सामाजिक परिवर्तन - सामाजिक परिवर्तन क्या है, अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएं, कारण | samajik parivartan

प्रस्तावना

अठारहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप के समाजों में हो रहे तीव्र परिवर्तनों के अध्ययन में प्रारम्भ से ही समाजशास्त्र में रुचि स्पष्टतः देखी जा सकती है। कॉम्ट (Comte), मार्क्स (Marx) तथा स्पेन्सर (Spencer) इत्यादि प्रारम्भिक विद्वानों की कृतियों में परिवर्तन के प्रति रुचि स्पष्ट दिखाई देती है। इतना ही नहीं, उन्नीसवीं शताब्दी में उदविकासवादी (Evolutionary) तथा ऐतिहासिक (Historical) दृष्टिकोणों का विकास परिवर्तन के अध्ययनों के परिणामस्वरूप ही विकसित हुआ है। परन्तु प्रारम्भिक विद्वानों के लेखों में सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा का प्रयोग भिन्न शब्दों द्वारा किया गया है।
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बीसवीं शताब्दी में 'उद्विकास', 'विकास' तथा 'प्रगति' की अवधारणाओं के प्रयोग के साथ जुड़ी हुई कठिनाइयों के परिणामस्वरूप 'सामाजिक परिवर्तन' शब्द का प्रयोग किया जाने लगा है जो कि मानव समाजों में सभी ऐतिहासिक परिवर्तनों को व्यक्त करता है। 1922 ई० में डब्ल्यू० एफ० ऑगबर्न (W. F. Ogburn) की पुस्तक सोशल चेंज (Social Change) के प्रकाशन से इस अधिक तटस्थ शब्द का प्रयोग ही सामान्य रूप में किया जाने लगा है। आज उद्विकास, विकास व प्रगति सामाजिक परिवर्तन के भिन्न स्वरूप माने जाते हैं।

सामाजिक परिवर्तन की आवधारणा

परिवर्तन के अभाव में हमारी सामाजिक उपलब्धि, समाजीकरण, सामाजिक सीख तथा सामाजिक नियन्त्रण कुछ भी सम्भव नहीं है। निश्चित और निरन्तर परिवर्तन मानव समाज की विशेषता है। सामाजिक परिवर्तन का विरोध होता है क्योंकि समाज में रूढ़िवादी तत्त्व प्राचीनता से ही चिपटे रहना पसन्द करते हैं। स्त्री स्वतन्त्रता और समान अधिकार की भावना, स्त्रियों की शिक्षा, परदा प्रथा की समाप्ति, स्त्रियों का आत्म-निर्भर होना, दलितों, अन्त्यजों और निम्न जातियों की प्रगति आदि अनेक परिवर्तनों को आज भी समाज के कुछ तत्त्व स्वीकार नहीं कर पाते हैं तथापि इनमें परिवर्तन होता जा रहा है।
वास्तव में, प्रत्येक समाज में दो प्रकार की शक्तियाँ पाई जाती हैं—पहली, वे जोकि समाज में यथास्थिति बनाए रखना चाहती हैं तथा दूसरी, वे जोकि समाज को परिवर्तित करना चाहती हैं। दोनों में सामंजस्य होना समाज में निरन्तरता के लिए अनिवार्य है। लूमले (Lumley) का कथन है कि कई कारणों से सामाजिक परिवर्तन अवश्यम्भावी रहा है, और है। यदि हम इतिहास पर दृष्टिपात करें तो लूमले के विचारों की पुष्टि होती दीख पड़ती है और यही कारण है कि आज समाज परिवर्तन का सम्मान करता है। ग्रीन (Green) के शब्दों में, “परिवर्तन से सामंजस्य स्थापित करना ही हमारे जीवन का ढंग बन चुका है।' इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन स्वाभाविक और अवश्यम्भावी है। परिवर्तनविहीन समाज अथवा सृष्टि के किसी भी उपादान की कल्पना ही हास्यास्पद है। आदिम, सरल अथवा परम्परागत समाजों में भी आज अत्यधिक परिवर्तन हो रहे हैं।

सामाजिक परिवर्तन का अर्थ एवं परिभाषाएँ

'परिवर्तन' को अंग्रेजी के 'चेन्ज' (Change), 'आल्टरेशन' (Alteration) तथा 'मोडिफिकेशन' (Modification) आदि शब्दों से सम्बोधित किया जाता है। परिवर्तन किसी भी वस्तु, विषय अथवा विचार में समय के अन्तराल से उत्पन्न हुई भिन्नता को कहते हैं। परिवर्तन तब और अब की स्थितियों के बीच पैदा हुए अन्तर को प्रकट करता है। ‘परिवर्तन' एक बहुत विस्तृत अवधारणा है और यह जैविक (Biological), भौतिक (Physical) तथा सामाजिक (Social) तीनों जगत में पाई जाती है। किन्तु जब परिवर्तन शब्द के पूर्व 'सामाजिक' शब्द जोड़कर उसे 'सामाजिक परिवर्तन' बना दिया जाता है तो निश्चित ही उसका अर्थ सीमित हो जाता है। सामाजिक परिवर्तन को हम सम्पूर्ण परिवर्तन का एक भाग कह सकते हैं क्योंकि भौतिक एवं जैविक जगत में होने वाले परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र के अन्तर्गत नहीं रखा जा सकता है। अत: प्रश्न उठता है कि सामाजिक परिवर्तन क्या है? सामाजिक परिवर्तन का अर्थ सामाजिक संगठन, समाज की विभिन्न इकाइयों, सामाजिक सम्बन्धों, संस्थाओं इत्यादि में होने वाला परिवर्तन है। सगंठन का निर्माण संरचना तथा कार्य दोनों से मिलकर होता है। सामाजिक प्रक्रियाओं तथा सामाजिक अन्तक्रियाओं में होने वाले परिवर्तनों को भी । सामाजिक परिवर्तन ही कहा जाता है।

मैरिल एवं एल्ड्रिज (Merrill and Eldredge) के अनुसार, “अपने सर्वाधिक सही अर्थों में सामाजिक परिवर्तन का अर्थ है कि अधिक संख्या में व्यक्ति इस प्रकार के कार्यों में व्यस्त हों जोकि उनके पूर्वजों के अथवा उनके अपने कार्यों से भिन्न हों जिन्हें वे कुछ समय पूर्व तक करते थे। समाज का निर्माण प्रतिमानित मानवीय सम्बन्धों के एक विस्तृत एवं जटिल जाल से होता है जिसमें सब लोग भाग लेते हैं। जब मानव व्यवहार संशोधन की प्रक्रिया में होता है तो यह कहने का ही दूसरा तरीका है कि सामाजिक परिवर्तन हो रहा है।” इन्होंने अपनी उपर्युक्त परिभाषा में सामाजिक परिवर्तन को मानव क्रियाओं के सन्दर्भ में स्पष्ट किया है। समाज सामाजिक सम्बन्धों का जाल है। ये सम्बन्ध समाज से मान्यता प्राप्त भी होते हैं और संस्थागत (Institutionalized) भी होते हैं। जब मनुष्यों के व्यवहार के प्रतिमानों अथवा सामाजिक सम्बन्धों में कोई परिवर्तन हो, तो हम उसे सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन जीवन की स्वीकृत रीतियों में । घटित परिवर्तन को कहते हैं, चाहे परिवर्तन भौगोलिक दशाओं, सांस्कृतिक साधनों, जनसंख्या की रचना या विचारधाराओं में परिवर्तन से उत्पन्न हुआ हो, और चाहे प्रसार के द्वारा अथवा समूह के अन्तर्गत हुए आविष्कारों के परिणामस्वरूप सम्भव हुआ है।” इनके अनुसार जीवन के स्वीकृत तरीकों में परिवर्तनों को हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। समाज में जीवन के स्वीकृत ढंग संस्थागत हो जाते हैं और इन्हीं संस्थागत प्रतिमानों में परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन कहलाता है। यह परिवर्तन किसी भी कारण से पैदा हो सकता है। इन्होंने इस परिवर्तन को लाने में भौगोलिक दशाओं, संस्कृति, व्यक्तियों की मनोधारणाओं एवं जनसंख्या की संरचना, नवीन आविष्कारों तथा सामाजिक सांस्कृतिक तत्त्वों के प्रसार (Diffusion) जैसे कारणों को महत्त्वपूर्ण माना है।

जोन्स (Jones) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन वह शब्द है जोकि सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक प्रतिमानों, सामाजिक अन्तक्रियाओं या सामाजिक संगठन के किसी भाग में घटित होने वाले हेर-फेर या संशोधन के लिए प्रयोग किया जाता है।" इन्होंने सामाजिक परिवर्तन को सामाजिक प्रक्रिया में परिवर्तन माना है। समाज में अनेक क्रियाएँ कार्यरत रहती हैं; जैसे—संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, विरोध, सहयोग इत्यादि। विविध सामाजिक क्रियाएँ एवं अन्तक्रियाएँ सामाजिक सम्बन्धों के ही विविध रूपों को हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। अत: सामाजिक क्रियाओं एवं अन्तक्रियाओं में परिवर्तन सामाजिक सम्बन्धों के ही विविध स्वरूपों में होने वाला परिवर्तन है। सामाजिक व्यवहार के प्रतिमान सामाजिक अन्तक्रिया का परिणाम होते हैं। सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य सामाजिक संगठन में होने वाला परिवर्तन है अर्थात् व्यक्तियों की प्रस्थिति एवं कार्यों में होने वाला परिवर्तन भी है।

डेविस (Davis) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन से तात्पर्य केवल उन परिवर्तनों से है जोकि सामाजिक संरचना (ढाँचे) एवं प्रकार्यों में होते हैं।” किंग्स्ले डेविस की इस परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि वे केवल उन्हीं परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं जोकि सामाजिक व्यवस्था में होते हैं। व्यक्तियों की प्रस्थिति एवं कार्यों से सामाजिक संस्थाओं और बहुत-सी सामाजिक समितियों का निर्माण होता है। वे सामाजिक समितियाँ और संस्थाएँ कुछ-न-कुछ कार्य करती हैं। इन्हीं संस्थाओं अथवा समितियों की संरचना एवं उनकी भूमिका में होने वाले परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। डेविस के अनुसार, चूँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए सामाजिक परिवर्तन का अर्थ मानवीय परिवर्तन है। समाज में होने वाला परिवर्तन व्यक्ति को परिवर्तित कर देता है।

मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) समाज को सामाजिक सम्बन्धों का जाल कहते हैं और इन्हीं सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तन को हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। उन्हीं के शब्दों में, “समाजशास्त्री होने के नाते हमारा सीधा सम्बन्ध सामाजिक सम्बन्धों से है। अत: जिसे हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं वह केवल इन्हीं (सामाजिक सम्बन्धों) में परिवर्तन है।"

सामाजिक परिवर्तन की विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि प्रत्येक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन नहीं है अपितु सामाजिक परिवर्तन सामाजिक प्रस्थिति एवं कार्यों में होना वाला परिवर्तन है। सामाजिक संगठन; संरचना तथा कार्य दोनों से मिलकर बनता है, इसलिए इनमें होने वाले परिवर्तन सामाजिक संगठन में परिवर्तन लाते हैं। ऐसे परिवर्तन भी सामाजिक परिवर्तन ही कहे जाएंगे। इसी प्रकार, सामाजिक संस्थाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक सम्बन्धों तथा सामाजिक अन्तक्रियाओं में परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन कहलाता है। उदाहरणार्थ-हिन्दुओं में नारी की परम्परागत सामाजिक प्रस्थिति में दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं एक, उसे अपने भाइयों के समान ही पिता की सम्पत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार मिला है और दूसरे, हिन्दुओं में तलाक का भी कानूनी प्रावधान किया गया है। ये दोनों ही बातें पहले हिन्दुओं में नहीं थीं। यह परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन हैं। 
सामाजिक परिवर्तन की विभिन्न परिभाषाओं के विश्लेषण से हमें यह पता चलता है कि समाजशास्त्रियों ने इसे भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों द्वारा परिभाषित करने का प्रयास किया है। इन परिभाषाओं में भिन्नता का कारण, वास्तव
में, सामाजिक परिवर्तन के बारे में विद्वानों में असहमति एवं अस्पष्टता का होना नहीं है अपितु भिन्नता का प्रमुख कारण विद्वानों द्वारा 'समाज' शब्द का बहुअर्थी प्रयोग है। उदाहरण के लिए, मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) ने समाज को सामाजिक सम्बन्धों के ताने-बाने अथवा जाल के रूप में परिभाषित किया है। इसी अर्थ के अनुरूप उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा दी है। उनका कहना है कि समाजशास्त्री होने के नाते हमारा सीधा सम्बन्ध सामाजिक सम्बन्धों से है, अत: जिसे हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं वह केवल इन्हीं (सामाजिक सम्बन्धों) में परिवर्तन है।

इसी प्रकार, गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) ने समाज की परिभाषा एक वृहद् स्थायी समूह के रूप में दी है जो सामान्य हितों, सामान्य भू-भाग, सामान्य रहन-सहन तथा पारस्परिक सहयोग अथवा अपनत्व की भावना से युक्त है तथा जिसके आधार पर वह अपने को बाहर के अन्य समूहों से पृथक् करता है। इसमें उन्होंने, वास्तव में, समाज की कुछ विशेषताओं का उल्लेख किया है तथा इन्हीं में होने वाले परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहा है। सामाजिक परिवर्तन के अन्तर्गत उन्होंने स्वीकृत रीतियों, भौगोलिक दशाओं, सांस्कृतिक साधनों तथा जनसंख्या की रचना या विचारधाराओं सभी में होने वाले परिवर्तनों को सम्मिलित किया है। ये सब वही पहलू हैं जिनको इन्होंने समाज की परिभाषा में प्रधानता दी है।

अतः स्पष्ट है कि प्रत्येक विद्वान् द्वारा सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा उसके समाज के बारे में दृष्टिकोण द्वारा प्रभावित है तथा इस अर्थ में वह ठीक भी है और नहीं भी। वास्तव में, जब तक समाज के अर्थ के बारे में सर्वसम्मति नहीं होगी तब तक सामाजिक परिवर्तन की परिभाषाओं में भिन्नताएँ रहेंगी ही।

सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ

विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर सामाजिक परिवर्तन की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-

सामाजिक परिवर्तन समाज से सम्बन्धित है
सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध व्यक्ति विशेष अथवा समूहविशेष से न होकर पूर्ण समाज के जीवन से होता है। यह व्यक्तिवादी नहीं वरन् समष्टिवादी होता है, इसीलिए परिवर्तन का प्रभाव सामान्यत: सम्पूर्ण समाज पर पड़ता है।

सामाजिक परिवर्तन सार्वभौमिक है
संसार में कोई भी ऐसा समाज नहीं है जहाँ परिवर्तन न होता रहता हो और जो पूर्णत: स्थिर हो। परिवर्तन प्रति क्षण होता रहता है। यह सम्भव है कि किसी समाज में परिवर्तन की गति तीव्र हो तो और कहीं धीमी, किन्तु परिवर्तन होता सब जगह है, चाहे उसके स्वरूप में कितनी भी भिन्नता क्यों न हो। विश्व में कोई भी दो समाज पूर्णत: एक से नहीं हैं, अतः परिवर्तन कभी भी पूर्णत: एक जैसे नहीं हो सकते। रोबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) ने कहा है कि “किन्हीं भी दो समाजों का इतिहास एक समान नहीं होता, किन्हीं भी दो समाजों की संस्कृति एक-जैसी नहीं होती, कोई भी एक-दूसरे का प्रतिरूप नहीं है।"

सामाजिक परिवर्तन स्वाभाविक और अवश्यम्भावी है
सामाजिक परिवर्तन स्वाभाविक है तथा समयानुकूल होता रहता है। मानव स्वभाव प्रत्येक क्षण नवीनता चाहता है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है तथा अवश्यम्भावी है। यह किसी की इच्छा अथवा अनिच्छा पर निर्भर नहीं होता यद्यपि आधुनिक युग में इसे नियोजित किया जा सकता है। अतः हम कह सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन स्वाभाविक और अवश्यम्भावी है।

प्रत्येक समाज में सामाजिक परिवर्तन की गति एक-समान नहीं है
सामाजिक परिवर्तन में एक विशेषता यह भी पाई जाती है कि इसकी गति हर समाज में एक-सी नहीं होती। साथ ही, ग्रामीण एवं नगरीय समुदायों में परिवर्तन की गति समान नहीं पाई जाती। अमेरिकी और जापानी समाजों में जिस तीव्र गति से परिवर्तन होते हैं, भारत एवं चीन के समाजों में वह गति देखने को नहीं मिलती। परिवर्तन न केवल एक समाज से दूसरे समाज में ही भिन्न पाया जाता है, बल्कि एक ही समाज के विभिन्न समूहों में भी इसकी गति असमान होती है। यदि दो समाजों में एक-समान परिवर्तन के कारक पाए भी जाएँ तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों समाजों में समान गति से एक-जैसा ही परिवर्तन होगा क्योंकि कारकों पर देश, काल एवं परिस्थिति का भी प्रभाव पड़ता है। अतः परिवर्तन के कारक किस समाज में अधिक प्रभावशाली होंगे और किसमें कम, यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता। उदाहरणार्थ-यूरोप में औद्योगीकरण, नगरीकरण, व्यक्तिवाद, स्त्रियों की स्वतन्त्रता तथा आवागमन एवं सन्देशवाहन के साधनों से अनेक परिवर्तन बड़ी तीव्रता से आए हैं। भारत में इन परिवर्तनों की गति अपेक्षाकृत मन्द है। भारतीय नगरों में गाँवों की अपेक्षा तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं।

सामाजिक परिवर्तन में समय का तत्त्व
विलबर्ट ई० मूर ने लिखा है कि “मानव अनुभूति में समय का भाव और परिवर्तन का अभ्यास अपृथकनीय रूप से जुड़े हए हैं। सीधे-सादे शब्दों में हम प्राय: यह कहते हैं कि पुराने जमाने में ऐसा होता था अथवा हमारे पूर्वजों के जमाने में ऐसा होता था। इन वाक्यांशों से यह सिद्ध होता है कि हम दो समयों की तुलना कर रहे हैं—एक वह जो पहले था और एक वह जो आज है। इन दोनों समयों के बीच उत्पन्न हुई भिन्नता ही परिवर्तन है। यदि सूत्र रूप में कहा जाए तो हम कह सकते हैं कि तब (T1) और अब (T2) के बीच अन्तर (T2-T1) ही परिवर्तन का द्योतक है। इस प्रकार-
  • Change = T2 – T1
  • परिवर्तन = समय 2 - समय 1
मूर के शब्दों को ही हम पुन: उद्धृत करना चाहेंगे जो स्पष्ट घोषणा करते हैं कि समय के तत्त्व के अभाव में परिवर्तन की बात करना निरर्थक है, “समय बिना कोई परिवर्तन नहीं है। परिवर्तन के अभाव में, इसी प्रकार, समय का कोई अर्थ नहीं है।'

सामाजिक परिवर्तन के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती
सामाजिक परिवर्तन के सम्बन्ध में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती क्योंकि कभी-कभी आकस्मिक कारक भी परिवर्तन ला देते हैं। सामाजिक परिवर्तन समाज या सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन है। हमारे व्यवहार भी परिवर्तनशील हैं। यही कारण है कि सामाजिक व्यवहार के बारे में भविष्यवाणी करते समय हम, मात्र अनुमान ही लगा सकते हैं किन्तु दृढ़तापूर्वक कुछ भी नहीं कह सकते। जैसे-अस्पृश्यता के विरुद्ध सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलन के द्वारा छुआ-छूत व ऊँच-नीच की भावना कम होगी यह तो कहा जा सकता है, किन्तु समाज में ये सब कब पूर्णतः समाप्त होगा यह नहीं कहा जा सकता। सामाजिक परिवर्तन की दिशा के बारे में तो अनुमान लगाया जा सकता है परन्तु भविष्यवाणी करना कठिन कार्य है।

सामाजिक परिवर्तन अमूर्त है
सामाजिक परिवर्तन एक अवधारणा है और अवधारणा अमूर्त होती है। अत: सामाजिक परिवर्तन भी अमूर्त है। सामाजिक परिवर्तन क्योंकि सामाजिक सम्बन्धों में होने वाला परिवर्तन है और सामाजिक सम्बन्धों को न तो देखा जा सकता है और न छुआ जा सकता है। इनका केवल अनुभव किया जा सकता है। क्योंकि सामाजिक सम्बन्ध अमूर्त होते हैं अत: उनमें होने वाला परिवर्तन भी अमूर्त हुआ।

सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न प्रतिमान होते हैं
परिवर्तन का कोई एक प्रतिमान नहीं है। समाज में होने वाले सभी परिवर्तनों को देखने के बाद हम इसी निष्कर्ष पर आते हैं कि समाज में सैकड़ों प्रकार के परिवर्तन होते रहते हैं। कभी परिवर्तन उतार-चढ़ाव के रूप में होता है तो कभी समरेखीय और कभी चक्रवत् तो कभी लहरदार। जनसंख्या, आर्थिक जगत एवं फैशन में परिवर्तन का जो प्रतिमान देखने में आता है वह मूल्यों एवं मनोधारणाओं के परिवर्तन में नहीं दिखाई देता।

सामाजिक परिवर्तन तुलनात्मक एवं सापेक्ष होता है
समाजशास्त्री सामाजिक परिवर्तन का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं क्योंकि सामाजिक परिवर्तन का कोई निश्चित मापदण्ड नहीं है। इसलिए सामाजिक परिवर्तन को जानने का यही एकमात्र उपाय रह जाता है कि या तो एक ही समय में दो विभिन्न समाजों की तुलना की जाए या एक ही समाज की दो विभिन्न कालों में तुलना की जाए। इस तुलना के आधार पर ही यह अनुमान लग सकता है कि किसी समाज में क्या परिवर्तन हो रहे हैं और वे परिवर्तन किस दिशा अथवा गति से हो रहे हैं। अतः हम कह सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन सदैव तुलनात्मक एवं सापेक्ष होते हैं।

सामाजिक परिवर्तन एक तटस्थ अवधारणा है
सामाजिक परिवर्तन एक तटस्थ अवधारणा है क्योंकि यह तो दो समयावधियों के अन्तराल में किसी समाज में उत्पन्न भिन्नता-मात्र है। इसलिए इससे तो केवल इतना पता चलेगा कि कोई चीज जिस रूप में पहले थी उस रूप में अब नहीं है। वह अन्तर समाज के लिए अच्छा रहा या बुरा, यह एक अलग बात होगी जिसे मापने के लिए निश्चित कसौटियों की जरूरत होगी।
सामाजिक परिवर्तन की विशेषताओं का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक परिवर्तन समाज व्यवस्था में अन्तर्निहित सत्य है। समय के साथ-साथ, जीवन-यापन की दशाओं में ऐसा परिवर्तन हो जाता है कि कुछ विशिष्ट समूहों अथवा वर्गों की अपनी महत्त्वाकांक्षाएँ पूरी नहीं होतीं। वे महसूस करते हैं कि उन्हें उनके न्यायोचित देय से वंचित रखा जा रहा है। यह असन्तोष और निराशा विद्यमान सामाजिक संस्थाओं में तनाव पैदा कर देती है और उनका पुनर्गठन करना आवश्यक हो जाता है। यहाँ यह भी स्मरण रखने योग्य है कि सामाजिक परिवर्तन बहुकारकीय घटना है। किसी एक कारक को ही समाज का निर्धारक कारक नहीं माना जा सकता। अन्त में, हम यह भी कहना चाहेंगे कि समाज व्यवस्था एक 'जीवन्त सम्पूर्ण' घटना है। इसकी सभी उपव्यवस्थाएँ; जैसे परिवार एवं नातेदारी, अर्थव्यवस्था, राज्यव्यवस्था, शैक्षिक व्यवस्था, धार्मिक व्यवस्था, नैतिक व्यवस्था, सौन्दर्य-बोधात्मक व्यवस्था तथा मनोरंजन व्यवस्था एक-दूसरे से घनिष्ठतया सम्बन्धित हैं। इनमें से किसी एक उपव्यवस्था में भी घटित हुआ परिवर्तन अन्य सभी उपव्यवस्थाओं पर प्रभाव अवश्य डालेगा और इस तरह सम्पूर्ण समाज के सन्तुलन को नए बिन्दु पर पुनर्गठित करना होगा।

सामाजिक परिवर्तन के विस्तत प्रतिमान

सामाजिक परिवर्तन एक विस्तृत अवधारणा है जिसका कोई एक निश्चित प्रतिमान नहीं है। मुख्य प्रश्न हमारे सामने यह है कि सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करने के लिए किस कारक को आधार माना जाए और व्याख्या करने में कौन-सी पद्धति को अपनाया जाए? विद्वानों ने इस समस्या को निम्नलिखित दो प्रकार से समझाने का प्रयास किया है

कारकों की विविधता एवं अन्योन्याश्रितता
जब हम समाज में होने वाले किसी भी परिवर्तन को देखते हैं तो यह ज्ञात होता है कि उसके एक नहीं बल्कि अनेक कारक हैं जो किपरस्पर भिन्न न होकर अन्योन्याश्रित हैं अर्थात् ये एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। किसी सामाजिक परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए मनोधारणाओं या मनोवृत्तियों में परिवर्तन तथा मानव मनोवृत्तियों पर उसके सम्पूर्ण पर्यावरण एवं दशाओं का प्रभाव पड़ता है। इस परिवर्तन को समझने के लिए आर्थिक दशाओं तथा प्रौद्योगिकीय एवं राजनीतिक पक्षों से भी परिचित होना पड़ता है। कुछ परिवर्तन इसलिए होते रहते हैं कि हम भौतिक पर्यावरण से सामंजस्य स्थापित कर सकें। उदाहरणार्थ-यदि हम गिरती हुई जन्म-दर का अध्ययन करें तो हमें धार्मिकता, स्त्रियों की बढ़ती हुई आर्थिक स्वतन्त्रता, सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि, देर से विवाह, व्यक्तिवाद आदि का अध्ययन करना ही होगा। इस संयुक्त योगदान को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। अत: बाध्य होकर सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या में हमें विविध कारकों का उत्तरदायित्व स्वीकार करना पड़ता है। ऐसा किए बिना हम सामाजिक परिवर्तन को नहीं समझ सकते। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करने में हम किसी एक कारक को निर्णायक कारक मानकर नहीं चल सकते।
समाज में परिवर्तन लाने वाले विभिन्न कारक आपस में अन्तर्सम्बन्धित हैं। यही कारण है कि वे स्वयं पूर्ण न होकर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। किसी सामाजिक घटना का वर्णन करते समय न केवल कारकों की बहुलता या विविधता (Multiplicity of factors) ही ध्यान में रखनी है वरन् उनकी अन्तर्निर्भरता को भी उतनी ही महत्ता देनी होगी। विविध कारण एक-दूसरे से मिले और गुँथे रहते हैं। अपराधों में वृद्धि का कारण हम व्यक्तिवाद को मानते हैं जिसने व्यक्ति को संयुक्त परिवार से अलग किया और संयुक्त परिवार का ह्रास करके एकाकी परिवार बसाने को प्रोत्साहित किया। अपराधों में वृद्धि का दूसरा कारक नगरीकरण माना जाता है क्योंकि जीविकोपार्जन हेतु गाँवों के लोग नगरों की ओर आकर्षित होते हैं और वहाँ की गन्दी बस्तियों के वातावरण में अपराध करने के अधिक अवसर मिलने पर अपराधों में भाग लेने लगते हैं। यहाँ उन्हें जनसंख्या में विविधता (Heterogeneity of population) मिलती है जिससे अपराध करके भीड़-भाड़ पूर्ण वातावरण में छिपने की सुविधा तथा औद्योगिक केन्द्रों में अपराधी व्यक्ति को खोज पाने की कठिनाई तथा साथ ही तीव्रगामी आवागमन के साधनों में वृद्धि के कारण एक स्थान पर अपराध करके दूसरे स्थान पर आसानी से भाग जाने की सुविधा आदि सम्भव होने के कारण व्यक्ति अपराधी बन जाता है। अपराध का तीसरा कारक शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोरी है। ऐसे व्यक्ति अधिक अपराध करते हैं क्योंकि उनमें इतनी बुद्धि नहीं होती है कि वे अपराध एवं उससे समाज को होने वाली हानि तथा अपने पर इसके होने वाले प्रभावों के विषय के बारे में सोच सकें। यह भी हो सकता है कि व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता का शिकार हो या निराश हो और इसी कारण अपराध करता हो। अब यह प्रश्न उठता है कि क्या ये सब कारक एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं? क्या व्यक्तिवाद नगरीकरण का ही परिणाम नहीं है? क्या नगरीकरण औद्योगीकरण का ही शिशु नहीं है? क्या आवागमन के साधनों में वृद्धि, नगरीकरण, व्यक्तिवाद, द्वितीयक समूहों का विकास तथा अपराध वृद्धि आदि सभी कारक पारस्परिक निर्भरता की कड़ी में नहीं बँधे हैं? समाजशास्त्रीय अध्ययनों के आधार पर आज हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि ये कारक स्वतन्त्र कारक नहीं बल्कि एक-दूसरे के साथ सहयोगी व्यवस्था में बँधकर किसी सामाजिक व्यवहार को जन्म देते हैं। सामाजिक कारक आपस में तार्किक रूप से कार्य-कारण सम्बन्धों से भी जुड़े हुए होते हैं।
इस प्रकार, यह सिद्ध हो जाता है कि सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करने में कारकों की विविधता तथा उनकी अन्योन्याश्रितता को भी ध्यान में रखना अत्यन्त आवश्यक है।

परिमाणात्मक पद्धति की असमर्थता
कुछ विद्वान् यह विश्वास करते हैं कि हर सामाजिक घटना का अध्ययन हम परिमाणात्मक सांख्यिकीय पद्धति के द्वारा कर सकते हैं। उदाहरणार्थ-अपराधों का अध्ययन करने के लिए हम संयुक्त परिवार के विघटन पर भी दृष्टिपात करते हैं। कितने संयुक्त परिवार विघटित हुए यह जानने के लिए हमें उनकी संख्या गिननी होगी जिसमें इस पद्धति का सहारा लेना होगा। परन्तु सामाजिक सम्बन्धों का एक परिमाणात्मक पहलू भी है जो अति न्यून है। भौतिक विज्ञानों के समान परिमाणात्मक पद्धति को यदि हम समाजशास्त्र में भी लागू करते हैं तो बड़ा भय उपस्थित हो जाता है। सामाजिक घटनाओं में प्राकृतिक घटनाओं के समान किसी परिस्थिति में से अलग किए जा सकने वाला कोई भाग नहीं है। विभिन्न भाग अपने सन्दर्भ में अलग होते ही अर्थहीन हो जाते हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि सामाजिक सम्बन्ध अमूर्त होते हैं क्योंकि न तो उनका कोई भौतिक स्वरूप ही होता है और न ही आकार। अत: उन्हें रेखागणितीय या परिमाणात्मक पैमाने से नहीं मापा जा सकता। साथ ही, यदि एक घटना को पैदा करने में कई कारकों का योगदान रहता है तो इनमें से प्रत्येक कारक का कितना अलग-अलग व्यक्तिगत योगदान है, यह ज्ञात करना अति कठिन है।
उपर्युक्त दोनों दृष्टिकोणों के कारण सामाजिक परिवर्तन के विस्तृत प्रतिमान के निर्धारण की समस्या और अधिक उलझ जाती है। इन समस्याओं के बावजूद समाजशास्त्री सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख विस्तृत प्रतिमानों को समझने में काफी सीमा तक सफल रहे हैं। यह सही है कि सामाजिक परिवर्तन समस्त समाजों में एक-सा नहीं हो सकता, अतः हमें परिवर्तन के विभिन्न प्रतिमान (Patterns) दृष्टिगोचर होते हैं। यदि किन्हीं दो समाजों में परिवर्तन के समान कारक भी कार्य कर रहे हों तो भी यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि उन दोनों समाजों में परिवर्तन के प्रतिमान भी समान ही विकसित होंगे, क्योंकि परिवर्तन के कारकों का क्रमागत एकीकरण (Orderly integration) भी समान होगा यह आवश्यक नहीं है। इसी से दो भिन्न समाजों में परिवर्तन के एक से ही कारकों के कार्यरत रहने पर भी प्रतिमान भिन्न हो जाते हैं।
यद्यपि सामाजिक परिवर्तन के अनेक प्रतिमान देखे जा सकते हैं तथापि मैकाइवर एवं पेज ने निम्नलिखित तीन प्रतिमान हमारे सम्मुख प्रस्तुत किए हैं-

पहला प्रतिमान रेखीय परिवर्तन
सामाजिक परिवर्तन के प्रथम प्रतिमान के अनुसार परिवर्तन यकायक (Suddenly) होता है और फिर क्रमश: मन्दगति से अनिश्चितकाल तक सदैव ऊपर की ओर होता रहता है। अत: यह परिवर्तन उत्तरोत्तर वृद्धि करता जाता है। परिवर्तन की यह रेखा सदैव ऊपर की ओर चलती रहती है। उदाहरणार्थ-हम आवागमन एवं सन्देशवाहन के साधनों को ले सकते हैं। एक बार जब कोई आविष्कार हो जाता है तो वह उत्तरोत्तर ऊपर चला जाता है तथा अन्य अनेक नवीन आविष्कारों का मार्ग भी प्रशस्त कर देता है। प्रौद्योगिकी (Technology) में होने वाले परिवर्तन भी इसी प्रकार के होते हैं। इसी प्रकार विज्ञान में होने वाले परिवर्तन भी इससे बहुत-कुछ साम्य रखते हैं। अत: निरन्तर उन्नत होते प्रतिमान रेखीय प्रतिमान कहलाते हैं। इनकी उन्नति की गति तीव्र भी हो सकती है और मन्द भी। मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, “वास्तव में, इस प्रकार के परिवर्तन की विशेषता उसकी यकायकता नहीं बल्कि एक उपयोगी व्यवस्था के निरन्तर संचयी विकास के रूप में है जब तक इस व्यवस्था को उसी भाँति उत्पन्न कोई दूसरी नई व्यवस्था अचानक आकर जड़ से ही न उखाड़ फेंके।"

दूसरा प्रतिमान : उन्नति-अवनतिशील परिवर्तन
परिवर्तन के इस प्रतिमान के अनुसार परिवर्तन एवं विकास क्रमश: नहीं होता है वरन् एक ही स्थिति के बिलकुल विपरीत स्थिति भी तुरन्त ही परिवर्तित हो जाती है। कुछ समय तक परिवर्तन का प्रवाह लगातार ऊपर की दिशा में जाता है, बाद में यह एकदम विपरीत दिशा में प्रवाहित हो जाता है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विकास और अवनति के ये सोपान परिलक्षित होते रहते हैं। आर्थिक जगत तथा जनसंख्या में होने वाले परिवर्तन इसी प्रतिमान की अभिव्यक्ति करते हैं। आर्थिक जगत में सामान्यत: अनेक उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। जनसंख्या भी बढ़ती जाती है और फिर एकदम से घटनी शुरू हो जाती है। प्रथम प्रतिमान (रेखीय परिवर्तन) में यह निश्चित है कि परिवर्तन निश्चित दिशा में सदैव ऊर्ध्वगामी होता है किन्तु इस द्वितीय प्रतिमान में कुछ पता नहीं रहता कि परिवर्तन कब अपनी विपरीत दिशा में प्रवाहित हो जाएगा। यह चरमोन्नति सेनिम्न स्तर और निम्नतम से चरमोन्नत की ओर कुछ भी हो सकता है।

तीसरा प्रतिमान चक्रीय परिवर्तन
परिवर्तन का यह प्रतिमान दूसरे से काफी मिलता-जुलता है। यह परिवर्तन पूरे जीवन अथवा उसके कई भागों में उसी प्रकार से देखने में आता है जैसे कि प्राकृतिक जगत में। इसकी तुलना साइकिल के पहिये की भाँति चलने वाले चक्र से की जा सकती है। प्राकृतिक जगत में इस प्रकार के परिवर्तन देखने में आते हैं। मौसमों का क्रमश: चक्रीय परिवर्तन इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। जैसे समुद्र अथवा नदी में एक के पीछे दूसरी लहरें उठती रहती हैं और उस प्रक्रिया का कोई अन्त नहीं होता, ठीक उसी प्रकार परिवर्तन आदि-अन्त विहीन निरन्तर होता रहता है। यह चक्र मानव जीवन में भी देखा जा सकता है। मनुष्य का जन्म होता है, वह युवा होता है, वृद्ध होता है तथा मर जाता है। ये अवस्थाएँ अवश्यम्भावी हैं। फैशन में होने वाले परिवर्तन तथा रूढ़ियों में होने वाले परिवर्तन इसी प्रतिमान के अन्तर्गत आते हैं।
इस प्रकार, यद्यपि हम उपर्युक्त प्रतिमानों में परिवर्तन को व्यक्त करते हैं तथापि सभी परिवर्तनों को इन तीन प्रतिमानों के अन्तर्गत ही नहीं रखा जा सकता। कुछ परिवर्तन ऐसे भी होते हैं जो इन तीनों में से किसी में भी नहीं आते हैं अथवा तीनों में ही आते हैं। वस्तुत: मानव सम्बन्धों का अधिकतर भाग गुणात्मक (Qualitative) है। अतः जब किसी परिवर्तन में सांस्कृतिक-मूल्यों का समावेश होता है तो हमारे लिए उस परिवर्तन को किसी एक प्रतिमान के अन्तर्गत रखना कठिन हो जाता है। इस कठिनाई के बावजूद अधिकांश समाजशास्त्री सैद्धान्तिक रूप में सामाजिक परिवर्तन के उपर्युक्त तीनों प्रतिमानों को स्वीकार करते हैं।

सामाजिक परिवर्तन के कारक

सामाजिक परिवर्तन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसके अनेक कारक हो सकते हैं। सामाजिक परिवर्तन का बिना किसी कारक के क्रियाशील होना असम्भव है परन्तु यह भी सत्य है कि किसी एक कारक से समाज में परिवर्तन होना मुश्किल है। अत: हम यहाँ सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न कारकों का अध्ययन करेंगे। इसके प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं

भौतिक कारक
समाजशास्त्र में हम भौतिक, भौगोलिक या प्राकृतिक पर्यावरण में अन्तर नहीं करते। जब कोई भी परिवर्तन हमारे भौतिक या भौगोलिक पर्यावरण में होता है तो उसका प्रभाव हमारे समाज पर भी पड़ता है। भौतिक पर्यावरण; यथा पृथ्वी की बनावट, उसका धरातल, समुद्र तल से ऊँचाई, पर्वत, चट्टानें, नदियाँ, झरने तथा पठार, वन, झील, जलवायु, मौसम तथा रेगिस्तान इत्यादि मानव जीवन को प्रभावित करते हैं। आचार-विचार से लेकर रहन-सहन तक तथा समाज की अवनति और उन्नति पर इसका प्रभाव परिलक्षित होता है। अकाल, तूफान, पहाड़ गिरना, बाढ़ आना इत्यादि भौगोलिक कारक समाज में निराश्रयता, भुखमरी, चरित्र भ्रष्टता, अपराध, भिक्षावृत्ति आदि के जन्मदाता होते हैं।
बकल एवं हटिंगटन (Buckle and Huntington) ने भी स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक अवस्था के अनुसार ही मनुष्य की कल्पना या भौतिक विकास सम्भव होता है। समाजशास्त्र में भौगोलिक सम्प्रदाय भी पाया जाता है। यह उन लोगों का सम्प्रदाय है जो मानव जीवन के हर पहलू की व्याख्या करने में भौगोलिक कारक को प्रमुख और निर्णायक मानते हैं। इस समूह के नेता हटिंगटन का कथन है कि जलवायु में होने वाले परिवर्तन हमारे स्वास्थ्य, हमारी मानसिक एवं शारीरिक क्षमता एवं कुशलता तथा उससे पैदा होने वाली हमारी संस्कृति एवं सभ्यता को प्रभावित एवं परिवर्तित करते हैं।

जैविक कारक
जैविक कारक में हम वंशानुक्रमणीय पद्धति में होने वाले परिवर्तनों को रखते हैं। वंशानुक्रमण ही यह निर्धारित करता है कि आगे आने वाली पीढ़ी का स्वास्थ्य कैसा होगा? जनसंख्या का जैसा स्वास्थ्य होगा वैसी ही शारीरिक एवं मानसिक कुशलता एवं क्षमता उनमें होगी। जैविक कारक ही विवाह की आयु एवं उत्पादन दर को भी प्रभावित करते हैं। यदि हमारे वंशानुक्रमण में कोई परिवर्तन होता है तो हमारे समाज में अनेक परिवर्तन होते हैं। जैविक जगत में होने वाले परिवर्तन सामाजिक जगत में होने वाले परिवर्तनों को जन्म देते हैं। डार्विन की प्रसिद्ध पुस्तक 'ओरिजिन ऑफ स्पेसीज' (Origin of Species) में प्राकृतिक प्रवरण (Natural selection) के सिद्धान्त के अन्तर्गत योग्यतम प्राणी के जीवित रहने तथा निर्बलों की समाप्ति अथवा लोप अथवा जीवित रहने के लिए जिस संघर्ष (Struggle for existence) की बात कही गई है वह जैविक परिवर्तन तथा उसके फलस्वरूप होने वाले सामाजिक परिवर्तनों पर पर्याप्त प्रकाश डालता है।

जनसंख्यात्मक कारक
जनसंख्या में होने वाला परिवर्तन समाज में अनेक परिवर्तनों को जन्म देता है। यदि किसी देश की जनसंख्या के स्वास्थ्य में गिरावट आती है तो उसका प्रभाव वहाँ के समाज पर अवश्य पड़ता है। जनसंख्या के आकार में परिवर्तन भी समाज में अनेक परिवर्तनों को जन्म देता है। यदि किसी देश की जनसंख्या का आकार बड़ा होगा तो उस देश में ऐसे रीति-रिवाज विकसित हो जाएँगे जिनके द्वारा बढ़ती हुई जनसंख्या को कम किया जा सके। भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम इसी दृष्टिकोण से विकसित कार्यक्रम है। इसके विपरीत, यदि किसी देश की जनसंख्या का आकार यकायक गिर जाता है तो उस देश के रीति-रिवाजों में भी परिवर्तन होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद रूस एवं जर्मनी में जनसंख्या अधिक मात्रा में समाप्त होने के कारण वहाँ ऐसी संस्थाओं एवं परम्पराओं का विकास हुआ जोकि अधिक बच्चे पैदा करने पर बल देती थीं। रूस उस माँ को राष्ट्रीय पुरस्कार देता रहा है जिसके नौ या अधिक बच्चे हों। ये सभी बातें जनसंख्या से सम्बन्धित है सामाजिक परिवर्तन का आधार हैं। जनसंख्या में स्त्री पुरुष अनुपात भी सामाजिक परिवर्तन का कारक हो सकता है। यदि स्त्रियों की जनसंख्या पुरुषों की अपेक्षा अधिक हो जाती है अथवा इसके विपरीत हो जाती है तो विवाह इत्यादि की संस्था पर इसका अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

प्रौद्योगिकीय कारक
एक समय था जब मनुष्य भोजन को एकत्र किया करता था। उत्पादन से उसका परिचय ही नहीं था। कृषि युग में आते-आते वह उत्पादन तो करने लगा, किन्तु वह उत्पादन केवल उपभोग के लिए ही होता था। आज प्रौद्योगिकी के विकास का युग है। हर क्षेत्र में नई प्रौद्योगिकी का विकास हुआ है। इसने हमारे जीवन को तीव्र गति से बदला है। हमारे मूल्यों को इसने प्रभावित किया है। आज खेतों में काम करने के लिए ट्रैक्टर, यातायात एवं आवागमन के लिए बस एवं मोटर, रेलगाड़ी तथा हवाई जहाज, अपनी बात दूसरों तक पहुँचाने के लिए टेलीफोन, तार, रेडियो, समाचारपत्र तथा पत्रिकाएँ आदि, दुश्मन से रक्षा करने एवं दुश्मन की सेनाओं का संहार करने के लिए टैंक इत्यादि, औषधि एवं उपचार के रूप में पैन्सिलीन तथा क्लोरोफॉर्म की खोज, हृदय परिवर्तन तथा फेफड़ों का बदलना एवं उनका सफल ऑपरेशन करना आदि से मानव समाज में होने वाले परिवर्तन की गति गम्भीर रूप से प्रभावित होने लगी है। आज हम कानपुर के आलू मुम्बई के बाजार में बेच सकते हैं। मेरठ, मुजफ्फरनगर और बिजनौर का गुड़ पूरे भारत में निर्यात किया जाता है। शीतालयों (Cold storages) के बनने से अब हम फल एवं सब्जी काफी समय तक उनमें रख सकते हैं और अन्य देशों से बिना मौसम के भी फलों (जैसे-ऑस्ट्रेलिया के सन्तरे एवं सेब, चीन की नाशपाती आदि) को प्राप्त किया जा सकता है। नसबन्दी ऑपरेशन ने समाज के विचारों को प्रभावित किया है। ट्रैक्टर ने हमारे कृषि उत्पादन को दुगना कर दिया है। नवीन प्रौद्योगिकी से हमारे जीवन में नित्य परिवर्तन होते रहते हैं। वेब्लन ने सामाजिक परिवर्तन लाने में प्रौद्योगिकीय कारकों को निर्णायक माना है।

आर्थिक कारक
जैसे-जैसे आर्थिक जगत में विकास होता है और नई आर्थिक व्यवस्था का प्रादुर्भाव होता है वैसे-वैसे समाज में अनेक परिवर्तन हुआ करते हैं। मार्क्स तो आर्थिक कारक को समाज में परिवर्तन का केन्द्रीय कारक मानते हैं। इनके अनुसार आर्थिक ढाँचे में परिवर्तन से पूरे समाज में परिवर्तन होते हैं। आज समाज में आर्थिक क्रियाएँ इतना महत्त्वपूर्ण स्थान पाती जा रही हैं कि हमारी सामाजिक क्रियाएँ उनके चारों ओर घूमती हुई दृष्टिगोचर होती हैं। हमारी हर क्रिया के पीछे आर्थिक स्वार्थ निहित रहता है। आज यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में कोई परिवर्तन होता है तो अन्य स्थितियाँ स्वयं बदल जाती हैं। इस विवेचन से हम कह सकते हैं कि समाज की आर्थिक क्रियाओं में होने वाला परिवर्तन पूरे समाज में ही परिवर्तन ले आता है।

सांस्कृतिक कारक
सामाजिक परिवर्तन लाने में संस्कृति का भी महत्त्वपूर्ण हाथ है। संस्कृति समाज की ही उपज है और समाज से घुली-मिली धारणा है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों में इतना अधिक सम्बन्ध है कि कुछ समाजशास्त्रियों ने सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों में अन्तर ही नहीं किया है। ऑगबर्न ने सांस्कृतिक परिवर्तन और उनसे होने वाले सामाजिक परिवर्तन को समझाने के लिए 'सांस्कृतिक विलम्बना' के सिद्धान्त को हमारे सम्मुख रखा है। वास्तव में, बिना सांस्कृतिक मूल्यों के हम सामाजिक परिवर्तन का मूल्यांकन नहीं कर सकते। हमारी भौतिक संस्कृति के तत्त्व रेडियो, हथौड़ा, चश्मा इत्यादि तथा अभौतिक संस्कृति के तत्त्व विचार, मनोधारणाएँ, नैतिक आदर्श तथा सदाचार इत्यादि में परिवर्तन होते ही हमारे सामाजिक सम्बन्धों में तीव्र गति से परिवर्तन होने लगता है। भारतीय संस्कृति परम्परा प्रधान है। यही कारण है कि इसमें तुलनात्मक रूप से कम परिवर्तन होते हैं तथा खुली वर्ग व्यवस्था पर आधारित यूरोप की संस्कृति अधिक परिवर्तनशील है। अत: संस्कृति के विभिन्न भागों में परिवर्तन एवं सामाजिक परिवर्तन में एक सीधा सम्बन्ध पाया जाता है। वेबर एवं सोरोकिन ने भी सामाजिक परिवर्तन में सांस्कृतिक कारकों को महत्त्वपूर्ण माना है।

राजनीतिक कारक
सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध राजनीतिक जगत की क्रियाओं से भी है। उत्तर प्रदेश राज्य को दो या चार भागों में बाँटने की माँग करना, भाषा के आधार पर सूबे की माँग करना, अनशन करना एवं धरना देना, विभिन्न प्रकार की अनुचित माँगों (जैसे 'सिक्ख राज्य', 'गोरखा राज्य' या 'तेलंगाना राज्य' की स्थापना) को लेकर आन्दोलन करना इत्यादि राजनीतिक क्रियाएँ हैं। इनके कारण समाज में अत्यधिक परिवर्तन होता है। राज्य एक राजनीतिक उद्देश्य से संगठित समुदाय है। उसके पास शक्तिशाली सरकार है जोकि सामाजिक नीतियों के निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाती है। वह बहुत-से परिवर्तन बलपूर्वक कर सकता है। उस का निर्णय सभी को मान्य होता है। अत: सामाजिक परिवर्तन के पीछे राजनीतिक हलचलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था अथवा इसमें यकायक परिवर्तन उस देश के निवासियों के परस्पर सम्बन्धों को प्रभावित करते हैं।

मनोवैज्ञानिक कारक
मनोवैज्ञानिक कारक प्रत्येक कार्य में उपस्थित रहते हैं। वस्तुत: सामाजिक सम्बन्ध, मानसिक सम्बन्ध ही होते हैं। हमारी समस्त क्रियाओं का उत्पत्ति-स्थल मस्तिष्क ही है। अत: क्रियाओं में परिवर्तन होने का तात्पर्य है, मस्तिष्क में परिवर्तन अर्थात् हमारे मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण में परिवर्तन। हमारे सोचने-विचारने के ढंग पहले बदलते हैं, उनके बाद ही हमारे व्यवहार में परिवर्तन होता है। भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त हमारी कुछ मानसिक आवश्यकताएँ भी होती हैं। आवश्यक नहीं कि यदि हम भौतिक एवं सामाजिक रूप से सन्तुष्ट हों तो मानसिक रूप से भी सन्तुष्ट होंगे। अमेरिका एवं अनेक जन समाजों में आज नवयुवक सारी भौतिक सुख-सुविधाओं के होते हुए भी मानसिक नैराश्य (Mental frustration) का शिकार होता है। वास्तव में कोई भी भौतिक तत्त्व तब तक सफल या उपयोगी नहीं होता जब तक कि हम उसे मन एवं मस्तिष्क से स्वीकार न कर लें। यह स्वीकार करने की प्रक्रिया एक मानसिक प्रक्रिया है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के लिए हमारे मस्तिष्क में परिवर्तन काफी हद तक जिम्मेदार है।

संघर्ष
सामाजिक परिवर्तन में संघर्ष की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। प्रत्येक समाज में सहयोग तथा संघर्ष दोनों पाए जाते हैं। जहाँ सहयोग जीवन या व्यवस्था में एकरूपता, मतैक्य, एकीकरण एवं संगठन का विकास करता है, वहीं दूसरी ओर संघर्ष, दमन, विरोध व हिंसा की उत्पत्ति करता है। आज सामाजिक जीवन में सामान्य सहमति न होकर असहमति, प्रतिस्पर्धा तथा स्वार्थों में संघर्ष की प्रधानता होती जा रही है।
कोजर (Coser) के शब्दों में, "स्थिति, शक्ति और सीमित साधनों के मूल्यों और अधिकारों के लिए होने वाले द्वन्द्व को संघर्ष कहा जाता है जिसमें संघर्षरत समूहों का उद्देश्य न केवल मूल्यों को प्राप्त करना है बल्कि अपने प्रतिद्वन्द्वियों को प्रभावहीन करना, हानि पहुँचाना अथवा समाप्त करना भी है।” सामाजिक परिवर्तन में संघर्ष की भूमिका को सर्वाधिक महत्त्व देने वाले विद्वान् मार्क्स (Marx) हैं। इसके अतिरिक्त कोजर (Coser), सिमेल (Simmel) तथा डेहरेन्डोर्फ (Dahrendorf) इत्यादि विद्वानों ने इस सन्दर्भ में अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। मार्क्स ने परिवर्तन को प्रत्येक समाज में पाए जाने वाले परस्पर विरोधी हित समूहों के संघर्ष के आधार पर समझाने का प्रयास किया है। इन्होंने वर्ग संघर्ष का आधार उत्पादन के साधन बताया है तथा सभी समाजों के इतिहास को वर्ग संघर्ष का इतिहास कहा है। संघर्ष में दमन, विरोध या हिंसा की ही उत्पत्ति नहीं होती अपितु कोजर का कहना है कि संघर्ष कुछ मात्रा में आवश्यक रूप से अकार्यात्मक (Dysfunctional) होने की अपेक्षा समूह के निर्माण तथा सामूहिक जीवन की निरन्तरता के लिए एक आवश्यक तत्त्व भी है। उदाहरण के लिए किसी बाह्य समूह या समाज में संघर्ष अपने समूह की आन्तरिक एकता को अधिक दृढ़ करता है तथा नवीन मित्रों तथा सहयोगियों की खोज के लिए अवसर प्रदान करता है। अतः कहा जा सकता है कि संघर्ष सामाजिक परिवर्तन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सामाजिक बनाम सांस्कृतिक परिवर्तन

सांस्कृतिक परिवर्तन समाज के आदर्शों और मूल्यों की व्यवस्था में होने वाला परिवर्तन है। रूथ बेनेडिक्ट (Ruth Benedict) ने संस्कृति के प्रतिमानों की चर्चा करते हुए स्पष्ट लिखा है कि उनमें परिवर्तन सदैव होते रहते हैं। उन्हीं के शब्दों में, “हमें याद रखना चाहिए कि परिवर्तन से, चाहे उसमें कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, बचा नहीं जा सकता।” परन्तु सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक परिवर्तन के अर्थ एवं अन्तर के विषय में विद्वानों के बीच तीव्र मतभेद दिखाई देता है। अत: यह उचित होगा कि सांस्कृतिक परिवर्तन के अर्थ एवं उसकी विशेषताओं को स्पष्ट कर दिया जाये ताकि इसमें तथा सामाजिक परिवर्तन में अन्तर स्पष्ट हो सके।
सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन को कुछ लोग एक समान अर्थ में प्रयुक्त करते हैं। इससे कभी-कभी यह भ्रम पैदा हो जाता है कि क्या सामाजिक परिवर्तन एवं सांस्कृतिक परिवर्तन एक ही अवधारणा के दो नाम हैं। इस भ्रम का प्रमुख कारण समाज एवं संस्कृति की अवधारणा को स्पष्ट रूप से एक-दूसरे से अलग न कर पाना है। कुछ विद्वान् इसी त्रुटि के शिकार हुए हैं। सामाजिक परिवर्तन एवं सांस्कृतिक परिवर्तन के विषय में जो भ्रान्ति पैदा होती है उसका कारण विद्वानों में दोनों के अर्थ के बारे में पाया जाने वाला मतभेद है।

मैरिल एवं एल्ड्रिज की परिभाषा (Definition of Merrill and Eldredge) सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा करते हुए मैरिल एवं एल्ड्रिज ने कहा है कि सामाजिक परिवर्तन मनुष्यों के कार्यों अथवा उनके व्यवहारों में परिवर्तन है। दूसरी ओर, मानव के कार्यों को हर्षकोविट्स (Herskovits) ने अपनी पुस्तक न एण्ड हिज वर्क्स (Man and His Works) में 'संस्कृति' कहा है। अत: मानव क्रियाओं में परिवर्तन का अर्थ हुआ सांस्कृतिक परिवर्तन। दोनों परिभाषाएँ यदि एक साथ सामने रखी जाएँ तो निश्चित भ्रम उत्पन्न होगा।

गिलिन एवं गिलिन की परिभाषा (Definition of Gillin and Gillin)
गिलिन एवं गिलिन ने परिवर्तन की परिभाषा करते हुए कहा है कि सामाजिक परिवर्तन जीवन की स्वीकृत पद्धतियों में परिवर्तन है। यहाँ कठिनाई यह है कि सम्पूर्ण जीवन पद्धति को मैलिनोव्स्की (Malinowski) इत्यादि सामाजिक मानवशास्त्री 'संस्कृति' कहकर पुकारते हैं। अत: गिलिन तथा गिलिन स्वीकृत जीवन पद्धति में कालान्तर में उत्पन्न भिन्नता को सामाजिक परिवर्तन की संज्ञा देते हैं। उसे निश्चित रूप से सांस्कृतिक परिवर्तन भी कहा जा सकता है।

डासन एवं गेटिस की परिभाषा (Definition of Dawson and Gettys)
सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में भ्रम का एक और आधार है प्रसिद्ध विद्वान् डासन एवं गेटिस की परिभाषा। उनके अनुसार, "सांस्कृतिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन ही है, क्योंकि संस्कृति अपनी उत्पत्ति, अर्थ एवं प्रयोग में सामाजिक ही होती है।" इस परिभाषा के दो अर्थ हो सकते हैं—प्रथम, यह कि सांस्कृतिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन के अन्तर्गत ही आ जाता है और उसका कोई अलग अस्तित्व नहीं है और द्वितीय, यह कि सांस्कृतिक परिवर्तन एवं सामाजिक परिवर्तन दोनों एक-दूसरे के समानार्थक अर्थात् पर्यायवाची (Synonyms) हैं और एक के स्थान पर दूसरे का प्रयोग भली प्रकार से किया जा सकता है। दोनों में कोई भी अन्तर नहीं है। अब यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है कि उपर्युक्त भ्रम को कैसे दूर किया जा सकता है? यह भ्रम तभी दूर हो सकता है जब सांस्कृतिक परिवर्तन को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए और फिर सामाजिक परिवर्तन एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में अन्तर स्पष्ट किया जाए। आज क्योंकि 'समाज' एवं 'संस्कृति' दोनों शब्दों का प्रयोग विशिष्ट एवं भिन्न अर्थों में किया जाता है। इसलिए इन दोनों प्रकार के परिवर्तनों को अलग-अलग परिभाषित किया जाता है।

डेविस (Davis) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन वास्तव में सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं है अपितु इसका एक अंग है। सांस्कृतिक परिवर्तन के अन्तर्गत संस्कृति की किसी भी शाखा, जैसे कला, विज्ञान, दर्शन तथा तकनीकी में परिवर्तन को सम्मिलित किया जा सकता है।" सांस्कृतिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन की अपेक्षा अधिक व्यापक है। भौतिक संस्कृति में परिवर्तन यद्यपि सामाजिक परिवर्तन ला सकता है परन्तु वह स्वयं सामाजिक परिवर्तन नहीं है।

फेयरचाइल्ड (Fairchild) सांस्कृतिक परिवर्तन की परिभाषा करते हुए लिखते हैं कि सांस्कृतिक परिर्वतन, “एक समाज की सभ्यता में संशोधन है अर्थात् समाज के उस पर्यावरण में संशोधन है जो मनुष्य द्वारा निर्मित है, चाहे वह संशोधन अपने आप हुआ हो और चाहे योजनाबद्ध तरीके से किया गया हो।” परन्तु यदि हम ध्यान से देखें तो यह परिभाषा संस्कृति और सभ्यता के बीच विभाजन रेखा को मिटा देती है और दोनों को समान अर्थों में प्रयोग करती है जो आज के समाजशास्त्रियों को मान्य नहीं है।

एल्फ्रेड एम० ली (Alfred M. Lee) ने सांस्कृतिक परिवर्तन को बड़े सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है। इनके अनुसार, “संस्कृति उन वस्तुओं और व्यवहारों की एक वह समन्वित व्यवस्था है जो मनुष्य के स्थायी भावों, मनोवृत्तियों एवं दर्शनों को अभिव्यक्त करती है। परिणामतः कोई भी आविष्कार या किसी नए पद का उसमें प्रवेश देर-सवेर सारी व्यवस्था में किसी न किसी संशोधन या पुनर्गठन के रूप में असर डालता है। ऐसे परिवर्तन प्रायः न तो नियोजित होते हैं और न ही पूर्व अनुमानित।" इन परिवर्तनों को ही सांस्कृतिक परिवर्तन कहा जाता है।

उपर्युक्त विवेचन से सांस्कृतिक परिवर्तन की निम्नांकित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-

संस्कृति से सम्बन्धित
सांस्कृतिक परिवर्तन का सम्बन्ध केवल मात्र समाज की संरचना एवं प्रकार्यों तक ही सीमित नहीं है, अपितु संस्कृति के किसी अंग (यथा कला, भाषा, विज्ञान, विश्वास, आचार, रूढ़ियाँ, प्रौद्योगिकी, प्रतीक, दर्शन इत्यादि) में होने वाले परिवर्तन को सांस्कृतिक परिवर्तन कहा जाता है। अत: यह संस्कृति से सम्बन्धित है।

जटिल प्रकृति
संस्कृति एक अत्यन्त विस्तृत एवं जटिल सम्पूर्ण है जिसमें असंख्य तत्त्व होते हैं। इसे भौतिक एवं अभौतिक दो भागों में बाँटा जा सकता है। अतः सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रकृति अपेक्षाकृत जटिल है।

विस्तृत क्षेत्र
सांस्कृतिक परिवर्तन एक विस्तृत अवधारणा है अर्थात् इसका क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। इसका अनुमान हम इसी बात से लगा सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन स्वयं सांस्कृतिक परिवर्तन का एक अंग है।

सार्वभौमिकता
सांस्कृतिक परिवर्तन सार्वभौमिक है अर्थात् यह प्रत्येक समाज में न्यूनाधिक गति में पाया जाता है। कुछ समाजों में अभौतिक संस्कृति का पक्ष बहुत ही कम परिवर्तित हुआ है, जबकि भौतिक पक्ष में परिवर्तन से अप्रत्यक्ष रूप से अभौतिक पक्ष भी प्रभावित हो रहा है।

असमान गति
सांस्कृतिक परिवर्तन की गति सभी समाजों में एक समान नहीं है। पश्चिमी समाजों में भौतिक संस्कृति में अत्यधिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप वहाँ की अभौतिक संस्कृति अर्थात् व्यक्तियों का रहन सहन, परम्पराएँ, मूल्य व विश्वास आदि में तीव्रता से परिवर्तन हुए हैं। भारतीय समाज में यद्यपि भौतिक संस्कृति में तीव्रता से परिवर्तन हुए हैं तथापि अभौतिक संस्कृति में अपेक्षाकृत कम परिवर्तन हुए हैं। सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में अन्तर करना एक कठिन कार्य है। फिर भी, दोनों प्रकार के परिवर्तन एक ही नहीं हैं।
इन दोनों में पाए जाने वाले अन्तरों को निम्नलिखित आधारों पर स्पष्ट किया जा सकता है-

1. सामाजिक एवं सांस्कृतिक जगत में होने वाले परिवर्तनों की गति के आधार पर
सामाजिक परिवर्तन एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में अन्तर करने का एक दृष्टिकोण इन दोनों की गति में अन्तर देखना है। सामाजिक परिवर्तन अधिक गतिशील है अर्थात् इसमें अधिक तीव्रता से परिवर्तन होता है, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन कम गतिशील है । अर्थात् इसमें बहुत कम अथवा धीमी गति से परिवर्तन होता है। इसीलिए सामाजिक सम्बन्धों में जिस तीव्रता से परिवर्तन होता है वैसा परिवर्तन प्रायः हमारी संस्कृति के अंगों जैसे कला, धर्म, दर्शन तथा रूढ़ियों में दिखाई नहीं देता।

2. समाज एवं संस्कृति की अवधारणाओं की विस्तृतता के आधार पर
यदि हम यह जान लें कि समाज एवं संस्कृति दोनों में से कौन सी अवधारणा अधिक विस्तृत है तो हम सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में स्पष्ट अन्तर कर सकेंगे। किंग्सले डेविस (Kingsley Davis) ने इन दोनों अवधारणाओं में इसी आधार पर अन्तर स्थापित किया है। डेविस के अनुसार सामाजिक परिवर्तन से हमारा तात्पर्य केवल उन्हीं परिवर्तनों से है जो किसामाजिक संगठन अर्थात् सामाजिक संरचना एवं प्रकार्यों में होते हैं, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन न केवल समाज की संरचना एवं प्रकार्यों तक ही सीमित हैं बल्कि संस्कृति के किसी भी अंग जैसे कला, विज्ञान, ज्ञान, विश्वास, आचार, रूढ़ियों, प्रौद्योगिकी, दर्शन विचार के माध्यमों तथा इसी प्रकार के अन्य असंख्य सांस्कृतिक तत्त्वों में होने वाले परिवर्तनों को कहा जाता है।
दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि संस्कृति एक बहुत ही विस्तृत एवं जटिल सम्पूर्ण (Complex whole) है जिसमें असंख्य तत्त्व आते हैं। इस प्रकार, सामाजिक संगठन में होने वाले परिवर्तन भी सांस्कृतिक परिवर्तनों के अन्तर्गत आ जाते हैं। अतः हम यह कह सकते हैं कि सांस्कृतिक परिवर्तन की अवधारणा सामाजिक परिवर्तन से अधिक विस्तृत है। सामाजिक परिवर्तन तो सांस्कृतिक परिवर्तन का एक अंग मात्र है। डेविस के शब्दों में, “सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक परिवर्तन का, जो निश्चित रूप से एक बड़ी अवधारणा है, एक भाग मात्र है। बाद वाली अवधारणा अर्थात् सांस्कृतिक परिवर्तन, संस्कृति के किसी भी भाग जिसमें हम कला, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, दर्शन इत्यादि को सम्मिलित करते हैं में होने वाले सभी परिवर्तनों का आलिंगन करती है तथा साथ ही-साथ सामाजिक संगठन के नियमों एवं स्वरूपों के परिवर्तन भी इसमें सम्मिलित हैं।"

डेविस यद्यपि यह स्वीकार करता है कि, “संस्कृति का कोई भी भाग सामाजिक संरचना से पूर्णत: सम्बन्धित नहीं है फिर भी यह एक वास्तविकता है कि सामाजिक व्यवस्था को बिना उल्लेखनीय रूप से प्रभावित किए हुए ही संस्कृति में अनेक परिवर्तन हो सकते हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टि से, सांस्कृतिक परिवर्तन में हमारी रुचि केवल वहीं तक है जहाँ तक यह सामाजिक संगठन में पैदा होता है तथा उसे प्रभावित करता है। सामाजिक परिवर्तन से बिलकुल अलग रूप में हमारी इसमें कोई रुचि नहीं है।'

इस प्रकार, यह सत्य होते हुए भी कि समाज एवं संस्कृति दोनों परस्पर सम्बन्धित हैं और एक दूसरे पर निर्भर हैं, यह मानना ही पड़ेगा कि अध्ययन के लिए दोनों अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से अलग किया जा सकता है और दोनों अवधारणाओं में संस्कृति की अवधारणा अधिक व्यापक एवं बड़ी है। अत: सांस्कृतिक परिवर्तन बड़ा है और सामाजिक परिवर्तन छोटा। वास्तव में, सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक परिवर्तन का ही एक भाग है।

3. समाज एवं संस्कृति की प्रकृति के आधार पर
समाज एवं संस्कृति दो अलग-अलग वस्तुएँ हैं। मैकाइवर एवं पेज ने भी सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन को भिन्न-भिन्न बताया है। उनके अनुसार, “समाज वर्तमान सम्बन्धों का बदलता हुआ सन्तुलन है।" यह एक प्रक्रिया है, उत्पत्ति नहीं है, तथा कालक्रम है। समाज में जैसे ही कोई परिर्वतन आता है वैसे ही सामाजिक सम्बन्ध बदल जाते हैं और उनके स्थान पर नए आ जाते हैं। किन्तु संस्कृति के बारे में यह बात लागू नहीं होती। संस्कृति एक उत्पत्ति है, जो कि उस या उन शक्तियों के समाप्त हो जाने के बाद भी बनी रहती है जिन्होंने उसे जन्म दिया था किन्तु अब मौजूद नहीं हैं। सामाजिक सम्बन्धों की कल्पना नहीं की जा सकती। सांस्कृतिक वस्तुओं को हम किसी संग्रहालय में रख सकते हैं किन्तु सामाजिक सम्बन्धों को हम संग्रहालय में नहीं रख सकते। समाज की एक प्रमुख विशेषता अमूर्तता है किन्तु सांस्कृतिक तत्त्वों को हम भौतिक व मूर्त रूप दे सकते हैं। एक सामाजिक संस्था तब तक ही बनी रह सकती है जब तक कि उसके मानने वाले जीवित रहें, किन्तु यदि लोग किसी प्रथा या परम्परा को मानना ही छोड़ दें तो उसका अस्तित्व ही क्या हो सकता है। इस प्रकार, सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक अथवा सभ्यता सम्बन्धी परिवर्तन से स्पष्ट रूप से भिन्न है। एक वह परिर्वतन है जोकि कालक्रम अर्थात् प्रक्रिया में होता है तथा दूसरा वह है जो कि उत्पत्ति (Product) में होता है।
अतः सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में प्रमुख अन्तर निम्नांकित हैं-
  • सामाजिक परिवर्तन संरचना में होने वाले या सामाजिक संगठन में होने वाले परिवर्तन को कहते हैं, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन संस्कृति के विभिन्न अंगों में होने वाला परिवर्तन है।
  • सामाजिक परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत तीव्र है, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन (विशेषतः अभौतिक संस्कृति) की गति अपेक्षाकृत धीमी है।
  • सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन से सामाजिक परिवर्तन आता है, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन प्रसार तथा वैज्ञानिक आविष्कारों के द्वारा आता है।
  • सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक परिवर्तन का एक हिस्सा है। यह सांस्कृतिक परिवर्तन की अपेक्षा संकुचित है तथा इसलिए इसका नियोजन सरल है, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन क्योंकि अधिक व्यापक है इसलिए इसका नियोजन सम्भव नहीं है।
  • सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध व्यक्तियों से है, वस्तुओं से नहीं, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन का सम्बन्ध मानव द्वारा उत्पादित भौतिक तथा अभौतिक वस्तुओं से है।
  • सामाजिक परिवर्तन व्यक्ति के सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तनों तथा वस्तुओं के उत्पादकों के सम्बन्धों में परिवर्तन को बताता है, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन व्यक्ति-पदार्थ के सम्बन्धों तथा मानव द्वारा उत्पादित वस्तुओं में होने वाले परिवर्तनों को बताता है।
सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं क्योंकि सामाजिक परिवर्तन संस्कृति को प्रभावित करता है, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन का प्रभाव समाज पर पड़ता है।
साथ ही, दोनों प्रकार के परिवर्तनों के बीच अन्तर के अध्ययन से कुछ निष्कर्ष उभरते हैं—प्रथम, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में अन्तर से तात्पर्य यह नहीं है कि दोनों एक दूसरे के विलोम या विरोधी हैं। मैकाइवर तथा पेज ने उचित ही कहा है कि सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवर्तन साथ-साथ घटित होते हैं अर्थात् एक में परिवर्तन दूसरे में परिवर्तन को जन्म देता है। द्वितीय, दोनों ही परिवर्तन एक दूसरे के पूरक भी हैं। सांस्कृतिक परिवर्तन निर्देशक की भूमिका निभाता है और सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक परिवर्तनों में उपयुक्त संशोधन की आवश्यकता की ओर इशारा करता है। मैकाइवर एवं पेज के इस कथन से पूर्णतः सहमति व्यक्त की जा सकी है कि, “यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि समस्त सांस्कृतिक परिवर्तन में सामाजिक परिवर्तन होता है क्योंकि......सामाजिक और सांस्कृतिक तत्त्वों का घनिष्ठ अन्तर्सम्बन्ध है।"

शब्दावली

  • सामाजिक परिवर्तन - सामाजिक परिवर्तन से तात्पर्य सामाजिक संरचना (ढाँचे), प्रकार्यों एवं सामाजिक सम्बन्धों में होने वाला परिवर्तन है।
  • सांस्कृतिक परिवर्तन – सांस्कृतिक परिवर्तन के अन्तर्गत संस्कृति की किसी भी शाखा, जैसे कला, विज्ञान, दर्शन तथा तकनीकी में होने वाले परिवर्तन को सम्मिलित किया जा सकता है।

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