इंग्लैंड की क्रांति - कारण, प्रभाव, महत्त्व और परिणाम | england ki kranti

इंग्लैंड की क्रांति

इंग्लैंड की क्रांति स्टुअर्ट वंश के राजा जेम्स द्वितीय के शासनकाल में हुई। वह 1685 ई. में इंग्लैंड के राजसिंहासन पर बैठा। उसकी क्रूर धार्मिक और राजनीतिक नीतियों के कारण इंग्लैंड में 1688 ई. में 'गौरवपूर्ण क्रांति' घटित हुई। इसे 'रक्तहीन क्रांति' या 'वैभवपूर्ण क्रांति' भी कहा जाता है। 18वीं सदी तक विश्व में तीन प्रमुख क्रांतियाँ विभिन्न देशों में हुईं। ये देश अवश्य अलग-अलग थे परंतु इन क्रांतियों का प्रभाव विश्व के सभी देशों पर पड़ा और इनके सकारात्मक परिणाम भी निकले।
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इन क्रांतियों में इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति (1688) सर्वप्रथम घटित हुई। इंग्लैंड की क्रांति ने अमेरिका में भी स्वतंत्रता प्राप्ति की मांग को बुलंद किया। अमेरिका में ससंद तथा जनता में तनाव का माहौल था। अतः अमेरिकी उपनिवेश ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये संघर्ष किया। यही संघर्ष अमेरिकी क्रांति (1776 ई.) कहलाता है।
अमेरिकी क्रांति तथा इंग्लैंड की क्रांति (1688) के कारण ही यूरोप में क्रांति का दौर आरंभ हुआ। आगे फ्राँस में चर्च, कुलीन तथा शासक वर्ग के विरुद्ध श्रमिकों, कृषकों तथा बुद्धिजीवियों के द्वारा जो क्रांति हुई वह फ्रांसीसी क्रांति (1789) कहलाती है। परंतु 1688 ई. की इंग्लैंड की क्रांति शांतिपूर्ण संपन्न हुई। इस क्रांति में इंग्लैंड की शासन व्यवस्था तथा इंग्लैंड का राजा बदला, पर कहीं खून का एक कतरा नहीं गिरा जो इसकी महत्त्वपूर्ण विशेषता भी है।

पृष्ठभूमि

इंग्लैंड के तात्कालिक शासक जेम्स द्वितीय की निरंकुशता तथा स्वेच्छाचारिता से तंग आकर जनता ने क्रांति का आह्वान किया। जेम्स द्वितीय को इंग्लैंड का शासक बनने के बाद सुरक्षित वातावरण प्राप्त हुआ। विरोधी दल समाप्त हो चुका था, परिस्थितियाँ राजतंत्र के पक्ष में थीं। राज्य के प्रति बिना विरोध आज्ञाकारिता का सिद्धांत स्वीकार किया जा चुका था। संसद के अधिकतर सदस्य राजा के दैवी अधिकार सिद्धांत का समर्थन करने वाले थे। लेकिन बाद में परिस्थितियाँ बदलने लगीं क्रांति के लिये जेम्स द्वितीय ने स्वयं ही परिस्थितियाँ तैयार की। उसके अनुचित एवं अवैध कार्यों से सभी दलों के लोगों में तीव्र रोष और विरोध फैला।
इंग्लैंड की जनता को विश्वास हो गया था कि राजा अपनी स्वेच्छा से शासन करेगा। जेम्स द्वितीय ने राजा बनने के बाद कैथोलिक चर्च की शक्ति को बढ़ाना तथा कैथोलिक धर्म का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया। उसने विश्वविद्यालयों तथा सरकारी नौकरियों के महत्त्वपूर्ण पदों पर कैथोलिकों को रखा। उसने न्यायालय में अपने विश्वासपात्र न्यायाधीशों को रहने दिया क्योंकि वह टेस्ट एक्ट को खत्म करना चाहता था। इंग्लैंड की जनता काफी समय तक उसके तानाशाही शासन को इस कारण बर्दाश्त करती रही कि उसकी मृत्यु के बाद कैथोलिक शासन का अंत होगा। परंतु जून 1688 में जेम्स की दूसरी कैथोलिक पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जनता को विश्वास हो गया कि अब जेम्स की नीतियाँ उसकी मृत्यु के उपरांत भी चलती रहेंगी। इस आशंका ने इंग्लैंड की जनता को क्रांति के लिये प्रेरित किया।

1688 की गौरवपूर्ण क्रांति

जेम्स द्वितीय के शासनकाल में विभिन्न घटनाएँ घटित हुईं जिन्होंने क्रांति को अवश्यंभावी बना दिया। ये घटनाएँ निम्नलिखित हैं-

जेम्स द्वितीय के पुत्र का जन्म
जेम्स की पहली पत्नी की केवल एक पुत्री थी। वह प्रोटेस्टेंट धर्म को मानती थी। उसका विवाह ऑरेंज (हॉलैंड) के राजकुमार विलियम से हुआ। वह भी प्रोटेस्टेंट मतावलंबी था। इंग्लैंड की जनता का विश्वास था कि वही इंग्लैंड पर शासन करेगी, इसलिये वे जेम्स के अनुचित और अनाचारपूर्ण कृत्यों को सहते रहे। जेम्स की दूसरी पत्नी कैथोलिक थी। जून 1688 में उसने एक पुत्र को जन्म दिया तो जनता में धारणा बनी कि उसके पुत्र की शिक्षा तथा लालन-पालन कैथोलिक धर्म के अनुसार ही होगा। जनता में भय और आतंक फैल गया क्योंकि उनका मानना था जेम्स की मृत्यु के बाद उसकी दूसरी पत्नी का कैथोलिक पुत्र ही राजा बनेगा।

जेम्स द्वितीय की पुत्री मेरी तथा दामाद विलियम को निमंत्रण
हिग और टोरी दल के पादरियों और सदस्यों ने एक जनसभा का आयोजन कर यह निर्णय लिया कि मेरी तथा विलियम को इंग्लैंड पर शासन करने के लिये आमंत्रित किया जाए।
इस समय विलियम फ्रांस के युद्ध में व्यस्त था। वह जानता था कि फ्राँस और वहाँ का राजा लुई चौदहवें के सामने उसकी हॉलैंड की सेना नहीं टिकेगी। उसने इंग्लैंड के लोगों द्वारा भेजा निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

विलियम का इंग्लैंड में आगमन तथा जेम्स का पलायन
प्रोटेस्टेंट शासक विलियम अपने सैनिकों के साथ नवबंर 1688 में इंग्लैंड के टोरबे बंदरगाह पर उतरा। जेम्स ने अपनी सेना के साथ उसका सामना किया परंतु जेम्स ने हवा के रुख को जाना और फ्राँस पलायन कर गया। उसे पता चल गया था कि उसके सहयोगी उसके साथ विश्वासघात कर उसकी पुत्री तथा दामाद से जा मिले।

मेरी तथा विलियम इंग्लैंड के संयुक्त शासक
जनवरी 1689 में इंग्लैंड की संसद में बैठक हुई। इसमें बिल ऑफ राइट्स पारित हुआ। संसद ने इस बिल द्वारा अपने अधिकारों को कानूनी रूप दे दिया। इस बिल की शर्ते थीं कि कोई भी राजा संसद के बनाए हुए कानूनों को समाप्त नहीं कर सकता। वह न तो सेना में भर्ती कर सकता था और न ही कर लगा सकता था। उसको संसद सदस्यों की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध लगाने का कोई अधिकार नहीं था। साल में एक बार संसद का अधिवेशन अनिवार्य था। राजा केवल प्रोटेस्टेंट ही हो सकता था। बिल की इन सभी शर्तों को विलियम ने स्वीकार किया। इसके बाद विलियम और मेरी को इंग्लैंड का संयुक्त शासक नियुक्त किया गया।

इंग्लैंड की क्रांति के कारण

1688 में इंग्लैंड में 'गौरवपूर्ण क्रांति' घटित हुई। इससे सत्ता निरंकुश राजाओं से संसद के हाथों में चली गई। इंग्लैंड की जनता को लोकप्रिय सरकार का शासन प्राप्त हुआ।
इस गौरवपूर्ण क्रांति के कारण निम्नलिखित हैं-

जेम्स द्वितीय की धार्मिक नीतियाँ
जेम्स द्वितीय कैथोलिक धर्म का अनुयायी था। वह कैथोलिक चर्च की शक्ति में विस्तार करना चाहता था। उसने विश्वविद्यालयों तथा सरकारी पदों पर कैथोलिकों को नियुक्त किया। इस पक्षपात को प्रोटेस्टेंटों ने स्वीकार नहीं किया और उसके कार्यों के कारण जनता में तीव्र रोष फैल गया। जेम्स ने हाई कमीशन नामक न्यायालय की स्थापना की। कैथोलिक धर्म की निंदा करने वालों को दंड दिये गए। इंग्लैंडवासियों ने विरोध किया परंतु जेम्स अपनी नीतियों का प्रचार करता रहा। जेम्स की नीतियों के कारण ही क्रांति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

संसद द्वारा अधिकारों के लिये संघर्ष
संसद अपने विशिष्ट अधिकारों का उपयोग चाहती थी साथ ही वह राजा के अधिकारों को सीमित और नियंत्रित करना चाहती था। फलतः राजा और संसद के मध्य संघर्ष प्रारंभ हो गया। इस संघर्ष का अंत शानदार क्रांति के रूप में हुआ और अंत में संसद ने राजा खून न्यायालय पर विजय प्राप्त की।

फ्रांस के साथ मित्रता
जेम्स द्वितीय का विश्वास था कि फ्राँस का शासक (लुई चौदहवें) आवश्यकता पड़ने पर उसे धन तथा सेना से सहायता देगा जिस कारण उसने फ्रांस के साथ मित्रता करने का प्रयास किया। फ्रांस के शासक लुई चौदहवें की तरह उसने भी रोमन कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंटों के बीच भेदभाव किया। उसका झुकाव कैथोलिक धर्म के प्रति था। जेम्स ने प्रोटेस्टेंट धर्म के अनुयायियों पर अत्याचार किये। प्रोटेस्टेंटो ने उसके अनाचारों का तीव्र विरोध करना शुरू कर दिया।

जेम्स द्वितीय की निष्फल विदेश
नीति जेम्स द्वितीय फ्रांस के कैथोलिक राजा लुई चौदहवें से आर्थिक और सैनिक सहायता प्राप्त कर इंग्लैण्ड में अपना निरंकुश, स्वेच्छाचारी शासन स्थापित करना चाहता था। वह लुई चौदहवें के धन और सैनिक सहायता के आधार पर राज करना चाहता था। लुई कैथोलिक था और फ्रांस में प्रोटेस्टेंटों पर अत्याचार कर रहा था। इससे ये प्रोटेस्टेंट इंग्लैण्ड मे आकर शरण ले रहे थे। ऐसी स्थिति में इंग्लैण्डवासी और संसद सदस्य नहीं चाहते थे कि जेम्स, लुई से मित्रता रखे और उससे सहायता प्राप्त करे। अतः वे जेम्स के विरोधी हो गये।

टेस्ट एक्ट के प्रति उदासीनता
इस एक्ट के अनुसार केवल एंग्लिकन चर्च के अनुयायी ही राज्य कर्मचारी नियुक्त हो सकते थे। कैथोलिकों की नियुक्ति प्रतिबंधित थी। इस कारण जेम्स ने टेस्ट एक्ट को समाप्त करना चाहा। परंतु संसद ने इसकी अनुमति नहीं दी। इससे नाराज़ जेम्स ने संसद का स्थगन कर दिया।

धार्मिक तथा खूनी न्यायालय की स्थापना
जेम्स ने 1686 ई. में कैथोलिक धर्म के प्रभुत्व को बढ़ाने के लिये धार्मिक न्यायालय अर्थात् कोर्ट ऑफ हाई कमीशन की स्थापना की। इस न्यायालय के पादरियों को राजा की इच्छा से कार्य करना होता था। यह न्यायालय कैथोलिकों का विरोध करने वालों को दंडित करता था। जब चार्ल्स द्वितीय के अवैध पुत्र मन्मथ (जेम्स चार्ल्स द्वितीय का भाई) ने इंग्लैंड का शासन प्राप्त करने के लिये जेम्स का विरोध किया तो इस विरोध ने युद्ध का रूप ले लिया। जेम्स ने मन्मथ को युद्ध में बंदी बनाया और उसके साथियों को इसी न्यायालय द्वारा मृत्युदंड दिया गया। इस न्यायालय को खूनी न्यायालय का नाम भी दिया गया।

कैथोलिक धर्म का प्रसार
जेम्स कैथोलिक मत का अनुयायी था, जबकि इंग्लैण्ड की अधिकांश जनता एंग्लिकन मत की अनुयायी थी जेम्स कैथोलिकों को अधिकाधिक सुविधाएँ प्रदान करना चाहता था। जेम्स ने पोप को इंग्लैण्ड में आमंत्रित किया और उसका अत्यधिक सम्मान किया। उसने लंदन में कैथोलिक गिरजाघर भी स्थापित किया। इससे इंग्लैण्ड के प्युरीटन और प्रोटेस्टेंट उसके विरोधी हो गये।

विमोचन और निलंबन के अधिकार का प्रयोग
इस अधिकार के अनुसार राजा किसी भी नियम को रद्द कर सकता था। जेम्स ने इस अधिकार के प्रयोग से ही कैथोलिक धर्म के विरुद्ध बने सभी अधिकारों को समाप्त कर दिया। इंग्लैंड की जनता में इससे भी असंतोष फैल गया।

नवीन कैथोलिक गिरजाघर
जेम्स ने कैथोलिक धर्म के अधिक प्रचार और प्रसार के लिए लंदन में एक नवीन कैथोलिक गिरजाघर स्थापित किया। जेम्स ने धार्मिक न्यायालयों की स्थापना करके कानून को भंग किया, गिरजाघरों, विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों पर आक्रमण कर पादरियों और टोरियों को रूष्ट किया। जेम्स के इन अनुचित और अवैध कार्यों से देश में विरोध और क्रांति की भावनाएँ फैल गयी।

स्थायी सेना में वृद्धि
जेम्स द्वितीय ने शासक बनने के बाद स्थायी सेना में वृद्धि की। सेना में अधिकतर सैनिक कैथोलिक मतावलंबी थे। इससे प्रोटेस्टेंटों में आतंक व्याप्त होना स्वाभाविक था। उन्हें विश्वास था कि जेम्स स्थायी सेना की सहायता से इच्छानुसार शासन करेगा और कैथोलिक धर्म को बढ़ावा देगा। जब उसने सिंहासन प्राप्त किया था तो वातावरण उसके अनुकूल था। उस समय न तो आंतरिक विरोध था और न ही विदेशी आक्रमण की संभावना थी। फिर भी उसने स्थायी सेना में वृद्धि की जिस कारण जनता में असंतोष फैल गया। इस असंतोष ने क्रांति का रूप ले लिया।

धार्मिक अनुग्रहों की घोषणाएँ
जेम्स द्वितीय ने इंग्लैण्ड को कैथोलिक देश बनाने के लिए 1687 ई. में दो बार धार्मिक अनुग्रह की घोषणा की। प्रथम घोषणा से कैथोलिक तथा अन्य मतावलम्बियों पर लगे प्रतिबंधों और नियंत्रणों को समाप्त कर दिया गया और द्वितीय घोषणा में वर्ग व धर्म का पक्षपात किये बिना सभी लोगों के लिए राजकीय पदों पर नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया साथ ही कैथोलिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान कर दी गई। इससे संसद में भारी असंतोष व्याप हो गया एवं सांसद उसके घोर विरोधी हो गये।

सात पादरियों पर अभियोग और उनको बंदी बनाना
जेम्स ने यह आदेश दिया कि प्रत्येक रविवार को उसकी द्वितीय धार्मिक घोषणा पादरियों द्वारा चर्च में प्रार्थना के अवसर पर पढी जाए। इसका परिणाम यह होता है कि या तो पादरी अपने धर्म व मत के विरूद्ध इस घोषणा को पढ़े, अथवा राजा की आज्ञा का उल्लंघन करें। इस पर केटरबरी के आर्च बिशप सेनक्राफ्ट ने अपने 6 साथियों सहित जेम्स को एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें जेम्स से निवेदन किया था कि वह अपनी आज्ञा को निरस्त कर दे और पुराने नियमों को भंग करने की नीति को त्याग दे। इससे जेम्स ने कुपित होकर इन पादरियों को बंदी बना कर उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया, पर न्यायाधीशों ने उनको दोष मुक्त कर दिया। इससे जनता और सेना ने पादरियों की मुक्ति पर हर्ष और जेम्स के प्रति विरोध व्यक्त किया।

कोर्ट ऑफ हाई कमीशन की स्थापना
1686 ई. में जेम्स ने गिरजाघरों पर राजकीय श्रेष्ठता, पूर्ण रूप से स्थापित करने के लिए 'कोर्ट ऑफ हाई कमीशन' को पुनः स्थापित कर लिया। इसमें कैथोलिक धर्म की अवहेलना करने वालों पर मुकदमा चलाकर उनको दण्डित किया जाता था।

जेम्स द्वितीय के पुत्र का जन्म
जेम्स की दूसरी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। वह कैथोलिक मतावलंबी थी। इंग्लैंड की जनता की धारणा थी कि वह उसका लालन-पालन कैथोलिक धर्म के अनुसार करेगी। यह कैथोलिक भविष्य में इंग्लैंड का राजा होगा। जेम्स की मृत्यु के बाद भी कैथोलिक शासन की क्रूर नीतियाँ चलती रहेंगी। इस आशंका से लोग भयभीत हुए और वे क्रांति के माध्यम से कैथोलिक शासन का अंत करने की योजना बनाने लगे।

विश्वविद्यालय में जेम्स द्वितीय का हस्तक्षेप
इंग्लैंड की जनता इस बात से असंतुष्ट थी कि जेम्स ने विश्वविद्यालय के सभी बड़े पदों पर कैथोलिकों को नियुक्त किया। कैंब्रिज तथा ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालयों में भी उसने मनमानी की। कैंब्रिज के कुलपति को इस कारण हटा दिया क्योंकि उसने एक कैथोलिक धर्म मानने वाले को डिग्री देने से मना किया था।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में कैथोलिक धर्म का प्रचार-प्रसार किया गया। कैथोलिकों का विश्वविद्यालयों पर प्रभुत्व बढ़ने से इंग्लैंड की जनता भयभीत हुई और क्रांति की योजना बनाने लगी।

इंग्लैंड की क्रांति का प्रभाव

1688 ई. की रक्तहीन क्रांति से सत्ता निरंकुश राजाओं के हाथों से संसद के नियंत्रण में चली गई। इंग्लैंड में जनता की लोकप्रिय सरकार का शासन प्रारंभ हुआ। इसके निम्नलिखित प्रभाव थे-

राजा की शक्ति में कमी
1689 ई. में 'बिल ऑफ राइट्स' संसद द्वारा पारित कर दिया गया। संसद के अधिकारों में वृद्धि हुई। इंग्लैंड का वास्तविक शासक संसद बनी। स्टुअर्ट के राजाओं तथा संसद के बीच दीर्घकाल से चल रहे संघर्ष का अंत हो गया। व्यवहार में संसद परंतु सिद्धांत में राजा संपन्न रहा।

संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना
क्रांति से राजा का स्वेच्छाचारी शासन समाप्त हो गया। संसद ने उसके अधिकारों को सीमित तथा नियंत्रित कर दिया। इंग्लैंड में संसदीय प्रणाली तथा वैधानिक राजतंत्र का युग आरंभ हुआ। क्रांति से पहले राजा को सर्वोपरि माना जाता था, परंतु बाद में राजा संसद के अधिनियम के अंतर्गत जनता की तरह एक सामान्य व्यक्ति रह गया।

सेना पर संसद का अधिकार
क्रांति के पूर्व सेना और उसके अधिकार राजा के अधीन थे। अब संसद ने विद्रोह अधिनियम को पारित किया। राजा सेना की भर्ती नहीं कर सकता था। सेना में 'गौरवपूर्ण क्रांति' के बाद अव्यवस्था समाप्त हो गई तथा राजा से उसकी सैन्य शक्तियों को संसद द्वारा अपने अधिकार में ले लिया गया।

धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा तथा न्यायालय की स्वतंत्रता
धार्मिक सहिष्णुता कानून पास कर सभी प्रोटेस्टेंट संप्रदायों को धार्मिक स्वतंत्रता दी गई। न्यायालय को भी स्वतंत्रता मिली कि वह राजा की आज्ञा को मानने से इनकार कर सकता है। धार्मिक क्षेत्र में यह स्पष्ट कर दिया गया कि इंग्लैंड का वास्तविक धर्म कैथोलिक न होकर एंग्लिकन होगा। संसद का धर्म के सभी मामलों पर विशेषाधिकार होगा। इससे इंग्लैंड में लोगों को कैथोलिक धर्म की कट्टरता से स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

संसद द्वारा विदेश नीति का संचालन
अब तक इंग्लैंड का राजा देश की विदेश नीतियों का संचालन व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित होकर करता था। वह देश के हितों की उपेक्षा करता था। इस कारण अनेक बार राजा द्वारा अपनाई गई विदेश नीतियाँ असफल रहीं। परंतु क्रांति के पश्चात् विदेश नीति का निर्धारण संसद की अनुमति से स्वीकृत किया जाने लगा।
इससे इंग्लैंड के औपनिवेशिक साम्राज्य का विस्तार हुआ तथा उसकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।

यूरोप की राजनीति पर प्रभाव
1688 ई. की इस 'गौरवपूर्ण क्रांति' का प्रभाव यूरोप के सभी देशों पर पड़ा। अब तक यूरोप में निरंकुश राजतंत्र था। परंतु क्रांति के प्रभाव से यूरोप में वैधानिक राजतंत्र और लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली के लिये आंदोलन शुरू हुए।

वैभवपूर्ण क्रांति की घटनाएँ


1. जेम्स द्वितीय के पुत्र का जन्म
जेम्स द्वितीय की पहली पत्नी को मेरी नामक पुत्री हुई थी। वह प्रोटेस्टेंट मतावलंबी थी और हालैण्ड में औरेंज के राजकुमार विलियम को ब्याही गयी थी। वह भी प्रोटेस्टेंट था। इंग्लैण्डवासियों को विश्वास था कि वही इंग्लैण्ड की शासिका बनेगी, इसलिए वे जेम्स के अनाचार और अनुचित कार्यों को सहन करते रहे। जेम्स की दूसरी पत्नी कट्टर कैथोलिक थी। जब 10 जून 1688 को उसके पुत्र हुआ तो लोगों की यह धारणा बन गयी कि उसका लालन-पालन और शिक्षा कैथोलिक धर्म के अनुसार होगी और जेम्स की मृत्यु के बाद वही राजा बनेगा। इससे उनमें भय और आतंक छा गया।

2. हालैण्ड के विलियम और मेरी को निमंत्रण
टोरी और हिग दल के सदस्यों और पादरियों ने एक जनसभा आयोजित कर यह निर्णय लिया कि जेम्स द्वितीय के दामाद विलियम और पुत्री मेरी को इंग्लैण्ड के राजसिंहासन पर आसीन होने के लिए आमंत्रित किया जाए। फलतः कुछ प्रभावशाली लोगों ने दूत भेजकर विलियम और मेरी को इंग्लैण्ड आमंत्रित किया। इस समय विलियम फ्रांस के युद्ध में व्यस्त था। वह जानता था कि फ्रांस और वहां का राजा लुई चौदहवाँ हालैण्ड से कहीं अधिक शक्तिशाली है। वह फ्रांस एवं झलैण्ड की समन्वित शक्ति का सामना नहीं कर सकेगा, इसलिए उसने निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

3. विलियम का इंग्लैण्ड में आगमन और जेम्स का पलायन
विलियम ऑफ ऑरेंज पंद्रह हजार सैनिकों के साथ 5 नवम्बर 1688 को इंग्लैण्ड के टोरबे बंदरगाह पर उतरा। जेम्स द्वितीय में अपनी सेना से उसका सामना करने का प्रयास किया, पर उसके सहयोगी व सेनापति जान चर्चिल ने उसका साथ छोड़ दिया निराश होकर 23 दिसम्बर 1688 को जेम्स राजमुद्रा को टेम्स नदी में फेंक कर फ्रांस पलायन कर गया।

4. विलियम और मेरी इंग्लैण्ड के शासक
22 जनवरी 1689 ई. को संसद की बैठक हुई, जिसमें “बिल ऑफ राइट्स' पारित हुआ। इसमें विलियम के सम्मुख कुछ शर्ते रखी गयी थी जिनको उसने स्वीकार कर लिया। इसके बाद विलियम तथा मेरी 13 फरवरी 1689 को इंग्लैण्ड के राज सिंहासन पर आसीन हुए। विलियम और मेरी संयुक्त शासक स्वीकार किए गए।

इंग्लैंड की क्रांति का महत्व

1688 ई. की 'गौरवपूर्ण क्रांति' इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना थी। निरंकुश राजतंत्र की परंपरा बिना रक्त की बूंद बहाए समाप्त हो गई। इसी कारण इस घटना को 'रक्तहीन क्रांति' या वैभवपूर्ण-महान-शानदार क्रांति भी कहा जाता है। इस गौरवपूर्ण क्रांति का महत्त्व उसकी उपलब्धियों के दूरगामी परिणामों तथा उद्देश्यों की विवेकशीलता में है।
'गौरवपूर्ण क्रांति' का महत्त्व उसके गर्जन-तर्जन से नहीं बल्कि इस कारण है क्योंकि यह एक युग निर्माणकारी घटना है। इसी के कारण संसद ने 1689 ई. में बिल ऑफ राइट्स (अधिकार विधेयक) पारित किया। इसके अनुसार राजा न तो किसी व्यक्ति की सज़ा बिना संसद की अनुमति के माफ कर सकता था, न ही नए कर और कानून लागू कर सकता था। संसद की शक्ति बढ़ी। वह राजसत्ता तथा राजकोष पर भी नियंत्रण रखने लगी। राजा की शक्ति कम हो गई। धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा मिला। न्यायालय को स्वतंत्रता मिली। फ्राँस को पराजित कर इंग्लैंड ने एक नई यूरोपीय नीति अपनाई। स्कॉटलैंड तथा आयरलैंड भी जेम्स द्वितीय के स्वेच्छाचारी शासन से भयभीत थे। क्रांति के कारण स्कॉटलैंड को संवैधानिक तथा राजनीतिक लाभ प्राप्त हुए। आयरलैंड के प्रोटेस्टेंटों को भी काफी राहत मिली। यूरोपीय राजनीति पर भी प्रभाव पड़ा तथा अन्य देश भी वैधानिक राजतंत्र तथा लोकतंत्र प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करने लगे।
अतः 1688 ई. की गौरवपूर्ण क्रांति ने महत्त्वहीन नहीं बल्कि महत्त्वपूर्ण क्रांति के रूप में इतिहास की युगांतरकारी घटनाओं में अपनी जगह बनाई।

1. संसद का वास्तविक शासक बनना
इस क्रांति से स्टुअर्ट राजाओं और संसद के बीच दीर्घकाल से चले आ रहे संघर्ष का अंत हो गया। इस संघर्ष में संसद की विजय हुई। अब इंग्लैण्ड में वास्तविक शासक संसद बन गयी।

2. सम्प्रभुता संसद में निहित
क्रांति के समय संसद ने 'बिल ऑफ राइट्स' (1689) पारित कर उस पर विलियम और मेरी की स्वीकृति ले ली। इसमें संसद की सम्प्रभुता स्वीकार कर ली गयी और राजा की सर्वोच्च राजसत्ता समाप्त कर दी गई।
जनता की सत्ता सर्वोपरि मान ली गई। राजा सिद्धांत में प्रभुता सम्पन्न बना रहा पर व्यवहार में संसद सर्वोपरि हो गयी। 1689 ई. में संसद ने बिल ऑफ राइट्स द्वारा अपने अधिकारों को वैधानिक रूप दे दिया। इस एक्ट के अनुसार कोई भी राजा संसद के बनाये हुए कानूनों को रद्द नहीं कर सकता था, न तो वह कर लगा सकता था और न सेना भर्ती कर सकता था। संसद सदस्यों की किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता पर कोई भी प्रतिबंध लगाने का उसे अधिकार नहीं था। साल में एक बार संसद का अधिवेशन होना अनिवार्य हो गया। राजा का धर्म निश्चित हो गया। वह प्रोटेस्टेंट ही हो सकता था. यह हमेशा के लिए निश्चित हो गया कि सार्वभौमिकता का स्रोत राजा नहीं, बल्कि संसद है।

3. दैवी सिद्धांत अमान्य और संसद को व्यापक अधिकार
इस क्रांति ने राजा के दैवी अधिकारों को अमान्य कर दिया। संसद द्वारा पारित किसी कानून को निरस्त करने का राजा का अधिकार समाप्त हो गया। राजा, संसद की स्वीकृति के बिना कोई कर नहीं लगा सकता। इस क्रांति ने यह स्पष्ट कर दिया कि नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करना, कानून बनाना और कर लगाना संसद के अधिकारों के अंतर्गत है। राजा संसद के अधिकारों में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं कर सकता था।

4. संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना
क्रांति से पूर्व राजा सर्वोपरि था, पर इसके बाद राजा संसद के अधिनियम के अंतर्गत एक सामान्य व्यक्ति रह गया। अब राजा की स्वेच्छाचारिता समाप्त हो गयी। उसके अधिकार संसद द्वारा प्रतिबंधित, नियंत्रित और सीमित कर दिए गए। अब इंग्लैण्ड में वैधानिक राजतंत्र का युग प्रारंभ हुआ और संसदीय प्रणाली का शासन प्रारंभ हुआ।

5. सेना पर संसद का नियंत्रण
अब तक सेना और उसके अधिकार राजा के अधीन थे। अब संसद ने विद्रोह अधिनियम पारित कर सेना पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया। इससे राजा की सैन्य शक्ति समाप्त हो गयी और सेना में व्याप्त अव्यवस्था भी दूर हो गयी।

6. कैथोलिक खतरे का अंत और इंग्लैण्ड का धर्म एंग्लिकन
बिल ऑफ राइट्स में यह तथ्य स्पष्ट कर दिया गया कि कोई कैथोलिक राजा या वह व्यक्ति जिसका विवाह कैथोलिक से हुआ हो इंग्लैण्ड के राजसिंहासन पर आसीन नहीं हो सकेगा। इस प्रकार इंग्लैण्ड सदा के लिए कैथोलिक खतरे से मुक्त हो गया। धार्मिक क्षेत्र में भी यह स्पष्ट कर दिया गया कि एंग्लिकन धर्म इंग्लैण्ड का वास्तविक धर्म है। चर्च पर से राजा के अधिकारों का अंत कर दिया गया। धर्म के मामलों में भी संसद का उत्तरदायित्व हो गया। इससे कालांतर में इंग्लैण्ड में धार्मिक सहिष्णुता का वातावरण निर्मित हुआ।

7. संसद द्वारा गृह और विदेश-नीति का निर्धारण
अब तक राजा देश की गृह और विदेश नीतियों का स्वयं संचालन करता था। वह अपने व्यक्तिगत स्वार्थो से प्रेरित रहता था देश के हितों की उपेक्षा की जाती थी। इससे अनेक बार राजा द्वारा अपनायी गयी विदेश नीति निष्फल ही रही। किन्तु क्रांति के बाद गृह और विदेश नीति का निर्धारण संसद के परामर्श और स्वीकृति से किया जाने लगा। इससे इंग्लैण्ड की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और उसके औपनिवेशक साम्राज्य का विस्तार हुआ।

8. यूरोप की राजनीति पर प्रभाव
इंग्लैण्ड की इस शानदार क्रांति का प्रभाव यूरोप के देशों पर पड़ा। अब तक यूरोप में निरंकुश स्वेच्छाचारी राजसत्ता ही आदर्श राजसत्ता मानी जाती थी। पर इस क्रांति के प्रभाव और परिणामस्वरूप यूरोप में भी वैज्ञानिक राजतंत्र और लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली के लिए आंदोलन प्रारंभ हुए।

महत्त्व और परिणाम

इस प्रकार 1688 ई. में इंग्लैण्ड में शासकों का परिवर्तन बिना रक्त की बूंद बहाए संपन्न हो गया, इसलिए इस घटना को वैभवपूर्ण, महान, शानदार क्रांति कहते हैं। इस रक्तहीन राज्य क्रांति का महत्त्व उसके गर्जन-तर्जन में नहीं, अपितु उसके उद्देश्यों की विवेकशीलता और उपलब्धियों की दूरगामिता में हैं। यह एक युग निर्माणकारी घटना है। इससे इंग्लैण्ड में लोकप्रिय सरकार का युग प्रारंभ हुआ और सत्ता निरंकुश, स्वेच्छाचारी राजाओं के हाथ से निकल कर संसद के हाथों में आ गयी।
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