संस्था किसे कहते है? अर्थ, परिभाषा, कार्य एवं विशेषताएं, आवश्यक तत्व | sanstha

संस्था क्या है?

सामान्य तौर से संस्था व समिति का एक ही अर्थ लगाया जाता है, परन्तु इन दोनों में कुछ आधारभूत अन्तर हैं। मानव की असीमित आवश्यकताएँ होती हैं। इनकी पूर्ति करने के लिए वह यथासम्भव प्रयास करता है। इन आवश्यकताओं में कुछ आवश्यकताएँ सामान्य होती हैं। इस प्रकार की स्थिति में व्यक्ति परस्पर मिल-जुलकर सामान्य आवश्यकताओं व उद्देश्यों की पूर्ति हेतु एक संगठन बना लेते हैं। व्यक्तियों के इसी संगठन को समिति कहा जाता है। इस प्रकार निर्मित की गई समितियों की सफलता के लिए परस्पर सहयोग की आवश्यकता होती है।
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समिति का कार्य विधिवत् रूप से चलाने के लिए (अर्थात् समिति के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए) जो साधन, तौर तरीके, विधियाँ, प्रणालियाँ आदि उपयोग में लाई जाती हैं, उन्हें संस्था कहते हैं। दूसरे शब्दों में, आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जो प्रतिमानित व्यवहार-प्रणाली या कार्यविधि होती है, उसे ही संस्था कहते हैं। उदाहरण के लिए-यदि कोई व्यक्ति अपना परिवार बसाना चाहता है तो उसे कुछ नियमों व रीति-रिवाजों का पालन करके विवाह करना होगा। परिवार एक समिति है, जबकि विवाह एक संस्था है। इसी भाँति, कोई महाविद्यालय तो एक समिति है, जबकि नियमों की व्यवस्था होने के कारण परीक्षा पद्धति एक संस्था है। चूंकि परिवार का स्वरूप समाज की मान्यताओं के अनुरूप निर्धारित होता है, इसलिए मूर्त होते हुए भी कई बार परिवार को एक संस्था ही कहा जाता है।

संस्था का अर्थ एवं परिभाषाएँ

संस्थाएँ वे कार्यप्रणालियाँ हैं जिनके द्वारा व्यक्ति, समितियाँ या संगठन अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। ये समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होती हैं। कार्यप्रणालियाँ या नियमों की व्यवस्था होने के कारण संस्थाएँ अमूर्त होती हैं। विवाह, उत्तराधिकार, परीक्षा प्रणाली, स्नातकत्व, सामूहिक सौदेबाजी, प्रजातन्त्र इत्यादि संस्थाओं के प्रमुख उदाहरण हैं। संस्था को सामाजिक रीति-रिवाजों का समूह कहा गया है।
  • ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार, “सामाजिक संस्थाएँ कुछ आधारभूत मानवीय आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए संगठित एवं स्थापित प्रणालियों को कहते हैं।”
  • बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार, “सामाजिक संस्था समाज की वह संरचना है जिसको सुस्थापित कार्यविधियों द्वारा व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संगठित किया जाता है।"
  • ग्रीन (Green) के अनुसार, “एक संस्था अनेक जनरीतियों और रूढ़ियों (प्रायः अधिकतर पर आवश्यक रूप से नहीं) का ऐसा संगठन होता है जो अनेक सामाजिक कार्य करता है।"
  • गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “एक सामाजिक संस्था सांस्कृतिक प्रतिमानों (जिनमें क्रियाएँ, विचार, मनोवृत्तियाँ तथा सांस्कृतिक उपकरण सम्मिलित है) का वह क्रियात्मक स्वरूप है जिसमें कुछ स्थायित्व होता है और जिसका कार्य सामाजिक आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करना है।"
  • इसी भाँति, मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार, “संस्थाएँ सामूहिक क्रिया की विशेषता बताने वाली कार्यप्रणाली के स्थापित स्वरूप या अवस्था को कहते हैं।"
संस्था की उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि संस्था नियमों या कार्यप्रणालियों की व्यवस्था है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि संस्था का तात्पर्य व्यवहार के स्वीकृत प्रतिमानों से है जिनके द्वारा परस्पर सम्बन्धित व्यक्तियों की भूमिकाएँ निश्चित कर दी जाती हैं।

संस्था की प्रमुख विशेषताएँ

सामाजिक संस्था की विभिन्न परिभाषाओं से इसकी कुछ विशेषताएँ भी स्पष्ट होती हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं-
  1. सुपरिभाषित उद्देश्य - प्रत्येक सामाजिक संस्था का एक निश्चित उद्देश्य होता है जिसकी पूर्ति के लिए संस्था का निर्माण किया जाता है। सामाजिक संस्थाओं के उद्देश्य पूर्णत: सुपरिभाषित व स्पष्ट होते हैं।
  2. स्थायित्व - सामाजिक संस्था का विकास दीर्घ समय में होता है। जब कोई कार्यविधि दीर्घ समय तक समाज के व्यक्तियों की आवश्यकताओं को सफलतापूर्वक पूरा करती रहती है, तब ही उसे एक संस्था के रूप में स्वीकार किया जाता है। अतएव साधारणत: स्थायित्व के कारण संस्था में परिवर्तन नहीं होता।
  3. सामूहिक अभिमति - सामाजिक संस्था के लिए सामूहिक अभिमति का होना अति आवश्यक है। सामूहिक अभिमति के कारण इसमें स्थायित्व आता है तथा सदस्यों के लिए अधिक प्रभावशाली होती है।
  4. नियमों की संरचना - बिना उचित ढाँचे या संरचना के कोई भी सामाजिक संस्था विकसित नहीं हो सकती। ढाँचे से अभिप्राय उन नियमों (लिखित या अलिखित) अथवा कार्यप्रणालियों से है जिनके द्वारा संस्था का काम चलता है तथा उद्देश्यों की प्राप्ति होती है।
  5. सामूहिक प्रयत्न - सामाजिक संस्था व्यक्ति विशेष के लक्ष्यों को पूरा न करके, सामूहिक लक्ष्यों की पूर्ति करती है। इस कारण संस्था का विकास या अवनति व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं होती है।
  6. प्रतीक - प्रत्येक सामाजिक संस्था के कुछ प्रतीक होते हैं। प्रतीकों की प्रकृति भौतिक या अभौतिक हो सकती है। उदाहरणार्थ—प्रत्येक बैंक या विश्वविद्यालय का अपना प्रतीक होता है। स्त्रियों के लिए विवाह संस्था का प्रतीक मंगलसूत्र है।
  7. अमूर्त व्यवस्था - सामाजिक संस्था व्यक्तियों का समूह न होकर कार्यविधियों की व्यवस्था है। कार्यविधि अथवा नियमों की व्यवस्था होने के कारण ही संस्था को अमूर्त व्यवस्था कहा जाता है।
  8. सांस्कृतिक व्यवस्था की इकाई - सामाजिक संस्था में अनेक रीतियाँ, प्रथाएँ, जनरीतियाँ व रूढ़ियाँ सम्मिलित होती हैं। ये सभी संस्कृति के अंग है। इनसे मिलकर बनने के कारण संस्था स्वयं सम्पूर्ण सांस्कृतिक व्यवस्था की इकाई बन जाती है।

संस्थाओं के प्रकार

संस्थाएँ अनेक प्रकार की होती हैं। मैकाइवर एवं पेज के अनुसार कुछ विशिष्ट संस्थाएँ ऐसी होती हैं जो कई प्रकार की समितियों में मिलती हैं; जैसे—सदस्यता का प्रयत्न, अधिकारियों का निर्वाचन और प्रबन्ध का रूप। परन्तु कुछ अन्य संस्थाएँ भी हैं जो किसी विलक्षण व विशिष्ट प्रकार की समितियों में पाई जाती हैं। एक संस्था की प्रकृति समिति द्वारा अपनाए गए विशेष हित की प्रकृति पर निर्भर रहती है। इस प्रकार प्रत्येक समिति का एक संस्थात्मक पक्ष होता है। मैकाइवर एवं पेज ने समितियों, संस्थाओं तथा हितों के बीच सम्बन्ध निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया है-

समिति विशेष संस्थाएँ विशेष हित
परिवार विवाह, घर, उत्तराधिकार। यौन सम्बन्ध, घर, वंशावली।
कॉलेज भाषण और परीक्षा प्रणाली, स्नातकत्व। शिक्षण, व्यावसायिक तैयारी।
व्यापार लेखा प्रणाली, संस्थापन, अंश-पूँजी। लाभ।
व्यापार संघ सामूहिक सौदेबाजी, हड़ताल, धरन। नौकरी सुरक्षा, पारिश्रमिक दरें, कार्य की स्थितियाँ।
चर्च (धार्मिक संघ) सम्प्रदाय, धर्म, भ्रातृत्व, उपासना के रूप। धार्मिक विश्वास।
राजनीतिक दल प्राथमिक इकाइयाँ, दल 'यन्त्र' राजनीतिक मंच। कार्यालय, शक्ति, सरकारी नीति।
राज्य संविधान, वैधानिक संहिता, शासन के रूप। सामाजिक व्यवस्था का साधारण नियमन।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक संस्थाएँ अनेक प्रकार की हैं। आर्थिक संस्थाएँ (जैसे श्रमविभाजन, सम्पत्ति, बाजार व्यवस्था, इत्यादि), राजनीतिक संस्थाएँ (जैसे संविधान, प्रजातन्त्र आदि), सांस्कृतिक संस्थाएँ (जैसे विवाह आदि), धार्मिक संस्थाएँ (जैसे धर्म आदि), शैक्षणिक संस्थाएँ, मनोरंजनात्मक संस्थाएँ इत्यादि समाज में विभिन्न प्रकार की संस्थाएँ ही हैं जो समाज के अस्तित्व को बनाए रखती हैं तथा सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं।

संस्थाओं के सामाजिक कार्य एवं महत्त्व

विभिन्न विद्वानों ने सामाजिक संस्थाओं के कुछ आधारभूत सामाजिक कार्य बताए हैं जोकि निम्नलिखित हैं

मानव व्यवहार पर नियन्त्रण
सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सदस्यों का व्यवहार समाज की आशा के अनुरूप होना चाहिए। सामाजिक संस्थाएँ, जोकि सामूहिक अभिमति की अभिव्यक्ति होती हैं, इसमें पूर्ण योगदान देती हैं। सामाजिक संस्था का उल्लंघन करना कोई सरल काम नहीं है।

संस्कृति की वाहक
सामाजिक संस्थाएँ सांस्कृतिक व्यवस्था का अंग होती हैं। ये सांस्कृतिक विरासत पर आधारित होती हैं। सामाजिक संस्था के नियम और पद्धतियाँ संस्कृति के गुणों को दर्शाते हैं। संस्थाओं के द्वारा संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होती है।

सामाजिक परिवर्तन का कारण
सामाजिक संस्था में रूढ़िवादिता होने के कारण परिवर्तित युग के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं होता और न आवश्यकता ही पूरी हो पाती है। ऐसी दशा में संस्थाओं में परिवर्तन के प्रयत्न सामाजिक परिवर्तन लाते हैं।

व्यक्ति के विकास और प्रगति में बाधक
सामाजिक संस्थाएँ कई बार व्यक्ति के विकास और प्रगति में भी बाधा बन जाती हैं। उदाहरणार्थ-व्यक्ति के लिए अपनी जाति या उपजाति के अन्दर विवाह करना अत्यन्त आवश्यक है। ऐसी दशा में रूढ़िवादिता के कारण विभिन्न जातियों में दूरी बनी रहती है।

व्यक्ति को प्रस्थिति एवं भूमिका प्रदान करना
प्रत्येक सामाजिक संस्था अपने सदस्य को पद देती है और उस पद के अनुसार भूमिका की आशा करती है। उदाहरण के लिए विवाह के बाद पुरुष और स्त्री को क्रमश: पति एवं पत्नी का पद प्राप्त होता है और उनसे हम इन पदों के अनुकूल भूमिका की आशा करते हैं।

सामाजिक अनुकूलन में सहायक
सामाजिक संस्थाएँ अपने नियमों तथा उपनियमों के द्वारा व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों के साथ अनुकूलन करना सिखाती हैं।

मार्गदर्शन करना
मनुष्य के व्यवहारों एवं आचरणों को निर्देशित करने के लिए विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ मार्गदर्शन का कार्य करती हैं। क्योंकि संस्थाएँ समाज द्वारा मान्यता प्राप्त विधियाँ हैं, इसलिए व्यक्ति इन विधियों के अनुसार व्यवहार करने के लिए प्रेरित होता है।

मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति
सामाजिक संस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रथम कार्य मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। मानव सर्वप्रथम किसी आवश्यकता का अनुभव करता है तथा उसकी पूर्ति हेतु संस्था का जन्म होता है। जैसे विवाह एक संस्था है जिसका प्रमुख कार्य यौन सन्तुष्टि करना है।

समिति एवं संस्था में अन्तर

संस्था एवं समिति दोनों मानव की आवश्यकता पूर्ति से सम्बन्धित हैं। इनमें जो मूलभूत अन्तर पाया जाता है उसे मैकाइवर एवं पेज के इस कथन से स्पष्ट समझा जा सकता है कि प्रत्येक समिति अपने विशिष्ट हित के लिए विशिष्ट संस्थाएँ रखती है। समिति तो व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जोकि एक या अधिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संगठित है, जबकि संस्थाएँ समितियों के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु मान्यता प्राप्त विधियाँ या कार्यप्रणालियाँ हैं।
समिति एवं संस्था में प्रमुख अन्तर अग्र प्रकार हैं-

समिति/संस्था
  • समिति का तात्पर्य मानव समूह से है और इससे सदस्यता का बोध होता है। संस्था नियमों एवं कार्यप्रणालियों का संकलन है और इससे पद्धति का बोध होता है।
  • समिति मूर्त होती है। संस्था अमूर्त होती है।
  • समिति का जन्म मनुष्यों द्वारा होता है। संस्था का विकास स्वतः तथा शनैः शनैः होता है।
  • समिति की प्रकृति अस्थायी होती है। संस्था की प्रकृति अपेक्षाकृत स्थायी होती है।
  • समिति पारस्परिक सहयोग पर निर्भर है। संस्था मनुष्यों की क्रियाओं पर निर्भर है।
  • प्रत्येक समिति नाम से जानी जाती है। प्रत्येक संस्था का एक प्रतीक होता है।
  • नियम पालन के सन्दर्भ में समिति में अनिवार्यता उतनी नहीं होती।नियम पालन के सन्दर्भ में संस्था में अनिवार्यता अधिक होती है।
  • हम समितियों के सदस्य हो सकते हैं। हम संस्थाओं के सदस्य नहीं हो सकते हैं।
  • समिति अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्था का निर्माण करती है।संस्था समिति का निर्माण नहीं करती है। 
  • समिति का कोई निश्चित ढाँचा नहीं होता। संस्था का निश्चित सामाजिक ढाँचा होता है।
  • समितियाँ प्रगतिशील व परिवर्तन में सहायक होती हैं। संस्थाएँ प्रथाओं पर आधारित होने के कारण रूढ़िवादी होती हैं।

हम समितियों के सदस्य होते हैं न कि संस्थाओं के
समिति एवं संस्था के अर्थ, परिभाषाओं तथा अन्तर से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि हम समितियों के तो सदस्य हो सकते हैं पर संस्थाओं के नहीं। समिति तथा संस्था दो पर्यायवाची शब्द नहीं हैं।
समाजशास्त्र में इन दोनों को विशेष अर्थों में परिभाषित किया जाता है। मैकाइवर एवं पेज ने इस सन्दर्भ में ठीक ही कहा है कि, "हम समितियों के सदस्य होते हैं, न कि संस्थाओं के।" इस कथन का तात्पर्य यह है कि चूँकि समिति मानव-समूह है अत: यह मूर्त है। इसीलिए मानव अपनी इच्छा से इसका सदस्य बन सकता है। उदाहरण के लिए हम परिवार, विद्यालय, क्लब, राज्य इत्यादि के सदस्य हो सकते हैं। लेकिन संस्था अमूर्त है क्योंकि यह नियमों या कार्यप्रणालियों का संकलन है। इसी कारण व्यक्ति संस्था का सदस्य नहीं बन सकता है।
उदाहरण के लिए—विवाह, परीक्षा की पद्धति इत्यादि संस्थाएँ हैं। कार्यप्रणालियाँ या नियमों की व्यवस्थाएँ होने के कारण हम संस्थाओं के सदस्य नहीं हो सकते। व्यक्ति अनेक समितियों का सदस्य होता है। हम समितियों के सदस्य इसलिए हैं क्योंकि ये मूर्त होती हैं तथा संस्थाओं के इसलिए नहीं क्योंकि वे अमूर्त होती हैं। इस प्रकार मैकाइवर एवं पेज का यह कथन पूर्णत: सही है कि हम समितियों के सदस्य होते हैं पर संस्थाओं के नहीं।
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