पर्यावरण किसे कहते हैं? | परिभाषा, प्रकार, महत्त्व, समस्याएं, लाभ | paryavaran kise kahate hain

पर्यावरण किसे कहते हैं?

पर्यावरण शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है परि+आवरण इसमें परि का अर्थ होता है चारों तरफ से एवं आवरण का अर्थ है 'ढके हुए। अंग्रेजी में पर्यावरण को Environment कहते हैं इस शब्द की उत्पकि 'Envirnerl' से हुई और इसका अर्थ है-Neighbonrhood अर्थात आस-पड़ोस। पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है हमारे आस-पास जो कुछ भी उपस्थित है जैसे जल-थल, वायु तथा समस्त प्राकृतिक दशाएँ, पर्वत, मैदान व अन्य जीवजन्तु, घर, मोहल्ला, गाँव, शहर, विद्यालय महाविद्यालय, पुस्तकालय आदि जो हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।
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"डगलस व रोमन हॉलेण्ड के अनुसार “पर्यावरण उन सभी बाहरी शक्तियों व प्रभावों का वर्णन करता है जो प्राणी जगत के जीवन स्वभाव व्यवहार विकास एवं परिपक्वता को प्रभावित करता है।"

पर्यावरण के अवयव

सौरमंडल का पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है जिस पर कि मानव जीवन वनस्पति जीवन और पशु जीवन विकसित हो सका। पृथ्वी पर मानव सभ्यता और संस्कृति की प्रगति हुई। पृथ्वी को भूमण्डल भी कहते है।
इसके चार मण्डल निम्नलिखित है- 
  1. स्थल मंडल
  2. जल मंडल
  3. वायुमंडल
  4. जैव मंडल

स्थल मण्डल (Lithosphere)
पृथ्वी के सबसे ऊपर की ओर ठोस परत पाई जाती है यह अनेक प्रकार की चट्टानों मिट्टी तथा ठोस पदार्थो से मिलकर बनी होती है। इसे ही स्थल मंडल कहते है। स्थलमंडल में भूमि भाग व समुद्री तल दोनों की आते हैं। स्थल मंडल सम्पूर्ण पृथ्वी का केवल 3/10 भाग है शेष 7/10 भाग समुद्र ने ले लिया है।

जल मण्डल (Hydrosphere)
पृथ्वी के स्थल मण्डल के नीचे के भागों में स्थित जल से भरे हुए भाग को जल मण्डल कहते हैं जैसे झील, सागर व महासागर आदि। 97.3% महासागरों और सागरों में है। शेष 2.7% हिमनदो और बर्फ के पहाड़ों, मीठे जल की झीलों नदियों और भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है।

वायुमण्डल (Atmosphere)
भूमण्डल का तीसरा मण्डल वायुमण्डल है। स्थल मण्डल व जल मण्डल के चारों और गैस जैसे पदार्थो का एक आवरण है। इसमें नाईट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बनडाइआक्साइड व अन्य गैसें, मिट्टी के कण, पानी की भाप एवं अन्य अनेक पदार्थ, मिले हुए हैं। इन सभी पदार्थो के मिश्रण से बने आवरण को वायुमण्डल कहते है।
वायुमण्डल पृथ्वी की रक्षा करने वाला रोधी आवरण है। यह सूर्य के गहन प्रकाश व ताप को नरम करता है। इसकी ओजोन (O3) परत सूर्य से आने वाली अत्याधिक हानिकारक पराबैंगनी किरणों को सोख लेती है। इस प्रकार यह जीवों की विनाश होने से रक्षा करती है।

जैव मण्डल (Biosphere)
जैव मण्डल का विशिष्ट लक्षण यह है कि वह जीवन को आधार प्रदान करती है। यह एक विकासात्मक प्रणाली है। इसमें अनेक प्रकार के जैविक व अजैविक घटकों का संतुलन बहुत पहले से क्रियाशील रहा है। जीवन की इस निरन्तरता के मूल में अन्योन्याश्रित सम्बन्धों का एक सुघटित तंत्र काम करता है। वायु जल मनुष्य, जीव जन्तु, वनस्पति, लवक मिट्टी एवं जीवाणु ये सभी जीवन चरण प्रणाली में अदृश्य रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और यह व्यवस्था पर्यावरण कहलाती है। सौर ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है। ये जैवमण्डल को सजीव बनाए रखती है।।
जैव मण्डल को मिलने वाली कुल ऊर्जा का 99.98% भाग इसी से प्राप्त होता है।

पर्यावरण के प्रकार

विभिन्न पर्यावरणविद ने पर्यावरण के विभिन्न-विभिन्न प्रकार दिए। वैसे मुख्य रूप से पर्यावरण तीन रूपों में पाया जाता है:-
  1. भौतिक पर्यावरण या प्राकृतिक पर्यावरण
  2. जैविक पर्यावरण
  3. जानवरों का वातावरण

भौतिक पर्यावरण या प्राकृतिक पर्यावरण
इसके अंतर्गत वायु, जल व खाद्य पदार्थ भूमि, ध्वनि, उष्मा प्रकाश, नदी, पर्वत, खनिज पदार्थ, विकिरण आदि पदार्थ शामिल हैं। मनुष्य इनसे लगातार सम्पर्क में रहता है इसलिए ये मनुष्य के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

जैविक पर्यावरण
जैविक पर्यावरण बहुत बड़ा अवयव है जो कि मनुष्य के इर्द-गिर्द रहता है। यहाँ तक कि एक मनुष्य के लिए दूसरा मनुष्य भी पर्यावरण का एक भाग है।
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जीवजन्तु व वनस्पति इस घटक के प्रमुख सहयोगी है।
जैविक पर्यावरण को दो भागों में बाँटा गया है।
  1. पौधों का वातावरण
  2. जीवों का वातावरण

जानवरों का वातावरण
मनो-सामाजिक पर्यावरणः- मनो-सामाजिक मनुष्य के सामाजिक संबंधों से प्रगट होता है। इसके अंतर्गत सामाजिक आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों में मनुष्य के व्यक्तिगत के विकास का अध्ययन करते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसे परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, पत्नि तथा समाज में पड़ौसियों के साथ संबंध बना कर रहना पड़ता है। उसे समुदाय प्रदेश एवं राष्ट्र से भी सम्बन्ध बना कर रहना पड़ता है। मनुष्य सामाजिक व सांस्कृतिक पर्यावरण का उत्पाद है जिसके द्वारा मनुष्य का आकार तैयार होता है। रहन-सहन, खान-पान, पहनावा-औढ़ावा, बोल-चाल या भाषा शैली व सामाजिक मान्यताएँ मानव व्यक्तिगत का ढाँचा बनाती है।

पर्यावरण के हानिकारक तत्व

पर्यावरण को निम्नलिखित तत्व हानि पहुँचाते है:-

हानिकारक गैसें
जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वन काटकर औद्योगिक धंधों का विस्तार करता जा रहा है। कल-कारखानों से जहरीली गैंसों का उत्सर्जन होता है जिससे हमारे सम्पूर्ण विश्व का पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है। प्रदूषण से विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ फैलती जा रही हैं। नाक, साँस लेने में परेशानी, पीलिया होना, सिरदर्द, दृष्टिदोष, क्षयरोग व कैंसर आदि रोग जहरीली गैसों के कारण होते है।
नियंत्रण मनुष्य के हानिकारक गैसों से बचने के निम्न लिखित उपाय है-
परम्परागत ईधन स्त्रोतों को छोड़ कर नवीन ईधन प्रणाली एल.पी.जी. गैस प्रणाली को अपनाना चाहिए।
उद्योग एवं कारखानों के क्षेत्र में हरे वृक्ष एवं विभिन्न प्रकार के पौधे लगाकर प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

जल प्रदूषण
जल प्रदूषण का प्रभाव विश्व के समस्त देशों को प्रभावित करता है। समुद्री प्रदूषण को खनिज तेलों को ले जाने वाले जहाजों के दुर्घटनाग्रस्त होने व नदियों के प्रदूषित जल का समुद्र में मिलना आदि बढ़ावा देते हैं। समुद्री जल के प्रदूषण से जीव-जन्तु व मनुष्य के जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ते हैं और संक्रामक रोग हो जाते हैं। प्रदूषण को रोकने का भरसक प्रयास करना चाहिए। विश्व पर्यावरण सम्मेलन में समुद्र में होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए राज्यों को ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे मनुष्य व समुद्री जीव-जन्तुओं के स्वास्थ्य को हानि न हो।

रेगिस्तानीकरण
पृथ्वी पर यदि मरूस्थल क्षेत्र बढ़ जाता है तो मनुष्य के लिए गम्भीर समस्या खड़ी हो जाती है। इसके मुख्य कारण पृथ्वी में पानी की कमी वन क्षेत्रों का मनुष्य द्वारा किया गया विनाश, संरक्षण प्रदान करने वाली पहाड़ियों की निर्जनता तथा जनसंख्या में वृद्धि होना। मरुस्थल का ताप 0°C हो जाता है जिससे मनुष्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे बचने के लिए सबसे पहले वनों की कटाई रोकनी पड़ेगी।

विकरणीय प्रदूषण
विकरणीय प्रदूषण मानवीय स्वास्थ्य एवं उसके विकास के लिए हानिकारक होता है। इसका प्रभाव मानव शरीर के आंतरिक व बाहरी भागों पर पड़ता है। इसलिए रेडियोधर्मी विकिरण से बचना चाहिए। X-Rays किरणों के उपयोग को विशेष परिस्थिति में स्वीकार करना चाहिए तथा इनके अधिक प्रयोग से बचना चाहिए।

पर्यावरण शिक्षा का अर्थ

प्रत्येक मनुष्य यदि ये अच्छी प्रकार से समझे कि किये गये कार्यो से ही पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। हमारी पृथ्वी जो कि प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है रिक्त होती जा रही है। भविष्य की बात तो छोड़े वर्तमान जीवन भी कठिन हो गया है इसलिए यह सम्भव कि एक तरह से नष्ट हो रही पृथ्वी की स्थिति पर कुछ नियंत्रण किया जा सकता है और उसे विनाश से बचाया जा सकता है।

पर्यावरण शिक्षा की परिभाषा

टेलर, चौपमेन के अनुसार :- “पर्यावरण शिक्षा का अभिप्राय सदनागरिक विकसित करने के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को पर्यावरणीय मूल्यों एवं समस्याओं पर केन्द्रित करना है ताकि सदनागरिकता का विकास हो सके तथा अधिगमकर्ता पर्यावरण के सम्बंध में अनभिज्ञ प्रेरित व उत्तरदायी हो सके।"

स्वान के अनुसार
“पर्यावरण शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा ऐसी नागरिकता का विकास किया जाये जो अपने पर्यावरण तथा उससे 1939 थीन मैन ने इस तंत्र को जैव तंत्र (Biosystem) कहा।

पर्यावरण की आवश्यकता

प्रकृति का क्षेत्र अधिक विस्तृत तथा रहस्यमय है जो कि पर्यावरण के साथ जुड़ा हुआ है। मनुष्य विकसित तथा सामाजिक प्राणी है इसलिए वह प्राकृतिक घटनाओं का ज्ञान व उसके कारण ढूँढ़ता है। खेत, बगीचे, नदी, झरने आदि व जन्तु आदि पर्यावरण को सुन्दर व स्वच्छ बनाते हैं। प्रकृति की गोद में बालक जाकर प्राकृतिक दृश्यों का बोध करता है और आँखों से देखकर हाथों से स्पर्श कर उन्हें समझ लेता है। यूनिसेफ ने प्राथमिक स्तर पर एक योजना पर्यावरणीय शिक्षा विद्यालयों में शुरू कर दी है। इसके द्वारा विद्यार्थियों को शिक्षण दिया जाता है। जिससे वे पर्यावरण के प्रति जागरूक भी हो जाते है।

पर्यावरण का महत्व

आज बढ़ते हए प्रदूषण की दुनिया में पर्यावरण का निम्नलिखित महत्व है-
  • जब विद्यार्थी प्रकृति के सम्पर्क में आता है तो उसकी निरीक्षण शक्ति बढ़ती है।
  • पर्यावरण प्रदूषण से कौन से रोग उत्पन्न हो सकते हैं तथा इससे क्या हानि है और उनसे बचाव के उपाय कौन-कौन से है।
  • विद्यार्थियों में प्रकृति के रहस्य जानने की स्वाभाविक लालसा रहती है उससे उनका व्यक्तिगत विकसित होता है।
  • विद्यार्थियों में सामाजिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक पर्यावरण के माध्यम से सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों का विकास किया जात सकता है।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण को परिपक्च बनाने के लिए तथा उसे स्वस्थ बनाने के लिए प्रकृति का सम्पर्क छात्रों के लिए आवश्यक है।
  • विज्ञान शिक्षण के लिए भी पर्यावरण का महत्वपूर्ण योगदान है।

पर्यावरण के प्रति शिक्षकों में जागरूकता
आज पर्यावरण पदूषण विश्वव्यापी ज्वलन्त समस्या है। इस समस्या के समाधान के लिये प्रत्येक आयु वर्ग के सभी स्त्री-पुरूषों में पर्यावरण के प्रति सकारात्मक संचेतना का होना अनिवार्य है। यह दायित्व शिक्षक ही निभा पाता है। शिक्षक देश के विकास व सामाजिक परिवर्तन में प्रायः महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षा द्वारा महत्वपूर्ण कार्यों की क्रियान्विति के लिए है। शिक्षक की भूमिका ही सशक्त होती है।
पर्यावरण जागरूकता के लिए शिक्षक निम्न प्रकार से अपना योगदान दे सकते हैं-

विद्यालय में शिक्षक द्वारा प्रवृत्तियों का आयोजन
  • शिक्षक पर्यावरण को प्रदूषित होने से रोकने के लिए विद्यालय की नियमित सफाई करवाता है।
  • विद्यालय के छात्रावास में कमरों की सफाई तथा स्वच्छ पानी की व्यवस्था करना।
  • विद्यालय तथा छात्रावास में पुस्तकालय तथा वाचनालय की व्यवस्था को व्यवस्थित ढंग से संचालित करना।
  • विद्यालय में पीने की पानी की व्यवस्था करना।
  • विद्यालय में मध्यांह भोजन या स्वल्पाहार की व्यवस्था करना।
  • विद्यार्थियों को अपने शरीर बाल, तथा नाखून आदि से सम्बद्ध स्वच्छता के अभ्यास के लिए विद्यालय में दर्पण, नेल कटर कंधा आदि सभी चीजों की व्यवस्था करना।
  • छात्रावास में रसोईघर की व्यवस्था करना।

विभिन्न विद्यालयों में कार्यक्रम
  • विभिन्न विद्यालयों में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयेजित किये जाने चाहिए जिससे जनतांत्रिक भावना की दृष्टि का विकास होता है।
  • विद्यार्थियों के लिये चुनाव कराना जिससे उनका ही अधिकार चुना जाये।
  • बाल सभा का आयोजन।
  • छात्र-संसद का बजट निर्माण, स्वीकृति एवं उपयोग की व्यवस्था की जाये।
  • विद्यालय में अल्प-बचत व्यवस्था।
  • विद्यालय में सामाजिक उत्सवों की व्यवस्था।

जनतंत्रात्मक प्रवृत्तियाँ
विद्यालय में निम्नलिखित माध्यम द्वारा पर्यावरण शिक्षा देना जिससे जनतंत्र में कौशल एवं दक्षताओं का विकास होता है ये निम्न लिखित हैं-
वाद-विवाद प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाना चाहिए।
निबन्ध लेखन प्रतियोगिता का आयोजन करना चाहिए जिसका कि विषय पर्यावरण प्रदूषण की समस्याओं के कारण तथा उन्हे कम करने के उपाय" तथा "पर्यावरण प्रदूषण को किस प्रकार रोका जा सकता है आदि होने चाहिए।
रेडियो, समाचार सुनने की व्यवस्था की जायें।

पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का आयोजन
शिक्षक द्वारा पर्यावरण शिक्षा के अन्तर्गत विद्यार्थियों द्वारा विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ करवायी जा सकती हैं जिससे पर्यावरण में सुधार हो सके जैसे (1) वृक्षारोपण करवाना तथा वनों का संरक्षण। (2) जहाँ कहीं भी गन्दा दिखे वहाँ की सफाई करने एवं करवाने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित करना जैसे नदी, जलाशय, शहरों की गन्दी नालियों की सफाई, सड़क पर गन्दगी आदि।

पर्यटन
विद्यार्थियों को भ्रमण एवं पर्यटन के माध्यम से विशिष्ट स्थलों एवं आत्म विवृतियों तथा प्रदूषणों को दृष्टान्त बताकर, पर्यावरण प्रदूषण से सम्बन्धित स्थलों पर ले जाकर प्रदूषण द्वारा पड़ रहे प्रभावों का निरीक्षण करवाना चाहिए जिससे विद्यार्थी अवलोकन कर अनुभव प्राप्त कर सकें।

जनसंख्या नियंत्रण
जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास हेतु शिक्षक अपने योग्य विद्यार्थियों के साथ गाँवों कस्बों तथा झुग्गी-झोपड़ियों में जाकर श्रव्य-दृश्य सामग्रियों एवं छोटे-छोटे नाटकों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण संबंधी तथ्यों को जनसामान्य तक प्रभावी ढंग से पहुँचा सकते हैं।

आदतों का विकास
शिक्षक अपने विद्यार्थियों को बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक ऐसी आदतों का विकास किया जा सकता है जो आजीवन चिरस्थायी प्रभाव वाले होते हैं जैसे रात के समय पेड़ो के नीचे वहीं सोना चाहिए, वनों को नहीं काटना, पानी का दुरुपयोग नहीं करना, घर तक तथा उसके आस-पास के वातावरण को साफ रखना आदि।

प्रदूषण से हानि
पर्यावरण को समझने, प्रदूषण से हानि ज्ञात करने, हवा, जल के प्रदूषण को पहचानने, वन्य जीवन के विनाश के दुष्परिणामों को जानने, भूसंरक्षण पर निरन्तर ध्यान देने के लिए पर्यावरण शिक्षा आवश्य है। विद्यार्थियों को चिपको आन्दोलन' जैसी हियाओं को समझाना होगा जहाँ वन-विनाश को रोकने तथा वायु एवं जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिये जन-आन्दोलन का सहारा लिया जाता है अतः पर्यावररणीय समस्याओं के समाधान के लिये ऐसी अभिप्रेरणा विकसित करनी होगी।

पर्यावरणीय संकट
पर्यावरणीय संकट को समझने तथा उसे कम करने के लिए शिक्षक निम्न साधनों का उपयोग भी कर सकता है, यह कार्य शिक्षा विभाग एवं पर्यावरणीय शिक्षा द्वारा राज्य एवं केन्द्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। ये संचार के माध्यम निम्नलिखित रूप से अनुपयोगी है।
  • इकोलॉजी क्लब :- इस क्लब के अन्दर पारिस्थितिकी से संबंधित चार्टस, मॉडल्स आशुरचित उपकरण, प्रदर्शन की अन्य सामग्री, साहित्य, फिल्म स्ट्रिप्स, समाचार पत्र-पत्रिकाएं आदि होती हैं। यह पर्यावरणीय शिक्षा से जुड़े शिक्षक द्वारा चलाया जाता है। इससे पर्यावरण से संबंधित साहित्य का ज्ञान, पर्यावरण संरक्षण का ज्ञान, पर्यावरण की उपयोगिता, अच्छे स्वास्थ्य, नवीन सूचनाएं, पर्यावरण के बारे में आस्था बढ़ना आदि का लाभ होता है।
  • इकोलॉजी प्रयोगशाला - यह पर्यावरण से संबंधित वस्तुओं का स्थल है। इसमें पर्यावरण के चार्टस, पोस्टर्स तथा अन्य प्रदर्शन सामग्री होती है। इसके द्वारा शिक्षक पर्यावरण के संरक्षण, स्वच्छता, पोषण तथा स्वास्थ्य सबंधी ज्ञान मिलता है।
  • पुस्तकालय :- शिक्षक द्वारा पुस्तकालय का उपयोग कर पर्यावरण शिक्षा दी जाती है।
  • दृश्य-श्रव्य उपकरणों का उपयोगः- पर्यावरणीय शिक्षा देने के लिए शिक्षक द्वारा टी.वी.वी.सी.आर., फिल्म स्ट्रिप, रेडियों टेपरिकार्डर आदि का उपयोग किया जाता है।
इस प्रकार शिक्षक एक कुम्हार के समान होता है जिसके द्वारा समाज एवं राष्ट्र के भावी कर्णधारों का निर्माण होता है। अतः शिक्षक पर्यावरण के प्रसार में प्रभावी एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

पर्यावरण की प्रति विद्यालय की भूमिका
पर्यावरण संबंधी संरक्षण में विद्यालय की भूमिका को निम्न माध्यमों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है या निम्नलिखित कार्यक्रम आयोजित किये जा सकते है-
  • विद्यालय को समय-समय पर खेल, नाटक, कहानियों से विद्यार्थियों को परिचित करना चाहिए।
  • समय-समय पर दूर-दर्शन, फिल्म एवं रेडियो के माध्यम से पर्यावरण संबंधी ज्ञान एवं विद्वानों के विचारों से विद्यार्थियों को अवगत कराना चाहिए।
  • विद्यालय में विद्यार्थियों को समय-समय पर संतुलित भोजन स्वच्छता एवं प्राकृतिक वातावरण के महत्व एवं उसकी उपयोगिता के विषय में बताना चाहिए।
  • विद्यालय पुस्तकालय में पर्यावरण शिक्षा का साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होना चाहिए।
  • कविता पाठ, कवि-सम्मेलन, संगीत सम्मेलन आदि का आयोजन किया जाना चाहिए।
  • विद्यालय में संगोष्ठियों का आयोजन कर भी पर्यावरण शिक्षा दी जा सकती है।
  • रेडियों पर आकाशवाणी के प्रमुख कार्यक्रमों को आयोजन विद्यार्थियों को सुनाया जा सकता है।
  • रेडियों के माध्यम से विद्वानों के विचारों को विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता हैं
  • विद्यालय में टी.वी. की व्यवस्था कर पर्यावरण संबंधी कार्टून, फिल्म, नाटक विद्यार्थियों को दिखाये जा सकते है। लोक संचार परिषद नई दिल्ली द्वारा कई अभिनयात्मक फिल्म ऐसी तैयार की गई है जो पर्यावरणीय बोध स्वरूप एवं संरक्षण द्वारा उनके रचनात्मक स्वरूप को दिग्दर्शन कराती है।
  • संसद विधान सभा या संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के कृत्रिम 'मोकसेशन' का प्रदर्शन किसी महापुरुष के कृतित्व के विषय में प्रदर्शन आदि चलचित्र में पूर्ण नाटकीकरण कर उसकी टेपिंग कर फिल्मांकन किया जा सकता है।
  • विद्यालय में वाद-विवाद प्रतियोगिता एवं बालसभा में पर्यावरण प्रदूषण एवं उसके नियंत्रण संबंधी उपायो पर चर्चा करना चाहिए।
  • इस प्रकार वातावरण उत्पन्न करना चाहिए जिससे प्रत्येक विद्यार्थी पर्यावरण के प्रति जागरूक हो जाये।
अतः पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए, पर्यावरण को स्वस्थ बनाये रखने के लिए पर्यावरण शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है और पर्यावरण शिक्षा का आवश्यक माध्यम विद्यालय है। प्रो. एस.के. दुबे के अनुसार “विद्यालय के सहयोग के अभाव में जन सामान्य तथा समाज में पर्यावरणीय जागरूकता पैदा नहीं की जा सकती है क्यों कि विद्यालय ही वह आधार है जिस पर पर्यावरणीय भवन खड़ा किया जा सकता है अन्यथा संपूर्ण प्रयास निरर्थक ही सिद्ध होंगे।"

पर्यावरणिय परिवेश में कार्यक्रम आयोजन एवं गतिविधिया
पर्यावरण विभाग में भारत सरकार ने सन् 1982-83 से प्रारम्भ किये हैं इन्हे पारिस्थितिकी विकास शिविर, व्याख्यान श्रृंखला, प्रशिक्षण कार्यक्रम, फिल्म प्रदर्शन, प्रदर्शनियों तथा कार्य गोष्ठियाँ आयोजन कर क्रियान्वित किया गया है। पर्यावरण को स्वच्छ एवं उसके प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए निम्न माध्यम होते है-

पर्यावरणीय खेल - खेल बालकों के शारीरिक विकास के लिए जरूरी है। विद्यार्थियों की अभिवृति एवं विषय वस्तु पर ध्यान केन्द्रित करने के लिये एक अच्छा साधन है। खेल उन गुणों का बढ़ाता है जिससे उसका व्यक्तित्व बनता है। खेल निम्नलिखित प्रकार से विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है
  1. प्रतिरोधक क्षमता - खेलों द्वारा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। जिससे स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है।
  2. तार्किक शक्ति का विकास :- खेलों द्वारा मानसिक विकास होता है और तार्किक तथा काल्पनिक शक्ति भी बढ़ती है।
  3. अनुशासन :- खेलों द्वारा सामाजिक गुणों का विकास होता है जिससे अनुशासन उत्तरदायित्व तथा दूसरों की सहायता से जैसे गुणों की वृद्धि होती है।
  4. नियंत्रण क्षमता :- खेलो द्वारा विद्यार्थियों के संवेगो में नियत्रंण की क्षमता उत्पन्न करता है इसके द्वारा कायरता तथा चिड़चिडेपन को दूर होता है।
  5. गतिविधियों द्वारा सूचना विश्लेषण :- खेलों द्वारा की गतिविधियां द्वारा सूचना का विश्लेषण किया जाता है।
  6. पर्यावरण संरक्षण :- खेल द्वारा पर्यावरण संरक्षण किया जा सकता है।
  7. पर्यावरण संतुलन एवं प्राकृतिक विरासत :- पर्यावरण संतुलन एवं प्राकृतिक विरासत की महत्ता जैसे कठिन प्रयत्नों को सहजता एवं आसानी से समझाने का प्रयत्न किया जा सकता है।

चलचित्र या फिल्म
शिक्षा की दृष्टि से मनोरंजन के साथ-साथ शैक्षिक क्रिया को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण साधन होता है। इसके माध्यम से दूरस्थ परिस्थितियों को भी उसी रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। आजकल विद्यार्थियों में अच्छी आदतों के निर्माण तथा नैतिकता चारित्रिकी विकास और इसी प्रकार नागरिकता के गुणों से सम्बद्ध अनेक चलचित्र बनाये जाते हैं। लोक संचार नई दिल्ली द्वारा अनेक अभिनयात्मक फिल्म ऐसी तैयार की गयी है जो पर्यावरणीय बोध उसके फलस्वरूप एवं संरक्षण द्वारा उसके रचनात्मक स्वरूप को स्पष्ट करती है।

अभिनय
ऐतिहासिक प्रकरणों तथा कठिन पर्यावरणीय अध्ययन के सम्प्रत्ययों को अभिनय के रूप में बोधगम्य एवं सुगम बनाया जा सकता है। छोटी कक्षाओं में इन्हें वार्तालाप के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उपयुक्त रहता है। पर्यावरण बचाओ जैसे अभिनय विद्यालय में कराये जा सकते है।

पारिस्थितिक तंत्र

सन 1935 में टेन्सले ने पारिस्थितिक तंत्र शब्द की रचना सर्व प्रथम की थी वह तंत्र जो दो प्रकार के घटक जैविक और अजैविक से मिलकर बना होता है वह तंत्र पारिस्थितिक तंत्र कहलाता है।

जैविक घटक (Biotic Component) :- इसके अन्तर्गत समस्त जीवधारियों को रखा गया है इसमें जन्तु और वनस्पति दोनों सम्मिलित है ये आपस में संबंधित होते है।
जैविक घटक दो प्रकार के होते है-
  1. स्वपोषी घटक
  2. परपोषित घटक

स्वपोषी घटक (Auto trophs)
वे जीव जो अपना भोजन स्वय बनाते है वे स्वपोषी घटक कहलाते है जैसे हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा अपना भोजन (कार्बोहाइड्रेट्स) बनाते है इन्हे स्वपोषी घटक कहते है और स्वपोषी जीवों को उत्पादक (Producers) कहते है। प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis)
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परपोषित घटक (Heterotoroprophs)
वे जीव जो अपने भोजन के लिए स्वपोषित जीवों द्वारा निर्मित जैविक पदार्थों पर निर्भर करते हैं वे पर-पोषी जीव कहलाते है ये निम्नलिखित प्रकार के होते है-
  • उपभोक्ता (consumer) :- जो जीव कार्बनिक भोजन को ग्रहण कर शरीर के अन्दर उसका पाचन करके सरल कार्बनिक पदार्थों में बदलते हैं जीव-भक्षी कहलाते है इन्हें उपभोक्ता भी कहते है ये तीन प्रकार के होते है
  • उपभोक्ता प्रथम या शाकाहारी (consumer or Harvi-vores) :- वे जन्तु जो अपने भोजन के लिए हरे पौधों अर्थात उत्पादकों को निर्भर रहते (Depend) है। उन्हे उपभोक्ता प्रथम कहते है।
  • उपभोक्ता द्वितीय या मांसाहारी (consumer II or carnivorus) :- इस प्रकार के उपभोक्ता शाकाहारी अर्थात प्रथम उपभोक्ता का उपभोग करते है इन्हें उपभोक्ता द्वितीय कहते हैं। ये मांसाहारी होते है जैसे लोमड़ी।
  • उपभोक्ता तृतीय या सर्वहारी Consumer Ill or omvi vorus) :- वे जीव जो कि द्वितीय उपभोक्ता का उपभोग करते हैं तृतीय उपभोक्ता कहलाते है। प्रथम उपभोक्ता उत्पादक और द्वितीय उपभोक्ता प्रथम उपभोक्त तथा तृतीय उपभोक्ता, द्वितीय उपभोक्ता के ऊपर निर्भर रहते है। उपरोक्त उपभोक्ता को वृहद् उपभोक्ता (Macro consumers) कहते है इसके अतिरिक्त उपभोक्ता भी होते हैं जिन्हे अपघटक भी कहते है।
  • अपघटक (Decomposers) :- वे जीव जो जीव उत्पादकों तथा वृहद् उपभोक्ताओं के मृत शरीर को अपघटित कर, सरल कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं ये बहुत सूक्ष्म होते है इसलिए अपघटकों को सूक्ष्म उपभोक्ता भी कहते हैं जैसे जीवाणु (Bacteria) कवक (fungus) आदि अपघटन की क्रिया द्वारा अकार्बनिक पदार्थ वातावरण में मुक्त हो जाते है और फिर से उत्पादकों के लिए उपलब्ध हो जाते है और इस प्रकार ये पर्यावरण को बनाये रखते है।

अजैविक घटक (Abiotic component) :- निर्जीव पदार्थ जो पर्यावरण में उपस्थित रहते है उन्हे पारिस्थितिक तंत्र के अजैविक घटक (Abiotic component) कहते है।
ये तीन प्रकार के होते है-
  • जलवायवीय कारक
  • कार्बनिक पदार्थ
  • अकार्बनकि पदार्थ

  1. जलवायवीय कारक :- वे कारक जो पर्यावरण में उपस्थित रहते है जैसे वायु, प्रकाश, ताप, वर्षा आदि 
  2. कार्बनिक कारक :- प्रोटीन्स, कार्बोहाइड्रेट्स वसा आदि पदार्थ जीवों की मृत्यु के बाद उनके शरीर से अपघटित होते है।
  3. अकार्बनिक पदार्थ :- नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, सल्फर, कार्बन आदि अकार्बनिक पदार्थों के द्वारा कार्बनिक पदार्थ संश्लेषित होते है। इसका उपयोग सर्वप्रथम उत्पादक द्वारा किया जाता है और यहां से ये उपभोक्ता में जाते है और अपघटकों द्वारा अपघटित होकर पुनः वातावरण में मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार ये पदार्थ चक्रीय पथ से गुजरते हैं तो इसे जैव-भू रायसायनिक चक्र कहते है।

पारिस्थितिक तंत्र की परिभाषा

लिण्डमेन के अनुसार - “किसी भी आकार की किसी भी क्षेत्रीय इकाई में भौतिक - जैविक क्रियाओं द्वारा निर्मित व्यवस्था पारिस्थितिक तंत्र (ecosystem) कहलाती है।"

ओडम के अनुसार - “पारिस्थितिक तंत्र पारिस्थितिक की एक आधारभूत इकाई है जिसमें जैविक एवं अजैविक पर्यावरण परस्पर प्रभाव डालते हुए पारस्परिक अनुक्रिया से ऊर्जा और रासायनिक पदार्थों के संचार से पारस्थितिक तंत्र की कार्यात्मक गतिशीलता को बनाए रखते है।"

थ्रीमेन के अनुसार :- “वह इकाई जिसमें सभी जैविक तत्व पाये जाते है अर्थात् क्षेत्र के सामुदायिक जीव परस्पर अन्तक्रिया करते है अपने भौतिक वातावरण से भी अन्तः क्रिया करते हैं जिससे ऊर्जा का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है इस्से जैव जगत व भौतिक जगत में ऊर्जा का आदान - प्रदान होता है इसे ही पारिस्थितिक तंत्र कहते है।"

पारिस्थितिक तंत्र के प्रकार

क्रियाशीलता के आधार पर पारिस्थितिक तंत्र निम्नलिखित प्रकार के होते है-
  1. स्वयं समर्थ पारिस्थितिक तंत्र (Self sufficient ecosystem) : पारिस्थितिकी तंत्र में यदि कोई परिवर्तन आ जाता है तो उस तंत्र के अन्य घटक स्वंय स्थिति को नियंत्रण में कर लेते है।
  2. अपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Incomplete Ecosystem) : सभी पारिस्थितिकी तंत्र में चार घटक उत्पादक, उपभोक्ता अपघटक और अजैविक घटक होते है यदि इनमें से एक घटक की भी कमी हो जाती है तो इस तंत्र को अपूर्ण परिस्थितिकी तंत्र (Incomplete ecosystem) कहते है।
  3. विकृत पारिस्थितिकी तंत्र (Degraded Ecosystem) : वह पारिस्थितिकी तंत्र जिसमें उत्पादक एवं उपभोक्ता के सामान्य अनुपात में कमी या वृद्धि हो जाती है जिससे पारिस्थितिक तंत्र विकृत हो जाता है तो इसे विकृत पारिस्थितिक तंत्र कहते है।
  4. अनियंत्रित पारिस्थितिकी तंत्र (Uncontrolled Ecosystem) : यह परिस्थितिक तंत्र जिसमें मनुष्य के द्वारा क्रियाकलाप कर पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो जाता है। तो इसे अनियंत्रित परिस्थितिक तंत्र कहते है।
मुख्य रूप से दो प्रकार है
  1. प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (Natural Ecosystem)
  2. कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र (Artificial Ecosystem)

1. प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (Natural Ecosystem) :- वे तंत्र जो कि स्वयं प्राकृतिक रूप से संतुलित रहते है, इन पर मनुष्य का अधिक हस्तक्षेप नहीं रहता है आवासीय स्थिति के आधार पर यह निम्न लिखित प्रकार के होते है-

1. स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र (Terrestril Ecosystem)
वे पारिस्थितिकी तंत्र जो कि थल में पाये जाते है वे स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र कहलाते है जैसे वन पारिस्थितिकी तंत्र, मरूस्थलीय एवं घास के मैदान का पारिस्थितिक तंत्र।

मरूस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र (Desert Ecosystem)
पृथ्वी के लगभग 17% भाग पर उष्ण मरूस्थल है। यहाँ का पर्यावरण अल्प वर्षा व उच्च ताप के कारण विशेष होता है। यहाँ पर जल की कमी होती है जिससे यहाँ की वनस्पति भी विशेष प्रकार की होती है तथा शुण्कता के कारण बालू के स्तूपों का सर्वत्र विस्तार होता है। मरूस्थल क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति कंटीली झाड़ियाँ छोटी घास व कुछ शुण्कता सहन करने वाले वृक्ष होते हैं। मरूस्थलीय क्षेत्र में रेंगने वाले व अन्य जीवों के साथ ऊँट, भेड़, बकरी की संख्या अधिकाधिक होती है जो कम वर्षा तथा अल्प भोजन पर जीवन व्यतीत कर सकें। इन क्षेत्रों में अपघटक क्रिया अपेक्षाकृत कम होती है। इन प्रदेशों में पशु पालन के साथ जहाँ जल उपलब्ध हो जाता है मोटे अनाज की खेती भी की जाती है। ऐसा अनुमान है कि मरूस्थलीय क्षेत्र में जल उपलब्ध हो जाए तो वहाँ भी उत्तम कृषि हो सकती है जैसा कि नील नदी की घाटी में थार के इन्दिरा गाँधी नगर क्षेत्र में आदि। इन क्षेत्रों के पारिस्थितिक तंत्र में फिर परिवर्तन आ जाता है और खेती भी आसानी से की जा सकती है।

वनीय पारिस्थितिक तंत्र (Forest Ecosystem)
पृथ्वी सौर मण्डल का ऐसा बहुत बड़ा गृह है जिस पर कि जीवन सम्भव है। इसके विस्तृत क्षेत्रों में वनों का विस्तार है। एक ओर सदाबहार उष्ण कटिबन्धीय वन हैं तो दूसरी ओर शीतोष्ण के पतझड़ वाले एवं शीत-शीतोष्ण के सीमावर्ती प्रदेशों के कोणधारी वन हैं। वन या प्राकृतिक वनस्पति जहाँ एक ओर पर्यावरण के विभिन्न तत्वों जैसे ताप दाब वर्षा, आर्द्रता, मृदा आदि को नियंत्रित करते हैं वही उनका अपना पारिस्थितिक तंत्र होता है। वनीय क्षेत्रों की मृदा में मिश्रित कई खनिज लवण व वायु मण्डल के तत्व इस प्रदेश के अजैविक तत्वों उत्पादक, उपभोक्ता व अपघटक के रूप में विभिन्न पौधे और जीव शामिल होते हैं। उत्पादक के रूप में वनीय प्रदेशों में विभिन्न प्रकार के वृक्ष होते हैं जो उष्ण शीतोष्ण व शीत दशाओं के साथ-साथ परिवर्तित होते हैं। इन सबके साथ-साथ विषुवतीय प्रदेशों में झाड़ियाँ, लताएं आदि की अधिक संख्या में पाई जाती हैं। प्राथमिक उपभोक्ताओं में विभिन्न प्रकार के जानवर जो वनस्पति का प्रयोग करते हैं कीट, वृक्षों पर रहने वाले पक्षी द्वितीय उपभोक्ता में माँसाहारी जीव-जन्तु पक्षी शामिल है।
मनुष्य भी एक हद तक भक्षक का कार्य करता है। वनस्पति लगातार गिरती रहती है और सड़ जाती है व मृदा में मिल जाती हैं। इस प्रकार जीव-जन्तु भी मृत्यु के बाद जीवाणुओं द्वारा सड़ा दिए जाते हैं और उनका शरीर अपघटित हो जाता है और अंत में वे मृदा में मिल जाते है। विश्व के उष्ण कटिबन्धीय वनों की ओर वर्तमान में पर्याप्त ध्यान आकृष्ट है क्योंकि इनका तेजी से हो रहा विनाश विश्व पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरा है।

2. जलीय पारिस्थितिक तंत्र (Aquatic Ecosystem)
जलीय स्त्रोतो के पारिस्थितिकी तंत्रो को जलीय पारिस्थितिक तंत्र कहते है ये निम्न प्रकार के होते है।
अवलणीय जलीय पारिस्थितकी तंत्र :- ये अलवणीय जलीय स्थान का पारिस्थितिक तंत्र होता है इसे दो भागों में बांटा गया है
  • अ. बहते जल का पारिस्थितिकी तंत्र (Lotic Ecosystem) झरना, नदियाँ आदि का पारिस्थितिक तंत्र।
  • ब. रूके हए जल का पारिस्थितिक तंत्र (Lantic Ecosystem) झील तालाब पोखर, गंदा दलदल आदि का
  • पारिस्थितिक तंत्र।
लवणीय पारिस्थितिक तंत्र (Marine Ecosystem) : - समुद्र महासागर, खाड़ी आदि का पारिस्थितिक तंत्र।

कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र (Artificial Ecosystem)
वह पारिस्थितिक तंत्र जो मनुष्य द्वारा निर्मित किया जाता है वह कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र कहलाता है। इस तंत्र में ऊर्जा प्रवाह नियोजन एवं प्राकृतिक संतुलन में व्यवधान रहते है। जैसे खेत की फसल का पारिस्थितिक तंत्र, बाग का पारिस्थितिक तंत्र।

कृषि क्षेत्र पारिस्थितिक तंत्र
प्राकृतिक तंत्र के अलावा मनुष्य द्वारा भी पारिस्थितिक तंत्र निर्मित किए जाते हैं। मनुष्य के तकनीकी व वैज्ञानिक ज्ञान के कारण प्राकृतिक पर्यावरण के साथ सांमजस्य स्थापित कर नए पारिस्थितिक तंत्र का विकास किया गया है जैसे कृषि क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र। इसमें मनुष्य अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के रासायनिक तत्वों का प्रयोग करता है। मृदा में कृत्रिम उर्वरक डालकर उसमें खनिज लवणों की पूर्ति करता है। विशेष प्रकार के बीज सिंचाई व्यवस्था व तकनीकी प्रयोग से न केवल कृषि क्षेत्र में विस्तार करता है वरन उत्पादन में वृद्धि उन्नमता में विकास नई-नई फसलों के उत्पादन द्वारा अधिक विकास करता है। जब हम फसल लगाते हैं तो इन फसलों के साथ कई प्रकार के पौधे स्वतः ही उग आते हैं ये पौधे उपभोक्ता द्वारा उपभोग कर लिए जाते है इन फसलों से पत्ते-फल अनाज हम तथा पालतू जानवर भी खा जाते है, जब फसल पक जाती है तो विभिन्न कार्बनिक पदार्थ मृदा मे मिल जाते है। इस प्रकार प्राकृतिक पर्यावरण में परिवर्तन के साथ-साथ पारिस्थतिक तंत्र में परिवर्तन आ जाता है मानवीय प्रयास उसमें और अधिक समानुकूलन पैदा करते है जिससे कई नवीन पारिस्थितिक तंत्र का विकास हो जाता है।

स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र (Terristrial Ecosystem)
घास के मैदान का पारिस्थितिक तंत्र घास के मैदान में जैविक घटक के उत्पादक उपभोक्ता अपघटक और अजैविक घटक वायु, दाव, ताप और प्रकाश होते है-

जैविक घटक :- जैविक घटक निम्न लिखित है-

1. उत्पादक (Producer)
हरी घास यहां उत्पादक है हरी घास सूर्य प्रकाश (Sunlight) और क्लोरोफिल की उपस्थिति में अपना भोजन स्वयं बनाती है अर्थात् कार्बोहाइड्रेटस का निर्माण करती है इस क्रिया को प्रकाशसंश्लेषण कहते है और हरी घास को उत्पादक कहते है।

जलीय पारिस्थितिक तंत्र (Aquatic Ecosystem)
इसमें जैविक व अजैविक दोनों घटक पाए जाते है जैविक में घटक उत्पादक, उपभोक्ता व अपघटक होते है-

1. उत्पादक (Producer)
जलीय जैसे तालाब के पारिस्थितिक तंत्र में उत्पादक छोटी छोटी हरी घास शैवाल होती है।

2. उपभोक्ता (Consumer) 
  • उपभोक्ता प्रथम (Consumer I) तालाब के पारिस्थितिक तंत्र में छोटी छोटी शाकाहारी मछलियां होती है।
  • उपभोक्ता द्वितीय (Consumer - II) :- बड़ी बड़ी मछलियां जो कि छोटी मछलियों को अपना आहार बनाती है।

3. अपघटक (Decoveposers)
सूक्ष्मकीट होते है जो उपरोक्त सभी के मृत शरीर को अपघटित कर देते हैं।

अजैविक घटक :- जल, ताप, दाव, वायु, आर्द्रता आदि

पारिस्थितिक तंत्र का महत्व

पारिस्थितिकी तंत्र में जैविक व अजैविक घटक आपस में मिलकर इस प्रकार एक दूसरे से संयोग करते है कि एक सन्तुलित व्यवस्था बनी रहती है जैसे वन का पारिस्थितिकी तंत्र है जो अनेक कार्यों का सम्पादन कर पर्यावरण को संतुलित रखता है और स्वयं भी संतुलित रहता है।

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