पिछड़ी जातियाँ | pichdi jatiyan

पिछड़ी जातियाँ

भारतीय समाज में अनेक सामाजिक समूह एवं श्रेणियाँ पाई जाती हैं जिनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर्याप्त भिन्न-भिन्न है। कुछ समूह सामाजिक दृष्टि से श्रेष्ठ स्वीकार किए जाते हैं तथा वे समाज में पर्याप्त प्रतिष्ठा-सम्पन्न हैं। इसी प्रकार, कुछ आर्थिक दृष्टि से उच्च हैं तथा अधिक साधन-सम्पन्न एवं समृद्ध हैं। इनसे भिन्न, भारतीय समाज में कुछ ऐसे समूह भी हैं जो या तो सामाजिक दृष्टि से निम्न हैं या आर्थिक दृष्टि से पर्याप्त पिछड़े हुए हैं। इन समूहों के व्यक्ति एवं परिवार न तो सामाजिक प्रतिष्ठा से सम्पन्न हैं और न ही आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हैं। इनमें बहुत-से तो ऐसे हैं जो निर्धनता रेखा के नीचे अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। इन समूहों को भी हम समाज के 'दुर्बल वर्ग' कहते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं, “सामाजिक स्तरीकरण के अन्तर्गत निम्न सामाजिक स्थिति वाले तथा आर्थिक दृष्टि से अति अल्प साधन-सम्पन्न वर्गों को समाज के 'दुर्बल वर्ग' कहा जा सकता है।" सामाजिक दृष्टि से दुर्बल वर्गों को समाज में हीन दृष्टि से देखा जाता है तथा अन्य वर्ग उनसे एक निश्चित 'सामाजिक दूरी' बनाए रखते हैं। कभी-कभी दुर्भाग्यवश उन्हें सामाजिक तिरस्कार का भी सामना करना पड़ता है।
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भारतीय समाज में ऊँच-नीच, छुआछूत जैसी बुराइयों का मुख्य शिकार यही ‘दुर्बल वर्ग' रहा है। समाज के ये 'दुर्बल वर्ग' जहाँ सामाजिक दृष्टि से निम्न स्तर पर रहे हैं, वहीं ये वर्ग शिक्षा के प्रसार से भी प्राय: वंचित ही रहे हैं। समाज के इन दुर्बल वर्गों को अनुसूचित जातियों (Scheduled Castes), अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) तथा अन्य पिछड़े वर्गों (Other Backward Classes) के रूप में जाना जाता है।
पिछड़ी जातियों में अनुसूचित जातियों को तो सम्मिलित किया ही जाता है, साथ ही इन जातियों में आज दलितों को भी श्रेणीबद्ध किया जाता है। 'दलित' शब्द से अभिप्राय, जैसा कि इस शब्द से ही स्पष्ट होता है, वह व्यक्ति, जाति या वर्ग है जिसका समाज में अत्यन्त निम्न स्थान है, जो उत्पीड़न का शिकार है तथा जिसका जीवन अभाव, दुःख एवं अपमान का जीवन है। जब हम दलित शब्द का प्रयोग करते हैं तो हमारा अभिप्राय दुर्बल वर्गों के उन लोगों से है जिनकी आर्थिक स्थिति अत्यन्त निम्न है अर्थात् दुर्बल वर्गों में अत्यन्त निम्न वर्ग ‘दलित वर्ग' कहलाता है। इस प्रकार, भारत के विकास क्रम में 'दलित' शब्द का प्रयोग प्राय: अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों के ऐसे व्यक्तियों के सम्बन्ध में किया जाता है जो गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। गरीबी रेखा का निर्धारण योजना आयोग ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में गरीबी के आय प्रमाण-पत्रों के आधार पर करता है। योजना आयोग की दृष्टि में गरीब वे व्यक्ति कहे जाते हैं, जिनका उपभोग परिव्यय अपर्याप्त है, जिनकी क्रय शक्ति कम है तथा जिन्हें भोजन में न्यूनतम निर्धारित कैलोरी की मात्रा भी प्राप्त नहीं होती है। भारत में सदियों से पिछड़ी जातियाँ सवर्ण हिन्दुओं, मुसलमानों तथा अंग्रेज शासकों की राजनीतिक एवं धार्मिक शोषण की चक्की में पिसती रही हैं। उसकी मान-मर्यादा एवं जान-माल सभी कुछ अत्याचारियों की लोलुप दृष्टि का शिकार होती रही हैं। धार्मिक प्रहारों को सहन करते-करते पिछड़ी जातियाँ जर्जर हो चुकी हैं तथा इसी के परिणामस्वरूप उसमें सामाजिक अव्यवस्था, कुप्रथाएँ, आडम्बर और अन्धविश्वास फैल चुका है। आज दलित शिक्षा प्रतिबन्धित होने के कारण पिछड़ी जातियाँ अज्ञान में सही मार्गदर्शन पाने के लिए इधर-उधर भटक रही हैं। पिछड़ी जातियों की नारियों की स्थिति तो और भी बदतर है। वे सबसे अधिक शोषित, उत्पीड़ित, अशिक्षित एवं अन्धविश्वासी हैं।

पिछड़ी जातियों के उत्थान हेतु सुझाव

यद्यपि केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों, अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, रेडक्रास आदि ने इनके उद्धार के लिए भरसक प्रयत्न किए हैं, तथापि यह दूषित प्रथा आज भी कुछ सीमा तक प्रचलित है। इसके ज्वलन्त उदाहरण आज भी दैनिक समाचार-पत्रों में पढ़ने को मिलते हैं। अत: अभी भी इनका सामाजिक उत्थान ठीक तरह से नहीं हो पाया है। इसका मुख्य कारण इन लोगों की आर्थिक हीनता है। धनाभाव के कारण ये लोग शिक्षा भी ग्रहण नहीं कर पाते हैं। वास्तविक रूप में यदि अस्पृश्यता को दूर करना है तो केवल सरकारी प्रयास ही काफी नहीं हैं, अपितु इसके निवारण के लिए जनमत तैयार करना भी अनिवार्य है।
पिछड़ी जातियों के उत्थान के लिए कुछ प्रभावशाली सुझाव निम्न प्रकार हैं-
  1. पिछड़ी जातियों की आर्थिक दशा में सुधार किया जाना चाहिए ताकि इनका जीवन ऊँचा उठ सके तथा इनकी बहुत-सी निर्योग्यताएँ दूर हो सकें।
  2. अस्पृश्यता निवारण के लिए चलचित्रों, नाटकों, गीतों आदि द्वारा जनमत तैयार किया जाना चाहिए ताकि साधारण जनता अस्पृश्यता के दूषित परिणामों को जान सके। शिक्षा द्वारा भी इसकी समाप्ति के पक्ष में जनमत तैयार किया जाना चाहिए।
  3. पिछड़ी जातियों के लोगों की बस्तियाँ साधारण बस्तियों में ही होनी चाहिए जिससे भेदभाव की प्रवृत्ति में कुछ कमी हो सके।
  4. पिछड़ी जातियाँ एवं अनुसूचित जातियों के लिए पृथक् विद्यालय नहीं खोले जाने चाहिए।
  5. सभी जातियों के बच्चों को एक साथ रहने के लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए जिससे वे भविष्य में भी एक साथ रह सकें।
  6. जो घृणा वाले पेशे हैं उनमें कुछ सुधार होना जरूरी है।
  7. अस्पृश्यता जाति व्यवस्था का ही अभिशाप है। अत: जाति व्यवस्था को यदि समाप्त कर दिया जाए तो अस्पृश्यता भी अपने आप समाप्त हो जाएगी। प्रचार तथा शिक्षा द्वारा जाति व्यवस्था को समाप्त करने के प्रयास किए जाने चाहिए। 
  8. अस्पृश्यों की दशा सुधारने के लिए ग्रामों में प्रौढ़ शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।
  9. पिछड़ी जातियों के लोगों का शोषण समाप्त होना चाहिए तथा इनके कार्य के बदले उचित वेतन देने सम्बन्धी नियम बनाए जाने चाहिए।
  10. स्वस्थ मनोरंजन के द्वारा पिछड़ी जातियों के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाने का भरसक प्रयत्न किया जाना चाहिए।
  11. सरकार द्वारा पिछड़ी जातियों के लोगों को आवश्यक सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
  12. केन्द्रीय सरकार एवं राज्य सरकारों को अन्तर-जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देना चाहिए।
  13. धार्मिक तथा राजनीतिक अवसरों पर भी सभी जातियों के सदस्यों को सम्मिलित होने का समान अवसर मिलना चाहिए।
  14. पिछड़ी जातियों की समस्याओं के समाधान हेतु २१ सूत्रीय दलित एजेण्डे (भोपाल घोषणा-पत्र) को लागू किया जाना चाहिए।
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