विज्ञापन रणनीति क्या है? | vigyapan men ranniti

विज्ञापन में रणनीति व अपील

आकर्षक चित्र सामग्री, रोचक शब्दावली, मोहक रंगों तथा रूचिपूर्ण रूप विन्यास से भरपूर विज्ञापन को प्रायः एक कला माना जाता है। किन्तु विज्ञापन एक विज्ञान भी है। यह सुनियोजित, सुव्यवस्थित तथा सुसंगत भी होते हैं। वस्तुतः नियोजन तथा रणनीति विज्ञापन निर्माण का एक अभिन्न अंग हैं।
विज्ञापनों को आकर्षक व रोचक बनाने के लिए रोचक शब्दावली, चित्र सामग्री, रूप विन्यास तथा रंगों आदि अनेक तत्वों का प्रयोग किया जाता है वहीं उन्हें सुसंगत तथा प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न प्रकार की अपीलों का इस्तेमाल किया जाता है।
vigyapan men ranniti
विज्ञापन के क्षेत्र में यह मान्यता है कि विज्ञापन सही रणनीति व नियोजन का सही निर्धारण व क्रियान्वयन है। जहाँ रणनीति विज्ञापन को सफल बनाने में मददगार साबित होती है वहीं अपीलें उपभोक्ताओं को विज्ञापित वस्तु के साथ जोडते हुए उसको ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
इस लेख में हम विज्ञापन में इस्तेमाल किए जाने वाले विभिन्न रणनीतियों का अवलोकन करेंगे।
साथ ही विज्ञापनों में प्रयुक्त अपीलों के बारे में विस्तार से चर्चा की जाऐगी। अन्त मे हम विज्ञापन के लक्षित उपभोक्ता वर्गों के बारे में भी चर्चा करेंगे।
इस लेख की संरचना इस प्रकार रहेगी-
  • उद्देश्य
  • परिचय
  • विषय वस्तु की प्रस्तुति
  • विज्ञापन में प्रयुक्त रणनीतियां
  • विज्ञापन में प्रयुक्त अपीलें
  • विज्ञापन के लक्षित उपभोक्ता वर्ग
  • सारांश
  • सूचक शब्द
  • स्व मूल्यांकन हेतु प्रश्न
  • संदर्भित पुस्तकें

उद्देश्य

प्रायः हम विज्ञापनों को उनमें प्रयुक्त चित्र व शाब्दिक सामग्री से समझते हैं। किन्तु विज्ञापन प्रमुख रूप से व्यवसायिक व सामाजिक संचार है। सफल विज्ञापन के कई पहलू हैं। इनमें शामिल हैं: विज्ञापन में प्रयुक्त रणनीति, नियोजन, अपीलों का सही निर्धारण तथा इन सबका सही क्रियान्वयन। साथ ही लक्षित उपभोक्ता वर्ग का सही निर्धारण व उसके बारे में समझ भी विज्ञापन के संदर्भ में विशेष भूमिका निभाते हैं।
इस अध्याय के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-
  • विज्ञापन में प्रयुक्त रणनीतियों के बारे में परिचित होना।
  • विज्ञापन में प्रयुक्त अपीलों को समझना।
  • विज्ञापन के लक्षित उपभोक्ता वर्ग को समझना।

परिचय

विज्ञापन संवर्धन का एक साधन है। संवर्धन विपणन का साधन है। वस्तुतः विज्ञापन विपणन का अंग होता है। जाहिर-सी बात है कि विज्ञापन में प्रयुक्त सभी रणनीति आदि का निर्धारण विपणन में प्रयुक्त रणनीति के संदर्भ में ही होना चाहिए।
विज्ञापन निर्माण से पहले हम विज्ञापन के उद्देश्यों का निर्धारण करते हैं। उचित उद्देश्यों के निर्धारण के उपरान्त हम संबंधित रणनीतियों का निर्धारण करते हैं। रणनीति मुख्य रूप से स्थूल किन्तु स्पट दिशा निर्देश है। चयनित रणनीतियों के आधार पर विज्ञापन हेतू नियोजन का कार्य किया जाता है। नियोजन रणनीतियों का सूक्ष्म रूप होता है। रणनीति व नियोजन के आधार पर ही विज्ञापन अभियानों का क्रियान्वयन किया जाता है। इस लेख में हम विज्ञापन से इन पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे:

विषय वस्तु की प्रस्तुति

किसी भी विज्ञापन को सफल बनाने के पीछे सुनिर्धारित रणनीति तथा उनका सही क्रियान्वयन प्रमुख भूमिका निभाते हैं। विज्ञापन का प्रमुख उद्देश्य लक्षित उपभोक्ता को प्रोत्साहित करना होता है। इस दिशा में उपभोक्ता वर्ग का सही चयन तथा उनके लिए सही अपीलों का निर्धारण भी जरूरी है।
इस अध्याय में इन तीन पहलूओं से परिचित होगें-
  1. विज्ञापन में प्रयुक्त रणनीतियां
  2. विज्ञापन में प्रयुक्त अपीलें
  3. विज्ञापन के लक्षित उपभोक्ता वर्ग

विज्ञापन में प्रयुक्त रणनीतियां

रणनीति आमतौर पर युद्धविद्या से संबंधित विधा है। किन्तु पिछले कुछ दशकों से इसका प्रचलन विपणन व विज्ञापन हेतू भी किया जाने लगा है। विज्ञापन की बात करें तो रणनीति का अर्थ विज्ञापन निर्माण व प्रस्तुतिकरण हेतू निश्चित स्थूल दिशा निर्देश से है। विज्ञापन में रणनीति एक किस्म से मार्गदर्शक का कार्य करती है। विज्ञापन का खाका बनाने में रणनीति मददगार साबित होती है। विज्ञापन में प्रयुक्त प्रमुख रणनीतियां हैं-
  • जेनरीक या वर्गीय रणनीति
  • प्रिएम्पटीव या अग्रक्रय रणनीति
  • युनिक सेलिंग प्रोपोजिशन या अनूठी बिक्रि व प्रस्तावना रणनीति
  • बांड इमेज रणनीति
  • ब्रांड पोजीशनिंग या ब्रांड स्थिति निर्धारण रणनीति

जेनरीक या वस्तु-वर्गीय रणनीति
इस प्रकार की रणनीति आमतौर पर विभिन्न वस्तु वर्गों के अग्रणी ब्रांडों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। यह ब्रांड विज्ञापन के जरिए प्रायः अपने प्रतिद्वंदियों की उपस्थिति को भी नकारते हैं। जेनेरीक रणनीति के जरिए बनाए गए विज्ञापनों में केवल मात्र विज्ञापित ब्रांड को पूरे वर्ग में एकमात्र विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हाल ही में आया कोका कोला का विज्ञापन अभियान इसका प्रमुख उदाहरण है। इस अभियान की विज्ञापन श्रृंखला में कोका कोला को केवल मात्र कोला वर्ग में ही नहीं अपितु समूचे ठण्डा या शीतल पेय वर्ग में एकमात्र विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मानो कोका कोला के अलावा बाजार में कोई और शीतल पेय विकल्प ही न हो। इस विज्ञापन श्रृंखला में अन्य कोला पेय बाकी सभी बोतल व पैकेट में उपलब्ध पेय तथा शरबत, नींबू पानी, शिकंजी जैसे घरेलू शीतल पेयों आदि की उपस्थिति को नकारा गया है। कोका कोला को समूचे शीतल पेय का वर्ग के एकमात्र विकल्प के रूप में ठण्डा मतलब कोका कोला स्लोगन के जरिए प्रस्तुत किया गया है।

युनिक सेलिंग प्रोपोजिशन या अनूठी बिक्री प्रस्तावना रणनीति
विज्ञापित वस्तु या सेवा में कोई खास तत्व होने की स्थिति में इस रणनीति का प्रयोग किया जाता है। विपणन एक स्पर्धायुक्त विधा है। इसी कारण सभी विपणक अपनी वस्तु सेवा में कोई विशेष तत्व या पहलू को ढूंढकर प्रतिद्वंद्वी वस्तु सेवाओं से अनूठा व बेहतर साबित करने का प्रयास करते हैं। यह कोई शारीरिक या व्यवहारिक तत्व हो सकते हैं। यही कारण है कि कोई अपने अनोखे आकार को अनूठी बिक्री प्रस्तावना के रूप में प्रस्तुत करता है तो कोई किसी व्यवहारिक तत्व जैसे लगाना आसान, चलाना आसान, कम लागत, लम्बे समय तक चलना आदि को इस रणनीति के तहत प्रस्तुत करते हैं। एकल तत्वों के साथ-साथ कई विपणक एकाधिक शारीरिक व व्यवहारिक तत्वों के समूह को भी अनूठी बिक्री प्रस्तावना के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

प्रिएम्प्टीव क्लेम या अग्रकय दावा रणनीति
प्रायतः ऐसा सम्भव नहीं होता है कि विज्ञापित वस्तु में कोई अनूठा तत्व हो। किन्तु लगभग सभी वस्तु व सेवाएं अनेक शारीरिक व व्यवहारिक तत्वों का समाहार होती हैं। ऐसी स्थिति में विपणक व विज्ञापक वस्तु में निहित ऐसे तत्वों को चिहनित करते हैं जिसके बारे में प्रतिद्वंद्वी ब्रांड कोई बात न करते हों। निश्चित तत्वों के बारे में दावे को लेकर सबसे पहले पहुंचने का प्रयास किया जाता है। प्रतिद्वंद्वी वस्तुओं में वह तत्व निहित होने के बावजूद भी पहले दावा करने के कारण श्रेय उसी वस्तु या सेवा को जाता है। उदाहरण के तौर पर भारत में निर्मित अधिकतर टूथपेस्टों में लोंग का तेल पाया जाता है। किन्तु एक टूथपेस्ट ब्रांड ने लोंग के तेल के बारे में बात करके उस तत्व पर अपना मालिकाना सत्व-सा बना दिया है।

ब्रांड इमेज रणनीति
आज के दिन तकनीकी अग्रसरता के कारण अधिकतर वस्तु व सेवाओं में कोई निश्चित व अनूठा तत्व नहीं पाया जाता। बाजार में उपलब्ध किसी भी वस्तु सेवा वर्ग के अधिकतर ब्रांड लगभग एक जैसे होते हैं। ऐसी स्थिति में वस्तु में निहित शारीरिक व व्यवहारिक तत्वों से अलग छवि बनाने का प्रयास किया जाता है। इसी कारण किसी मोटरसाईकिल को बॉस का खिताब दे दिया जाता है तो किसी शीतल पेय को नई पीढी का शीतल पेय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसी क्रम में एक निश्चित ब्रांड के बिस्किट को एनी टाईम बिस्किट बताया जाता है।

ब्रांड पोजीशनिंग या ब्रांड स्थिति निर्धारण रणनीति
किसी भी वस्तु की स्थिति का आंकलन उसकी बिक्री मात्रा से किया जाता है। किन्तु वास्तविकता यह है कि किसी वस्तु की बाजार में स्थिति उस वस्तु के प्रति उपभोक्ताओं के मन में छवि का ही प्रतिफलन है। इसी कारण अनेक विपणक अपनी वस्तु या सेवा के लिए उपभोक्ताओं के मन में एक निश्चित जगह बनाने का प्रयास करते हैं। इस क्रम में एक बढिया उदाहरण हैदो मिनट में बनने वाला मैगी नूडल।

विज्ञापन में प्रयुक्त प्रणालियाँ

हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि विज्ञापनों में वस्तु व सेवाओं के संदर्भ में संदेश प्रस्तुत करने के लिए कहानीनूमा ताना-बाना बुना जाता है। विज्ञापन के क्षेत्र में माना जाता है कि हर विज्ञापित वस्तु व सेवा की कोई न कोई कहानी होती है। इस संदर्भ में अलग-अलग विज्ञापक अलग-अलग शैली व प्रणालियाँ का प्रयोग करते हैं।
कुछ विज्ञापक एक सूचना प्रधान शैली को अपनाते हुए प्रत्यक्ष व सीधे-सपाट तरीके से सम्बन्धित तथ्य व सूचनाओं को प्रस्तुत करते हैं। कार, टेलिविजन, फ्रिज, वाशिंग मशीन आदि स्लो मूविंग कन्ज्यूमर गुड्स या एस.एम.सी.जी. वर्ग की वस्तुओं के विज्ञापनों में इस शैली का अधिक प्रयोग किया जाता है। इस वर्ग की वस्तुओं की खरीददारी का निर्णय लेते समय उपभोक्ता सम्बन्धित सभी सूचना व तथ्यों को परखना चाहते हैं।
इस वर्ग से विपरित फास्ट मूविंग कन्ज्यूमर गुड्स या एफ.एम.सी.जी. वर्ग की वस्तुओं के लिए विज्ञापनों में मार्मिक व छवि प्रधान शैली का इस्तेमाल किया जाता है। शीतल पेय, प्रसाधन सामग्री, नहाने का साबुन आदि वस्तु खरीदते समय उपभोक्ता प्रायतः वस्तु सम्बन्धित सूचना के बदले वस्तु की छवि से ज्यादा प्रभावित होते हैं। इस वस्तु वर्ग में क्रय निर्णय प्रायतः मार्मिक या इमोशनल ही होते हैं।
इन शैलियों के अलावा विज्ञापनों में वस्तु व सेवा सम्बन्धी संदेश को प्रस्तुत करने के लिए अनेक प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है।
इनमें प्रमुख हैं-
  • हास्य व व्यंग्य
  • नाटकीयता
  • क्रियाशीलता या एक्शन
  • सेक्स अपील
  • जीवन से जुडी आम घटना या स्लाइश ऑफ लाइफ
  • प्रसिद्ध व चर्चित हस्तियाँ
  • विशेष काल्पनिक या वास्तविक पात्र
  • बच्चे
  • पशु-पक्षी
  • स्वतन्त्र स्थान विशेष
विज्ञापनों में बहुत कम बार प्रत्यक्ष व सीधी-सपाट शैली का प्रयोग किया जाता है। प्रायतः अधिकतर विज्ञापनों में एक अप्रत्यक्ष शैली का इस्तेमाल किया जाता है। विज्ञापन में शामिल संदेश की ग्राह्यता बढाने हेतू ऊपर लिखित प्रणालियों का एकल या सामूहिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। इन प्रणालियों को संदेश सम्प्रेषण का आधार या वाहन माना जाता है। इन आधारों के प्रयोग से विज्ञापन संदेश को आकर्षक व रोचक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है तथा संदेश को आसानी से समझा जा सकता है व ग्रहण भी किया जा सकता है। विज्ञापन संदेश के प्रभावी सम्प्रेषण व संचार हेतू इन आधारों का इस्तेमाल किया जाता है।
वोडाफोन के विज्ञापन में इस्तेमाल किया गया कुत्ता विज्ञापित सेवा की निष्ठता या लॉयलिटि को दर्शाता है। वहीं सिएट टायर में गेंडा विज्ञापित वस्तु की मजबूती को प्रतिबिम्बित करता है। अधिकतम विज्ञापन नाटकीयता व क्रियाशीलता या एक्शन को प्राधान्य देते हैं। पिछले कुछ वर्षों से स्लाइस ऑफ लाइफ एक बहु प्रचलित आधार बन चुका है। प्रसाधन सामग्री से लेकर अन्य वस्तुओं के विज्ञापन में सेक्स अपील का प्रयोग किया जाता है।

विज्ञापन में प्रयुक्त अपीलें

विज्ञापन प्रमुख रूप से संवर्धन या प्रोमोशन का साधन है। वस्तु व सेवाओं की ग्राह्यता बढाने हेतू विज्ञापन उपभोक्ताओं को मनाने, बुझाने, रिझाने या प्रेरित करने का प्रयास करता है। इसी संदर्भ में विज्ञापनों मे अपीलों का इस्तेमाल किया जाता है। सरल शब्दों में विज्ञापन अपीलों का अर्थ प्रेरित या प्रोत्साहित करने वाले तत्व हैं।
कहा जाता है कि हम सभी चाहतों के पुतले हैं। हर इन्सान में चाहतों के अलावा आशाएं, आकांक्षाएं, महत्वकांक्षाएं, लक्ष्य तथा आवश्यकताओं के साथ-साथ अनेक रूचियाँ कूट-कूट कर भरी होती हैं। ये सभी हमें अलग-अलग काम करने के लिए प्रेरित करते हैं। विज्ञापनों में इन आशाओं, अपेक्षाओं की पूर्ति के कारक के रूप में विज्ञापित वस्तु से होने वाले फायदे को प्रस्तुत किया जाता है।
कहा यह भी जाता है कि उपभोक्ता केवल मात्र वस्तु को ही नहीं खरीदता अपितु वह उस वस्तु से होने वाले फायदे की उम्मीद को खरीद रहा होता है। घरेलू उपयोग की वस्तु को खरीदते समय हम प्रकारान्त में आराम, लगाने में आसानी, चलाने में आसानी, साफ-सफाई, भरोसा, लम्बे समय चलना, सुरक्षा, एकाधिक तत्व व कार्यक्षमता आदि की उम्मीद खरीद रहे होते हैं।
अपील के चयन हेतू हमें बहुत ज्यादा खोज करने की आवश्यकता नहीं होती। अनेक वस्तुओं में उनसे होने वाले फायदों के कारक व कारण वस्तुओं में निहित होते हैं। प्रायतः वस्तुओं में निहित शारीरिक व व्यवहारिक तत्व ही अपीलों के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।
अपीलों का चयन करते समय निम्नलिखित बिन्दुओं का खयाल रखा जाता है-
  • अपील विज्ञापित ब्रांड के सम्बन्धित या संदर्भ में होनी चाहिए।
  • अपील उपभोक्ताओं की नज़र में महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
  • अपील विज्ञापित वस्तु वर्ग में अनोखी होनी चाहिए।
साथ ही प्रभावी अपील अर्थपूर्ण, प्रत्यक्ष व निश्चित, तथा विश्वसनीय होती है।
इस विज्ञापित वस्तु से दूसरी प्रतिद्वंद्वी वस्तुओं की तुलना में मुझे क्या फायदा होने वाला है ? विज्ञापन में प्रयुक्त अपील इस प्रश्न का उत्तर देती है। इसके साथ-साथ अपील इतनी प्रत्यक्ष व दृश्यमान होनी चाहिए कि विज्ञापन में इसे दिखाया जा सके तथा इसके बारे में बात की जा सके। अपीलों का विश्वसनीय होना भी अत्यावश्यक है। किसी उपभोक्ता द्वारा कोई वस्तु खरीदे जाने से पहले उस वस्तु पर व्यक्ति का भरोसा आना आवश्यक है। उपभोक्ताओं की शंका तथा द्वंद्व को दूर करने के लिए विपणक ट्रायल ऑफर, मनीबैक ऑफर तथा गारन्टी व वारन्टी आदि का सहारा लेते हैं।
विज्ञापन में प्रयुक्त अपील मूल रूप से एक क्रय-कारण है। विज्ञापन में प्रमुख रूप से दो प्रकार की अपीलें इस्तेमाल की जाती हैं

तार्किक अपीलें
स्वच्छता, लम्बे समय तक चलने की क्षमता, किफायती मूल्य, किफायती मात्रा, लगाने में आसानी, चलाने में आसानी, सुरक्षा, अनेक विकल्पों की उपलब्धता, तत्व बहुलता, कार्य बहुलता, अपेक्षित गुणवत्ता, आराम, शारीरिक कार्य से निजात आदि।

मार्मिक अपीलें
आकांक्षाएं, शारीरिक कार्य से निजात, भूख, कौतूहल, मनोरंजन, सुखी घरेलू जीवन, घरेलू आराम, सौन्दर्य निखार, स्टाईल, खेलकूद, सामाजिक स्वीकृति व प्रतिष्ठा, ईर्ष्या, ग्लानि, प्रेम-प्रणय आदि।
तार्किक अपीलों का प्रयोग उपभोक्ताओं की वस्तु व सेवा सम्बन्धित व्यवहारिक व प्रयोजनसम्बन्धित आवश्यकता की पूर्ति हेतू किया जाता है। मार्मिक अपीलों का प्रयोग उपभोक्ताओं की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व प्रतीकात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतू किया जाता है। विज्ञापनों में इन दोनों प्रकार की अपीलों का प्रयोग एकल या सामाजिक रूप में किया जाता है। अपीलों से दो प्रमुख फायदे हैं। यह विज्ञापित वस्तु व सेवा के लिए एक निश्चित, अनूठी व सकारात्मक छवि बनाने में मददगार साबित होती है तथा उपभोक्ताओं में रूचि व इच्छा जागृत कराते हुए उनको प्रेरित करती है।
इन दोनों प्रकार की अपीलों के अलावा सामाजिक विज्ञापनों में नैतिक अपीलों का भी उपयोग किया जाता है।

विज्ञापन के लक्षित उपभोक्ता वर्ग

विज्ञापन के क्षेत्र में लक्षित उपभोक्ता वर्ग का निर्धारण एक अति महत्वपूर्ण निर्णय होता है। विपणन के क्षेत्र में यह माना जाता है कि सभी वस्तु व सेवाएं सभी उपभोक्ताओं के लिए नहीं होतीं। अलग-अलग वस्तु व सेवाओं के लिए निश्चित उपभोक्ता वर्ग होते हैं। विपणक सबसे पहले इस वर्ग को चिह्नित व निर्धारित करता है। विज्ञापन की भाषा में इसको लक्षित उपभोक्ता वर्ग या टारगेट ऑडियंस कहा जाता है।
लक्षित उपभोक्ता वर्ग में वर्तमान के उपभोक्ताओं के साथ-साथ भावी उपभोक्ता भी शामिल होते हैं। इन उपभोक्ताओं को प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयक वर्गों में बांटा जाता है।
विज्ञापन बनाने से पहले लक्षित उपभोक्ता वर्ग से सम्बन्धित सभी प्रकार की जानकारियाँ इकट्ठी की जाती हैं। इस वर्ग के बारे मे भौगोलिक, जनसंख्या संबंधित या डेमोग्राफिक तथा मनोवैज्ञानिक या साइकोग्राफिक जानकारियाँ इकट्ठी की जाती हैं। ये जानकारियाँ लक्षित उपभोक्ता वर्ग की आशाएं, अपेक्षाओं के साथ-साथ उनके क्रय व्यवहार आदि को समझने मे मददगार साबित होती हैं। इसी समझ के साथ प्रभावी विज्ञापन संदेश बनाए जाते हैं।

सारांश

विज्ञापन संवर्धन का एक साधन है। संवर्धन विपणन का साधन है। वस्तुतः विज्ञापन विपणन का अंग होता है। विज्ञापन में प्रयुक्त सभी रणनीति आदि का निर्धारण विपणन में प्रयुक्त रणनीति के संदर्भ में ही होना चाहिए। चयनित रणनीतियों के आधार पर विज्ञापन हेतू नियोजन का कार्य किया जाता है। नियोजन रणनीतियों का सूक्ष्म रूप होता है। रणनीति व नियोजन के आधार पर ही विज्ञापन अभियानों का क्रियान्वयन किया जाता है।
रणनीति युद्धविद्या से संबंधित विधा है। विज्ञापन की बात करें तो रणनीति का अर्थ विज्ञापन निर्माण व प्रस्तुतिकरण हेतू निश्चित स्थूल दिशा निर्देश से है। विज्ञापन में रणनीति एक किस्म से मार्गदर्शक का कार्य करती है। विज्ञापन का खाका बनाने में रणनीति मददगार साबित होती
जेनरीक या वस्तु-वर्गीय रणनीति आमतौर पर विभिन्न वस्तु वर्गों के अग्रणी ब्रांडों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। यह ब्रांड विज्ञापन के जरिए प्रायः अपने प्रतिद्वंदियों की उपस्थिति को भी नकारते हैं। जेनेरीक रणनीति के जरिए बनाए गए विज्ञापनों में केवल मात्र विज्ञापित ब्रांड को पूरे वर्ग में एकमात्र विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
युनिक सेलिंग प्रोपोजिशन या अनूठी बिक्री प्रस्तावना रणनीति विज्ञापित वस्तु या सेवा में कोई खास तत्व होने की स्थिति में इस रणनीति का प्रयोग किया जाता है। सभी विपणक अपनी वस्तु सेवा में कोई विशेष तत्व या पहलू को ढूंढकर प्रतिद्वंद्वी वस्तु सेवाओं से अनूठा व बेहतर साबित करने का प्रयास करते हैं। यह कोई शारीरिक या व्यवहारिक तत्व हो सकते हैं।
आज के दिन तकनीकी अग्रसरता के कारण अधिकतर वस्तु व सेवाओं में कोई निश्चित व अनूठा तत्व नहीं पाया जाता। बाजार में उपलब्ध किसी भी वस्तु सेवा वर्ग के अधिकतर ब्रांड लगभग एक जैसे होते हैं। ऐसी स्थिति में वस्तु में निहित शारीरिक व व्यवहारिक तत्वों से अलग छवि बनाने का प्रयास किया जाता है।
किसी भी वस्तु की स्थिति का आंकलन उसकी बिक्री मात्रा से किया जाता है। किन्तु वास्तविकता यह है कि किसी वस्तु की बाजार में स्थिति उस वस्तु के प्रति उपभोक्ताओं के मन में छवि का ही प्रतिफलन है। इसी कारण अनेक विपणक अपनी वस्तु या सेवा के लिए उपभोक्ताओं के मन में एक निश्चित जगह बनाने का प्रयास करते हैं।
विज्ञापनों में वस्तु व सेवाओं के संदर्भ में संदेश प्रस्तुत करने के लिए कहानीनूमा ताना-बाना बुना जाता है। विज्ञापन के क्षेत्र में माना जाता है कि हर विज्ञापित वस्तु व सेवा की कोई न कोई कहानी होती है। इस संदर्भ में अलग-अलग विज्ञापक अलग-अलग शैली व प्रणालियाँ का प्रयोग करते हैं।
विज्ञापन में शामिल संदेश की ग्राह्यता बढाने हेतू ऊपर लिखित प्रणालियों का एकल या सामूहिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। इन प्रणालियों को संदेश सम्प्रेषण का आधार या वाहन माना जाता है। इन आधारों के प्रयोग से विज्ञापन संदेश को आकर्षक व रोचक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है तथा संदेश को आसानी से समझा जा सकता है व ग्रहण भी किया जा सकता है।

सूचक शब्द

जेनरीक : जेनरीक ऐसी रणनीति है जिसमें विभिन्न वस्तु वर्गों के अग्रणी ब्रांडों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। यह ब्रांड विज्ञापन के जरिए प्रायः अपने प्रतिद्वंदियों की उपस्थिति को भी नकारते हैं। जेनेरीक रणनीति के जरिए बनाए गए विज्ञापनों में केवल मात्र विज्ञापित ब्रांड को पूरे वर्ग में एकमात्र विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

युनिक सेलिंग प्रोपोजिशन : विज्ञापित वस्तु या सेवा में कोई खास तत्व होने की स्थिति में युनिक सेलिंग प्रोपोजिशन रणनीति का प्रयोग किया जाता है।

प्रिएम्प्टीव क्लेम : विज्ञापन के संदर्भ में यह रणनीति भी महत्त्वपूर्ण है। प्रायतः ऐसा सम्भव नहीं होता है कि विज्ञापित वस्तु में कोई अनूठा तत्व हो। किन्तु लगभग सभी वस्तु व सेवाएं अनेक शारीरिक व व्यवहारिक तत्वों का समाहार होती हैं। ऐसी स्थिति में विपणक व विज्ञापक वस्तु में निहित ऐसे तत्वों को चिह्नित करते हैं जिसके बारे में प्रतिद्वंद्वी ब्रांड कोई बात न करते हों। निश्चित तत्वों के बारे में दावे को लेकर सबसे पहले पहुंचने का प्रयास किया जाता है।

ब्रांड इमेज : वस्तु में निहित शारीरिक व व्यवहारिक तत्वों से अलग छवि बनाने का प्रयास किया जाता है, जो ब्रांड इमेज कहलाता है। इसी क्रम में एक निश्चित ब्रांड के बिस्किट को एनी टाईम बिस्किट बताया जाता है।

ब्रांड पोजीशनिंग : किसी भी वस्तु की स्थिति का आंकलन उसकी बिक्री मात्रा से किया जाता है। किन्तु वास्तविकता यह है कि किसी वस्तु की बाजार में स्थिति उस वस्तु के प्रति उपभोक्ताओं के मन में छवि का ही प्रतिफलन है। इसी कारण अनेक विपणक अपनी वस्तु या सेवा के लिए उपभोक्ताओं के मन में एक निश्चित जगह बनाने का प्रयास करते हैं।
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