प्रदूषण क्या है | pradushan kya hai | प्रदूषण की परिभाषा, कारण, प्रकार, प्रभाव, अर्थ

प्रदूषण किसे कहते हैं?

प्रदूषण (pollution) की परिभाषा है कि, पर्यावरणीय घटकों अर्थात् वायु, जल और मृदा की भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक विशिष्टता में लाया जाने वाला कोई भी अवांछनीय परिवर्तन जिससे जीवन स्वरूपों तथा जीवनश्रयी तंत्रों पर बुरा प्रभाव पड़ता हो, प्रदूषण कहलाता है। आप यह भी कह सकते हैं कि मानव क्रियाकलापों द्वारा पैदा होने वाला कोई भी प्रतिकूल परिवर्तन प्रदूषण है। पर्यावरण घटक को संदूषित करने वाला साधन प्रदूषक (pollutant) कहलाता है।
pradushan kya hai
पर्यावरण का कोई भी सामान्य रचक जब अपने सांद्रण की सीमाओं से इतना अधिक मात्रा में पहुंच जाता है कि उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाए, तो वह प्रदूषक बन जाता हैं, प्रदूषक, कोई नया पदार्थ (जैविक अथवा अजैविक) या ऊर्जा (ऊष्मा, ध्वनि, रेडियोसक्रियता आदि) भी हो सकता है जो पर्यावरण में मिल कर अथवा उसके किसी भी घटक में जुड़ कर इतने स्तर तक पहुंच जाता है कि पर्यावरण की तथा उस घटक की उपयोगिता समाप्त हो जाती है।

प्रदूषकों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
  1. अजैवनिम्नीकरणीय प्रदूषक
  2. जैवनिम्नीकरणीय प्रदूषक

अजैवनिम्नीकरणीय प्रदूषक
ये प्रदूषक बहुत लंबे समय तक अपरिवर्तित रूप में बने रहते हैं जैसे पीड़कनाशी, भारी धातुएं, रबड़, नाभिकीय अपशिष्ट आदि। प्लास्टिक भी इसी श्रेणी में आते हैं। ऐसे पदार्थ जीवाणुओं द्वारा विखंडित अथवा विघाटित नहीं होते।

जैवनिम्नीकरणीय प्रदूषक
कुछ प्रकार के प्रदूषक जैसे कि कागज, उद्यान कचरा, घरेलू जल-मल, कृषि आधारित अपशिष्ट तथा उर्वरक आदि जीवाणुओं की विघटन प्रक्रियाओं के द्वारा विघटित होकर सरलतर अंत्य-उत्पादों में परिवर्तित हो जाते हैं। ये सरल उत्पाद प्रकृति की कच्ची सामग्री होते है। ये जैवविघटनशील प्रदूषक उस समय एक खतरा बन जाते हैं जब पर्यावरण में उनका निवेश विघटन क्षमता से ज्यादा हो जाता है।

प्रदूषकों का पर्यावरण में प्रवेश निश्चित स्रोतों अथवा अनिश्चित स्रोतों से हो सकता है निश्चित स्रोत (point sources) वे स्पष्ट एवं परिसीमित स्रोत होते हैं जहां से प्रदूषक/बहिःस्राव किसी चिमनी द्वारा या किसी विसर्जन नली द्वारा छोड़े जाते हैं जैसे कि उद्योगों अथवा नगर निगमों के क्षेत्रों के पाइपों अथवा सुरंगों के द्वारा। अनिश्चित स्रोत (non-point sources) अर्थात् क्षेत्र स्रोत ऐसे विसृत होते हैं जिनमें विसर्जित होने वाले प्रदूषक एक बड़े क्षेत्र में फैल जाते हैं। इनके कुछ उदाहरण हैं - निर्माण क्षेत्रों से तथा कृषि भूमियों से होने वाले अपप्रवाह।
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निश्चित स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषकों का स्थान-गत उपचार करके उन्हें नियंत्रण किया जा सकता है, परंतु अनिश्चित स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषण का उपचार करना कठिन है क्योंकि इसके स्रोत व्यापक क्षेत्र में फैले होते हैं।

पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण

औद्योगिक प्रक्रियाओं तथा बढ़ती हुई मानव जनसंख्या के कारण ऊर्जा का तथा प्राकृतिक संसाधनों का अधिक उपयोग होता गया। संसाधनों के बढ़ते उपयोग से वायु, जल, मृदा और अंततः जैवमंडल में गैसों, रसायनों, अपशिष्टों तथा अन्य सामग्री के निष्कासन लगातर बढ़ते गए। मनुष्यों को संसाधनों तथा ऊर्जा की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि वे अपनी आवश्यकताएं पूरी कर सकें और इसलिए भी कि वे आहार, आवास, परिवहन, मनोरंजन तथा विलासिता की अधिकाधिक लालसा में जुटे रहते हैं। सतत् बढ़ती मानव जनसंख्या के कारण लकड़ी, खनिज, जल, मृदा, कोयला, तेल, गैस आदि जैसे संसाधनों एवं ऊर्जा-स्रोतों की मांग बढ़ती गयी है।

हमारे घरों, दफ़्तरों तथा अन्य भवनांतरिक क्षेत्रों में प्रदूषकों के पाए जाने का स्पष्ट कारण है, भवनों के भीतर प्रदूषण के विभिन्न प्रकार के संभावित स्रोत-
भवनों के भीतर और बाहर प्रदूषण पैदा करने वाले कुछ स्रोतों के उदाहरण
स्रोत प्रदूषक मुख्यतः भवनों के भीतर
पार्टिकल बोर्ड, फोम तापरोधी, सजावटी साज सामान सीलिंग- टाइल्स, तम्बाकू का धुंआ फॉर्मेल्डीहाइड
इमारती सामान- कंकरीट, पत्थर, पानी और मृदा रेडॉन
फायर-प्रूफिंग, ऊष्मा एवं विद्युतरोधी, ध्वनिकी (acoustic) ऐस्बेस्टॉस, "मिनरल वूल" संश्लिष्ट रेशे
आसंजक, विलयाक, रंग-रोगन, भोजन पकाना, सौंदर्य प्रसाधन, तम्बाकू का धुआं कार्बनिक पदार्थ, निकोटीन, ऐअरोसॉल, वाष्पशील कार्बनिक पदार्थ
रंगरोगनों में पीड़कनाशी, प्रयोगशालाओं में पदार्थों का छलकना-गिरना, स्प्रे पारा, कैडमियम
उपभोक्ता उत्पाद, घरेलू धूलि, जानवरों का कचरा, संक्रमित जीव विभिन्न संघटना वाले ऐरोसॉल, ऐलर्जन, जीवनक्षम सूक्ष्मजीव
मुख्यत : बाहर
कोयला एवं तेल दहन, प्रगालकों, आग सल्फर के ऑक्साइड
प्रकाश रासायनिक अभिक्रियाएं ओज़ोन
मोटरगाड़ियां, स्मेल्टर्स सीसा, मैंगेनीज
मृदा कण, औद्योगिक निष्कासन कैल्सियम, क्लोरीन, सिलिकॉन, कैड्मियम
पेट्रोरसायन विलायक, अनजले ईंधनों का वाष्पीकरण कार्बनिक पदार्थ
बाहर और भीतर, दोनों
ईंधन दहन नाइट्रोजन के ऑक्साइड
असम्पूर्ण ईंधन दहन कार्बन मॉनोक्साइड
जीवाश्म ईंधन दहन, उपापचयन क्रिया कार्बन डाइऑक्साइड
पुनर्निलंबन, वाष्प-संघनन, दहन उत्पाद निलम्बित कणिकीय पदार्थ
पेट्रोलियम उत्पाद, दहन, पेंट, उपापचयन क्रिया, पीड़कनाशी, कीटनाशी, कवकनाशी कार्बनिक पदार्थ, भारी धातुएं
सफाई उत्पाद, कृषि, उपापचयन उत्पाद अमोनिया

वायु प्रदूषण

क्या आपने कभी सोचा कि वायु भी उतना ही एक संसाधन है जितना कि जल और भोजन? ज़िन्दा रहने के लिए औसत वयस्क मानव, प्रतिदिन जितना भोजन और पानी का सेवन करता है उससे छह गुना ज़्यादा उसे गैसों का विनियम करना होता है। यही कारण है कि वायु हमारे लिए इतनी महत्वपूर्ण है। अधिकतर जीवों के लिए ऑक्सीजन पर्यावरण से तुरंत ली जाने वाली आवश्यकता है। भोजन तथा जल के बिना हम कुछ घंटों या कुछ दिन तक जीवित रह सकते हैं मगर आक्सीजन के बिना केवल कुछ ही मिनट तक वायु की सामान्य संघटना में कोई भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हानिकारक होता है।

वायु प्रदूषकों के प्रारूप
मोटे तौर पर प्रदूषकों को निम्नलिखित प्रारुपों में वर्गीकृत किया जा सकता है

प्राकृतिक प्रदूषक (Natural pollutants)
ये प्रदूषक प्राकृतिक स्रोतों से अथवा प्राकृतिक क्रियाकलापों से निकलते हैं। कुछ उदाहरण हैं : पौधों के पराग और पौधों के वाष्पशील कार्बनिक यौगिक; ज्वालामुखी विस्फोटों तथा जैविक पदार्थों के सड़ने गलने से निकलने वाली गैसें जैसे, सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड आदि; दावानलों तथा समुद्र से निकलने वाले कण, प्राकृतिक रेडियोसक्रियता आदि। सामान्यतः प्राकृतिक निष्कासनों की सांद्रता कम होती है और गंभीर हानि नहीं होती।

प्राथमिक प्रदूषक (Primary pollutants)
ये प्रदूषक प्राकृतिक अथवा मानव क्रियाकलाप के द्वारा सीधे वायु में निष्कासित होते हैं। इनके उदाहरण हैं: इंधन जलाने से निकालने वाले सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, विविध हाइड्रोकार्बन तथा कणिकाएं।
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द्वितीयक प्रदूषक (Secondary pollutants)
सूर्य के विद्युतचुम्बकीय विकिरणों के प्रभाव के अधीन प्राथमिक प्रदूषकों तथा सामान्य वायुमण्डलीय यौगिकों के बीच रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप द्वितीयक प्रदूषकों का निर्माण होता है।
उदाहरण के लिए प्राथमिक प्रदूषक सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) वायुमण्डल में ऑक्सीजन (O2) के साथ अभिक्रिया करके सल्फर ट्राइऑक्साइड (SO3) बनाता है जो एक द्वितीयक प्रदूषक है। सल्फर ट्राइऑक्साइड जल वाष्प से मिलकर एक और द्वितीयक प्रदूषक सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) बनाता है जो कि अम्ल वर्षा का एक घटक है। एक और उदाहरण है शहरी क्षेत्रों के ऊपर किसी खुली धूप वाले दिन ओज़ोन का बनना। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) पृथ्वी की सतह पर पहुंचने वाले पराबैगनी विकिरणों का अवशोषण करती है और नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) तथा आक्सीजन परमाणुओं (O) में विखंडित हो जाती है।
ये ऑक्सीजन परमाणु ऑक्सीजन के साथ संयोजित होकर ओज़ोन (O3) बनाते हैं। NO2 से दो अन्य द्वितीयक प्रदूषण भी बनते हैं - पेरॉक्सी एसिटिल नाइट्रेट (peroxy acetyly nitrate, PAN) तथा नाइट्रिक अम्ल (HNO3)| धूमकोहरा (smog), धुंए और कोहरे का मिश्रण होता है जो नाइट्रोजन के ऑक्साइडों तथा विविध हाइड्रोकार्बनों के बीच सूर्य के प्रकाश द्वारा शुरू होने वाली जटिल अभिक्रियाओं के कारण बनता है। धूमकोहरा अधिकतर शहरी क्षेत्रों में विशेषकर ठहरी हुई हवा के समय बनता है। इसका मुख्य कारण है मोटर गाड़ियों की अत्यधिक संख्या।

प्रमुख वायु प्रदूषक
आइए, सारणी का अध्ययन करें ताकि प्रमुख वायु प्रदूषकों, उनके स्रोतों तथा मानवों एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले उनके प्रभावों की एक सामान्य जानकारी ले सकें।

सारणी मुख्य वायु प्रदूषक, उनके स्रोत तथा मानवों एवं पर्यावरण पर उनके प्रभाव-
प्रदूषक उत्पादन–स्रोत प्रभाव
कार्बन के ऑक्साइड
(CO2)- कार्बन डाइऑक्साइड
(CO)- कार्बन मोनोक्साइड
कोयला, तेल तथा अन्य ईंधनों का ऊर्जा-उत्पादन के लिए दहन; निर्माण एवं परिवहन; जैवसंहति का जलाया जाना CO2 की एक अहम् भूमिका ग्रीन-हाऊस प्रभाव पैदा करने में है; इससे हल्का कार्बोनिक अम्ल बनता है जो अम्ल वर्षा में योग देता है; CO हीमोग्लोबिन के साथ आबंधित होकर मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, जिससे श्वासावरोध (asphyxia) हो जाता है।
सल्फर के ऑक्साइड - (SO2)
सल्फर डाइऑक्साइड (SO2)
सल्फर ट्राइऑक्साइड (SO3)
सल्फेट (SO4)
सल्फर युक्त इंधन जैसे कोयले का दहन, पेट्रोलियम, निष्कर्षण तथा इनकी विनय; कागज निर्माण नगरपालिका कचरा जलाना; अयस्क पिघला कर धातु निष्कर्षण SO2 में सर्वाधिक हानिकारक प्रभाव होते हैं क्योंकि यह मानवों एवं अन्य प्राणियों के फेफड़ों में गंभीर हानि पहुंचा सकती है तथा अम्ल वर्षा की एक महत्वपूर्ण पुर्ववर्ती होती है, इसके हानिकार प्रभावों में आते हैं रंग-रोगन और धातुओं का संक्षारण तथा प्राणियों और पौधों को क्षति एवं उनकी मृत्यु।
नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NO2)
नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO)
नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO2)
नाइट्रस ऑक्साइड (N2O)
नाइट्रेट (NO3)
ईधनों का जलना; जैवसंहति का जलना; उर्वरकों की निर्माण प्रक्रिया के उत्पाद द्वितीयक प्रदूषक पेरॉक्सी एसीटिल नाइट्रेट (PAN) तथा नाइट्रिक अम्ल, (HNO3) का बननाः पादप वृद्धि का दमन और ऊतक क्षति, आंखों में चिरमिराहट।
हाइड्रोकार्बन्स (HCs) इन्हें वाष्पशील कार्बनिक यौगिक भी कहते हैं (VOCs)
मीथेन (CH4)
ब्यूटेन (C4H10)
ऐथिलीन (C2H4)
बेंजीन (C6H6)
बेंजोपाइरीन (C20H12)
प्रोपेन (C3H8)
गैसोलीन टैंकों, काब्युरेटर्स से वाश्पन; ईंधनों, जैवसंहति का जलना; नगरनिगमों के भूमि-भराव; जल-मल की सूक्ष्मजैविकी क्रिया; औद्योगिकी प्रक्रिया जिसमें विलायक निहित होते हैं इनका मानवों पर कैंसरजनी प्रभाव हो सकता है; उच्चतर सांद्रण पौधों और प्राणियों के लिए विषैले हो सकते हैं; वायुमण्डल में होने वाले जटिल रासायनिक परिवर्तनों के द्वारा ये हानिकारक यौगिकों में बदल सकते हैं; इनमें से कुछ सूर्य के प्रकाश के साथ ज्यादा अभिक्रियक होते और प्रकाशरासायनिक धूमकोहरा बनाते हैं।
अन्य कार्बनिक यौगिक
क्लोरोफ्लूरोकार्बन्स (CFCS)
फ़ार्मेल्डीहाइड (CH2O)
मेथिलीन क्लोराइड (CH2CI2)
ट्राइक्लोरो एथिलीन (C2HCI3)
वीनाइल क्लोराइड (C2H3CI)
कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCI4)
एथिलीन ऑक्साइड (C2H4O)
ऐरोसॉल स्प्रे, फास्ट-फूड पात्र बनाने के लिए फोम तथा प्लास्टिक, रेफ्रिजरेशन CFSS से समतापमण्डलीय ओज़ोन की मात्रा में कमी जिससे पृथ्वी की सतह पर पराबैगनी प्रकाश का अधिक प्रवेश होता है; अधिक मात्रा में आती हुई UV विकिरणों से त्वचा-कैंसर होता है तथा उनसे विविध जीव स्वरूपों पर घातक प्रभाव हो सकता है।
धातुएं तथा अन्य अकार्बनिक यौगिक -
सीसा (Pb)
पारा (Hg)
हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S)
हाइड्रोजन फ्लोराइड (HF)
तेल कुएं तथा रिफाइनरी; परिवहन वाहन; नगरपालिका भूमि-भराव; उर्वरक, सिरैमिक्स; कागज, रसायन तथा पेंट उद्योग; पीड़कनाशी; कवकनाशी, ऐलुमिनियम उत्पादन कोयला गैसीभवन। श्वसन समस्याएं पैदा होती हैं, विशालुता आती है जिनसे मानवों तथा अन्य प्राणियों की मृत्यु तक हो सकती है; फसलों को क्षति; कैंसरजनी प्रभाव।
तरल बुंदिकाएं-
सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4)
नाइट्रिक अम्ल (HNO3)
तेल- पीड़कनाशी जैसे DDT तथा मैलेथिऑन
कृषि पीड़कनाशी; धूमन; तेल विनय; वायुमण्डल में प्रदूशकों की अभिक्रियाएं। अम्ल वर्षा में योगदान; संक्षारण; विविध जीवों की क्षति
निलम्बित कणिकीय पदार्थ (SPM-ठोस कण)- धूल, मिट्टी, सल्फेट लवण, भारी धातु लवण, कार्बन (कालिख) के अग्नि कण, ऐस्बेस्टॉस, तरल स्प्रे, कुहासा, आदि इंधन दहन; भवन निर्माण; खनन; ताप बिजलीघर; पत्थर तोड़ना; औद्योगिक प्रक्रियाएं; दावानलें; अपशिष्ट भस्मीकरण श्वसन-तंत्र पर चिरकालिक प्रभाव; हरी पत्तियों की सतह पर जमाव जिससे CO2 के अवशोषण तथा O2, के विमोचन में बाधा आती है; सूरज की रोशनी में रुकावट, कणों के आकार जो 0.1 से 10 µm के बीच के होते हैं, उनसे सबसे ज़्यादा फेफड़ा क्षति होती है।
प्रकाशरासायनिक आक्सीडेंट्स -
ओजोन (O3)
पेरॉक्सी एसिल नाइट्रेट्स (PANS)
फॉर्मेल्डीहाइड (CH2O)
ऐसीटएल्डिहाइड (C2H-4O)
हाइड्रोजन पेरॉक्साइड (H2O2)
हाइड्रॉक्सिल मूलक (HO)
वायुमण्डल में प्रकाशरासायनिक अभिक्रियाएं सूर्य के प्रकाश में होने वाली, नाइट्रोजन के ऑक्साइड तथा हाइड्रोकार्बन धुधं पैदा करते हैं; आंखों, नाक तथा गले में जलन; श्वसन समस्याएं: सूर्य के प्रकाश आने में बाधा

वायु प्रदूषण तथा वायुमण्डलीय समस्याएं
वायु प्रदूषण से जहां एक ओर साज-सामान, पौधों तथा प्राणियों के समुदायों को क्षति पहुंचती एवं मनुष्यों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं खड़ी होती हैं, वहीं दूसरी ओर वायुमण्डलीय प्रक्रियाओं में भी परिवर्तन आते हैं। अम्ल वर्षा, धूमकोहरा, वैश्विक ऊष्मायन, ओज़ोन-रिक्तिकरण आदि कुछ ऐसे ही प्रभाव हैं जो हमारे वायुमण्डल में प्रदूषण के कारण हो रहे हैं। आइए, वायुमण्डल में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली कुछ समस्याओं के उदाहरणों पर एक नज़र डालें।

निलम्बित कणिकीय पदार्थ (Suspended particulate matter)
आस-पास की हवा में पाया जाने वाला कणिकीय पदार्थ विभिन्न आकार के कणों का, जिनमें अनेक रासायनिक घटक भी हो सकते हैं, एक सम्मिश्र होता है एवं इसका मिश्रण अदलता-बदलता रहता है। इनमें से बृहत्तर कण हमारी नाक के भीतर के बालों में तथा श्वास नलियों में अटक जाते हैं। 10 µm से छाटे आकार के कण जिन्हें PM10 कहते हैं, श्वसनशील निलम्बित कणिकीय पदार्थ (Respirable suspended particulate matter, RSPM) कहलाते हैं। सबसे छोटे कण 2.5 µm से भी कम आकार के होते हैं जिन्हें PM 2.5 कहते हैं। ये सांस द्वारा फेफड़ों में गहराई तक चले जाते हैं और बहुत-सी परेशानियां पैदा करते हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा हाल के वर्षों में कुछ भारतीय शहरों की परिवेशी गुणवत्ता के अध्ययन से पता चलता है कि कई भारतीय शहरों जैसे रायपुर, कानपुर, दिल्ली, ग्वालियर तथा लुधियाना में RSPM 200 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से अधिक है। RSPM का स्तर साधारणतः 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होता है।
SO2 तथा NO2 के स्तरों में कमी हो रही थी। इसका कारण यह हो सकता है कि, दिल्ली में निम्न सल्फर डीज़ल का चलन चलाया गया और 15 साल से ज़्यादा पुरानी व्यावसायिक गाड़ियों के चलाने पर रोक लगा दी गयी। लेड (सीसा) रहित पेट्रोल के इस्तेमाल से सीसे का स्तर NAAQS स्तरों से बहुत कम हो गया है।

अम्ल वर्षण (Acid precipitation)
अम्ल वर्षा अथवा अम्ल वर्षण में विभिन्न प्रकार के आर्द्र निक्षेप सम्मिलित है, जैसे कि वर्षा, हिमपात, कोहरा अथवा ओस तथा वायु से गिरने वाले शुष्क अम्लीय कणिकाएं। अम्ल वर्षण ऐसे क्षेत्रों में अथवा उनके आसपास होता है जहां मानवजनित क्रियाकलापों के परिणामस्वरूप सल्फर डाइआक्साइड (SO2) तथा नाइट्रोजन के आक्साइडों (NO) के मुख्य निस्सरण निकलते हैं। कोयले से चलने वाले बिजलीघरों में से निकलने वाला हाइड्रोक्लोरिक अम्ल भी अम्ल वर्षा की समस्याओं में अपना योग देता है। अम्ल निक्षेपों से जीव-जंतुओं पर और साथ ही साज-सामान पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं। जलीय निकायों का pH घट जाता है। जिससे उनकी जीव सृष्टि को हानि होती है अथवा उनके जीव मर जाते हैं। pH एक सांख्यिकीय मूल्य है जिससे अम्ल अथवा क्षार की तीव्रता का मापन होता है। अम्ल वर्षा से मृदा उर्वरता पर बुरा असर पड़ता है क्योंकि मृदा में अम्ल जल से भारी धातु के आयन निकलते हैं जो स्थानीय क्षेत्रों में ठहरे रह जाते हैं तथा पौधों तथा अन्य मृदा जीवों के लिए क्षतिकारक होते हैं। अम्ल वर्षा द्वारा वनों और झीलों को तो क्षति पहुंचती ही हैं, इससे भवन-निर्माण सामग्री जैसे इस्पात, पेंट, प्लास्टिक, सीमेंट, चूना-पत्थर, बालू-पत्थर तथा संगमरमर को भी बहुत नुकसान पहुंचता है।
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वायुमण्डलीय उत्क्रमण (Atmospheric inversion)
वायुमण्डलीय उत्क्रमण अथवा तापमान उत्क्रमण तब होता है जब ठंडी वायु के ऊपर उष्णतर वायु की एक स्थायी परत बन जाती है। इस कारण बढ़ती जाती ऊँचाई के साथ-साथ तापमान के गिरते जाने की सामान्य प्रक्रिया उलट जाती है जिससे संवहनी वायु धाराएं, जिनसे सामान्यतः प्रदूषक बिखर जाया करते हैं, नहीं चल पाती।परिणामस्वरूप एक उल्टी ताप-प्रवणता बन जाती है, वायु परिसंचरण सीमित हो जाते हैं तथा प्रदूषक निचले वायुमण्डल की स्थिर वायु संहति में फंस कर रह जाते हैं।
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केस स्टडी : भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy)
सन् 1969 में एक बड़ी विश्वव्यापी स्तरीय कम्पनी 'यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन' ने भारत के केन्द्र में स्थित भोपाल शहर के उत्तरीय छोर पर एक पीड़कनाशी फैक्ट्री लगायी। 1979 में इसने मीथाइल आइसो सायेनेट (Methyl iso cyanate) का संयत्र खड़ा किया और इसका उत्पादन शुरू कर दिया।
सन् 1984 में 2 दिसम्बर की रात को जब कारखाने में नियमित काम चल रहा था तब रात के 9.30 बजे बहुत मात्रा में जल, जिसमें उत्प्रेरण पदार्थ घुला था, भण्डारण टैंक न. 610 में घुस गया। उसी रात में 3 दिसम्बर, 1984 की भोर होते-होते इस भण्डारण टैंक में संदूषण होने से चालीस टन विषैली गैसें बाहर निकलीं और सारे शहर में फैल गयीं। नतीजा, एक भयंकर अफ़रा-तफ़री और ताण्डव पैदा हो गया और उसके परिणाम आज भी जारी हैं। न तो कोई चेतावनी दी गयी थी और न ही दुर्घटना स्थल से बाहर निकल जाने की कोई योजना ही बनी हुई थी। गैस का रिसाव 1 घंटे से कम समय तक हुआ फिर भी इस दुर्घटना ने लगभग 2500 लोगों की जान ले ली। लगभग 1 लाख लोग गैस से बुरी तरह जख्मी हो गए। इस गैस से शरीर पर छाले पड़ जाते हैं, आंख, नाक, गले तथा फेफड़ों में भारी जलन पैदा होती है। सांस के द्वारा कुछ ही ppm गैस से जबर्दस्त खांसी हो जाती है, फेफड़े सूज जाते हैं रक्त-स्राव होने लगता है तथा मृत्यु हो जाती है।
जांच होने से पता चला कि इस त्रासदी के होने से पूर्व कोई भी ऐसा एक वर्ष नहीं था जब कोई न कोई दुर्घटना न हुई हो। अनेक बार जांच के आदेश दिए जाते थे मगर बाद में सब कुछ भुला दिया जाता था। इससे स्पष्ट था कि सुरक्षा मानकों में कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी थी। अमेरिका में यूनियन कार्बाइड के मुख्यालय की एक तीन-सदस्यी सुरक्षा-टीम ने मई 1982 में भोपाल संयत्र का दौरा किया और और MIC खंड के सुरक्षा मानकों में कमियों पर एक रिपोर्ट पेश की थी।

सुरक्षा मानकों की जिन कमियों की वजह से इस त्रासदी को बढ़ावा मिला उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं-
  • उद्योग की विभिन्न इकाइयों में, जिनमें MIC भण्डारण टैंक भी शामिल थे, तापमान और दाब में होने वाले परिवर्तनों को मापने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाली युक्तियों का रख-रखाव इतना खराब था कि वहां के कर्मी संभावित मुसीबत के आरंभिक चिह्नों की भी अनदेखी करने लग गए थे।
  • उद्योग यूनिट का रेफ्रीजरेशन प्लांट जिनमें MIC भण्डारण टैंक को निम्न ताप पर रखने के लिए था, ताकि कभी यदि जल जैसा संदूषक भी टैंक के भीतर प्रवेश कर जाए तो अधिक बढ़ जाने वाली गर्मी एवं प्रसार को, इसकी ठंडक द्वारा न्यूनतम रखा जा सके। मगर यह प्लांट कुछ समय से बंद पड़ा था।
  • एक गैस-स्क्रबर रिसती हुई MIC गैस का उदासीनीकरण करने के लिए लगा था, मगर यह ठीक से निर्मित नहीं था और ऊपर से यह मरम्मत के लिए कुछ दिनों से बंद रखा हुआ था। इस स्क्रबर की क्षमता अधिकतम दाब पर रिस सकने वाली कुछ MIC की केवल 25% मात्रा को ही संभाल सकने की थी।
  • वह फ़्लेम-टावर जो गैस-स्क्रबर से बचकर निकल जाने वाली MIC को जलाने के लिए था, वह भी एक खराब हुई पाइप के प्रतिस्थापन हेतु बंद किया हुआ था। और तो और यह फ्लेम टावर भी निकलने वाली कुल MIC गैस के केवल एक-चौथाई भाग को ही संभाल सकने की क्षमता रखता था।
जो लोग इस त्रासदी के दौरान उद्भासन से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में स्वास्थय की दृष्टि से प्रभावित हुए उस संबंध में ICMR के आंकड़े इस प्रकार हैं-
  • 22.6% उद्भासित लोगों में फेफड़ो का फाइब्रोसिस, मानसिक डिप्रेशन, चिंता और साइकोसिस पाया गया।
  • 1987 से 1989 तक किए गए अध्ययनों से पता चला कि गैस उद्भासित बच्चों (आपदा के समय 5 वर्ष की आयु के रहे बच्चे) में उसी उम्र के अनुद्भासित आबादी के बच्चों की तुलना में ज्वर (बुख़ार), दम घुटना, उल्टियां आना और ख़ासी का पीड़न दो से चार गुना ज़्यादा रहा।
  • काफी समय बाद 1990 तक अनुद्भासित महिलाओं की अपेक्षा उद्भासित महिलाओं में स्वतः गर्भपात दर तीन गुना ज्यादा रही।

जल प्रदूषण

वायु के समान कोई भी भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक परिवर्तन जिससे जल की गुणवत्ता घट जाती हो, जल-प्रदूषण पैदा करता है। जल एक सार्वत्रिक विलायक होने के नाते अपने भीतर विविध प्रकार के पदार्थों को घुला सकता है। इस गुणवत्ता के कारण जल का संदूषित हो जाना स्वाभाविक ही होता है।
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प्रदूषित जल हमारे स्वास्थ्य, जलीय जीवन तथा अन्य जीवों के लिए एक ख़तरा है। जलनिकायों, जैसे कि तालाबों, झीलों तथा भूमिगत जल में, पाया जाने वाला प्रदूषण स्थानीकृत होकर वहीं सीमित रहता है। इससे प्रदूषण की गंभीरता बढ़ जाती है। मानवजनित जल प्रदूषण के मुख्य स्रोतों में आते हैं: जल-मल, कचरा, कूड़ा, औद्योगिक तथा कृषि अपशिष्ट जैसे कि उर्वरक एवं पीड़कनाशी।

जल प्रदूषकों के प्रारूप
जल प्रदूषकों को निम्नलिखित तीन मुख्य वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। जल प्रदूषकों के प्रकार स्त्रोत एवं उनके प्रभावों को सारणी 9.5 में दर्शाया गया है जिसका पारस्परिक संबंध होता है।

जैविकीय कारक (Biological agents)
जहां तक मानव स्वास्थ्य का संबंध है, रोगजनक जीव जैसे विषाणु, जीवाणु तथा प्रोटोज़ोआ गंभीर प्रकार के जल प्रदूषक हैं। हैजा, जीवाणुवीय तथा अमीबी पेचिश, जठरांत्रशोध, टाइफाइड, पोलियों, वाइरल हेपेटाइटिस, कृमि संक्रमण, फ्लू आदि कुछ खास जल-वहनी रोग हैं। कुछ कीट जिनके जलीय लार्वा होते हैं, मलेरिया, डेंगू, पीत ज्वर तथा फाइलेरिऐसिस फैलाते हैं। भारत में वर्षा ऋतु के आरम्भ होने पर प्रायः ऐसी महामारियां शुरू हो जाया करती है। घनी आबादी वाले क्षेत्र, अनियोजित औद्योगिक एवं मानव बस्तियाँ तथा उचित नागरिक सुविधाओं के अभाव आदि से अक्सर इन बीमारियों को योगदान मिलता है। मानव अपशिष्टों, जानवरों के अपशिष्टों, घरेलू जल-मल तथा चमड़ा-शोधशालाओं एवं बूचड़खानों से निकले अपशिष्ट जल विसर्जनों से जल का प्रदूषण होता है।
प्रदूषण श्यमान स्वरूप जैसे कि जल का रंगदार हो जाना अथवा उसमें झाग बन जाना, जल के उपयोग को हतोत्साहित करता है। अतः कभी-कभार इस प्रकार के दृष्यमान प्रदूषक अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे बन जाया करते है, जबकि इनसे भी ज़्यादा गंभीर प्रदूषक वे होते हैं जो जल में घुल जाते हैं तथा कोरी आखों को दिखायी नहीं पड़ते।

रासायनिक कारक (Chemical agents)
रासायनिक प्रदूषक अकार्बनिक (Inorganic) हो सकते हैं, जैसे नाइट्रेट्स, अम्ल, लवण तथा विषैली भारी धातुएं। कार्बनिक (Organic) रासायनिक प्रदूषकों में आते हैं तेल, गैसोलीन, पीड़कनाशी, रंग-रोगन, प्लास्टिक्स, धुलाई में काम आने वाले विलायक, डिटर्जेंट तथा जैविक अपशिष्ट जैसे घरेलू जल-मल, पशु जल अपशिष्ट आदि। रेडियोसक्रिय पदार्थ (Rodioative substances) जो तीसरी श्रेणी के रासायनिक प्रदूषक से होते हैं, यूरेनियम अयस्क के संसाधन के फलस्वरूप तथा शोध प्रयोगशालाओं से निकले अपशिष्ट होते हैं।
जैविक अपशिष्ट तथा अकार्बनिक पोषक जैसे कि विविध फॉस्फेट तथा नाइट्रेट जल निकायों को सम्पन्न बना देते हैं जिससे वहां जलसुपोषण हो जाता है। अकार्बनिक लवण जल में आयनीकृत हो कर एकत्र हो जाते हैं तथा जल को कठोर बना देते है।
अनेक प्रकार के रसायन जैसे अम्ल, क्षार, डिटर्जेंट तथा ब्लीचिंग साधन विविध उद्योगों से निकल कर आते हैं। इनसे जल निकायों में कुछ परिवर्तन आ जाते हैं जैसे पानी के रंग में परिवर्तन होना (आयरन ऑक्साइड से लाल रंग आता है तथा आयरन सल्फेट से पीला रंग), डिटर्जेंटों से झाग पैदा होना आदि। इस प्रकार के परिवर्तनों से इन जल निकायों पर निर्भर जीवों को हानि पहुंचती है।

भौतिक कारक (Physical agents)
निलम्बित ठोस पदार्थ, अवसादी ठोस पदार्थ और तापमान ऐसे भौतिक कारक हैं जिनसे जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इन जल प्रदूषकों से कई प्रकार के कुप्रभाव होते हैं, जैसे गाद बनना, जल मागों का अवरुद्ध हो जाना, बांधों का भर जाना तथा पानी का गंदा हो जाना। जलीय जीवों को इस प्रकार के जल में अपने गिलों (क्लोमों) से सांस लेना समस्या बन जाती है। निलम्बित कार्बनिक तथा खनिज ठोस पदार्थ, विषैले पदार्थों, जैसे भारी धातुओं को अधिशोषण कर लेते हैं और उन्हें खाद्य- श्रृंखला में पहुंचा देते है। जल निकाय में ऊष्मा-धारी जल के मिलने से जल निकाय में ताप प्रदूषण पैदा होता है।

प्रमुख जल प्रदूषक, उनके स्रोत एवं प्रभाव
प्रदूषक स्रोत प्रभाव
जैविक कारक
जीवाणु, कवक तथा प्रोटोजोआ
मानव जल-मल: प्राणि एवं पादप अपशिष्ट; सड़ता-गलता जैविक पदार्थ; औद्योगिक अपशिष्ट तेल शोधक कारखाने, पेपर-मिल, खाद्य-संसाधन इकाइयां); प्राकृतिक तथा शहरी अप्रवाह ऑक्सीजन-भोगी जीवाणु इन परजीवी, जैविक अपशिष्टों को खाते हैं जिससे जल निकाय की ऑक्सीजन समाप्त होने लगती हैं; ऑक्सीजन के अभाव में जीव नष्ट हो जाते हैं दुर्गन्ध निकलती है, मवेशियों में विष पहुंचता है
रासायनिक कारक अकार्बनिक रसायन तथा खनिज
अम्ल, लवण, धातुएं जैसे कि सीसा और पारा, पादप पोषक जैसे फॉस्फेट्स तथा नाइट्रेट्स
थल से प्राकृतिक अपप्रवाह; शहरी तूफान; औद्योगिक अपशिष्ट; अम्ल जमाव; सीसायुक्त गैसोलीन; सीसा-गलन; सिंचाई, पीड़कनाशी; कृषि अपप्रवाह; खनन तेल खनन स्थान; घरेलु जल-मल; खाद्य संसाधन उद्योग; डिटर्जेंट जिनमें फॉस्फेट होते हैं खाद्य-श्रृंखला के माध्यम से विविध प्रकार के जीवों एवं मानवों के लिए आविशी, जिनसे आनुवंशिक एवं जन्मजात दोष पैदा हो सकते हैं; हानिकारक खनिजों की जल में अधिक विलयशीलता, घरेलु, कृषि एवं औद्योगिक उपयोग के लिए जल को अनुपयुक्त बना देते हैं; मृदा में लवणता वर्धन; जल निकायों के पारितंत्र में गड़बड़ी तथा जल-कुपोषण पैदा होता है।
कार्बनिक रसायन
पीड़कनाशी, शाकनाशी, डिटर्जेंट, क्लोरीन के यौगिक, तेल, ग्रीज, तथा प्लास्टिक्स
कृषि, वानिकी; पीड़क नियंत्रण उद्योग, घेरलु तथा औद्योगिक अपशिष्ट; जल विसंक्रमण प्रक्रियाएं; कागज उद्योग; ब्लीचिंग प्रक्रिया; मशीन तथा पाइपलाइन अपशिष्ट; तेल बिखराव जलीय जीवन के लिए आविशी तथा उन जीवों के लिए भी जो ऐसे जल निकायों पर निर्भर करते हैं; जल निकायों का सुपोषण
रेडियोसक्रिय पदार्थ शोध प्रयोगशालाओं तथा अस्पतालों से निकले नाभिकीय अपशिष्ट; यूरेनियम अयस्क का संसाधन; नाभिकीय संयंत्र रेडियोन्यूक्लाइड खाद्य-श्रृंखला में प्रवेश करते हैं और जन्मजात एवं आनुवंशिक दोष पैदा करते हैं; कैंसर के उत्पन्नकारी कारक
भौतिक कारक
कणिकाएं तथा ऊष्मा
मृदा अपरदन; कृषि से अपप्रवाह; खनन, वानिकी तथा भवन निर्माण क्रियाकलाप; बिजलीघर, औधोगिक शीतलन जल-मागों, बंदरगाहों तथा निकायों में भराव, तापमान की वृद्धि से जल में ऑक्सीजन की विलयशीलता कम हो जाती है; जल-राशियों में जीव-सृष्टि का हास

समुद्रीय प्रदूषण

प्रदूषकों का अंतिम गर्त समुद्र हैं। समुद्र में, ये प्रदूषक या तो सीधे ही अपशिष्टों के रूप में डाल दिए जाते हैं या जल धाराओं, नदियों, नहरों के द्वारा पहुंचते हैं या फिर दुर्घटना के कारण बिखराव के रूप में पहुंचते हैं, जैसे तेल-छितराव। समुद्री जल का अधिकांश प्रदूषण समुद्र तट रेखाओं पर होता है जहां बड़े शहर, बंदरगाह तथा औद्योगिक केंद्र स्थापित हैं। महासागरों, समुद्रों, ज्वारनदों, लवण दलदलों तथा अन्य समान जल निकायों का प्रदूषण समुद्री अथवा महासागरीय प्रदूषण कहलाता है।
भारत की कुल जनसंख्या का 25% भाग समुद्र तट-रेखा पर रहता है और वह समुद्री संसाधन पर ही निर्वाह करता है। वहां पर पाए जाने वाले प्रदूषक बहुत प्रकार के होते हैं जैसे जल-मल, शहरी अपशिष्ट, औद्योगिक बहिःस्राव, उद्योगों से शीतलन प्रक्रियाओं के दौरान अपशिष्ट, ऊष्मा, तेल छितराव, एवं समुद्री पोतों से निकले बहिःस्राव, जलपोत उद्योगों से निकले तेल और ग्रीस से हर वर्ष लगभग 210 मिलियन गैलन पेट्रोलियम पहुंचता है, जिसका कारण होता है तेल और उसके उत्पादों का निष्कर्षण, परिवहन तथा उपभोग। प्राकृतिक रिसाव के द्वारा भी हर वर्ष लगभग 180 मिलियन गैलन तेल समुद्र में पहुंचता रहता है। तेल के छितराव से जो निम्नतर क्वथनांक वाले ऐरोमेटिक हाइड्रोकार्बन होते हैं, उन्हीं के कारण सबसे पहले बहुत सारे जलीय जीव और विशेषकर उनके लार्वा स्वरूप तुरंत मर जाते हैं। तिरते तेल समुद्री पक्षियों के और ख़ास तौर से डुबकी लगाने वाले पक्षियों के परों पर तथा कुछ समुद्री स्तनियों जैसे कि सील आदि पर चिपक कर उन पर परत जमा लेते हैं। तेल आवरण से प्राणियों की प्राकृतिक तापरोधिता एवं उत्प्लावकता नष्ट हो जाती है और उनमें से अधिकतर या तो डूब जाते हैं या देह ऊष्मा की हानि से ठंड के मारे मर जाते हैं।

उष्मीय (तापीय) प्रदूषण
उष्मीय प्रदूषण तब होता है जब किसी जल निकाय का अथवा वायुमण्डल की वायु का तापमान बढ़ जाता या घट जाता है। इस कारण उस क्षेत्र का तापमान सामान्य स्तरों से हट जाता है। यदि उष्णकटिबंधीय महासागरों का तापमान मात्र एक डिग्री ही नीचे आ जाए तो, ऐसा परिवर्तित पर्यावरण कुछ प्रवालों एवं प्रवाल भित्तियों के लिए घातक हो सकता है। जल के तापमान के बढ़ने से भी संवेदनशील जीवों पर भी इसी प्रकार के प्रभाव हो सकते हैं। ताप प्रदूषण तब होता है जब अपशिष्ट ऊष्मा को जल निकाय के भीतर छोड़ दिया जाता है। ताप प्रदूषण के मानवीय कारणों में दो मुख्य बाते हैं, एक तो वनस्पति आवरण का घट जाना और दूसरे वाष्प जेनेरेटरों से गर्म जल को बाहर छोड़ा जाना । धातु प्रगालक, संसाधन मिलें, पेट्रोलियम शोध कारखाने, पेपर मिलें, खाद्य संसाधन फैक्ट्रियां तथा रसायन निर्माण संयंत्र आदि शीतलन हेतु पानी का काफी उपयोग किया करते हैं। अंततः यह पानी गर्म हो जाता है और ऐसी उद्योग इकाइयों से बहिःस्रावों के रूप में बाहर निकलता है।
चिरकालिक ताप प्रदूषण की समस्याओं का समाधान इस बात में है कि बिजली घरों तथा अन्य औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले गर्म जल तथा बहिःस्रावों को किसी एक धारक इकाई में छोड़ा जाए जहां ये ठंडा हो सके। ठंडा हो जाने के बाद ही इन्हें जल निकायों में छोड़ा जाए।

जल गुणवत्ता मापक
जल की गुणवत्ता का निर्धारण करने हेतु कई मापक इस्तेमाल किए जाते हैं। पानी के नमूनों को इन प्राचलों के अनुसार परखा जाता है ताकि उसकी उपयोगिता को सुनिश्चित किया जा सके। घुली ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen: DO), जैविकीय ऑक्सीजन मांग (Biological Oxygen Demand: BOD), रासायनिक ऑक्सीजन मांग (Chemical Oxygen Demand: COD). सर्वाधिक संभाव्य संख्या  (Most Probable Number: MPN) तथा सम्पूर्ण घुले ठोस (Total dissolved Solids: TDS) ऐसे ही कुछ मापक हैं।

घुली ऑक्सीजन (DO)
यह प्राचल किसी जल स्रोत के जल में घुली ऑक्सीजन-मात्रा को दर्शाता है। घुली ऑक्सीजन की उच्च मात्रा का अर्थ है कि जल की गुणवत्ता अच्छी है। घुली ऑक्सीजन के निम्न सांद्रण बताते हैं कि जल के भीतर जैविक अपशिष्ट प्रदूषण है।

जैविकीय ऑक्सीजन मांग (BOD)
BOD उस ऑक्सीजन का माप होती है जो जीवाणु जैसे सूक्ष्मजीवों को विविध प्रकार के जैविक पदार्थों के विघटन के लिए चाहिए, जैसे कि जल-मल, मृत पादप पत्तियां, घास की पत्तियां तथा भोजन अपशिष्टों के विघटन के लिए। यदि जल स्रोत के भीतर जैविक अपशिष्टों की मात्रा अधिक हुई तब जीवाणु ज़्यादा संख्या में होंगे और ऑक्सीजन का इस्तेमाल करेंगे। इस प्रकार की प्रदूषित दशाओं में ऑक्सीजन की मांग ज़्यादा होगी और इस तरह BOD मान ऊंचा होगा। BODके उच्च स्तरों के होने पर जल के भी DO के स्तर कम हो जाते है।

रासायनिक ऑक्सीजन मांग (COD)
यह वह ऑक्सीजन-मात्रा होती है जो अपशिष्ट जल के भीतर मौजूद कार्बनिक रासायनिक यौगिकों के निम्नीकरण अथवा विघटन के लिए चाहिए। जिस जल निकाय में रसायन फैक्ट्रियों से निकले बहिःस्राव पहुंचते हैं उनके COD मान ऊँचे होते है।

सर्वाधिक संभाव्य संख्या (MPN)
जिस जलन में जल-मल जैसे अपशिष्टों का प्रदूषण होता है उसमें ई. कोलाई (E. COli) तथा कोलीस्वरूप जैसे जीवाणुओं की भारी संख्या पायी जाती है। MPN परीक्षण की सहायता से ई. कोलाई तथा कोलीस्वरूप जीवों को पहचाना जा सकता है एवं उन्हें गिना जा सकता है MPN विधि से सांख्यिकी रूप में जल निकाय में मौजूद इन जीवों की संख्या की पूर्वघोषणा की जा सकती है। कोलीस्वरूप जीव मानव अंतड़ियों में पाए जाते हैं और वे हमें हानि पहुंचाएं ऐसा ज़रूरी नहीं। परंतु इनका पानी में पाया जाना दर्शाता है कि इन मल में मानव अपशिष्ट मौजूद हैं। प्रदूषित जल में MPN के उच्चतर मान पाए जाएंगे।

सम्पूर्ण घुले ठोस (TDS)
जल में घुले तथा लवणों की कितनी मात्रा है इसको TDS एवं लवण की मात्रा का परीक्षण करके मापा जाता है। जल की गुणवत्ता को गिराने वाले कुछ घुले पदार्थ होते हैं- कैल्सियम, फॉस्फोरस, आयरन सल्फेट, कार्बोनेट्स, नाइट्रेट्स, क्लोराइड्स तथा अन्य लवण। भारी धातुएं भी इसी श्रेणी में आती हैं। TDS की अधिक मात्राओं से जल की गुणवत्ता गिर जाती है।

मृदा प्रदूषण

सभी समस्त थल जीव जिनमें हम भी शामिल हैं, भूमि की सतही परत अर्थात् मृदा के साथ परस्पर क्रिया करते हैं क्योंकि यही हमें जीवन की आधारभूत आवश्यकताएं जैसे कि भोजन, आश्रय तथा वस्त्रादि प्रदान करती है। मृदा जो हमारा एक जीवनावश्यक कारक है समस्त भूमि पर मात्र छह इंच गहरी है। हमारी भूमि सतह का अपकर्ष यूं तो कुछ हद तक प्राकृतिक कारणों से भी होता है मगर हम मनुष्य इसे तीन प्रकार से खराब करते हैं इसका उपयोग करके (कृषि तथा विकास क्रियाकलाप), इसमें से चीजें बाहर निकाल कर (खनन तथा वनोन्मूलन), तथा इसके भीतर पदार्थों को डालकर (अपशिष्ट निपटान)।

अपने भूक्षेत्रों की ओर हमारी बेरुखी से हुए कुछ नुकसान इस प्रकार हैं-

जैव-विविधता की हानि (Loss of Biodiversity)
सतत् बढ़ती जाती मानव जनसंख्या के लिए कृषिय तथा विकास आवश्यकताओं और उन्हीं के साथ उसकी अभिलाषाओं तथा लिप्साओं की पूर्ति के लिए भूमि प्रदान करने हेतु कितने ही बड़े-बड़े क्षेत्रों से वन काट दिए गए जिससे प्राकृतिक वनस्पतिजात एवं प्राणिता नष्ट हो गयी। "इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर" (IUCN) के अनुसार अनुमान लगाया गया है कि सन् 2050 तक लगभग 50,000 पादप स्पीशीज विलुप्त हो जाएंगी या संकटापन्न स्तर तक पहुंच जाएंगी। वैज्ञानिकों के अनुसार इस समय 4,500 प्राणि स्पीशीज़ तथा 20,000 पादप स्पीशीज़ संकटापन्न मानी जा रही है।

मृदा अपरदन (Soil Erosion)
यह वह प्रक्रिया है जिसमें मृदा घटकों का और विशेषकर उपरिमृदा (topsoil) के कणों का ढीला होना, अलग-अलग हो जाना तथा वहां से हटा लिया जाना शामिल है। मृदा अपरदन दो साधनों-तेज़ हवाओं तथा बहते पानी से होता है। मगर ये दोनों कारक तभी कार्यशील हो जाते हैं जब भूमि सतह से वनस्पति आवरण समाप्त हो चुका होता है। उपरिमृदा की अत्यधिक हानि से मृदा-उर्वरता कम हो जाती है और परिणामस्वरूप यह अपरद मृदा नदियों की तली में आकर जम जाती है, यानी जल निकायों में गाद का जमना होता है।

अम्लता तथा क्षारता (Acidity and Alkalinity)
मृदा में अम्लता अथवा क्षारता के बढ़ जाने से उसकी उर्वरता कम हो जाती है तथा कुछ फ़सलों के लिए यह अच्छा नहीं होता है। यदि मौसम सूखा रहा और वर्षा कम हुई तो कैल्सियम कार्बोनेट जैसे खनिज़ तथा क्षारीय यौगिक मिट्टी मे जमा हो जाते हैं। इससे मदा की क्षारता बढ़ जाती है। मुदा की इस प्रकार की दशा के मुख्य कारण है भूमि का बिना सोचे-समझे उपयोग और अनुचित कृषि प्रथाएं-और ये दोनों ही मानव-जनित कारण हैं।

अपशिष्ट-निक्षेप द्वारा भूमि प्रदूषण (Land Pollution by waste Deposition)
हम अपनी भूमि को एक चरम कडादान कह सकते हैं क्योंकि मख्यतः मानव क्रियाकलापों से ही जन्मा कूड़ा इसी के अंदर गाढ़ा अथवा इसी में फेंका जाता है। अपशिष्ट के मुख्य प्ररूप एवं उनके स्रोतों को सारणी 9.5 में सूचीबद्ध किया गया है। जैसा कि अन्य एशियाई देशों में हो रहा है भारत में भी अधिकतर ठोस अपशिष्ट भूमि भराव में डाले जा रहे हैं अपशिष्टों को अक्सर यूं ही डाल दिया जाता हैं। भूमि-भरावों से सभी प्रकार का अपशिष्ट डाल दिया जाता है और जब पानी उनमें से होकर रिसता है तबवह संदूषित हो जाता तथा और आगे परिवेशी क्षेत्रों में प्रदूषण फैलाता है। भूमि-भरावों के द्वारा होने वाला भूमि एवं जल संदूषण निक्षालन (लीचिंग) कहलाता है। खुला, अनुपचारित और अपृथक्कृत ठोस अपशिष्टों को यूं ही खुले में डाल दिया जाता है। ऐसे कूड़ा-स्थलों से होकर वर्षा जल के अपप्रवाह से निकटवर्ती भूमि तथा जल निकायों का संदूषण होता है।

विभिन्न स्रोतों से पैदा होने वाले मुख्य अपशिष्ट प्रारूप जिनसे हमारे भू-क्षेत्र प्रदूषित होते हैं।
pradushan kya hai
एक बार जब प्रदूषक जैवमंडल (पारिमंडल) के किसी भी घटक के भीतर पहुंच जाते हैं तो वे सभी अन्य घटकों जैसे कि वायु, जल और मृदा में से चक्रण करते हुए जीवों के भीतर प्रवेश कर सकते हैं आइए, पीड़कनाशियों का उदाहरण लेते हैं। ये पीड़कों को नष्ट करने वाले रसायन होते हैं। खेत में इस्तेमाल करने हेतु इन । पीड़कनाशियों को पौधों पर छिड़का जाता है अथवा उन्हें खेत की मिट्टी में मिला दिया जाता है। छिड़काव करने तथा मिट्टी से वाष्पन द्वारा ये पीड़कनाशी वायुमण्डल में पहुंच जाते हैं। वर्षा द्वारा ये रसायन फिर से भूक्षेत्र पर अथवा जल निकायों में आ जाते हैं। कृषि भूमियों से अपप्रवाह द्वारा ये पीड़कनाशी जल निकायों में पहुंच जाते हैं। ऐसे जल निकायों से की गयी सिंचाई के द्वारा ये पीड़कनाशी वापिस खेतों में पहुंच जाते है। दीर्घस्थायी रसायन तथा प्रदूषक इस पथमार्ग में बहुत लंबे समय तक चलते जा सकते और खाद्य-श्रृंखला में प्रवेश कर सकते हैं। यदि ये प्रदूषक जैव निम्नीकरणीय नहीं होते तो खाद्यश्रृंखला के उच्चतर स्तरों में इनका जैवसंचयन (bioaccumulation) एवं जैवआवर्धन (biomagnification) होता जाता है।
जैवसंचयन का अर्थ है प्रदूषक का किसी खाद्य-श्रृंखला के भीतर प्रवेश होना | इसमें प्रदूषक का पर्यावरण से खाद्य-श्रृंखला के प्रथम स्तर के जीवों में सांद्रण बढ़ जाता है। जैव-आवर्धन उस परिघटना को कहते हैं जिसमें प्रदूषक का खाद्य-श्रृंखला की एक कड़ी से अगली कड़ी में सांद्रण बढ़ता जाता है।
इसमें दी गयी संख्याएं खाद्य श्रृंखला में पोषण स्तरों के जीवों के ऊतकों में डी.डी.टी. का सांद्रण दर्शाती है। एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर पर पहुंचने वाले पोषकों की तुलना में डी.डी.टी. का अपचयन तथा उत्सर्जन कहीं ज़्यादा धीमा होता है। अतः यह शरीर के भीतर एकत्रित होता जाता है। इस प्रकार खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर मौजूद अलक्ष्य जीवों के लिए डी.डी.टी. का एकत्रण जोखिम भरा हो जाता है।

ध्वनि प्रदूषण

ध्वनि एक संचार-माध्यम है। ध्वनि न हो तो हमारा दैनिक जीवन लगभग असंभव सा हो जाएगा। परंतु यदि ध्वनि परेशान करने लगे एवं हानिकारक हो जाए तो उसे शोर कहा जाता है। परिभाषा के रूप में शोर, ध्वनि के कोई भी ऐसे अवंछित तथा अत्यधिक ऊंचे स्तर होते हैं जिनसे परेशानी होती है, तनाव होता है अथवा श्रवण क्षमता आहत होती है।
शोर के प्रमुख स्रोत हैं औद्योगिक क्रिया कलाप, मशीनें, मोटर वाहन, रेलें, वायुयान, सैन्य शस्त्र एवं बारूद, भवन-निर्माण कार्य तथा घरेलू-उपकरण। ध्वनि की उच्चता अर्थात् ध्वनि की तीव्रता को एक पैमाने पर दाब को माप कर मापा जा सकता है जिसे डेसिबल (decibel) (db) पैमाना कहते हैं। ध्वनि की तीव्रता में 10 गुना वृद्धि को इस मानक्रम में 10 db में दर्शाया जाता है। इस यंत्र को डेसिबलमापक (decibel meter) दाब के अतिरिक्त ध्वनि में तारत्व (pitch) भी होता है। उसी तीव्रता की निम्न तारत्व वाली ध्वनि की अपेक्षा ऊँचे तारत्व वाली ज़्यादा परेशान करने वाली होती हैं वह इकाई जिसमें ध्वनि का दाब एवं उसका तारत्व दोनों मापे जाते हैं, डेसिबल-ए (decibel-A : dbA) कहलाती है। शोर से कई प्रकार के प्रभाव आते हैं जैसे एक-दूसरे से बातचीत में विघ्न, स्वास्थ्य एवं व्यवहार संबंधी दोष तथा श्रवण शक्ति का हास। मानवों में उच्च ध्वनि से आवर्धित एड्रीनलीन स्तर, उच्च रक्त-चाप, माइग्रेन, उच्च कोलेस्ट्राल स्तर, पेट के अल्सर, चिड़चिडापन, अनिद्रा, अधिक आक्रामक व्यवहार तथा अन्य मनोवैज्ञानिक दोष, एवं श्रवण क्षमता में स्थायी क्षति आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं।

शोर प्रदूषण नियंत्रण में काम लाए जाने वाले उपाय इस प्रकार हैं-
  • (i) स्रोत पर शोर कम पैदा किया जाना
  • (ii) शोर के संचरण पथ में रोक पैदा करना
  • (iii) प्राप्तकर्ता की सुरक्षा।
हमारे देश में शोर प्रदूषण को कम करने की दिशा में अपेक्षाकृत बहुत ही कम ध्यान दिया गया है। शोर प्रदूषण के अभिशाप को नियंत्रित करने की दिशा में इन सबकी आवश्यकता है-जागरूकता, अभिप्रेरणा तथा कानून बनाने और उनको प्रभावशील विधि से लागू करना। दिल्ली के कुछ इलाकों में दीपावली के दिन CPCB द्वारा परिवेशी शोर स्तरों के संनिरीक्षण से पता चला कि रात के समय आवासीय क्षेत्रों में 45 dbA की निर्धारित सीमाओं से कहीं ज़्यादा शोर स्तर पाया गया। दीपावली पर पटाखों के इस्तेमाल के विरोध में स्कूली छात्रों द्वारा उत्साह और जागरूकता पैदा करने में शोर ओर वायु प्रदूषण का नियंत्रित करने में योगदान मिल सकता है।

सारांश

इस लेख में आपने प्रदूषण की संकल्पना के विषय में तथा मानव क्रियाकलापों से वायु, जल तथा मृदा के क्या-क्या प्रदूषक हैं, उनके विषय में पढ़ा। शोर तथा रेडियोसक्रिय प्रदूषण से भी पर्यावरण बिगड़ता है।
  • प्रदूषक उन साधनों को कहते हैं जिनसे वायु, जल तथा मृदा की गुणवत्ता में अवांछनीय परिवर्तन पैदा हो जाते हैं। प्रदूषण तथा पर्यावरण निम्नीकरण के लिए। मुख्य रूप में मानव जनित क्रियाकलाप ही ज़िम्मेदार हैं। प्रदूषणों की प्रकृति कैसी होगी यह ज़्यादातर हमारी अपनी जीवन-शैली, व्यवसाय, आदतों, परंपराओं, जागरूकता आदि पर निर्भर होता है।
  • संसाधनों का अविवेकशील उपयोग, औद्योगिक प्रक्रियाओं के उपजात, अपशिष्ट का बनना, बहिःस्त्रावों तथा अपशिष्टों के उपचार एवं प्रबंधन की ओर लोगों में इच्छाशक्ति का अभाव जैसे कारकों से पर्यावरण के प्रदूषण में योगदान होता है। जैवनिम्नीकरणी प्रदूषण सरलता से विद्यटित हो जाते हैं परंतु अ-अजैवनिम्नीकरणी प्रदूषक जब कभी पारितंत्र के किसी घटक में पहुंच जाते हैं तब वे समस्त पर्यावरण घटकों अर्थात् वायु, जल तथा मृदा में चक्र बनाते हुए चलते रह सकते हैं।
  • पारितंत्र के प्रदूषक पदार्थों तथा फ़सलों में क्षति पहुंचा कर मानवों एवं अन्य जीवन स्वरूपों को प्रत्यक्ष रूप में अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। चिरस्थायी प्रदूषक जैसे कि भारी धातुएं एवं चिरस्थायी कार्बनिक यौगिक खाद्य श्रृखंला में प्रवेश कर जाते हैं जिससे उनमें भांति-भांति की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं। पर्यावरण प्रदूषण के नियंत्रण हेतु आवश्यक है कि प्रदूषण होने के विविध कारणों एवं उससे होने वाली समस्याओं के प्रति जनता-जागरूकता पैदा हो, तथा कड़े पर्यावरण नियमों के मौजूद होने के साथ-साथ उनका कड़ाई से पालन हो। उद्योग से पैदा होने वाली प्रदूषण समस्याओं से लड़ने के लिए पर्यावरण-हितैशी प्रौद्योगिकियों का उपयोग बहुत प्रभावकारी होता है।
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