समाजशास्त्र - समाजशास्त्र क्या है, अर्थ एवं परिभाषाएँ | sociology in hindi

समाजशास्त्र 

ऑगस्त कॉम्ट (Auguste Comte) प्रथम विचारक हैं जिन्होंने एक व्यवस्थित विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र विषय का निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में किया। उनको मानवीय तथा सामाजिक एकता पर बल देने वाला प्रथम समाजशास्त्री माना जाता है। उनका विचार था कि कोई भी विषय ऐसा नहीं है जो कि समाज के विभिन्न पहलुओं का समग्र रूप में अध्ययन कर सकता हो। इस कमी को दूर करने के लिए उन्होंने इस नवीन विषय का निर्माण किया। इसीलिए कॉम्ट को समाजशास्त्र विषय का जनक या जन्मदाता माना जाता है। समाजशास्त्र विषय का जनक मात्र इसीलिए नहीं कि उन्होंने इस नवीन विषय को प्रथमत: नाम प्रदान किया, अपितु इसलिए भी कि उन्होंने इस विज्ञान को 'विज्ञानों के संस्तरण' में तार्किक व उचित स्थान दिलवाने में तथा सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग की सम्भावना को जोरदार शब्दों में व्यक्त करने में भी सफलता प्राप्त की। इस इकाई का उद्देश्य समाजशास्त्र के अर्थ, प्रकृति, विषय-क्षेत्र की विवेचना करना है।
sociology in hindi
प्रथमतः कॉम्ट ने समाजशास्त्र को 'सामाजिक भौतिकशास्त्र' (Social Physics) कहा, परन्तु बाद में उन्होंने इसे 'समाजशास्त्र' नाम दिया तथा आज यह विषय इसी नाम से ही प्रचलित है। कॉम्ट ने 'समाजशास्त्र' शब्द का प्रयोग प्रथमत: 1838 ई० में किया। इस प्रकार, एक नवीन तथा संस्थागत विषय के रूप में इसका इतिहास लगभग 172 वर्षों का ही है। उन्होंने समाजशास्त्र को अत्यधिक आधुनिक विज्ञान मानते हुए इसे 'विज्ञानों की रानी' की संज्ञा दी। अमेरिका में यह एक पृथक् विज्ञान के रूप में 1876 ई० में, फ्रांस में 1889 ई० में तथा इंग्लैण्ड में 1907 ई० में प्रारम्भ हुआ। बाकी सभी देशों में यह विषय प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् आरम्भ हुआ। जॉन स्टुअर्ट मिल (John Stuart Mill) ने समाजशास्त्र के लिए 'इथोलोजी' (Ethology) शब्द का प्रयोग करने का सुझाव दिया था जोकि स्वीकार नहीं किया गया। इस इकाई का उद्देश्य, समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र तथा समाज कार्य से समाजशास्त्र के सम्बन्ध की विवेचना करना है।

प्रस्तावना

समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है। यह एक ऐसा विषय है जिसमें मानव समाज के विभिन्न स्वरूपों, उसकी विविध संरचनाओं, प्रक्रियाओं इत्यादि का वस्तुनिष्ठ एवं क्रमबद्ध रूप से अध्ययन किया जाता है। यह राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान एवं मानवशास्त्र की तरह एक सामाजिक विज्ञान है। यह अन्य विषयों की भाँति सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक रूप से परिपक्व व स्वतन्त्र विषय है। समाज का विज्ञान होने के नाते इस विषय की उत्पत्ति तभी से मानी जानी चाहिए जब से कि स्वयं समाज का निर्माण हुआ है और मनुष्य ने समाज के विभिन्न पहलुओं के बारे में चिन्तन प्रारम्भ किया है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है।
सामाजिक पहलुओं के अध्ययन की एक लम्बी परम्परा रही है, फिर भी समाजशास्त्र विषय का एक संस्थागत विषय के रूप में उद्भव एवं विकास 19वीं शताब्दी में हुआ। टी० बी० बॉटोमोर (T. B. Bottomore) ने अपनी पुस्तक 'समाजशास्त्र' का प्रारम्भ इन पंक्तियों से किया है, “हजारों वर्षों से लोगों ने उन समाजों एवं समूहों का अवलोकन एवं चिन्तन किया है जिसमें कि वे रहते हैं। फिर भी, समाजशास्त्र एक आधुनिक विज्ञान है तथा एक शताब्दी से अधिक पुराना नहीं है।” उनके इस कथन से इस तर्क की पुष्टि हो जाती है कि समाजशास्त्र एक नवीन विषय है। साथ ही इससे यह भी पता चल जाता है कि समाज में रहना एवं इसके बारे में चिन्तन करना तथा समाज का अध्ययन करना दो भिन्न बातें हैं। समाज में रहना ही यदि समाज का अध्ययन करना होता, तो समाजशास्त्र विषय एक अति प्राचीन विषय होता जोकि वास्तव में नहीं है। इसी भाँति, रोबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) का भी यही मत है कि, “समाजशास्त्र का अतीत तो बहुत लम्बा है, परन्तु इसका इतिहास संक्षिप्त है।"

समाजशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषाएँ

समाजशास्त्र समाज का क्रमबद्ध अध्ययन करने वाला विज्ञान है। 'समाजशास्त्र' शब्द अंग्रेजी भाषा के 'सोशियोलॉजी' (Sociology) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है जिसे दो भागों ‘सोशियो' ('Socio') तथा 'लोजी' ('Logy') में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम शब्द अर्थात् 'Socio' लैटिन भाषा के शब्द 'Socius' से तथा दूसरा शब्द अर्थात् 'Logy' ग्रीक भाषा के 'Logos' शब्द से बना है जिनका अर्थ क्रमश: 'समाज' तथा 'विज्ञान' या 'अध्ययन' है। अत: 'समाजशास्त्र' का शाब्दिक अर्थ 'समाज का विज्ञान' या 'समाज का अध्ययन' है। समाज का अर्थ सामाजिक सम्बन्धों के ताने-बाने से है, जबकि विज्ञान किसी भी विषय के व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ज्ञान को कहते हैं। दो भाषाओं से व्युत्पत्ति के कारण कुछ विद्वान् समाजशास्त्र को एक संकर (Hybrid) अथवा दोगला (Bastard) विज्ञान कहते हैं। समाजशास्त्र की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना एक कठिन कार्य है। विभिन्न विद्वानों ने इसकी परिभाषा भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से दी है। समाजशास्त्रियों द्वारा दी गई परिभाषाओं को हम निम्नलिखित पाँच प्रमुख श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं-

समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है
अधिकांश विद्वान् (यथा ओडम, वार्ड, जिसबर्ट, गिडिंग्स आदि) समाजशास्त्र को समाज के अध्ययन या समाज के विज्ञान के रूप में परिभाषित करते हैं। यही दृष्टिकोण अधिकांश प्रारम्भिक समाजशास्त्रियों का भी रहा है जिन्होंने समाज का समग्र के रूप में (अर्थात् इसे एक सम्पूर्ण इकाई मानकर) अध्ययन करने पर बल दिया है।
ओड़म (Odum) के अनुसार, “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो समाज का अध्ययन करता है।' वार्ड (Ward) के अनुसार, “समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।” जिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामान्यत: समाज के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया जाता है।" इसी भाँति, गिडिंग्स (Giddings) के अनुसार, "समाजशास्त्र समग्र रूप से समाज का क्रमबद्ध वर्णन तथा व्याख्या है।"
समाज के अध्ययन के रूप में दी गई समाजशास्त्र की उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि केवल 'समाजशास्त्र' का शाब्दिक अर्थ ही 'समाज का अध्ययन' या 'समाज का विज्ञान' नहीं है अपितु ओडम, वार्ड, जिसबर्ट तथा गिडिंग्स आदि विद्वानों ने इसकी परिभाषा देते समय भी समाज को इस विषय का मुख्य अध्ययनबिन्दु बताया है। समाज का अर्थ सामाजिक सम्बन्धों की एक व्यवस्था, जाल अथवा ताने-बाने से है। इससे किसी समूह के सदस्यों के बीच पाए जाने वाले पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों की जटिलता का बोध होता है। अन्य शब्दों में, जब सामाजिक सम्बन्धों की एक व्यवस्था पनपती है तभी हम उसे समाज कहते हैं। विज्ञान क्रमबद्ध ज्ञान या किसी तथ्य अथवा घटना से सम्बन्धित वस्तुनिष्ठ रूप से जानकारी प्राप्त करने का एक तरीका है। इसमें अवलोकन, परीक्षा, प्रयोग, वर्गीकरण तथा विश्लेषण द्वारा वास्तविकता को समझने का प्रयास किया जाता है। यह प्रघटना के पीछे छिपे तथ्य अथवा वास्तविकता को प्राप्त करने का एक मार्ग है। इस प्रकार, जब हम समाजशास्त्र को समाज का विज्ञान कहते हैं तो हमारा तात्पर्य ऐसे विषय से है जो समाज तथा इसके विभिन्न पहलुओं का क्रमबद्ध अध्ययन करता है।

समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन है
कुछ विद्वानों (यथा मैकाइवर एवं पेज, क्यूबर, रोज, सिमेल, ग्रीन आदि) ने समाजशास्त्र को सामाजिक सम्बन्धों के क्रमबद्ध अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है। सामाजिक सम्बन्धों से हमारा अभिप्राय दो अथवा दो से अधिक ऐसे व्यक्तियों के सम्बन्धों से है जिन्हें एक-दूसरे का आभास है तथा जो एक-दूसरे के लिए कुछ-नकुछ कार्य कर रहे हैं। यह जरूरी नहीं है कि सम्बन्ध मधुर तथा सहयोगात्मक ही हों, ये संघर्षात्मक या तनावपूर्ण भी हो सकते हैं। समाजशास्त्री इन दोनों तरह के सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं। सामाजिक सम्बन्ध उस परिस्थिति में पाए जाते हैं जिसमें कि दो या अधिक व्यक्ति, अथवा दो या अधिक समूह परस्पर अन्तक्रिया में भाग लें। सामाजिक सम्बन्ध तीन प्रकार के हो सकते हैं—प्रथम, व्यक्ति तथा व्यक्ति के बीच, द्वितीय, व्यक्ति तथा समूह के बीच तथा तृतीय, एक समूह और दूसरे समूह के बीच। पति-पत्नी, भाई-बहन, पिता-पुत्र के सम्बन्ध पहली श्रेणी के उदाहरण हैं। छात्रों का अध्यापक के साथ सम्बन्ध दूसरी श्रेणी का उदाहरण है। एक टीम का दूसरी टीम अथवा एक राजनीतिक दल का दूसरे राजनीतिक दल से सम्बन्ध तीसरी श्रेणी का उदाहरण है। मैकाइवर एंव पेज (Maclver and Page) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के विषय में है। सम्बन्धों के इस जाल को हम ‘समाज' कहते हैं।" क्यूबर (Cuber) के अनुसार, “समाजशास्त्र को मानव सम्बन्धों के वैज्ञानिक ज्ञान के ढाँचे के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।' रोज (Rose) के अनुसार, “समाजशास्त्र मानव सम्बन्धों का विज्ञान है।" सिमेल (Simmel) के अनुसार, “समाजशास्त्र मानवीय अन्तर्सम्बन्धों के स्वरूपों का विज्ञान है।" इसी भाँति, ग्रीन (Green) के अनुसार, “इस प्रकार समाजशास्त्र मनुष्य का उसके समस्त सामाजिक सम्बन्धों के रूप में समन्वय करने वाला और सामान्य अनुमान निकालने वाला विज्ञान है।"
सामाजिक सम्बन्धों के अध्ययन के रूप में समाजशास्त्र को परिभाषित करने वाली उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट पता चल जाता है कि समाजशास्त्र की मुख्य विषय-वस्तु व्यक्तियों में पाए जाने वाले सामाजिक सम्बन्ध हैं। इनके आधार पर ही समाज का निर्माण होता है। मैकाइवर एवं पेज का इस सन्दर्भ में यह कथन उचित ही लगता है कि समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों की श्रृंखला का अध्ययन करने वाला विषय है। ये सामाजिक सम्बन्ध विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं। इनमें जटिलताएँ भी हो सकती हैं और नवीन सामाजिक परिवेश के अनुसार इनके विभिन्न रूप भी हो सकते हैं। सामाजिक सम्बन्ध छिछले, अल्पजीवी अन्तक्रियाओं वाले (जैसे विदेश में दो भारतीयों का एक-दूसरे को अभिवादन करना) भी होते हैं और स्थायी अन्तक्रिया की प्रणालियों वाले (जैसे परिवार या घनिष्ठ मैत्री) भी। सामाजिक सम्बन्ध में भाग ले रहे लोग मित्रवत् भी हो सकते हैं और द्वेषपूर्ण भी। वे एक-दूसरे के साथ सहकार भी कर सकते हैं अथवा एक-दूसरे का संहार करने की कामना भी। विरोधी सेनाओं के बीच के सम्बन्ध (शत्रुतापूर्ण सम्बन्ध) भी सामाजिक सम्बन्ध ही हैं। अतः हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों की जटिल व्यवस्था का क्रमबद्ध और व्यवस्थित तरीके से अध्ययन करने वाला सामाजिक विज्ञान है।

समाजशास्त्र सामाजिक जीवन, घटनाओं, व्यवहार एवं कार्यों का अध्ययन है
कुछ विद्वानों (यथा ऑगबर्न एवं निमकॉफ, बेनेट एवं ट्यूमिन, किम्बल यंग, सोरोकिन आदि) ने समाजशास्त्र को सामाजिक जीवन, व्यक्तियों के व्यवहार एवं उनके कार्यों तथा सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है। ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।' बेनेट एवं ट्यूमिन (Beanet and Tumin) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक जीवन के ढाँचे और कार्यों का विज्ञान है।” यंग (Young) के अनुसार, “समाजशास्त्र समूहों में मनुष्यों के व्यवहार का अध्ययन करता है।" इसी भाँति, सोरोकिन (Sorokin) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं के सामान्य स्वरूपों, प्ररूपों और विभिन्न प्रकार के अन्तःसम्बन्धों का सामान्य विज्ञान है।"
उपर्युक्त विवेचन से हमें पता चलता है कि समाज का विज्ञान होने के नाते समाजशास्त्र, समाज के अन्य विज्ञानों (यथा राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, मानवशास्त्र आदि) से भिन्न है। इसमें हम सामाजिक जीवन का ही अध्ययन करते हैं। इसके साथ-ही-साथ सामाजिक व्यवहार एवं सामाजिक कार्यों का अध्ययन भी इस विषय को अन्य सामाजिक विज्ञानों से पृथक् करता है। सामाजिक व्यवहार का अर्थ ऐसा व्यवहार है जो अन्य व्यक्तियों के व्यवहार या उनकी प्रत्याशित अनुक्रिया को ध्यान में रखकर किया जाता है।

समाजशास्त्र सामाजिक समूहों का अध्ययन है
व्यक्ति समाज में अकेला नहीं रहता अपितु अन्य व्यक्तियों के साथ रहता है। वास्तव में, व्यक्ति का जीवन विभिन्न सामाजिक समूहों का सदस्य होने के कारण ही संगठित जीवन है। हेरी एम० जॉनसन (Harry M. Johnson) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक समूहों, उनके आन्तरिक स्वरूपों या संगठन के स्वरूपों, उन प्रक्रियाओं जो उस संगठन को बनाए रखती हैं या परिवर्तित करती हैं और समूहों के बीच पाए जाने वाले सम्बन्धों का अध्ययन करने वाला विज्ञान है।" जॉनसन की परिभाषा से हमें पता चलता है कि समाजशास्त्र सामाजिक समूहों, इनमें पाए जाने वाले संगठनों तथा इनसे सम्बन्धित प्रक्रियाओं का अध्ययन है। जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी लक्ष्य या उद्देश्य को पाने के लिए एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं या अन्तक्रिया करते हैं और इसके परिणामस्वरूप उनके मध्य सामाजिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं। तभी उन व्यक्तियों के संग्रह को समूह कहा जा सकता है। इस प्रकार समूह के तीन तत्त्व हो सकते हैं-प्रथम, दो या दो से अधिक व्यक्तियों का संग्रह, द्वितीय, उनमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्धों का होना तथा तृतीय, उनकी क्रियाओं का आधार सामान्य हित या उद्देश्य का होना।
सभी समूह सामाजिक सम्बन्धों के संकाय होते हैं। इस अर्थ में किसी भी समूह में उसके सदस्यों के बीच कुछ लक्ष्यों की प्राप्तियों के लिए आंशिक सहकार निहित रहता है। समूह के सहकारिता पक्ष का यह अर्थ नहीं कि इसके सदस्यों के बीच वैमनस्य हो ही नहीं सकता। एक समूह में प्रतिद्वन्द्विता और स्थायी घृणा का बाजार गर्म हो सकता है, जैसे कि कुछ परिवार होते हैं, लेकिन वह फिर भी समूह बना रहता है। उसके सदस्य भी यदा-कदा अपनी अन्तक्रियाओं में कतिपय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहकार करते रहते हैं। समाजशास्त्र व्यक्ति-व्यक्ति के परस्पर सम्बन्धों की अपेक्षा समूह-समूह के परस्पर सम्बन्धों (यथा एक जाति के दूसरी जातियों से सम्बन्ध तथा एक वर्ग के दूसरे वर्गों से सम्बन्ध) को अधिक महत्त्व देता है।

समाजशास्त्र अन्तक्रियाओं का अध्ययन है
मानव एक सामाजिक प्राणी है। वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भर है अत: यह स्वाभाविक ही है कि इन आवश्यकताओं की पूर्ति के दौरान उनमें परस्पर सम्बन्ध, सहयोग तथा अन्तक्रियाएँ हों।
व्यक्तियों की सामाजिक क्रियाओं एवं अन्तक्रियाओं का अध्ययन समाजशास्त्र में किया जाता है। सभी क्रियाएँ सामाजिक नहीं होतीं, वही क्रियाएँ सामाजिक होती हैं जो अर्थपूर्ण होती हैं, इस नाते वे अन्य व्यक्तियों द्वारा समझी जा सकती हैं, सामाजिक नियमों द्वारा प्रभावित होती हैं और जिनका निर्धारण समाज अथवा समूह द्वारा किया जाता है। वेबर (Weber) के अनुसार, “समाजशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जो सामाजिक क्रिया का निर्वचनात्मक अर्थ व्यक्त करने का प्रयत्न करता है ताकि इसकी गतिविधि तथा परिणामों की कारण सहित विवेचना की जा सके।” गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “समाजशास्त्र को विस्तृत अर्थ में जीवित प्राणियों के एक-दूसरे के सम्पर्क में आने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली अन्तक्रियाओं का अध्ययन कहा जा सकता है।" इसी भाँति, जिन्सबर्ग (Ginsberg) के अनुसार- “समाजशास्त्र मानवीय अन्तक्रियाओं, अन्तर्सम्बन्धों, उनकी दशाओं और परिणामों का अध्ययन है।" 
सामाजिक अन्तक्रियाएँ (Social interactions) ही समाज की मूलाधार हैं। लूमले (Lumley) ने इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए बड़े सुन्दर शब्दों में लिखा है कि, “सम्पर्क तथा अन्तक्रियाएँ हमारे जीवन की आधारशिला हैं; वास्तव में, यही वे चीजें हैं जिन्हें हम सामाजिक अर्थ में समझते हैं; ये समाज के लिए उसी प्रकार से हैं जिस प्रकार से इमारतों के लिए ईंट और चूना होते हैं।' बीसेन्ज एवं बीसेन्ज (Biesanz and Biesanz) ने भी इसी अर्थ को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि, “समाज की जड़ें सामाजिक अन्तक्रियाओं में ही हैं।" समाज का जन्म ही अन्तक्रियाओं के माध्यम से होता है।

सामाजिक अन्तक्रिया दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच होने वाली अर्थपूर्ण क्रिया को कहते हैं। स्पष्ट है कि सामाजिक अन्तक्रिया का विश्लेषण करते समय हम क्रिया के कर्ता (Subject) और कर्म (Object) दोनों को
सामने रखते हैं। यह वह क्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति या समूह एक-दूसरे को परस्पर रूप से प्रभावित करते हैं।

डासन एवं गेटिस (Dawson and Gettys) ने अन्तक्रिया को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि, “सामाजिक अन्तक्रिया वह प्रक्रिया होती है जिसके द्वारा मनुष्य एक-दूसरे के मस्तिष्क में अन्तः प्रवेश करते हैं।" इसे हम शतरंज के खेल की स्थिति से समझ सकते हैं। जहाँ शतरंज के मोहरे की प्रत्येक चाल को खेलने वाले खिलाड़ी एक-दूसरे का इरादा समझने का प्रयास करते हैं और एक-दूसरे की चाल से प्रभावित होकर अपनी चाल का निर्धारण करते हैं। सामाजिक अन्तक्रियाओं के प्रमुख स्तर इस प्रकार हैं-व्यक्ति की व्यक्ति से अन्तक्रिया, व्यक्ति की समूह से अन्तक्रिया, समूह की समूह से अन्तक्रिया तथा समूह की व्यक्ति से अन्तर्किया। प्रमुख विद्वानों द्वारा विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर समाजशास्त्र की जो परिभाषाएँ दी गई हैं उनसे स्पष्ट ज्ञात होता है कि समाजशास्त्र मुख्य रूप से समाज, सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक जीवन, सामाजिक घटनाओं, व्यक्तियों के व्यवहार एवं कार्यों, सामाजिक समूहों एवं सामाजिक अन्तक्रियाओं का अध्ययन करने वाला विषय है। यह एक आधुनिक विज्ञान है। इसमें मानव व्यवहार के प्रतिमानों और नियमितताओं पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इसमें व्यक्तियों, उनके समूहों तथा श्रेणियों के बारे में सामान्य नियम निर्धारित किए जाते हैं। वास्तव में, समाजशास्त्रियों की रुचि उन सभी बातों के अध्ययन में है जोकि एक-दूसरे के साथ अन्तक्रिया के दौरान घटित होती हैं। उदाहरणार्थ-व्यक्ति किसी विशेष प्रकार का व्यवहार क्यों करते हैं? वे समूहों का निर्माण क्यों करते हैं? वे युद्ध अथवा संघर्ष क्यों करते हैं? वे पूजा क्यों करते हैं? वे विवाह क्यों करते हैं? वे वोट क्यों डालते हैं? ऐसे अनगिनत प्रश्नों का उत्तर इसी विषय में खोजने का प्रयास किया जाता है। स्मेलसर (एसी) ने उचित ही लिखा है कि, “संक्षेप में, समाजशास्त्र को सामाजिक सम्बन्धों, संस्थाओं तथा समाज के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।"

समाज के क्रमबद्ध ज्ञान एवं सामान्य बौद्धिक ज्ञान में अन्तर
समाजशास्त्र में समाज का क्रमबद्ध (विधिवत्) अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन एक विशिष्ट परिप्रेक्ष्य या चिन्तन द्वारा किया जाता है जिसे समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य या चिन्तन कहते हैं। यह चिन्तन सामान्य बौद्धिक ज्ञान से भिन्न होता है। सामान्य बौद्धिक ज्ञान में दार्शनिक एवं धार्मिक अनुचिन्तन सम्मिलित किया जाता है। उदाहरणार्थहम अपने दैनिक जीवन में बहुत-सी बातों एवं घटनाओं को देखते हैं परन्तु उनके बारे में वैज्ञानिक चिन्तन नहीं करते अर्थात् उनका क्रमबद्ध वर्णन करने का प्रयास नहीं करते। यदि हम किसी भिखारी को चौराहे या सार्वजनिक स्थल पर भीख माँगते हुए देखते हैं तो सामान्य बौद्धिक ज्ञान से यह सोच लेते हैं कि वह शायद गरीब है इसलिए भीख माँग रहा है। यदि इसी को हम समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो हमारा चिन्तन पूर्णतया अलग होगा। हमारी सोच के प्रमुख बिन्दु इस प्रकार होंगे-क्या सभी गरीब भिक्षा माँगने पर विवश होते हैं? यदि नहीं तो, केवल कुछ व्यक्ति ही भिक्षावृत्ति क्यों करते हैं? भिक्षावृत्ति एक राष्ट्रीय समस्या क्यों है? गरीबी के अतिरिक्त भिक्षावृत्ति के क्या कारण हैं? क्या इस समस्या के कारणों का पता लगाकर इसका निराकरण करना सम्भव है? भिक्षावृत्ति जनहित का मुद्दा क्यों है? सरकार भिक्षावृत्ति के निवारण के लिए क्या प्रयास कर रही है? समाज का क्रमबद्ध चिन्तन व्यक्तियों में जिस दृष्टिकोण को विकसित करता है उसी को
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण या चिन्तन कहते हैं। यह चिन्तन हमें भिक्षावृत्ति के इतिहास, भिखारियों की जीवन दशाओं, उनके सामाजिक-आर्थिक कारणों तथा इस समस्या के समाधान की खोज करने की उत्सुकता से भर देता है।
समाज का क्रमबद्ध अध्ययन रोजमर्रा के सामान्य प्रेक्षण से भी भिन्न है। रोजमर्रा की घटनाएँ व्यक्तियों में समाजशास्त्रीय सोच विकसित नहीं करतीं। हम बहुत-सी घटनाओं को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। उदाहरणार्थ, अपने पड़ोस में एक कामकाजी महिला को अपने पति, सास-ससुर या अन्य सदस्य से झगड़ते हुए देखकर हम सोच लेते हैं कि अमुक महिला ही ऐसी है। यदि इसी को हम समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य की दृष्टि से देखें तो हमारे सामने कामकाजी महिलाओं से सम्बन्धित अनेक मुद्दे सामने आ जाएँगे। कामकाजी महिलाएँ ही ऐसा क्यों करती हैं? क्या बिना कामकाजी महिलाओं वाले परिवारों में भी ऐसा होता है? क्या आस-पड़ोस में कोई ऐसा परिवार भी है जिसमें कामकाजी महिला का अपने परिवार के सदस्यों से किसी प्रकार का मतभेद नहीं है तथा सभी सदस्य उसके पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने में सहयोग देते हैं?

समाजशास्त्र की प्रकृति

क्या समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जा सकता है या नहीं? यह प्रश्न समाजशास्त्र की स्थिति या प्रकृति से सम्बन्धित प्रश्न है अर्थात् इसका सम्बन्ध इस तथ्य का पता लगाना है कि क्या समाजशास्त्र विज्ञान है या नहीं? यदि यह एक विज्ञान है तो इसमें वैज्ञानिक पद्धति की कौन-सी विशेषताएँ पाई जाती हैं और यदि यह विज्ञान नहीं है तो इसमें कौन-सी ऐसी आपत्तियाँ हैं जिनके आधार पर इसे विज्ञान नहीं कहा जा सकता है। इस प्रश्न के बारे में विद्वानों में मतैक्य का अभाव पाया जाता है। प्रमुख रूप से हमारे सामने दो दृष्टिकोण रखे गए हैं—समाजशास्त्र एक विज्ञान है तथा समाजशास्त्र विज्ञान नहीं है।
प्रथम दृष्टिकोण में इस बात पर बल दिया जाता है कि समाजशास्त्र अन्य विज्ञानों की तरह ही एक विज्ञान है तथा समाज, सामाजिक प्रघटनाओं एवं सामाजिक पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सकता है। दूसरे दृष्टिकोण के समर्थक इस बात पर बल देते हैं कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति एवं सामाजिक व्यवहार इतना जटिल है कि इनका वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव नहीं है। अत: समाजशास्त्र को एक विज्ञान नहीं कहा जा सकता। इन दोनों दृष्टिकोणों के समर्थकों ने अपने-अपने दृष्टिकोणों की पुष्टि करने के लिए अनेक तर्क दिए हैं जिनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है-

समाजशास्त्र विज्ञान के रूप में
समाजशास्त्र में विज्ञान की निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं-
  1. समाजशास्त्र में सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक अन्तक्रियाओं, सामाजिक व्यवहार एवं समाज का अध्ययन कल्पना के आधार पर नहीं किया जाता अपितु इनको वास्तविक रूप से वैज्ञानिक पद्धति द्वारा समझने का प्रयास किया जाता है। वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ही उपकल्पनाओं का परीक्षण एवं सामाजिक नियमों या सिद्धान्तों का निर्माण किया जाता है। 
  2. समाजशास्त्रीय ज्ञान प्रमाण पर आधारित है क्योंकि समाजशास्त्री किसी बात को बलपूर्वक मानने के लिए नहीं कहते अपितु तर्क एवं प्रमाणों के आधार पर इसकी व्याख्या करते हैं।
  3. समाजशास्त्र तथ्यों का यथार्थ रूप से वर्णन ही नहीं करता अपितु इनकी व्याख्या भी करता है। इसमें प्राप्त तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर या आदर्श एवं कल्पना से मिश्रित करके प्रस्तुत नहीं किया जाता अपितु वास्तविक घटनाओं (जिस रूप में वे विद्यमान हैं) का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।
  4. समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति द्वारा एकत्र आँकड़ों को व्यवस्थित करने के लिए उनका वैज्ञानिक वर्गीकरण किया जाता है तथा तर्क के आधार पर निर्वचन करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं। क्योंकि तथ्यों का वर्गीकरण, उनके क्रम का ज्ञान व सापेक्षिक महत्त्व का पता लगाना ही विज्ञान है और इन सब बातों को हम समाजशास्त्रीय विश्लेषणों में स्पष्ट देख सकते हैं, अतः समाजशास्त्र एक विज्ञान है।
  5. समाजशास्त्र अपनी विषय-वस्तु में कार्य-कारण सम्बन्धों की खोज करता है अर्थात् इसका उद्देश्य विभिन्न सामाजिक घटनाओं के बारे में आँकड़े एकत्र करना ही नहीं है अपितु उनके कार्य-कारण सम्बन्धों एवं परिणामों का पता लगाना भी है। प्राकृतिक विज्ञानों में कार्य-कारण सम्बन्धों का निरीक्षण प्रयोगशाला में किया जाता है परन्तु समाजशास्त्र में यह अप्रत्यक्ष प्रयोगात्मक पद्धति अर्थात् तुलनात्मक पद्धति द्वारा ही सम्भव है।
  6. समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति द्वारा अध्ययन किए जाते हैं तथा सामाजिक वास्तविकता को समझने का प्रयास किया जाता है। इसीलिए इसमें सामान्यीकरण करने एवं सिद्धान्तों का निर्माण करने के प्रयास भी किए गए हैं, यद्यपि एक आधुनिक विषय होने के कारण इनमें अधिक सफलता नहीं मिल पाई है।
  7. विज्ञान के लिए यह आवश्यक है कि उसके द्वारा प्रतिपादित नियमों का पुनर्परीक्षण हो सके और इस कसौटी पर समाजशास्त्र खरा उतरता है। जब किसी समाजशास्त्री द्वारा सिद्धान्त या नियम प्रतिपादित किए जाते हैं तो अन्य लोग उसे तर्क के आधार पर समझने एवं प्रमाणों के आधार पर उनकी पुनर्परीक्षा करने का प्रयास करते हैं।
  8. समाजशास्त्र में क्या है' के वैज्ञानिक पद्धति द्वारा अध्ययन के आधार पर यह बतलाया जा सकता है कि 'क्या होगा। समाजशास्त्र में क्योंकि कार्य-कारण सम्बन्धों की खोज-सम्भव है, अत: उसके आधार पर एक समाजशास्त्री भविष्यवाणी कर सकता है।
कुछ विद्वानों का विचार है कि समाजशास्त्र एक विज्ञान नहीं है क्योंकि इसमें वस्तुनिष्ठता का अभाव पाया जाता है। साथ ही, इस बात पर भी बल दिया जाता है कि सामाजिक घटनाओं तथा व्यवहार की जटिलता एवं परिवर्तनशीलता, मापने की समस्या, प्रयोगशाला की कमी, अमूर्तता, भविष्यवाणी करने में असमर्थता, सामाजिक घटनाओं, मानवीय क्रियाओं एवं व्यवहार की स्वतन्त्रता तथा अनिश्चितता आदि समाजशास्त्रीय अध्ययनों में वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग में अवरोधक हैं। आधुनिक समाजशास्त्री इन आरोपों को अस्वीकार करते हैं तथा इस बात पर बल देते हैं कि समाजशास्त्र निश्चित रूप से एक विज्ञान है। उदाहरणार्थ, आधुनिक समाजशास्त्री यद्यपि यह तो स्वीकार करते हैं कि सामाजिक अध्ययन प्राकृतिक एवं भौतिक विज्ञानों की तरह वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकते, परन्तु यह मानने को तैयार नहीं हैं कि सामाजिक घटनाओं एवं व्यवहार का वस्तुनिष्ठ रूप में अध्ययन किया ही नहीं जा सकता। समस्या का चयन जरूर व्यक्ति की रुचि से प्रभावित हो सकता है, परन्तु मैक्स वेबर (Max Weber) जैसे विद्वानों ने इस बात पर बल दिया है कि समस्या के चयन के पश्चात् सामाजिक अनुसन्धान के सभी चरणों में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जा सकता है और वस्तुनिष्ठता बनाए रखी जा सकती है। अत: यह आरोप अधिक उचित एवं तार्किक प्रतीत नहीं होता। इसी भाँति, आधुनिक समाजशास्त्री यद्यपि यह तो स्वीकार करते हैं कि सामाजिक घटनाओं एवं व्यवहार की प्रकृति जटिल एवं परिवर्तनशील होती है परन्तु वह इतनी जटिल नहीं है कि इन्हें समझा ही न जा सके। यदि हमारा व्यवहार इतना जटिल होता जितना कि आलोचकों का कहना है तो हमें यह तक पता नहीं होता कि अगले पल हमें क्या करना है। परन्तु इसके विपरीत मानवीय व्यवहार में कुछ नियमितताएँ पाई जाती हैं जो इस बात की ओर संकेत करती हैं कि इसे समझा जा सकता है। अत: यह आरोप भी न्यायोचित प्रतीत नहीं होता। जहाँ तक प्रयोगशाला का प्रश्न है, समाज ही समाजशास्त्र की प्रयोगशाला है। समाजशास्त्र की विषय-वस्तु समाज है तथा इसके अन्तर्गत ऐसे विषयों का अध्ययन होता है जिन्हें यदि प्रयोगशाला में किया जाए तो उनमें कृत्रिमता आ जाएगी और वैज्ञानिकता समाप्त हो जाएगी। समाजशास्त्र भविष्यवाणी करने में भी सक्षम है।
हेरी एम० जॉनसन (Harry M. Johnson) जैसे विद्वानों का कहना है कि विज्ञान क्या है और क्या नहीं है? यह एक बहुधा निष्फल विवाद का विषय है इसलिए कि विज्ञान और अविज्ञान में अन्तर केवल कुछ अंशों का है। अतः हम कह सकते हैं कि यद्यपि समाजशास्त्र एक विज्ञान है परन्तु भविष्यवाणी करने तथा सिद्धान्तों का निर्माण करने की दृष्टि से यह अन्य विज्ञानों, विशेष रूप से प्राकृतिक विज्ञानों, से अभी काफी पीछे है। रोबर्ट बीरस्टीड(Robert Bierstedt) का कहना है कि समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति वैज्ञानिक है।
इसे उन्होंने निम्नांकित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया है-
  1. समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है, प्राकृतिक विज्ञान नहीं समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है क्योंकि इसकी विषय-वस्तु मौलिक रूप से सामाजिक है अर्थात् इसमें समाज, सामाजिक घटनाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक सम्बन्धों तथा अन्य सामाजिक पहलुओं एवं तथ्यों का अध्ययन किया जाता है। प्रत्यक्ष रूप से इसका प्राकृतिक या भौतिक वस्तुओं से कोई सम्बन्ध नहीं है अत: यह प्राकृतिक विज्ञान नहीं है। समाजशास्त्र स्वयं सम्पूर्ण सामाजिक विज्ञान नहीं है अपितु सामाजिक विज्ञानों में से एक विज्ञान है।
  2. समाजशास्त्र एक वास्तविक (निश्चयात्मक) विज्ञान है, आदर्शात्मक विज्ञान नहीं—समाजशास्त्र वास्तविक घटनाओं का अध्ययन, जिस रूप में वे विद्यमान हैं, करता है तथा विश्लेषण में किसी आदर्श को प्रस्तुत नहीं करता या अध्ययन के समय किसी आदर्शात्मक दृष्टिकोण को नहीं अपनाया जाता। अत: यह एक वास्तविक विज्ञान है, आदर्शात्मक नहीं। अवलोकन प्रविधि द्वारा आँकड़ों के संकलन तथा कार्य-कारण सम्बन्धों के अध्ययन पर बल देने के कारण भी यह एक वास्तविक विज्ञान है। समाजशास्त्र इस बात का अध्ययन नहीं करता कि क्या होना चाहिए अपितु इस बात का अध्ययन करता है कि वास्तविक स्थिति क्या है।
  3. समाजशास्त्र अमूर्त विज्ञान है, मूर्त विज्ञान नहीं—अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह समाजशास्त्र एक अमूर्त विज्ञान है क्योंकि इसकी विषय-वस्तु; जैसे समाज, सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक संस्थाओं, प्रथाओं, विश्वासों इत्यादि को देखा या छुआ नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए, संस्थाओं को हाथ में लेकर नहीं देखा जा सकता और न ही प्रथाओं को तराजू में तोला जा सकता है। समाज भी अमूर्त है
  4. क्योंकि इसे सामाजिक सम्बन्धों (जोकि स्वयं अमूर्त हैं) का ताना-बाना माना गया है। अत: समाजशास्त्र एक अमूर्त विज्ञान है, मूर्त नहीं। रोबर्ट बीरस्टीड का कहना है कि समाजशास्त्र मानवीय घटनाओं के मूर्त प्रदर्शन में विश्वास न रखकर उन स्वरूपों और प्रतिमानों को मान्यता देता है जो घटना-विशेष से सम्बन्धित होती हैं।
  5. समाजशास्त्र एक विशुद्ध विज्ञान है, व्यावहारिक विज्ञान नहीं समाजशास्त्र विशुद्ध विज्ञान है क्योंकि इसका प्रमुख उद्देश्य मानव समाज से सम्बन्धित सामाजिक घटनाओं का अध्ययन, विश्लेषण एवं निरूपण कर ज्ञान का संग्रह करना है। विशुद्ध विज्ञान क्योकि सैद्धान्तिक होता है इसीलिए इसके द्वारा संचित ज्ञान अनिवार्य रूप से व्यावहारिक उपयोग में नहीं लाया जा सकता। रोबर्ट बीरस्टीड ने स्पष्ट कर दिया है कि इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजशास्त्र व्यर्थ या अव्यावहारिक विज्ञान है, परन्तु समाजशास्त्र की इसमें कोई रुचि नहीं कि प्राप्त ज्ञान का प्रयोग व्यावहारिक क्षेत्रों पर कैसे लागू किया जाता है।
  6. समाजशास्त्र सामान्य विज्ञान है, विशेष विज्ञान नहीं अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह समाजशास्त्र भी घटनाओं का अध्ययन करके सामान्यीकरण करने या सामान्य नियमों का निर्माण करने का प्रयास करता है। अधिकांश समाजशास्त्रियों की यह मान्यता है कि समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है क्योंकि इसमें सामाजिक जीवन की सामान्य घटनाओं का ही अध्ययन किया जाता है। दुर्खीम (Durkheim), हॉबहाउस (Hobhouse) तथा सोरोकिन (Sorokin) जैसे विद्वानों ने इसे सामान्य विज्ञान माना है।
  7. समाजशास्त्र तार्किक तथा आनुभविक विज्ञान है—समाजशास्त्र एक तार्किक विज्ञान है क्योंकि इसमें सामाजिक घटनाओं एवं तथ्यों की तार्किक व्याख्या देने का प्रयास किया जाता है। साथ ही, क्योंकि इसमें अध्ययन अनुसन्धान-क्षेत्र में जाकर किया जाता है पुस्तकालय में बैठकर नहीं, अत: यह अनुभवाश्रित भी है। समाजशास्त्र तर्क के आधार पर वास्तविक घटनाओं का अध्ययन करता है, परन्तु फिर भी अनुभव के आधार पर कम उपयोगी तथ्यों की पूरी तरह से अवहेलना नहीं करता।
समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति के बारे में रोबर्ट बीरस्टीड द्वारा बताई गई विशेषताओं से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र एक ऐसा सामाजिक विज्ञान है जो निरपेक्ष, वास्तविक, विशुद्ध, अमूर्त और सामान्य होने के साथ-साथ तार्किक तथा अनुभवाश्रित भी है। यह प्राकृतिक विज्ञान, विशेष विज्ञान, व्यावहारिक विज्ञान, आदर्शात्मक विज्ञान तथा मूर्त विज्ञान नहीं है।

समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र

प्राय: कुछ लोग विषय-क्षेत्र (Scope) तथा विषय-वस्तु (Subject-matter) को एक ही समझ लेते हैं जबकि दोनों में पर्याप्त अन्तर है। विषय-क्षेत्र का तात्पर्य वे सम्भावित सीमाएँ हैं जहाँ तक किसी विषय का अध्ययन सम्भव होता है, जबकि विषय-वस्तु वे निश्चित सीमाएँ हैं जिनके अन्तर्गत अध्ययन किया जा सकता है। प्रत्येक सामाजिक विज्ञान व्यक्तियों के सामाजिक जीवन को तथा विभिन्न घटनाओं को अपने अपने दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करता है। उदाहरणार्थ, अर्थशास्त्र आर्थिक दृष्टिकोण से, राजनीतिशास्त्र राजनीतिक दृष्टिकोण से, मनोविज्ञान मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से तथा समाजशास्त्र सामाजिक दृष्टिकोण से घटनाओं का अध्ययन करते हैं। विभिन्न दृष्टिकोण होने के बावजूद किसी भी सामाजिक विज्ञान का विषय-क्षेत्र निर्धारित करना एक कठिन कार्य है। एक आधुनिक विज्ञान होने के नाते समाजशास्त्र में यह कठिनाई अन्य विज्ञानों की अपेक्षा कहीं अधिक है। कालबर्टन (Calberton) के अनुसार समाजशास्त्र क्योंकि लचीला विज्ञान है अत: यह निश्चित करना पूर्ण रूप से कठिन कार्य है कि इसकी सीमा कहाँ से प्रारम्भ होती है, कहाँ समाजशास्त्र मनोविज्ञान तथा कहाँ मनोविज्ञान समाजशास्त्र बन जाता है अथवा जैविक सिद्धान्त समाजशास्त्रीय सिद्धान्त बन जाता है। समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र के बारे में प्रमुख विद्वान एकमत नहीं हैं। इसके बारे में हमारे सामने निम्नांकित दो प्रमुख परिप्रेक्ष्य, दृष्टिकोण (या सम्प्रदाय) प्रस्तुत किए गए हैं-

स्वरूपात्मक अथवा विशिष्टवादी सम्प्रदाय
इस सम्प्रदाय के प्रमुख प्रणेता तथा समर्थक जॉर्ज सिमेल, स्माल, वीरकान्त, मैक्स वेबर, वॉन वीज आदि विद्वान् हैं। इन विद्वानों के दृष्टिकोण में समाजशास्त्र स्वतन्त्र, विशिष्ट तथा शुद्ध विज्ञान है। इसका प्रमुख लक्ष्य मानवीय सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन करना है। इस सम्प्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की तुलना में पृथक् अस्तित्व रखता है। अन्य सामाजिक विज्ञान वही अध्ययन नहीं करते हैं जो समाजशास्त्र करता है। दूसरे सामाजिक विज्ञानों के अध्ययन का लक्ष्य अन्तर्वस्तु (Content) को समझना है, जबकि समाजशास्त्र स्वरूपों (Forms) का अध्ययन करता है। इन विद्वानों ने स्वरूपात्मक पक्ष को अत्यधिक महत्त्व दिया है। इसी कारण, इस सम्प्रदाय का नाम स्वरूपात्मक सम्प्रदाय पड़ा है। स्वरूपात्मक सम्प्रदाय को स्पष्ट रूप से जानने के लिए इसके प्रमुख समर्थकों के विचार प्रस्तुत हैं-

सिमेल
जॉर्ज सिमेल के दृष्टिकोण में स्वरूपों तथा अन्तर्वस्तु का पृथक्-पृथक् अस्तित्व है। इन्होंने सामाजिक सम्बन्धों को भी दो वर्गों में बाँटा है-(i) स्वरूप तथा (ii) अन्तर्वस्तु। सिमेल यह मानते हैं कि सामाजिक सम्बन्धों का स्वरूप होता है और इसी स्वरूप का अध्ययन समाजशास्त्र में किया जाना चाहिए। दूसरे सामाजिक विज्ञान अन्तर्वस्तु का अध्ययन करते हैं।

स्माल
स्माल यह मानते हैं कि समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों का विशिष्ट अध्ययन है। इनका मत जॉर्ज सिमेल के मत से मिलता-जुलता है। उनका कहना है कि समाजशास्त्र का कार्य सामाजिक सम्बन्धों और व्यवहारों या क्रियाओं के मूल रूप का विशिष्ट अध्ययन करना मात्र है, न कि समाज में होने वाली प्रत्येक घटना अथवा क्रिया का।

वीरकान्त
वीरकान्त भी समाजशास्त्र को विशिष्ट विज्ञान मानते हैं। इनके अनुसार समाजशास्त्र को मानसिक सम्बन्धों के उन स्वरूपों का अध्ययन करना चाहिए जो एक-दूसरे को बाँधते हैं। वीरकान्त के अनुसार ये मानसिक सम्बन्ध प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, ममता, सम्मान आदि में व्यक्त होते हैं।

वेबर
मैक्स वेबर समाजशास्त्र के क्षेत्र को निश्चित व स्पष्ट करने के पक्ष में थे। इनके अनुसार समाजशास्त्र का उद्देश्य सामाजिक व्यवहार का विवेचन करना तथा समझना है। इसका अर्थ यह हुआ कि सभी प्रकार के व्यवहार सामाजिक नहीं होते हैं। इसलिए आवश्यक है कि समाजशास्त्र सामाजिक क्रिया का अध्ययन करे। सामाजिक क्रिया वह क्रिया है जो समाज के अन्य सदस्यों से प्रभावित होती है। प्रत्येक सामाजिक क्रिया में कुछ अर्थ निहित होता है। इस कारण समाजशास्त्र को सामाजिक क्रिया का अध्ययन करना चाहिए।

वॉन वीज
वॉन वीज समाजशास्त्र के क्षेत्र को अधिक संकुचित करते हुए कहते हैं कि इसका क्षेत्र केवल सामाजिक सम्बन्धों के अध्ययन तक ही सीमित रहना चाहिए।

स्वरूपात्मक सम्प्रदाय की आलोचना अनेक विद्वानों ने स्वरूपात्मक सम्प्रदाय की आलोचना की है। आलोचना के प्रमुख आधार इस प्रकार हैं-
  • मानवीय सम्बन्धों के स्वरूपों और अन्तर्वस्तुओं की पृथक्-पृथक् कल्पना भ्रमपूर्ण है। सामाजिक घटनाओं की अन्तर्वस्तु में परिवर्तन के साथ-साथ स्वरूप में भी परिवर्तन हो जाता है। सोरोकिन (Sorokin) ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि, "हम एक गिलास को उसके स्वरूप को बदले बिना शराब, पानी और शक्कर से भर सकते हैं, परन्तु मैं किसी ऐसी सामाजिक संस्था की कल्पना भी नहीं कर सकता जिसका स्वरूप सदस्यों के बदलने पर भी न बदले।”
  • यह दावा करना निराधार है कि सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन किसी भी अन्य सामाजिक विज्ञान के द्वारा नहीं किया जाता। उदाहरणार्थ, विधि विज्ञान (Science of Law) में सामाजिक सम्बन्धों के अनेक स्वरूपों; जैसे सत्ता, संघर्ष, स्वामित्व आदि का स्पष्ट रूप से अध्ययन किया जाता है।
  • इस सम्प्रदाय ने समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को अन्य विज्ञानों से पूर्णत: अलग कर प्रस्तुत किया है। वास्तव में, प्रत्येक विज्ञान को, यहाँ तक कि प्राकृतिक विज्ञान को भी, दूसरे विज्ञानों से सहायता लेना आवश्यक होता है।
  • इस सम्प्रदाय ने अमूर्तता पर जो ज्यादा जोर दिया है वह अवैज्ञानिक है। इस सम्बन्ध में राइट (Wright) ने ठीक ही लिखा है कि यदि सामाजिक सम्बन्धों का सूक्ष्म एवं अमूर्त रूप में अध्ययन किया जाए तो यह समाजशास्त्र के लिए लाभदायक नहीं होगा।

समन्वयात्मक सम्प्रदाय
इस सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक दुर्खीम, लेस्टर वार्ड, सोरोकिन, हॉबहाउस आदि हैं। इस सम्प्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र विशिष्ट विज्ञान न होकर एक सामान्य विज्ञान है। समाज का प्रत्येक भाग परस्पर सम्बन्धित है। यदि उसके किसी एक भाग में परिवर्तन होता है तो उसका प्रभाव सारे समाज पर पड़ता है, अतएव सारे समाज का अध्ययन करना आवश्यक है। इस अध्ययन को अन्य सामाजिक विज्ञान; जैसे अर्थशास्त्र (आर्थिक जीवन का अध्ययन) तथा राजनीतिशास्त्र (राजनीतिक जीवन का अध्ययन) आदि; अधिक समृद्ध बना सकते हैं। सामाजिक जीवन न केवल आर्थिक और राजनीतिक पक्ष पर ही आधारित है अपितु इन अन्तर्सम्बन्धों से सामाजिक जीवन में पूर्णता भी आती है। इसलिए समाजशास्त्र को इन अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करके सम्पूर्ण सामाजिक जीवन का सामान्य ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। इन विद्वानों के मतानुसार समाजशास्त्र समाज के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि समस्त पक्षों का अध्ययन और विवेचन करने वाला विज्ञान है। इसी आधार पर इस सम्प्रदाय को समन्वयात्मक सम्प्रदाय कहा जाता है। समन्वयात्मक सम्प्रदाय को अधिक स्पष्ट जानने के लिए इसके समर्थक विद्वानों के विचार निम्नांकित हैं-

दुर्खीम
इमाइल दुर्खीम ने समाजशास्त्र को परिभाषित करते हुए कहा है कि, “समाजशास्त्र सामूहिक प्रतिनिधित्वों (प्रतिनिधानों) का विज्ञान है।" प्रत्येक समाज में कुछ ऐसे विचार, धारणाएँ और भावनाएँ होती हैं, जोकि सामाजिक अन्तक्रिया के समय व्यक्तिगत चेतना के पारस्परिक प्रभावों के कारण स्पष्ट हो जाती हैं और जीवन में सामने आने लगती हैं। इसी कारण समाज के अधिकांश सदस्य उसे अपना लेते हैं और इनका विकास सामाजिक प्रतीकों के रूप में हो जाता है। चूँकि इन प्रतीकों को समाज के अधिकांश सदस्य मानते हैं, इसलिए ये सामूहिक रूप से समस्त समूह के विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं। समाजशास्त्र को सामूहिक प्रतिनिधित्वों को अपने विषय-क्षेत्र में सम्मिलित करना चाहिए।

वार्ड
लेस्टर वार्ड का विचार है कि जिस प्रकार रसायनशास्त्र में दो वस्तुओं को मिला देने से एक नई बस्तु का जन्म होता है और उसका अध्ययन रसायनशास्त्र करता है, उसी प्रकार समाजशास्त्र ज्ञान की विभिन्न शाखाओं का समन्वय-मात्र है। समाज का निर्माण करने वाले समूह एवं संस्थाएँ आदि परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं जिसके कारण एक में हुआ परिवर्तन दूसरों पर प्रभाव डालता है। इसी प्रकार समाजशास्त्र का आधार, अन्य सामाजिक विज्ञानों के परिणाम हैं। अतएव समाजशास्त्र को विभिन्न सामाजिक विज्ञानों से प्राप्त केन्द्रीय विचारों का समन्वय एवं अध्ययन करना चाहिए।

सोरोकिन
पिटिरिम सोरोकिन ने समन्वयात्मक आधार पर समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को समझाने का प्रयत्न किया है। समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र पर सोरोकिन ने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि, “यदि सामाजिक घटनाओं को वर्गों में विभाजित किया जाए और विशेष सामाजिक विज्ञान प्रत्येक वर्ग का अध्ययन करे तो इन विशेष सामाजिक विज्ञानों के अलावा एक ऐसे विज्ञान की आवश्यकता होगी जो सामान्य एवं विभिन्न विज्ञानों के सम्बन्धों का अध्ययन करे।” सोरोकिन का विचार है कि प्रत्येक विज्ञान में कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं जिनका अध्ययन समाजशास्त्र में समन्वय के आधार पर तीन प्रकार से किया जा सकता है—प्रथम, समाज में घटित होने वाली विभिन्न घटनाओं के सम्बन्धों एवं सहसम्बन्धों का अध्ययन करना, द्वितीय, सामाजिक व असामाजिक दोनों प्रकार की घटनाओं के सहसम्बन्धों का अध्ययन करना तथा तृतीय, इन सामाजिक घटनाओं में निहित सामान्य विशेषताओं का भी अध्ययन करना। अपने कथन की पुष्टि के लिए उन्होंने निम्नलिखित उदाहरण प्रस्तुत किए हैं
  • आर्थिक सम्बन्ध                क, ख, ग, घ, ङ, च
  • राजनीतिक सम्बन्ध           क, ख, ग, छ, ज, झ
  • धार्मिक सम्बन्ध                क, ख, ग, अ, ट, ठ
  • वैधानिक सम्बन्ध              क, ख, ग, ड, ढ, ण
  • मनोरंजनात्मक सम्बन्ध      क, ख, ग, त, थ, द
इससे स्पष्ट होता है कि घटना क, ख, ग प्रत्येक विषय में समान रूप से है, चाहे घटनाओं की प्रकृति कुछ भी हो। ये ऐसी घटनाएँ हैं जो सामाजिक जीवन के सभी पक्षों में सामान्य हैं। समाजशास्त्र को अपने विषय-क्षेत्र के अन्तर्गत इन्हीं सामान्य घटनाओं का अध्ययन करना चाहिए।

हॉबहाउस
हॉबहाउस का दृष्टिकोण भी समन्वयात्मक है। इनके अनुसार विभिन्न विज्ञानों का अध्ययन इस प्रकार से किया जाना अनिवार्य है जिसमें कि उनके सिद्धान्तों में समन्वय सम्भव हो पाए। समाजशास्त्र सामान्य जीवन का अध्ययन उसी समय कर सकता है जब समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों के आधारभूत विचारों का अध्ययन करे अथवा सामान्य केन्द्रीय धारणाओं को खोजने का प्रयत्न करे। इसलिए समाजशास्त्र अपने को विशेष प्रकार के सम्बन्धों तक सीमित नहीं रख सकता।

समन्वयात्मक सम्प्रदाय की आलोचना- समन्वयात्मक सम्प्रदाय के विचारों के विरुद्ध मुख्य तर्क निम्नांकित हैं-
  1. समाजशास्त्र का कार्य यदि सभी प्रकार की सामाजिक घटनाओं व तथ्यों का अध्ययन करना हो जाएगा तो यह एक विशुद्ध शास्त्र न रहकर मिश्रित शास्त्र हो जाएगा।
  2. ऐसी स्थिति में समाजशास्त्र अपना विशुद्ध और स्वतन्त्र चरित्र खो देगा और वह अन्य विज्ञानों की तरह एक 'सामान्य विज्ञान' बनकर रह जाएगा।
  3. सभी प्रकार की सामाजिक घटनाओं व तथ्यों के संग्रह और अध्ययन के कारण समाजशास्त्र किसी भी विषय का पूर्ण और अधिकृत ज्ञान प्रदान नहीं कर सकेगा। साथ ही यह किसी भी तथ्य की सर्वज्ञता का दावा नहीं कर सकेगा और न वह समाज के लिए इतना उपयोगी रह पाएगा जितना कि यह विशिष्ट विज्ञान होने के नाते हो सकता है।
उपर्युक्त दोनों विचारधाराएँ परस्पर विरोधी हैं तथा दोनों का समान महत्त्व है। एक सम्प्रदाय के दृष्टिकोण से समाजशास्त्र विशेष सम्बन्धों का अध्ययन करने वाला तथा दूसरे दृष्टिकोण में सामान्य सम्बन्धों का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। वास्तविकता यह है कि किसी भी सामाजिक विज्ञान के लिए यह सीमा निश्चित कर देना कि यह सामान्य या विशिष्ट सम्बन्धों का ही अध्ययन करेगा, अवैज्ञानिक है। सामान्यता तथा विशिष्टता परस्पर एक-दूसरे की पूरक हैं तथा साथ ही चलती हैं। जिन्सबर्ग ने समाजशास्त्र तथा प्राणिशास्त्र की तुलना की है। इनके अनुसार प्राणिशास्त्र के अन्तर्गत अनेक विज्ञानों का संग्रह होता है और प्रत्येक विज्ञान की अपनी विशिष्टता है। लेकिन इन विशिष्ट विज्ञानों के अतिरिक्त एक सामान्य जीवशास्त्र होता है, जो जीवन की परिस्थितियों के ज्ञान का आधार है। ठीक उसी प्रकार समाजशास्त्र में सामाजिक जीवन के तत्त्वों से सम्बन्धित अनेक विशिष्ट विज्ञान हैं और इस दृष्टिकोण से समाजशास्त्र समस्त सामाजिक विज्ञानों के समग्र रूप के समान है।
वास्तव में समाजशास्त्र के क्षेत्र से सम्बन्धित दोनों दृष्टिकोणों में समन्वय करने की आवश्यकता है। एक ओर हमें समाज के मूल एवं सामान्य तत्त्वों का ज्ञान होना अनिवार्य है, जबकि दूसरी ओर सामाजिक जीवन के विशिष्ट पहलुओं की अवहेलना भी नहीं की जा सकती। अत: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विषय-क्षेत्र के बारे में झगड़ा व्यर्थ है क्योंकि अपनी अध्ययन-पद्धति के अनुरूप समाजशास्त्र विशिष्ट एवं सामान्य दोनों ही है।

समाजशास्त्र की विषय-वस्तु

किसी भी विषय की विषय-वस्तु से तात्पर्य उन पहलुओं अथवा बातों से है जिनका अध्ययन उसमें किया जाता है। विषय-वस्तु का निर्धारण करना इसलिए अनिवार्य है क्योंकि किसी भी विषय में सभी पहलुओं या बातों का अध्ययन नहीं किया जा सकता। ऐसा किसी भी विषय-विशेष को अन्य विषयों से अलग करने के लिए भी अनिवार्य है। अन्य विषयों की भाँति समाजशास्त्र की भी निश्चित विषय-वस्तु है, परन्तु एक नवीन विषय होने के कारण समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के सन्दर्भ में विद्वानों में मतभेद पाए जाते हैं।
दुर्खीम के अनुसार समाजशास्त्र को निम्न तीन भागों से विभक्त कर अध्ययन किया जाना चाहिए-

सामाजिक स्वरूपशास्त्र
इसके अन्तर्गत सामाजिक संगठन बनाए रखने में सहायता करने वाली शक्तियों का अध्ययन किया जाता है। इसमें मुख्यतः भोगौलिक परिस्थितियाँ; जैसे जनसंख्या का घनत्व आदि; जिनका प्रभाव समाज के संगठन पर पड़ता है, का अध्ययन किया जाता है।

सामाजिक शरीर-रचना
यह खण्ड अनेक उपखण्डों में वर्गीकृत है तथा इनके अन्तर्गत वे विषय आते हैं जिनका अध्ययन अन्य विशेष विज्ञान करते हैं; जैसे, धर्म का समाजशास्त्र, कानून का समाजशास्त्र, ज्ञान का समाजशास्त्र आदि। समाजशास्त्र इनका समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से अध्ययन करता है।

सामान्य समाजशास्त्र
इसमें उन विधियों का अध्ययन किया जाता है जो सामान्य हितों व सामाजिक नियमों को सुरक्षित रखने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। दुर्खीम के दृष्टिकोण में यह भाग समाज का दार्शनिक अंग है।
एलेक्स इंकलिस ने अपनी पुस्तक 'ह्वाट इज सोशियोलॉजी?' में समाजशास्त्र की विषय-वस्तु का निर्धारण निम्नलिखित तीन विधियों (पथों) द्वारा करने का प्रयास किया है-

1. ऐतिहासिक विधि
इस विधि द्वारा इंकलिस ने यह जानने का प्रयास किया है कि समाजशास्त्र के जन्मदाताओं ने इसकी विषय-वस्तु के बारे में क्या कहा है। इसमें इन्होंने चार ऐसे प्रारम्भिक समाजशास्त्रियों के विचारों का उल्लेख किया है जिन्होंने 'समाजशास्त्र' को विज्ञान बनाने में सहायता दी है। ये विद्वान् निम्नलिखित हैं-

ऑगस्त कॉम्ट- कॉम्ट समाजशास्त्र के जन्मदाता माने जाते हैं क्योंकि उन्होंने ही 1838 ई० में प्रथमत: 'समाजशास्त्र' शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने अपना अधिक ध्यान समाजशास्त्र के अस्तित्व को स्वीकार करवाने में ही लगाया। वास्तव में, कॉम्ट क्योकि समाजशास्त्र को एक ऐसा विज्ञान मानते थे जिसमें सभी दृष्टिकोणों को एक साथ रखकर अध्ययन किया जा सकता है, अत: उन्होंने इसकी कोई विषय-वस्तु निर्धारित नहीं की है।
उन्होंने समाजशास्त्र की दो शाखाओं—सामाजिक स्थैतिकी (Social statics) तथा सामाजिक गत्यात्मकता (Social dynamic)-का उल्लेख किया है। प्रथम शाखा में उन्होंने अर्थव्यवस्था, परिवार, राजनीति आदि प्रमुख संस्थाओं के विश्लेषण पर बल दिया है, जबकि दूसरी शाखा में समाज को इकाई मानकर इसके विकास एवं परिवर्तन के अध्ययन पर बल दिया है। उन्होंने समाज का समग्र रूप में अध्ययन करने को ही नहीं, अपितु समाजों के तुलनात्मक अध्ययनों को भी समाजशास्त्र की विषय-वस्तु स्वीकार किया है।

2. हरबर्ट स्पेन्सर- स्पेन्सर की पुस्तक 'प्रिन्सिपल्स ऑफ सोशियोलॉजी', जोकि 1877 ई० में तीन खण्डों में प्रकाशित हुई, प्रथम समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने वाली कृति मानी जाती है। उन्होंने, कॉम्ट के विपरीत समाजशास्त्र में अध्ययन की जाने वाली बातों की अधिक स्पष्ट रूप से विवेचना की है। उन्होंने परिवार, धर्म, सामाजिक नियन्त्रण तथा उद्योग अथवा कार्य को ही समाजशास्त्र की विषय-वस्तु नहीं बताया अपितु समितियों, समुदायों, श्रम-विभाजन, सामाजिक विभिन्नीकरण तथा सामाजिक स्तरीकरण, ज्ञान के समाजशास्त्र, विज्ञान के समाजशास्त्र और कला के समाजशास्त्रीय विश्लेषण को समाजशास्त्र की विषय-वस्तु में सम्मिलित किया है। उन्होंने भी सम्पूर्ण समाज को एक इकाई मानकर व्यापक पैमाने पर अध्ययन करने पर बल दिया है।

3. इमाइल दुर्खीम- दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों के अध्ययन पर बल दिया तथा स्वयं श्रम-विभाजन, आत्महत्या और धर्म जैसे सामाजिक तथ्यों का अध्ययन किया। उन्होंने व्यक्तित्व, धर्म, कानून, प्रतिमान, अपराध, जनसंख्या, विज्ञान, कला आदि को तथा आर्थिक पहलुओं के समाजशास्त्रीय अध्ययन को समाजशास्त्र की विषयवस्तु में विशेष स्थान दिया है। 

4. मैक्स वेबर- वेबर ने सामाजिक क्रिया, धर्म, आर्थिक जीवन के अनुपम पहलुओं (जिसमें मुद्रा तथा श्रमविभाजन भी सम्मिलित है), राजनीतिक दल, राजनीतिक शक्ति एवं सत्ता, अधिकारीतन्त्र तथा अन्य बड़े संगठनों, जाति एवं वर्ग, नगर तथा संगीत पर स्वयं अध्ययन किए और इनकी महत्ता पर प्रकाश डाला।

2. आनुभविक विधि
इस विधि द्वारा इंकलिस ने यह जानने का प्रयास किया है कि आज समाजशास्त्र में किन बातों को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है अर्थात् समकालीन समाजशास्त्री क्या कर रहे हैं? यह पता तीन स्रोतों द्वारा लगाया जा सकता है-(अ) पाठ्य-पुस्तकों (Textbooks) का विश्लेषण, (ब) विभिन्न विद्वानों द्वारा समाजशास्त्र की भिन्न शाखाओं का समर्थन तथा (स) अनुसन्धान पत्रिकाओं व अन्य रिपोर्टों में प्रकाशित लेख। होर्नल हार्ट (Hornell Hart) ने 1952 ई० से 1958 ई० तक की अवधि में अमेरिका में प्रकाशित 24 पाठ्य-पुस्तकों का विश्लेषण करके 12 ऐसे पहलुओं या बातों का पता लगाया जिन्हें कम-से-कम 20 पाठ्यपुस्तकों में सम्मिलित किया गया था। ये पहलू निम्नलिखित हैं-
  • समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति (Scientific method in Sociology),
  • समाज में व्यक्तित्व (Personality in society),
  • संस्कृति (Culture),
  • मानव समूह (Human groups),
  • जनसंख्या (Population),
  • जाति तथा वर्ग (Caste and class),
  • प्रजाति (Race),
  • सामाजिक परिवर्तन (Social change),
  • आर्थिक संस्थाएँ (Economic institutions),
  • परिवार (Family)
  • शिक्षा (Education), तथा
  • धर्म (Religion)

3. विश्लेषणात्मक विधि
इंकलिस का कहना है कि समाजशास्त्र के जन्मदाताओं के विचार तथा समकालीन समाजशास्त्रियों के अध्ययन की रुचि के विषय समाजशास्त्र की विषय-वस्तु को निर्धारित करने में पर्याप्त नहीं हैं। अत: समाजशास्त्र की विषय-वस्तु को तार्किक विश्लेषण (Logical analysis) द्वारा निर्धारित करना अनिवार्य है। अन्य शब्दों में, इस विधि द्वारा इंकलिस ने समाजशास्त्र की वृहत् विषय-वस्तु को तार्किक दृष्टि से परिसीमित करने का प्रयास किया है। इंकलिस के अनुसार समाजशास्त्र की विशिष्ट विषय-वस्तु में तीन पहलुओं को घटते क्रम (Decreasing order) में सम्मिलित किया जा सकता है। ये पहलू निम्नलिखित हैं-

(अ) समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है- समाजशास्त्र एक ऐसा विशिष्ट विज्ञान है जिसमें समाज को समग्र के रूप में विश्लेषण की एक इकाई माना जाता है। इस पहलू में विशेष समाजों के आन्तरिक विभेदीकरण तथा उनकी बाहरी विशेषताओं से सम्बन्धित समाज के विकास तथा समस्याओं के अध्ययनों को सम्मिलित किया जा सकता है। मैक्स वेबर तथा किंग्सल डेविस के अध्ययन इस श्रेणी के अध्ययनों के उदाहरण हैं।

(ब) समाजशास्त्र सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन है- समाजशास्त्र की विषय-वस्तु का दूसरा विशिष्ट पहलू सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन है। इस पहलू में समाज का निर्माण करने वाले विभिन्न अंगों तथा सामाजिक संस्थाओं जैसे कि परिवार, चर्च, स्कूल, राजनीतिक दल आदि के अध्ययन पर बल दिया जाता है। संस्थाओं की सामान्य विशेषताओं, इनके परस्पर सम्बन्धों एवं कार्यों के अध्ययन भी इस पहलू में सम्मिलित किए जा सकते हैं।
इंकलिस के अनुसार इस पहलू में अधिक अध्ययन नहीं हुए हैं तथा आज बड़ी संस्थाओं की अपेक्षा छोटी संस्थाओं के अध्ययन में रुचि बढ़ती जा रही है।

(स) समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन है- इंकलिस ने इस पहलू में सामाजिक सम्बन्धों के अध्ययन पर बल दिया है। सामाजिक सम्बन्ध तीन प्रकार के हो सकते हैं—व्यक्ति-व्यक्ति के बीच, व्यक्ति-समूह के बीच तथा एक समूह और दूसरे समूह के बीच। मैक्स वेबर, वॉन वीज, जॉर्ज सिमेल तथा टॉलकट पारसन्स ने इस पहलू में महत्त्वपूर्ण अध्ययन किए हैं।

समाजशास्त्र एवं समाज कार्य

समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है। विज्ञान दो तरह के होते हैं-प्रथम, प्राकृतिक विज्ञान तथा द्वितीय, सामाजिक विज्ञान। प्राकृतिक विज्ञान प्रकृति अथवा प्राकृतिक घटनाओं से सम्बन्धित होते हैं, जबकि सामाजिक विज्ञान समाज के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करते हैं। समाजशास्त्र ही एकमात्र सामाजिक विज्ञान नहीं है अपितु अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान, समाज कार्य, मानवशास्त्र तथा इतिहास इत्यादि भी सामाजिक विज्ञान हैं। अतः समाजशास्त्र सामाजिक विज्ञानों में से एक विज्ञान है तथा इस नाते यह अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्धित है। समाजशास्त्र के अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्धों की चर्चा करते हुए बार्न्स एवं बीकर लिखते हैं कि, “समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की न तो गृहस्वामिनी है और न उनकी दासी है, अपितु उनकी बहन है।' यद्यपि सामाजिक विज्ञानों को बहन मानने में, सबसे बाद में उत्पन्न होने के कारण यह सबसे छोटी बहन है, किन्तु प्रभाव की दृष्टि से यह सबसे बढ़ी-चढ़ी है। छोटी होते हुए भी यह सब बहनों को एक-दूसरे के पास लाती है और उनसे सामाजिक अध्ययन के कार्य में पूर्ण सहयोग लेती है। उनके विचारों से यह स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र एवं अन्य सामाजिक विज्ञानों का अध्ययन का एक समान आधार है।
समाजशास्त्र समाज का क्रमबद्ध अध्ययन है। समाज को सामाजिक सम्बन्धों का जाल अथवा ताना-बाना कहा जाता है। समाजशास्त्र में मुख्य रूप से मानव संस्कृति तथा समाज, सामाजिक जीवन की प्राथमिक इकाइयों (जैसे—सामाजिक क्रिया तथा सामाजिक सम्बन्ध, मानव का व्यक्तित्व, समूह (प्रजाति तथा वर्ग सहित), समुदाय (नगरीय और ग्रामीण), समितियाँ और संगठन, जनसंख्या, तथा समाज आदि), मूलभूत सामाजिक संस्थाओं (जैसे—परिवार और नातेदारी, आर्थिक संस्थाएँ, राजनीतिक तथा वैधानिक संस्थाएँ, धार्मिक संस्थाएँ, शैक्षणिक व वैज्ञानिक संस्थाएँ, मनोरंजनात्मक व कल्याण संस्थाएँ, तथा कलात्मक तथा अभिव्यक्ति सम्बन्धी संस्थाएँ आदि) तथा मौलिक सामाजिक प्रक्रियाओं (जैसे—विभेदीकरण तथा स्तरीकरण, सहयोग, समायोजन तथा सात्मीकरण, सामाजिक संघर्ष जिसमें क्रान्ति और युद्ध भी सम्मिलित है, संचार जिसमें जनमत निर्माण और परिवर्तन भी सम्मिलित है, समाजीकरण और सैद्धान्तीकरण, सामाजिक मूल्यांकन, सामाजिक नियन्त्रण, सामाजिक विचलन, सामाजिक एकीकरण, तथा सामाजिक परिवर्तन इत्यादि) का अध्ययन किया जाता है।
समाज कार्य एक सामाजिक विज्ञान है। इसमें उन कल्याणकारी क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है जिनका उद्देश्य मानवतावादी दर्शन, वैज्ञानिक ज्ञान एवं प्राविधिक निपुणताओं पर आधारित व्यक्तियों, समूहों अथवा समुदायों को एक सुखी एवं सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करने में सहायता प्रदान करना है। समाज कार्य शब्द का प्रयोग समस्याओं के समाधान द्वारा मानवीय कल्याण में वृद्धि करने हेतु किया जाता है। यह एक व्यावहारिक विज्ञान है जिसमें समाजशास्त्र तथा अन्य विज्ञानों में खोजे गए ज्ञान के आधार पर समाज की समस्याओं का समाधान तथा सामाजिक कल्याण एवं पुनर्निर्माण करने का प्रयास किया जाता है। समाज कार्य वह व्यावसायिक क्रिया या सेवा है जो व्यक्तियों, समूहों अथवा समुदायों को समस्याओं का समाधान करने हेतु आत्म सहायता करने योग्य बनाती है। इस क्रिया में मानवतावादी दर्शन, वैज्ञानिक ज्ञान तथा प्राविधिक निपुणताओं का प्रयोग किया जाता है तथा समुदाय से तालमेल बैठाते हुए लोगों की आकांक्षाओं और क्षमताओं के अनुरूप बेहतर जीवन स्तर प्राप्त करने तथा सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना में उनकी व्यक्तिगत या सामूहिक रूप में सहायता करने का प्रयास किया जाता है।
समाजशास्त्र का समाज कार्य से निकट का सम्बन्ध पाया जाता है। इन दोनों सामाजिक विज्ञानों में पाया जाने वाला विभाजन सुस्पष्ट नहीं है और इसीलिए इनमें काफी सीमा तक सामान्य रुचियाँ, संकल्पनाएँ एवं अध्ययन की पद्धतियाँ हैं। इसीलिए बहुत-से विद्वानों का कहना है कि समाजशास्त्र एवं समाज कार्य को अलग-अलग करना इनमें पाए जाने वाले अन्तरों को अतिरंजित करना तथा समानताओं पर आवरण चढ़ाने जैसा होगा। इसका अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि जिस संस्था में समाज कार्य का प्रशिक्षण सर्वप्रथम प्रारम्भ किया गया उसका नाम 'स्कूल ऑफ सोशियोलॉजी' रखा गया तथा उसके पाठ्यक्रम में समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों को प्रमुख रूप से सम्मिलित किया गया।
समाजशास्त्र तथा समाज कार्य के पारस्परिक सम्बन्ध को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-
  • समाजशास्त्र तथा समाज कार्य की उत्पत्ति सामान्य रूप से सामाजिक समस्याओं एवं समाज सुधार में रुचि के परिणामस्वरूप हुई है।
  • समाजशास्त्र तथा समाज कार्य में समाज में विद्यमान सामाजिक समस्याओं के कारणों को ढूँढ़ने तथा उनका समाधान करने हेतु अपनाए जाने वाले उपायों पर बल दिया जाता है।
  • प्रारम्भ में समाज कार्य हेतु प्रशिक्षण समाजशास्त्र द्वारा उपलब्ध कराया जाता था अर्थात् समाज कार्यकर्ता बनने हेतु समाजशास्त्रीय प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती थी।
  • समाजशास्त्र समाज कार्य को वैयक्तिक, पारिवारिक, सामुदायिक एवं सामाजिक समस्याओं को समझने, उनका विश्लेषण करने तथा उनका निदान करने में सहायता प्रदान करता है।
  • समाजशास्त्र सामाजिक समूहों, संस्थाओं एवं प्रक्रियाओं से सम्बन्धित उपयोगी उपकल्पनाओं (प्राकल्पनाओं) का निर्माण करके समाज कार्य को सहायता प्रदान करता है।
  • समाजशास्त्र समाज कार्यकर्ताओं को समाजशास्त्र से सम्बन्धित विभिन्न अवधारणाओं को स्पष्ट करने तथा उनका इस रूप में प्रयोग करने में सहायता प्रदान करता है जिससे वे समाज की संरचना को ठीक प्रकार से समझ सकें।
  • समाज कार्यकर्ता समाजशास्त्रियों द्वारा संकलित तथ्यों एवं उनके आधार पर निकाले गए निष्कर्षों व प्रतिपादित सिद्धान्तों का परीक्षण करते हैं।
  • समाज कार्य का अधिकांश ज्ञान समाजशास्त्र पर आधारित है। मेयर (Meyor) जैसे विद्वानों ने समाजशास्त्र तथा समाज कार्य में चार क्षेत्रों में अन्तरसम्बन्ध का उल्लेख किया है-अन्तर्वैयक्तिक अन्तक्रिया, सामाजिक ज्ञान, संस्थाओं का प्रशासन तथा सामाजिक समस्याएँ। इससे इन दोनों में पाए जाने वाले सम्बन्धों का पता चलता है।
  • टिम्स (Timms) के मतानुसार समाज कार्य में प्रयुक्त वैयक्तिक समाज कार्य पद्धति में समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान के ज्ञान का ही बहुधा प्रयोग होता है क्योंकि वैयक्तिक समाज कार्य का अपना कोई ज्ञान नहीं है।
  • समाजशास्त्र सेवार्थी के व्यक्तित्व को समझने, उस पर पड़ने वाले प्रभावों का पता लगाने, व्यक्तित्व में पाई जाने वाली संगठन एवं विघटन की सापेक्ष स्थिति को स्पष्ट करने, उसकी मनोवृत्तियों, योग्यताओं, क्षमताओं इत्यादि को समझने में भी सहायता प्रदान करता है।
  • समाजशास्त्र अध्ययन-क्षेत्र में सेवार्थी द्वारा अनुभव की जाने वाली समस्याओं के सामाजिक पहलुओं को समझने तथा समाज में उपलब्ध विभिन्न संसाधनों का ज्ञान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है।
  • समाजशास्त्र सेवार्थी को वह ज्ञान उपलब्ध कराता है जो उसे समस्याग्रस्त व्यक्ति, समूह अथवा समुदाय के साथ सम्पर्क करने एवं अर्थपूर्ण संचार बनाए रखने में सहायक होता है। समाजशास्त्र उन कारकों के प्रति सेवार्थी को सचेत भी करता है जो उसकी कार्यक्षमता को कम करते हैं।
समाजशास्त्र द्वारा समाज कार्य को दिए जाने वाले उपर्युक्त योगदान का अर्थ यह कदापि नहीं है कि दोनों विषय एक ही हैं तथा समाज कार्य समाजाशास्त्र का ही एक रूप है। यह सही है कि समाजशास्त्र एवं समाज कार्य सहित अधिकांश सामाजिक विद्वानों द्वारा अन्त:विषयक उपागम (Inter-disciplinary approach) अपनाए जाने से विभिन्न सामाजिक विज्ञानों में अन्तर करना और भी कठिन हो गया है, फिर भी, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि विभिन्न सामाजिक विज्ञानों में परस्पर सम्बन्ध के बावजूद रुचियों, संकल्पनाओं एवं अध्ययन पद्धतियों में थोड़ा-बहुत अन्तर पाया जाता है। यह तथ्य समाजशास्त्र एवं समाज कार्य पर भी लागू होता है। समाज कार्यों में समाजशास्त्र के अतिरिक्त अन्य सामाजिक विज्ञानों में उपलब्ध ज्ञान का भी प्रयोग किया जाता है ताकि सेवार्थी समस्याओं का प्रभावशाली ढंग से समाधान कर सकें तथा समस्याग्रस्त व्यक्तियों एवं समूहों में आत्म सहायता की क्षमता विकसित कर सकें। समाज कार्य द्वारा मनो-सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करना इस बात का द्योतक है कि इसमें समाजशास्त्र के अतिरिक्त मनोविज्ञान की भी सहायता ली जाती है।
समाज कार्य तथा समाजशास्त्र में पाया जाने वाला सम्बन्ध एक-तरफा नहीं है। समाज कार्य भी समाजशास्त्र को मूल्यवान ज्ञान उपलब्ध कराने में सहायक है। समाजशास्त्र में चिकित्सा समाजशास्त्र, औद्योगिक समाजशास्त्र, पर्यावरणीय समाजशास्त्र जैसी शाखाओं के विकास में समाज कार्य के उल्लेखनीय योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। समाज कार्य द्वारा संकलित व्यावहारिक ज्ञान समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों की पुनर्परीक्षा करने में भी सहायक होता है। समाजशास्त्रियों द्वारा पाठीय (पुस्तकीय) परिप्रेक्ष्य के स्थान पर क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य को दी जाने वाली प्राथमिकता का प्रमुख कारण भी समाज कार्य द्वारा उपलब्ध क्षेत्रीय ज्ञान ही है।

व्यावहारिक समाजशास्त्र

समाजशास्त्र एक विज्ञान है क्योंकि इसमें वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यह किस प्रकार का विज्ञान है? क्या यह एक विशुद्ध विज्ञान है अथवा व्यावहारिक? यह एक वाद-विवाद का विषय है। रोबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) के अनुसार समाजशास्त्र एक विशुद्ध या मौलिक विज्ञान है क्योंकि इसका प्रमुख उद्देश्य मानव समाज से सम्बन्धित सामाजिक घटनाओं का अध्ययन, विश्लेषण एवं निरूपण कर ज्ञान का संग्रह करना है। विशुद्ध विज्ञान क्योकि सैद्धान्तिक होता है इसीलिए इसके द्वारा संचित ज्ञान अनिवार्य रूप से व्यावहारिक उपयोग में नहीं लाया जा सकता। रोबर्ट बीरस्टीड ने स्पष्ट कर दिया है कि इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजशास्त्र व्यर्थ या अव्यावहारिक विज्ञान है, परन्तु समाजशास्त्र की इसमें कोई रुचि नहीं कि प्राप्त ज्ञान का प्रयोग व्यावहारिक क्षेत्रों पर कैसे लागू किया जाता है। इसीलिए समाजशास्त्र में होने वाले अधिकतर शोध की प्रकृति भी मौलिक या विशुद्ध है। इस प्रकार का शोध नवीन तथ्यों की प्राप्ति करके मानव-जिज्ञासा को सन्तुष्टि करने से सम्बन्धित होता है। इसमें सामाजिक वास्तविकता के बारे में नवीन ज्ञान प्राप्त किया जाता है, मौलिक सिद्धान्तों और नियमों का निर्माण किया जाता है तथा पुराने सिद्धान्तों का नवीन ज्ञान के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। अत: विशुद्ध शोध नवीन ज्ञान की प्राप्ति तथा पहले से प्राप्त ज्ञान की पुनर्परीक्षा द्वारा उसमें वृद्धि करने से सम्बन्धित है।
दूसरी ओर, जब से समाजशास्त्र का विकास हुआ है तभी से कुछ समाजशास्त्रियों का एक वर्ग समाजशास्त्र द्वारा प्राप्त वैज्ञानिक ज्ञान को सामाजिक समस्याओं के समाधान एवं समाज-सुधार हेतु प्रयुक्त करने के पक्ष में रहा है। इन विद्वानों में जेनी एडम्स (Jane Addams), ऑगस्त कॉम्ट (Auguste Comte), लेस्टर वार्ड (Lester Ward) इत्यादि प्रमुख हैं। उदाहरणार्थ—समाजशास्त्र के जनक कॉम्ट ने अपने अध्ययनों में समाजशास्त्रीय ज्ञान की व्यावहारिकताओं पर बल दिया। इनकी सामाजिक पुनर्निर्माण की योजना (Plan of social reconstruction) समाजशास्त्र के व्यावहारिक पक्ष को महत्त्व देने की ही द्योतक है।
व्यावहारिक समाजशास्त्र के समर्थक समाजशास्त्र द्वारा प्राप्त ज्ञान एवं तथ्यों द्वारा निर्मित सिद्धान्तों को नीतिनिर्धारकों (Policy-makers) एवं लोगों के सामान्य जीवन पर लागू करने पर बल देते हैं। आज समाजशास्त्र में 'व्यावहारिक समाजशास्त्र' शब्द का प्रयोग मानव व्यवहार एवं संगठनों से सम्बन्धित प्रायोगिक प्रासंगिकता विकसित करने के इरादे के लिए किया जाता है। सामान्यतया इस प्रकार के कार्य का लक्ष्य किसी सामाजिक समस्या के समाधान में सहायता प्रदान करना होता है। अमेरिका, यूरोप के अनेक विकसित देशों एवं भारत जैसे विकासशील देशों में भी सरकार ने प्रजातिवाद, नृजातिवाद, साम्प्रदायिक हिंसा, अश्लील साहित्य, अपराध, बालअपराध, जनसंख्या आप्रावास इत्यादि सामाजिक महत्त्व के विषयों पर अनेक आयोग गठित किए हैं। इन आयोगों में समाजशास्त्रियों एवं अन्य सामाजिक वैज्ञानिकों को सदस्य बनाया जाना समाजशास्त्र के व्यावहारिक उपयोग का द्योतक है। अमेरिका जैसे देश में तो स्थानीय समुदायों के स्तर पर व्यावहारिक समाजशास्त्र के अनेक केन्द्र स्थापित किए गए हैं जिनमें सामुदायिक विषयों; जैसे-रोजगार के उपलब्ध अवसर, विकलांगों की समस्याएँ, वरिष्ठ नागरिकों की समस्याएँ इत्यादि पर शोध किया जाता है तथा प्राप्त निष्कर्षों को स्थानीय प्रशासन को उपलब्ध कराया जाता है ताकि इनसे सम्बन्धित नीति-निर्माण में सहायता मिल सके। व्यावहारिक समाजशास्त्र के समर्थक समाजशास्त्र में व्यावहारिक शोध करने पर बल देते हैं। व्यावहारिक शोध ज्ञान प्राप्ति से सम्बन्धित न होकर प्राप्त ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में लागू करने पर बल देता है। यह सामाजिक व्यवहार को समझने तथा सामाजिक व्याधिकीय अथवा विघटनकारी समस्याओं को समझने से सम्बन्धित होता है अर्थात् इसका उद्देश्य व्यावहारिक जीवन के विविध पहलुओं एवं समस्याओं के बारे में ज्ञान प्राप्त करना होता है। 'व्यावहारिक समाजशास्त्र' में इसी प्रकार के शोध किए जाते हैं।
19वीं शताब्दी के अन्त तक एवं 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अनेक समाजशास्त्रियों को समाज-सुधारकों एवं सामाजिक अभियन्ताओं के रूप में देखा जाता था क्योंकि वे समाजशास्त्रीय ज्ञान को सामाजिक समस्याओं के समाधान तथा सामाजिक जीवन को उन्नत बनाने पर ही बल नहीं देते रहे, अपितु निरन्तर इस ओर प्रयासरत भी रहे। अमेरिका में वार्ड जैसे अनेक समाजशास्त्रियों ने समाजशास्त्र को समाज कल्याण से जोड़ने का प्रयास किया तथा नगरीकरण एवं औद्योगीकरण से उत्पन्न समस्याओं को समझने व उनका समाधान खोजने का प्रयास किया। इसी से व्यावहारिक समाजशास्त्र की उत्पत्ति हुई। यद्यपि ऐसे विद्वानों को अधिक सफलता तो नहीं मिली क्योंकि समस्याओं के समाधान सम्बन्धी निर्णय लेने का कार्य सरकार करती है न कि कोई समाजशास्त्री या अन्य कोई सामाजिक वैज्ञानिक, तथापि आज 'व्यावहारिक समाजशास्त्र' के अस्तित्व को सभी विद्वान् स्वीकार करते हैं।
फैडरिको (Federico) के अनुसार 'व्यावहारिक समाजशास्त्र' सामान्य समाजशास्त्र की प्रयोगात्मक शाखा है जो समाजशास्त्रीय ज्ञान को लोगों के जीवन को उन्नत करने हेतु प्रयोग में लाने पर बल देती है। इनका यह भी कहना है कि ज्ञान को इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु प्रयोग में लाने के लिए समाज के बारे में उपलब्ध मूल ज्ञान में सुधार होना जरूरी है और इसीलिए समाजशास्त्रियों का वैज्ञानिक होने का नाते प्रथम उत्तरदायित्व वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ज्ञान प्राप्त करना तथा इसे संगठित करना है।

स्कैफर एवं लाम (Schaefer and Lamm) के अनुसार व्यावहारिक समाजशास्त्र में बढ़ती हुई रुचि के परिणामस्वरूप ही समाजशास्त्र की अनेक विशिष्ट शाखाओं; जैसे—चिकित्सा समाजशास्त्र (Medical sociology) एवं पर्यावरणीय समाजशास्त्र (Environmental sociology) का विकास हुआ है।

चिकित्सा समाजशास्त्र में केवल इस बात का अध्ययन नहीं किया है कि डॉक्टर रोगियों से किस प्रकार का व्यवहार करते हैं, अपितु एड्स (AIDS) जैसे भयंकर रोगों का परिवारों, मित्रों एवं समुदायों पर सामाजिक प्रभाव देखने का प्रयास भी किया है। पर्यावरणीय समाजशास्त्री केवल मानव समाज एवं भौतिक पर्यावरण में सम्बन्धों का ही अध्ययन नहीं करते, अपितु यह समझने का प्रयास भी करते हैं कि कारखानों से निकलने वाला खतरनाक स्राव किस प्रकार से गन्दी बस्तियों एवं अल्पसंख्यक पड़ोसों को प्रभावित करता है।

स्कैफर एवं लाम का कहना है कि व्यावहारिक समाजशास्त्र की लोकप्रियता के परिणामस्वरूप ही 'निदानात्मक समाजशास्त्र' (Clinical sociology) जैसी विशिष्ट शाखा का विकास हुआ है। यद्यपि लुईस विर्थ (Louis Wirth) ने आज से लगभग सात दशक पहले (1931 ई० में) 'निदानात्मक समाजशास्त्र' शब्द का प्रयोग किया था, तथापि यह शब्द पिछले कुछ वर्षों में ही लोकप्रिय हुआ है। निदानात्मक समाजशास्त्र के समर्थक समाजशास्त्र में क्रियात्मक शोध (Action research) करने पर बल देते हैं। यह वह सामाजिक शोध है जिसमें शोधकर्ता किसी सामाजिक समस्या या घटना के क्रियात्मक पक्ष को अधिक महत्त्व देता है तथा शोध के निष्कर्षों का प्रयोग वर्तमान परिस्थितियों; जैसे गन्दी बस्तियों, जातीय तनावों या अन्य ऐसी परिस्थितियों को बदलने हेतु करता है। निदानात्मक समाजशास्त्री सामाजिक समस्याओं के निदान हेतु केवल सुझाव मात्र ही नहीं देते अपितु इस दिशा में स्वयं भी सक्रिय प्रयास करते हैं।

'निदानात्मक समाजशास्त्र' में परिवर्तन लाने हेतु विविध प्रकार की प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है तथा यह काफी सीमा तक 'व्यावहारिक समाजशास्त्र' के समान ही है। फिर भी, व्यावहारिक समाजशास्त्र मूल्यांकनात्मक हो सकता है, जबकि निदानात्मक समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों को बदलने अथवा सामाजिक संस्थाओं को पुनर्संरचित करने से सम्बन्धित है। अमेरिका में समाजशास्त्रीय ज्ञान को व्यक्तियों एवं सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से प्रासंगिक बनाने तथा इसे प्रोत्साहन देने हेतु 1978 ई० में 'The Sociological Practice Association' नामक समिति की स्थापना की गई थी जिसमें समाजशास्त्रियों का पेशेवर समूह व्यावहारिक एवं निदानात्मक समाजशास्त्र से सम्बन्धित अध्ययन करता है। इस समिति ने 1989 ई० से निदानात्मक समाजशास्त्र से सम्बन्धित ‘Sociological Practice Review' नामक पत्रिका निकालना भी प्रारम्भ किया। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि व्यावहारिक समाजशास्त्र सामान्य समाजशास्त्र की वह शाखा है जो समाजशास्त्रीय ज्ञान को व्यवहार में लाने अर्थात् समास्याओं के समाधान हेतु प्रयोग करने पर बल देती है। इसका सम्बन्ध समाज का पुनर्निर्माण करना है। चूँकि समाजशास्त्री स्वयं नीति-निर्धारक नहीं होता इसलिए व्यावहारिक समाजशास्त्री सामान्यतया संकलित ज्ञान एवं मूल्यांकन को प्रयोग में लाने का कार्य नीति-निर्धारकों पर छोड़ देते हैं। व्यावहारिक समाजशास्त्रियों के विपरीत निदानात्मक समाजशास्त्री इस दिशा में स्वयं भी प्रयास करते हैं। इसी दृष्टि से 'निदानात्मक समाजशास्त्र' 'व्यावहारिक समाजशास्त्र' से भिन्न है। 

व्यावहारिक समाजशास्त्र की सामाजिक समस्याओं, सामाजिक कल्याण एवं नीति-निर्धारण के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसकी उपयोगिता को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-
  • व्यावहारिक समाजशास्त्र सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायक है। यह केवल समाज में पाई जाने वाली विभिन्न समस्याओं के बारे में ज्ञान प्राप्त करने में ही सहायक नहीं है, अपितु कारणों का विश्लेषण करके इनके समाधान के उपाय बताने में भी सहायक है। निर्धनता, बेरोजगारी, अपराध, बालापराध, मद्यपान, मानसिक तथा साम्प्रदायिक उपद्रव, वेश्यावृत्ति इत्यादि समस्याओं को समझने तथा उनका समाधान करने में समाजशास्त्रीय ज्ञान की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
  • व्यावहारिक समाजशास्त्र व्यावसायिक दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इसने विभिन्न व्यवसायों को समझने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज इस विषय की अनेक शाखाएँ; जैसे कि 'शिक्षा का समाजशास्त्र', 'कानून का समाजशास्त्र', 'चिकित्सा का समाजशास्त्र', 'सैनिक जीवन का समाजशास्त्र', 'अपराध का समाजशास्त्र' आदि; अपने-अपने क्षेत्र में व्यवसायों को समझने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही है।
  • व्यावहारिक समाजशास्त्र का सामाजिक नियोजन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। आज सभी विकसित एवं विकासशील देश सामाजिक नियोजन द्वारा अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील हैं। व्यावहारिक समाजशास्त्र सामाजिक नियोजन में सहायता प्रदान करके इस दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। आज विभिन्न देशों में योजनाओं के निर्माण में समाजशास्त्री एवं अन्य सामाजिक वैज्ञानिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
  • व्यावहारिक समाजशास्त्र राष्ट्र-निर्माण की समस्याओं को समझने तथा उनका निराकरण करने में सहायक है। समाजशास्त्रीय ज्ञान नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावनाएँ जाग्रत करने तथा राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में तीव्रता लाने में भी सहायक है। इससे हमें यह पता चलता है कि कौन-कौन सी बाधाएँ किसी देश के राष्ट्र-निर्माण में प्रमुख हैं। उदाहरणार्थ-भारत में जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रीयता व प्रादेशिकता आदि प्रमुख बाधाओं को दूर करने के प्रयासों एवं राष्ट्रीयता की भावनाएँ जाग्रत करने में समाजशास्त्रीय ज्ञान उपयोगी सिद्ध हो रहा है।
  • व्यावहारिक समाजशास्त्र की नीति-निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसका ज्ञान नीतियों के निर्धारण में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। टी० बी० बॉटोमोर के अनुसार, समाजशास्त्री उन मामलों पर पर्याप्त, आवश्यक, निश्चित एवं वस्तुनिष्ठ रूप से विचार करते हैं जो राजनीतिज्ञों, प्रशासकों व समाज-सुधारकों के सामने आते हैं। समाजशास्त्रीय विश्लेषण एवं ज्ञान नीति-निर्धारकों का मार्गदर्शन करता है तथा नीतिनिर्माण का कार्य सरल बनाता है।
  • व्यावहारिक समाजशास्त्र का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पाई जाने वाली विविधताओं को समझने तथा सभी राष्ट्रों में सद्भाव बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह हमें संसार के अनेक देशों के बारे में ज्ञान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है। आज औद्योगीकरण एवं यन्त्रीकरण के कारण हमारा जीवन दिन-प्रतिदिन अन्तर्राष्ट्रीय होता जा रहा है तथा इसके लिए अन्य समाजों में रहने वाले व्यक्तियों तथा उनकी संस्कृतियों को जानना अत्यन्त जरूरी हो गया है। अतः अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को सुलझाने एवं सद्भाव बनाए रखने में समाजशास्त्र का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है।
उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यावहारिक समाजशास्त्र एक अत्यन्त उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण सामाजिक विज्ञान है। वस्तुत: व्यावहारिक समाजशास्त्र ही समाज कार्य के अधिक नजदीक है।

शब्दावली

समाजशास्त्र - समाजशास्त्र वह विषय है जो समाज का क्रमबद्ध अध्ययन करता है।
सामाजिक अन्तक्रिया - दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच होने वाली अर्थपूर्ण क्रिया को सामाजिक अन्तक्रिया कहते हैं।
परिप्रेक्ष्य - परिप्रेक्ष्य का अर्थ एक विशिष्ट नजरिया (देखने का तरीका) है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति अपने अध्ययन को समन्वित व सुव्यवस्थित करता है।
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