फ्रांस की क्रांति - कारण, प्रभाव, महत्त्व और परिणाम | france ki kranti

फ्रांस की क्रांति

18वीं सदी के अन्तिम दशकों में विश्व में राजनैतिक परिवर्तनों का जो दौर अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के रूप में प्रारम्भ हुआ था, उसकी अगली कड़ी फ्रांस की 1789 की क्रान्ति बनी, जिसने न केवल फ्रांस वरन् विश्व के कई देशों की जनता को भी राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में पूर्ण परिवर्तन हेतु प्रेरित किया। फ्रांस की 1789 की क्रांति द्वारा पुरातन व्यवस्था, जिसमें कुलीन वर्ग और कैथोलिक पादरियों का वर्चस्व था, को समाप्त कर समानता पर आधारित व्यवस्था स्थापित की गयी। इस नवीन व्यवस्था को स्थापित करने के लिए शासन व्यवस्था में संवैधानिक राजतंत्र, पूर्ण गणतंत्र तथा डायरेक्टरी आदि असफल प्रयोग किए गए। अंततः नेपोलियन बोनापार्ट ने प्रथम कौंसिल के रूप में फ्रांस की बागडोर संभाली। यद्यपि कई इतिहासकारों के अनुसार नेपोलियन ने फ्रांस की क्रांति की मूल भावना को आघात पहुँचाया, तथापि उसके कार्यों ने प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से क्रांति के सिद्धान्तों के प्रसार में योगदान किया और फ्रांस की क्रान्ति को यूरोप की क्रान्ति बना दिया।
france ki kranti
फ्रांस की इस क्रांति को यूरोप की अगली शताब्दी की कई अन्य 1820, 1830 और 1848 की क्रांतियों की पहली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। अगले सौ वर्षों तक यूरोप में होने वाली प्रमुख घटनाओं को यह क्रांति प्रभावित करती रही।

उद्देश्य

इस लेख में आप -
  • फ्रांस की क्रांति के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों और क्रांति के दौरान घटित विभिन्न घटनाक्रमों को जान सकेंगे।
  • फ्रांस की क्रांति के दौरान शासन सम्बन्धी विभिन्न असफल प्रयोगों तथा अंततः जनता द्वारा नेपोलियन के एकतंत्रीय शासन को स्वीकार करने के कारणों को समझ सकेंगे।
  • फ्रांस की क्रांति के विभिन्न चरण और स्वरूप को जान सकेंगे।
  • फ्रांस की क्रांति का प्रभाव और प्रसार तथा फ्रांस और यूरोप के इतिहास में उसके महत्व को जान सकेंगे।

फ्रांस की पुरातन व्यवस्था और क्रान्ति के कारण

फ्रांस की क्रान्ति कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। इसकी पृष्ठभूमि फ्रांस की पिछली सदियों की व्यवस्था में देखी जा सकती है, जिसे पुरातन व्यवस्था 'आसियां रिजीम' कहा जाता है। क्रान्ति के वास्तविक कारणों को समझने के लिए वहां की पुरातन व्यवस्था को जानना आपके लिए आवश्यक है। यहाँ हम पुरातन व्यवस्था के साथ साथ क्रान्ति के अन्य कारणों का भी विश्लेषण करेंगे।

सामाजिक स्थिति
फ्रांस का समाज पुरातन व्यवस्था पर आधारित श्रेणीबद्ध समाज था। समाज असमानता और विशेषाधिकारों के आधार पर विघटित था। प्रत्येक वर्ग के अन्दर भी श्रेणियां थीं, जिनके अधिकार और सुविधाओं में असमानता थी। उच्च पादरी वर्ग और कुलीन सामन्त वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त थे। मध्यम वर्ग, कृषक और मजदूर आदि सर्व साधारण वर्ग अधिकारहीन था।

विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग

पादरी वर्ग
फ्रांस की अधिकांश जनता रोमन कैथोलिक थी। अतः पादरियों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। पादरियों में दो वर्ग थे- उच्च पादरी तथा सामान्य पादरी। उच्च पादरी वर्ग में आर्कबिशप, ऐबे आदि पद थे। पद खरीदे जाते थे। अतः उच्च पादरी सामान्यतः अमीर कुलीनों के पुत्र होते थे। इनकी आय बहुत अधिक थी। राज्य की दस प्रतिशत भूमि पर उनका अधिकार था, दो प्रतिशत उपहार के रूप में राजा को देते थे। इनकी रूचि धार्मिक कार्यों में नहीं थी तथा वह विलासपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे। सामान्य पादरी वर्ग में स्थानीय गिरजाघरों के वह पादरी थे, जो निम्न वर्ग या किसान परिवारों से आते थे। इन छोटे पादरियों की आय कम थी, परन्तु जनता के सभी धार्मिक कार्यों को यह छोटे पादरी ही सम्पन्न कराते थे। जनता के कष्टों से परिचित इन पादरियों ने क्रान्ति के समय जनता का सहयोग किया।

कुलीन वर्ग
विशेषाधिकार प्राप्त दूसरा वर्ग कुलीन सामन्तों का था। राज्य, सेना और चर्च के सभी महत्वपूर्ण पदों पर इनका ही अधिकार था। यह वर्ग अनेक उपवर्गों में बँटा था-प्राचीन अभिजात वशों के सामन्त, सैनिक सामन्त, दरबारी सामन्त, नागरिक और न्यायिक प्रशासन के पोशाकधारी सामन्त, राजकृपा से बने नवोदित सामन्त। इनमें अभिजात सामन्त नवोदित सामन्तों को और दरबारी सामन्त प्रान्तीय सामन्तों को हेय दृष्टि से देखते थे। आर्थिक दृष्टि से भी सभी सामन्त सामान नहीं थे। परन्तु सभी सामन्तों को अनेक अधिकार प्राप्त थे। 1781 के बाद सेना में कमीशन केवल कुलीन वर्ग के लिए सुरक्षित कर दिए गए थे। सम्पूर्ण भूमि का पाँचवा भाग इनके पास था। यह स्वयं कोई कर नहीं देते थ, परन्तु जनता पर कर और जुर्माना लगाने, न्याय करने, शिकार करने, बेगार लेने आदि के द्वारा सभी सामन्त किसानों का शोषण करते थे।
लुई तेरहवें के समय रिशलू ने सामन्तों के बहुत से राजनैतिक अधिकारों में कटौती कर दी थी। सामन्त अपनी राजनैतिक प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करना चाहते थे। क्रान्ति से पूर्व लुई सोलहवें के सुधारों का पार्लमां में विरोध और एएस्टेट्स जनरल बुलाने की मांग इन सामन्तों की महत्वाकांक्षा का ही परिणाम था।

अधिकारहीन वर्ग -सर्वसाधारण वर्ग
फ्रांस की अधिकांश जनता को कोई अधिकार नहीं प्राप्त थे। देश की 94 प्रतिशत जनता इस वर्ग में थी। सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से इस वर्ग में बहुत असमानता थी, जिसके आधार पर इसको तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है।

'क' मध्यम वर्ग
इस वर्ग में व्यापारी, शिक्षक, वकील, डाक्टर, लेखक, सरकारी कर्मचारी आदि लोग सम्मिलित थे। इनके पास धन और योग्यता थी, किन्तु समाज और राजनीति में इन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। यह वर्ग पुरातन व्यवस्था का पूर्ण विरोधी था तथा सामाजिक व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक व्यवस्था में भी परिवर्तन चाहता था। मध्यम वर्ग के अनेक पूँजीपतियों ने सरकार को कर्ज दे रखा था, लेकिन राज्य की दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें अपना धन वापस न मिलने की चिन्ता सता रही थी। वह सुधारों के पक्षधर थे और अपने हित में कानून में परिवर्तन कराकर कुलीन वर्ग के समान अधिकार पाना चाहते थे। यह मध्यम वर्ग ही क्रान्ति का वाहक बना।

'ख' कृषक वर्ग
फ्रांस में सबसे अधिक संख्या किसानों की थी। कुल जनसंख्या का अस्सी प्रतिशत किसान थे। यूरोप के अन्य देशों के किसानों से फ्रांस के किसान बेहतर स्थिति में थे। तथापि इनमें कुछ धनी किसानों को छोड़कर अधिकांश किसानों की समाज के अन्य वर्गों की तुलना में स्थिति निम्न थी। स्वतंत्र और अर्द्ध दास दोनों प्रकार के किसान कुलीनों के शोषण के शिकार थे। उन्हें अपनी आमदनी का लगभग अस्सी प्रतिशत भाग राज्य, चर्च और कुलीनों को कर और नजराने के रूप में देना पड़ता था। उनमें अपनी निम्न सामाजिक और आर्थिक दशा के कारण असंतोष था। यह असंतोष शोषक सामन्तों के विरूद्ध क्रान्ति के रूप में प्रकट हुआ।

'ग' मजदूर वर्ग
यह वर्ग मध्यम वर्ग और पूंजीपतियों पर निर्भर था। इनकी आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी। इस वर्ग में शहर में । रहने और मध्यम वर्ग के सम्पर्क के कारण राजनैतिक चेतना का विकास हो गया था।
इस प्रकार आपने देखा कि असमानता पर आधारित फ्रांस की पुरातन सामाजिक व्यवस्था में समाज के प्रत्येक वर्ग में दूसरे वर्ग के प्रति संदेह और असंतोष व्याप्त था। अपनी पुस्तक 'द फ्रेंच रिवोल्यूशन एण्ड नेपोलियन' में लियो गर्शाय ने फ्रांसिसी क्रान्ति के कारणों में सामाजिक कारण को महत्वपूर्ण कारण माना है। सामन्तों की राजनैतिक अधिकार पाने की इच्छा, मध्यम वर्ग में जागरूकता, किसानों और मजदूरो में आकोश आदि क्रान्ति के कारण बने।

राजनीतिक स्थिति
सत्रहवीं और अठाहरवीं सदी में यूरोप में राजनैतिक चेतना का तीव्र प्रसार हो रहा था। मध्य पूर्व के शासक प्रबुद्ध शासन के द्वारा अपने राज्य में सुधारात्मक परिवर्तन कर रहे थे, परन्तु फ्रांस के शासक समय की मांग को समझ नहीं सके और पुरातन व्यवस्था में परिवर्तन करने के स्थान पर निरंकुश और स्वेच्छाचारी शासन करते रहे। इसके परिणामस्वरूप फ्रांस में जनता का आक्रोश 1789 में क्रान्ति के रूप में प्रकट हुआ।

निरंकुश राजतन्त्र तथा अक्षम शासक
फ्रांस में हेनरी चतुर्थ द्वारा स्थापित बूर्बा वंश का निरंकुश राजतंत्र लुई चौदहवें के समय अपनी शक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँच गया था। राजा को असीमित अधिकार प्राप्त थे। राजा ही कानून बनाता, वही कर लगाता, स्वेच्छा से व्यय करता, किसी को भी कैद करके बिना मुकदमा चलाये सजा दे देता, अपनी इच्छा से ही वह विदेशी राज्यों से युद्ध अथवा सन्धि करता था। लुई चौदहवां कहता था ' मैं ही राज्य हूँ'।
लुई चौदहवें के समय जिस प्रकार केन्द्रीकरण और निरंकुश तंत्र का विकास हुआ था, उसको कायम रखने के लिए आवश्यक था कि शासक योग्य हो। परन्तु लुई चौदहवें के उत्तराधिकारी अयोग्य थे। उसके पश्चात लुई पंद्रहवाँ गद्दी पर बैठा, वह कमजोर और विलासी शासक था। वह किसी प्रकार का सुधार करने के पक्ष में नहीं था। उसका मानना था कि वर्तमान व्यवस्था में मेरा समय निकल जायेगा। उसकी विलासिता और युद्धों के कारण फ्रांस की बहुत बदनामी हुयी। उसके शासन को ' रखैलों की सरकार' कहा जाता था। लुई पंद्रहवाँ के बाद लुई सोलहवाँ शासक बना। उसमें निर्णय लेने और नेतृत्व करने की क्षमता का अभाव था। वह अपनी रानी मेरी अन्टायनेट के प्रभाव में रहता था। रानी मेरी अन्टायनेट आस्ट्रिया की रानी मारिया थेरेसा की पुत्री थी। आस्ट्रिया से पूर्व में शत्रुता होने के कारण फ्रांस की जनता उससे घृणा करती थी और उसे 'घृणित आस्ट्रियन' कहती थी। वह राजनीति में अत्यधिक हस्तक्षेप करती थी। लुई सोलहवाँ रानी के दबाव के कारण ही किसी प्रकार का सुधार करने में असफल रहा।

प्रतिनिधि सभाओं की शक्तिहीन स्थिति
फ्रांस में राजा की शक्ति को सीमित करने के लिए एस्टेट्स जनरल नामक संस्था थी, परन्तु लुई तेरहवें के समय से यह अप्रभावी हो गयी थी। एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन 1614 के बाद बुलाया नहीं गया था। दूसरी संस्था पार्लमां थी, जो प्रतिनिधि संस्था न होकर उच्चतम न्यायालय के समान थी। इसका एक अन्य कार्य राजा के आदेशों को कानून के रूप में पंजीकृत करना था। फ्रांस में कुल तेरह पार्लमां थीं, जिनमें पेरिस की पार्लमां अधिक शक्तिशाली थी। पार्लमां के न्यायाधीश कुलीन वर्ग के होते थे। लुई सोलहवें के समय इस सभा की शक्तियों में वृद्धि हुयी और यह राजा का विरोध करने लगी। इसके विरोध ने जनता का ध्यान राजा की नीतियों के तरफ आकर्षित किया।

अक्षम प्रशासनिक व्यवस्था
फ्रांस की शासन प्रणाली अत्यन्त अव्यवस्थित और अक्षम थी। शासन में राजा की सहायतार्थ पाँच समितियाँ थीं, जो कानून बनाने, आदेश जारी करने तथा अन्य घरेलू और विदेशी मामलों सम्बन्धी कार्य करती थीं।
सम्पूर्ण देश कई प्रकार की धार्मिक, प्रशासकीय और शैक्षणिक इकाईयों में बंटा था। प्रमुख रूप से फ्रांस में दो प्रकार के प्रशासकीय प्रान्त थे। प्राचीन प्रकार के प्रान्त गवर्नमेन्ट थे, जिनकी संख्या 40 थी। इनके गवर्नरों को राज्य से वेतन प्राप्त होता था, परन्तु शासन में इनका कोई योगदान नहीं था। दूसरे प्रकार के प्रान्त जेनेरालिते की संख्या 34 थी। राजा द्वारा नियुक्त एतादां इन प्रान्तों का शासन करते थे। राजा के आदेशों का पालन करना और उसकी आख्या भेजना इनका प्रमुख कार्य था। यह निरंकुश तरह से प्रशासन करते थे। उच्च वर्ग से नियुक्त किये गये यह एतादां केवल राजा के प्रति उत्तरदायी थे।
फ्रांस में स्थानीय शासन केन्द्र से ही संचालित होता था। स्थानीय कर्मचारियों को छोटी छोटी बातों के लिए राजधानी से आदेश प्राप्त करना पड़ता था। केन्द्र की कमजोर स्थिति के कारण कर्मचारी भ्रष्ट और अनियंत्रित हो गये थे तथा मात्र अपने हित साधन में लगे रहते थे।

भ्रष्ट न्याय और कानून व्यवस्था
शासन के अन्य अंगों की तरह कानून और न्याय के क्षेत्र में भी अव्यवस्था और भ्रष्टाचार फैला था। सम्पूर्ण देश में 385 प्रकार के न्याय विधान प्रचलित थे। एक क्षेत्र में जो कानून था वह दूसरे क्षेत्र में गैर कानूनी माना जाता था। न्यायालय भी कई प्रकार के थे और उनके क्षेत्राधिकार भी स्पष्ट नहीं थे। न्यायिक पदों को बेचा जाता था। व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं थी। एक वारंट 'लेत्र द काशे' द्वारा किसी को कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता था।
इस प्रकार फ्रांस का राजनैतिक जीवन भ्रष्ट, गतिहीन और जर्जर हो गया था। फ्रांस की अराजकता पूर्ण स्थिति के सम्बन्ध में मादले ने कहा था, 'बुरी व्यवस्था का तो प्रश्न नहीं, कोई व्यवस्था ही नहीं थी।

आर्थिक स्थिति
बूर्बा वंश के अधीन फ्रांस की अर्थव्यवस्था पतनोन्मुख थी। शासकों की विलासिता, अपव्ययता, वित्त नीति, दोषपूर्ण कर प्रणाली और कृषि, उद्योग तथा व्यापार के विकास के प्रति उदासीनता ने फ्रांस को आर्थिक रूप से खोखला कर दिया था।

शासकों की विलासिता तथा बजट का अभाव
राज्य की वित्तीय नीति दोषपूर्ण थी। आय के अनुसार व्यय करने के स्थान पर व्यय के अनुसार आय निश्चित की जाती थी। राजा की व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा राजकोष में कोई अन्तर नहीं था। राजा और उसका परिवार शानशौकत तथा विलासिता पर मनमाना धन व्यय करता था। राज्य की समस्त आय का तीन चौथाई भाग युद्धों और राजनयिक सम्बन्धों पर व्यय किया जाता था। लुई चौदहवें और पंद्रहवें द्वारा लड़े गये युद्धों ने फ्रांस की आर्थिक स्थिति को पहले ही कमजोर कर दिया था। इसके बावजूद लई सोलहवें ने अमेरिका स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। रानी अपने दास दासियों पर बहुत अधिक धन व्यय कर देती थी। क्रान्ति से पूर्व फ्रांस को प्रति वर्ष लगभग ढाई करोड़ घाटा हो रहा था। सरकार अपने खर्चों के लिए पूंजीपति वर्ग से ऋण लेती रही और अन्त में स्थिति इतनी खराब हो गयी कि राष्ट्रीय आय का आधा भाग कर्ज के ब्याज को चुकाने में ही खर्च होने लगा।

दोषपूर्ण कर प्रणाली
अधिकांश जमीन सामन्तों के पास थी। परन्तु अधिकांश भूमि का मालिक होने के बावजूद विशेषाधिकार प्राप्त सामन्त और पादरी वर्ग प्रत्यक्ष करों से मुक्त था। करों का अधिकांश भार किसानों और सामान्य जनता को उठाना पड़ता था। किसानों की उपज का अधिकांश भाग भूमिकर (ताय) के रूप में चला जाता था। इसके अतिरिक्त उनको उपज का दसवाँ भाग धर्मकर (टाइथ) के रूप में चर्च को तथा कई अन्य प्रकार के कर सामन्तों को देने पड़ते थे। 1778 के पश्चात मंदी का दौर में सामन्तों ने अपनी हानि की पूर्ति हेतु सामन्तीय करों में वृद्धि कर दी थी। अप्रत्यक्ष कर विशेषरूप से नमक कर (गैबेल्ल) अत्यंत कष्टदायी था। कानून के अनुसार सात वर्ष से अधिक आयु वाले प्रत्येक व्यक्ति को वर्ष में सात पौण्ड नमक अवश्य खरीदना पड़ता था। करों को ठेके पर वसूल करने की प्रथा थी। ठेकेदार अधिक मात्रा में कर वसूल कर एक हिस्सा स्वयं रख लेते थे तथा राज्य को मात्र 60-65 प्रतिशत ही राजस्व प्राप्त होता था। करों की दरों में भी असमानता थी।

कृषि तथा उद्योगों की उपेक्षा
राज्य की ओर से कृषि के विकास हेतु कोई ध्यान नहीं दिया गया। राज्य के अयोग्य और कड़े नियन्त्रण के कारण उद्योग और व्यापार की भी प्रगति नहीं हो रही थी। राज्य में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ने लगी। उत्पादित वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने पर प्रत्येक प्रान्त की सीमा पर चुंगी देनी पड़ती थी, जिससे वस्तु की कीमत बढ़ जाती थी। इसी दौरान सन् 1788 में फ्रांस तथा यूरोप के बहुत बड़े भाग में अकाल पड़ा। आधुनिक शोधों के अनुसार इस व्यापक अकाल के लिए 'अल नीनो' प्रभाव उत्तरदायी थे। इससे फ्रांस में खाद्य पदार्थों की अत्यधिक कमी हो गयी तथा रोगों और कुपोषण में वृद्धि हुयी। फ्रांस में गरीब किसान और मजदूर वर्ग के सम्मुख भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी।
फ्रांस दिवालिया होने को था। 1774 से 1776 के मध्य वित्त मंत्री तुर्गो ने आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए भूमि के उपयोग, मुक्त व्यापार नीति आदि कई सुधार करने का प्रयास किया तो उसे पद से हटा दिया गया। अगले वित्तमंत्री नेकर ने भी तुर्गों की भांति राज्य का व्यय कम करने और कुलीनों पर कर लगाने का प्रयास किया तो रानी और कुलीनों के दबाब में उसे भी 1781 में पद से हटा दिया गया। रानी और दरबारी सामन्तों के षड़यन्त्रों और सामन्तों के द्वारा सहयोग न करने के कारण आर्थिक सुधार के सभी प्रयास असफल रहे।

बौद्धिक क्रान्ति तथा क्रान्ति के अन्य कारण
फ्रांस में शासन के प्रति असन्तोष लुई 15वें के शासनकाल से ही दिखने लगा था। अठाहरवीं सदी में यहाँ अनेक दार्शनिकों और लेखकों ने हजारों वर्षों से चले आ रहे विचारों पर प्रश्नचिहन लगाया और नये विचार प्रस्तुत किए। इन दार्शनिकों को फिलॉजाइस कहा जाता था। इन्होंने राजनीति, धर्म, समाज आदि से सम्बन्धित विचारों को नए आयाम दिए। इनके विचारों ने परिवर्तन के लिए जनता को प्रेरित किया। इनका नारा तर्क, सहिष्णुता और मानवता' था तथा इन्होंने उदार प्रगतिशील और आदर्श समाज की स्थापना पर जोर दिया। यह इंग्लैण्ड की शासन व्यवस्था से प्रभावित थे। इनका अत्यधिक प्रभाव फ्रांस की जनता पर पड़ा। इनके प्रभाव से समाज में तर्क का महत्व बढ़ा और नगरों में गोष्ठियों (सैलो) और संस्थाओं (कारदीलिए) में समाज में व्याप्त बुराइयों पर विचार विर्मश किया जाने लगा।
इन दार्शनिकों में प्रमुख मान्टेस्क्यू ने राजा के दैवीय अधिकारों के सिद्धान्तों की तीव्र आलोचना की। उसने अपनी पुस्तक 'द स्पिरिट ऑफ लॉज' में शक्ति के पृथक्करण का सिद्धान्त प्रस्तुत करते हुए लिखा कि शासन के तीनों अंगों कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका को अलग अलग कार्य करना चाहिए। वह संवैधानिक शासन पद्धति के पक्ष में था। वाल्टेयर ने प्राचीन रूढ़ियों, कुप्रथाओं और अंधविश्वासों का विरोध किया। विशेषरूप से कैथोलिक चर्च और पादरियों के विलासमय जीवन को जनता के समक्ष रखा। उसका मानना था कि राजनीति तथा धर्म एक दूसरे से पृथक पृथक होने चाहिए। रूसो ने 'सोशल कांट्रैक्ट' नामक पुस्तक में स्पष्ट किया कि शासक को जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। रूसो ने लिखा कि 'मनुष्य स्वतंत्र उत्पन्न हुआ, किन्तु सर्वत्र जंजीरों से जकड़ा है। रूसो की यह पुस्तक क्रांति की बाइबिल कहलाती है। नेपोलियन का कथन था कि यदि रूसो न होता तो फ्रांस की क्रान्ति न होती। दिदरों ने एक विश्वकोष की रचना की, जिसमें विभिन्न विचारकों के भ्रष्टाचार, निरंकुश शासन आदि पर आलोचनात्मक विचार प्रस्तुत किए। इनके अतिरिक्त क्वेस्ने, हॉलबैक, हैल्वेशियस आदि ने अपनी लेखनी से असमानता, शोषण, धार्मिक असहिष्णुता, भ्रष्ट और निरंकुश राजतंत्र, प्रशासनिक दोष आदि के प्रति जनता को जाग्रत किया।
फ्रांस की क्रान्ति के लिए बौद्धिक आन्दोलन कितना उत्तरदायी था? इसमें मतभेद हैं। उपन्यासकार शातोब्रियां का मानना था कि बौद्धिक आन्दोलन ने ही भौतिक दुखों का अधिक व्यापक रूप से विरोध किया था। डेविड थॉमसन ने लिखा कि फ्रांस के दार्शनिकों और क्रान्ति के मध्य परोक्ष सम्बन्ध था, दार्शनिकों ने क्रान्ति का प्रत्यक्ष उपदेश नहीं दिया। इन्हें क्रान्ति का जन्मदाता नहीं कहा जा सकता। तथापि फ्रांस में परिवर्तन हेतु वैचारिक आधार प्रदान करने का कार्य इन दार्शनिकों ने किया।
समकालीन विश्व की कुछ घटनाओं ने भी फ्रांस की जनता को क्रान्ति हेतु प्रभावित किया। इंग्लैण्ड की गौरवशाली क्रान्ति के पश्चात वहां लागू संवैधानिक शासन व्यवस्था तथा अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम ने फ्रांस की जनता को व्यवस्था परिवर्तन हेतु प्रेरित किया।
फ्रांस में क्रान्ति पूर्व परिस्थितियों को जानने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि अक्षम शासन व्यवस्था, दोषपूर्ण आर्थिक नीति, सामाजिक असमानता तथा बौद्धिक क्रान्ति ने फ्रांस की क्रान्ति के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। यद्यपि यूरोप के अन्य देशों में भी फ्रांस की तरह की पुरातन व्यवस्था थी, परन्तु क्रान्ति फ्रांस में ही क्यों हुयी, इसके पीछे

कुछ मूलभूत कारण थे।
  • फ्रांस में बहुत पहले ही राष्ट्रीय राज्य तथा केन्द्रीकृत सत्ता की स्थापना हो गयी थी। फ्रांस की जनता वंशानुगत निरंकुश शासकों की मनमानी और स्वार्थी रवैये से परेशान थी, जबकि यूरोप के अन्य शासक प्रबुद्ध निरंकुश शासन द्वारा जनहित के कार्य कर रहे थे।
  • सामन्त निरंकुश राजतंत्र द्वारा छीन ली गयी अपनी राजनैतिक शक्तियों को पुनः प्राप्त करना चाहते थे।
  • फ्रांस में क्रान्ति में मध्यम वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जबकि यूरोप के अन्य देशों में प्रगतिशील और जागरूक मध्यम वर्ग का अभाव था।
  • फ्रांस के किसान अन्य देशों के किसानों से अधिक सम्पन्न और स्वतंत्र थे, उन्हें अपने जीवन यापन की समस्याओं की अपेक्षा सामन्तीय अधिकारों से अधिक परेशानी थी।

तात्कालिक कारण - वित्तीय संकट और सामन्तों का विद्रोह
आप को जैसा कि पहले ही बताया गया है कि अमेरिका के स्वतंत्रता युद्ध में भाग लेने के कारण फ्रांस की आर्थिक स्थिति अत्यधिक खराब हो गयी थी। 1788-89 में आए अकाल के कारण फ्रांस में वित्तीय संकट उत्पन्न हो गया। सरकार को अपना ऋण भुगतान करने के लिए धन की आवश्यकता थी, परन्तु कोई नया ऋण देने को तैयार नहीं था। पहले से ही अत्यधिक करभार उठा रही जनता अकाल के कारण नया कर देने की स्थिति में नहीं थी। अब एकमात्र विकल्प बचा था कि विशेषाधिकार वर्ग पर कर लगाया जाए। संकट के निवारण के लिए वित्त मंत्री कोलोन ने अनाज के मुक्त व्यापार और नए कर लगाने का प्रस्ताव कुलीन वर्ग की सभा में रखा तो सुधारों के विरूद्ध कुलीन सामन्त वर्ग संगठित हो गया। उनके विरोध के कारण लुई 16वें को कोलोन को पहले के वित्तमंत्रियों की भांति पद से हटाना पड़ा। नए मंत्री ब्रीन के सुझाव पर राजा ने प्रस्ताव को पार्लमां के समक्ष पंजीकरण करने के लिए भेज दिया।
पेरिस की पार्लमां, जिसके सदस्य सामन्त वर्ग के थे, ने कर लगाने सम्बन्धी कानूनों को पंजीकृत करने से इंकार कर दिया। उसने स्पष्ट किया कि राजा को नया कर लगाने का अधिकार नहीं है, केवल राज्य को ही 'एस्टेट्स जनरल' के माध्यम से कर लगाने का अधिकार है। इस प्रकार विशेषाधिकार सम्पन्न सांमत वर्ग ने राजा का विरोध करके फ्रांस को क्रान्ति की ओर धकेल दिया।

फ्रांस की क्रान्ति (1789) प्रमुख घटनायें

क्रान्ति की निश्चित प्रारम्भिक तिथि के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों ने सामन्तों द्वारा 17871789 तक कर लगाने का विरोध और पार्लमां द्वारा एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन बुलाने की मांग के साथ ही क्रान्ति का प्रारम्भ माना है। क्रान्तिकाल मे राब्सपियरे और बाद में कार्ल मार्क्स ने माना है कि क्रान्ति अभिजात वर्ग द्वारा प्रारम्भ हुयी और उसे जनसाधारण ने पूरा किया। एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन बुलाना सामन्तों के विद्रोह के कारण सम्भव हुआ। 1789 से 1799 के मध्य फ्रांस में जो कुछ घटित हुआ, वह सभी क्रान्ति का ही हिस्सा था।

एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन एवं टेनिस कोर्ट की शपथ
एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलाने की पार्लमां की मांग का जनता द्वारा भारी समर्थन किया गया। राजा ने पार्लमां को भंग करना चाहा, तो कई शहरों में प्रत्यक्ष विरोध प्रदर्शन हुआ। अंततः विवश होकर राजा को एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलानी पड़ी। आपको बताया जा चुका है कि 1614 में एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन अन्तिम बार हुआ था। एस्टेट्स जनरल के चुनाव के लिए पादरी ,सामंत और तृतीय वर्ग की अलग अलग बैठक होती थी तथा तीनों के अलग अलग निर्णय लिए जाते थे। तीनों मतों में दो मत एक होने पर प्रस्ताव पारित होता था। 1789 में एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन बुलाते समय प्रतिनिधि चुनने की इस पुरानी पद्धति के विरूद्ध तृतीय वर्ग ने विरोध किया। विशेष रूप से यह विरोध जनता द्वारा हजारों की संख्या में अपने प्रतिनिधियों को सुझाव पत्र समस्याओं की सूची 'काहिया' (बुक्स ऑफ ग्रिसेस') भेजकर व्यक्त किया गया। तृतीय वर्ग के सदस्यों की संख्या तो बढ़ा दी गयी, लेकिन उनके तीनों सदनों की संयुक्त बैठक कर सभी प्रतिनिधियों के बहुमत से निर्णय लेने की मांग को अस्वीकार कर दिया गया। 25 वर्ष से अधिक आयु का जो व्यक्ति राज्य को कर देता था या किसी विशेष कार्य में दक्ष था, मत दे सकता था।
5 मई को एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन वर्साय में हुआ, परन्तु मतदान प्रणाली को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया। लगभग डेढ़ माह तक गतिरोध चलता रहा। तृतीय वर्ग ने अन्य वर्गों को अपने साथ बैठने के लिए आमंत्रित किया। विरोध के बावजूद प्रथम वर्ग से कुछ छोटे पादरियों ने तृतीय सदन के साथ बैठना स्वीकार किया। अंततः 17 जून,1789 को तृतीय सदन ने अपने को राष्ट्रीय सभा घोषित कर दिया। 20 जून, 1789 को जब तृतीय वर्ग के प्रतिनिधि सभा भवन में पहुंचे तो राजा ने सभा भवन बंद करा दिया। तृतीय वर्ग ने समीप स्थित टेनिस कोर्ट में सभा करने का निर्णय किया।
टेनिस कोर्ट में एकत्र होकर प्रतिनिधियों ने शपथ ली कि राष्ट्रीय सभा देश के लिए नया संविधान बनाने तक भंग नहीं की जायेगी। इस प्रकार पहली बार एक संविधान सभा का गठन स्वतः हो गया। 23 जून, 1789 को राजा ने तीनों वर्गों के प्रतिनिधियों को सम्बोधित किया तथा पृथक-पृथक सदन में बैठकर निर्णय करने को कहा तो राष्ट्रीय सभा ने इसे मानने से इंकार कर दिया। दो दिन बाद पादरी और कुलीन भी राष्ट्रीय सभा में सम्मिलित हो गए। अंत में 27 जून, 1789 को राजा ने तीनों सदनों की संयुक्त बैठक करने की अनुमति दे दी और राष्ट्रीय सभा को वैधानिक मान्यता मिल गयी। यह जनता की महत्वपूर्ण विजय थी।

पेरिस में 'सान्ज क्यूलात द्वारा विद्रोह और बास्तील का पतन
पेरिस के लोग वर्साय में एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन करने से नाराज थे। पेरिस में अकाल के कारण बेरोजगार हुए लोग एकत्र हो गए थे। इन बेरोजगार और गरीब लोगों, जिनको सांज क्यूलोत कहा जाता था, ने धीरे धीरे अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी। उन्होंने 27 जून को कारखाना मालिकों और व्यापारियों पर हमला कर दिया
और दंगे बढ़ते गये। इसी समय राजा ने लोकप्रिय मंत्री नेकर को भी बर्खास्त कर दिया। वह तृतीय वर्ग का समर्थन कर रहा था। 1781 में पद से हटाने के बाद मई, 1789 में उसे पुनः वित मंत्री बनाया गया था। रानी और राज परिवार के कई सदस्य उसके विरोधी थे। 11 जुलाई को नेकर ने जब सुझाव दिया कि राजपरिवार को अपने व्यय को सीमित करना चाहिए, तब उसे पद से हटा दिया। इससे पेरिस की जनता को यह विश्वास हो गया कि राजा कोई कठोर कदम उठाने जा रहा है।
13 जुलाई,1789 को यह अफवाह फैली कि विद्रोहियों का दमन करने के लिए पेरिस में सैनिकों को भेजा जा रहा है। कामील देमूलैं नामक पत्रकार ने अपने उत्तेजित भाषण में जनता को हथियार जमा करके सैनिकों का सामना करने के लिए तैयार रहने का आहवान किया। इससे उत्तेजित होकर लोगों की भीड़ ने पहले पेरिस में हथियारों को लूटा और तत्पश्चात अधिक हथियार पाने के उद्देश्य से 14 जुलाई, 1789 को बास्तील के किले की ओर बढ़ी। लोगों का मानना था कि यहाँ बारूद और हथियार बहुत मात्रा में एकत्र हैं। बास्तील के किले के प्रशासक दलोने ने अपने सैनिको के साथ भीड़ को हथियार लेने से रोकने का प्रयास किया। उत्तेजित भीड़ ने किले पर हमला कर दिया। चार पाच घंटे चले संघर्ष में कई लोग मारे गये। भीड़ ने किले के अधिकारियों को मार कर सभी बन्दियों को रिहा कर दिया तथा किले में स्थित हथियारों को लूटकर किले को पूरी तरह नष्ट कर दिया।
फ्रांस की क्रांति का यह निर्णायक मोड़ था। बास्तील का किला पेरिस से कुछ दूरी पर स्थित था। इस किले में राजनीतिक कैदियों को बंदी बनाकर रखा जाता था। वाल्टेयर, मिराबो जैसे लोकप्रिय नेताओं को यहाँ बंदी बनाकर रखा गया था। जनता इस किले को निरंकुशता और अत्याचार का गढ़ मानती थी। इस किले का पतन निरंकुशता पर विजय का प्रतीक थी। क्रांतिकारियों ने 14 जुलाई को फ्रांस का राष्ट्रीय दिवस घोषित किया तथा पुराने झंडे के स्थान पर क्रांति का नया तिरंगा झंडा अपना लिया। पेरिस में नयी सरकार 'पेरिस कम्यून' का गठन किया गया, जिसमें जीन सिल्वेन बैली को मेयर बनाया गया। लाफायते के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय सुरक्षा दल की स्थापना की गयी। सेना पर मध्यम वर्ग का अधिकार हो गया। राजा लुई 16वें को इन परिवर्तनों को स्वीकारने के लिए कहा गया तो उसने 17 जुलाई को पेरिस आकर इन परिवर्तनों को स्वीकार कर लिया। इस घटना को एकतंत्र की पराजय और स्वतंत्रता की विजय माना गया। पेरिस के समान अन्य स्थानों पर भी कम्यून और सुरक्षा दल गठित किये गये।
बास्तील की घटना का विशेष महत्व है। इस घटना के पश्चात जनता को सामन्तों और विरोधियों पर सीधी कार्यवाही करने का मौका मिल गया। शीघ्र ही फ्रांस में पुरातन व्यवस्था और उसके प्रतीकों को समाप्त किया जाने लगा। ग्रामीण क्षेत्र में भी किसानों ने सामंतों के निवास स्थानों पर आक्रमण करके सामंती करों के अभिलेखों में आग लगा दी। व्यवहार में सामन्ती व्यवस्था का अन्त कर दिया गया।

राष्ट्रीय संवैधानिक सभा (1789-91)

आपने देखा कि कैसे तृतीय एस्टेट ने अपने को राष्ट्रीय सभा घोषित किया और टेनिस कोर्ट की सभा में नवीन संविधान का निर्माण करने का निश्चय किया। 27 जून को जब राष्ट्रीय सभा को मान्यता प्रदान की गयी तो पादरी और कुलीन भी राष्ट्रीय सभा में सम्मिलित हो गए। राष्ट्रीय सभा ने अगस्त, 1789 से सितम्बर, 1791 तक शासन में सुधार और कई महत्वपूर्ण कार्य किए और फ्रांस का पहला लिखित संविधान तैयार किया।

सामन्तीय विशेषाधिकारों का अन्त
उस समय सम्पूर्ण देश में क्रान्ति अपने चरम पर थी। बास्तील के पतन के पश्चात फ्रांस के नगरों और ग्रामीण क्षेत्र में सामन्तों के विरूद्ध जनता आन्दोलित हो गयी थी। राष्ट्रीय सभा में 4 अगस्त को एक समिति ने राज्य की अशान्ति और अराजक दशा पर एक रिर्पोट प्रस्तुत की तो नोआइय नामक एक कुलीन ने यह कह कर कि इसका कारण सामन्तों के विशेषाधिकार हैं,अपने विशेषाधिकारों को त्याग दिया। उसका समर्थन करते हुए कई अन्य सामन्तों ने भी अपने अधिकारों को त्यागने की घोषणा की। तब राष्ट्रीय सभा ने प्रस्ताव पारित करके सभी नागरिकों पर एक सामान कर व्यवस्था लागू की और विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया। सदियों पुरानी व्यवस्था, जो क्रान्ति का प्रमुख कारण थी, का अन्त हो गया। इस घटना के बाद कुछ असन्तुष्ट सामन्त और राजा के सम्बन्धी विदेश भाग गये और क्रान्ति के विरूद्ध षडयन्त्र रचने लगे।

मानव एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा
राष्ट्रीय सभा ने अमेरिकी क्रान्ति से प्रेरित होकर तथा रूसो की पुस्तक 'सोशल कांट्रैक्ट' से प्रभावित हो 27 अगस्त, 1789 को मानव अधिकारों की घोषणा की। इसमें उन सभी सिद्धान्तों को सम्मिलित किया गया जिसके आधार पर राष्ट्रीय सभा सम्पूर्ण शासन प्रणाली में सुधार करना चाहती थी। इस घोषणानुसार -
  • प्रत्येक मनुष्य को समानता का अधिकार प्राप्त है।
  • मुआवजा दिए बिना किसी की सम्पत्ति को जब्त नहीं किया जायेगा।
  • सरकारी पदों पर योग्यता के आधार पर नियुक्ति की जायेगी।
  • सभी को धार्मिक स्वतंत्रता के साथ साथ लेखन, भाषण तथा प्रकाशन की स्वतंत्रता प्रदान की गयी। समस्त जनता को समान न्याय और समान कानून का अधिकार दिया गया। किसी को गैर कानूनी ढंग से कैद नहीं किया जायेगा।
  • इस घोषणा ने क्रान्ति को व्यापकता प्रदान की और समस्त विश्व को प्रभावित किया।

पेरिस की महिलाओं का वर्साय अभियान
4 अगस्त के निर्णय तथा मानव अधिकारों के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने में राजा लुई 16वाँ देरी कर रहा था। जनता को भय था कि लुई 16वाँ क्रान्ति विरोधियों के साथ मिलकर क्रान्ति दमन करना चाहता है और इसके लिए पेरिस में सेना भेज सकता है। 1 अक्टूबर को वर्साय में शानदार दावत का आयोजन किया गया, जबकि पेरिस में अन्न की कमी थी। अतः 5 अक्टबर, 1789 को पेरिस की कई हजार स्त्रियों ने वर्साय जाकर राजा के महल को घेर लिया। वह हमें रोटी दो' नारे लगा रही थीं। इनके साथ कई आन्दोलनकारी भी मिल गए। 6 अक्टूबर को इन लोगों ने वर्साय के महल पर अधिकार कर लिया और राजा तथा उसके परिवार को पेरिस में चलकर रहने पर विवश किया। राजा को तुईलरी के महल में रखा गया। 16 अक्टूबर को राष्ट्रीय सभा को भी पेरिस ले आया गया।

आर्थिक सुधार
राष्ट्रीय सभा के सामने आर्थिक समस्या सबसे बड़ी समस्या थी। तालिराँ नामक एक विशप ने राष्ट्रीय सभा में प्रस्ताव रखा कि चर्च की सम्पत्ति को समाप्त कर दिया जाए। चर्च के पास फ्रांस की भूमि का पाँचवाँ हिस्सा था। वाद विवाद के पश्चात यह प्रस्ताव 22 वोटों से पारित हुआ। 3 नवम्बर, 1789 को चर्च की भूमि का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। चर्च की भूमि का भुगतान करने के लिए बॉन्ड (असिगनेट) का प्रयोग किया गया जो शीघ्र ही कागज की नियमित करेंसी बन गए। आर्थिक स्थिति सुधारने हेतु निर्धनों के लिए 'चैरिटी वर्कशाप' स्थापित किए। किसानों से भूमिकर के अतिरिक्त कोई भी कर लेना बन्द कर दिया। व्यापार और उद्योग धन्धों पर कर लगाए गए। अनाज के व्यापार को कर मुक्त किया और स्थानीय चुंगीयां और श्रेणियां समाप्त कर दी गयीं। देश छोड़कर गये कुलीन लोगों की सम्पत्ति को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित किया।

राष्ट्रीय सभा का मूल्यांकन
इतिहासकार हेज का मत है कि फ्रांस के तूफानी वातावरण में राष्ट्रीय संवैधानिक सभा ने देश में शान्ति एवं सुव्यवस्था के लिए जो कार्य अल्पकाल में पूरे किए वह अन्य सभाएं वर्षों तक पूरा करने में सफल नहीं हो पातीं। राष्ट्रीय सभा ने पुरातन व्यवस्था और सामन्तवाद का अंत करके मानवाधिकारों की घोषणा की और एक लिखित संविधान बनाया।
राष्ट्रीय सभा के कार्यों में कई दोष भी थे। - इसने नागरिकों को मताधिकार के आधार पर दो वर्गों सक्रिय नागरिक और निष्क्रिय नागरिक में बाँट दिया और गरीबों को मताधिकार से वंचित कर दिया। व्यवस्थापिका
और कार्यपालिका अलग करने से वह एकदूसरे की सहायक न होकर विरोधी बन गयीं। अत्यधिक विकेन्द्रीयकरण करने के कारण केन्द्र सरकार का स्थानीय अधिकारियों पर नियंत्रण नहीं रहा जिससे प्रशासन कमजोर हो गया। दूसरी बार विधान सभा का सदस्य नहीं बनने के निर्णय ने अनुभव की उपेक्षा की। इतिहासकार एच. जी. वेल्स के अनुसार इस सभा के बहुत से कार्य रचनात्मक तथा चिरस्थायी प्रवृत्ति का थे किन्तु इस सभा के बहुत से कार्य प्रायोगिक थे और अस्थायी सिद्ध हुए।

विधान सभा (1791-92)

1791 के संविधान अनुसार फ्रांस में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हेतु व्यवस्थापिका सभा का निर्वाचन किया गया। नई विधान सभा का पहला सत्र 1 अक्टूबर, 1791 को प्रारंभ हुआ। इसकी सदस्य संख्या 745 थी। यह सभी सदस्य नए और अधिकांश मध्यम वर्ग के थे। विधान सभा के प्रारम्भ के साथ जनता ने खुशी मनाई कि अब कान्ति समाप्त हो गयी है और फ्रांस में अब शान्ति स्थापित होगी। परन्तु विधान सभा के गठन से पूर्व जब राष्ट्रीय सभा अपना कार्य कर रही थी तब ही 20 जून, 1791 को राजा और रानी ने नौकरों के वेष में विदेश भागने का प्रयत्न किया। सीमा पार करने से पूर्व ही उन्हें पहचान लिया गया और उन्हें पेरिस लाया गया। इस घटना से लोगों का राजा पर से विश्वास कम हो गया । इसका लाभ गणतंत्रवादियों को मिला और वह अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल रहे।

विधान सभा में दलबन्दी
इस सभा में कई दलों के प्रतिनिधि विजित हुए-
  • राजतंत्रवादी- इनकी संख्या 100 थी और यह लुई 16वें के समर्थक थे।
  • संविधानवादी- यह संवैधानिक राजतंत्र के समर्थक थे। फेइयां चर्च में एकत्र होने के कारण फेइयां भी कहा जाता था। इनकी संख्या 164 थी।
  • सेण्टर पार्टी- यह स्वतंत्र सदस्य थे सभा में बीच में बैठने के कारण सेण्टर पार्टी कहलाये। यह 245 थे।
  • गणतंत्रवादी- राजतंत्र को पूर्ण समाप्त करना चाहते थे। इनकी संख्या 236 थी। गणतंत्रवादियों में भी दो गुट थे- जिरोंदिस्त जो उदारवादी था और जैकोबिन, जो उग्रवादी था। विधान सभा में जिरोदिस्त दल का मंत्रीमंडल था। 

विधान सभा के समक्ष समस्याएं
इस सभा को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
  • फ्रांस में राजतंत्र के समर्थक बहुत से सामन्त और राजा के भाई विदेश भाग गये थे, जहां वह यूरोप के अन्य राजतंत्रों के साथ मिलकर क्रान्ति विरोधी षड़यन्त्र रच रहे थे। व्यवस्थापिका सभा ने विदेश गए सामन्तों को दो माह के अन्दर लौट आने अन्यथा देशद्रोही घोषित करने का आदेश दिया। राजा ने इस आदेश पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया।
  • संविधान सभा द्वारा बनाए गए लौकिक संविधान की शपथ न लेने वाले पादरियों को सभा ने यह आदेश दिया कि यदि वह शपथ नहीं लेंगे तो उनको पद से हटा दिया जायेगा और उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली जायेगी। राजा ने इस आदेश को भी अस्वीकार कर दिया।
राजा के इन कार्यों को कान्ति विरोधी प्रचारित करके गणतंत्रवादियों ने राजतंत्र के विरूद्ध प्रहार करना प्रारम्भ कर दिया।

यूरोपीय राष्ट्रों से युद्ध
फ्रांस के राजा के समर्थन में 27 अगस्त, 1791 को आस्ट्रिया और प्रशा के शासकों ने पिलनित्स की घोषणा की जिसमें कहा कि फ्रांस की समस्या सभी राज्यों की समस्या है और हम इसको समाप्त करने के लिए फ्रांस में सशस्त्र हस्तक्षेप करेंगे। यह घोषणा विधान सभा को भयभीत करने के लिए की गयी थी। किन्तु गणतंत्रवादियों ने राजतंत्र को समाप्त करने के लिए युद्ध को आवश्यक मानकर युद्ध करने का प्रस्ताव रखा, जो बहुमत से पास हुआ। 20 अप्रैल, 1792 को आस्ट्रिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी गयी।

राजतंत्र का अंत और अन्तरिम सरकार का गठन
प्रशा के सेनापति ने ब्रुन्सविक की घोषणा की कि यदि फ्रांस की जनता ने लुई 16वे तथा उसके परिवार को कोई क्षति पहुंचाई तो पेरिस को नष्ट कर दिया जायेगा। फ्रांस की जनता इससे उत्तेजित हो गयी और लुई 16वें को देशद्रोही मानकर तुइलरी के महल पर धावा बोल दिया। व्यवस्थापिका सभा ने 11 अगस्त, 1792 को राजा लुई 16वें को निलम्बित कर दिया तथा गणतंत्र की स्थापना करने के लिए नवीन संविधान का गठन करने हेतु राष्ट्रीय सम्मेलन का चुनाव करने का निश्चय किया। तत्पश्चात पेरिस की नागरिक सभा पेरिस कम्यून को अन्तरिम सरकार चलाने का कार्यभार सौंप दिया।

कम्यून और सितम्बर हत्याकांड
पेरिस कम्यून की अन्तरिम सरकार ने 11 अगस्त से 20 सितम्बर तक राज्य किया। इस पर जैकोबिन नेताओं राब्सपियरे, दांतों और मारा आदि का प्रभाव था। उसने प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को मतदान करने का अधिकार दिया। कम्यून ने लुई 16वें तथा उसके परिवार को बन्दी बना लिया। मारा ने विचार रखा कि बाहरी शत्रु से पूर्व देश में स्थित कान्ति विरोधियों का दमन करना चाहिए। परिणामस्वरूप 2 सितम्बर से 6 सितम्बर, 1792 में हजारों की संख्या में राजतंत्र के समर्थकों और क्रान्ति विरोधियों को मौत के घाट उतार दिया गया। सितम्बर हत्याकाण्ड का असर चुनावों पर भी पड़ा। 20 सितम्बर, 1792 को फ्रांस ने आस्ट्रिया और प्रशा की सेनाओं को वाल्मी के युद्ध में पराजित किया। इसी दिन विधान सभा भंग कर दी गयी और राष्ट्रीय सम्मेलन का चुनाव हुआ।

नेशनल कन्वेंशन ' राष्ट्रीय सम्मेलन (1792-1795)

राष्ट्रीय सम्मेलन फ्रांस की तीसरी क्रान्तिकारी सभा थी तथा इसका चुनाव आतंक और भय के माहौल में 20 सितम्बर, 1792 को हुआ । इसमें कुल 782 सदस्यों में से 200 जिरोंदिस्त, 100 जैकोबिन तथा 482 स्वतंत्र सदस्य निर्वाचित हुए। 20 सितम्बर, 1792 को इसकी प्रथम बैठक हुयी। इनमें प्रमुख जिरोंदिस्त नेता ब्रिसट, कन्डोरसे तथा प्रमुख जैकोबिन नेता रोबस्पियरे, दाँतो, मारा, कार्नो , कामिल आदि थे।

राष्ट्रीय सम्मेलन की प्रमुख समस्याएं
कन्वेंशन ने क्रान्ति के विषम दौर में विकट समस्याओं के मध्य अपना कार्य सितम्बर, 1792 से अक्टूबर, 1795 तक सम्पादित किया। इसके सामने प्रमुख समसयाएं थीं।
फ्रांस में शान्ति स्थापित करना, विदेशी आक्रमण का सामना करना,, आर्थिक दशा में सुधार करना तथा धार्मिक समस्याओं का सुलझाना। इनके अतिरिक्त सबसे बड़ी समस्या गणत्रंवादियों के आपसी मतभेद, विशेष रूप से राजा के दण्ड के सम्बन्ध में आपसी मतभेद थे।

राजा को मृत्युदण्ड
लुई सोलहवें के विरूद्ध उसके महल से प्राप्त गुप्त पत्रों से उसके राष्ट्रद्रोह के प्रमाण मिले थे। अतः अब औपचारिक मुकदमें के बाद राजा को अपराधी घोषित कर दिया गया। 16 जनवरी, 1793 को राजा को मृत्युदण्ड देने के प्रश्न पर मतदान हुआ और सम्मेलन ने राजा को बहुमत के आधार पर मृत्युदण्ड दे दिया। राजा लुई 16वें को देशद्रोही घोषित किया तथा 21 जनवरी, 1793 को उसे गिलोटिन पर चढ़ाकर मृत्युदण्ड दिया।

यूरोपीय राष्ट्रों से युद्ध
राजा को प्राणदण्ड देने के कारण कई यूरोपीय देश फ्रांस के विरोधी हो गये। आस्ट्रिया, प्रशा के साथ इंग्लैण्ड, स्पेन, हालैण्ड, सार्डिनिया ने मिलकर फ्रांस के विरूद्ध संगठन बनाया और फ्रांस पर आक्रमण कर दिया। विदेशी आक्रमणों का सामना करने के लिए तीन लाख सैनिकों की एक विशाल सेना का गठन किया गया। प्रारम्भ में फ्रांस को पराजित करने के बाबजूद यह प्रथम संगठन फ्रांस का अहित करने में असफल रहा।

आतंक का शासन
इस समय बाहरी और आन्तरिक विरोध के कारण सम्पूर्ण देश में अराजकता फैली थी। सम्मेलन के अन्दर भी दलगत संघर्ष व्याप्त थे। जिरोंदिस्त और जैकोबिन के मध्य संघर्ष में अन्ततः जैकोबिन विजयी हुए। उन्होंने पेरिस की जनता की सहायता से 2 जून, 1793 को जिरोंदिस्त दल के 31 प्रमुख सदस्यों को बन्दी बनाकर शासन पर पूर्ण अधिकार कर लिया। क्रान्ति के विरोधियों में भय उत्पन्न करने और गणतंत्र को स्थायी बनाने के लिए जैकोबिनों ने आतंक के राज्य की स्थापना की। यह शासन जून,1793 से जुलाई,1794 तक चलता रहा। इसका प्रमुख दाँते था।
इस आतंकी सरकार ने दो महत्वपूर्ण समितियाँ गठित की- जन सुरक्षा समिति और सामान्य सुरक्षा समिति। जन सुरक्षा समिति का प्रमुख रोबस्पियरे था। यह समिति व्यवहारिक रूप से सबसे शक्तिशाली संस्था बन गयी। राष्ट्रीय सम्मेलन के नेता उसके पूर्ण नियंत्रण और आतंक के अधीन हो गये। इस समिति ने अपने विरोधियों पर अनेक अत्याचार किये और हजारों लोगों को गिलोटिन पर चढ़ा दिया। सामान्य सुरक्षा समिति पुलिस का कार्य करती थी। उसने अगणित लोगों को जेलों में डाला, जहाँ से उन्हें न्यायाधिकरण के समक्ष पेश किया जाता था। क्रान्ति विरोधियों को दंडित करने के लिए क्रान्तिकारी न्यायालय की भी स्थापना की। इसके द्वारा आतंक का शासन स्थापित किया गया। इस दौरान राज परिवार के सदस्यों, हजारों की संख्या में क्रान्ति विरोधियों तथा अन्त में प्रमुख जिरोंदिस्त सदस्यों को भी गिलोटिन पर चढ़ाया गया। 28 जुलाई, 1794 को राब्सपियरे की मृत्यु के साथ आतंक के शासन का अन्त हुआ।

राष्ट्रीय सम्मेलन के अन्य कार्य
राष्ट्रीय सम्मेलन ने गणतंत्र की घोषणा करके देश के लिए नया कैलेण्डर बनाया। राष्ट्रीय सम्मेलन ने फ्रांस में दास प्रथा तथा वर्ग भेद समाप्त करके सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करने का प्रयास किया। फ्रेंच को राष्ट्रभाषा घोषित किया तथा स्कूलों और पुस्तकालयों की स्थापना की। बुद्धि पूजा को महत्व दिया गया। विवाह और तलाक के नियम सरल बनाये गए। वित्तीय समस्या के समाधान हेतु वित्त विशेषज्ञ परिषद का गठन किया।
राष्ट्रीय सम्मेलन की स्थापना का उद्देश्य संविधान का निर्माण करना था। अतः उसने 1795 में संविधान तैयार किया, जिसे तृतीय वर्ष का संविधान कहा जाता है। तत्पश्चात 26 अक्टूबर, 1795 को राष्ट्रीय सम्मेलन को भंग कर दिया गया।

निदेशक मण्डल (1795-1799) और नेपोलियन का उदय

राष्ट्रीय सम्मेलन द्वारा निर्मित तृतीय वर्ष के संविधान में दो सदन वाली विधान सभा और पाँच सदस्यों के निदेशक मण्डल वाली कार्यपालिका का प्रावधान रखा गया था। उसके अनुसार पाँच सदस्यों –बर्रास, कार्नो, एबेसिया, रूबेल और ला रिबेलियरे का चयन करके निदेशक मण्डल का गठन किया गया। इस डायरेक्टरी ने 27 अक्टूबर,1795 से 19 अक्टूबर, 1799 तक शासन किया।
डायरेक्टरी का चार वर्ष का कार्यकाल अनिश्चितता और संकटपूर्ण रहा। इसके सदस्य अयोग्य और भ्रष्ट तथा अपने स्वार्थों में निहित थे। फलतः शासन व्यवस्था कमजोर पड़ने लगी और डायरेक्टरी के विरूद्ध षड़यन्त्र रचे जाने लगे। पेन्थियन विद्रोह जिसे बेबुफ द्वारा प्रारम्भ करने के कारण बेबुफ षड़यन्त्र कहा जाता है, डायरेक्टरी के समय की प्रमुख घटना है। इसका उद्देश्य सर्वहारा वर्ग के हितों को स्थापित करना तथा मध्यमवर्ग के प्रभुत्व वाली डायरेक्टरी का विरोध करना था। इस षड़यन्त्र का दमन कर दिया गया। लेकिन जनता में डायरेक्टरी के शासन के प्रति आक्रोश फैल गया।
डायरेक्टरी का कार्यकाल यूरोपीय देशों के साथ लड़े गये युद्धों और उनमें तेजी से उभरते सेनापति नेपोलियन की प्रारम्भिक सैनिक सफलताओं के कारण याद किया जाता है। नेपोलियन की सैनिक योग्यता से प्रभावित हो डायरेक्टरी ने उसे इटली के अभियान का सेनाध्यक्ष नियुक्त किया। इटली का अभियान अप्रैल,1796 से अप्रैल,1797 तक चला।
नेपोलियन ने आस्ट्रिया की सेना को परास्त किया। आस्ट्रिया के सम्राट ने सन्धि करने का प्रस्ताव रखा और युद्ध रोक दिया गया। अंत में नेपोलियन ने आस्ट्रिया के साथ 17 अक्टूबर, 1797 को कैम्पो फोर्मियो की संधि की। इस सन्धि के अनुसार-आस्ट्रिया द्वारा फ्रांस को बेल्जियम प्रदान कर दिया गया। लोम्बार्डी पर फ्रांस का अधिकार स्वीकार कर लिया गया। राइन का प्रदेश भी फ्रांस को दे दिया गया। वेनिस के इरिट्रिया और डाल्मेशिया क्षेत्र आस्ट्रिया को देकर वेनिस के पश्चिमी भाग को सिसएल्पाइन में मिलाकर फ्रांस के अधीन कर दिया गया।
नेपोलियन ने इटली के विजित क्षेत्रों को मिलाकर सिसएल्पाइन गणतंत्र और जिनोआ तथा उत्तर पश्चिम के प्रदेशों को मिलाकर लिगूरियन गणतंत्र बना दिया। 1799 में उसने दक्षिणी इटली के क्षेत्रों नेपल्स आदि में पार्थेनोपियन गणतंत्र की स्थापना की। इस अभियान से अधिकांश इटली पर आस्ट्रिया का प्रभाव खत्म हो गया और फ्रांस का प्रभाव कायम हो गया।
फ्रांस के विरूद्ध बने प्रथम गुट में अब इग्लैण्ड ही शेष रह गया था, नेपोलियन का विचार था कि मिश्र पर अधिकार करके वह इंग्लैण्ड के भूमध्यसागरीय और एशियायी व्यापार को बाधा डालकर उसकी आर्थिक शक्ति को क्षीण कर सकता है। फ्रांस के डायरेक्टर भी नेपोलियन की लोकप्रियता से भयभीत होकर उसे फ्रांस से दूर रखना चाहते थे। अतः उसकी मिश्र अभियान की योजना को स्वीकृति मिल गयी। प्रारम्भ में वह मिश्र में भी सफल रहा लेकिन अंत में नील नदी के युद्ध में अंग्रेज सेनापति नेल्सन के हाथों बुरी तरह पराजित हुआ।
नेपोलियन की प्रारम्भिक सैनिक उपलब्धियाँ विशेषरूप से इटली की सफलता ने फ्रांस में उसको लोकप्रिय बना दिया था। इस समय डायरेक्टरी (निदेशक मण्डल) के भ्रष्ट शासन और देश में व्याप्त अराजकता से फ्रांस की जनता तंग आ गयी थी। महत्वाकांक्षी नेपोलियन ने सत्ता पर अधिकार करने हेतु उचित समय जानकर डायरेक्टरी के विरूद्ध षडयन्त्र रचा। इस षडयन्त्र में उसने ऐबेसीये, तालिरां और फूशे आदि को अपने साथ मिला लिया। तीन प्रमुख निदेशकों पर दबाब डालकर इस्तीफा ले लिया गया और दो निदेशकों को नजरबंद कर दिया गया। दोनों सदनों के अधिवेशन में विरोधियों को अपने सैनिकों के द्वारा भयभीत कर नेपोलियन ने संचालक मण्डल को समाप्त करने का प्रस्ताव पास करा लिया। सीये को संविधान बनाने का कार्य सौंपा गया। इस प्रकार 10 नवम्बर, 1799 को 19वें ब्रूमेयर के आठवें कूप द इतात द्वारा सत्ता परिवर्तन कर दिया गया।

कौंसिल शासन 1799-1804

1799 ई0 से 1804 ई0 के युग में फ्रांस की क्रान्ति के सिद्धान्तों का सम्पूर्ण यूरोप में प्रसार हुआ। नेपोलियन के कार्यों ने प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से इन सिद्धान्तों के प्रसार में योगदान किया और फ्रांस की क्रान्ति को यरोप की क्रान्ति बना दिया।
कौंसिल शासन में सत्ता तीन कौंसिल- नेपोलियन, सीये और ड्यूको के अधीन थी। प्रथम कौंसिल को समिति का अध्यक्ष बनाया गया और यह पद नेपोलियन को दे दिया गया। शासन की सम्पूर्ण शक्ति प्रथम कौंसिल में केन्द्रित थी। फ्रांस की आन्तरिक व्यवस्था स्थापित करते समय उसने एक ओर क्रान्ति के सिद्धान्तों को स्थिरता प्रदान की तो दूसरी ओर बूर्बा राजवंश द्वारा स्थापित परम्परागत व्यवस्था को भी नवीन रूप देकर पुनर्स्थापित किया।

क्रान्ति के सिद्धान्तों पर आधारित कार्य
फ्रांस में व्याप्त अव्यवस्था को दूर करने के लिए प्रथम कौंसिल बनने के पश्चात नेपोलियन ने अनेक सुधार किए। उसके प्रशासनिक कौशल को प्रकट करने वाले यह सुधार उसकी स्थायी उपलब्धियाँ सिद्ध हुये।
  • संविधान का निर्माण किया गया, जो फ्रांस की क्रांति के पश्चात चौथा संविधान था। कार्यपालिका के लिए तीन सदस्यों की कौंसिल समिति का प्रावधान रखा गया, जिसकी कार्यावधि दस वर्ष रखी गयी। इनमें संविधान में चार सदनों वाली व्यवस्थापिका का प्रावधान रखा गया। इन सभाओं के सदस्यों का चुनाव सूची तैयार करके अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा किया जाता था। नेपोलियन ने कुछ वर्ष पश्चात इस संविधान पर जनमत संग्रह कराया और फ्रांस की जनता ने भारी बहुमत से संविधान को स्वीकार कर लिया।
  • नेपोलियन की सेनाएँ क्रान्ति के नारे ‘स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व' के ध्वज को लेकर विजित क्षेत्रों में गयीं। 1801 में आस्ट्रिया और फ्रांस के मध्य ल्यूनेविल की सन्धि हुयी, जिसमें केम्पोफोर्मिया की शर्तों को ही दुहराया गया। फ्रांस का बेल्जियम और राइन नदी के बाएँ किनारे पर पुनः अधिकार हो गया और इटली के गणतंत्रों बटेवियन, हेल्वेटिक और सिसएल्पाइन का वह स्वयं राष्ट्रपति हो गया। विजित क्षेत्रों में उसके प्रशासनिक सुधारों से क्रान्ति के सिद्धान्त स्वतः विकसित होने लगे।
  • फ्रांस का इंग्लैण्ड के साथ लगभग दस वर्ष से युद्ध चल रहा था। दोनों ही देश शान्ति चाहते थे। फलतः 1802 ई. में दोनों देशों ने आमियां की सन्धि कर ली। इस सन्धि के अनुसार-इंग्लैण्ड ने फ्रांस की कौंन्स्यूलेट सरकार को मान्यता प्रदान की। नेपोलियन का धर्म के सम्बन्ध में स्पष्ट मत था कि फ्रांस का एक धर्म होना चाहिए, जो राज्य के नियंत्रण में रहे 1801 में नेपोलियन ने पोप पायस सप्तम के साथ एक समझौता किया, जिसको कोन्कोर्दा कहा गया। इस समझौते के अनुसार-कैथोलिक धर्म को फ्रांस की बहुसंख्यक जनता का धर्म स्वीकारा गया तथा फ्रांस के सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गयी। चर्च को राज्य के अधीन माना गया और चर्च के अधिकारी राज्य के कर्मचारी माने गये। चर्च के बिशपों की नियुक्ति का अधिकार प्रथम कौंसिल को मिला, पोप को मात्र औपचारिक स्वीकृति का अधिकार दिया गया। राज्य बिशपों और पादरियों को वेतन देता था और उनको देशभक्ति की शपथ लेनी होती थी। चर्च को स्थायी सम्पत्ति खरीदने का अधिकार भी नहीं रहा। इस समझौते से नेपोलियन ने उन सभी बातों को पोप से स्वीकार करा लिया, जिसका प्रारम्भ में पोप ने विरोध किया था। पोप की अनुमति के बिना नेपोलियन ने प्रोटेस्टेंटो के अधिकारों को स्पष्ट करने के लिए अधिकार पत्र दिया और फ्रांस में धर्मनिरपेक्ष राज्य का संस्थापक बन गया।
  • नेपोलियन ने कानूनी क्षेत्र में व्याप्त असंगतियों को दूर करने और एकरूपता स्थापित करने की ओर प्राथमिकता से ध्यान दिया। इसके लिए उसने चार सदस्यों की एक समिति गठित की, जिसके द्वारा तैयार की गयी कानूनी
  • संहिता को नेपोलियन कोड कहा गया। इसमें पाँच तरह के कानूनों का संकलन हुआ।
  1. नागरिक संहिता (सिविल कोड)
  2. नागरिक प्रक्रिया की संहिता (कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर)
  3. फौजदारी कानून (पीनल कोड)
  4. अपराधमूलक प्रक्रिया की संहिता (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर)
  5. व्यवसाय सम्बन्धी कानून (कॉमर्शियल कोड)
इन कानूनों को तीन स्रोतों – फ्रांस के परम्परागत कानून, रोमन कानून और क्रान्ति के अनुभवों से संकलित किया गया। उसकी 1804 में बनी नागरिक संहिता (सिविल कोड) उसके सभी कानूनों मे सबसे अधिक प्रभावशाली थी। इनमें समानता के सिद्धान्त को स्वीकारा गया, स्वतंत्रता को नियंत्रित किया गया तथा विशेषाधिकार और सामन्ती नियम समाप्त कर दिये गये।

नागरिक संहिता के अनुसार-परिवार को एक पवित्र इकाई माना गया और उसमें पिता को सर्वोपरि माना गया। पैतृक सम्पत्ति पर सभी पुत्रों का सामान अधिकार माना गया। विवाह एक पवित्र एवं स्थायी बन्धन माना गया। सिविल मैरिज और तलाक को स्वीकारा गया। लेकिन स्त्रियों को पुरूषों की अपेक्षा कम महत्व दिया गया। उनको पूर्णतया अपने पति के अधीन कर दिया गया। व्यक्तिगत सम्पत्ति के सिद्धान्त को मान्यता दी गई और भूमि पर स्वामी के अधिकार को सख्त बनाया गया। ब्याज की दरें निश्चित कर दी गयीं। एकमात्र सरकार ही सम्पत्ति का अधिग्रहण कर सकती थी। औद्योगिक समूह और धार्मिक संस्थान सम्पत्ति का संग्रह नहीं कर सकते थे।
  • नेपोलियन ने शिक्षा को राष्ट्र के विकास और प्रशासनिक व्यवस्था सुव्यवस्थित करने का प्रमुख साधन माना। उसने शिक्षा के विकास हेतु राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाई, जिसके द्वारा शिक्षा पर राजकीय नियंत्रण लगा कर उसे राष्ट्रीय और धर्मनिरपेक्ष बनाया गया। नेपोलियन ने शिक्षा को तीन स्तरों पर विभाजित किया। प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा। प्रत्येक नगर में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय स्थापित किये गये। प्रीफेक्टों और उप प्रीफेक्टों की देख रेख में शिक्षा का कार्य सौंपा गया।
  • आर्थिक क्षेत्र में सरकारी नियन्त्रण और मुद्रा के विकास हेतु नेपोलियन ने पेरेगो के सहयोग से 1800 में बैंक ऑफ फ्रांस की स्थापना की। इसे नोट जारी करने का एकाधिकार दिया गया। साथ ही इस बैंक से ऋण प्राप्त करने की व्यवस्था भी की गयी। बैंक ने फ्रांस की मुद्रा स्थिति को दृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि के विकास हेतु बंजर और रेतीले इलाकों को उपजाऊ बनाने का प्रयास किया गया। नहरों की व्यवस्था ठीक की गयी। परन्तु भू सुधार और उत्पादन वृद्धि हेतु कोई मौलिक सुधार नहीं किये गए। राजस्व और करों की वसूली केन्द्रिय सरकार के अधीन रखी गयी। इससे करदाता और सरकार दोनों को लाभ हआ। करों को व्यक्ति की आर्थिक स्थिति के आधार पर निर्धारित किया गया।
  • मजदूरों और किसानों की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति का वह विशेष ध्यान रखता था।
  • प्रमुख नदियों पर पुल बनाये गये और नहरों का निर्माण किया गया। सीन नदी पर मजबूत पुलों को बनाया गया। पेरिस का पुननिर्माण किया गया और उसे यूरोप के सबसे सुन्दर और भव्य नेपोलियन ने लगभग 229 अच्छी सड़कों का निर्माण कराया था। तीस सडकें पेरिस को फ्रांस के नगर के रूप में स्थापित किया गया। नेपोलियन स्वयं इटली और मिश्र से कला कृतियां पेरिस को सजाने के लिए लाया था। पेरिस में ला मादलैन का गिरजाघर का निर्माण किया गया। थियेटर, म्यूजियम और बेघर लोगों के लिए आवास गृहों का निर्माण किया गया। भवनो और फर्नीचर निर्माण में एक नई शैली का विकास हुआ, जिसे साम्राज्य की शैली कहा जाता है। नेपोलियन ने शिक्षा और संस्कृति के विकास के लिए जनता पुस्तकालय भी स्थापित किये। तुलों और शेरब्रुग बन्दरगाहों का विकास भी किया गया।
इस प्रकार उसके द्वारा किए गए कार्यों से फ्रांस में आधुनिक राज्य और समाज के सिद्धान्तों की स्थापना हुयी। धर्मनिरपेक्ष राज्य, धर्म और कानून की समानता, लोक सेवाओं और व्यवसाय में सामान्य रूप से समस्त नागरिकों की भागेदारी आदि सभी सुधारों के मूल में समानता के सिद्धान्त को अधिक महत्व दिया गया।

पुरातन व्यवस्था पर आधारित कार्य
प्रशासनिक व्यवस्था का केन्द्रीकरण, प्रेस पर प्रतिबन्ध आदि द्वारा उसने बू| कालीन व्यवस्था के कुछ क्रान्ति विरोधी तत्वों को भी शासन में समाहित किया। उसका मानना था कि फ्रांस की जनता समानता चाहती है स्वतंत्रता नहीं।
  • संविधान की रूपरेखा नेपोलियन द्वारा इस तरह तैयार की गयी कि सारी शक्ति उसी के अधिकार में रहे। गणतंत्र केवल दिखावा मात्र था, वास्तविक सत्ता नेपोलियन के ही हाथ में थी। चुनाव हेतु नामांकन की सूचियां इस तरह से तैयार की जाती थी कि इनका सदस्य वही हो सकता था, जिसको नेपोलियन चाहे।
  • नेपोलियन ने प्रथम कौंसिल का पद ग्रहण करते ही स्थानीय प्रशासन की समस्त व्यवस्था को केन्द्रित कर दिया। उसने देश के प्रशासकीय विभाजन को पूर्ववत रहने दिया। 1800 में उसने पुरातन व्यवस्था के इन्टैंडेंटों के सदश अधिकारियों की नियुक्ति करके पुरातन व्यवस्था में थोड़े संशोधन के साथ केंद्रीकृत शासन स्थापित किया। अब केन्द्र द्वारा प्रत्येक विभाग में प्रीफेक्ट और जिलों में उप प्रीफेक्ट तथा नगरों और कम्यून में मेयर नियुक्त किये जाने लगे। यह अधिकारी निरन्तर केन्द्र के सम्पर्क में रहते थे। केन्द्र सरकार नीति निर्धारण करती थी, इनका कार्य केन्द्र की नीतियों को समान रूप से सम्पूर्ण राज्य में लागू करना था। इनकी सहायतार्थ निर्वाचित परिषदों की स्थापना भी की गयी. जिनका कार्य अपने स्थानों के लिए राष्ट्रीय करों को तय करना था। नेपोलियन ने सचिवालय का भी विकास किया और मारे के नियंत्रण में राज्य मंत्रालय बनाया, जो देश का केंद्रीय लेखा कार्यालय बन गया। स्थानीय प्रशासन और नौकरशाही की यह व्यवस्था थोड़े परिवर्तनों के साथ आज भी फ्रांस में प्रचलित है।
  • नागरिक संहिता के अतिरिक्त जो अन्य संहिताये लागू की गयीं, वह निरंकुशता की भावना से प्रभावित थीं। दण्ड संहिता में राजनीतिक अपराधों को रोकने के लिए मृत्यु दंड, उम्र कैद, देश निर्वासन, संपत्ति जब्त जैसे कानून लागू किए गए। फौजदारी मामलो में जूरी प्रथा समाप्त कर दी गयी। व्यवसाय संहिता साधारण व्यापार, समुद्री व्यापार, दिवालियापन तथा अन्य व्यापारिक मामलों का नियमन करती थी।
  • उच्च शिक्षा के लिए पेरिस विश्वविद्यालय का पुनर्गठन किया गया। विश्वविद्यालय पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण लागू किया गया। पेरिस विश्वविद्यालय के प्रमुख शिक्षकों और अधिकारियों की नियुक्ति नेपोलियन स्वयं करता था। विश्वविद्यालय स्वायत्त संस्था के स्थान पर शिक्षा विभाग का एक अंग बना दिये गए। विश्वविद्यालय के प्रमाणपत्र के बिना नया स्कूल खोलने या सार्वजनिक रूप से शिक्षा देने का किसी को अधिकार नहीं था। नेपोलियन ने नारी शिक्षा ओर कोई ध्यान नहीं दिया। उनके लिए प्राथमिक स्तर तक ही शिक्षा की व्यवस्था की गयी, जो धार्मिक संस्थाओं के अधिकार में रखी गयी। उसने मजदूर संघों को गैर कानूनी घोषित कर मजदूरों पर कड़ा नियन्त्रण स्थापित किया।
  • नेपोलियन मुक्त व्यापार के सिद्धान्त के विपरीत व्यापार पर राज्य का पूर्ण नियन्त्रण चाहता था। उसके अनुसार कोष पर नियन्त्रण और व्यापार में संतुलन के लिए राज्य का हस्तक्षेप आवश्यक है। उसने पुरातन व्यवस्था के अनुसार कुछ व्यापार श्रेणियों को स्थापित किया। नेपोलियन ने साहित्य और पत्रकारिता पर कई प्रतिबन्ध लगा कर उसकी स्वाभाविक प्रगति को रोक दिया था। फलतः फ्रांस में साहित्य का अधिक विकास नहीं हो सका। उस समय के प्रमुख फ्रांसीसी साहित्यकार शातोब्रियां और मैडम द स्ताएल उसके विरोधी थे।
  • एक सम्मान 'लीजियन ऑफ ऑनर' की स्थापना की, जिसके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धियों के लिए लोगों को सम्मान देकर एक नया विशिष्ट वर्ग बनाया।
  • क्रान्ति के विचारों के विपरीत न चाहते हुए भी कैथोलिक फ्रांस का राज्य धर्म बन गया था।
  • पुराने राजप्रसादों तुइलरी और फौंतैब्लो को पुनः सुसज्जित किया गया। जोसेफिन के लिए मालमेजों नामक सुन्दर महल का निर्माण कराया गया। नेपोलियन के समय में प्रमुख चित्रकार दावी और ऐंग्र ने नेपोलियन के युद्धों की सुन्दर कलाकृतियों द्वारा उसको महिमा मंडित करने का कार्य किया।

क्रान्ति का अंत -नेपोलियन सम्राट के रूप में (1804-1815)
नेपोलियन अत्यन्त महत्वाकांक्षी था। 1802 में उसने जनमत संग्रह कराकर अपने को जीवन पर्यन्त प्रथम कौंसिल नियुक्त करा लिया। 1804 में पुनः जनमत संग्रह कराकर वह फ्रांस का सम्राट बन गया। 2 दिसम्बर, 1804 को नाट्रडम के प्रसिद्ध चर्च में उसका राज्याभिषेक किया गया। उसने राजमुकुट पोप के हाथ से लेकर स्वयं धारण कर लिया। फ्रांस में नेपोलियन का एकतंत्र शासन स्थापित हुआ। सम्राट बनने के बाद नेपोलियन निरन्तर युद्धरत रहा।
नेपोलियन की साम्राज्यवादी नीति के विरूद्ध यूरोप के देशों ने भी इंग्लैण्ड के नेतृत्व में गुट की स्थापना की। फ्रांस के विरूद्ध यूरोपीय देशों के इस तृतीय गुट में इंग्लैण्ड, आस्ट्रिया, रूस और स्वीडन थे तथा इसका लक्ष्य फ्रांस को उसकी मूल सीमाओं के अन्दर रखना था। नेपोलियन ने इस गुट के विरूद्ध अपने अभियान का प्रारम्भ 20 अक्टूबर, 1805 ई0 को आस्ट्रिया पराजित करके किया। तत्पश्चात 21 अक्टूबर, 1805 में इंग्लैण्ड के साथ उसका ट्रैफेलगर का युद्ध हुआ। नेल्सन के कुशल नेतृत्व में इंग्लैण्ड की सेना ने फ्रांस और स्पेन के संयुक्त नौसैनिक बेड़े को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया।
2 दिसम्बर, 1805 को आस्टरलित्स के युद्ध में आस्ट्रिया और रूस की संयुक्त सेनाओं के साथ उसका भंयकर युद्ध हुआ। इसे 'तीन सम्राटों का युद्ध' कहा जाता है। इस युद्ध में नेपोलियन को अपने जीवन की महानतम विजयी प्राप्त हुयी। उसके विरूद्ध बना तृतीय गुट भंग हो गया। आस्ट्रिया ने विवश होकर 25 दिसम्बर, 1805 में उसके साथ प्रेसबर्ग की सन्धि की।
इस युद्ध से इटली के अधिकांश क्षेत्र पर उसका अधिकार हो गया। जर्मन क्षेत्र में नेपोलियन ने पवित्र रोमन साम्राज्य का अंत और राइन संघ की स्थापना की। तत्पश्चात प्रशा और रूस को पराजित किया। रूस के साथ की गयी टिलसिट की सन्धि (1807) के समय वह अपने उन्नति के शिखर पर था।
सन् 1807 के पश्चात उसके युद्ध और कार्यों विशेषरूप से इंग्लैण्ड के विरूद्ध महाद्वीपीय व्यवस्था और उसके परिणामस्वरूप यूरोप के अन्य देशों के साथ उसके कटु सम्बन्धों ने उसे पतन की ओर अग्रसर कर दिया। पुर्तगाल पर अधिकार, स्पेन से प्रायद्वीपीय युद्ध में पराजय, मास्को अभियान की असफलता, यूरोप में फैलती तीव्र राष्ट्रीयता की भावना ने नेपोलियन की सत्ता को अंत के निकट पहुँचा दिया। उसके विरूद्ध यूरोपीय राष्ट्रों ने चतुर्थ गुट की स्थापना की और 1813 में लिप्जिग तथा 1814 में लाओं के युद्ध में नेपोलियन को पराजित कर दिया। पराजित नेपोलियन को फाउन्टेनब्ल्यू की संधि के अनुसार एल्बा द्वीप का शासक बनाया गया। 1815 में नेपोलियन पुनः फ्रांस लौट आया और 100 दिन शासन करने के पश्चात मित्र राष्ट्रों की सेना द्वारा वाटरलू के युद्ध में बुरी तरह पराजित हुआ। उसे सेंट हेलेना के द्वीप में बन्दी बना दिया गया।
इस प्रकार नेपोलियन का अन्त हुआ। उसके समय में राष्ट्रीयता का विकास और पुरातन प्रथाओं का अन्त हुआ और एक नवीन यूरोप का उदय हुआ। उसकी विजयों ने नवीन यूरोप की पृष्ठभूमि का निर्माण किया। उसके सुधारों ने पुरातन व्यवस्था की जड़े नष्ट कर दीं। नेपोलियन के पश्चात इन क्षेत्रों की जनता पुनः कुलीन और सामन्तवादी व्यवस्था को स्वीकारने को तैयार नहीं हुयी और संघर्ष का दौर प्रारम्भ हुआ। मध्य तथा दक्षिण जर्मनी के राज्य, नेपिल्स, स्पेन आदि नेपोलियन के अधीनस्थ राज्यों में सामन्तवाद तथा अर्द्ध दास प्रथा समाप्त कर दी गई तथा धार्मिक सहिष्णुता और प्रजातन्त्रीय शासन के सिद्धान्त स्थापित हुए।
उसने इटली और जर्मनी के राज्यों की जो व्यवस्थायें कीं, उससे इन राज्यों में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत हुयी और इटली तथा जर्मनी के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। उसकी साम्राज्यवादी और निरंकुश प्रवृत्ति के प्रतिक्रियास्वरूप प्रशा, स्पेन, नार्वे, स्वीडन, नेपल्स आदि में राष्ट्रीयता की भावना विकसित हुयी।
नेपोलियन ने आधुनिक यूरोप के निर्माण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान की। नेपोलियन के पश्चात राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और उदारवादी शक्तियों का पुरातनवादी और राजतंत्रवादी शक्तियों से संघर्ष का युग प्रारम्भ हुआ।
धार्मिक सहिष्णुता और और जर्मनी के राज्यों की जान प्रशस्त हुआ। उसकी सात हुयी।

मूल्यांकन

क्रान्ति के विभिन्न चरण और स्वरूप
फ्रांस की क्रान्ति में कई चरणों में हुई और इसका स्वरूप भी बदलता रहा। यदि क्रान्ति के घटनाक्रम को देखा जाए तो पार्लमां द्वारा राजा का विरोध और सामन्तों द्वारा एस्टेट्स जनरल की मांग के साथ ही क्रान्ति प्रारम्भ हो गयी थी। इस संस्था को पुनर्जीवित कर सामन्त राजतंत्र के ऊपर अपना प्रभाव स्थापित करना चाहते थे। लुई 14वें के समय से उपेक्षित एस्टेट्स जनरल बुलाने की मांग ने जनता को भी अपने अधिकारों के प्रति आन्दोलित किया। मध्यम वर्ग और साधारण जनता एस्टेट्स जनरल में अपनी संख्या बढ़ाने और संख्या के आधार पर मतदान करने को लेकर आन्दोलित हुई।
क्रान्ति का दूसरा चरण तीसरे वर्ग द्वारा अपने को राष्ट्रीय सभा घोषित करने से लेकर राष्ट्रीय सभा द्वारा सामन्तवाद और पुरातन व्यवस्था के अंत से प्रारम्भ होता है। सामन्तवादी प्रतीकों का अन्त, मानवाधिकारों की घोषणा और राष्ट्रीय सभा द्वारा किए गए कार्यों के पश्चात जनता ने संतोष और सुख की सांस ली। समानता के अधिकार को पाने के पश्चात किसान और मजदूर भी शान्त हो गए। विधान सभा की स्थापना के द्वारा संवैधानिक राजतंत्र स्थापित हो गया। यह लगा कि अब कान्ति समाप्त हो गयी है।
क्रान्ति का तीसरा चरण विधान सभा के निर्णयों का राजा द्वारा समर्थन न करने से प्रारम्भ होता है। राजा के असहयोग के कारण मध्यम वर्ग राजतंत्र का विरोधी हो गया और गणतंत्र की स्थापना के प्रयास किए जाने लगे। राजा के समर्थन में विदेशी सहायता और यूरोपीय देशों द्वारा फ्रांस के विरूद्ध युद्ध प्रारम्भ हो जाने से गणतंत्रवादियों के प्रयासों में अधिक तेजी आयी। विधान सभा को भंग करके गणतंत्र की स्थापना हेतु राष्ट्रीय सम्मेलन का गठन किया गया। राजतंत्र समर्थकों का दमन करने के लिए उग्र गणतंत्रवादियों द्वारा आतंक का शासन स्थापित किया । इसने क्रान्ति की बाहरी और आन्तरिक शत्रुओं से रक्षा की।
क्रान्ति का चौथा चरण संचालक मण्डल की स्थापना से प्रारम्भ हो कर कौंसिल शासन और नेपोलियन के एकतंत्रीय शासन स्थापना तक जाता है। इस युग में क्रान्ति के सिद्धान्त यूरोप के अन्य देशों में फैले।
इस प्रकार क्रान्ति सामन्तवादियों के स्वार्थ से प्रारम्भ हुयी फिर जन क्रान्ति में बदल गयी। बाद में क्रान्ति का नेतृत्व मध्यम वर्ग के हाथ में हो गया। अंत में सैनिक तानाशाह द्वारा इसका अंत हो गया, लेकिन क्रान्ति की मूल भावना समाप्त न हो सकी और न ही पुरातन व्यवस्था फिर से कायम हो सकी।

क्रान्ति के प्रमुख नेता
फ्रांस में क्रान्ति को दिशा देने का कार्य विभिन्न नेताओं द्वारा किया गया। फ्रांस की क्रान्ति के प्रमुख नेताओं चाहे वह उदारवादी ला फायत, एबे सिए, मिराबो आदि हों या उग्रवादी मारा, कार्नो, दांते, राब्सपियर आदि सभी ने फ्रांस की क्रान्ति के सिद्धान्तों के लिए प्रतिक्रियावादियों से संघर्ष किया और फ्रांस में पुरातन व्यवस्था का अन्त कर एक नए युग का सूत्रपात किया। इनमें प्रमुख नेताओं की पृष्ठभूमि और कार्यों के बारे में जानने से क्रान्ति पर उनके प्रभाव को ठीक से समझ सकेंगे।

लाफायत
यह कुलीन वर्ग का था और इसने अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। यह रूसों के स्वतंत्रता और समानता के विचारों से भी प्रभावित था। फ्रांस की क्रान्ति के दौरान इसने 'मानव अधिकारो का घोषणा' का मसविदा तैयार किया था। क्रान्ति के समय अराजकता फैलने पर इसने राष्ट्रीय सुरक्षा दल की स्थापना कर शान्ति स्थापित करने का प्रयास किया। क्रान्ति समर्थक हाने पर भी वह राजा का समर्थन करता था। पेरिस की जनता पर गोली चलाने के कारण लाफायत बदनाम हो गया।

मिराबो
सामन्त वर्ग का था लेकिन 1789 में तीसरे एस्टेट का सदस्य चुना गया। टेनिस कोर्ट की शपथ में उसका प्रमुख योगदान थां उसने ही राजा को पेरिस से सेना हटाने को विवश किया। मतदान भवन के स्थान पर उसने प्रतिनिधि की संख्या के अनुसार मतदान कराया। उसके प्रयत्नों से ही जनता से लिए जाने वाला टाइथ कर समाप्त हुआ।

ऐबे सिए
यह मध्यमवर्गीय परिवार का था तथा दस वर्ष तक पादरी भी रहा। एस्टेट्स जनरल से पूर्व इसके द्वारा लिखे लेख ने ही तृतीय सदन को आन्दोलित किया। उसके इस लेख को राष्ट्रीय सभा की आधार शिला भी माना जाता है। टेनिस कोर्ट की शपथ में यह मिराबो के साथ था। 1795 में जन रक्षा समिति का सदस्य बना। डायरेक्टरी और कौंसिल शासन में भी सक्रिय रहा। इसे मौलिक विचारक कहा जाता है।

दाँतों
साधारण परिवार का कुशल वकील और वक्ता था। जैकोबिन दल का प्रमुख नेता था। इसने तुइलरी के महल पर आक्रमण करके राजा को बंदी बनाया और गणतंत्र प्रणाली की स्थापना में योगदान दिया। राजतंत्र समथर्कों का दमन करने के लिए आंतक के राज्य की स्थापना की। फ्रांसीसी सेना का पुर्नगठन किया। 1794 में फ्रांस के बाहरी और आन्तरिक शत्रुओं से निपटने के बाद जब उसने अपने साथियों के समक्ष आतंक का शासन समाप्त करने का प्रस्ताव रखा तो उसको ही गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।

मारा
यह चिकित्सक था और राजतंत्र का कट्टर विरोधी था। ' द फ्रेन्डस ऑफ द पीपुल' समाचार पत्र का प्रकाशन कर लोगों में चेतना का प्रसार किया। सितम्बर, 1792 के भयंकर रक्तपात में उसका बड़ा हाथ था।

राब्सपियरे
यह एक वकील, लेखक और प्रभावशाली वक्ता था। रूसो से प्रभावित तथा जैकोबिन दल का नेता था। 1789 में एस्टेट्स जनरल का सदस्य चुना गया। राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान दांतों आदि के साथ मिलकर आतंक का राज्य | आतंक का राज्य कायम रखने के लिए इसने बाद में दांतो की भी हत्या कर दी। इसके प्रमुख कार्यों में राष्ट्रीय कैलेन्डर तथा कान्तिकारी न्यायलयों की स्थापना करना था। उसने ईसाई धर्म के प्रभाव को कम करने और नया धर्म लादने का भी प्रयास किया। पेरिस की जनता में वह लोकप्रिय था, परन्तु उसके आतंकी कार्यों से भयभीत होकर राष्ट्रीय सम्मेलन द्वारा 26 जुलाई, 1794 में उसे बंदी बनाकर गिलोटीन पर चढ़ा दिया गया।

कार्नो
यह राष्ट्रीय सम्मेलन के समय फ्रांस का युद्ध मंत्री था। विदेशी शक्तियों के विरूद्ध सेना का गठन किया और प्रशा स्पेन तथा हालैण्ड को अपमान जनक सन्धियां करने को बाध्य किया। फ्रांस की जनता उसे विजय का संगठनकर्ता कहती थी।

नेपोलियन क्रांतिपुत्र या क्रांतिहंता
नेपोलियन स्वयं को क्रान्ति पुत्र कहता था। किन्तु इतिहासकारों में इस विषय में मतभेद है कि वह क्रान्ति पुत्र था कि नहीं। इस मत के पक्ष और विपक्ष में इतिहासकारों द्वारा कई तर्क प्रस्तुत किये गए हैं, जो इस प्रकार हैं।

पक्ष
  • फ्रांस में क्रान्ति ने विषमता और विशेषाधिकारों का अन्त कर समानता की प्रतिष्ठा की थी। परिणामस्वरूप साधारण परिवार में उत्पन्न नेपोलियन को सर्वोच्च स्थान तक पहुँचने का अवसर प्राप्त हो सका।
  • नेपोलियन ने जिस क्षेत्र को विजित किया ,वहाँ उसकी सेनाएँ क्रान्ति के सिद्धान्तों को लेकर गयीं। उसने विजित क्षेत्र में प्राचीन संस्थाओं को समाप्त कर नवीन संस्थाओं की स्थापना की।
  • उसने जिस संविधान का निर्माण कराया था, वह गणतंत्रीय था तथा इस संविधान को जनमत संग्रह द्वारा उसने जनता से अनुमोदित कराया था।
  • नेपोलियन ने सामाजिक भेदभावों को मिटाकर सामाजिक समानता की स्थापना की और सामन्तीय प्रथा का अन्त किया। सबके लिए समान कर अदायगी, राजकीय पदों पर नियुक्ति का आधार योग्यता करना एवं सबके लिए समान कानूनों का निर्माण करना आदि कार्य क्रान्ति के प्रमुख सिद्धान्त समानता पर ही आधारित थे।
  • क्रान्ति के पश्चात उत्पन्न अव्यवस्था को दूर करके नेपोलियन ने एक सुदृढ़ शासन स्थापित किया।
  • क्रान्ति के दौरान उठायी गयी सामाजिक और आर्थिक सुधारों की मांगों को नेपोलियन ने पूर्ण किया। उसने क्रान्तिकाल में भूव्यवस्था में किये गए परिवर्तनों को कायम रखा।
  • फ्रांस को गौरव दिलाया और यूरोप का प्रमुख देश बना दिया।

विपक्ष
  • फ्रांस की क्रान्ति ने जिस स्वतंत्रता के सिद्वान्त को स्थापित किया था, नेपोलियन ने उसके विरूद्ध कार्य किए। उसने फ्रांस और यूरोप की जनता की स्वतंत्रता का दमन कर अपनी इच्छा को थोपा। समाचारपत्रों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाये तथा आलोचकों और विरोधियों को कुचल दिया।
  • नेपोलियन ने बन्धुत्व के सिद्वान्त की भी अवहेलना की, उसने विजित देशों में क्रान्ति के लाभों को पहुंचाया लेकिन वहाँ बन्धुत्व के सिद्धान्त के स्थान पर फ्रांस की सर्वोच्चता का सिद्धान्त कार्यान्वित किया।
  • नेपोलियन ने राष्ट्रीयता के सिद्धान्त की पूर्ण उपेक्षा की। प्रजा की इच्छा के विरूद्ध उसने अपने रिश्तेदारों को विजित प्रदेश में शासक नियुक्त किया।
  • उसने जिस संविधान की स्थापना की थी, वह नाममात्र का गणतंत्र था, वास्तविक शक्ति नेपोलियन के हाथों में थी। केन्द्रीकरण की नीति अपनाकर, उसने उत्तरदायी शासन के स्थान पर प्रबुद्ध तानाशाह की तरह शासन किया।
  • नेपोलियन ने समानता के सिद्धान्त को भी केवल मध्य वर्ग तक ही सीमित रखा।
  • उसने कई पुरानी परम्पराओं जैसे -सम्राट की उपाधि धारण करना, लिजियन का सम्मान करना आदि को पुनः स्थापित किया।
इतिहासकार ग्रान्ट और टेम्परले के अनुसार-' नेपोलियन को क्रान्ति ने जन्म दिया था पर अनेक रूपों में उसने उस आन्दोलन के उद्देश्यों और सिद्धान्तों को उलट दिया, जिनसे उसका उत्थान हुआ था। '

फ्रांस की 1789 की क्रान्ति के परिणाम और प्रभाव
अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध की जिन घटनाओं ने उन्नीसवीं सदी को एक दिशा प्रदान की, उनमें एक प्रमुख घटना फ्रांस की 1789 की क्रांति थी। इसने यूरोप में राजनैतिक और सामाजिक परिवर्तनों का दौर शुरू किया। जीवन का कोई भी क्षेत्र उससे प्रभावित हुए बिना नही रह सका।
  • फ्रांस की क्रान्ति ने पुरातन व्यवस्था का अंत कर दिया। सामन्ती व्यवस्था और विशेषाधिकारों का अन्त करके समानता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  • क्रान्ति ने लोकतंत्र की भावना का विकास और प्रसार किया। मानवाधिकारों की घोषणा ने इस तथ्य पर जोर दिया कि कानून जनसाधारण की सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति मात्र है। क्रान्ति ने राजा के दैवीय अधिकार के सिद्धान्त का अन्त कर दिया और लोकप्रिय सम्प्रभुता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  • क्रान्ति के समय किसानों ने सामन्तों से भूमि छीन कर उस पर खेती की, जिससे न केवल उनकी स्थिति में सुधार हुआ, वरन् फ्रांस की आर्थिक दशा में भी परिवर्तन आया। क्रान्तिकाल में समाज में कृषि दासता और निरंकुशता का अन्त हुआ। यूरोप के अन्य देशों में भी कृषि दासता और निरंकुशता के अन्त हेतु क्रान्तियां होने लगीं।
  • क्रान्तिकाल में नागरिक स्वतंत्रता का उदय हुआ। क्रान्ति के बाद जो कानून बने उनमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता विशेष रूप से सम्पत्ति का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रमुख स्थान दिया गया।
  • फ्रांस की क्रान्ति ने राष्ट्रीयता की भावना का विकास किया। राजतंत्रात्मक प्रतीकों का स्थान राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय कैलेण्डर, राष्ट्रीय गीत आदि ने ले लिया। जैकोबिनों ने उग्र राष्ट्रवाद को जन्म दिया। यूरोप के अन्य देश राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित और आन्दोलित हुए।
  • फ्रांस की क्रान्ति ने चर्च के पुराने स्वरूप को समाप्त कर धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की। शिक्षा को भी चर्च के बन्धन से मुक्त करके राष्ट्रीय और धर्मनिरपेक्ष बनाया।
  • समानता की भावना के प्रसार ने मध्यम वर्ग की शक्ति में वृद्धि की और अगले वर्षों में यह मध्यम वर्ग ही उदारवादी, प्रजातान्त्रिक तथा राष्ट्रवादी तत्वों के संवाहक बना।

यूरोप पर प्रभाव
फ्रांस की क्रान्ति के सिद्धान्तों स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व की भावना ने न केवल फ्रांस वरन् सम्पूर्ण यूरोप को प्रभावित किया। नेपोलियन की सेना के साथ यूरोप के देशों में क्रान्ति के सिद्धान्त पहुंचे और वहां की जनता को स्वतंत्रता और समानता हेतु संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। नीदरलैण्ड, राइन प्रदेश तथा इटली का अधिकांश क्षेत्र, जो नेपोलियन के प्रत्यक्ष अधिकार में था, की प्रशासनिक व्यवस्था समानता पर आधारित थी। नेपोलियन के अधीनस्थ राज्यों में सामन्तवाद तथा अर्द्ध दास प्रथा समाप्त कर दी गईं तथा धार्मिक सहिष्णुता और प्रजातन्त्रीय शासन के सिद्धान्त स्थापित हुए।
यूनान का स्वतंत्रता संग्राम को क्रान्ति के सिद्धान्तों से ही बल मिला। इटली के राज्यों में एकीकरण की भावना का प्रसार हुआ। राष्ट्रीयता की भावना से जर्मनी के छोटे-छोटे राज्य भी प्रभावित हो जर्मनी के एकीकरण के लिए प्रयासरत हुए। इंग्लैण्ड में फ्रांस की क्रान्ति का स्वागत किया गया। मानव अधिकारों के घोषणापत्र से वहां के साहित्यकार वर्डसवर्थ, कालरिज, वायरन, शैली आदि प्रभावित हुए। थामस पेन ने फ्रांस की क्रान्ति को एक शुभ सन्देश बताया। इंग्लैण्ड के शासकों को फ्रांस की क्रान्ति के प्रभाव को अपने देश में फैलने से रोकने के लिए समाचारपत्रों, हड़तालों आदि पर प्रतिबन्ध लगाने पड़े। एडमंड बर्क आदि कुछ लेखकों ने क्रान्ति का विरोध किया। क्रान्ति के बाद यूरोप के शासक प्रतिक्रियावादी बन गये तथा उनका उद्देश्य क्रान्ति के प्रसार को अपने क्षेत्र में रोकना था।
क्रान्ति के विषय में इतिहासकार एक मत नहीं हैं। वेबस्टर और एच.जे. दाल आदि क्रान्ति को अप्रगतिशील और अराजकतावादी बताते हैं जबकि क्रोपोटकिन ने इसे आधुनिक विचारधाराओं की नींव रखने वाली कहा। डेविड थॉमसन ने भी फ्रांस की क्रान्ति को 1914 ई. तक यूरोपीय जीवन की महत्वपूर्ण घटना माना।

सारांश

फ्रांस की क्रान्ति पुरातन व्यवस्था के विरूद्ध थी। विशेषधिकारों के आधार पर विघटित और विषम समाज, कमजोर नेतृत्व और अक्षम शासन व्यवस्था, राज्य की दयनीय आर्थिक स्थिति और बौद्धिक चेतना का मध्यम वर्ग में विकास आदि क्रान्ति के प्रमुख कारण थे। इन परिस्थितियों में अकाल और शासकों के अनियंत्रित खर्चों ने वित्तीय संकट उत्पन्न कर दिया। इससे निपटने के लिए जब सामन्त वर्ग पर कर लगाने का प्रस्ताव रखा गया तो सामन्तों ने इसका विरोध किया और कहा नया कर लगाने का अधिकार प्रतिनिधि सभा स्टेटस जनरल को है। सामन्तों ने स्टेटस जनरल बुलाने की मांग रखी, इसके साथ ही क्रान्ति का प्रारम्भ हुआ।
स्टेटस जनरल का प्रथम सदन पादरियों का, द्वितीय सदन सामन्तों का तथा तृतीय सदन जनसाधारण का प्रतिनिधित्व करता था। तृतीय सदन ने सदस्यों की संख्या के आधार पर मत गणना हेतु संयुक्त अधिवेशन की मांग रखी, जिसे राजा द्वारा अस्वीकार करने पर तृतीय सदन ने टेनिस कोर्ट में सभा कर अपने को राष्ट्रीय सभा घोषित कर दिया। अंततः 27 जून को तीनों सदनों को एक साथ बैठने की अनुमति के साथ राष्ट्रीय सभा को वैधानिक मान्यता मिल गयी। राष्ट्रीय सभा ने संवैधानिक राजतंत्र स्थापित करने के लिए संविधान बनाने की घोषणा की। राजा ने दमन करने का प्रयास किया तो पेरिस की भीड़ ने क्रान्ति का नेतृत्व किया और 14 जुलाई को बास्तील के दुर्ग को नष्ट कर दिया। तत्पश्चात समस्त देश में क्रान्ति फैल गयी। अगले दो वर्षों तक राष्ट्रीय सभा ने सामन्तवाद का पतन, मानवाधिकारों की घोषणा, चर्च के अधिकारों में कटौती, मठों का अन्त, आर्थिक सुधार आदि कार्य किया तथा फ्रांस के लिए 1791 के नये संविधान का निर्माण किया। नये संविधान के आधार पर व्यवस्थापिका सभा का गठन हुआ। इस सभा में विभिन्न दलों के लोग निर्वाचित हुए, लेकिन गणतंत्रवादियों का प्रभाव बढ़ता गया। कई राजतंत्र समर्थक विदेश भाग गए और क्रान्ति के विरूद्ध विदेशी शक्तियों की सहायता से षड़यन्त्र रचने लगे। संवैधानिक राजतंत्रात्मक व्यवस्था में व्यवस्थापिका सभा द्वारा लिए गए निर्णयों पर राजा द्वारा हस्ताक्षर न करने तथा उसके विदेश भागने का प्रयास करने से क्रान्तिकारी नाराज हो गए। आस्ट्रिया और प्रशा के धमकी देने पर क्रान्तिकारियों ने राजा को देशद्रोही माना और उसे पद से निलम्बित कर दिया। फ्रांस विदेशी युद्धों में फंस गया। व्यवस्थापिका सभा ने फ्रांस में गणतंत्रात्मक शासन स्थापित करने के लिए 1792 का संविधान बनाया।
1792 के संविधान के द्वारा व्यवस्थापिका सभा के स्थान पर फ्रांस का शासन राष्ट्रीय कन्वेंशन के अधीन हो गया। प्रारम्भ में गणतंत्रवादी उदार दल जिरोंदिस्त शासन में प्रभावी था। इसने फ्रांस में कई सामाजिक और आर्थिक सुधार किए। राजा पर मुकदमा चलाकर उसको मृत्यु दण्ड दिया, जिससे यूरोप के अन्य देश इंग्लैण्ड, हालैण्ड और स्पेन भी प्रशा और आस्ट्रिया के साथ फ्रांस के विरूद्ध युद्ध में शामिल हो गए। उग्रवादी जैकोबिनों ने अक्षमता का आरोप लगा जिरोंदिस्त को सत्ता से बाहर कर दिया और आतंक का राज्य स्थापित किया। हजारों लोंगों को गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया। अंत में जनता के विद्रोह के द्वारा आतंक के शासन का अन्त हुआ। उदारवादियों ने 1795 का संविधान बनाया, जिसके आधार पर फ्रांस में निदेशक मण्डल का शासन स्थापित हुआ। उनके भ्रष्ट शासन में फ्रांस में पुनः अराजकता का माहौल हो गया। इस दौरान विदेशी सेनाओं को पराजित करके सेनापति नेपोलियन फ्रांस में लोकप्रिय हो गया था। 1799 में उसने निदेशक मण्डल का पतन कर सत्ता पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार फ्रांस में नेपोलियन युग का सूत्रपात हुआ। फ्रांस की क्रान्ति और नेपोलियन के युग में फ्रांस यूरोपीय राजनीति की धुरी बन गया था। क्रान्ति के सिद्धान्तों ने सम्पूर्ण यूरोप को प्रभावित किया। यूरोप के कई देशों में राष्ट्रीयता का विकास और पुरातन प्रथाओं का अन्त हुआ और एक नवीन यूरोप का उदय हुआ।

तकनीकी शब्दावली एवं प्रमुख कथन
  • आसियां रिजीम- फ्रांस में सोलहवीं शताब्दी से लेकर क्रान्ति से पूर्व 1789 तक रही राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था।
  • लेत्र द काशे- 1789 से पूर्व किसी भी व्यक्ति को बिना आरोप से बंदी बनाने हेतु वारंट।
  • सान्ज क्यूलोत- नगर के छोटे दुकानदार, कारीगर, मजदूर और गरीबों का समूह।
  • कूप द इतात- राज्य पर अथवा शासन सत्ता पर शक्ति अथवा छल से अधिकार करना अथवा हिंसात्मक क्रान्ति द्वारा सरकार को पलट देना।
  • कम्यून-फ्रांस में शासन की न्यूनतम इकाई, नगर सभा।
  • आसिग्नेट- फ्रांस की क्रान्तिकारी सरकार द्वारा चलाए गए कागजी नोट।
  • मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ, फिर भी वह जंजीरों से जकड़ा हुआ है। रूसो
  • अगर रूसो न होता तो क्रान्ति भी न होती।- नेपोलियन बोनापार्ट
  • यदि रोटी नहीं मिलती तो लोग केक क्यों नहीं खा लेते। मेरी अन्टायनेट
  • ब्रूमेयर- कोहरा पड़ने का माह "22 अक्टूबर से 20 नवम्बर तक", फ्रांस मे 1793 से 1806 तक प्रयोग में लाए गए कैलेण्डर का माह।
  • 'मुझे फ्रांस का राजमुकुट धरती पर पड़ा मिला और तलवार की नोंक से मैंने उसे उठा लिया।'- नेपोलियन बोनापार्ट
  • 'फ्रांस के लोग समानता चाहते हैं, स्वतंत्रता नहीं। - नेपोलियन बोनापार्ट
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