लोक प्रशासन और निजी प्रशासन में अंतर | lok prashasan evam niji prashasan mein antar

लोक प्रशासन और निजी प्रशासन में अंतर

अन्तर का आधार लोक प्रशासन निजी प्रशासन
कार्य क्षेत्र विस्तृत सीमित
स्वरूप राजनीतिक अराजनीतिक
उद्देश्य जन कल्याण लाभार्जन
उत्तरदायित्व जनता के प्रति उपभोक्ता के प्रति
नियंत्रण संविधान, विधायिका आदि का प्रत्यक्ष व परोक्ष नियंत्रण कार्य में अपेक्षाकृत व स्वतंत्रता
संगठनात्मक प्रकृति विस्तृत एवं जटिल छोटी एवं सरल
एकाधिकारिक क्षेत्र रक्षा आदि क्षेत्र सुरक्षित प्रवेश नहीं
पदसोपानिक व्यवस्था कठोरतापूर्वक लागू लचीलापन
गोपनीयता अपेक्षाकृत कम प्रायः सभी कार्य गोपनीय रखे जाते हैं।
नियोक्ता श्रेष्ठ नियोक्ता के अनुरूप सुविधाएँ व वेतन अपेक्षाकृत कम सुविधाएँ व वेतन
वित्तीय नियंत्रण बाहरी व संसदीय नियंत्रण आन्तरिक व स्वामित्व पर निर्भर
राष्ट्र निर्माण में सहयोग सर्वोच्च योगदान सीमित योगदान
नौकरशाही लालफीताशाही, कठोरता, विलम्बता, औपचारिकता का अधिक प्रभाव प्रायः मुक्त
व्यवहार (कार्यकरण) सभी के साथ समान समान हो आवश्यक नहीं
कार्यकुशलता अपेक्षाकृत कम अपेक्षाकृत अधिक
विधिक समस्या कानूनों व नियमों से आबद्ध निजी नियमों को अधिक महत्त्व
परिवर्तनोन्मुखी समयानुरूप, परिवर्तन प्रायः शनैः शनैः विलम्ब से समयानुरूप परिवर्तन शीघ्रता से
सेवाओं में स्थायित्व पदाधिकारियों व कर्मचारियों के पद स्थायी कर्मचारियों व पदाधिकारियों के पद स्थायी नहीं
राज सत्ता के आधार पर कार्य पूर्ण करने के लिए सेना, पुलिस, न्यायालय आदि का सहयोग प्राप्त होता है। इस प्रकार की राज सत्ता का सहयोग नहीं
जनसम्पर्क जनसम्पर्क का महत्त्व नहीं लाभ के लिये जनसम्पर्क आवश्यक व महत्त्वपूर्ण
आचार संहिता का प्रयोग कठोरता पूर्वक पालन किया जाता है। लचीलापन लिए हुए।

लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन में समानताएँ

हेनरी फेयोल, मेरी पार्कर फौलेट, एल उर्विक आदि विद्वान लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन में अन्तर नहीं मानते हैं। इस मत के समर्थक विद्वान उन विषयों को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं जो लोक प्रशासन व निजी प्रशासन में समान हैं। हेनरी फेयोल के अनुसार “अब हमारे समक्ष कई प्रशासनिक विज्ञान नहीं हैं बल्कि एक ही है जिसे लोक प्रशासन एवं व्यक्तिगत प्रशासन में समान रूप से लागू किया जा सकता है।
योजना बनाना, संगठित करना, आदेश देना, समन्वय तथा नियंत्रण करना इत्यादि प्रक्रियाएँ सभी जगह समान हैं। अतः मैंने प्रशासन के विस्तृत अर्थ में केवल सार्वजनिक सेवाओं को ही नहीं बल्कि अन्य उद्योगों को सम्मिलित किया है। मेरी पार्कर फौलेट तथा एल. उर्विक का कहना है “गम्भीरता पूर्वक विचार करें तो यह सोचना कठिन होता है कि वह जीव रसायन (Bio-Chemistry) बैंकर्स का है , एक शरीर क्रिया विज्ञान अध्यापकों का है या एक मनोचिकित्सा विज्ञान (Psychopathology) राजनीतिज्ञों का है। किसी विशेष प्रकार के संस्थान के उद्देश्य के अनुसार प्रबन्ध कीय अथवा प्रशासनिक अध्ययन का उपविभाजन करना अधिकतर विद्वानों की दृष्टि से गलत होगा।

निश्चय ही लोक प्रशासन और निजी प्रशासन में बहुत सी बातें समान हैं। अग्रलिखित विशेषताएँ लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन में समान हैं।
  1. उद्देश्य हेतु संगठित - जिस उद्देश्य के लिये संगठन का निर्माण किया जाता है उसकी प्राप्ति हेतु दोनों ही प्रशासन संगठित रूप से (उद्देश्य प्राप्ति हेतु) प्रयास करते हैं।
  2. प्रशासन की समान तकनीकें - लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन दोनों में ही प्रशासन की समान तकनीकों का प्रयोग किया जाता है- फाइलों का रख रखाव, निस्तारण, आदेश प्रारूप, कार्य-प्रक्रियाएँ, आँकड़े उपलब्ध कराना, हिसाब-किताब रखना, रिपोर्ट तैयार करना आदि। लेखांकन (Accounts) एवं लेखा परीक्षण (Audit) के लिये समान प्रक्रियाएँ प्रयोग में ली जाती हैं।
  3. अनुसंधान एवं नवीन तकनीक - लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन दोनों के लिये अनुसंधान व नवीन तकनीकों का प्रयोग आवश्यक है। बढते उत्तरदायित्वों एवं विकास को देखते हुए दोनों ही प्रशासन नवीन सिद्धान्तों, उपकरणों व विद्याओं का सहारा लेते हैं।
  4. अधिकारियों के दायित्व - यद्यपि लोक प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी होता है तथा निजी प्रशासन उपभोक्ताओं के प्रति। तथापि दोनों ही प्रशासन के अधिकारियों का यह उत्तरदायित्व होता है कि अपने लक्ष्य प्राप्ति में संगठन के उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करें।
  5. जनसम्पर्क - आज के युग में जनसम्पर्क का महत्त्व सर्वविदित है। उपभोक्तावादी संस्कृति में निजी प्रशासन की तरह लोक प्रशासन भी जनता और उपभोक्ता के पास समस्त प्रशासनिक गतिविधियों, उपलब्धियों एवं उत्पादों को जनसम्पर्क के माध्यम से पहुँचाने का प्रयास करता है। यही वजह है कि लोक प्रशासन और निजी प्रशासन में जनसम्पर्क को पहले की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया जाने लगा है।
  6. कार्मिक व्यवस्था - लोक प्रशासन, निजी प्रशासन दोनों में ही भर्ती, प्रशिक्षण, आचार संहिता, एवं अभिप्रेरणा की आवश्यकता समान है।
  7. विकास एवं प्रगति - कोई भी प्रशासन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि वह विकासोन्मुख एवं प्रगतिशील न हो। चाहे लोक प्रशासन हो अथवा निजी प्रशासन दोनों के लिए परिवर्तित परिस्थितियों में अनुकूलन की आवश्यकता होती है। विकास एवं प्रगति के बिना लोक प्रशासन अधिक जनोपयोगी नहीं हो सकता और निजी प्रशासन अधिक लाभ प्राप्त नहीं कर सकता है।
  8. प्रशासनिक सिद्धान्त - लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन दोनों में एक सी प्रबन्धकीय तकनीकों का उपयोग किया जाता है। दोनों ही प्रशासन में योजनाएँ बनाना, संगठित करना, समन्वय करना, नियन्त्रण करना, आदेश देना, इत्यादि प्रक्रियाएँ समान रूप से पायी जाती हैं दूसरे शब्दों में लूथर गुलिक के पोस्डकोर्ब (POSDCORB) सूत्र की मान्यता लोक प्रशासन व निजी प्रशासन दोनों के लिये समान रूप से लागू होती है।
इस प्रकार दोनों प्रकार के प्रशासनों में विभिन्न क्षेत्रों में समानताएँ पायी जाती हैं। वर्तमान समय में निजीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण, कम्प्यूटर, सूचना प्रौद्योगिकी, तकनीकी विकास इत्यादि के कारण लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के मध्य समानताएँ बढ़ रही है।

लोक प्रशासन व निजी प्रशासन में असमानताएँ

लोक प्रशासन व निजी प्रशासन के मध्य अनेक बातों में समानताएँ होते हुए भी व्यापक असमानताएँ व्याप्त है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों में हरबर्ट साइमन, सर जोसिया स्टाम्प, पॉल एच. एपीलबी, नीग्रो आदि प्रमुख हैं। हरबर्ट साइमन का कथन है - जन साधारण के मन में यह धारणा रहती है कि लोक प्रशासन की प्रकृति राजनीतिक व लालफीताशाही की है जबकि व्यक्तिगत प्रशासन गैर राजनीतिक होता है।

प्रो. पॉल एच. एपल्बी ने तीन आधारों पर लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन में अन्तर किया है-
  1. लोक प्रशासन का क्षेत्र, प्रभाव, विचार अपेक्षाकृत व्यापक होता है जबकि निजी प्रशासन छोटा व कम महत्त्वपूर्ण ।
  2. लोक प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी होता है जबकि निजी प्रशासन के लिये यह आवश्यक नहीं।
  3. लोक प्रशासन का चरित्र राजनीतिक होता है जबकि निजी प्रशासन का अराजनीतिक।

साइमन ने निम्नांकित आधारों पर भेद किया है-
  1. लोक प्रशासन का स्वरूप नौकरशाही होता है जबकि निजी प्रशासन व्यापारिक।
  2. लोक प्रशासन राजनीतिक वातावरण के समीप होता है जबकि निजी प्रशासन अराजनीतिक होता है।
  3. लोक प्रशासन में लालफीताशाही पायी जाती है जबकि निजी प्रशासन इससे मुक्त होता है।

सर जोसिया स्टाम्प ने दोनों के मध्य निम्न चार आधारों पर भेद किया है-
  1. सामान्यतः लोक प्रशासन में एकरूपता पायी जाती है जबकि निजी प्रशासन में विभिन्नताएँ व्याप्त रहती हैं। 
  2. लोक प्रशासन पर बाह्य वित्तीय नियंत्रण पाया जाता है जबकि निजी प्रशासन में आन्तरिक नियंत्रण अर्थात् निजी प्रशासन के वित्तीय नियंत्रण में विधायिका हस्तक्षेप नहीं करती।
  3. लोक प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी होता है जबकि निजी प्रशासन में इसका अभाव है।
  4. लोक प्रशासन का अन्तिम उद्देश्य जनकल्याण होता है जबकि निजी प्रशासन लाभ के उद्देश्य से संचालित किया जाता है।

लोक प्रशासन और निजी प्रशासन में व्याप्त असमानताओं को निम्नांकित बिन्दुओं द्वारा अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है-
  1. विस्तृत कार्यक्षेत्र - लोक प्रशासन सरकार का कार्यकारी अंग है इसलिये इसके कार्यकरण का क्षेत्र एवं प्रभाव व्यापक होता है जबकि निजी प्रशासन का क्षेत्र, विधिक नियंत्रण का अभाव, वित्तीय संसाधनों की कमी आदि के कारण सीमित होता है।
  2. राजनीतिक स्वरूप - लोक प्रशासन का प्रमुख कार्य शासन की नीतियों की क्रियान्विति है। वह शासन के प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष नियंत्रण में कार्य करता है, अतः इसका स्वरूप राजनीतिक होता है जबकि निजी प्रशासन का स्वरूप गैर राजनीतिक होता है।
  3. उद्देश्य - लोक प्रशासन का मूल लक्ष्य जन कल्याण करना होता है । लोक प्रशासन जन सेवा की भावना से ओतप्रोत होता है तथा इसका सदैव प्रयत्न रहता है कि जनोपयोगी सेवाओं का निरन्तर विस्तार कर जन कल्याण को यथासंभव पूरा किया जाए जबकि निजी प्रशासन का उद्देश्य अधिकाधिक लाभ कमाना है।
  4. जन उत्तरदायित्व - लोक प्रशासन का अन्तिम रूप से अपने कार्यों के लिये जनता के प्रति उत्तरदायित्व होता है जबकि निजी प्रशासन में ऐसा होना आवश्यक नहीं । निजी प्रशासन उपभोक्ता को केन्द्र बिन्दु मानकर कार्य करता है।
  5. प्रशासन पर नियंत्रण - लोक प्रशासन पर संविधान, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, जनता द्वारा अनेक साधनों द्वारा नियन्त्रण रखा जाता है जबकि निजी प्रशासन पर इस प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं होता है। निजी प्रशासन अपने कार्यकरण में स्वतंत्र होता है।
  6. संगठनात्मक प्रकृति - लोक प्रशासन द्वारा गम्भीर प्रकृति के कार्यों का संचालन किया जाता है अतः उसके संगठनों का आकार विस्तृत व जटिल प्रकृति का होता है जबकि निजी प्रशासन तुलनात्मक रूप से छोटे एवं सरल होते हैं।
  7. एकाधिकारिक क्षेत्र - कुछ कार्य क्षेत्र ऐसे होते हैं जिनके संचालन एवं नियंत्रण का एकाधिकार लोक प्रशासन को होता है तथा निजी प्रशासन को इन क्षेत्रों में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती है जैसे – रक्षा संबंधी क्षेत्र।
  8. कठोर पदसोपानिक व्यवस्था - लोक प्रशासन में कार्य करने वाले लोक सेवकों पर अनेक राजनीतिक व आधिकारिक नियंत्रण होते हैं अर्थात् निम्न कर्मचारियों व अधिकारियों को अपने से उच्च अधिकारियों के नियंत्रण व निर्देशन में कार्य करना पड़ता है जबकि निजी प्रशासन पर इस प्रकार का कठोर पद सोपानिक नियंत्रण व निर्देशन नहीं होता है।
  9. गोपनीयता - लोक प्रशासन शीशे के मकान में रहता है अर्थात् लोक प्रशासन के सभी क्रिया-कलापों, गतिविधियों के बारे में आम जन को जानने का अधिकार है तथापि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कुछ कार्य ऐसे हैं, जिन्हे गोपनीय रखा जा सकता है। लेकिन निजी प्रशासन के अधिकाँश कार्य गोपनीय होते हैं।
  10. श्रेष्ठ नियोक्ता - राज्य की श्रेष्ठ नियोक्ता की अवधारणा के अन्तर्गत लोक सेवक, निजी कार्मिकों की अपेक्षा अच्छा वेतन, उन्नत सेवा शर्ते, प्रतिष्ठित सामाजिक मान्यता एवं अच्छी कार्य की दशाएँ पाते हैं।
  11. वित्तीय नियंत्रण - लोक प्रशासन पर बाह्य वित्तीय नियंत्रण पाया जाता है वित्त पर संसदीय नियंत्रण होता है तथा बिना सदन की अनुमति के लोक प्रशासन आय–व्यय नहीं कर सकता क्योंकि जनता के धन पर जनता का ही परोक्ष नियंत्रण रहता है। जबकि निजी प्रशासन पर इस प्रकार का कोई संसदीय नियंत्रण नहीं होता है, केवल आन्तरिक वित्तीय नियंत्रण होता है जो संचालक, नियंत्रक, स्वामित्वधारी के पूर्णतया नियंत्रण में होता है।
  12. राष्ट्र निर्माण में योगदान - लोक प्रशासन का अन्तिम ध्येय जनता का हित है अतः लोक प्रशासन विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न गतिविधियों से राष्ट्र निर्माण में सर्वोच्च योगदान करता है। यद्यपि निजी प्रशासन भी ऐसा करता है लेकिन सीमित या मर्यादित क्षेत्र तक।
  13. नौकरशाही - लोक प्रशासन में नौकरशाही के दोष यथा - लालफीताशाही, कठोरता, कार्य करने में अत्यधिक औपचारिकताएँ, कार्य में विलम्ब, आदि सर्वत्र पाये जाते हैं। इसके विपरीत प्रायः निजी प्रशासन कुशल, स्वतंत्र व लचीलापन लिए होता है।
  14. व्यवहार में असमानता - निजी प्रशासन में व्यवहार की असमानता पायी जाती है। निजी प्रशासन सभी लोगों के साथ एक समान व्यवहार नही करता जबकि लोक प्रशासन में सभी लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाता है। सरकारी प्रशासन में असमान व्यवहार जनता में आक्रोश व असंतोष को बढ़ावा दे सकता है जबकि निजी प्रशासन में असमान व्यवहार प्रायः स्वीकृत एवं मान्य मान लिया जाता है।
  15. कार्य कुशलता - लोक प्रशासन में निजी प्रशासन की अपेक्षा कार्य कुशलता कम पायी जाती है। निजी प्रशासन का मुख्य ध्येय लाभ की प्राप्ति है अतः पूरा ध्येय न्यूनतम व्यय पर अधिकतम उत्पादन का रहता है जबकि लोक प्रशासन जन कल्याण को देख कर क्रियाशील रहता है।
  16. कानूनों व नियमों से आबद्ध - लोक प्रशासन संवैधानिक एवं वैधानिक कानूनों से आबद्ध होता है। लोक प्रशासन कानूनों व नियमों से हटकर कार्य नही कर सकता है क्योंकि प्रत्येक कार्य के निर्धारित नियम व उपनियम होते है जबकि निजी प्रशासन का न तो कोई संवैधानिक आधार है और न ही कोई बाध्यकारी कानून।
  17. परिवर्तनोन्मुखी - निजी प्रशासन दिन-प्रतिदिन प्रतिस्पट " का सामना करता है। अतः परिवर्तित परिस्थितियों के अनुरूप संगठन, संरचनाओं, कार्यक्रमों, उद्देश्यों एवं गतिविधियों में आवश्यक परिवर्तन कर समय के अनुरूप क्रियाशील रहता है जबकि लोक प्रशासन में समय के अनुरूप परिवर्तन न केवल शनैः शनैः होते हैं बल्कि विलम्ब से भी।
  18. सेवाओं के स्थायित्व में अन्तर - लोक प्रशासन में कार्यरत पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों के पद स्थायी होते हैं । बिना उचित प्रक्रिया के, बिना अभियोग चलाए तथा अपना मत रखने के अवसर दिये बिना अधिकारियों व कर्मचारियों को उनकी सेवा से मुक्त नहीं किया जा सकता। जबकि निजी प्रशासन में पद अस्थायी होते हैं। मालिक की इच्छानुसार ही कार्मिक अपने पद पर बना रहता है एवं उसकी इच्छा से पद मुक्त किया जा सकता है।
  19. राज सत्ता के आधार पर - लोक प्रशासन को अपने कार्यों को पूर्ण करने के लिए संविधान, सेना, पुलिस, न्यायालय आदि विधिक सत्ता द्वारा आवश्यक सहयोग प्रदान किया जाता है जबकि निजी प्रशासन को अपने कार्यों के लिए इस प्रकार की राजसत्ता प्राप्त नहीं है वह केवल कुशलता एवं व्यावहारशीलता से समाज में अपने कार्यों को अंजाम देता है।
  20. जनसम्पर्क के आधार पर - लोक प्रशासन में जन-सम्पर्क को उतना अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता है जितना कि निजी प्रशासन में। लोक प्रशासन का मुख्य ध्येय लोक कल्याण है न कि जनसम्पर्क इसी मान्यता के आधार पर लोक प्रशासन में जन सम्पर्क इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि निजी लाभ के लिए निजी प्रशासन में।
  21. आचार संहिता का पालन - निजी प्रशासन व लोक प्रशासन के मध्य आचार संहिता को लागू करने में भी अन्तर पाया जाता है। लोक प्रशासन में कठोरता पूर्वक आचार संहिता को क्रियान्वित किया जाता है, साथ ही नैतिकता एवं मूल्यों का न्यूनतम स्तर बनाये रखना अनिवार्य होता है, जबकि निजी प्रशासन नैतिकता एवं मूल्यों के बन्धनों से मुक्त रहता है जैसे जिस प्रकार के विज्ञापन, निजी प्रशासन द्वारा दिये जाते हैं वैसे लोक प्रशासन द्वारा नहीं दिये जा सकते हैं।
इसके अतिरिक्त संविधान का प्रभाव, सेवा भावना, परिवर्तित परिस्थितियों में अनुकूलन की स्थिति आदि के आधार पर लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन में विभेद किया जा सकता है।

निष्कर्ष

लोक प्रशासन व निजी प्रशासन में उपर्युक्त आधारों पर असमानताएँ देखी जा सकती हैं। दोनों प्रशासनों के मध्य अन्तर केवल मात्रात्मक है, गुणात्मक एवं प्रकारात्मक नहीं। दोनों की सत्ता एक ही है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, दोनों को पृथक् नहीं किया जा सकता। कई बातें दोनों प्रशासनों में समान दिखाई देती हैं। वर्तमान में अनेक विद्वान ऐसे हैं जो दोनों के मध्य समानताओं को अधिक महत्त्व देते हैं। हेनरी फेयोल का कथन उपयुक्त प्रतीत होता है कि सभी प्रकार के प्रशासनों को योजना, संगठन, आदेश, समन्वय, एवं नियंत्रण की आवश्यकता होती है और अपना कार्य भली भाँति सम्पन्न करने के लिये सभी को एक जैसे सामान्य सिद्धान्तों का पालन करना होता है।
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