सामाजिक समूह - सामाजिक समूह क्या है, अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं | samajik samuh

प्रस्तावना

मनुष्य की जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक आवश्यकताएँ होती हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समूह में रहना आवश्यक है, क्योंकि इनकी पूर्ति मनुष्य स्वयं नहीं कर सकता। इसी कारण मनुष्य अनेक समूहों का सदस्य है। उदाहरण के लिए हम सभी अपने परिवार, क्रीड़ा समूह, मित्र-मण्डली, जाति तथा राष्ट्र के सदस्य हैं। इस सन्दर्भ में एडवर्ड सेपियर (Edward Sapir) का कथन है कि समूह का निर्माण इस तथ्य पर आधारित है कि कोई न कोई स्वार्थ उस समूह के सदस्यों को एक सूत्र में बाँधे रहता है। विभिन्न प्रकार के समूहों से ही समाज का निर्माण होता है। समिति से अभिप्राय किसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु बनाए गए ऐसे संगठन से है जिसके सदस्य सामूहिक रूप से पारस्परिक सहयोग द्वारा लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। समुदाय, समूह एवं समिति की प्रकृति मूर्त होती है। संस्था नियमों की व्यवस्था अथवा व्यवहार से सम्बन्धित कार्यप्रणाली के कारण अमूर्त होती है। एक समाज में अनेक समुदाय पाए जाते हैं, समुदाय में अनेक समूह एवं समितियाँ पाई जाती हैं जो समाज द्वारा मान्य तरीकों (जिन्हें हम संस्था कहते हैं) द्वारा अपने लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयास करते हैं अथवा जिनके सदस्यों का व्यवहार इन्हीं स्वीकृत तरीकों द्वारा नियन्त्रित होता है।

सामाजिक समूह किसे कहते हैं

हम सब समूहों में रहते हैं। परिवार, पड़ोस, क्रीड़ा समूह इत्यादि समूहों के ही उदाहरण हैं। इनका मानव व्यवहार को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। समाजशास्त्र मानव के सामाजिक जीवन का अध्ययन है। सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषता यह है कि मनुष्य परस्पर अन्तक्रिया करते हैं, संवाद करते हैं तथा सामाजिक सामूहिकता को निर्मित भी करते हैं। प्रत्येक समाज, चाहे उसका स्वरूप कैसा भी क्यों न हो, में मानवीय समूह और सामूहिकताएँ विद्यमान रहती हैं। इन समूहों एवं सामूहिकता के प्रकार अलग-अलग होते हैं।
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सामाजिक समूहों का समाजशास्त्रीय अध्ययन 20वीं शताब्दी में ही प्रारम्भ हुआ। इससे पहले अधिकांश विद्वान् समाज के उद्भव एवं विकास को समझने में ही लगे हुए थे। औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप सामाजिक समूहों के सदस्यों में पाए जाने वाले सम्बन्धों में तीव्र गति से परिवर्तन हुए जिसे समझने के प्रयास किए जाने लगे। टॉनीज, दुर्खीम, मार्क्स इत्यादि विद्वानों ने इस ओर विशेष ध्यान दिया। अधिकांश समूहों की एक निश्चित संरचना होती है। परिवर्तन की प्रक्रियाएँ समूहों की संरचना को भी प्रभावित करती हैं। प्रस्तुत अध्याय में सामाजिक समूह की अवधारणा को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

सामाजिक समूह का अर्थ एवं परिभाषाएँ

सामान्य अर्थों में समूह का अर्थ व्यक्तियों के संग्रह या समुच्चय से लगा लिया जाता है। संग्रह या समुच्चय केवल लोगों का जमावाड़ा होता है जो एक समय में एक ही स्थान पर होते हैं लेकिन एक-दूसरे से कोई निश्चित सम्बन्ध नहीं रखते। उदाहरणार्थ-हम खेल के मैदान, जलसे, बाजार, सिनेमा घर, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे अथवा बस स्टॉप पर व्यक्तियों की भीड़ को देखते हैं, लेकिन उन्हें समूह की संज्ञा नहीं दी जा सकती। इसका कारण यह है कि उन व्यक्तियों में सामाजिक सम्बन्धों व चेतना का अभाव होता है। पारस्परिक चेतना व सामाजिक सम्बन्ध अन्योन्याश्रित हैं। चेतना के अभाव में परस्पर सम्बन्ध स्थापित नहीं होते। इन्हें अर्द्ध-समूह तो कहा जा सकता है, परन्तु सामाजिक समूह नहीं। अर्द्ध-समूहों में संरचना अथवा संगठन की कमी होती है तथा सदस्य समूह के अस्तित्व के प्रति अनभिज्ञ होते हैं। सामाजिक वर्गों, प्रस्थिति समूहों, आयु एवं लिंग समूहों, भीड़ इत्यादि को अर्द्ध-समूह के उदाहरणों के रूप में देखा जा सकता है।
समूह के निर्माण हेतु अन्तक्रिया (Interaction) तथा संचार (Communication) का होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए बाजार में सामान्य दृष्टिकोण के व्यक्तियों के संग्रह को समूह नहीं कहा जा सकता है। किन्तु यदि किसी कारण से (चाहे पॉकेटमार के पकड़ने से या अन्य किसी कारण से) ये संगृहीत लोग आपस में अन्तक्रिया करते हैं तो उनमें सामाजिक सम्बन्धों का जन्म होता है। तब उस समय वह संग्रह समूह में परिवर्तित हो जाएगा चाहे उसकी प्रकृति अस्थायी ही क्यों न हो। इसी भाँति, महिला आन्दोलन ने महिलाओं को एक सामूहिक निकाय के रूप में संगठित कर इन्हें सामाजिक समूह के रूप में परिवर्तित किया है। इन आन्दोलनों ने महिलाओं को अपनी पहचान एक सामूहिकता और समूह के रूप में विकसित करने में सहायता दी है। एक सामाजिक वर्ग, जाति अथवा समुदाय से सम्बन्धित व्यक्ति एक सामूहिक निकाय के रूप में संगठित होकर जब दीर्घकालीन अन्तक्रियाएँ करने लगते हैं तथा उनमें अपनत्व की भावना विकसित होने लगती है, तो वे समूह का रूप धारण कर लेते हैं।
इसी भाँति, आयु के आधार पर निर्मित समूह को सामाजिक समूह नहीं कहा जाता है। यह भी अर्द्ध-समूह का उदाहरण है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी माँग को लेकर किशोर आयु समूह संगठित हो जाए। यदि शिक्षा संस्थाओं में किसी माँग को लेकर अथवा समाज में किसी महत्त्वपूर्ण भूमिका को लेकर इस प्रकार का समूह अपने सदस्यों में आपसी पहचान एवं अपनत्व की भावना का विकास कर लेता है, सदस्यों में दीर्घ एवं स्थायी अन्तक्रिया प्रारम्भ हो जाती है तथा उनमें अन्तक्रिया के प्रतिमान स्थिर होने लगते हैं तो आयु के आधार पर बना किशोर समूह एक सामाजिक समूह का रूप धारण कर लेता है।
एक सामाजिक समूह में कम-से-कम निम्न लक्षण होना अनिवार्य है-
  • निरन्तरता के लिए दीर्घ एवं स्थायी अन्तक्रिया,
  • इन अन्तक्रियाओं का स्थिर प्रतिमान,
  • समूह एवं उसके नियमों, अनुष्ठानों एवं प्रतीकों के प्रति जागरूकता,
  • सामान्य रुचि,
  • सामान्य आदर्शों एवं मूल्यों को अपनाना, तथा
  • एक निश्चित संगठन या संरचना का होना।
बॉटोमोर (Bottomore) के अनुसार, “सामाजिक समूह व्यक्तियों के उस योग को कहते हैं जिसमें विभिन्न व्यक्तियों के बीच निश्चित सम्बन्ध होते हैं और प्रत्येक व्यक्ति समूह के प्रति और उसके प्रतीकों के प्रति सचेत होता है। दूसरे शब्दों में, एक सामाजिक समूह में कम से कम अल्पविकसित संरचना और संगठन (नियमों और संस्कारों सहित) तथा उसके सदस्यों में चेतना का एक मनोवैज्ञानिक आधार होता है।'' मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार, “समूह से हमारा तात्पर्य ऐसे व्यक्तियों के संग्रह से है जो एक-दूसरे के साथ सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं।” बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार, “एक सामाजिक समूह का अर्थ हम दो या अधिक व्यक्तियों के ऐसे संग्रह से लगा सकते हैं जिनके ध्यान के कुछ सामान्य लक्ष्य होते हैं, जो एक-दूसरे को प्रेरणा देते हैं, जिनमें सामान्य वफादारी पाई जाती है और जो समान क्रियाओं में भाग लेते हैं।" ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार, “जब कभी दो या दो से अधिक व्यक्ति एकत्र होकर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं तो वे एक सामाजिक समूह का निर्माण करते हैं।' इसी भाँति, गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “सामाजिक समूहों के विकास हेतु एक ऐसी अनिवार्य स्थिति होती है, जिसमें सम्बन्धित व्यक्तियों में अर्थपूर्ण अन्तः उत्तेजना और अर्थपूर्ण प्रत्युत्तर सम्भव हो सके एवं जिसमें उन सबका सामान्य उत्तेजकों अथवा हितों पर ध्यान टिका रहे और सामान्य चालकों, प्रेरकों व संवेगों का विकास हो सके।”
सामाजिक समूह की विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि सामाजिक समूह हेतु दो या दो से अधिक व्यक्तियों में अन्तक्रिया एवं सामाजिक सम्बन्धों को होना अनिवार्य है। वस्तुतः समूह के चार तत्त्व होते हैं—प्रथम, दो या दो से अधिक व्यक्तियों का संग्रह, द्वितीय, उनमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्धों एवं अन्तक्रियाओं का होना, तृतीय, उनकी अन्तक्रियाओं का आधार सामान्य हित या उद्देश्य का होना तथा चतुर्थ, एक निश्चित संगठन या संरचना का होना। उपर्युक्त विवेचन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक समूह केवल व्यक्तियों का संग्रह मात्र ही नहीं है। इन व्यक्तियों के मध्य पारस्परिक सम्बन्धों का होना अत्यावश्यक है। अत: कहा जा सकता है कि जिस समय दो या दो से अधिक व्यक्ति कतिपय सामान्य उद्देश्यों अथवा लाभों की पूर्ति हेतु परस्पर सम्बन्धों की स्थापना करते हैं और अपने व्यवहार द्वारा एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, तो उसे सामाजिक समूह की संज्ञा दी जा सकती है। वास्तव में, यह उन लोगों का समुच्चय है जो आपस में किसी न किसी तरह की अन्तक्रिया करते हैं और इसलिए अपने आप को एक-दूसरे से जुड़े हुआ अनुभव करते हैं।

सामाजिक समूह की सामान्य विशेषताएँ

सामाजिक समूह की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

समूह व्यक्तियों का संग्रह है
समूह के लिए व्यक्तियों का होना आवश्यक है। यह आवश्यक नहीं है कि समूह के सदस्यों में शारीरिक निकटता ही हो, परन्तु उनके मध्य अन्तक्रिया का होना आवश्यक है। इसी अन्तक्रिया से सामाजिक सम्बन्धों का जन्म होता है।

समूह की अपनी सामाजिक संरचना होती है
प्रत्येक समूह की एक सामाजिक संरचना होती है। फिचर के अनुसार प्रत्येक समूह की अपनी सामाजिक संरचना होती है। उस संरचना में व्यक्तियों की प्रस्थिति निर्धारित होती है। प्रत्येक समूह में आयु, लिंग, जाति, व्यवसाय आदि के आधार पर सामाजिक स्तरीकरण पाया जाता है। प्रत्येक सदस्य को समूह में अपनी प्रस्थिति से सम्बन्धित भूमिका निभानी पड़ती है।

समूह में कार्यात्मक विभाजन होता है
समूह में संगठन बनाए रखने के लिए प्रत्येक सदस्य विविध कार्य करता है। उदाहरण के लिए शिक्षण संस्था में प्रत्येक शिक्षक अलग-अलग विषय को पढ़ाते हैं तथा ज्ञान देने के लक्ष्य को पूरा करते हैं। प्रधानाचार्य की अपनी अलग भूमिका होती है और लिपिक वर्ग के सदस्य उनके लिए निर्धारित कार्यों को निष्पादित करते हैं।

समूह में सामान्य स्वार्थों की भावना होती है
मनुष्य समूह का सदस्य इसलिए बनता है, क्योंकि उसके माध्यम से उसके स्वार्थों की पूर्ति होती है। सभी सदस्यों के स्वार्थ समान होते हैं। अतएव उनकी भावनाएँ भी एक-सी होती हैं। यदि सदस्यों के स्वार्थ या हित असमान होंगे तो ऐसी दशा में न सम्बन्धों में दृढ़ता रहेगी और न समूह में संगठन ही होगा।

समूह विशेष की सदस्यता ऐच्छिक होती है
परिवार जैसे समूह को छोड़कर अन्य सभी समूहों की सदस्यता ऐच्छिक होती है। यह व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि तथा लक्ष्यों की प्रकृति पर निर्भर करता है कि वह किस समूह का सदस्य बनेगा। अतः मनुष्य अपने जीवन काल में अनेक समूहों के सम्पर्क में आता है।

समूह की अपनी सत्ता होती है
समूह का आधार सामूहिक व्यवहार है। सामूहिक व्यवहार के अभाव में समूह का अस्तित्व सम्भव नहीं है। व्यक्ति समूह के समक्ष अपने अस्तित्व को बहुत गौण मानता है। समूह पर उसे पूरा विश्वास तथा श्रद्धा होती है। अत: वह समूह के नियम तोड़ने से डरता है। यह भावना समूह के अस्तित्व की रक्षा करती है। इसके साथ ही साथ, इससे समूह को स्थायित्व तथा संगठन प्राप्त होता है।

सामाजिक मानदण्ड समूह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं
समूह अपने अस्तित्व के लिए कुछ मानदण्डों या आदर्श-नियमों की स्थापना करता है। इनके द्वारा वह अपने सदस्यों के व्यवहार को नियन्त्रित करता है। इन्हीं मानदण्डों के कारण सदस्यों के व्यवहार में एकरूपता रहती है। यह आवश्यक नहीं है कि सभी समूहों के सामान्य मानदण्ड हों तथा वे सभी सदस्यों पर समान रूप से लागू हो।

समूह एक मूर्त संगठन है
सामाजिक समूह समान उद्देश्यों व लक्ष्यों वाले व्यक्तियों का संकलन है। क्योंकि यह व्यक्तियों का संकलन है अतएव यह मूर्त होता है।

सामाजिक समूहों का वर्गीकरण

समाजशास्त्रियों ने सामाजिक समूहों का वर्गीकरण भिन्न आधारों को सामने रखकर किया है। प्रमुख समाजशास्त्रियों ने समूहों का वर्गीकरण निम्नवर्णित प्रकार से किया है

1. मैकाइवर एवं पेज का वर्गीकरण
मैकाइवर एवं पेज ने समस्त सामाजिक समूहों को तीन वर्गों में विभाजित किया है। ये तीन वर्ग निम्नांकित हैं

क्षेत्रीय समूह
ये समूह वे हैं जो एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते हैं। उदाहरणार्थ-राष्ट्र, पड़ोस, गाँव, नगर, देश, जनजाति आदि क्षेत्रीय समूह हैं।

हितों के प्रति चेतन समूह जिसका निश्चित संगठन नहीं होता है
ये समूह अपने हितों के बारे में सचेत तो अवश्य हैं, लेकिन इनमें निश्चित संगठन की कमी होती है। इस प्रकार के समूह के सदस्यों में समान प्रवृत्ति पाई जाती है। एक समूह से दूसरे समूह में जाने की इच्छा व पद-प्रतिष्ठा की प्रवृत्ति भी इनमें पाई जाती है। इसका उदाहरण वर्ग, जाति, शरणार्थी समूह, समान तथा असमान रुचि वाली भीड़ है।

हितों के प्रति चेतन समूह जिसका निश्चित संगठन होता है
ये समूह अपने हितों के सम्बन्ध में सचेत होते हैं तथा संगठित भी होते हैं। इन समूहों की सदस्य संख्या सीमित होती है पर इनके उत्तरदायित्व असीमित होते हैं; उदाहरणार्थ-परिवार, पड़ोस, क्लब आदि। इस श्रेणी में कुछ समूह इस प्रकार के भी आते हैं जिनकी सदस्य संख्या तो अत्यधिक होती है परन्तु संगठन में औपचारिकता होती है; उदाहरणार्थ-राज्य, चर्च, श्रमिक संघ आदि।

2. समनर का वर्गीकरण
समनर ने समूह के सदस्यों में घनिष्ठता व सामाजिक दूरी के आधार पर समस्त समूहों को निम्नलिखित दो प्रकारों में वर्गीकृत किया है

अन्तःसमूह
जिन समूहों के साथ कोई व्यक्ति पूर्ण एकात्मकता या तादात्म्य स्थापित करता है उन्हें उसका अन्त:समूह कहा जाता है। अन्त:समूह के सदस्यों के मध्य अपनत्व की भावना पाई जाती है। वे अन्त:समूह के सुख को अपना सुख तथा दु:ख को अपना दुःख मानते हैं। समूह का अस्तित्व सदस्य स्वयं का अस्तित्व मान लेते हैं। दूसरे शब्दों में इस प्रकार के समूह में 'हम की भावना' (We feeling) पाई जाती है। प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे से भावात्मक सम्बन्धों द्वारा बँधा होता है। प्रेम, स्नेह, त्याग और सहानुभूति का भाव स्पष्ट रूप से सदस्यों के मध्य दृष्टिगोचर होता है। अधिकांश व्यक्तियों के लिए परिवार अन्तःसमूह का एक चिरपरिचित उदाहरण है। अपना गाँव, जाति, धार्मिक सम्प्रदाय, राष्ट्र आदि अन्त:समूह के अन्य उदाहरण हैं। प्रत्येक व्यक्ति का राष्ट्र उसका अन्त:समूह है। वह अपने देश की प्रशंसा उसकी प्रगति से प्रारम्भ करता है। इसके विपरीत देश की अवनति या बुराई से उसे दुःख होता है। ठीक इसी प्रकार पड़ोस या जिस शिक्षण संस्था का वह सदस्य है, वह व्यक्ति का अन्तःसमूह होता है। वह उस समूह (अन्तःसमूह) से विशेष लगाव व स्नेह रखता है। वह ठीक वैसे ही कार्य करता है, जैसे कि समूह की इच्छा होती है। अत: अन्त:समूह, सदस्यों की दृष्टि में उनका अपना समूह होता है। उसके साथ सदस्य अपना तादात्म्य स्थापित करते हैं। एक समूह के सदस्यों के लिए जो अन्त:समूह होता है, दूसरे समूह के सदस्यों के लिए वही बाह्यसमूह होता है। अन्त:समूह प्राथमिक भी हो सकते हैं, द्वितीयक भी, वे स्थायी भी हो सकते हैं तथा अस्थायी भी।

बाह्यसमूह
कोई व्यक्ति बाह्यसमूह का उल्लेख अपने अन्त:समूह के सन्दर्भ में करता है। बाह्यसमूहों के लिए वह 'वे' या 'अन्य' जैसे शब्दों का प्रयोग करता है। बाह्यसमूह में जो गुण पाए जाते हैं वे अन्त:समूह से विपरीत होते हैं। इसमें इस तरह की भावना होती है व्यक्ति इसे दूसरों का समूह समझता है। इसी कारण बाह्यसमूह के प्रति सहयोग, सहानुभूति, स्नेह आदि का सर्वथा अभाव होता है। उसके स्थान पर बाह्यसमूह के प्रति दूरी या अलगाव, खिन्नता, घृणा, प्रतिस्पर्धा, पक्षपातपूर्ण भावना रहती है। यह भावना यदा-कदा शत्रुता या बैर के रूप में भी हो सकती है। उदाहरण के लिए हम इस पड़ोस के सदस्य हैं लेकिन, 'वो' पड़ोस बहुत भ्रष्ट और गन्दा है। वहाँ के रहने वाले जानवर से भी गए-गुजरे हैं। इसमें 'वो' समूह एक बाह्यसमूह है। शत्रु सेना, विदेशी समूह, प्रतिस्पर्धा करने वाले समूह आदि बाह्यसमूह के ही प्रमुख उदाहरण हैं।
अन्त:समूह एवं बाह्यसमूह में निम्नलिखित अन्तर पाए जाते हैं-
  1. अन्त:समूह को व्यक्ति अपना समूह मानता है अर्थात् इसके सदस्यों में अपनत्व की भावना पाई जाती है, जबकि बाह्यसमूह को व्यक्ति पराया समूह मानता है अर्थात् इसके सदस्यों के प्रति अपनत्व की भावना का अभाव पाया जाता है।
  2. अन्त:समूह के सदस्यों में 'हम की भावना' पाई जाती है, जबकि उनमें बाह्यसमूह के सदस्यों के प्रति विरोधपूर्ण भावनाएँ पाई जाती हैं।
  3. अन्त:समूह के सदस्यों में पाए जाने वाले सम्बन्ध घनिष्ठ होते हैं, जबकि बाह्यसमूह के सदस्यों के प्रति घनिष्ठता नहीं पाई जाती है।
  4. अन्त:समूह के सदस्य अपने समूह के दुःखों एवं सुखों को अपना दुःख एवं सुख मानते हैं, जबकि बाह्यसमूह के प्रति इस प्रकार की भावना का अभाव होता है।
  5. अन्तःसमूह के सदस्य प्रेम, स्नेह, त्याग व सहानुभूति के भावों से जुड़े होते हैं, जबकि बाह्यसमूह के प्रति द्वेष, घृणा, प्रतिस्पर्धा एवं पक्षपात के भाव पाए जाते हैं।
  6. अन्त:समूह के सदस्यों में अपने समूह के कल्याण के सामने व्यक्तिगत हितों की शिथिलता पाई जाती है, जबकि बाह्यसमूह के सदस्यों के प्रति सन्देह, घृणा एवं भेदभाव पाया जाता है।
  7. अन्तःसमूह का आकार तुलनात्मक रूप में छोटा होता है, जबकि बाह्यसमूह का आकार तुलनात्मक रूप से बड़ा होता है।
  8. अन्त:समूह का लक्षण ‘सामान्य हित' है, जबकि बाह्यसमूह का ‘हितों में संघर्ष' है।

3. कूले का वर्गीकरण
चार्ल्स कूले ने प्राथमिक (Primary) एवं द्वितीयक (Secondary) समूह में भेद किया है। इनके अनुसार, “प्राथमिक समूहों से मेरा तात्पर्य उन समूहों से है जिनकी विशेषता आमने-सामने का घनिष्ठ सम्बन्ध और सहयोग है। इस प्रकार के समूह अनेक अर्थों में प्राथमिक होते हैं और वह भी मुख्यतः इस अर्थ में कि वे व्यक्ति के सामाजिक स्वभाव तथा आदर्शो के निर्माण में मूलभूत होते हैं।"
चार्ल्स कूले ने प्राथमिक समूहों के तीन प्रमुख उदाहरण दिए हैं—प्रथम, परिवार (Family), द्वितीय, क्रीड़ा समूह (Play group) तथा तृतीय, पड़ोस (Neighbourhood) उन्होंने समूह का जो दूसरा विभाजन किया उसे द्वितीयक समूह कहते हैं। कूले के अनुसार द्वितीयक समूह ऐसे समूह हैं जिनमें घनिष्ठता का पूर्णतः अभाव पाया जाता है। इनमें सामान्यत: उन विशेषताओं का अभाव होता है जोकि अधिकांशत: प्राथमिक समूह में पाई जाती हैं। उदाहरण के लिए कॉरपोरेशन, श्रोतागण, क्लब, राष्ट्र, चर्च, व्यावसायिक संघ इत्यादि प्रमुख द्वितीयक समूह हैं।

4. मिलर का वर्गीकरण
हरबर्ट मिलर ने समूह के मध्य स्थित सामाजिक दूरी के आधार पर सामाजिक समूहों को दो श्रेणियों में बाँटा है-उदग्र समूह (Vertical group) तथा क्षैतिज समूह (Horizontal group) उदग्र समूह वे समूह हैं जो विभिन खण्डों में स्तरीकृत होते हैं तथा उनमें सामाजिक दूरी का बोध होता है। जब समूह के खण्डों में ऊँच-नीच या संस्तरण पाया जाए तो उसे उदग्र समूह कहते हैं। उदाहरण के लिए-वर्ण तथा जाति उदग्र समूह हैं। क्षैतिज समूह में सामाजिक समानता का पता चलता है। इन समूहों को क्षैतिज समूह इस कारण कहा जाता है कि इनके सदस्यों की स्थिति समान होती है; उदाहरण के लिए-कवि वर्ग, नेता वर्ग, श्रमिक वर्ग, अध्यापक वर्ग, छात्र वर्ग आदि। एक समूह विशेष के सदस्यों को उस समूह विशेष में समान स्थान प्राप्त है।

5. गिलिन एवं गिलिन का वर्गीकरण
गिलिन एवं गिलिन ने समूहों के सभी सम्बन्धित आधारों को सामने रखकर समूहों का निम्न प्रकार से वर्गीकरण प्रस्तुत किया है-
  • रक्त सम्बन्धी समूह (जैसे—परिवार, जाति आदि),
  • शारीरिक विशेषताओं पर आधारित समूह (जैसे—समान लिंग, आयु अथवा प्रजाति पर आधारित समूह),
  • क्षेत्रीय समूह (जैसे-जनजाति, राज्य, राष्ट्र इत्यादि),
  • अस्थिर समूह (जैसे—भीड़, श्रोता समूह इत्यादि),
  • स्थायी समूह (जैसे-खानाबदोशी जत्थे, ग्रामीण पड़ोस, कस्बे, शहर तथा विशाल नगर इत्यादि) तथा
  • सांस्कृतिक समूह (जैसे—आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, मनोरंजनात्मक तथा शैक्षिक समूह)।

6. सामाजिक समूहों के अन्य वर्गीकरण
सामाजिक समूहों के अनेक अन्य वर्गीकरण भी किए गए हैं। उदाहरणार्थ,-
एलवुड (Ellwood) ने समूहों को ऐच्छिक व अनैच्छिक समूह, संस्थागत व असंस्थागत समूह तथा अस्थायी व स्थायी समूहों में विभाजित किया है।
गिडिंग्स (Giddings) ने समूहों को जननिक (Genetic) समूह एवं इकट्ठे (Congregate) समूह का उल्लेख किया है। जननिक समूह परिवार है जिसमें मनुष्य का जन्म होता है। इकट्टठा समूह ऐसा ऐच्छिक समूह है जिसमें मनुष्य स्वेच्छा से सम्मिलित होता है।
वार्ड (Ward) ने दो प्रकार के समूह बताए हैं—ऐच्छिक समूह तथा अनिवार्य समूह।
सोरोकिन (Sorokin) ने एकल-प्रबन्धन समूह/एकल-कार्यात्मक समूह तथा बहु-बन्धन समूह/बहु-कार्यात्मक समूह का उल्लेख किया है। नूनेज (Nunez) ने चार प्रकार के समूह बताए हैं—संरचित समूह, संरचित अर्द्ध-समूह, आकस्मिक अर्द्ध-समूह तथा कृत्रिम समूह।
मर्टन (Merton) ने समूहों को सदस्यता समूह तथा गैर-सदस्यता समूहों में विभाजित किया है। उन्होंने सन्दर्भ समूह की अवधारणा भी विकसित की है। सन्दर्भ समूह से अभिप्राय उस समूह से है जिसको व्यक्ति अपना आदर्श स्वीकार करते हैं जिसके सदस्यों के अनुरूप बनना चाहते हैं तथा जिसकी जीवन-शैली का अनुकरण करते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हम सन्दर्भ समूहों के सदस्य नहीं होते हैं। हम सन्दर्भ समूहों से अपने आप को अभिनिर्धारित अवश्य करते हैं।
लियोपोल्ड (Leopold) ने समूहों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है-भीड़, समूह तथा अमूर्त संग्रह। पार्क एवं बर्गेस (Park and Burgess) ने समूहों को प्रादेशिक एवं गैर-प्रादेशिक समूहों में विभाजित किया है। जॉर्ज हासन (George Hasen) ने समूहों को असामाजिक, आभासी सामाजिक, समाज-विरोधी तथा समाजपक्षी समूहों में विभाजित किया है। बीरस्टीड (Bierstedt) ने समूहों को चार श्रेणियों में विभाजित किया है
सांख्यिकीय समूह, समाजीय समूह, सामाजिक समूह तथा सहचारी समूह। उन्होंने अनेक अन्य समूहों का भी उल्लेख किया है जिनमें वृहत् समूह एवं लघु समूह, बहुसंख्यक समूह एवं अल्पसंख्यक समूह, दीर्घकालीन समूह एवं अल्पकालीन समूह, खुला समूह एवं बन्द समूह, स्वतन्त्र समूह एवं आश्रित समूह, संगठित समूह एवं असंगठित समूह इत्यादि प्रमुख हैं।

प्राथमिक समूह की अवधारणा

सामाजिक समूहों के वर्गीकरण में सर्वाधिक मान्यता कूले के वर्गीकरण को दी जाती है। उन्होंने 1909 ई० में अपनी कृति 'सामाजिक संगठन' (Social Organization) में प्राथमिक समूह की अवधारणा का प्रयोग किया। उन्होंने अपनी दूसरी कृति 'प्रारम्भिक समाजशास्त्र' (Introductory Sociology) में द्वितीयक समूह का उल्लेख किया है। कूले की प्राथमिक समूह की अवधारणा; टॉनीज द्वारा प्रतिपादित गेमाइनशाफ्ट (Gemeinschaft) तथा गेसेलशाफ्ट (Gesellschaft) की अवधारणा के बहुत निकट है।
मानव के जीवन में स्नेह, प्रेम, सहानुभूति आदि भाव महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन भावों के विकास में प्राथमिक समूह की मुख्य भूमिका है। ऐसे गुणों के कारण समाज के संगठन को स्थायित्व प्राप्त होता है। मानव जब जन्म लेता है तो उसका रूप पूर्णतः जैविक होता है। सर्वप्रथम वह परिवार के सम्पर्क में आता है तथा परिवार उसे सामाजिक प्राणी बनाता है। चूंकि परिवार मनुष्य के जीवन में प्रथम या प्राथमिक है, इसलिए इसे प्राथमिक समूह कहा जाता है। प्राथमिक समूह से अभिप्राय उन समूहों से है जिनमें प्रत्यक्ष, अनौपचारिक, घनिष्ठ एवं प्राथमिक सम्बन्ध पाए जाते हैं। 
चार्ल्स कूले के शब्दों में, “प्राथमिक समूहों से मेरा तात्पर्य उन समूहों से है जिनकी विशेषता आमने-सामने का घनिष्ठ सम्बन्ध और सहयोग हैं। इस प्रकार के समूह अनेक अर्थों में प्राथमिक' होते हैं और वह भी मुख्यत: इस अर्थ में कि व्यक्ति के सामाजिक स्वभाव व आदर्शों के निर्माण में वे मूलभूत होते हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से इन घनिष्ठ सम्बन्धों का परिणाम सभी व्यक्तियों का एक सामान्य सम्पूर्णता में इस प्रकार मिल जाना है कि अनेक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक ही व्यक्ति के विचार और उद्देश्य सम्पूर्ण समूह का सामान्य जीवन और उद्देश्य बन जाते हैं। इस सम्पूर्णता की अभिव्यक्ति करने के लिए सम्भवतः सबसे सरल ढंग यह है कि इसे 'हम' शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाए। इस सम्पूर्णता में इस प्रकार की सहानुभूति व पारस्परिक एकरूपता की भावना पाई जाती है, जिनके लिए 'हम' एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।"

कूले की परिभाषा प्राथमिक समूह की मुख्य विशेषताओं का बोध कराती है। उन्होंने प्राथमिक समूह को एक ऐसा समूह माना है जिसके सदस्यों के मध्य आमने-सामने का सम्बन्ध होता है। आमने-सामने के सम्बन्धों के कारण सदस्य परस्पर घनिष्ठ सम्बन्धों से बंधे होते हैं। ये समूह मनुष्य के सामाजिक स्वभाव बनाने में तथा उसके जीवन में आदर्शों का निर्माण करने में भी प्राथमिक होते हैं। उदाहरण के लिए परिवार को ही लिया जाए, जिसे कूले ने प्रथम प्राथमिक समूह माना है। परिवार के सदस्यों में आमने-सामने के सम्बन्ध पाए जाते हैं। इसके कारण सभी सदस्य एक-दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्धों में बँधे रहते हैं। वे एक-दूसरे की सहायता या सहयोग भी करते हैं। परिवार समाजीकरण करने वाला सर्वप्रथम समूह होता है। इसी से व्यक्ति भाषा, खाने-पीने के ढंग, व्यवहार के ढंग, आचार-विचार सीखता है। अन्य शब्दों में, मनुष्य के सामाजिक स्वभाव का निर्माण प्राथमिक समूह ही करते हैं। प्राथमिक सम्बन्धों में घनिष्ठता होने के कारण सदस्यों का व्यक्तित्व समूह के व्यक्तित्व में मिल जाता है। इससे सम्पूर्ण रूप से 'हम' की भावना का जन्म होता है। 'हम' की भावना एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो यह दर्शाती है कि समूह के प्रति सदस्यों में कितनी निष्ठा, लगाव और सहानुभूति है। इसलिए इस समूह का सुख-दु:ख उनका अपना सुख-दु:ख बन जाता है।

कूले ने तीन महत्त्वपूर्ण प्राथमिक समूहों का उल्लेख किया है-परिवार, खेल-साथियों का समूह या क्रीड़ा समूह तथा पड़ोस। इन्हें प्राथमिक मानने का कारण इनका सभी युगों में तथा सभी समाजों में पाया जाना है। ये समूह मनुष्य के व्यक्तित्व के निर्माण में आधारभूत तथा प्राथमिक योगदान प्रदान करते हैं। ये समूह व्यक्ति (जो जैविक प्राणी होता है) में सामाजिक गुणों को भरने (सामाजिक बनाने) में भी प्राथमिक होते हैं।
किंग्सले डेविस ने कूले की प्राथमिक समूह की परिभाषा की समीक्षा करते हुए हमारा ध्यान दो बातों की ओर दिलाया है—प्रथम, कूले ने वास्तविक समूहों (जैसे परिवार, क्रीड़ा समूह, पड़ोस आदि) को प्राथमिक समूह कहा है तथा द्वितीय, कूले ने एक ओर तो “आमने-सामने की समिति' वाक्यांश का प्रयोग किया है और दूसरी ओर सम्बन्धों के कुछ विशिष्ट गुणों; जैसे सहानुभूति तथा पारस्परिक तादात्म्य पर बल दिया है। डेविस के अनुसार इन दोनों से प्राथमिक समूह के बारे में कुछ भ्रान्ति उत्पन्न होती है। ये दोनों बातें कुछ अंशों में प्रत्येक समूह में पाई जाती हैं। इतना ही नहीं, अप्रत्यक्ष सम्बन्ध (जैसे पत्र व्यवहार द्वारा दो व्यक्तियों में मित्रता) तथा मित्रतापूर्वक एवं घनिष्ठ प्रत्यक्ष सम्बन्ध (जैसे वेश्यावृत्ति-ग्राहक या सैनिकों का अभिवादन) भी औपचारिक एवं अवैयक्तिक प्रकृति के हो सकते हैं।

प्राथमिक समूहों की प्रकृति या विशेषताएँ
डेविस के अनुसार प्राथमिक समूहों की प्रकृति को तीन पहलुओं के सन्दर्भ में स्पष्ट किया जा सकता है। ये पहलू निम्नलिखित हैं-
(अ) प्राथमिक समूहों की बाह्य विशेषताएँ या भौतिक दशाएँ—किंग्सले डेविस ने निम्नलिखित तीन प्रमुख भौतिक दशाओं को प्राथमिक समूह के लिए अनिवार्य माना है-

1. शारीरिक समीपता
प्राथमिक समूहों के लिए शारीरिक समीपता का होना आवश्यक है। जिसे कूले ने आमने-सामने का सम्बन्ध कहा है उसी के लिए किंग्सले डेविस 'शारीरिक समीपता' शब्द का प्रयोग करते हैं। पारस्परिक घनिष्ठता के लिए यह आवश्यक है कि सदस्य एक-दूसरे को प्रत्यक्ष रूप से जानें। परस्पर जानने से एक-दूसरे के विचारों से परिचित होने का अवसर मिलता है। इससे एक-दूसरे की भावनाओं को समझा जा सकता है तथा 'हम की भावना का विकास होता है।

2. सीमित आकार
प्राथमिक समूह आकार में लघु होते हैं। सदस्यों की कम संख्या के कारण ही सदस्यों में घनिष्ठता होती है। किंग्सले डेविस का कथन है कि प्राथमिक समूह को आकार में छोटा होना ही चाहिए, क्योंकि यह असम्भव है कि एक ही समय में बहुत से व्यक्तियों से बुद्धिमत्तापूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया जा सके। फेयरचाइल्ड का विचार है कि प्राथमिक समूह में तीन-चार से लेकर पचास-साठ व्यक्ति तक पाए जा सकते हैं।

3. सम्बन्धों की लम्बी अवधि
सम्बन्धों की घनिष्ठता पर्याप्त रूप से उनकी अवधि पर निर्भर करती है। सम्बन्धों की अवधि जितनी लम्बी होती है, सम्बन्ध उतने ही घनिष्ठ होते हैं। प्राथमिक समूह में स्थिरता पाई जाती है। इसके दो मुख्य कारण हैं—प्रथम, यह कि सभी सदस्य एक-दूसरे को भली-भाँति जानते हैं, जिससे सम्बन्ध घनिष्ठ बने रहते हैं। घनिष्ठ सम्बन्धों के कारण समूह में स्थिरता रहती है तथा द्वितीय, यह कि प्राथमिक समूह के लक्ष्य सामान्य होते हैं। इसके अतिरिक्त सम्बन्धों में निरन्तरता (लम्बी अवधि), सदस्यों की एकता तथा आत्मीयता के कारण अन्य समूहों से प्राथमिक समूह अधिक स्थिर होता है।

(ब) प्राथमिक सम्बन्धों की प्रकृति
प्राथमिक समूहों की आन्तरिक विशेषताओं के अन्तर्गत सदस्यों में पाए जाने वाले सम्बन्ध आते हैं। डेविस ने प्राथमिक सम्बन्धों की पाँच प्रमुख विशेषताएँ बताई हैं। ये निम्नलिखित हैं

1. लक्ष्यों में सादृश्यता
प्राथमिक समूह के सदस्यों में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। इस घनिष्ठता का मुख्य आधार है सदस्यों के लक्ष्यों या उद्देश्यों में समानता। प्रत्येक सदस्य यह प्रयत्न करता है कि वह अपने लक्ष्यों या हितों को पूरा करने हेतु किसी दूसरे के हितों का हनन या अवहेलना न करे।

2. सम्बन्ध स्वयं साध्य होता है
प्राथमिक समूह में जो सम्बन्ध स्थापित किए जाते हैं, उनमें किसी विशेष उद्देश्य को प्राप्त करने की भावना निहित नहीं होती। किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्राथमिक समूह में सम्बन्ध स्थापित नहीं किए जाते हैं, अपितु सम्बन्ध ही अन्तिम लक्ष्य होता है।

3. सम्बन्ध व्यक्तिगत होता है
प्राथमिक समूहों में सदस्य एक-दूसरे को प्रत्यक्ष रूप से जानते हैं। इसी कारण, सम्बन्धों में आडम्बर या दिखावा नहीं होता और न ही इनका हस्तान्तरण किया जा सकता है। सम्बन्ध अवैयक्तिक तथा औपचारिक नहीं होते वरन् वैयक्तिक एवं घनिष्ठ होते हैं।

4. सम्बन्ध सर्वांगीण (संयुक्त) होता है
प्राथमिक समूह के कार्य में हर एक सदस्य सम्पूर्ण हृदय तथा इच्छा से भाग लेता है। प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे को प्रत्यक्ष रूप से जानते तथा पहचानते हैं। अतएव एक सदस्य दूसरे सदस्य के प्रति जागरूक होता है। सभी सदस्य आपस में मिलकर लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। इसीलिए प्राथमिक समूहों में पाए जाने वाले सम्बन्ध सर्वांगीण होते हैं। अन्य शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के जीवन की सम्पूर्ण दशाओं को जानता है।

5. सम्बन्ध स्वजात होता है
प्राथमिक समूहों में सम्बन्धों का विकास स्वत: होता है। प्रत्येक सदस्य के साथ दूसरे सदस्य का जो सम्बन्ध होता है उसका आधार है स्वयं की इच्छा। यह सम्बन्ध किसी प्रकार के दबाव, प्रलोभन या शर्त द्वारा स्थापित नहीं होता है। व्यक्ति अपनी प्रसन्नता व इच्छा से समूह के लिए या सदस्यों के लिए अपना सब-कुछ त्याग करने के लिए तैयार रहता है।

(स) मूर्त समूह तथा प्राथमिक सम्बन्ध
किंग्सले डेविस का कहना है कि प्राथमिक समूहों की जिन बाहरी अथवा भौतिक दशाओं तथा प्राथमिक सम्बन्धों के जिन गुणों का वर्णन किया गया है, वे सभी अनिवार्य रूप से मूर्त रूप में विद्यमान नहीं होते। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि डेविस ने प्राथमिक समूहों की विवेचना आदर्श-प्ररूप (Ideal-type) के रूप में की है। अतः यह अनिवार्य नहीं है कि सभी विशेषताएँ वास्तविक समूहों में पाई ही जाएँ। कई बार लघु समूहों में भी प्रेम एवं घनिष्ठता के स्थान पर घृणा एवं संघर्ष जैसी विशेषताएँ पाई जाती हैं। वास्तव में, प्राथमिक सम्बन्ध केवल अन्तिम लक्ष्य होते हैं जिनकी ओर आगे बढ़ने के लिए कुछ वास्तविक प्रकार की अन्तक्रियाएँ तो होती हैं लेकिन उन लक्ष्यों तक हम पहुँच नहीं पाते।

प्राथमिक समूहों को प्राथमिक क्यों कहा जाता है?
चार्ल्स कूले ने प्राथमिक समूहों के तीन प्रमुख उदाहरण दिए हैं- परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा समूह। कूले ने इन प्राथमिक समूहों को प्राथमिक क्यों कहा है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर हम अनेक दृष्टिकोणों को सामने रखकर दे सकते हैं। प्राथमिक समूहों को निम्नलिखित कारणों से प्राथमिक कहा जाता है-

1. प्राथमिक समूह समय की दृष्टि से प्राथमिक हैं
प्राथमिक समूहों को समय की दृष्टि से प्राथमिक कहा गया है। सर्वप्रथम बच्चा इन्हीं समूहों के सम्पर्क में आता है। उदाहरण के लिए सर्वप्रथम बच्चा परिवार, क्रीड़ा समूह या मित्र-मण्डली तथा पड़ोस के सम्पर्क में ही आता है। अन्य समूहों से उसका सम्पर्क बाद में होता है।

2. प्राथमिक समूह महत्त्व की दृष्टि से प्राथमिक हैं
प्राथमिक समूहों का व्यक्तियों के व्यक्तित्व निर्माण में विशेष महत्त्व होने के कारण भी इन्हें प्राथमिक कहा गया है। ये सम्पूर्ण सामाजिक जीवन के लिए आदर्श स्वरूप होते हैं।

3. प्राथमिक समूह मौलिक मानव संघों का प्रतिनिधित्व करने की दृष्टि से प्राथमिक हैं
मौलिक मानव संघों का प्रतिनिधि होने के कारण भी प्राथमिक समूहों को प्राथमिक माना गया हैं। किम्बल यंग के अनुसार प्राथमिक समूह सम्भवत: उतने ही प्राचीन हैं जितना कि मानव जीवन। ये सरलतम रूप से ऐसे प्राथमिक समुदाय का निर्माण करते हैं जो ऐतिहासिक रूप से व्यक्ति की मुख्य आवश्यकताओं को पूर्ण करने में महत्त्वपूर्ण इकाई हैं।

4. प्राथमिक समूह समाजीकरण की दृष्टि से प्राथमिक हैं
प्राथमिक समूह व्यक्ति का समाजीकरण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा समूह बच्चों को सामाजिक प्राणी बनाने में (अर्थात् समाज की मान्यताओं के अनुरूप व्यवहार सिखाने में) विशेष महत्त्व रखते हैं। इन्हीं से व्यक्ति अपने समूह की परम्पराओं, मान्यताओं एवं संस्कृति के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है। वास्तव में, हमारी रूढ़ियों तथा परम्पराओं का जन्म भी इसी समूह में होता है।

5. प्राथमिक समूह सम्बन्धों की प्रकृति के आधार पर प्राथमिक हैं
प्राथमिक समूह में प्राथमिक सम्बन्ध पाए जाते हैं। लक्ष्यों में सादृश्यता, स्वयं साध्य होना तथा सम्बन्धों का स्वजात, व्यक्तिगत एवं सर्वांगीण होना प्राथमिक सम्बन्धों की प्रमुख विशेषताएँ हैं। परिवार, क्रीड़ा समूह तथा पड़ोस जैसे प्राथमिक समूहों में ये विशेषताएँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं। साथ ही, प्राथमिक समूहों को इसलिए भी प्राथमिक कहा गया है क्योंकि इन्हीं से व्यक्ति में सहिष्णुता, दया, प्रेम और उदारता की मनोवृत्ति जन्म लेती है।

6. प्राथमिक समूह आत्म-नियन्त्रण की दृष्टि से भी प्राथमिक हैं
प्राथमिक समूह व्यक्ति में आत्म-नियन्त्रण की भावना उत्पन्न करते हैं। वास्तव में, ये सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधन हैं। व्यक्ति सहानुभूति व त्याग की भावना के कारण ही, प्राथमिक समूह के नियमों को नहीं तोड़ता है। कूले का कहना है कि प्राथमिक समूहों द्वारा पाशविक प्रेरणाओं का मानवीकरण किया जाना ही, इनके द्वारा की जाने वाली प्रमुख सेवा है।

प्राथमिक समूहों का महत्त्व
प्राथमिक समूहों का सामाजिक जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। लैण्डिस ने इनके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि प्राथमिक समूहों से व्यक्ति में सहिष्णुता, दया, प्रेम और उदारता की मनोवृत्ति जन्म लेती है। यह उदारता व्यक्ति में प्रत्यक्ष शिक्षण की अपेक्षा अनुकरण तथा समूह की मनोवृत्तियों को सीखने से पनपती है। यद्यपि इसमें प्रत्यक्ष शिक्षण भी होता है, पर इसके मुख्य लक्षण पारस्परिक ध्यान व स्नेह हैं। दूसरे व्यक्तियों के लिए प्रेम और सहानुभूति की भावना प्रतियोगिता एवं स्वयं के स्वार्थ से ऊपर होती है। दुःख के समय पारिवारिक सहायता उपयुक्त रूप से दी जाती है। समूह के सदस्य एक-दूसरे के बारे में चर्चा करते हैं और अनुपस्थित सदस्य के बारे में रुचि लेते हैं और चिन्तित होते हैं।
निस्सन्देह मनुष्य प्राथमिक समूहों के कारण ही समाज के योग्य बनता है। यदि प्राथमिक समूह मानव जीवन में उपस्थित न रहें तो वह समाज में उपयुक्त नहीं बन सकेगा। मनुष्य को अपने जीवनकाल में किसी न किसी प्राथमिक समूह का सदस्य बनना ही पड़ता है। प्राथमिक समूह ही मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। गिलिन एवं गिलिन ने ठीक ही कहा है कि प्राथमिक समूह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। यह व्यक्तियों के अनुभवों तथा मानव समाज के विकास में प्राथमिक होता है। अतः हम कह सकते हैं कि प्राथमिक समूह सम्पूर्ण सामाजिक जीवन के आदर्श स्वरूप होते हैं।
किम्बल यंग ने प्राथमिक समूह की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि यह मौलिक मानव संघों का प्रतिनिधि है। सम्भवतः यह उतना ही प्राचीन है जितना कि मानव जीवन। मौलिक मानव संघ सरलतम रूप से ऐसे प्राथमिक समूहों का निर्माण करते हैं जो ऐतिहासिक रूप से व्यक्ति की मुख्य आवश्यकताओं को पूर्ण करने में महत्त्वपूर्ण होते हैं। 
प्राथमिक समूहों में व्यक्तित्व का विकास होता है। वह इनसे अपनी प्रथाओं, परम्पराओं तथा संस्कृति के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है। मैकाइवर एवं पेज का कहना है कि हम सबसे पहले प्राथमिक समूह की सामाजिक भावनाओं को सृजनात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। हमारी सामाजिक रूढ़ियों तथा परम्पराओं का जन्म भी इन्हीं समूहों में होता है।
कूले के शब्दों में, “प्राथमिक समूहों द्वारा पाशविक प्रेरणाओं का मानवीकरण किया जाना ही सम्भवतः इनके द्वारा जाने वाली प्रमख सेवा है।" इसका तात्पर्य यह हआ है कि मनुष्य के अन्तर्मन में पाशविक प्रेरणाएँ (जैसे घृणा, हिंसा, प्रतिशोध आदि) हुआ करती हैं और इन्हीं प्रेरणाओं पर प्राथमिक समूह विजय पाना सिखाता है तथा स्नेह, त्याग, प्रेम आदि भावों को उत्पन्न करता है।
संक्षेप में, प्राथमिक समूह के महत्त्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-
  • प्राथमिक समूह मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। जन्म लेने के पश्चात् ही इन समूहों का प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हो जाता है। जीवन भर व्यक्ति का व्यवहार इन समूहों द्वारा प्रभावित होता रहता है।
  • प्राथमिक समूह समाजीकरण के प्रमुख अभिकरण हैं। एच० ई० बार्नस का कथन है कि समाजीकरण की प्रक्रिया के विकास में प्राथमिक समूह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। वे स्वाभाविक रूप से व्यक्ति के समाजीकरण, स्थापित संस्थाओं से एकीकरण व सुरक्षा में भी महत्त्वपूर्ण होते हैं।
  • प्राथमिक समूह सामाजिक नियन्त्रण का मुख्य साधन हैं। व्यक्ति सहानुभूति व त्याग की भावना के कारण प्राथमिक समूह के नियमों को नहीं तोड़ता। ये समूह उसके समाजीकरण के द्वारा उसकी पाशविक प्रवृत्तियों को समाप्त कर उसके व्यवहार पर नियन्त्रण लगाते हैं।
  • प्राथमिक समूह हमें उचित-अनुचित का ज्ञान कराते हैं। ये सामूहिक मान्यताओं के अनुरूप व्यक्तित्व की रचना में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। उदाहरणार्थ-परिवार अपने सदस्यों को सामान्यत: समाज में उचित व्यवहार करना सिखाता है।
  • प्राथमिक समूह इस प्रकार का वातावरण बनाते हैं जिनमें व्यक्ति को भावात्मक सुरक्षा मिलती है। ब्रूम का कथन है कि "प्राथमिक समूह व्यक्ति और समाज के मध्य सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। प्राथमिक समूहों की सहायता से व्यक्ति को भावात्मक सुरक्षा प्राप्त होती है और इन्हीं के माध्यम से व्यक्ति अपने उच्चतर लक्ष्यों को प्राप्त करता है।''

द्वितीयक समूह की अवधारणा

आज सभ्यता की उन्नति के साथ-साथ द्वितीयक समूहों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। द्वितीयक समूह की प्रकृति प्राथमिक समूह की प्रकृति के विपरीत होती है। किंग्सले डेविस का कथन है कि, “स्थूल रूप से द्वितीयक समूहों को, जो चीजें प्राथमिक समूह के बारे में कही गई हैं उनके विपरीत कहकर परिभाषित किया जा सकता है।” द्वितीयक समूह इतने विस्तृत क्षेत्र में फैले होते हैं कि इनके सदस्यों को निकटता में रहने की आवश्यकता नहीं होती। न ही सभी सदस्य एक-दूसरे को वैयक्तिक रूप में जानते हैं। इनमें ऐसे सम्बन्ध होते हैं जो स्वयं में लक्ष्य नहीं होते, न वैयक्तिक और न ही संयुक्त होते हैं। उदाहरणार्थ-राज्य एक द्वितीयक समूह है जिसकी विशेषताएँ प्राथमिक समूहों में पाई जाने वाली विशेषताओं के विपरीत हैं।
अत: प्राथमिक समूह के विपरीत विशेषताओं वाले समूह को द्वितीयक समूह की संज्ञा दी जाती है। यह समूह का वह रूप है जो अपने सामाजिक सम्पर्क और औपचारिक संगठन की मात्रा में प्राथमिक समूहों की घनिष्ठता से भिन्न है। ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार, “जो समूह घनिष्ठता के अभाव वाले अनुभवों को प्रदान करते हैं, उन्हें द्वितीयक समूह कहा जाता है।" लुण्डबर्ग (Lundberg) के अनुसार, "द्वितीयक समूह वे हैं जिनमें दो या अधिक व्यक्तियों के सम्बन्ध अवैयक्तिक, हित-प्रधान तथा व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित होते हैं।” फेयरचाइल्ड (Fairchild) के अनुसार, “समूह का वह रूप, जो अपने सामाजिक सम्पर्क और औपचारिक संगठन की मात्रा में प्राथमिक या आमने-सामने के समूह की तरह घनिष्ठता से भिन्न हो, द्वितीयक समूह कहलाता है।" इसी भाँति, कूले (Cooley) के अनुसार, “द्वितीयक समूह ऐसे समूह हैं जिनमें घनिष्ठता का पूर्णत: अभाव होता है और सामान्यत: उन विशेषताओं का भी अभाव होता है जोकि अधिकतर प्राथमिक तथा अर्द्ध-प्राथमिक समूहों में पाई जाती हैं।"
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि द्वितीयक समूहों में प्राथमिक समूहों के विपरीत विशेषताएँ पाई जाती हैं। वे आकार में बड़े होते हैं तथा इनमें घनिष्ठता का अभाव पाया जाता है।

द्वितीयक समूहों की विशेषताएँ
द्वितीयक समूहों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

बड़ा आकार
द्वितीयक समूह में सदस्यों की संख्या अधिक होती है, अतएव द्वितीयक समूह का आकार बड़ा होता है। द्वितीयक समूहों की सदस्यता की कोई सीमा नहीं होती है।

उद्देश्यों का विशेषीकरण
द्वितीयक समूह किसी उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए बनाए जाते हैं। कोई भी द्वितीयक समूह उद्देश्यविहीन नहीं होता और न ही किसी स्वार्थरहित द्वितीयक समूह की कल्पना ही की जा सकती है। इसी कारण किम्बल यंग ने इन्हें 'विशेष स्वार्थ समूह' कहा है।

अप्रत्यक्ष सम्पर्क
द्वितीयक समूह में प्रत्यक्ष सम्पर्क भी हो सकते हैं, तथापि प्राय: अप्रत्यक्ष सम्पर्क ही अधिक पाया जाता है। इसका मुख्य कारण समूह के आकार का बड़ा होना है। अप्रत्यक्ष सम्पर्क के कारण घनिष्ठता का जन्म उस सीमा तक नहीं होता है जितना कि प्राथमिक समूह में होता है।

व्यक्तिगत तथा घनिष्ठ सम्बन्धों का अभाव
द्वितीयक समूहों में घनिष्ठता का अभाव पाया जाता है। द्वितीयक समूह का आकार बड़ा होने के कारण प्रत्येक सदस्य परस्पर वैयक्तिक रूप से सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाता, अतः उनमें घनिष्ठता नहीं आ पाती है।

उद्देश्यों की भिन्नता
द्वितीयक समूह में प्रत्येक व्यक्ति अपने हित या लक्ष्य को पूरा करने की सोचता है। जब सभी सदस्य अपने ही हित को पाने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे तब उस स्थिति में उद्देश्यों की भिन्नता पाई जाएगी। उद्देश्यों की भिन्नता के कारण ही द्वितीयक समूहों में स्वार्थ-सिद्धि तथा प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहन मिलता है।

औपचारिक सम्बन्ध
द्वितीयक समूहों के सदस्यों का पारस्परिक सम्बन्ध कुछ निश्चित नियमों व उपनियमों के अनुसार नियन्त्रित होता है। यदि ये नियम नहीं हों तो इन समूहों में अव्यवस्था फैल जाएगी। इन नियमों के कारण सदस्यों का सम्बन्ध औपचारिक होता है।

इच्छा से स्थापित
चूँकि ये विशेष स्वार्थ समूह होते हैं इस कारण इनकी स्थापना जान-बूझकर की जाती है। जब सदस्यों को कोई विशेष लक्ष्य या उद्देश्य प्राप्त करना होता है तो उस दशा में लोग द्वितीयक समूह की स्थापना करते हैं ताकि उनके लक्ष्यों की पूर्ति हो सके।

प्राथमिक एवं द्वितीयक समूहों में अन्तर

प्राथमिक एवं द्वितीयक समूहों की विशेषताएँ पूर्णत: एक-दूसरे के विपरीत होती हैं। दोनों में निम्नलिखित प्रमुख आधारों पर अन्तर स्पष्ट किया जा सकता है-

आकार
प्राथमिक समूह का आकार छोटा होता है। उदाहरण के लिए परिवार, पड़ोस तथा मित्र-मण्डली का आकार सीमित है। फेयरचाइल्ड के अनुसार इसमें तीन-चार व्यक्तियों से लेकर पचास-साठ व्यक्तियों तक तथा कूले के अनुसार इसमें दो से साठ व्यक्तियों तक की संख्या हो सकती है। द्वितीयक समूह का आकार बड़ा होता है। इसके सदस्यों की संख्या असीमित हो सकती है। सम्पूर्ण राष्ट्र भी एक द्वितीयक समूह है जिसकी संख्या असीमित होती है।

सम्बन्ध
प्राथमिक समूह के सदस्यों में आमने-सामने के वैयक्तिक व घनिष्ठ सम्बन्ध पाए जाते हैं। वैयक्तिक सम्बन्धों के कारण इनमें औपचारिकता नहीं होती है। इसके विपरीत प्रेम, सहयोग, सद्भावना आदि आन्तरिक गुणों का समावेश होता है। इनमें हम की भावना की प्रधानता रहती है। द्वितीयक समूह में अप्रत्यक्ष एवं अवैयक्तिक सम्बन्ध पाए जाते हैं। इनमें सहयोग, स्नेह, घनिष्ठता की कमी होती है और 'हम' के स्थान पर 'मैं' की प्रधानता रहती है।

हित
प्राथमिक समूह में कोई विशेष हित नहीं होता है। सभी कार्यों में प्रत्येक सदस्य पूर्ण हृदय से हिस्सा लेते हैं। वे समूह के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को तैयार रहते हैं। द्वितीयक समूह में, जोकि विशेष स्वार्थ समूह के नाम से जाने जाते हैं, प्रत्येक सदस्य अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जी जान से कोशिश करता है। यदि उसे अपने हित के लिए दूसरे सदस्यों के हितों की अवहेलना भी करनी पड़ जाए तो भी वह इसके लिए तत्पर रहता है।

सम्बन्धों का जन्म
प्राथमिक सम्बन्धों का जन्म स्वत: होता है। इस प्रकार के सम्बन्धों की स्थापना में किसी प्रकार की कोई शर्त या दबाव नहीं होता है। द्वितीयक समूह में सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आडम्बर या कृत्रिमता का आश्रय लिया जाता है। इनमें प्राथमिक सम्बन्धों (जोकि आमने-सामने के सम्बन्ध हैं) के विपरीत, सम्बन्ध अप्रत्यक्ष अथवा दूर-संचार के माध्यम से होते हैं।

दायित्व
प्राथमिक समूहों में दायित्व की कोई सीमा नहीं होती है। यह नहीं बताया जा सकता कि माँ अपने पुत्र के प्रति कितने दायित्वों को निभाएगी। द्वितीयक समूहों में सदस्यों का दायित्व सीमित व शर्तों या नियमों के अनुसार होता है। 

नियम
प्राथमिक समूह में किसी प्रकार का लिखित नियम नहीं होता है। ये समूह अनौपचारिक होते हैं। ये अपने सदस्यों पर कोई कानून या शर्त नहीं लगाते हैं। द्वितीयक समूह की प्रकृति औपचारिक है। इसमें अनेक प्रकार के नियम, कानून तथा कार्यविधियों को सदस्यों पर थोपा जाता है और नियम का उल्लंघन करने वालों को औपचारिक दण्ड मिलता है। 

नियन्त्रण
प्राथमिक समूहों में नियन्त्रण की प्रकृति अनौपचारिक होती है। निन्दा व तिरस्कार आदि के द्वारा सदस्यों का व्यवहार नियन्त्रित होता है। द्वितीयक समूहों के नियन्त्रण की प्रकृति औपचारिक होती है। द्वितीयक समूह अपने सदस्यों के व्यवहार पर नियन्त्रण कानून, पुलिस आदि द्वितीयक साधनों की सहायता से करता है।

क्षेत्र
प्राथमिक समूह प्रत्येक काल व प्रत्येक समाज में पाए जाते हैं। अन्य शब्दों में, ये सार्वभौमिक होते हैं। ये समूह बहुत छोटे क्षेत्र में व्याप्त होते हैं। द्वितीयक समूह सार्वभौमिक नहीं होते हैं। इनका भौगोलिक क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत होता है। कोई-कोई द्वितीयक समूह सम्पूर्ण देश में भी फैला हो सकता है।

प्रभाव
प्राथमिक समूह व्यक्ति के विचारों व मनोवृत्तियों को बनाते हैं, अत: इनका प्रभाव सर्वव्यापी होता है। द्वितीयक समूह विशेषीकृत समूह होते हैं और इनका प्रभाव कुछ विशेष क्षेत्रों तक ही सीमित रहता है।

व्यक्तित्व
प्राथमिक समूह में व्यक्ति के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण भाग समूह के सम्पर्क में आता है। इसीलिए प्राथमिक समूह के सदस्य एक-दूसरे के बारे में पूर्णतया परिचित होते हैं। द्वितीयक समूह के सदस्यों में व्यक्तित्व का केवल कुछ भाग ही समूह के सम्पर्क में आता है।

कार्य
प्राथमिक समूह मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करता है या समाजीकरण करता है। कूले के अनुसार, “यह मानव स्वभाव का निर्माण स्थल है।' इसके विपरीत द्वितीयक समूह व्यक्ति के व्यक्तित्व का विशेषीकरण करते हैं या विशेषीकरण करने वाले समूह हैं।

सदस्यता
प्राथमिक समूह की सदस्यता अनिवार्य होती है। इसके कारण मनुष्य को अपने परिवार, खेल समूह तथा पड़ोस में रहना पड़ता है। द्वितीयक समूह की सदस्यता अनिवार्य नहीं है। जब व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसे हित विशेष को प्राप्त करना है, तभी वह द्वितीयक समूह का सदस्य बनता है।

कार्य-क्षेत्र
प्राथमिक समूह का कार्य-क्षेत्र सीमित तथा कम होता है। द्वितीयक समूह का कार्य-क्षेत्र अधिक विस्तृत होता है। 

हम की भावना
प्राथमिक समूह में हम की भावना पाई जाती है तथा व्यक्तियों के सम्बन्ध प्राथमिक होते हैं। द्वितीयक समूह में किसी प्रकार की हम की भावना नहीं पाई जाती है तथा सम्बन्ध गौण होते हैं।

व्यक्तिगत एवं सामूहिक हित
प्राथमिक समूह समष्टिवादी होते हैं। इसी कारण सदस्यों के व्यक्तिगत हित सामूहिक हित में विलीन हो जाते हैं। द्वितीयक समूह व्यक्तिवादी होते हैं। इनमें सामूहिक हितों की अपेक्षा व्यक्तिगत हितों को अधिक महत्त्व दिया जाता है।

प्राचीनता
प्राथमिक समूह अत्यधिक प्राचीन हैं, शायद उतने ही जितना कि स्वयं मानव समाज। द्वितीयक समूह तुलनात्मक रूप में नए समूह हैं। जनसंख्या में वृद्धि, औद्योगिक क्रान्ति, सामाजिक गतिशीलता इत्यादि कारणों से आधुनिक समाजों में द्वितीयक समूहों की संख्या में वृद्धि हुई है।
और नया पुराने