स्त्रियों की समस्या | striyon ki samasya

स्त्रियों की विशिष्ट समस्याएँ

स्त्रियों को अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
striyon ki samasya
उनकी विशिष्ट समस्याएँ निम्न प्रकार हैं-

लिंग-भेदभाव

सामाजिक फन्दे का अत्याचार-स्त्रियों के साथ जन्म से ही भेदभाव प्रारम्भ हो जाता है। परिवार में समाजीकरण की प्रक्रिया में इस भेदभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। लड़कों और लड़कियों में असमानता से सम्बन्धित मूल्य समाजीकरण के माध्यम से ही हस्तान्तरित हो जाते हैं। इस भाँति, सामाजिक फन्दे का यह अत्याचार पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होता रहता है।

शिक्षा में असमानता

प्रारम्भिक वैदिक साहित्य से हमें यह पता चलता है कि वैदिक युग में लड़की का भी उपनयन संस्कार होता था और वह भी लड़कों की भाँति आश्रमों में शिक्षा के लिए जाती थी। धीरे-धीरे उसे शिक्षा से दूर किया जाता रहा और उसके लिए एकमात्र संस्कार विवाह ही माना जाने लगा। धर्मशास्त्रों तक आते-आते यह प्रक्रिया पूरी हो गई। मुस्लिम काल में तो स्त्री पूर्णतः निरक्षर थी। नई दिल्ली स्थित ‘भारतीय समाज विज्ञान अनुसन्धान परिषद' (ICSSR) द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चलाता है कि 1971 ई० में साक्षर स्त्रियाँ 18.4 प्रतिशत थीं, 1981 ई० में यह प्रतिशत 25 था, जबकि 1991 ई० तथा 2001 ई० की जनगणनाओं के अनुसार यह क्रमश: 39.42 तथा 54.16 प्रतिशत हो गया है। वास्तव में, यह प्रगति नगरीय क्षेत्रों में उच्च और मध्यम वर्गों के बीच अधिक हुई है।

रोजगार में असमानता

यह सत्य है कि आज स्त्रियाँ सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर काम कर रही हैं, तथापि रोजगार में काफी असमानता पाई जाती है। रोगजार में स्त्रियों का अनुपात काफी कम है। स्त्री श्रम की भी अजब कहानी है। उसकी गृहस्थी का कार्य, जो वह प्राय: सबसे पहले उठकर प्रारम्भ करती है और देर रात तक समाप्त करती है, अनुत्पादक माना जाता है। कृषि क्षेत्र में, जहाँ कि 80 प्रतिशत स्त्रियाँ काम कर रही हैं, स्त्री श्रम को पुरुषों की अपेक्षा कम मजदूरी मिलती है तथा वहाँ भी वे असंगठित हैं और मौसमी रोजगार के उच्चावचन से पीड़ित हैं। संगठित उद्योगों में स्त्रियाँ निम्न स्तर पर ही कार्य कर रही हैं। वृत्ति समूहों की दृष्टि से स्त्रियाँ सर्वाधिक शिक्षण में हैं, चिकित्सा और नर्सिंग के क्षेत्र में भी स्त्रियाँ प्रवेश कर चुकी हैं।

स्वास्थ्य एवं पोषण सम्बन्धी सुविधाओं में असमानता

स्त्रियों में अस्वास्थ्य और कुपोषण की भी भारी समस्या है। बचपन से ही लड़कियों को वह पोषक पदार्थ नहीं दिए जाते जो लड़कों को दिए जाते हैं। वे स्वयं ही अपने शरीर की रक्षा और स्वास्थ्य पर बहुत कम ध्यान देती हैं। प्राय: घर में वही स्त्री, जो अपने पति और बच्चों के लिए अच्छे से अच्छा भोजन बनाती है, बाद में जो बच जाता है उसे खाती है और अगर बासी भोजन रखा है तो पहले उसे खाती है।
मातृत्व का भार भी उस पर सबसे ज्यादा है। शारीरिक व्यायाम की तो उन्हें शिक्षा ही नहीं दी जाती। ज्यादातर उनमें खून की कमी रहती है। एक ओर गरीब निर्धन स्त्रियों को तो उचित चिकित्सा एवं पोषण मिलना ही दुश्वार है तो, दूसरी ओर, धनी स्त्रियों के लिए समस्या इससे उलटी है। वहाँ अत्यधिक दवाइयों का सेवन या आलसी जीवन एक समस्या बन गया है। ज्यादातर स्त्रियाँ असंगठित कार्य-क्षेत्र में लगी हैं जहाँ उनके स्वास्थ्य का कोई ध्यान नहीं रखा जाता। बहुत से व्यवसाय विशेषत: स्त्री के लिए हानिकारक हैं, परन्तु वहाँ भी उनकी देखभाल का कोई प्रबन्ध नहीं है। घर के मार-पीट के वातावरण और तनावभरी जिन्दगी के बीच स्त्री का स्वास्थ्य गिरता ही जाता है।

यौन शोषण तथा यौन उत्पीड़न

यौन शोषण तथा यौन उत्पीड़न स्त्रियों की एक प्रमुख समस्या है। चाहे घर हो अथवा कार्यस्थल, आज भी स्त्रियों को विविध रूपों में यौन शोषण एवं यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। स्त्रियों से छेड़छाड़ तथा कार्यस्थलों पर उनके शोषण की घटनाएँ सामान्य हो गई हैं जिन्हें दैनिक समाचारपत्रों में रोजाना देखा जा सकता है।

दहेज के कारण उत्पीड़न

दहेज एक ऐसी समस्या है जो कानून बनाने के बावजूद यथावत् बनी हुई है। हजारों स्त्रियों को दहेज न लाने के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है तथा अनेक स्त्रियाँ तो उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या तक कर लेती हैं। दहेज के विरुद्ध जिस प्रकार का जनमत निर्मित किए जाने की आवश्यकता है, वह आज भी नहीं हो पा रहा है। ऐसा लगता है कि कोई भी दहेज पर अंकुश लगाने में अपने आपको समक्ष नहीं मान रहा है।

तलाक द्वारा उत्पीड़न

स्त्रियों की एक अन्य समस्या तलाक है। पति-पत्नी के वैवाहिक सम्बन्धों का कानूनी दृष्टि से विच्छेद किया जाना तलाक है। तलाक के विभिन्न समुदायों में भिन्न-भिन्न आधार हैं परन्तु तलाक स्त्री के लिए पुरुषों की अपेक्षा अधिक कष्टकारी और आघातपूर्ण घटना है। अदालत की लम्बी प्रक्रिया, बच्चों का प्रश्न, स्वयं के जीवन निर्वाह का प्रश्न, सामाजिक अप्रतिष्ठा और निन्दा का सामना - यह सब स्त्री को भुगतना पड़ता है, पुरुष को नहीं। तलाक प्राप्त स्त्री भारतीय समाज में अप्रतिष्ठा का विषय है और उसके पुनर्विवाह की समस्या भी कठिन है। इसलिए स्त्री के लिए तलाक एक महँगा सौदा है। परन्तु ऐसी अनेक परिस्थितियाँ आ जाती हैं; जैसे पति द्वारा क्रूर यातना दिया जाना, उसका व्यभिचार में लिप्त होना या घर छोड़कर कहीं चले जाना आदि; जो तलाक को ही एकमात्र हल के रूप में प्रस्तुत करती हैं।

वैधव्य के बारे में दोहरे मापदण्ड

स्त्री के लिए वैधव्य सबसे भयानक शब्द है। उसका सबसे बड़ा सौभाग्य सुहागिन बनना है। सूनी माँग मृत्यु से भी ज्यादा भयानक है। हिन्दुओं की उच्च जातियों में विधवा के पुनर्विवाह की परम्परा नहीं थी। विधवा से बड़े संयमी और तपस्वी जीवन व्यतीत करने की आशा की जाती थी। इस पर भी उसे अनिष्टकारी माना जाता था और घर की बड़ी-बूढ़ियाँ उसे डायन कहती थीं जो अपने सुहाग को खा गई। उससे आशा की जाती थी कि वह यौन सम्बन्धी सभी बातों से विमुख रहेगी, जबकि परिवार के नजदीकी रिश्तेदार और समाज में फिरते भूखे भेड़िए उसकी देह लूटने की चेष्टा करते हैं। यदि जाल में फंस गई तो सारा दोष उसी का है, पुरुष तो उस लांछन से छूट ही जाता है। अनेक विधवाएँ वेश्यालयों तक भी पहुँच जाती हैं। इस विषय पर भी गांधी जी के विचार अनुकरणीय हैं। उनका विचार है कि जो विधवा संयम न रख सके उन्हें पुनर्विवाह का अधिकार होना चाहिए। जो पुन: विवाह की इच्छुक न हो उन्हें समाज कल्याण के कार्यों में प्रशिक्षित करके रचनात्मक कार्यों के लिए प्रेरित करना चाहिए। ऐसी स्त्रियों की संगठित शक्ति सामाजिक उत्थान में बहुत बड़ा योगदान दे सकती है।

स्त्रियों के प्रति हिंसा

स्त्रियों की एक अन्य समस्या उनके प्रति होने वाली हिंसा है। यह हिंसा विविध रूपों में होती है जिनमें घरेलू हिंसा तथा कार्यस्थल पर होने वाली हिंसा प्रमुख है। हिरासत की स्थिति में हिंसा, बलात्कार, यौन उत्पीड़न, अश्लील साहित्य एवं विज्ञापन, वेश्यावृत्ति तथा स्त्रियों का अनैतिक व्यापार स्त्रियों के प्रति होने वाली हिंसा के प्रमुख स्वरूप हैं।

स्त्री हत्या

स्त्री हत्या वह हत्या कही जा सकती है जो उस समय हो जबकि वह माँ के गर्भ में है, या जन्म लेने के बाद स्त्री-शिशु हत्या के रूप में है और चाहे जलती बहू या किसी अन्य प्रकार के उत्पीड़न से । मारने के रूप में है। इतना ही नहीं, इसमें ऐसी घटनाएँ भी शामिल हैं जिनमें ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दी गई हों कि स्त्री ने मजबूर होकर आत्महत्या कर ली हो। ऐसी घटनाएँ स्त्री के उत्पीड़न की बड़ी दर्दनाक कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं और वे इक्का-दुक्का घटनाएँ नहीं हैं कि जिन्हें अपवाद समझकर टाल दिया जाए। यह तो एक राष्ट्रीय खोज का विषय है। गर्भ में लिंग निर्धारण के परीक्षण, जिसे (Amniocentesis) कहा जाता है, के द्वारा यह पता चल जाता है कि गर्भ में लड़का है या लड़की, तथा हजारों की संख्या में लोग, यह पता लगने पर कि गर्भ में लड़की है, गर्भपात करा लेते हैं। जन्म लेने से पहले ही स्त्री की हत्या हो जाती है। बहुत-से कुतर्की कहते हैं कि अगर पहले से ही किसी के कई लड़कियाँ हैं तो ऐसे माँ बाप का, जहाँ केवल लड़के की चाह है, ऐसा करना अनुचित नहीं है। अनचाहे शिशु को जन्म देने से क्या लाभ? परन्तु यह तर्क तो ऐसा है जैसे यह कहना कि हम गरीबी नहीं चाहते तो गरीबों को मार ही क्यों न दिया जाए या फिर जिस माता-पिता के पहले से कई लड़के हैं और गर्भ परीक्षण से पता चले कि गर्भ में फिर एक लड़का है तो क्या ऐसे में भी वह गर्भपात कराना चाहेंगे? कदापि नहीं। वास्तव में, पुत्र या पुत्री में अन्तर किया जाना ही दोषपूर्ण है। सच तो यह है कि पुत्र या पुत्री के चरित्र व आचरण से परिवार का नाम चलता है न कि मात्र पुत्र के द्वारा। महात्मा गांधी के चार लड़के थे पर आम आदमी उनका नाम तक नहीं जानता, जबकि पं० जवाहरलाल नेहरू के एक पुत्री थी और सारी दुनिया उसका नाम जानती है। इसी भाँति लड़की माँ-बाप की ज्यादा सेवा करती है और नालायक बेटा तो माता-पिता के लिए मृत्युपर्यन्त जी का जंजाल बना रहता है।
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