कोशिका क्या है? सिद्धांत, संरचना, प्रकार एवं कार्य | cell in hindi

कोशिका cell in hindi

कोशिका (Cell) सजीवों के शरीर की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है और प्रायः स्वतः जनन का सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न जीवों का वह छोटे से छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएं होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहते हैं।
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'कोशिका' का अंग्रेजी शब्द सेल (Cell) लेटिन भाषा के 'सेलुला' शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ 'एक कक्ष' है। कुछ सजीव जैसे जीवाणुओं के शरीर एक ही कोशिका से बने होते हैं, उन्हें एककोशिकीय जीव कहते हैं जबकि कुछ सजीव जैसे मनुष्य का शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है उन्हें बहुकोशिकीय जीव कहते हैं।
कोशिका की खोज का श्रेय रॉबर्ट हुक (1665) को जाता है जिन्होंने सर्वप्रथम कॉर्क की स्लाइस में दिखाई देने वाले छोटे-छोटे कोष्ठों को सेलुली नाम दिया जो वास्तव में कोशिका भित्ति थी। जीवित कोशिका का अध्ययन सर्वप्रथम ल्यूवेनहॉक द्वारा किया गया।

कोशिका सिद्धांत (Cell Theory)

जर्मन पादप वैज्ञानिक मैथियास श्लाइडेन (1838) एवं जन्तु वैज्ञानिक थियोडोर श्वान (1839) अपनी-अपनी खोजों के आधार पर इस सामूहिक निष्कर्ष पर पहुंचे कि पादपों व जन्तुओं के शरीर कोशिकाओं एवं उनके उत्पादों से बने होते हैं। इसे कोशिका सिद्धांत (Cell theory) नाम दिया। परन्तु कोशिका सिद्धांत में कोशिका की उत्पत्ति को नहीं समझाया गया, जिसे बाद में रूडोल्फ विरचॉव (1855) द्वारा प्रतिपादित किया गया। इसके अनुसार कोशिका की उत्पत्ति पूर्ववर्ती कोशिका से होती है (Omnis Cellula e Cellua)| बाद में कोशिका सिद्धांत को नेगेली (1846) एवं रूडोल्फ विरचॉव (1855) ने नये रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया-
  • कोशिका सजीवों की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है।
  • सभी सजीवों का शरीर एक या अनेक कोशिकाओं तथा उनके उत्पादों से बना होता है।
  • प्रत्येक कोशिका में जीव के आनुवंशिक गुण निहित होते हैं।
  • नवीन कोशिकाओं का निर्माण पूर्ववर्ती कोशिकाओं (Pre existing cells) के विभाजन से होता है।
  • प्रत्येक कोशिका जीवन के निरंतरता (Continuity) के साथ उसके उद्गम एवं स्वभाव को दर्शाती है।

विषाणु कोशिका सिद्धांत के अपवाद हैं क्योंकि
  1. इनमें स्वतंत्र विभाजन की क्षमता नहीं पाई जाती है। इनके विभाजन के लिये दूसरी जीवित कोशिका आवश्यक होती है।
  2. इनमें प्लाज्मा झिल्ली, कोशिकाद्रव्य, विकर (एन्जाइम), कोशिकीय अवयव इत्यादि अनुपस्थित होते हैं।
  3. केवल एक केन्द्रक अम्ल (Nucleic acid) डीएनए अथवा आरएनए पाया जाता है। कोशिका में दोनों केन्द्रक अम्ल पाये जाते हैं।

कोशिका संरचना (Cell Structure)

विकास एवं केन्द्रक की संरचना के आधार पर कोशिकाएं दो प्रकार की होती हैं-
  1. प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic cell) तथा
  2. यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic cell)

प्राकैरियोटिक कोशिकाएं

प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic cell) = Pro = Primitive, (प्रा), Karyon=nucleus (केन्द्रक)। ये कोशिकाएं जीवाणु, नीलहरित शैवाल, माइकोप्लाज्मा और प्ल्यूरो निमोनिया समजीव (PPLO) आदि में मिलती हैं। सामान्यतया ये यूकैरियोटिक कोशिकाओं से बहुत छोटी होती हैं और काफी तेजी से विभाजित होती हैं। ये माप व आकार में काफी भिन्न होती हैं।
प्रोकैरियोटिक कोशिका का मूलभूत संगठन आकार व कार्य में भिन्नता के बावजूद एक सा होता है। सभी में कोशिका भित्ति होती है, जो कोशिका झिल्ली से घिरी रहती है। कोशिका में कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) एक तरल मैट्रिक्स के रूप में भरा रहता है। इसमें कोई स्पष्ट विभेदित केन्द्रक नहीं पाया जाता है। आनुवंशिक पदार्थ मुख्य रूप से नग्न व केन्द्रक झिल्ली द्वारा परिबद्ध नहीं होता है।
प्रोकैरियोटस में केन्द्रक को प्रोकेरियोन (Prokaryon) अथवा न्यूक्लिआइड (Nucleoid) कहते हैं जिसमें केन्द्रक कला तथा सत्य गुणसूत्रों का अभाव होता है। परिणामतः कोशिका विभाजन प्रत्यक्ष (Direct) होता है। इनमें द्विस्तरीय झिल्लीयुक्त कोशिकांगों का अभाव होता है।

यूकैरियोटिक कोशिकाएं

यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic cell) = Eu= Well (उत्तम), Karyon= Nucleus (केन्द्रक)। यूकैरियोटिक कोशिकाओं में सुविकसित तथा सुव्यवस्थित केन्द्रक तथा कोशिकांग होते हैं। गुणसूत्र स्पष्ट होते हैं तथा कोशिका विभाजन अप्रत्यक्ष (समसूत्रण एवं अर्द्धसूत्रण द्वारा) होता है। सभी उच्च श्रेणी के पौधों और जन्तुओं में ऐसी कोशिकाएं होती हैं।
सभी यूकैरियोटिक कोशिकाएं एक जैसी नहीं होती हैं। पादप व जन्तु कोशिकाएँ भिन्न होती हैं। पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ति, लवक एवं रसधानी (Vaccule) मिलती है जबकि प्राणी कोशिकाओं में ये अनुपस्थित होती हैं, दूसरी तरफ प्राणी कोशिकाओं में तारककाय मिलता है जो लगभग सभी पादप कोशिकाओं में अनुपस्थित होती है।

प्रोकैरियोटिक व यूकैरियोटिक कोशिकाओं की तुलना
प्रोकैरियोटिक कोशिका यूकैरियोटिक कोशिका
1. ये प्रारम्भिक कोशिकाएं हैं। इनमें केन्द्रक कला नहीं पायी जाती है। सुकेन्द्रिक कोशिकाओं में एक झिल्ली से घिरा हुआ केन्द्रक (Nucleus) होता है जिसके अन्दर आनुवंशिक सामग्री होती है।
2. स्पष्ट केन्द्रक नहीं होता है। केन्द्रकीय पदार्थ कोशिका द्रव में बिखरे होते हैं। स्पष्ट केन्द्रक होता है।
3. इन कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट, गॉल्जीबाड़ी, तारककाय, माइटोकान्ड्रिया तथा अन्तःद्रव्यीजालिका (E.R.) नहीं पायी जाती है। इन कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट, गॉल्जीबाड़ी, तारककाय, माइटोकान्ड्रिया तथा अन्तःद्रव्यीजालिका (E.R.) पायी जाती है।
4.70S प्रकार के राइबोसोम्स पाये जाते हैं। 80S प्रकार के राइबोसोम्स पाये जाते हैं।
5. डीएनए हिस्टोन प्रोटीन से सम्बद्ध नहीं होता है। उदाहरण – नीले हरे शैवाल तथा जीवाणु डीएनए हिस्टोन प्रोटीन से सम्बद्ध होता है। उदाहरण :- जन्तु एवं पादप

कोशिका का संगठन

कोशिका के तीन भाग होते हैं -
  1. कोशिका भित्ति (Cell wall)
  2. कोशिका झिल्ली (Cell membrane)
  3. जीवद्रव्य (Protoplasm)

कोशिका भित्ति (Cell wall)

पादपों की जीवद्रव्य झिल्ली के बाहर पाई जाने वाली दृढ़ निर्जीव आवरण को कोशिका भित्ति कहते हैं। कोशिका भित्ति कोशिका को केवल यांत्रिक हानियों और संक्रमण से ही रक्षा नहीं करती बल्कि यह कोशिकाओं के बीच आपसी सम्पर्क बनाए रखने तथा अवांछनीय वृहद् अणुओं के लिए अवरोध प्रदान करती है। कोशिका भित्ति - सेलुलोज, हेमीसेलुलोज, पेक्टीन व प्रोटीन की बनी होती है। कोशिका भित्ति के संगठन में मध्य पटलिका, प्राथमिक भित्ति, द्वितीय भित्ति एवं तृतीय भित्ति पाई जाती हैं।
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मध्य पट्टलिका मुख्यतः कैल्शियम पेक्टेट की बनी सतह होती है जो आस-पास की विभिन्न कोशिकाओं को आपस में चिपकाए व पकड़े रहती है। यह कोशिका भित्ति का सबसे बाह्य स्तर है। प्राथमिक भित्ति मध्य पटलिका के भीतर की ओर स्थित पतली, लचीली एवं कोमल भित्ति है।
इसमें वृद्धि की क्षमता होती है, जो कोशिका की परिपक्वता के साथ घटती जाती है व इसके साथ कोशिका के भीतर की तरफ द्वितीय भित्ति का निर्माण होने लगता है। तृतीय भित्ति, द्वितीयक भित्ति के अन्दर की ओर स्थित होती है तथा जीवद्रव्य के सूखे स्तर को प्रदर्शित करती है।
कोशिका भित्ति एवं मध्य पट्टलिका में जीवद्रव्य तंतु (Plasmadesmata) आड़े-तिरछे रूप में स्थित रहते हैं। जो आस-पास की कोशिका के कोशिका द्रव्य को जोड़ते हैं।

कोशिका झिल्ली (Cell membrane)

सभी कोशिकाओं में जीवद्रव्य के चारों ओर विभेदी पारगम्य, विद्युत आवेशित, चयनात्मक कोशिका झिल्ली पाई जाती है जो मुख्यतः वसा एवं प्रोटीन से बनी होती है। इसकी संरचना के बारे में विभिन्न मत प्रचलित हैं जिनमें से सिंगर एवं निकॉलसन (1972) का तरल मोजेक मॉडल सर्वमान्य है।


जिसमें इन्होंने बताया कि कोशिका झिल्ली 75 A° मोटी फॉस्फोलिपिड एवं प्रोटीन से बनी होती है इसके बीच के भाग में फॉस्फोलिपिड के दो स्तर होते हैं। प्रोटीन इसमें दो प्रकार से लगे रहते हैं - बाह्य या परिधीय प्रोटीन (Extrinsic protein) दोनों सतहों पर एक अणु मोटी तह बनाते हैं तथा कुछ आंतरिक या समाकल प्रोटीन (Intrinsic protein) वसीय परत के बीच में घिरे होते हैं। इन्हीं आंतरिक प्रोटीनों की सहायता से कोशिका झिल्ली पदार्थों के आवागमन को नियंत्रित करती है।
कोशिका झिल्ली कोशिका को निश्चित आकृति एवं कोशिकांगो को सुरक्षा प्रदान करती है। यह पदार्थों के निष्क्रिय परिवहन (Passive transport) जैसे विसरण, परासरण तथा सक्रिय परिवहन (Active transport) का कार्य करती है।

जीवद्रव्य (Protoplasm)

कोशिका भित्ति के अन्दर सम्पूर्ण जीवित पदार्थ (कोशिका द्रव्य + केन्द्रक) जीवद्रव्य (Protoplasm) कहलाता है। प्रोटोप्लाज्म शब्द का प्रयोग सबसे पहले पुरकिन्जे (1838) ने किया। जीवद्रव्य को जीवन का भौतिक आधार कहा जाता है।
  1. जीवद्रव्य के भौतिक गुण (Physical properties) - जीवद्रव्य एक जटिल विस्कासी (Viscoid) पारदर्शी या पारभाषी (Semi-translucent), रंगहीन, गंधहीन, लचीला और कणिकामय (Granular) द्रव्य है।
  2. रासायनिक गुण (Chemical properties) - पानी मुख्य संघटक है जोकि लगभग 90% होता है। इसके अलावा कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ होते है। सामान्यतया कार्बनिक पदार्थ कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन्स, लिपिड्स आदि। कार्बनिक पदार्थ सामान्यतः कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन्स, लिपिडस आदि तथा अकार्बनिक पदार्थ- कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम, आयरन, नाइट्रेट, सल्फेट, क्लोराइड, बोरोन आदि। इसके अतिरिक्त वर्णक, लेटेक्स, विटामिन्स, वृद्धि नियंत्रक, विकर तथा एल्केलायड आदि।

कोशिका द्रव्य (Cytoplasm)

कोशिका द्रव्य जीवद्रव्य का वह भाग है जो कोशिका झिल्ली द्वारा घिरा होता है तथा कोशिका भित्ति एवं केन्द्रक के मध्य में होता है।
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कोशिका द्रव्य में कई कोशिकांग पाये जाते हैं जैसे- लवक, माइटोकॉन्ड्रिया, अर्न्तद्रव्यी जालिका, राइबोसोम, लाइसोसोम, सिलिआ, फ्लेजिला आदि।

कोशिकांगों की संरचना एवं कार्य


सत्रकणिका/माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria)
माइटोकॉन्ड्रिया की खोज फ्लेमिंग एवं अल्टमैन ने की। सी. बेण्डा (C. Benda) ने सर्वप्रथम 1897 में इसे माइटोकॉन्ड्रिया नाम दिया। प्रत्येक कोशिका में सूत्रकणिका की संख्या भिन्न होती है।
यह उसकी कार्यिकी सक्रियता पर निर्भर करती है। ये आकार व आकृति में भिन्न होती है जो 1.0-4.1 μm लम्बी व 0.2-1 μm व्यास की होती है। सूत्रकणिका एक दोहरी झिल्ली युक्त संरचना होती है। सूत्रकणिका का वायवीय श्वसन से संबंध होता है। इनमें कोशिकीय ऊर्जा ATP के रूप में उत्पादित होती है। इस कारण से सूत्रकणिकाओं को कोशिका का शक्ति गृह कहते हैं।
सूत्रकणिका का विभाजन विखण्डन द्वारा होता है।

लवक (Plastid)
यह शब्द सबसे पहले शिम्पर (Schimpar) ने प्रयोग किया। लवक सभी पादप कोशिकाओं एवं कुछ प्रोटोजोआ जैसे युग्लिना में मिलता है। विभिन्न प्रकार के वर्णकों के आधार पर लवक कई तरह के होते हैं जैसे - हरितलवक, वर्णीलवक व अवर्णीलवक।
हरित लवकों में पर्णहरित वर्णक व केरोटिनॉइड वर्णक मिलते हैं जो प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक प्रकाशीय ऊर्जा को संचित रखने का कार्य करते हैं। वर्णीलवकों में वसा विलेय केरोटिनॉइड वर्णक जैसे – केरोटिन, जैन्थाफिल आदि।
अवर्णी लवक विभिन्न आकृति एवं आकार के रंगहीन लवक होते हैं जिसमें खाद्य पदार्थ संचित रहते है मंडलवक में मंड के रूप में कार्बोहाइड्रेट संचित रहता है जैसे आलू, तेल लवक में तेल व वसा तथा प्रोटीन लवक में प्रोटीन का भंडारण होता है।
हरे पौधों के अधिकतर हरितलवक पत्ती की पर्णमध्योतक कोशिकाओं में पाये जाते हैं। हरित लवक द्विझिल्लीयुक्त होते हैं। हरित लवक के अंतःझिल्ली से घिरे हुए भीतर के स्थान को पीठिका (Stroma) कहते हैं। पीठिका में चपटे, झिल्लीयुक्त थैली जैसी संरचना संगठित होती है जिसे थाइलेकोइड (Thylakoid) कहते हैं। थाइलेकोइड सिक्कों के चट्टों की भांति ढेर के रूप में मिलते हैं जिसे ग्रेना (Grana) कहते हैं। ग्रेना में प्रकाश संश्लेषण होता है।

अन्तद्रव्यी जालिका (Endoplasmic reticulum)
यूकेरियोटिक कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में कोशिका झिल्ली और केन्द्रक के मध्य एक पतली, अनियमित कलायुक्त चपटी, आपस में जुड़ी नलिकाओं का जालतंत्र बिखरा रहता है जिसे अन्तद्रव्यी जालिका कहते है। 
प्रायः राइबोसोम अंतर्द्रव्यी जालिका के बाहरी सतह पर चिपके रहते हैं। जिस अंतर्द्रव्यी जालिका के सतह पर यह राइबोसोम मिलते हैं, उसे खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका कहते हैं। यह निरंतर सक्रिय स्त्रवण का कार्य करती है। राइबोसोम की अनुपस्थिति पर अंतर्द्रव्यी जालिका चिकनी लगती है, अतः इसे चिकनी अंतर्द्रव्यी (Smooth ER) जालिका कहते हैं। इसकी खोज पोर्टर (Porter 1955) ने की।

गॉल्जी उपकरण (Golgi complex)
केमिलो गॉल्जी (Camillo Golgi) ने 1898 में पहली बार केन्द्रक के पास बनी रंजित जालिकावत संरचना देखी जिन्हें गॉल्जीकाय कहा गया। यह बहुत सारी चपटी डिस्क आकार की थैली से मिलकर बनी होती है जिनका व्यास 0.5 माइक्रोमीटर से 1.0 माइक्रोमीटर ((μm) होता है। ये एक दूसरे के समानान्तर ढेर के रूप में मिलते हैं जिसे जालिकाय कहते हैं।
मुख्य कार्य द्रव्य को संवेष्टित कर अंतरकोशिका लक्ष्य तक पहुँचाना या कोशिका के बाहर स्त्रवण करना है। गॉल्जीकाय ग्लाइको प्रोटीन व ग्लाइकोलिपिड निर्माण का प्रमुख स्थल है।

राइबोसोम (Ribosome)
जार्ज पैलेड (George Palade) ने (1953) सघन कणिकामय संरचना राइबोसोम को सर्वप्रथम देखा। ये राइबोन्यूक्लिक अम्ल एवं प्रोटीन के बने हुए तथा किसी भी झिल्ली से घिरे नहीं रहते। अवसादन गुणांक के आधार पर राइबोसोम दो प्रकार के होते हैं- 70S तथा 80S।
70S राइबोसोम आकार में छोटे, प्रोकैरियोटिक कोशिका में तथा यूकैरियोटिक कोशिकाओं के हरितलवक एवं माइटोक्रॉन्ड्रिया में पाये जाते हैं। 80S राइबोसोम आकार में बड़े तथा सभी यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाये जाते हैं।
दोनों प्रकार के राइबोसोम दो उपइकाइयों से बने होते हैं-
तारककाय व तारककेन्द्र (Centrosome & Centriole) - तारककाय दो बेलनाकार संरचना से मिलकर बना होता है, जिसे तारक केन्द्र कहते हैं। तारकेन्द्र पक्ष्माभ व कशाभिका का आधारीकाय बनाता है और तर्कुतंतु जन्तु कोशिका विभाजन के उपरान्त तर्कु उपकरण बनाता है।

लयनकाय (Lysosome)
इनमें उपस्थित पाचक एन्जाइमों के कारण इनको लयनकाय कहा जाता है। इनका निर्माण गॉल्जीकाय की पुटिकाओं के मुकुलन द्वारा होता है। पृथकीकृत लयनकाय पुटिकाओं में सभी प्रकार की जल अपघटकीय एन्जाइम मिलते हैं जो कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, लिपिड, न्यूक्लिक अम्ल आदि के पाचन में सक्षम है।

रसधानी (Vacuoles)
पादप कोशिकाओं में एक या अधिक, छोटी या बड़ी गोलाकार एकल झिल्ली से घिरी रिक्तिकाएं पाई जाती हैं। रिक्तिका को घेरने वाली झिल्ली को टोनोप्लास्ट तथा इसमें भरे द्रव्य को कोशिका रस (Cell sap) कहते हैं। कोशिका रस में अधिकांश अवशिष्ट पदार्थों का संचय होता है जिसे अजैव पदार्थ या एरगास्टिक पदार्थ कहा जाता है। इसमें शर्कराएं, एमीनोअम्ल, खनिज लवण, कार्बनिक अम्ल, वर्णकद्रव्य आदि घुलित अवस्था में रहते हैं।
पौधों में बहुत से आयन व दूसरे पदार्थ सांद्रता प्रवणता के विपरीत टोनोप्लास्ट से होकर रसधानी में अभिगमित होते हैं; इस कारण से इनकी सांद्रता रसधानी से कोशिकाद्रव्य की अपेक्षा काफी अधिक होती है। पादप कोशिकाओं में रसधानी कोशिका का 90% स्थान घेरती है।

सूक्ष्मकाय (Microbodies)
ये एकलकला से घिरी थैली समान संरचनाएं होती हैं जिनका निर्माण अन्तर्द्रव्यी जालिका एवं गॉल्जीकाय के टूटने से होता है।
ये दो प्रकार की होती है- परऑक्सीसोम और ग्लाइऑक्सीसोम।

केन्द्रक (Nucleus)
प्रत्येक कोशिका के भीतर एक सघन झिल्लीयुक्त संरचना मिलती है, जिसे केन्द्रक कहते हैं। इस केन्द्रक में गुणसूत्र (Chromosome) होते हैं, जिसमें आनुवंशिक पदार्थ डी.एन.ए. होता है। जिस कोशिका में झिल्लीयुक्त केन्द्रक होता है, उसे यूकैरियोट व जिसमें झिल्लीयुक्त केन्द्रक नहीं मिलता उसे प्रोकैरियोट कहते हैं।

केन्द्रक को निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है-
  1. केन्द्रिका (Nucleolus)
  2. केन्द्रक कला (Nuclear membrane)
  3. केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm ornuclear sap)
  4. क्रोमेटिन (Chromatin)।

(i) केन्द्रिका (Nucleolus)- केन्द्रक रस में प्रायः एक गोलाकार काय (Spherical bodies) पायी जाती है जिसे केन्द्रिका (न्यूक्लियोलस) कहते हैं। केन्द्रिका मुख्यतः प्रोटीन, rRNA तथा rDNA की बनी होती है।

(ii) केन्द्रक कला (Nuclear membrane)- लिपोप्रोटीन की एक दोहरी कला (Two unit membrane) केन्द्रक के चारों ओर होती है जिसे केन्द्रक कला कहते हैं।

(iii) केन्द्रक द्रव्य (Nuclear sap) - केन्द्रक कला के भीतर केन्द्रक में गाढ़ा अर्ध-द्रव्य भरा रहता है जिसे केन्द्रक रस कहते हैं। यह दानेदार होता है तथा इसमें कई केन्द्रक अम्ल तथा प्रोटीन आदि पदार्थ होते हैं। इसमें कई प्रकार के विकर (एन्जाइम) जैसे राइबोन्यूक्लियेज, डाइपेप्टीडेज तथा फास्फेटेज भी होते है।

(iv) क्रोमेटिन जालिका (Chromatin network) - केन्द्रक द्रव्य में क्रोमेटिन की धागेनुमा लम्बी रचनायें फैली रहती हैं तथा जिनसे केन्द्रक में जाल जैसी रचना बन जाती है जिसको केन्द्रक जालिका कहते हैं तथा ये धागेनुमा रचनायें गुणसूत्र (Chromosome) कहलाती हैं।

सूक्ष्मदर्शी में गुणसूत्रों के चार भाग दिखायी देते हैं – (i) सेन्ट्रोमियर (ii) हेटरोक्रोमेटिन (iii) यूक्रोमेटिन तथा (iv) न्यूक्लिओलर ऑर्गेनाइजर्स। केन्द्रक का सबसे महत्वपूर्ण भाग क्रोमेटिन होता है। यह क्रोमेटिन ही केन्द्रक के निमंत्रण कार्य (Regulatory function) तथा आनुवंशिक कार्य (Hereditary functions) करता है।

कोशिका विभाजन एवं महत्व

एक कोशिका (जनक/मातृ कोशिका) से दो अथवा अधिक कोशिकाओं (पुत्री कोशिकाएं) के निर्माण को कोशिका विभाजन कहते हैं। ये पुत्री कोशिकाएं स्वयं भी वृद्धि व विभाजन कर सकती है। यह क्रम लगातार चलता रहता है। नई कोशिकाओं का निर्माण कोशिका विभाजन (Cell division) से ही सम्भव है। अतः सजीव की शारीरिक वृद्धि तथा लैंगिक एवं अलैंगिक जनन के अलावा नए अंगों की उत्पत्ति, क्षतिग्रस्त ऊतकों के पुनरोत्पादन, पुराने ऊतकों तथा पुरानी कोशिकाओं के प्रतिस्थापन आदि के लिये कोशिका विभाजन एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसके बिना सजीवों का जीवन चक्र पूर्ण होना असंभव है।
युकेरियोटिक कोशिकाओं में दो प्रकार के कोशिका विभाजन पाये जाते हैं। (1) समसूत्रण, समसूत्री विभाजन या कायिक कोशिका विभाजन (Mitosis) तथा (2) अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis)। इसके अतिरिक्त असूत्री विभाजन (Amitosis) जो कि प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में पाया जाता है।

कोशिका विभाजन का महत्व/कार्य
  • कायिक ऊतक की वृद्धि एवं विकास।
  • नये ऊतकों व अंगों का निर्माण।
  • क्षतिग्रस्त ऊतकों का पुनरोत्पादन।
  • पुराने ऊतकों, अंगों एवं कोशिकाओं का प्रतिस्थापन ।
  • अलैंगिक जनन
  • लैंगिक जनन
  • कोशिकाओं के आकार को निर्धारित आकारिकी में रखना आदि।

कोशिका चक्र (Cell cycle)

जीवों में कोशिका विभाजन के समय क्रमशः गुणसूत्रों का टूटना, डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि प्रक्रियाएँ सम्पन्न होती है तथा पुत्री कोशिकाओं में इनकी पैतृक कोशिकाओं के जीनोम का स्थानान्तरण होता है। जीवों में घटनाओं का एक निश्चित क्रम जिसमें कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन, अन्य घटकों का संश्लेषण तथा कोशिका के विभाजन से दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, कोशिका चक्र कहलाता है। कोशिका चक्र की विभिन्न प्रक्रियाओं की अवधियाँ केवल विभिन्न जीवों में ही विविध नहीं होती है, बल्कि एक ही जीव के विभिन्न ऊत्तकों में भी भिन्न होती है।

समसूत्री कोशिका विभाजन के कोशिका चक्र में दो अवस्थाएँ होती हैं – (1) अन्तरावस्था (Interphase) (2) एम अवस्था (सूत्री विभाजन (Mitosis phase)।

1. अन्तरावस्था (Interphase)
समसूत्रण (Mitosis) की अंत्यावस्था (Telophase) के बाद तथा अगला विभाजन शुरू होने से पहले की अवस्था को अन्तरावस्था कहते हैं। इस अवस्था में गुणसूत्र अकुण्डलित तथा पूरी तरह फैले होते हैं जिसे क्रोमेटिन जालक कहते हैं। इस अवस्था में केन्द्रिक, केन्द्रक कला उपस्थित होते हैं तथा इसे कोशिका विभाजन की अवस्था नहीं कहा जा सकता है। कोशिका चक्र में अन्तरावस्था की अवधि कोशिका विभाजन की अन्य अवस्थाओं की अवधि से काफी लम्बी होती है।

अन्तरावस्था को निम्नलिखित तीन उपअवस्थाओं में बाँटा गया है :- (i) प्रथम अन्तराल उपअवस्था (First gap or G1) (ii) संश्लेषण उपअवस्था (Synthesis or S) (iii) द्वितीय अन्तराल उपअवस्था (Second gap or G2)

प्रथम अन्तराल (G1 Phase) - समसूत्री विभाजन एवं डीएनए संश्लेषण के बीच अन्तराल की अवस्था है। यह कोशिका चक्र की सबसे लम्बी अवस्था है तथा इसमें कोशिका की अधिकतम वृद्धि होती है। इस अवस्था में आरएनए तथा प्रोटीन का संश्लेषण एवं डीएनए संश्लेषण के लिए आवश्यक पदार्थों का संश्लेषण होता है। यह सबसे अधिक परिवर्तनशील होती है।

संश्लेषण उप अवस्था (S Phase) - इस उपअवस्था में डीएनए का प्रतिकृतिकरण (Replication) होता है तथा प्रत्येक गुणसूत्र में दोनों अर्द्धगुणसूत्र (Chromatids) बन जाते हैं | DNA की मात्रा 2C से 4C हो जाती है परन्तु गुणसूत्र संख्या समान बनी रहती है। अर्थात् 4C कोशिका में भी गुणिता स्तर 2n बना रहेगा। हिस्टोन प्रोटीन का संश्लेषण भी इसी उपअवस्था में होता है।

द्वितीय अन्तराल उपअवस्था (G2 Phase) - इस उपअवस्था में प्रोटीन, आरएनए व ए.टी.पी. का संश्लेषण होता है। इस उपअवस्था में एक प्रकार के दूत आरएनए (m RNA) का निर्माण होता है जो कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक है। इस उपअवस्था में कोशिका स्वयं को सूत्री विभाजन के लिए तैयार करती है।

2. एम अवस्था (Mitosis phase)
इस अवस्था में समसूत्री कोशिका विभाजन होता है। यह कोशिका चक्र की सबसे छोटी अवस्था होती है। उदाहरण के तौर पर जीवों जैसे मनुष्य में औसतन 24 घण्टे के कोशिका चक्र में कोशिका विभाजन सामान्यतया एक घण्टे में पूर्ण होता है। कोशिका चक्र की कुल अवधि का 95 प्रतिशत से अधिक की अवधि अन्तरावस्था में ही व्यतीत होती है।
समसूत्री कोशिका विभाजन दो प्रमुख चरणों में पूर्ण होती है। प्रथम, केन्द्रकी विभाजन (Karyokinesis) के दौरान कोशिका के केन्द्रक में उपस्थित गुणसूत्रों का दो समान समूहों में बंटना तथा दो संतति केन्द्रकों की उत्पत्ति होना है। इसके तुरन्त पश्चात् द्वितीय चरण, कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis) में एक कोशिका का कोशिकाद्रव्य दो भागों में बंट जाता है और प्रत्येक भाग में एक केन्द्रक उपस्थित होता है।

समसूत्री कोशिका विभाजन (Mitosis)
माइटोसिस (Mitosis) शब्द सर्वप्रथम वाल्टर फ्लेमिंग (Walter Fleming) ने 1882 में दिया। समसूत्री विभाजन में प्रत्येक गुणसूत्रों के दोनों क्रोमैटिड अलग-अलग ध्रुवों पर जाते हैं, जिससे एक कोशिका से उत्पन्न दो पुत्री कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या एवं आकारिकी पैतृक कोशिका के समान होती है। जीवों की कायिक कोशिकाओं का निर्माण समसूत्री कोशिका विभाजन से होता है।

कोशिका विभाजन एक सतत् प्रगतिशील प्रक्रिया है और केन्द्रक तथा गुणसूत्रों की आकारिकी में परिवर्तन के आधार पर सूत्री कोशिका विभाजन को चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है-
  1. पूर्वावस्था (Prophase)
  2. मध्यावस्था (Metaphase)
  3. पश्चावस्था (Anaphase)
  4. अन्त्यावस्था (Telophase)

1. पूर्वावस्था (Prophase) - अन्तरावस्था के पश्चात् गुणसूत्र पतले, तन्तुमय, अकुण्डलित आपस में गूंथे होने के कारण स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं। इस अवस्था के शुरू होने के साथ ही गुणसूत्र छोटे, कुण्डलित और अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। मध्य पूर्वावस्था में गुणसूत्रों के दोनों क्रोमेटिड दिखाई पड़ने लगते हैं। पूर्वावस्था में केन्द्रिक, केन्द्रक कला लगभग विलुप्त होने लगते हैं व तारक उपकरण प्रकट हो चुका होता है। यह अवस्था सूत्री विभाजन की सबसे लम्बी अवस्था है।

2. मध्यावस्था (Metaphase) - केन्द्रक कला व केन्द्रिक पूर्णरूप से अदृश्य हो जाते हैं। इसमें गुणसूत्र अधिक सघन हो जाते है। यह अवस्था गुणसूत्र के अध्ययन के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
मध्यावस्था में गुणसूत्र के दोनों क्रोमेटिड गुणसूत्र बिन्दु (Centromere) पर जुड़े स्पष्ट दिखाई देते हैं। ये गुणसूत्र कोशिका की मध्यवर्ती पट्टिका पर एकत्रित हो जाते हैं। गुणसूत्र बिन्दु की सतह पर एक छोटी बिम्ब (Disc) आकार की रचना मिलती है जिसे काइनेटोकोर कहते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र का एक क्रोमेटिड एक ध्रुव से तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर के द्वारा जुड़ जाता है, वही इसका दूसरा क्रोमेटिड का काइनेटोकोर विपरीत ध्रुव के तर्कुतंतु से जुड़ जाता है। इस अवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं-
  • केन्द्रिक तथा केन्द्रक कला अनुपस्थित।
  • गुणसूत्रों का मध्यवर्ती पट्टिका पर विन्यास।
  • गुणसूत्रों का छोटा व मोटा होना।
  • तुर्क उपकरण की उपस्थिति तथा तर्कुतन्तु का क्रोमेटिड्स के काइनेटोकोर से जुड़ना।

3. पश्चावस्था (Anaphase)- इस अवस्था के आरम्भ में मध्यवर्ती पट्टिका पर स्थित प्रत्येक गुणसूत्र के गुणसूत्र बिन्दु के टूटने से दोनों भगिनी क्रोमेटिड (Sister chromatid) अलग होने लगते हैं। मध्यवर्ती पट्टिका से ध्रुवों की ओर सबसे पहले गुणसूत्र बिन्दु का संचलन होता है। गुणसूत्रों की दोनों भुजाएँ गुणसूत्र बिन्दु से मध्यवर्ती पट्टिका की ओर लटकी हुई दिखती हैं व भगिनी क्रोमेटिड विपरीत ध्रुवों की ओर जाने लगते हैं। इस प्रक्रिया को पश्चावस्था गति कहते हैं। इस अवस्था को गुणसूत्र आकृति के अध्ययन में उपयोगी माना गया है।

4. अन्त्यावस्था (Telophase)- सूत्री विभाजन की अन्तिम अवस्था के प्रारंभ में विपरीत ध्रुवों पर एकत्रित क्रोमेटिड्स अकुंडलित होने लगते हैं, जिससे वे लम्बे व पतले हो जाते हैं, और विसंघनन होता रहता है। इस अवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं-
  1. गुणसूत्र के क्रोमेटिड्स का विपरीत ध्रुवों पर एकत्रित होना तथा इनकी पृथक पहचान समाप्त हो जाना।
  2. क्रोमेटिड्स समूह के चारों ओर केन्द्रक कला का निर्माण हो जाना।
  3. केन्द्रिक का पुनः उद्भव होना।
अवधि के अनुसार, पूर्वावस्था सबसे लम्बी, मध्यावस्था उससे काफी छोटी, पश्चावस्था सबसे छोटी तथा अन्त्यावस्था मध्यावस्था के समान होती है। प्याज के मूलाग्र (Root-tip) में इन अवस्थाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis)

एक केन्द्रक का दो केन्द्रकों में विभाजन प्रायः केन्द्रक विभाजन या सूत्री विभाजन (Karyokinesis) कहलाता है और इसके बाद कोशिकाद्रव्य विभाजन होता है। कोशिकाद्रव्य विभाजन पश्चावस्था के अन्त में शुरू होकर अन्त्यावस्था के तुरन्त बाद पूर्ण हो जाता है। जन्तुओं में कोशिका द्रव्य विभाजन के समय जीवद्रव्य कला में एक संकीर्णन उत्पन्न होता है। यह संकीर्णन धीरे-धीरे चारों ओर से गहरा होता जाता है तथा अन्त में केन्द्र में आपस में मिलने से कोशिकाद्रव्य दो भागों में बंट कर दो संतति कोशिकाएँ बनाता है। यह प्रक्रिया कोशिका खांच (Cell furrow) या विदलन (Cleavage) कहलाती है।
पौधों में कोशिकाद्रव्य विभाजन अन्य प्रक्रिया द्वारा भी सम्पन्न होता है। पौधों की कोशिकाओं में अधिक दृढ़ कोशिका भित्ति होती है। ऐसे में कोशिका पटलिका (Cell plate) का निर्माण होता है। कोशिका पटलिका सर्वप्रथम प्रायः केन्द्र में बननी आरम्भ होती है, जहाँ से चारों ओर परिधि की ओर बढ़कर पूर्ण हो जाती है। कोशिका पटलिका में कैल्शियम तथा मैग्निशियम पैक्टेट स्त्रावित होने से यह मध्य पटलिका में रूपान्तरित हो जाती है। मध्य पटलिका के निर्माण के बाद उसके दोनों ओर प्रारंभिक भित्तियों का जमाव होता है। इसके पश्चात् सैलूलोज की द्वितीय भित्ति बनती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन के समय कोशिकांग जैसे सूत्रकणिका (Mitochondria) व लवकों का दो संतति कोशिकाओं में वितरण हो जाता है।

समसूत्री कोशिका विभाजन का महत्त्व
  • बहुकोशिकीय जीवों में वृद्धि व ऊतकों का पुनरुत्पादन समसूत्री विभाजन के द्वारा होता है।
  • क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत।
  • पुनरूद्भवन (Regeneration)|
  • कुछ पुराने ऊतकों (जैसे आंत की उपकला) एवं कोशिकाओं (जैसे लाल रूधिर कणिकाओं) का लगातार प्रतिस्थापन ।
  • नए अंगों, जैसे पौधों में जड़ों, प्ररोहों की शाखाओं आदि की उत्पत्ति।
  • पौधों में अलैंगिक जनन द्वारा जनक पौधों के समान संतति उत्पन्न करना।
  • पादपों में अर्धसूत्री विभाजन से उत्पन्न अगुणित (Haploid) बीजाणुओं (Spores) से युग्मकों का निर्माण समसूत्री कोशिका विभाजन से होता है।

अर्धसूत्री कोशिका विभाजन (Meiosis)
मियोसिस शब्द फार्मर एवं मूरे ने 1905 में दिया। लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न संतति में दो युग्मकों का संयोजन होता है तथा युग्मकों में अगुणित गुणसूत्र समूह पाया जाता है। युग्मकों का निर्माण जननांगों में उपस्थित द्विगुणित कोशिकाओं के अर्धसूत्री विभाजन से होता है। इस कोशिका विभाजन से उत्पन्न कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या व डीएनए की मात्रा, मातृ कोशिका की तुलना में घट कर आधी रह जाती है। अर्धसूत्री विभाजन में डीएनए संश्लेषण अन्तरावस्था में होने के बाद दो बार केन्द्रकी विभाजन होता है। लैंगिक जनन करने वाले जीवों के जीवन चक्र में अर्धसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित कोशिका उत्पन्न करना एवं निषेचन द्वारा द्विगुणित कोशिका पुनः स्थापित होती है। जिससे जाति स्तर पर गुणसूत्रों की संख्या स्थिर रहती है। प्राणियों में युग्मकजनन के दौरान अर्धसूत्री विभाजन होता है, जिसके परिणामस्वरूप अगुणित युग्मक उत्पन्न होते हैं जबकि पादपों के विभिन्न समूह में बीजाणु निर्माण, युग्मक निर्माण के समय तथा युग्मनज में यह विभाजन पाया जाता है।

जीवों में तीन प्रकार के अर्धसूत्री विभाजन पाये जाते हैं -
  • (i) आदि या युग्मनजीय अर्धसूत्री विभाजन
  • (ii) मध्य या स्पोरिक अर्धसूत्री विभाजन एवं
  • (iii) अन्त या युग्मकीय अर्धसूत्री विभाजन
आदि या युग्मनजीय अर्धसूत्री विभाजन निम्न वर्गीय पादपों में पाया जाता है। अधिकांश कवकों में निषेचन के तुरन्त बाद अर्धसूत्री विभाजन होता है। मध्य अर्धसूत्री विभाजन सभी उच्च पादपों में होता है। इस प्रकार के अर्धसूत्री विभाजन से अगुणित (Haploid) बीजाणुओं (Spores) का निर्माण होता है और इन बीजाणुओं में समसूत्री विभाजन से युग्मक बनते हैं। लगभग सभी जन्तुओं में अर्धसूत्री विभाजन पाया जाता है। अतः जन्तुओं में अर्धसूत्री विभाजन से सीधे युग्मकों की उत्पत्ति होती है।

अर्धसूत्री विभाजन की मुख्य विशेषताएं निम्न हैं
  • अर्धसूत्री विभाजन के दौरान, केन्द्रक का दो बार विभाजन होता है इन विभाजनों को क्रमशः अर्धसूत्री विभाजन प्रथम तथा अर्धसूत्री विभाजन द्वितीय कहते हैं, अर्धसूत्री विभाजन में डीएनए प्रतिकृति केवल प्रथम विभाजन के पूर्व की अन्तरावस्था में ही होती है।
  • जन्तु कोशिकाओं में प्रत्येक केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिका द्रव्य विभाजन होता है, लेकिन पादप कोशिकाओं में केन्द्रक विभाजन द्वितीय के बाद दोनों कोशिका द्रव्य विभाजन समकालीन होते हैं या यह दो बार भी हो सकता है।
  • अर्धसूत्री विभाजन प्रथम न्यूनकारी विभाजन, जिससे पुत्री कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है। 
  • अर्धसूत्री विभाजन प्रथम में समजात गुणसूत्रों का युगलन व पुनर्योजन होता है।
  • अर्धसूत्री विभाजन द्वितीय के अंत में चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं।

अर्धसूत्री विभाजन पूर्व अंतरावस्था
अर्धसूत्री विभाजन शुरू होने के पहले कोशिकाएँ अन्तरावस्था में रहती हैं जिसे अर्धसूत्री विभाजन की पूर्व अन्तरावस्था कहते हैं। इसकी संश्लेषण उपावस्था (S-phase) में एक विशेष प्रकार का हिस्टोन संश्लेषित होता है, जिससे कोशिकाएँ अर्धसूत्री विभाजन में प्रवेश के लिए प्रेरित होती है। कोशिकाओं का अर्धसूत्री विभाजन में प्रवेश G2 अवस्था में संश्लेषित कुछ अज्ञात पदार्थों पर निर्भर होता है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं परन्तु संश्लेषण उपावस्था केवल एक बार, अर्धसूत्री पूर्व अन्तरावस्था, में ही आती है। अर्धसूत्री विभाजन में गुणसूत्रों की प्रतिकृति केवल एक बार होती है, परन्तु उनका विभाजन दो बार होता है। अर्धसूत्री कोशिका विभाजन में भी समसूत्री कोशिका विभाजन की तरह विभिन्न अवस्थाओं में केन्द्रक कला तथा केन्द्रिक की भिन्न-भिन्न स्थितियाँ दिखाई देती है।

अर्धसूत्री विभाजन को निम्न अवस्थाओं में वर्गीकृत किया गया है।
प्रथम पूर्वावस्था द्वितीय पूर्वावस्था
प्रथम मध्यावस्था द्वितीय मध्यावस्था
प्रथम पश्चावस्था द्वितीय पश्चावस्था
प्रथम अन्त्यावस्था द्वितीय अन्त्यावस्था

अर्धसूत्री विभाजन प्रथम (Meiosis I)
  1. पूर्वावस्था प्रथम (Prophase I) - अर्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था प्रथम सबसे लम्बी एवं जटिल अवस्था है। विशेष रूप से, मादा जन्तुओं में प्रथम पूर्वावस्था अत्यन्त लम्बी होती है। गुणसूत्रों के व्यवहार के आधार पर इसे पाँच उपअवस्थाओं में विभाजित किया गया है - तनुपट्ट (Leptotene), युग्मपट्ट (Zygotene), स्थूलपट्ट (Pachytene), द्विपट्ट (Diplotene) व पारगतिक्रम (Diakinesis)।
  2. तनुपट्ट (Laptotene) – साधारण सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर तनुपट्ट अवस्था में क्रोमेटिन संघनित होकर गुणसूत्र बनाते हैं तथा ये लम्बे व मणिकामय दिखाई देते हैं। अर्द्ध गुणसूत्र प्रकट नहीं होते हैं। गुणसूत्रों का संघनन (Condensation) इस अवस्था के दौरान जारी रहता है। इसके उपरांत पूर्वावस्था प्रथम की द्वितीय उपावस्था-युग्मपट्ट आरंभ होती है।
  3. युग्मपट्ट (Zygotene)- इस उपावस्था में समजात गुणसूत्र एक दूसरे को आकर्षित करते हुए युग्म बनाते हैं जिन्हें युगली (Bivalent) कहते हैं। युगली निर्माण की क्रिया युग्मन (Synapsis) कहलाती है। गुणसूत्र युग्म के बीच सिनेप्टोनीमल जटिल का निर्माण होता है। अर्ध गुणसूत्र अभी भी स्पष्ट नहीं होते हैं।
  4. स्थूलपट्ट (Pachytene)- इस उपावस्था में गुणसूत्रों का संघनन होता है, जिससे गुणसूत्र छोटे व मोटे हो जाते हैं। अर्ध गुणसूत्र सुस्पष्ट प्रकट होने से युगली अब चर्तुलक (Tetrad) के रूप में परिलक्षित होते हैं। समजात गुणसूत्रों में जीन विनियम (Crossing over) होता है। जीन विनिमय दो समजात गुणसूत्रों के अभगिनी (Non-sister) क्रोमेटिडों के बीच आनुवंशिक पदार्थों के आदान-प्रदान के कारण होता है। इस अवस्था का यह मुख्य लक्षण है। जीन विनिमय के लिए एंजाइमों का एक समूह पुर्नसंयोजन गुलिका (Recombination nodule) उत्तरदायी होता है। यह इस अवस्था में प्रकट होता है।
  5. द्विपट्ट (Diplotene) - इस उपावस्था में युगली समजात गुणसूत्र विनिमय बिन्दु के अतिरिक्त एक दूसरे से अलग हटने लगते हैं। विनिमय बिन्दु पर अंग्रेजी के 'x' आकार की संरचना को काईएज्मेटा कहते हैं। इस अवस्था के अन्तिम चरण में काईएज्मेटा गुणसूत्रों के सिरों की ओर हटने लगते हैं; इस क्रिया को काईएज्मा उपांतीकरण (Chiasma terminalization) कहते हैं। यह सिनेप्टोनीमल जटिल के विघटन प्रारंभ होने की अवस्था है।
  6. पारगतिक्रम (Diakinesis) – अर्धसूत्री पूर्वावस्था प्रथम की अन्तिम उपावस्था पारगतिक्रम (डाइकाइनेसिस) कहलाती है। इस उपावस्था में काईएज्मेटा का उपांतीकरण पूर्ण हो जाता है अतः काईएज्मेटा लुप्त हो जाते हैं व सिनेप्टोनीमल जटिल पूर्ण विघटित हो जाता है। इस उपावस्था के अन्तिम चरण में केन्द्रक कला का विघटन तथा केन्द्रिक अदृश्य हो जाती है। इस अवस्था में गुणसूत्र पूर्णतया संघनित हो जाते हैं व तर्कुतंतु का निर्माण हो जाता है।

मध्यावस्था प्रथम (Metaphase I)
प्रत्येक युगली के दोनों गुणसूत्र मध्यवर्ती पट्टिका पर भिन्न तलों में विन्यासित हो जाते हैं जिससे दो मध्यवर्ती पट्टिकाएं प्रकट होती हैं। विपरीत ध्रुवों के तर्कुतन्तु की सूक्ष्मनलिकाएं समजात गुणसूत्रों से अलग-अलग गुणसूत्र बिन्दु पर जुड़ जाते हैं।

पश्चावस्था प्रथम (Anaphase I)
इस अवस्था में प्रत्येक युगली के दोनों समजात गुणसूत्र एक दूसरे से विपरीत ध्रुवों की ओर गति करते हैं व गुणसूत्र बिन्दु विभाजित नहीं होता है।

अन्त्यावस्था प्रथम (Telophase I)
इस अवस्था में केन्द्रक कला व केन्द्रिक पुनः प्रकट होने लगते हैं। गुणसूत्र आंशिक अकुंडलित हो जाते हैं। कोशिकाद्रव्य का विभाजन शुरू हो जाता है और कोशिका की इस अवस्था को कोशिका द्विक (Dyad) कहते हैं।
दो अर्धसूत्री विभाजन के बीच की अवस्था को अंतरावस्था (इंटरकाइनेसिस) कहते हैं और यहां तारक केन्द्रों का द्विगुणन होता है। यह अल्प समय के लिए होती है तत्पश्चात् पूर्वावस्था द्वितीय शुरू होती है।

अर्धसूत्री विभाजन द्वितीय (Meiosis II)
अर्धसूत्री विभाजन द्वितीय एक प्रकार का समसूत्री विभाजन ही है। जिसमें प्रविष्ट होने वाली कोशिकाएं अगुणित (n) हो चुकी होती हैं परन्तु उनमें डीएनए की मात्रा (2C) रहती है।
  • पूर्वावस्था द्वितीय (Prophase II) - अन्त्यावस्था प्रथम में गुणसूत्र का जो आंशिक अकुंडलन हुआ रहता है, वह पुनः कुंडलन हो जाने के कारण गुणसूत्र और भी अधिक सघनित हो जाते हैं, इस अवस्था के अन्त में केन्द्रिक तथा केन्द्रक कला का विघटन एवं तर्कु उपकरण (Spindle apparatus) का निर्माण होता है।
  • मध्यावस्था द्वितीय (Metaphase II) - केन्द्रक कला व केन्द्रिक अनुपस्थित होते हैं। सभी गुणसूत्र के गुणसूत्र बिन्दु मध्यवर्ती पट्टिका पर विन्यासित हो जाते हैं और विपरीत ध्रुवों की तर्कतंतु की सूक्ष्म नलिकाएं, इनके संतति क्रोमेटिड के काइनेटोकोर से जुड़ जाती है।
  • पश्चावस्था द्वितीय (Anaphase II) – इस अवस्था में गुणसूत्र का गुणसूत्र बिन्दु लम्बवत् दो भागों में बंट जाता है व प्रत्येक गुणसूत्र का एक क्रोमेटिड एक ध्रुव की ओर, तथा दूसरा क्रोमेटिड विपरीत ध्रुव की ओर चला जाता है। इस अवस्था का काल क्रोमेटिडों के विपरीत ध्रुवों पर पहुंचने के साथ ही पूरा हो जाता है।
  • अन्त्यावस्था द्वितीय (Telophase II) - यह अवस्था अर्धसूत्री विभाजन की अन्तिम अवस्था है, जिसमें क्रोमेटिडों के दो समूह पुनः केन्द्रक कला द्वारा घिर जाते हैं। क्रोमेटिडों का अकुंडलन होने लगता है, जिससे वे ऊन के एक ढीले गोले जैसे दिखने लगते हैं। केन्द्रिक का पुनः निर्माण होता है। कोशिकाद्रव्य विभाजन के पश्चात् चार अगुणित संतति कोशिकाओं का कोशिका चतुष्क बनता है।

अर्धसूत्री विभाजन का महत्व
लैंगिक जनन करने वाले जीवों में इस प्रक्रिया से अगुणित (n) कोशिकाओं का निर्माण होता है। इन कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या कायिक गुणसूत्र संख्या की आधी होती है। अगुणित नर व मादा युग्मकों के निषेचन के बाद द्विगुणित (2n) युग्मनज बनाते हैं। जिससे लैंगिक जनन करने वाले जीवों की प्रत्येक जाति में गुणसूत्रों की संख्या पीढ़ी दर पीढ़ी अचर रहती है। अर्धसूत्री विभाजन के अन्य महत्त्व जैसे - जीनों में विनियम होना, विसंयोजन, स्वतंत्र अपव्यूहन एवं जीन विनिमय द्वारा आनुवंशिक विविधता की उत्पत्ति होना है। यह उद्विकास का प्रमुख तत्व है। समसूत्री एवं अर्धसूत्री विभाजन के प्रमुख अन्तर सारणी में दर्शाये गये हैं।

समसूत्री एवं अर्धसूत्री विभाजन के प्रमुख अन्तर 
समसूत्री विभाजन अर्धसूत्री विभाजन
1. अगुणित व द्विगुणित दोनों प्रकार की कोशिकाओं में संभव अगुणित या विषमगुणिता वाली कोशिकाओं में अनुपस्थित।
2. कायिक कोशिकाओं में सामान्य बीजाणु मातृ कोशिका, युग्मनज व युग्मक मातृ कोशिका में होता है।
3. केन्द्रक विभाजन व कोशिकाद्रव्य विभाजन एक बार होता है। केन्द्रक विभाजन दो बार व कोशिकाद्रव्य विभाजन एक अथवा दो बार
4. डीएनए प्रतिकृति का निर्माण अन्तरावस्था में डीएनए की प्रतिकृति मात्र एक बार (अर्धसूत्री विभाजन प्रथम से पूर्व की अन्तरावस्था में)
5. पूर्वावस्था सामान्य प्रावस्था है। पूर्वावस्था प्रथम जटिल प्रावस्था है, जो पाँच विशिष्ट उपअवस्थाओं में विभाजित है।
6. जीन विनिमय नहीं होता। स्थूलपट्ट उपअवस्था में जीन विनिमय होता है।
7. मध्यावस्था के गुणसूत्र एक तल में अवस्थित मध्यावस्था प्रथम में गुणसूत्र दो तलों में व्यवस्थित
8. पश्चावस्था में गुणसूत्र बिन्दु विखण्डित होता है। पश्चावस्था प्रथम में यह विखण्डन नहीं होता, मात्र पश्चावस्था द्वितीय में होता है।

कोशिका से सम्बंधित महत्वपूर्ण बिन्दु

  • जीवों में वृद्धि व विकास कोशिका विभाजन द्वारा होता है।
  • पैतृक कोशिकाओं से पुत्री कोशिकाओं के निर्माण को कोशिका विभाजन कहते हैं।
  • लैंगिक जनन करने वाले प्रत्येक जीव का जीवनचक्र एक कोशिकीय युग्मनज से प्रारंभ होता है।
  • कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन व अन्य संघटकों का संश्लेषण और तुरंत बाद में विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, इसे कोशिका चक्र कहते है। कोशिका चक्र में दो प्रावस्थाएँ होती है
अ. अंतरावस्था - कोशिका विभाजन की तैयारी की प्रावस्था
तथा
ब. सूत्री विभाजन - कोशिका विभाजन का वास्तविक समय।
अंतरावस्था को G1 S व G2 उपअवस्थाओं में विभाजित किया गया है।
  • G1 उपअवस्था में आरएनए व प्रोटीन का संश्लेषण होता है।
  • S उपअवस्था में डीएनए व हिस्टोन प्रोटीन का संश्लेषण होता है।
  • G2 उपअवस्था में आरएनए (RNA), प्रोटीन व एक विशेष दूत आरएनए का निर्माण होता है जो कोशिका विभाजन के लिए अनिवार्य है।
  • सूत्री विभाजन को चार अवस्थाओं में विभाजित किया है। जैसे - पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था व अन्त्यावस्था। पूर्वावस्था में गुणसूत्रों का संघनन होता है। मध्यावस्था में गुणसूत्र मध्यवृत्ति पट्टिका पर एकत्रित हो जाते हैं। केन्द्रक कला व केन्द्रिक लुप्त हो जाते हैं। पश्चावस्था में गुणसूत्र बिन्दु विभाजित होकर उनके क्रोमेटिड विपरीत ध्रुव की ओर गमन करने लगते हैं। अन्त्यावस्था में क्रोमेटिड ध्रुव पर पहुँचने के बाद लम्बे होने लगते हैं, व केन्द्रिक व केन्द्रक कला का पुनः निर्माण होता है।
  • केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिका द्रव्य का विभाजन होता है।
  • अर्धसूत्री विभाजन जीवों के जननांगों में उपस्थित द्विगुणित कोशिकाओं में होता है। जो युग्मक निर्माण के लिए उत्तरदायी है। इस विभाजन के बाद बनने वाले युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है। लैंगिक जनन में युग्मकों के निषेचन द्वारा द्विगुणित अवस्था पुनः स्थापित हो जाती है।
  • अर्धसूत्री विभाजन को दो अवस्थाओं में विभाजित किया गया है। अर्धसूत्री विभाजन प्रथम तथा अर्धसूत्री विभाजन द्वितीय । प्रथम अर्धसूत्री विभाजन में समजात गुणसूत्र जोड़े युग्ली बनाते हैं तथा इनमें जीन विनिमय होता है।
  • अर्धसूत्री विभाजन I की पूर्वावस्था लम्बी होती है तथा इसे पाँच उपवस्थाओं में विभाजित किया गया है - तनुपट्ट (लेप्टोटीन), युग्मपट्ट (जाइगोटीन), स्थूलपट्ट (पैकीटीन), द्विपट्ट (डिप्लोटीन) व पारगतिक्रम (डायकाइनेसिस)। मध्यावस्था| में प्रत्येक युग्ली गुणसूत्र मध्यवर्ती पटलिका पर विन्यस्त हो जाते हैं। पश्चावस्था-I में समजात गुणसूत्र अलग होकर विपरीत ध्रुवों की ओर गमन करते हैं। अंत्यावस्था-1 के समय केन्द्रक कला व केन्द्रिक पुनः दिखाई देते हैं तथा गुणसूत्र आंशिक अकुण्डलित होते हैं।
  • अर्धसूत्री II समसूत्री विभाजन के समान होता है। पश्चावस्था II के दौरान संतति क्रोमेटिड आपस में अलग हो जाते हैं। इस प्रकार कोशिकाद्रव्य विभाजन के पश्चात् अर्धगुणसूत्री विभाजन में चार अगुणित संतति कोशिकाओं का निर्माण होता है।
और नया पुराने