कर क्या है - अर्थ एवं परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ, वर्गीकरण, प्रभाव, (प्रत्यक्ष कर, अप्रत्यक्ष कर) | kar kya hai | tax in hindi

प्रस्तावना

टैक्स को हिंदी में कर कहते हैं आधुनिक समय में किसी भी सरकार के लिए कराधान या Taxation आय का सबसे बड़ा स्रोत है। राजस्व के विभिन्न साधनों में करों का प्रमुख स्थान है। लोकतन्त्र में कराधान सरकार की आर्थिक सामाजिक नीतियों को मूल रूप प्रदान करने में एक अति महत्वपूर्ण सहायक तत्त्व है।
kar kya hai
कर सरकार की आय का प्रमुख स्रोत है। देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह विधिवत अपने करों का भुगतान अवश्य करें। यदि कोई व्यक्ति कर का भुगतान नहीं करता है तो उसे कानून द्वारा दंडित भी किया जा सकता है। यह एक अनिवार्य भुगतान समझा जाता है जिसका आशय समाज कल्याण से है। सरकार जनता के कर से उत्पन्न आय को विभिन्न विकास कार्यों जैसे सड़क, परिवहन, शिक्षा आदि में लगाती है।

उद्देश्य

प्रस्तुत इकाई का प्रमुख उद्देश्य छात्रों को भारतीय अर्थव्यवस्था में राजस्व के प्रमुख स्रोत, कर एवं कराधान प्रणाली को सरलतम रूप में समझाना है। कर प्रणाली एवं कर व्यवस्था को समझने के बाद आप एक विकासशील अर्थव्यवस्था को विकसित बनाने में अपने योगदान को समझ सकेंगे। साथ ही आप यह जान सकेंगे कि-
  • कर क्या हैं
  • कर क्यों लगाए जाते हैं
  • कर कितने प्रकार के होते हैं
  • करों के गुण एवं अवगुण क्या हैं
  • भारत में प्रचलित प्रमुख कर कौन-कौन से हैं
  • कर भुगतान क्यों आवश्यक है
  • आयकर एवं आयकर सम्बन्धी कुछ महत्वपूर्ण तथ्य क्या हैं, तथा
  • पैन कार्ड का क्या महत्व है।
आइए, इकाई की शुरुआत कर की परिभाषा से करें।

कर : अर्थ एवं परिभाषाएँ

साधारण शब्दों में कर का अर्थ करदाता द्वारा किया जाने वाला भुगतान है। यह एक अनिवार्य भुगतान है जिसका विधिवत भुगतान न करने पर व्यक्ति को कानून द्वारा दंडित किया जा सकता है। कर चोरी एक अपराध है।
विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने कर की विभिन्न परिभाषाएँ दी हैं।
  • एडम के शब्दों में : “कर नागरिक द्वारा राज्य की सहायता के लिए दिया जाने वाला अंशदान है।
  • सालिगमैन के अनुसार : “कर किसी व्यक्ति द्वारा सरकार को दिया जाने वाला वह अनिवार्य भगतान है जो बिना किसी लाभ की अपेक्षा किए, जन साधारण के हितों के लिए किए गए व्यय को वहन करने के लिए किया जाता है। 
  • डी. मारको के अनुसार : “कर नागरिकों की आय का वह भाग है जिसे राज्य अपने लिए लेता है, जो सामान्य जन सेवाओं के उत्पादन के लिए आवश्यक है।

कर प्रणाली की विशेषताएँ

राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास में कर का एक महत्वपूर्ण साधन है। इससे संपूर्ण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। जैसा कि पहले बताया गया है कि यह एक अनिवार्य भुगतान है, ना कि स्वैच्छिक। सरकार द्वारा लगाए गए कर का किसी न किसी रूप में विरोध अवश्य होता है। कर प्रणाली में सभी को संतुष्ट कर पाना लगभग असंभव है। परन्तु जहाँ तक संभव हो यह प्रयास किया जाना चाहिए कि इसमें न्यूनतम त्रुटियां हों।
उत्तम कर प्रणाली की विशेषताएं-
  • कर एक अनिवार्य भुगतान है।
  • कर देने में त्याग का तत्त्व निहित है।
  • कर आय से दिए जाते हैं।
  • कर विभिन्न प्रकार के होते हैं।
  • कर वैध होते हैं।
  • कर राष्ट्रीय विकास एवं जन कल्याण की भावना से एकत्रित किए जाते हैं।

करारोपण के उद्देश्य
अब हम जानेंगे कि करारोपण के मुख्य उद्देश्य क्या हैं। कर क्यों लगाए जाते हैं तथा किसी भी प्रकार की अर्थव्यवस्था में इनका क्या महत्व है। आइए, जानने का प्रयास करें।

सार्वजनिक राजस्व का निर्माण
आपने पढ़ा कि करारोपण का प्रमुख उद्देश्य राजस्व प्राप्ति या सरकार के राजस्व कोष में धन एकत्र करना है परन्तु इसके अतिरिक्त सरकार कुछ विशेष शिक्षा कार्यक्रम, महिला एवं बाल विकास योजनाएं, आर्थिक विकास, चिकित्सा सुविधाएँ, जन स्वास्थ्य संवर्धन आदि की प्राप्ति हेतु भी करारोपण कर सकती है। करारोपण का प्रमुख उद्देश्य सार्वजनिक व्यय को पूरा करने के लिए सार्वजनिक राजस्व निर्माण करना है जो कि कराधान द्वारा ही संभव है।

पूंजी निर्माण
करों के द्वारा जो भी राजस्व प्राप्त होता है वह पूंजी निर्माण में सहायक होता है। करारोपण का मुख्य उद्देश्य बचत को प्रेरित करना एवं पूंजी निर्माण प्रकिया को संवर्धित करना है। सरकार द्वारा इस बचत को उत्पादन कार्यों में लगाया जाता है।

अनावश्यक उपभोग पर नियन्त्रण
मनुष्य की तीन मूलभूत आवश्यकताओं; भोजन, वस्त्र तथा आवास एवं आधुनिक सन्दर्भ में अन्य आवश्यकीय मद जैसे शिक्षा, चिकित्सा, आहार एवं पोषण, महिला एवं शिशु कल्याण, सड़क परिवहन एवं तकनीक संवर्धन, ज्ञान-विज्ञान उन्नयन आदि मदों पर अधिक धन खर्च किए जाने की आवश्यकता होती है। सरकार द्वारा आवश्यक अथवा कम आवश्यक भोग विलास, ऐश्वर्य, मौज-मस्ती आदि वस्तुओं पर कर लगाने से या तो इनका उपयोग कम हो जाएगा अथवा सक्षम व्यक्ति ही इस कर का भुगतान कर पाएंगे। इस प्रकार एकत्र किया गया धन समाज के निम्न जरूरतमंद वर्ग के कल्याण हेतु प्रयुक्त होता है। इस प्रकार समाज की आर्थिक असमानताओं को भी दर किया जा सकता है।

आर्थिक असमानताओं/विसंगतियों को दूर करना
करारोपण का एक प्रमुख उद्देश्य आर्थिक असमानताओं को दूर करना है। विकासशील देशों में उच्च वर्ग और निम्न वर्ग की आय में एक व्यापक अन्तर होता है। आर्थिक रूप से समृद्व लोगों पर भारी कर लगा कर तथा निर्धन लोगों पर न्यूनतम कर लगा कर इस अन्तर को दूर किया जा सकता है। यही प्रजातान्त्रिक मूल्यों का आधार है। आर्थिक रूप से समृद्ध वर्ग पर अधिक कर लगा देने से उनकी आय पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है परन्तु उनके द्वारा दिए गए कर से निम्न वर्ग निश्चित रूप से लाभान्वित होता है।

राष्ट्रीय आय में वृद्धि
करों से प्राप्त आय उत्पादक कार्यों में प्रयुक्त की जाती है जिससे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। राष्ट्र के आर्थिक रूप से समद्ध होने पर राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है जो राष्ट्रीय समृद्धि का एक सूचक है।

बेरोजगारी दूर करने में सहायक
कराधान बेरोजगारी दूर करने में भी सहायक है।

नियमन और नियन्त्रण
हानिकारक और प्रतिबन्धित वस्तुओं जैसे तम्बाकू, गुटका, सिगरेट, बीड़ी, मदिरा आदि पर कर एवं आयात शुल्क, कराधान द्वारा राष्ट्रीय आय के नियमन और नियंत्रण के स्पष्ट उदाहरण हैं। यहाँ पर यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आयात शुल्क उन वस्तुओं के आयात पर रोक लगाने के लिए लगाए जाते हैं जो देश के नए उद्योगों के लिए हानिकारक हो सकते हैं। इसी प्रकार निर्यात शुल्क देश के भीतर आवश्यक वस्तुओं के निर्यात को रोकने के लिए
लगाए जाते हैं। इन उदाहरणों के माध्यम से आपने समझा कि किस प्रकार कराधान राष्ट्रीय आय के नियमन और नियंत्रण के लिए आवश्यक है।

उत्तम कर व्यवस्था हेतु आवश्यक तत्त्व
उत्तम कर व्यवस्था वह है जो करारोपण के अधिकांश नियमों को संतुष्ट करती हो, राजकोष में घाटे अथवा व्यय से उत्पन्न स्थिति से निपटने में सहायक हो और साथ ही करदाता पर भी भार स्वरूप न हो। एक उत्तम कर प्रणाली के निम्न आवश्यक गुण हैं-
  • कर अनुपात : यद्यपि कर अनुपात निर्धारण आवश्यक है परन्तु पूर्ण प्रयास किया जाना चाहिए कि कर अनुपात में धीरे-धीरे वृद्धि हो।
  • कर प्रणाली के नियमों की भाषा जटिल न हो कर सरल एवं सुस्पष्ट होनी चाहिए। कर जमा करने की प्रक्रिया एवं समय यथासंभव करदाता की सुविधानुसार होना चाहिए।
  • कर प्रणाली सन्तुलित होनी आवश्यक है। कर प्रणाली में किसी एक विशेष कर की बहुलता अथवा न्यूनता नहीं होनी चाहिए। कर प्रणाली में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष, दोनों करों का उचित सन्तुलन होना आवश्यक है।
  • कर प्रणाली उत्पादन को प्रेरित करने वाली होनी चाहिए। उत्तम कर प्रणाली का उत्पादन एवं वितरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

करों का वर्गीकरण

करों को उनके स्वरूप के आधार पर निम्नवत वर्गीकृत किया गया है-
  1. प्रत्यक्ष कर
  2. अप्रत्यक्ष कर

प्रत्यक्ष कर ऐसे कर होते हैं जो विधिवत रूप से जिस पर लगाए जाते हैं उसे ही प्रत्यक्ष रूप से उनका भुगतान करना पड़ता है, जैसे आयकर (Income tax)। जबकि अप्रत्यक्ष कर किसी व्यक्ति पर आंशिक या पूर्ण रूप से लगाए जाते हैं परंतु किसी वस्तु या सेवा के रूप में। प्रत्यक्ष कर स्थानान्तरित नहीं किए जा सकते, जैसे आयकर का भुगतान व्यक्ति को स्वयं करना होता है। जबकि अप्रत्यक्ष कर जैसे सीमा शुल्क और उत्पादन शुल्क व्यापारी से उपभोक्ता को स्थानान्तरित किए जा सकते हैं। प्रत्यक्ष कर करदाता की आय को प्रभावित करते हैं जब वह इस आय को प्राप्त करता है। अप्रत्यक्ष कर व्यक्तिगत उपभोग औए सम्पत्ति स्थानान्तरण पर प्रभाव डालते हैं। यह कर उपभोक्ता की आय को वस्तुओं के क्रय के समय प्रभावित करते हैं।

आइए अब प्रत्येक पर चर्चा करें।

प्रत्यक्ष कर

जैसे कि हमने चर्चा की कि प्रत्यक्ष कर वस्तुओं या सेवाओं की बजाय उस आय या मुनाफे पर लगाए जाते हैं जो व्यक्ति को प्राप्त होती है। हम प्रत्यक्ष करों के गुणों तथा अवगुणों की चर्चा करेंगे।

प्रत्यक्ष करों के गुण
प्रत्यक्ष करों के निम्नलिखित गुण हैं-
  • मितव्ययिता : इन करों को एक निश्चित स्रोत पर एकत्र किया जाता है और संपूर्ण कर राशि सरकारी कोष में जमा होती है। करदाता द्वारा इन करों का सीधा भुगतान सरकार को होता है। इन्हें एकत्र करने में सरकार का व्यय कम होता है। अतः इन करों को मितव्ययी कहा जा सकता है।
  • समानता : प्रत्यक्ष करों को तर्कपूर्ण और व्यय संगत कर कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह प्रत्येक व्यक्ति के सामर्थ्य, आय तथा कर देने की क्षमता के अनुपात में निर्धारित किए गए हैं। इस कर से व्यक्ति पर किसी प्रकार का बोझ नहीं पड़ता है। इन करों को लगाए जाने के पीछे सामाजिक और आर्थिक उन्नति की भावना होती है।
  • निश्चितता : प्रत्यक्ष कर की प्रवृति निश्चित होती है। करदाता इसके भुगतान हेतु मानसिक रूप से तैयार रहता है और इसका भुगतान किस प्रकार किया जाना है इसका निर्धारण एवं प्रावधान पहले से ही तैयार कर लेता है। प्रत्यक्ष करों से सरकार को एक निश्चित धनराशि प्राप्त होती है जिससे इस धनराशि के उपयोग हेतु सरकार पूर्व योजनाएं बना सकती है।
  • लोच : प्रत्यक्ष करों में लोच पाई जाती है। लोगों की आय बढ़ने पर कर की दरों में वृद्धि होती है।
  • शैक्षिक मूल्य : आम जनता प्रत्यक्ष करों के महत्व को जानती है और व्यर्थ एवं अनुपयोगी सामाजिक व्ययों को रोक सकती है। अतः प्रत्यक्ष करों का एक विशेष शैक्षिक मूल्य भी है।
  • समझने में सरल : प्रत्यक्ष करों का एक निश्चित प्रारूप होता है जिसे समझने के लिए नियम बनाए गए हैं जिससे एक शिक्षित समाज के आम आदमी को भी प्रत्यक्ष करों यथा आयकर की जानकारी होती है।

प्रत्यक्ष करों के अवगुण
प्रत्यक्ष करों के अवगुण निम्नवत हैं-
  • असुविधा : कई बार करदाता को अपनी आय में से एकमुश्त धनराशि कर के रूप में देनी पड़ती है जो उसके लिए असुविधाजनक या उसके बजट से बाहर होती है। यह एक कष्टप्रद स्थिति हो सकती है। यद्यपि प्रत्यक्ष कर एक निश्चित प्रारूप/नियमों का अनुपालन करते हैं परन्तु यथार्थ में यह नियम अत्यधिक जटिल होते हैं। बहुधा व्यक्ति इसे समझ नहीं पाता है और टैक्स कन्सलटेन्सी या कर विचार-विमर्श की सहायता लेता है। इस सेवा के लिए उसे भुगतान भी करना होता है।
  • अलोकप्रिय : चूंकि यह कर व्यक्ति पर प्रत्यक्ष रूप से लगाए जाते हैं, अतः व्यक्ति इसका भुगतान करने में असहजता का अनुभव करता है जिस कारण यह कर आम व्यक्ति में लोकप्रिय नहीं होते।
  • सीमितता : प्रायः प्रत्यक्ष कर समाज के कुछ वर्गों जैसे वेतन भोगियों पर लगाए जाते हैं तथा कुछ वर्गों जैसे लघु उद्यमियों पर नहीं लगाए जाते। इससे असमानता का भाव उत्पन्न होता है। प्रत्यक्ष करो की इस सीमितता के कारण लोगों में कर चोरी का भावना उत्पन्न होती है।
  • कर चोरी की संभावना : प्रत्यक्ष कर करदाता के विवेक और ईमानदारी पर निर्भर करते हैं। प्रायः लोग इस प्रकार के कर से बचने के लिए अपनी संपूर्ण आय नहीं बताते हैं और आय कर से बचने के लिए तरीके खोज निकालते हैं। यह सर्वथा अनुचित मनोवृति है।

अप्रत्यक्ष कर

अप्रत्यक्ष कर जैसे बिक्री कर, मूल्य संवर्धन कर, वस्तु एवं सेवा कर आदि वह कर हैं जो एक मध्यस्थ (जैसे एक खुदरा स्टोर) द्वारा उपभोक्ता से एकत्रित किए जाते हैं जो कर का अंतिम आर्थिक बोझ वहन करता है।

अप्रत्यक्ष करों के गुण
इस प्रकार के करों के निम्न गुण हैं-
  • सुविधा : यदि प्रत्यक्ष करों की तुलना अप्रत्यक्ष करों से की जाए तो आप पाएंगे कि अप्रत्यक्ष कर अधिक सुविधाजनक हैं क्योंकि इनका भुगतान एकमुश्त न होकर छोटी-छोटी किश्तों मे होता है। इसके भुगतान हेतु किसी भी औपचारिकता को पूर्ण नहीं करना पड़ता है। प्रायः यह वस्तुओं/सेवाओं के मूल्य में निहित होता है। अपनी आवश्यकतानुसार करदाता इनका भुगतान करते हैं। यदि आवश्यक न हो तो करदाता उस वस्तु/सेवा का उपभोग न करके इस प्रकार के कर से बच सकते हैं। यह प्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति पर न लगकर उत्पादन पर लगता है।
  • लोचमय : अप्रत्यक्ष कर लोचमय होते हैं। इन करों से निश्चित रूप से राजस्व को बढ़ाया जा सकता है। यह प्रायः आवश्यक उत्पादों जैसे चीनी, नमक, तेल आदि में लगाए जाते हैं।
  • कर चोरी की संभावना विहीन : व्यक्ति के लिए इन करों से बचना लगभग असंभव होता है। जैसा कि पहले बताया गया है, यह कर उत्पाद या वस्तुओं के मूल्य में निहित होते हैं। यदि व्यक्ति इन उत्पादों का उपभोग न करें तो इन करों से बचा जा सकता है। परन्तु दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं के परिप्रेक्ष्य में यह लगभग असंभव होता है। 
  • समानता : इन करों में समानता की भावना होती है। व्यक्ति द्वारा उपभोग की गई वस्तुओं/सेवाओं पर ही यह कर देय होता है। स्पष्ट है जो व्यक्ति वस्तुओं/सेवाओं का उपयोग करने में सक्षम हैं वही कर भुगतान कर पाएंगे, ना कि आर्थिक रूप से अक्षम व्यक्ति या वर्ग।
  • जन कल्याण : मदिरा, धूम्रपान तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक अन्य वस्तुओं पर भारी कर लगाकर इन प्रवृतियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
  • व्यापक स्वरूप : अप्रत्यक्ष करों का स्वरूप व्यापक होने के कारण समाज के प्रत्येक व्यक्ति पर इसका प्रभाव पड़ता है, फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति इन करों के माध्यम से राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकता है।
  • विकासशील राष्ट्रों की आवश्यकताओं के लिए उपयोगी : जैसा कि आप पढ़ चुके हैं कि अप्रत्यक्ष करों में औपचारिकताएं कम होती हैं जिसके कारण भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले राष्ट्र में जहाँ साक्षरता दर तुलनात्मक रूप से कम है, के लोगों को लिए विशेष रूप से उपयोगी हैं। समस्त करदाता आवश्यक वस्तुओं/सेवाओं के क्रय मात्र से ही इन करों का भुगतान करते हैं।
  • एकत्रित करने में आसान : इस प्रकार के कर वस्तुओं/सेवाओं या सुविधाओं के मूल्य में निहित होते हैं। अतः इन्हें एकत्र करने हेतु सरकार द्वारा कोई समय सीमा, प्रारूप, निर्धारित दर आदि पर प्रयास नहीं करना पड़ता है।

अप्रत्यक्ष करों के अवगुण
  • प्रगतिगामी स्वभाव : अप्रत्यक्ष करों का स्वभाव प्रगतिगामी होता है। यह सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लगाए जाते हैं तथा समाज के प्रत्येक वर्ग पर इसका प्रभाव पड़ता है। समाज के कम आय वाले वर्ग पर इन करों का परिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • अनिश्चितता : अप्रत्यक्ष करारोपण से अनिश्चितता होना तय है। यदि किसी वस्तु पर भारी कर लगाया जाता है तो संभव है कि उस वस्तु का उपभोग कम हो। इस कारण उस वस्तु की मांग घट जाएगी जिसका पूर्व निर्धारण करना कठिन होता है।
  • नागरिक चेतना का अभाव : यद्यपि अप्रत्यक्ष कर स्वरूप में व्यापक एवं विस्तृत होते हैं परन्तु कई बार नागरिकों, जो शिक्षित तथा जागरूक नहीं हैं, को इस प्रकार के कर भाव का अनुभव नहीं होता है तथा वे करों द्वारा राष्ट्रीय विकास में अपनी भूमिका का संज्ञान नहीं ले पाते हैं।
  • बचत हतोत्साहन : आवश्यक वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर लगने पर उपभोक्ता को मजबूरीवश वस्तु की खरीद पर अधिक धन खर्च करना पड़ता है जिसका प्रतिकूल प्रभाव उसके द्वारा की जाने वाली बचत पर पड़ता है। इसके विपरीत सरकार की बचत आय में वृद्धि होती है।
  • मूल्य वृद्धि में सक्षम : अप्रत्यक्ष कर वस्तु के मूल्यों में वृद्धि करने में सक्षम होते हैं। इससे उच्च मूल्य उच्च लागत और पुनः उच्च मूल्य के चक्र का उद्भव होता है।
  • खर्चीले : अप्रत्यक्ष कर खर्चीले होते हैं क्योंकि व्यापारी सरकार द्वारा लगाए गए करों की तुलना में अधिक कर वसूलते हैं।
  • असमानता : आवश्यक वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर लगा देने से निर्धन वर्ग को धनी वर्ग की अपेक्षा (आय के अनुपात में) अधिक कर देना पड़ता है, जो न्यायोचित नहीं है।
  • सरकार के साथ प्रत्यक्ष संपर्क नही : अप्रत्यक्ष करों के भुगतान में सरकार और करदाता के मध्य कोई सीधा संबंध या संवाद नहीं रहता है।
किसी भी अर्थव्यवस्था एवं उसके विकास में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर एक दूसरे के पूरक हैं। प्रत्यक्ष कर लगाने से पहले करदाताओं की आय का अनुमान लगाना अति आवश्यक है। अप्रत्यक्ष करों के लिए आय का आकलन आवश्यक नहीं होता, अतः कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के कर एक दूसरे की कमी को पूर्ण करके, कर के भार को समान रूप से वितरित करते हैं। विभिन्न परिस्थितियों एवं समय में करदाताओं की आय बदलती रहती है। इस प्रकार आय का सही अनुमान लगाना संभव नहीं हो पाता है। व्यक्ति की आय के साथ उसका उपभोग स्तर बदलता रहता है। अप्रत्यक्ष करों से उपयोग स्तर तथा बदलती आय का अनुमान लगाया जा सकता है। विशिष्ट परिस्थितियों एवं उपयोगिता में एक आदर्श कर प्रणाली में दोनों प्रकार के करों का उचित सामंजस्य होना अति आवश्यक है।

भारत में विभिन्न प्रकार के कर
आपने अभी करों के गुणों-अवगुणों, करों के स्वरूप, कराधान के उद्देश्य के विषय में पढ़ा। इसके अतिरिक्त भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ अन्य कर निम्नवत हैं जिनकी आपको जानकारी होना आवश्यक है। भारत में विभिन्न प्रकार के कर लागू हैं। कर का प्रकार मुख्यतया इस बात पर निर्भर करता है कि वह सरकार द्वारा किस विशेष प्रावधान के अन्तर्गत लगाया गया है।

प्रत्यक्ष कर
इसके विषय में आप जान चुके हैं कि इन करों का भुगतान प्रत्यक्ष रूप से सरकार को किया जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में करदाताओं द्वारा इस प्रकार के कर भुगतान में निरन्तर वृद्धि देखी गयी है जो कि एक प्रगतिशील अर्थव्यवस्था का संकेत है। कुछ प्रमुख प्रत्यक्ष कर निम्नलिखित है।
  • बैंकिंग कैश ट्रान्जैक्शन कर
  • कॉरपोरेट कर
  • पूँजी लाभ कर
  • डबल टैक्सेशन एवौइडेन्स एग्रीमैंट/दोहरा कर वंचन संधि
  • फ्रिंज बेनिफिट कर/अनुषंगी लाभ कर
  • सिक्योरिटीज ट्रान्जैक्शन कर
  • व्यक्ति आय कर
  • टैक्स इनसैन्टिव्स

अप्रत्यक्ष कर
अप्रत्यक्ष कर कुछ विशेष वस्तुओं/उत्पादों या सेवाओं पर लागू होते हैं। अप्रत्यक्ष कर किसी व्यक्ति विशेष या संस्था पर लागू नहीं होते हैं। इन करों की परिधि में उपभोक्ता उत्पादों से लेकर सेवाओं का वितरण निहित है। इसके अतिरिक्त अर्थव्यवस्था में अन्य गतिविधियां/सेवाएं जिनका सन्दर्भ आयात निर्यात व्यापार से है, को भी अप्रत्यक्ष करों में सम्मिलित किया गया है। अप्रत्यक्ष करों में विभिन्न प्रकार के कर सम्मिलित हैं,
जिनमें से मुख्य हैं-
  • सीमा शुल्क
  • उत्पाद शुल्क
  • एंटी डम्पिंग ड्यूटी
  • बिक्री कर
  • सेवा कर
  • मूल्य वर्धित/संवर्धन कर

इनके अतिरिक्त कुछ अन्य कर भी भारत सरकार द्वारा लगाए जाते हैं, जैसे-

म्यूनिसिपल अथवा स्थानीय कर
यह सर्वाधिक प्रचलित कर है जो स्थानीय निकायों द्वारा किसी वस्तु उत्पाद के प्रवेश पर निर्धारित किया जाता है। इसे प्रवेश कर भी कहा जाता है।

उपभोग कर
किसी प्रकार की वस्तु/उत्पाद/सेवाओं/सुविधाओं के उपयोग पर इस प्रकार का कर लगाया जाता है। इस प्रकार का कर उपभोग पर लागू होता है, ना कि आय अथवा श्रम पर। इस प्रकार के कर को बिक्री कर भी कहा जाता है। यह एक प्रतिगामी प्रकार का कर है

लाभांश कर
किसी कम्पनी के शेयर धारकों को लाभांश के रूप में जो धन राशि प्राप्त होती है, उस पर लागू कर को लाभांश कर कहा जाता है।

दान कर
किसी कम्पनी द्वारा फंड के रूप में संस्थानों (विशेषकर शैक्षिक संस्थानों) को दी जाने वाली सहायता राशि पर इस प्रकार का कर लगाया जाता है।

सम्पत्ति कर
सम्पत्ति कर को मृत्यु कर या विरासत में मिली सम्पत्ति पर निर्धारित कर भी कहा जाता है। सामान्य अर्थों में सम्पत्ति कर किसी मृत व्यक्ति की संपूर्ण संम्पत्ति, बचत तथा चल एवं अचल संपत्ति के आर्थिक मूल्य पर लगाया जाता है। इस प्रकार के कर निर्धारण के पीछे सामाजिक कल्याण की भावना निहित होती है।

ईंधन कर
पैट्रोल, गैस, गैसोलीन जैसे ईंधनों पर लगने वाले कर को ईंधन कर कहा जाता है। यह एक प्रकार का बिक्री कर है जो ईधनों की बिक्री पर लगाया जाता है।

बिक्री कर
किसी वस्तु की देश में बिक्री पर लगने वाला कर बिक्री कर कहा जाता है।

स्वरोजगार कर
ऐसे व्यक्ति जो नियमित सेवा में अथवा वेतनभोगी नहीं हैं, अर्थात जो किसी प्रकार के व्यापार अथवा सरकार द्वारा वैधानिक रूप से मान्य किसी प्रकार की व्यापारिक गतिविधियों में सम्मिलित हैं तथा यही उनकी जीविका का साधन है, उन पर यह कर लागू होता है। उनके द्वारा प्रतिमाह अर्जित आय से इस प्रकार के कर निर्धारण का आकलन किया जाता है।

सामाजिक सुरक्षा कर
सेवानिवृति के उपरान्त कर्मचारियों के लिए इस प्रकार की कर योजना लाभदायक होती है। भारत में यह कर अवधारणा प्रोविडैन्ट फंड अथवा भविष्य निधि के नाम से प्रचलित है। यह कई प्रकार के होते हैं, जैसे जन भविष्य निधि, सामान्य भविष्य निधि, कर्मचारी भविष्य निधि।

स्थानान्तरण कर
सम्पत्ति के स्थानान्तरण (एक व्यक्ति से दसरे व्यक्ति को) होने पर इस प्रकार का कर लगाया जाता है। सम्पत्ति के स्थानान्तरण एवं पंजीकरण पर यदि कानूनी कार्यवाही सम्मिलित है तो वहां पर इस प्रकार का कर लगाया जाता है। सम्पत्ति (चल सम्पत्ति), अंश/बॉन्ड्स आदि के स्थानान्तरण इस कर के मुख्य उदाहरण हैं। यहां पर यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि कानूनी प्रकिया के दौरान नोटरी आदि को दी जाने वाली फीस स्थानान्तरण कर नहीं है। 

पेरोल कर
यह कर दो प्रकार का होता है। पैरोल टैक्स या तो निश्चित दर का अनुपालन करता है या कर्मचारी की आय के अनुपात के अनुसार निर्धारित होता है।

पोल कर
यह भारत में वाहनों पर लगने वाले सड़क कर की ही भांति है। यद्यपि भारत में यह कर अधिक प्रचलित नहीं है परन्तु वर्ष 2002 में परिवहन मंत्रालय द्वारा भारत के समस्त पर्यटक वाहनों के जम्मू कश्मीर में प्रवेश पर इस प्रकार के कर का निर्धारण किया गया।

सम्पत्ति कर
मूल्यवान एवं कर योग्य वस्तुओं के वार्षिक मूल्य पर इस प्रकार के कर का निर्धारण किया जाता है। यदि सम्पत्ति का उपयोग व्यापार या व्यवसायिक उद्देश्य हेतु किया जा रहा है तो उससे प्राप्त लाभ पर भी नियमानुसार कर देय होगा।

विकासशील अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का महत्व
विकासशील राष्ट्रों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों प्रकार के करों का वांछित क्षेत्रों में साधनों को जुटाने, उत्पादन एवं निवेश को बढ़ावा देने के लिए उपयोग किया जाता है। आइए, अब विकासशील अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों की भूमिका के विषय में जानें।

प्रत्यक्ष करों की भूमिकाएं निम्न प्रकार हैं-
  • सट्टेबाजी/पूर्वानुमान आदि पर होने वाले निवेश को रोकना
  • मुद्रास्फीति पर नियंत्रण लगाने में सहायक
  • कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहन
  • उपभोग पर प्रतिबन्ध
  • आय असमानता पर नियंत्रण
  • समानता का भाव

विकासशील अर्थव्यवस्था में अप्रत्यक्ष करों की भूमिकाएं
  • सुविधाजनक
  • विलासिता वाली वस्तुओं के नियंत्रण में सहायक
  • अधिक परिवर्तनगामी
  • प्रेरणादायक

करारोपण के प्रकार

कराधान के कई प्रकार हैं जिनकी अब हम चर्चा करेंगे।

1. एकल कर
यह वह कर प्रणाली है जिसमें कर केवल एक मद पर लगाया जाता है। इसमें एक वस्तु पर कर लगता है। यह कर सार्वजनिक राजस्व का प्रमुख स्रोत है। इस प्रकार का कर साधारणतया केवल एक बार नहीं अपितु एक निश्चित अन्तराल पर लगाया जाता है जैसे यह कर प्रत्येक माह अथवा वर्ष के अन्त में एकत्रित किए जाते हैं।

एकल कर के गुण
  • एकल कर करारोपण का सरल रूप है जिससे सरकारी कार्य सरल होता है।
  • यह एक मितव्ययी कर है क्योंकि इसमें राजस्व को एकत्र करने में कम राशि व्यय होती है।
  • यह भेदभाव रहित है।
  • इसके पीछे सामाजिक न्याय की भावना निहित है।

एकल कर के अवगुण
  • यह करभार का सर्वाधिक अनुचित एवं असन्तोषपूर्ण वितरण है।
  • यह कर दाता की योग्यता के नियम को संतुष्ट नहीं करता।
  • यह सरकारी कोष हेतु पर्याप्त साधन नहीं जुटा पाता है।
  • यह संकटकालीन स्थिति में अधिक उपयोगी नहीं है।
  • यह लोचमय नहीं है।
  • इसमें कर चोरी की अधिक संभावनाएं होती हैं।

2. बहुकर
इसका तात्पर्य है कि कर प्रणाली में सभी प्रकार के करों को सम्मिलित किया जाना चाहिए ताकि प्रत्येक नागरिक आर्थिक विकास में अपना योगदान सुनिश्चित कर सके। आधुनिक प्रकार की अर्थव्यवस्था में इस प्रकार की कर प्रणाली को प्राथमिकता दी जाती है। बहुकर प्रणाली से अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है।

बहुकर कर प्रणाली के लाभ
बहकर प्रणाली के माध्यम से आय और सम्पत्ति की असमानताओं और विषमताओं को कम किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त-
  • ये कर सरकार की आय में वृद्धि करते हैं।
  • कर चोरी को रोकने में इस प्रकार के कर सक्षम हैं।
  • यह कर प्रणाली समानता के सिद्धांत पर आधारित है।
  • यह कर प्रणाली लोचमय है।

बहुकर प्रणाली की हानियाँ
यह कर प्रणाली तुलनात्मक रूप से जटिल है।
यह उत्पादक क्रिया पर रोक लगाती है।
यह भुगतान करने की क्षमता के सिद्धान्त पर आधरित नहीं है।

विशिष्ट कर
वस्तुओं के किन्हीं विशिष्ट गुणों के आधार पर लगाए जाने वाले करों को विशिष्ट कर कहा जाता है। ये कर वस्तु के भार, आकार अथवा मात्रा आदि के अनुसार लगाए जाते हैं। जैसे, चीनी पर उसके वजनानुसार, कपड़े की लम्बाई के अनुसार, टेलीविजन की पिक्चर ट्यूब पर उसके आकारनुसार कर लगता है। विशिष्ट कर गणनात्मक एवं प्रशासनात्मक रूप में सरल होते हैं और इन्हें एकत्र करना आसान होता है। इनका भार आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों पर अधिक पड़ता है। इस कर का भार उत्पाद की सस्ती किस्मों जिन्हें निम्न आय वर्ग के लोग प्रयोग करते हैं, उन पर अधिक पड़ता है।

मूल्यानुसार कर
इस प्रकार के कर वस्तु के मूल्य के आधार पर लगाए जाते हैं। इस प्रकार के कर निर्धारण से पूर्व कर योग्य वस्तुओं का मूल्यांकन किया जाता है। यह प्रायः आयातित एवं निर्यातित वस्तुओं पर लगाया जाता है। उदाहरण के लिए निर्यात आयात शुल्क 5 पैसे प्रति रुपये वस्तु मूल्य या 10% की दर पर लगाया जाता है। मूल्यानुसार कर समानता के सिद्धान्त पर आधारित है। यह वस्तुओं के मूल्य पर लगाए जाते हैं। आर्थिक रूप से सम्पन्न वर्ग पर इसका भार अधिक पड़ता है। अतः इस प्रकार के करों को तर्कसंगत एवं न्यायोचित कहा जा सकता है। मूल्यानुसार कर प्रशासनात्मक रूप से कठिन होते हैं तथा इन्हें लगाना और एकत्र करना कठिन होता है। इसमें कर चोरी की संभावनाएं अधिक होती हैं क्योंकि कर भुगतान से बचने के लिए प्रायः वस्तुओं का मूल्य कम दिखाया जाता है। कर प्रणाली में स्थिरता तथा लोच की दृष्टि से मूल्यानुसार करों को विशिष्ट करों की तुलना में श्रेष्ठ माना गया है।

दोहरा कर
किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक सेवा पर यदि दो बार कर दिया जाए तो उसे दोहरा कर कहते हैं। यदि एक व्यक्ति विदेश में आय अर्जित करता है तो उसे विदेश में तथा भारत में, एक ही आय पर दो बार कर देना होता है, यह दोहरे कर का उदाहारण है। दोहरे कर का आधार एवं समय एक ही रहता है, अतः इससे कर दाता अतिरिक्त औपचारिकताओं एवं समय से बच जाता है। दोहरे कर के कारण एक राज्य से दूसरे राज्य में पूँजी के स्थानान्तरण पर प्रभाव पड़ता है जो अर्थव्यवस्था के विकास में बाधक सिद्ध हो सकता है। साथ ही एक ही कर दो बार लगने के कारण यह न्याय संगत नहीं है। यही कारण है कि इस प्रकार के कर में कर चोरी की संभावना अधिक होती है।

करारोपण का प्रभाव

आपने विभिन्न प्रकार के करों एवं उनके गुण/दोषों के विषय में पढ़ा। आइए, अब जानें कि करारोपण का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है। करारोपण से सरकार की आय होती है। यह राजस्व का प्रमुख स्रोत है। करारोपण के माध्यम से सरकार आर्थिक उन्नति के विभिन्न लक्ष्यों को भी पूर्ण करती है। करारोपण किसी भी अर्थव्यवस्था के सभी स्तरों को प्रभावित करता है। इसका उत्पादन, उपभोग, बचत, निवेश एवं रोजगार सभी क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है।
  • प्रो. डाल्टन के अनुसार आर्थिक दृष्टिकोण से करारोपण की सर्वोतम प्रणाली वह है जिसके आर्थिक प्रभाव सर्वोतम हों तथा बुरे प्रभाव न्यूनतम हों। तालिका से आप करारोपण के विभिन्न प्रभावों को देख सकते हैं।
तालिका करारोपण का प्रभाव
उत्पादन पर वितरण पर अन्य प्रभाव
बचत एवं निवेश की क्षमता और इच्छा पर प्रत्यक्ष करों पर मुद्रास्फीति पर
उद्योगों और स्थानों में साधनों के स्थानान्तरण पर अप्रत्यक्ष करों पर आर्थिक मंदी पर
उपयोग, आर्थिक वृद्धि तथा साधनों की पूर्ति पर

कर चोरी

कर चोरी का अभिप्राय उन स्थितियों से है जिनके माध्यम से व्यक्ति सरकार द्वारा लगाए गए करों से बचने के विभिन्न प्रयास करते हैं और कर भुगतान करने से बचते हैं। प्रायः व्यक्ति अपनी आय कम दिखाकर अथवा किसी अन्य के नाम पर सम्पत्ति खरीदकर कर चोरी करते हैं जो कि सर्वथा अनुचित एवं गैर कानूनी है। कर चोरी जैसी स्थिति न आ पाए, इस परिप्रेक्ष्य में करदान क्षमता को समझना आवश्यक है। आधुनिक समय में प्रत्येक अर्थव्यवस्था राष्ट्र के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान हेतु कटिबद्ध है। इस कटिबद्धता में करदान क्षमता का विशेष महत्व है। समाज के विभिन्न वर्गों से उनकी क्षमता के अनुसार कर भुगतान की राशि को सामाजिक वृद्धि हेतु खर्च किया जाता है। राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत करदान ही है। अतः प्रत्येक सरकार लोगों की करदान क्षमता का निर्धारण करने के लिए प्रयत्नशील रहती है।

करदान क्षमता को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है-

“करदान क्षमता के द्वारा व्यक्तिगत हितों को बिना किसी प्रकार की हानि पहुँचाकर उस सीमा का निर्धारण किया जाता है, जहाँ तक व्यक्ति कर दे सकता है। करदान क्षमता का अभिप्राय समुदाय की अधिकतम कर भुगतान कर पाने की योग्यता से है।

जैसा कि आपने जाना कि कर सार्वजनिक आय/राजस्व का प्रमुख स्रोत हैं। यद्यपि उच्च करारोपण सार्वजनिक आय में वृद्धि करते हैं परन्तु दसरी तरफ ये लोगों की क्रय शक्ति, कार्य करने की क्षमता, बचत तथा निवेश की इच्छा को हतोत्साहित भी करते हैं। इसके मध्य संतुलन होना आवश्यक है। करदान क्षमता का निर्धारण इसी समस्या का समाधान है। किसी अर्थव्यवस्था की करदान क्षमता कई तत्त्वों पर निर्भर करती है।
कुछ प्रमुख तत्त्व निम्नवत् हैं-
  • राष्टीय आय का स्वरूप
  • जनसंख्या का आकार तथा वृद्धि दर
  • करारोपण का प्रकार
  • करारोपण का उद्देश्य
  • करदाताओं की मनोवृति
  • आय में स्थायित्व
  • प्रशासनिक दक्षता
  • रहन-सहन का स्तर
  • राजनैतिक परिस्थितियां
  • बचत, निवेश और आर्थिक वृद्धि
  • सरकार का स्वरूप
  • देशभक्ति और संकटकालीन स्थितियां
  • मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति

मूल्य वर्धित कर (Value Added Tax)

प्रायः आपने खरीददारी करते समय या रैस्टोरेन्ट में खाने के बिल पर  VAT अवश्य देखा होगा। इस कर का प्रादुर्भाव हाल में ही हुआ है।
मूल्य वर्धित कर (VAT) एक वस्तु अथवा सेवा के (निर्यात और सरकारी सेवाओं को छोड़कर) मूल्य मे जोड़ा गया कर है। यह कर उस मूल्य पर लगाया जाता है जो व्यापारिक फर्म उन वस्तुओं और सेवाओं में जोड़ती है जिन्हें वह अन्य शक्ति, योग्यता, मशीनरी, भवन तथा अन्य संसाधन लगाकर मूल्य वर्धन करती है। व्यापारिक प्रक्रिया में यह एक ही स्तर पर लगाया जाता है। मूल्य वर्धित कर वस्तु के कुल विक्रय मूल्य पर कहीं नहीं होता बल्कि अन्तिम व्यापारी द्वारा इसमें जोड़े गए मूल्य पर होता है। अतः व्यापारी कुल मूल्य पर कर देने के लिए नहीं बल्कि शुद्ध मूल्य पर कर देने के लिए जिम्मेदार होता है। उत्पादन प्रक्रिया के कई चरण होते हैं जो वस्त को अन्तिम उपभोक्ता तक पहुँचाने के मार्ग में आते हैं, अतः यह एक बहुस्तरीय बिक्री करारोपण है।

आयकर

भारत में आयकर सभी स्रोतों से प्राप्त आयों (कृषि को छोड़कर) पर निर्धारित किया जाता है। भारत में आयकर वर्ष 1860 से लागू किया गया। इसमें विविध प्रकार के परिवर्तनों एवं सुधारों के पश्चात् भारतीय आयकर अधिनियम, 1922 पारित किया गया जिसमें ऑल इंडिया टैक्स समिति के द्वारा कुछ अति महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। इसके पश्चात् आयकर के प्रशासनात्मक पक्ष का नियंत्रण प्रत्यक्ष रूप से केन्द्र सरकार द्वारा किया जाने लगा। इस अधिनियम में पुनः सुधार/परिवर्तन कर 1961 में पारित किया गया। वर्तमान में भारत में लागू आयकर कराधान अभी भी इसी संशोधित अधिनियम का पालन करता है। 1961 के आयकर अधिनियम के अनुसार करदाता जिनका कुल आय स्तर अधिनियम छूट की सीमा से अधिक है, कर योग्य सीमाके अंतर्गत आते हैं। करदाता को वित्त अधिनियम में वर्णित विभिन्न मदों के अनुसार कर भुगतान करना पड़ता है। आयकर भुगतान का आकलन पिछले वर्ष की कुल आय को संगत वित्त वर्ष के लिए आधार मान कर किया जाता है। प्रत्येक कर दाता अपने कर का भुगतान वर्तमान नियमों के अन्तर्गत ही कर सकता है।

आयकर स्लैब
यह वह स्लैब होता है जिसके द्वारा लिंग, आय, आय तथा व्यवसाय के आधार पर व्यक्ति के आयकर का निर्धारण किया जाता है।

आयकर स्लैब
1. पुरुष तथा महिला (60 वर्ष से कम)
आयकर स्लैब (वार्षिक आय पर) आयकर दर
ढाई लाख से कम आय पर शून्य कर
ढाई लाख से अधिक, पाँच लाख से कम आय पर ढाई लाख से अधिक आय का 10 प्रतिशत
पाँच लाख से अधिक, दस लाख से कम आय पर पाँच लाख से अधिक आय का 20 प्रतिशत
दस लाख से अधिक आय पर दस लाख से अधिक आय का 30 प्रतिशत

2. वरिष्ठ नागरिक (60 वर्ष से अधिक 80 वर्ष से कम)
आयकर स्लैब (वार्षिक आय पर) आयकर दर
तीन लाख से कम आय पर शून्य कर
तीन लाख से अधिक, पाँच लाख से कम आय पर तीन लाख से अधिक आय का 10 प्रतिशत
पाँच लाख से अधिक, दस लाख से कम आय पर पाँच लाख से अधिक आय का 20 प्रतिशत
दस लाख से अधिक आय पर दस लाख से अधिक आय का 30 प्रतिशत

अति वरिष्ठ नागरिक (80 वर्ष से अधिक)
आयकर स्लैब(वार्षिक आय पर) आयकर दर
पाँच लाख से कम आय पर शून्य कर
पाँच लाख से अधिक, दस लाख से कम आय पर पाँच लाख से अधिक आय का 20 प्रतिशत
दस लाख से अधिक आय पर दस लाख से अधिक आय का 30 प्रतिशत

सहकारी समिति हेतु आय कर स्लैब
आयकर स्लैब(वार्षिक आय पर) आयकर दर
दस हजार से कम आय पर आय का 10 प्रतिशत
दस हजार से अधिक, बीस हजार से कम आय पर दस हजार से अधिक आय का 20 प्रतिशत
बीस हजार से अधिक आय पर बीस हजार से अधिक आय का 30 प्रतिशत

पैन कार्ड (PAN Card)

आपने पैन कार्ड के विषय में अवश्य सुना होगा। संभव है कि आपके पास स्वयं का पैन कार्ड उपलब्ध हो। आइए, पैन कार्ड के विषय में कुछ महत्वपूर्ण एवं रोचक तथ्यों को समझने का प्रयास करें।

पैन कार्ड क्या है?
PAN का विस्तृत रूप है; Permanent Account Number. इसे स्थायी लेखा संख्या भी कहा जाता है। व्यक्ति के आवेदन करने पर अथवा स्वयं आयकर विभाग द्वारा यह संख्या आंवटित की जाती है। यह दस संख्या वाला अल्फान्यूमैरिक अर्थात A-Z तथा 1-9 तक की संख्या वाला एक कार्ड है। पैन कार्ड आयकर विभाग तथा संबंधित व्यक्ति के मध्य एक कड़ी है जो विभाग को व्यक्ति के विभिन्न व्यवहारों जैसे कर भुगतान, टी0डी0एस0 (स्रोत पर कर कटौती), पत्राचार आदि से जोड़ती है। इस प्रकार व्यक्ति और विभाग के मध्य पैन कार्ड एक पहचान है।

पैन कार्ड (नमूना)
पैन कार्ड का उद्भव विभिन्न गतिविधियों के सरलीकरण के उद्देश्य से किया गया है। यहां पर गतिविधियों से तात्पर्य विभिन्न दस्तावेजों को आपस में जोड़ना, कर भुगतान, कर बकाया आदि है तथा व्यक्ति से संबंधित वे सभी गतिविधियाँ जिनमें धन सम्मिलित है। इस प्रकार पैन कार्ड कर चोरी की पहचान और उसे रोकने में भी सहायता प्रदान करता है। यहाँ एक आदर्श PAN संख्या AFZPK7190K के माध्यम से आइए जानें कि PAN कार्ड में दी गई इस संख्या का क्या अर्थ है।
इसमें पहले तीन अक्षर AFZ वर्णमाला के अनुक्रम को दर्शाते हैं।
पैन कार्ड में अंकित चौथे अक्षर P से तात्पर्य व्यक्ति (Individual) से है। यदि यहां पर P के स्थान पर F होता तो इसका अर्थ संस्था (Firm) से होता। C होने पर इसका अर्थ कम्पनी से होता। इसी प्रकार-
  • A-Association of Persons (AOP)/व्यक्तियों के संघ
  • B- Body of Individuals/व्यक्तियों के निकाय
  • G-Government/सरकार
  • H- Hindu Undivided Family/हिंदू अविभाजित परिवार
  • L- Local Authority/स्थानीय प्राधिकरण
  • T- Trust/ट्रस्ट
पैन कार्ड में अंकित पाँचवा अक्षर K का संबंध व्यक्ति के सरनेम से है। जैसे अखिल गुप्ता (Akhil Gupta) नामक व्यक्ति के पैन कार्ड पर यह अक्षर G होगा।
अगले चार अंक उस श्रृंखला को प्रदर्शित करते हैं जिसके अन्तर्गत यह पैन कार्ड निर्गत किया जाता है। उदाहरण के लिए 0001-9999
अंतिम अक्षर वर्णमाला का निरीक्षण अंक (check digit) होता है।
आपने पैन कार्ड में अंकित विवरणों को भली प्रकार से समझ लिया है। आइए, अब जानें हमें पैन कार्ड की आवश्यकता क्यों होती है।

1 जनवरी 2005 से आयकर विभाग से संबधित समस्त व्यवहार एवं गतिविधियाँ जिसमें वित्त अंतर्निहित है, में पैन कार्ड का उल्लेख करना अनिवार्य है। ये गतिविधियाँ निम्न प्रकार की हो सकती है-
  • पाँच लाख या इससे अधिक कीमत की अचल सम्पत्ति खरीदे जाने पर।
  • चार पहिया वाहन की खरीद और बिक्री पर।
  • पचास हजार रुपये के समय-बधिन्त बैंक जमा पर।
  • डाकघर में पचास हजार रुपये से अधिक की बचत पर।
  • बैंक में खाता खोलने पर।
  • टेलिफोन कनैक्शन लिए जाने पर।
  • होटल/रेस्टोरेन्ट में एक समय में पच्चीस हजार रुपये से अधिक के बिल पर।
  • बैंक में पचास हजार रुपये से अधिक धनराशि जमा करते समय तथा इसी धनराशि के ड्राफ्ट,
  • चैक-पे-ऑडर संबंधी समस्त व्यवहारों पर।
  • विदेशों में यात्रा करते समय एक समय में पच्चीस हजार रुपये से अधिक के व्यवहार पर।
आइए, अब जानें कि किन-किन व्यक्तियों के पास पैन कार्ड होना अनिवार्य है।
  • समस्त करदाता या वे सभी व्यक्ति जो स्वयं या किसी अन्य की तरफ से आयकर रिटर्न प्रस्तुत कर रहे हों।
  • ऐसे व्यक्ति जो अपना व्यवसाय करते हों तथा जिनकी बिक्री या वार्षिक टर्न ओवर (विगत वर्ष में) पाँच लाख रुपये से अधिक हो।
  • किसी भी प्रकार के वित्तीय व्यवहार हेतु।
  • वित्तीय मामलों का मल्यांकन करने वाला अधिकारी आवश्यकता पड़ने पर करदाता को पैन कार्ड निर्गत कर सकता है।
किसी भी व्यक्ति को इस बात की जानकारी होना जरूरी है कि वह पैन कार्ड हेतु आवेदन किस प्रकार करे। आइये, इसकी जानकारी लें।

पैन कार्ड हेतु आयकर विभाग का 49A फॉर्म निर्धारित है। इसे आप आयकर विभाग की अधिकृत वैबसाइट से डाउनलोड कर मुद्रित कर सकते हैं अथवा IT PAN सर्विस सेन्टर से भी यह फॉर्म प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त पैन कार्ड के लिए आयकर विभाग के अधिकृत वैब पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन भी किया जा सकता है और संबंधित दस्तावेज जैसे पहचान पत्र, पता (आवसीय पते का प्रमाण) डाक/कूरियर द्वारा भेजे जा सकते हैं। व्यक्ति फीस का भुगतान क्रेडिट-डेबिट कार्ड अथवा नेट बैंकिंग के माध्यम से कर सकता है। यदि आपके पास पहले से ही पैन कार्ड उपलब्ध है और उसमें कोई त्रुटि है, ऐसी स्थिति में कार्ड में संशोधन हेतु ऑनलाइन आवेदन भी किया जा सकता है। आवेदन करने और संबंधित दस्तावेज विभाग को प्राप्त करने के 15 दिनों के भीतर पैन कार्ड प्राप्त किया जा सकता है। पैन कार्ड के लिए तत्काल सुविधा उपलब्ध नहीं है। सरकार द्वारा मान्य दस्तावेज जैसे आधार कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता पहचान पत्र, हाईस्कूल प्रमाण पत्र (जन्मतिथि सत्यापन हेतु), टेलीफोन/बिजली का बिल इत्यादि को पैन कार्ड बनवाने में प्रयुक्त किया जा सकता है। यदि व्यक्ति स्वयं के लिए पैन कार्ड आवेदन कर रहा है तो दस्तावेजों के साथ-साथ अपना नवीनतम फोटो लगाना भी अनिवार्य है।

व्यक्ति के अप्रवासी करदाता के रूप में यह प्रावधान सैक्शन 160 (आयकर अधिनियम, 1961) के अन्तर्गत उपलब्ध है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, स्थायी लेखा संख्या एक स्थायी संख्या है जो कार्ड धारक के लिए आजीवन समान तथा वैध रहती है।

आयकर के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
आयकर व्यक्ति, कम्पनी, फर्म इत्यादि की कुल वित्तीय आय पर सरकार के वित्तीय नियमों/अधिनियमों के अंतर्गत लगने वाला कर है। आयकर के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिनके बारे में हमें जानना आवश्यक है।

विगत वर्ष एवं मूल्यांकन वर्ष
विगत वर्ष वह वित्तीय वर्ष है जो प्रत्येक वर्ष की 31 मार्च को समाप्त हो जाता है। मूल्यांकन वर्ष 12 महीने का वह समय है जो विगत वर्ष के समाप्त होने (31 मार्च) के तुरन्त बाद अर्थात 1 अप्रैल से आरम्भ हो जाता है। उदाहरण के लिए विगत वित्तीय वर्ष जो कि 31.03.2016 में समाप्त हुआ, के लिए मूल्यांकन वर्ष 1.04.2016 से 31.03.2017 तक होगा।

आयकर नियमानुसार भुगतान न कर पाने की स्थिति
हमारे देश में आयकर चोरी कानूनन अपराध है। किसी भी व्यक्ति को आयकर चोरी करने का दोषी पाए जाने पर आयकर अधिनियम 1961 की धारा 276 c (2) के अन्तर्गत मुकदमा दायर किया जा सकता है एवं नियमानुसार व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है।

व्यक्ति द्वारा अधिक आयकर जमा कर देने की स्थिति
अतिरिक्त आयकर का पुनः भुगतान कर दिया जाता है। यह पुनर्भुगतान आयकर रिटर्न पूर्ण होने के पश्चात् किया जाता है। आयकर सीमा की अधिकतम छूट से अधिक आय होने पर व्यक्ति को आयकर भुगतान करना होता है। ऐसे व्यक्ति करदाता कहे जाते हैं।

आयकर रिटर्न भरने हेतु निम्न प्रपत्र निर्धारित हैं।
करदाता फॉर्म संख्या
ऐसे व्यक्ति जिनकी आय का स्रोत वेतन/पेंशन या पारिवारिक पैंशन है। ITR-1
ऐसे व्यक्ति अविभाजित हिन्द परिवार जिनकी आय का स्रोत व्यापार अथवा व्यवसाय है। ITR-2
ऐसे व्यक्तिअविभाजित हिन्द परिवार जो किसी फर्म में साझेदार/ हैं और किसी साझेदारी के अन्तर्गत व्यवसाय चलाते हैं। ITR-3
ऐसे व्यक्ति/अविभाजित हिन्द परिवार जिनकी आय का स्रोत प्रोप्राइटरी व्यापार व्यवसाय है। ITR-4
फर्म हेतु। ITR-5
कम्पनी, उनके अतिरिक्त जिन्हें सैक्शन 11 के अन्तर्गत छूट प्राप्त है। ITR-6
ऐसे व्यक्ति तथा कम्पनी जिन्हें सैक्शन 11 के अन्तर्गत रिटर्न भरने की आवश्यकता है। ITR-7

आयकर किस प्रकार भरें?
वेतनभोगी व्यक्ति प्रपत्र-16 (Form-16) के आधार पर आयकर का भुगतान करते हैं। यह नियोक्ता के द्वारा कार्यरत कर्मचारी को निर्गत किया जाता है एवं इसमें वेतन का संपूर्ण विवरण अंकित रहता है। प्रत्येक माह मिलने वाले वेतन के आधार पर स्रोत अंकित होता है। ऐसे व्यक्ति जो वेतन के अतिरिक्त किसी भी अन्य प्रकार की आय प्राप्त करते हों, उनकी संबंधित सूचना प्रपत्र-16 में अंकित होती है। आयकर का भुगतान ऑनलाइन भी किया जा सकता है।
निम्न प्रकार की आय पर आयकर भरना आवश्यक है-
  • वेतन से प्राप्त आय।
  • घर सम्पत्ति से प्राप्त आय।
  • व्यवसाय मे होने वाले लाभ से प्राप्त आय।
  • पूंजी से प्राप्त लाभ।
  • अन्य स्रोतों से प्राप्त आय।

आयकर छूट
निम्न स्थितियों में आयकर छट का प्रावधान है।
  • कृषि आय।
  • लीव ट्रैवल कन्सेशन।
  • आनुतोषिक पर (Gratuity)।
  • स्वैच्छिक सेवानिवृति पर (अधिकतम 5 लाख के भुगतान पर)।
  • भविष्य निधि के भुगतान (भविष्य निधि अधिनियम, 1925 तथा जन भविष्य निधि, 1968) के अन्तर्गत।
  • सेवानिवृति होने पर अवकाश के नगदीकरण कराने की स्थिति पर (अधिकतम सीमा 3 लाख)।
  • आवसीय भत्ते पर।
  • 1/3 पेंशन के विनिमय पर।

किन परिस्थितियों में कर राहत दी जाती है?
आयकर की धारा 80 c के अन्तर्गत कुछ निवेश तथा अन्य संबंधित गतिविधियाँ अनुमन्य हैं तथा ये कर मुक्त हैं। इनमें निवेश की अधिकतम सीमा एक लाख पचास हजार रुपये है। निम्न निवेश इसके उदाहरण हैं-
  • भविष्य निधि और सामान्य भविष्य निधि।
  • पैंशन योजना में निवेश।
  • सरकार द्वारा अधिकृत संचय योजना में निवेश।
  • इक्विटि संबंधित संचय योजना में निवेश।
  • सरकार द्वारा अधिकृत इन्फ्रास्ट्रकचर बॉन्ड।
  • राष्टीय बचत पत्र में निवेश।
  • आवसीय ऋण पर।
  • शिक्षण संस्था में ट्यूशन फीस पर।
  • डाकघर संबंधी किसी निवेश पर।
  • किसी विशेष सावधि जमा पर।

आयकर की धाराएं
आइए, अब आयकर की धाराओं के विषय में समझें। आयकर की धारा 80C के अन्तर्गत निवेश अनुमन्य है। 80C तथा 80CCC की अधिकतम सीमा डेढ़ लाख रुपये है। आइए 80C तथा इसी से संबंधित अन्य धाराओं के विषय में जानें।

टी. डी. एस. स्रोत पर कटौती से क्या तात्पर्य है?
करदाता द्वारा किसी वित्तीय वर्ष में अपनी अनुमानित आय तथा उसके अनुसार कर भुगतान का आकलन कर प्रायः प्रतिमाह वेतन से कर भुगतान स्रोत पर कटौती अथवा टी0डी0एस0 का उदाहरण है।

टी. डी. एस. प्रमाण पत्र क्या है?
आयकर रिटर्न भरते समय टी.डी.एस. प्रमाण पत्र आवश्यकता पड़ती है और यह इस बात का प्रमाण है कि करदाता द्वारा नियमों का पालन किया गया है। वेतन भोगी कर्मचारियों हेतु प्रपत्र 16 पर यह विवरण अंकित होता है। प्रपत्र 16 में वेतन के अतिरिक्त आय पर टी.डी.एस. या स्रोत पर कटौती का प्रमाण पत्र होता है।

सारांश

आपने जाना कि राज्य अथवा केन्द्र सरकार द्वारा करदाता पर अनिवार्य वित्तीय भार को कर कहते हैं। कर सदैव नियम/कानून के अन्तर्गत निर्धारित किए जाते हैं। कर राजस्व के प्रमुख स्रोत हैं। भारत में मुख्यतया दो प्रकार के कर प्रचलित हैं, प्रत्यक्ष कर तथा अप्रत्यक्ष कर। वे कर जिनका सीधा प्रभाव करदाता पर पड़ता है, उन्हें प्रत्यक्ष कर कहते हैं। जैसे आय कर, सम्पत्ति कर इत्यादि। ऐसे कर जिनका अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति पर प्रभाव पड़ता है, उन्हें अप्रत्यक्ष कर कहते हैं। ये वस्तुओं और सेवाओं के उपयोग पर देय होते हैं, किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं। सेवा कर, वैट (मूल्य वर्धित कर) इसके उदाहरण हैं। आपने भारत में विभिन्न प्रकार के कर, कराधान व्यवस्था, आयकर की दर, छूट के प्रावधान, प्रपत्रों, पैन कार्ड के विवरण, महत्व, आवश्यकता संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों एवं स्रोत पर कटौती जैसे महत्वपूर्ण विषयों को समझा। करों और कराधान व्यवस्था के विषय को भली-भाँति प्रकार समझने पर अब आपके लिए यह विषय कठिन नहीं होगा तथा आप अपने दैनिक जीवन में इस ज्ञान से अवश्य लाभान्वित होंगे।

पारिभाषिक शब्दावली
  • कर: नागरिकों की आय का वह भाग जिसे राज्य अपने लिए लेता है तथा जो सामान्य जन सेवाओं के उत्पादन के लिए आवश्यक है।
  • प्रत्यक्ष कर: ऐसे कर जो विधिवत रूप से जिस पर लगाए जाते हैं उसे ही प्रत्यक्ष रूप से उनका भुगतान करना पड़ता है, जैसे आयकर।
  • अप्रत्यक्ष कर: ऐसे कर जो किसी व्यक्ति पर आंशिक या पूर्ण रूप से लगाए जाते हैं परंतु किसी वस्तु या सेवा के रूप में, जैसे उत्पादन शुल्क।
  • लाभांश कर: किसी कम्पनी के शेयर धारकों को लाभांश के रूप में जो धन राशि प्राप्त होती है, उस पर लागू कर को लाभांश कर कहा जाता है।
  • एकल कर: वह कर प्रणाली जिसमें कर केवल एक मद पर लगाया जाता है।
  • दोहरा करः किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक सेवा पर दो बार दिया गया कर।
  • आयकर स्लैब: वह स्लैब जिसके द्वारा लिंग, आय, आयु तथा व्यवसाय के आधार पर व्यक्ति के आयकर का निर्धारण किया जाता है।
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