प्रथम विश्व युद्ध - कारण, परिणाम, प्रभाव | pratham vishwa yudh

प्रथम विश्वयुद्ध

प्रथम विश्वयुद्ध विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। यह एक ऐसी घटना थी जब एक यूरोपीय युद्ध विश्वयुद्ध में परिवर्तित हो गई। इस युद्ध की पृष्ठभूमि में अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति, साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता, शस्त्रों की होड़, उग्र राष्ट्रवाद, ऑस्ट्रिया के राजकुमार फर्डीनेंड की सेराजेवों में हत्या आदि तत्त्व थे।
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इस युद्ध में जितनी अधिक धन-जन की बर्बादी हुई उतनी मानव इतिहास में इससे पूर्व नहीं हुई थी। इससे पूर्व की लड़ाईयों में गैर-सैनिक जनता साधारणतया शामिल नहीं होती थी तथा जान की हानि आमतौर पर युद्धरत् सेनाओं को उठानी पड़ती थी। 1914 के इस विश्वयुद्ध का क्षेत्र सर्वव्यापी था एवं इस युद्ध में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर विश्व के लगभग सभी देश सम्मिलित हुए।
इस युद्ध में यूरोप, एशिया, अफ्रीका तथा प्रशांत क्षेत्र में लड़ाईयां लड़ी गई थी। इसके अभूतपूर्ण विस्तार एवं सर्वागीण प्रकृति के कारण ही इसे प्रथम विश्वयुद्ध कहा गया। यह विश्वयुद्ध 28 जुलाई, 1914 से 11 नवंबर, 1918 तक चला था।

प्रथम विश्वयुद्ध के कारण


यूरोपीय कूटनीतिक व्यवस्था
1871 ई. में जर्मनी के एकीकरण के पश्चात् बिस्मार्क द्वारा यह घोषणा की गई थी कि जर्मनी एक संतुष्ट राष्ट्र है एवं वह क्षेत्रीय विस्तार के संबंध में कोई इच्छा नहीं रखता है। इसके बावजूद उसने फ्रांस से अल्सास लॉरेन का क्षेत्र लेकर उसे आहत कर दिया और यह वही बिन्दु है जिस पर जर्मनी को हमेशा यह भय बना रहता था कि फ्रांस यूरोप में दूसरे देशों के साथ मित्रता स्थापित कर जर्मनी के खिलाफ बदले की कार्रवाई न कर दे। इसी कारण, बिस्मार्क अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फ्रांस को अलग-थलग अथवा एकाकी रखने के लिए कूटनीतिक जाल बुनने लगा। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर उसने 1879 ई. में ऑस्ट्रिया के साथ द्वैध संधि की जो एक गुप्त संधि थी। 1882 में इटली ने द्वैध संधि में शामिल होकर इसे त्रिवर्गीय संधि का रूप प्रदान किया। बिस्मार्क की यह कोशिश भी रही कि रूस के साथ सम्यक संबंध कायम हो इसलिए 1871, 1881 तथा 1887 में उसने रूस के साथ संधि कर उसे अपने पक्ष में मिलाए रखा। इस प्रकार बिस्मार्क की यह हरसंभव कोशिश रही कि फ्रांस को मित्रहीन बनाए रखा जाय और वह इसमें सफल भी रहा। परन्तु, 1890 में बिस्मार्क के चासंलर पद से हटने के बाद जर्मन सम्राट उसके इस विरासत को संभाल पाने में सफल नहीं रहे। 1894 में फ्रांस ने अततः रूस से मित्रता कर ली। 1907 में इंग्लैंड, फ्रांस तथा रूस ने आपस में समझौता कर इसे त्रिवर्गीय मैत्री संघ का रूप दिया। इस प्रकार यूरोपीय देशों में जबर्दस्त गुटबाजी का दौर चल पड़ा। सभी साम्राज्यवादी देशों ने अपने-अपने हितों को साधने के लिए गुटबाजी का प्रयास किया एवं आपस में गुप्त संधियां की। इन विभिन्न यूरोपीय देशों के इन कृत्यों से यूरोप में शंका का वातावरण व्याप्त हो गया। इस प्रकार इन दोनों गुटों में प्रतिद्वंद्विता एवं तनाव बढ़ता गया तथा प्रथम विश्वयुद्ध में दोनों गुट एक-दूसरे के विरूद्ध लड़ने में संलग्न हो गए।

साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता
यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता प्रथम विश्वयुद्ध का एक-दूसरा मौलिक कारण स्वीकार किया जाता है। 19वीं शताब्दी के अंत में यूरोप के लिए यह एक बड़ी समस्या सामने आयी। 1870 के दशक में नवीन साम्राज्यवाद का युग प्रारंभ हुआ। जर्मनी एवं इटली के एकीकरण के पूर्व ही विभिन्न यूरोपीय देशों द्वारा विभिन्न एशियाई तथा अफ्रीकी क्षेत्रों में उभरे एवं इन्हें उपनिवेशों की आवश्यकता पड़ी। वस्तुतः जब तक बिस्मार्क जर्मनी का चासंलर रहा तब तक तो वह साम्राज्यवादी युद्धों पर अंकुश लगाए रखा। परन्तु, उसके पश्चात् जर्मन सम्राट द्वारा यह प्रसिद्ध घोषणा की गई कि "जर्मनी को भी सूर्य के नीचे जगह चाहिए।" अर्थात् इसका अभिप्राय था-उपनिवेशों की प्राप्ति तथा इसकी प्राप्ति हेतु साम्राज्यवादी नीति को अपनाना।
पहले से स्थापित साम्राज्यवादी देशों के गुट में तीन नए देशों जर्मनी, इटली एवं जापान के शामिल हो जाने से स्वाभाविक रूप से साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता में तीव्रता आई। इससे साम्राज्यवादी शक्तियों के मध्य अफ्रीका का बंटवारा, चीन को प्रभाव क्षेत्रों में बांटना एवं प्रशांत महासागरीय क्षेत्र के अनेकानेक द्वीपों पर अधिकार स्थापित करने की लालसा से घोर प्रतिस्पर्धा का दौर शुरू हो गया। प्रारंभ में यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों द्वारा अफ्रीका को शांतिपर्ण ढंग से आपस में बांट लेने की योजना बनाई गई एवं इसके लिए 1884 में बर्लिन सम्मेलन में कुछ निदेशक सिद्धान्त भी प्रस्तुत किए गए, परन्तु यह मापदंड लंबे समय तक नहीं चला। अफ्रीका के बंटवारे के सिलसिले में यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों के मध्य घोर संघर्ष व आपसी टकराहट की स्थिति बनी। चीन तथा प्रशांत महासागरीय द्वीप नव साम्राज्यवाद का दूसरा क्षेत्र था। यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों ने चीन की कमजोरी का लाभ उठाकर उसको विभिन्न प्रभाव क्षेत्रों में बांट लिया एवं अनेक सुविधाएं प्राप्त कर ली। इस स्थिति में चीन की स्वतंत्र स्थिति लगभग समाप्त हो गई।
1894-95 में चीन एवं जापान के युद्ध के परिणामस्वरूप जापान द्वारा चीन के कुछ भू-भाग जीत लिये गए। जापानी प्रसार की इस नीति से रूस के साथ टकराव अवश्यंभावी हो गया। 1904-05 का रूस-जापान युद्ध इस टकराहट का ही प्रतिफल था जिसमें जापान ने रूस को पराजित कर अपनी साम्राज्यवादी उद्देश्य की नींव मजबूत कर ली। रूस-जापान के इस युद्ध ने यूरोपीय राजनीति को भी प्रभावित किया एवं यूरोप का वातावरण तनावपूर्ण हो गया।
बाल्कन प्रायद्वीप साम्राज्यवाद का तीसरा एवं सबसे भयंकर क्षेत्र था। इस क्षेत्र में तुर्की, रूस एवं ऑस्ट्रिया के हित टकराते थे। चूंकि संपूर्ण बाल्कन क्षेत्र विशाल तुर्की साम्राज्य का ही विस्तार था एंव रूस तथा ऑस्ट्रिया दोनों ही इस क्षेत्र से तुर्की आधिपत्य को समाप्त कर अपना-अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे। अतः इस क्षेत्र में ऑस्ट्रिया एवं रूस एक-दूसरे के प्रबल विरोधी के रूप में सामने आए। वस्तुतः रूस एंव ऑस्ट्रिया के मध्य हितों की यही टकराहट प्रथम विश्व युद्ध का प्रमुख कारण बना।

उग्र राष्ट्रवाद
जब विभिन्न यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों के मध्य विभिन्न मुद्दों पर टकराहट की स्थिति व्याप्त थी, उसी समय विभिन्न देशों में उग्र राष्ट्रवाद की विचारधारा चरमोत्कर्ष पर पहंची। फ्रांसीसी क्रांति के फलस्वरूप राष्ट्रवाद की जो भावना जागृत हुई थी, उसने प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व के संध्या पर विभिन्न राष्ट्रों के बीच आपसी टकराहट के लिए उत्प्रेरक का काम किया। वस्तुतः हम कह सकते हैं कि राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीय चेतना जर्मनी एवं इटली के एकीकरण के संबंध में सकारात्मक पक्ष को दर्शाता है परन्तु 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यह राष्ट्रवाद अपने घिनौने रूप में उभरकर आया। प्रत्येक राष्ट्र एक-दूसरे से स्वयं को सर्वोच्च रूप में दिखने का प्रयास करता था। जर्मन राष्ट्रवादी फ्रांस के विरूद्ध थे तथा फ्रांस के राष्ट्रवादी भी जर्मनी का नामोनिशान मिटाने हेतु कृतसंकल्प थे। ध्यातव्य है कि जर्मनी के एकीकरण के क्रम में बिस्मार्क ने फ्रांस की पराजय से उत्पन्न परिस्थिति का लाभ उठाकर उसके अल्सास-लॉरेन जैसे समृद्ध क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था। इस राष्ट्रीय अपमान को फ्रांस कभी भी भूल नहीं पाया और वह 1871 की अपमानजनक पराजय का बदला और अल्सास-लॉरेन क्षेत्र को पुनः प्राप्त करने हेतु व्यग्र था। ये तो रहा फ्रांस-जर्मनी के तत्कालीन कड़वाहट वाली संबंधो की बात। अब अगर हम ऑस्ट्रिया व रूस के संबंधों का विश्लेषण तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में करें तो हम पाएंगे कि बाल्कन क्षेत्र के जटिल मुद्दों एवं आपसी हित को लेकर ऑस्ट्रिया एवं रूस में गंभीर तनातनी थी। राष्ट्रीयता की चरम परिणति बाल्कन क्षेत्र में भी कुत्सित रूप में सामने आई। एक व्यवस्था के तहत बोस्निया एवं हर्जेगोविना जैसे सर्वजाति बहुल क्षेत्र ऑस्ट्रिया को दे दिया गया जबकि सर्बिया के दावे को अस्वीकार कर दिया गया। एक और पक्ष जो चुभने वाली थी वह यह कि सर्बिया के लोग स्लाव वंश के थे और रूस अखिल स्लाववाद का दुहाई देकर पूर्वी यूरोप की राजनीति में प्रभाव स्थापित करना चाहता था। राष्ट्रवाद का सबसे विकृत रूप यह था कि कुछ जातियों ने स्वयं को सर्वश्रेष्ठ जाति का होने का दावा प्रस्तुत किया। वे अन्य जातियों पर शासन स्थापित करना अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझने लगी। राष्ट्रवाद की इस आंधी में बाल्कन क्षेत्र सहित पूर्वी यूरोप की कुछ अन्य जातियों जैसे बुल्गर, चेक, पोल, सर्व, स्लाव आदि अपने स्वतंत्र राष्ट्र की इच्छा को प्रबलता से प्राप्त करने के लिए उत्तेजित हुई।

सैन्यवाद
प्रत्यक्ष रूप से सैन्यवाद विभिन्न यूरोपीय साम्राज्यवाद देशों के मध्य होने वाले गुप्त संधियों से जुड़ा हुआ था। इन विभिन्न देशों के मध्य होने वाली गुप्त संधियों ने एक-दूसरे के प्रतिशंका एवं अविश्वास की खाई उत्पन्न कर दी और यही वह तत्त्व था जिसके कारण एक-दूसरे देशों के साथ युद्ध की आंशका बढ़ी। औपनिवेशिक विस्तार तथा उपनिवेशों की रक्षा के लिए सैन्यवाद को प्रश्रय देना विभिन्न साम्राज्यवादी देशों की महती आवश्यकता एवं मजबूरी भी थी।
फ्रांसीसी क्रांति (1789) के परिणामस्वरूप सैन्यवाद का जन्म हुआ तथा जर्मनी-इटली के एकीकरण तक सैन्यवाद अपने विकसित स्तर को प्राप्त कर चुका था। सैनिक शक्ति की आवश्यकता को देखते हुए विभिन्न देशों में सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी गई। सैन्य शक्ति में वृद्धि राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का पर्याय बन गया। यूरोपीय देशों के बीच अस्त्र-शस्त्र एवं सैनिकों की संख्या बढ़ाने की होड़ ने गंभीर सैन्य वातावरण का रूप ले लिया। यह समय एक तरीके से अंतर्राष्ट्रीय अराजकता का समय था और इस समय ऐसे वातावरण का निर्माण हुआ जिससे ऐसा लग रहा था कि अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान सिर्फ सैनिक शक्तियों के बल पर ही संभव है। सैन्य अधिकारियों का प्रभाव व्यापक रूप से देश की राजनीति पर था। नीति निर्माण एवं निर्णय कार्यों में उनकी भूमिका बढ़-चढ़कर होती थी। ऐसी स्थिति में जब संकट उत्पन्न होता तो इन सैन्य अधिकारियों द्वारा असैन्य अधिकारियों पर इस बातों का दबाव देकर युद्ध शुरू करने की स्वीकृति ले ली जाती कि थी सामरिक स्थिति नियंत्रण में रहेगी।

समाचारपत्रों की भूमिका
विभिन्न यूरोपीय देशों के मध्य प्रकाशित होने वाले समाचारपत्रों ने विभिन्न देशों के बारे में दुष्प्रचार कर युद्ध के वातावरण को विषावत कर दिया। राष्ट्रीय उन्माद एवं उत्तेजना बढ़ाने में ये विभिन्न समाचारपत्र प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। यद्यपि 18वीं एवं 19वी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षो में जनमत का महत्त्व नगण्य ही था, परन्तु 1830 एवं 1848 की फ्रांसीसी क्रांति एवं उसके परिणामस्वरूप यूरोप में आई राजनीतिक चेतना और इटली एवं जर्मनी के एकीकरण में समाचारपत्रों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। अब किसी राजनीतिक घटना का प्रभाव उस देश के न सिर्फ शासन एवं प्रशासन से संबंद्ध लोगों पर पड़ता था वरन् वहां की जनता भी उस घटना से अपने को संबद्ध कर लेती थी एवं उस पर अपनी प्रतिक्रिया देती थी। वस्तुतः 1871 के बाद फ्रांस का जनमत जर्मनी के विरूद्ध तथा बोस्निया, हर्जेगोबिना एवं सर्बिया की जनता ऑस्ट्रिया के विरूद्ध जबकि रूस की जनता स्लाव जाति के होने के कारण बाल्कन देशों के साथ थी। 1890 के बाद जब जर्मनी ने साम्राज्यवादी नीति को अपनाया तब ब्रिटेन की जनता जर्मनी को अपना शत्रु समझने लगी, क्योंकि जर्मनी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मार्ग में रोड़ा अटकाने लगा था और इस घटना में समाचारों ने जनमत को उत्तेजित किया। इस तरह समाचारपत्रों ने विभिन्न देशों में दूसरे देश के विरूद्ध जनमत तैयार किया।

अंतर्राष्ट्रीय अराजकतापूर्ण स्थिति
बिस्मार्क द्वारा जिस कूटनीतिक जाल को बुनने की परंपरा शुरू की गई थी वह बिल्कुल गुप्त संधियों पर आधारित थी, जिसके परिणामस्वरूप समस्त यूरोप में शंका तथा भय का वातावरण व्याप्त हो गया। अपने स्वाथों की पूर्ति के लिए किसी भी यूरोपीय देशों को संधि की शर्तो की अवहेलना करने में थोड़ी-सी भी हिचक नहीं होती थीं। 1878 में हुए बर्लिन कांग्रेस के पश्चात् रूस जर्मनी से सख्त नफरत करता था। परन्तु, इसके बावजूद भी रूस जर्मनी से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने का वादा करता रहा। इसी तरह एक तरफ जर्मनी ऑस्ट्रिया के हितों की रक्षा की बात करता रहा एवं रूस से भी 1890 तक मित्रता बनाने की बात पर दृढ़-संकल्प रहा। वस्तुतः सैद्धांतिक तौर पर ब्रिटेन फ्रांस से मित्रता की बात नहीं करता था लेकिन अपने साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए जर्मनी के विरूद्ध मित्र की खोज कर रहा था। इटली जर्मनी एंव ऑस्ट्रिया के साथ रहते हुए भी अपने स्वार्थो की पूर्ति हेतु दूसरे गुट के संपर्क में था जिसका खुलासा युद्ध प्रारंभ होने के बाद तब सामने आया जब वह त्रिवर्गीय मैत्री संघ में शामिल हो गया। इन सभी तथ्यों के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व यूरोपीय देशों में अजराजकता फैली हुई थी, जिसमें संधि की शर्तो की अवहेलना तथा मैत्रीपूर्ण संबंध के बावजूद शत्रुवत् षड्यंत्र करना सामान्य बात हो गई थी।

बाल्कन क्षेत्र की जटिलता
बाल्कन क्षेत्र के अन्तर्गत रूस की तनातनी एवं विभिन्न जातियों के बीच विकसित हुई उग्र राष्ट्रवाद से उत्पन्न समस्याओं ने समस्त बाल्कन क्षेत्र के वातावरण को विषावत कर दिया था। बाल्कन क्षेत्र की जटिल समस्या ने त्रिवर्गीय संधि एवं त्रिवर्गीय मैत्री संघ के सदस्यों को आमने-सामने खड़ा कर दिया। वास्तव में एक ओर रूस यदि धर्म एवं जाति के नाम पर स्वयं को स्लाव जाति का सरंक्षक समझता था और अखिल स्लाव आंदोलन को बढ़ावा दे रहा था, तो दूसरी और ऑस्ट्रिया हर हाल में सर्वआंदोलन को दबाकर इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। यद्यपि ये बातें इतनी विषावत नहीं होती यदि सर्बिया को रूस से सहायता की गारंटी नहीं मिली होती एवं रूस की पीठ पर फ्रांस तथा ब्रिटेन के समर्थन की बात नहीं होती। इसी तरह ऑस्ट्रिया भी यदि अकेला होता तो बाल्कन क्षेत्र में युद्ध लड़ने का साहस नहीं करता, परन्तु उसे भी जर्मनी एवं इटली का समर्थन था। इसलिए यह कहना बिल्कल सच है कि प्रथम विश्वयुद्ध दो घोड़ों (सर्बिया एवं ऑस्ट्रिया) का युद्ध था, घुडसवार बाद में इस युद्ध में शामिल हुए।

तात्कालिक कारण (सेराजेवो हत्याकांड)
बोस्निया की राजधानी सेराजेवो में ऑस्ट्रियाई राजकुमार फर्डीनेण्ड हत्या ने बारूद के ढेर को चिंगारी लगा दी और स्थिति विस्फोटक हो गई। ध्यातव्य है कि ऑस्ट्रिया ने 1908 में बोस्निया एवं हर्जेगोविना नामक दो सर्व बहुल प्रांतों पर अधिकार कर लिया था। फलतः राष्ट्रवादी भावना से ओत-प्रोत सर्बिया इन सर्व बहुल क्षेत्र को ऑस्ट्रिया के चुंगल से छुडाना चाहता था। इन क्षेत्रों में अस्ट्रियाई शासन के खिलाफ बोस्निया-हर्जेगोविना प्रान्तों में आतंकवादी आंदोलन का एक लंबा सिलसिला शुरू हुआ। सर्बिया के निर्देश पर कुछ सर्व आंतकवादियों द्वारा ऑस्ट्रिया के युवराज फर्डीनेण्ड की हत्या कर दी गई। ऑस्ट्रियाई सरकार इसके लिए सर्बिया को दोषी मानती थी एंव इस हत्या के लिए सर्बिया को जवाब-तलब किया। सर्बिया के तरफ से जब संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो ऑस्ट्रिया ने 28 जुलाई, 1914 को सर्बिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। रूस तुंरत सर्बिया की मदद के लिए युद्ध में शामिल हो गया। फिर, जर्मनी एवं फ्रांस भी अपने-अपने मित्र राज्यों का पक्ष लेते हए युद्ध में शामिल हो गए। साथ ही, जब जर्मनी ने बेल्जियम पर आक्रमण किया तो अपने ऊपर खतरा देखकर ब्रिटेन ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस तरह पहली बार विश्वयुद्ध का श्रीगणेश हुआ, जिसमें विश्व के प्रायः सभी देश प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में शामिल हुए।

प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व ऑस्ट्रिया

19वीं सदी के 5वे दशक तक ऑस्ट्रिया-रूस संबंध काफी सौहार्द्रपूर्ण थे। इस अवधि में दोनों शक्तियों ने आपसी सहयोग से नेपोलियन को पराजित किया एवं 1815 के वियना कांग्रेस के पश्चात् 1848 तक अर्थात् मेटरनिख युग तक दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंध था। परन्तु, क्रीमिया युद्ध (1853-56) के क्रम में दोनों देशों के प्रगाढ़ संबंध को जबर्दस्त धक्का लगा। युद्ध में ऑस्ट्रिया ने खुलेआम रूस विरोधी दृष्टिकोण अपनाया था।
ऑस्ट्रिया की इस कृतघ्नता को रूस कभी नहीं भूल पाया और जब 1866 ई. में ऑस्ट्रिया-प्रशा युद्ध हुआ तो रूस ने स्पष्टतः ऑस्ट्रिया विरोधी रूख अपनाया।

इटली एवं जर्मनी के एकीकरण के फलस्वरूप ऑस्ट्रिया के प्रभाव में कमी आई। ऑस्ट्रिया मूलतः एक साम्राज्यवादी देश था, अतः इटली एंव जर्मनी में समाप्त हुए उसके प्रभाव की भरपाई को कोई विकल्प आवश्यक था। दूसरे शब्दों में, ऑस्ट्रिया के लिए अब एकमात्र क्षेत्र बाल्कन प्रायद्वीप ही था जहां उसकी साम्राज्यवादी लिप्सा पूरी हो सकती थी। अतः 1870 के पश्चात् ऑस्ट्रियाई विदेश नीति मूल रूप में बाल्कन की प्रायद्वीप की ओर बढ़ने पर केन्द्रित हो गई। उधर रूस भी इस क्षेत्र में अपने विस्तार की योजना बनाये हुए था। बाल्कन क्षेत्र में विभिन्न जातियां जैसे बुल्गर, पोल, चेक, सर्व, यूनानी आदि निवास करती थी। इन सभी जातियों में राष्ट्रवाद की प्रबल भावना विकसित हुई और ये ऑटोमन साम्राज्य के अधीन न रहकर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करना चाहते थे। कुल मिलाकर इस क्षेत्र में ऑटोमन साम्राज्य की कमजोर पकड़ के कारण अशांति की स्थिति थी। ऑटोमन साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर रूस इस क्षेत्र में बढ़ने का प्रयास कर रहा था तथा उसका एकमात्र उद्देश्य बाल्कन क्षेत्र को पूर्णरूपेण रूसी प्रभाव क्षेत्र में परिवर्तित कर देना था बाल्कन क्षेत्र के प्रायः सभी लोग स्लाव प्रजाति एंव ग्रीक चर्च के अनुयायी थे तथा रूसी लोग भी स्लाव एवं ग्रीक चर्च के ही अनुयायी थे। अर्थात् रूस एवं बाल्कन क्षेत्र के निवासियों के बीच गहरा प्रजातीय एवं धार्मिक संबंध था। यही धर्म एवं प्रजाति नामक तत्त्व था जिसकी आड़ में रूस उन सभी परिस्थितियों को खड़ा कर रहा था जो उसकी विस्तारवादी नीति के मार्ग में सहायक होता। बाल्कन क्षेत्र की इस स्थिति ने ऑस्ट्रिया-रूस के हितों में प्रत्यक्ष टकराहट को बढ़ावा दिया।

बाल्कन क्षेत्र में अपने हितों को साधने हेतु रूस के निर्देश पर एक सर्व स्लाव आंदोलन चला, जिसका उद्देश्य बाल्कन के सभी स्लावों को एकता के सूत्र में आबद्ध करके तुर्की की दासता से मुक्त करना था। इस सर्व स्लाव आंदोलन ने शीध्र ही तूल पकड़ लिया तथा बाल्कन क्षेत्र के निवासी ऑटोमन शासन के विरूद्ध विद्रोह करने लगे। इस विद्रोह को दबाने के लिए तुर्की सत्ता (ऑटोमन शासक) ने एड़ी-चोटी एक कर दी। फलतः रूस एवं तुर्की के मध्य संघर्ष हुआ जिसमें रूस विजयी रहा और दोनों के बीच 'सन स्टीफानों की संधि' हुई। इस संधि से बाल्कन क्षेत्र में तुर्की साम्राज्य लगभग समाप्त हो गया एवं रूस का व्यापक प्रभाव बढ़ा। यह स्थिति ऑस्ट्रिया एवं ब्रिटेन के लिए असहनीय था। अतः इन दोनों ने सन स्टीफानों की संधि का विरोध किया। घटनाक्रम ने विभिन्न मोड़ लिए और अंततः सम्मेलन का आधार तैयार हुआ। इस सम्मेलन में बाल्कन क्षेत्र से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण बातें सामने आई।

इसमें एक महत्त्वपूर्ण निर्णयों के तहत बोस्निया एवं हर्जेगोविना नामक सर्व बहुल प्रांत को अधिकृत करने एवं उनपर शासन करने का अधिकार ऑस्ट्रिया को मिला जबकि सर्बिया स्वयं को सर्व जाति का पैतृक प्रतिनिधित्व मानता था और इन सर्व बहुल दोनों प्रांतों को अपने अधीन होने की इच्छा रखता था। परन्तु इस सम्मेलन में सर्बिया की मांग को ठुकरा दिया गया। इस व्यवस्था ने भविष्य में रूस एवं ऑस्ट्रिया के टकराव को अवश्यभावी बना दिया।

प्रथम विश्वयुद्ध की पूर्व संध्या पर बाल्कन क्षेत्र की जटिल समस्या ने गंभीर रूप ले लिया। किसी भी हालत में सर्बिया बर्लिन व्यवस्था को स्वीकार करते हेतु तैयार नहीं था और सर्वस्लावाद के रूसी कर्णाधार इस बात को ठीक से समझते थे कि स्लाव एवं ट्यूटोनिक जातियों के बीच संघर्ष अवश्यंभावी है और रूस को इसके लिए तैयार रहना है। इस परिस्थिति में सर्बिया ने यह निश्चित कर लिया कि किसी भी काम पर उसे अपने स्र्वेजातियों को मुक्त कराना है। इसके लिए सर्बिया ने रूस के सरंक्षण में रहते हुए पराधीन स्लावों को संगठित करना शुरू किया ताकि उनमें विद्रोह की भावना फैलाकर उन्हें ऑस्ट्रिया से मुक्त किया जा सका। ऐसी स्थिति में अक्टूबर, 1908 में ऑस्ट्रिया द्वारा बोस्निया एवं हर्जेगोविना नामक प्रांतों को अधिकृत कर लिया गया। फलतः स्थिति गंभीर होती गई। इस हालात में रूस एवं सर्बिया का प्रोत्साहन पाकर सर्व देशभक्तों ने उग्र एवं आतंकवादी उपायों का सहारा लिया तथा गुप्त संगठनों के माध्यम से ऑस्ट्रियाई पदाधिकारियों की हत्या की जाने लगी। इन कार्रवाईयो से आंतक का वातावरण व्याप्त हो गया। इसी तनाव के वातावरण में बोस्निया की राजधानी सेराजेवी में ऑस्ट्रियाई राजकुमार फैडीनेण्ट की हत्या कर दी गई। जिसमें इन्हीं सर्व आतंकवादियों की भूमिका थी।
फलतः ऑस्ट्रिया के लिए स्थिति बर्दाश्त से बाहर की चीज हो गई और अततः सर्बिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा की दी। यह युद्ध तो महज ऑस्ट्रिया एवं सर्बिया के मध्य था परन्तु इससे यूरोप की तत्कालीन सभी साम्राज्यवादी शक्तियां भिन्न रूप से जुडी हुई थी जैसे-सर्बिया के साथ रूस तथा रूस के साथ ब्रिटेन एवं फ्रांस और इसी तरह ऑस्ट्रिया से जर्मनी एवं तुर्की आदि। फलतः इस नेटवर्क से जितने भी देश जुड़े हुए थे सब एक-दूसरे गुटों के विरूद्ध युद्ध के जाल में फंस गए और इस तरह प्रथम विश्वयुद्ध की शुरूआत हो गई।

प्रथम विश्वयुद्ध की प्रमुख घटना

प्रथम विश्वयुद्ध के क्रम में 1917 में दो प्रमुख घटनाएं महत्त्वपूर्ण हैं- 
पहली, रूस में सफल बोल्शेविक क्रांति के फलस्वरूप रूस का विश्वयुद्ध से अलग हो जाना जबकि दूसरी घटना थी-अमेरिका का युद्ध में सम्मिलित होना।
1917 की क्रांति के फलस्वरूप रूस में स्थापित बोल्शेविक सत्ता ने सर्वप्रथम विश्वयुद्ध से अलग होने की घोषणा की। यद्यपि इस निर्णय की मित्रराष्ट्रों की ओर से तीखी निदा की गई, परन्तु देशहित में बोल्शेविक सरकार का यह निर्णय आवश्यक था। रूस की नई सरकार ने जर्मनी से समझौता कर 'ब्रेस्ट लिटोवस्क' की संधि की। इस संधि के अनुसार रूस ने अपने सारे पश्चिम प्रांत जर्मनी को दे दिए। इससे जर्मनी की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई। जर्मनी ने अपनी सेनाएं पश्चिमी मोर्चे पर भेज दी फलतः मित्र राष्ट्रों की स्थिति संकटपूर्ण हो गई। परन्तु, अमेरिका के युद्ध में प्रवेश करने से मित्र राष्ट्रों की स्थिति मजबूत हुई। इन्हें अमेरिका से धन एंव जन दोनों की प्राप्ति हुई। हालांकि इस युद्ध में अमेरिका शुरू में शामिल नहीं था लेकिन जब जर्मनी द्वारा अमेरिका का यात्री जहाज 'लुसीटानिया' को डूबो दिया गया तो अमेरिका को बाध्य होकर जर्मनी वाले गुट के विरूद्ध में कूदना पड़ा।
पश्चिमी मोर्चे पर स्थापित जर्मनी की प्रसिद्ध 'हिंडेनबर्ग पंक्ति' मित्रराष्ट्रों के विरूद्ध विशेष कारगर साबित नहीं हुई। जर्मनी के सभी मित्र देश एक-दूसरे कर युद्ध में पिछड़ते जा रहे थे। बाल्कन क्षेत्र के बुलगारिया, तुर्की एवं ऑस्ट्रिया-हंगरी द्वारा आत्म-समर्पण कर दिए जाने के पश्चात जर्मन नेतृत्वकर्ता कैसर विलियम ने स्थिति पर नियंत्रण की व्यापक कोशिश की लेकिन बिगडती हई जर्मनी की स्थिति के कारण विलियम ने सत्ता छोड़ दिया। अंततः जर्मनी ने घुटने टेक दिए तथा प्रथम विश्वयुद्ध का अंत हो गया।

प्रथम विश्वयुद्ध के परिणाम

  • साम्राज्य विघटन : प्रथम विश्वयुद्ध का तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि इसने जर्मनी, ऑस्ट्रिया तथा तुर्की साम्राज्यों को छिन्न-भिन्न कर दिया। फलतः यूरोप में अनेक नए देश अस्तित्व में आए, जैसे-यूगोस्लाविया, हंगरी, रोमानिया आदि।
  • निरंकुश शासकों का अंत एवं गणराज्यों की स्थापना : युद्ध के दौरान ही रूस में साम्यवादी क्रांति हुई जिसके कारण वहां जारशाही का अंत हो गया और रोमोनेव राजवंश समाप्त हो गया, साथ ही युद्ध के पश्चात् जर्मनी में होहेनजोलन और ऑस्ट्रिया-हंगरी में हैप्सवर्ग राजवंश का अंत हो गया। युद्ध के सात वर्ष पश्चात् तुर्की के निरंकुश शासन का भी अंत हो गया। अतः हम प्रथम विश्वयुद्ध को एक क्रांति के रूप में देख सकते हैं, जिसने विभिन्न निरंकुश राजवंशों का अंत कर दिया। युद्ध के पश्चात् यूरोप के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अस्तित्व में आई जैसे-रूस, जर्मनी, पोलैण्ड, ऑस्ट्रिया, लिथुआनिया, लाटविया, चेकोस्लोवाकिया, फिनलैंड आदि।
  • रूसी क्रांति : प्रथम विश्वयुद्ध के 6 देशों में ही रूस में सफल बोल्शेविक क्रांति हुई एवं वहां साम्यवादी सरकार सत्ता में आई। यह क्रांति साम्राज्यवाद की जबर्दस्त विरोधी थी। वास्तव में यह सरकार परतंत्र जातियों को वैचारिक स्तर पर मदद की पक्षधर थी। स्वाभाविक रूप से पूंजीवादी देश इसके विरोधी के रूप में सामने आए। परन्तु, सभी परतंत्र जातियां अपनी स्वाधीनता हेतु सोवियत संघ की ओर आकृष्ट हुई।
  • अधिनायकवाद का उदय : युद्धकाल में युद्ध को भलीभांति संचालित करने हेतु यूरोपीय देशों की सरकारें काफी शक्तिशाली रूप में उभरी। युद्ध पश्चात् की परिस्थिति हेतु यह शक्ति और भी आवश्यक समझी जाने लगी। राजनीतिक नेता देश की भलाई, सुरक्षा, एवं उन्नति की दुहाई देकर असीम अधिकारों का उपभोग करने लगे। इसी आधार पर इटली, स्पेन, जर्मनी रूस आदि देशों में मुख्य राजनीतिक दलों का शासन स्थापित हुआ। इतना ही नहीं, इस स्थिति ने और भी परिवर्तित रूप से मुसोलिनी एवं हिटलर को आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया।
  • अमेरिका की महत्ता में वृद्धि : प्रथम विश्वयुद्ध के परिणामस्वरूप यूरोपीय देशों का प्रभुत्व समाप्त हो गया। चूंकि युद्ध में खर्च होने वाले अतिशय धन के कारण यूरोपीय देशों को संयुक्त राज्य अमेरिका से भारी मात्रा में कर्ज लेना। फलतः युद्ध पश्चात् अमेरिका का प्रभाव बढ़ गया। इससे फ्रांस, जर्मनी, इंगलैंड आदि देशों का महत्त्व एवं अमेरिका का विश्व शक्ति के रूप में उदय हुआ।
  • राष्ट्रसंघ की स्थापना : युद्ध पश्चात अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की आवश्यकता को महसूस करते हुए अंतर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई। इसकी स्थापना में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन की महान भूमिका रही।
  • वैज्ञानिक आविष्कार : युद्ध काल में कई आविष्कार हुए। यह युद्ध, केमिस्टो का युद्ध' था। अर्थात् इस युद्ध में रसायनों का व्यापक प्रयोग किया गया था। सैन्य प्रौद्योगिक के विकास ने वैज्ञानिक आविष्कार हेतु उत्प्रेरक का काम किया। हवाई जहाजों, पनडुब्बियों सहित जहरीली गैसों एवं विभिन्न औषधिायों की खोज हुई। फलतः विज्ञान के क्षेत्र में विशेष प्रगति दर्ज की गई
  • राष्ट्रीयता की विजय : युद्ध पश्चात् हुए वर्साय की संधि के तहत राष्ट्रीयता के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया। इस सिद्धान्त के आधार पर यूरोप में कुल आठ नए देशों का निर्माण हुआ जैसे-हंगरी, चेकोस्लोवाकिया. पोलैण्ड, फिनलैंड, लिथुआनिया आदि। इसके बावजूद भी विश्व में ऐसे देश थे जहां इन सिद्धान्तों को मान्यता नहीं दी गई जैसे आयरलैंड, मिस्त्र, भारत आदि जिस पर इंगलैंड का, फिलीपीन्स पर अमेरिका का एवं कोरिया पर जापान का अधिकार था। इतना ही नहीं, अफ्रीकी क्षेत्रों में यूरोपवासियों के विशाल औपनिवेशिक क्षेत्र थे। 
  • सामाजिक परिणाम : प्रथम विश्वयुद्ध के क्रम में एवं उसके पश्चात् महिलाओं की तत्कालीन स्थिति में व्यापक सुधार हुआ। युद्ध में सैनिक कार्यो में पुरूषों की भागीदारी के कारण कृषि, उद्योग एवं विभिन्न व्यवसायों में पुरूषों की कमी हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि इन कार्य क्षेत्रों में स्त्रियों की सहभागिता में व्यापक वृद्धि हुई। युद्ध पश्चात् महिलाओं को राजनैतिक अधिकार भी मिले जिसका एक प्रमुख उदाहरण था इंगलैंड में 1918 में 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को मताधिकार मिला। विश्वयुद्ध के फलस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक समानता का विकास हुआ। युद्धकाल में अनेक देशों के लोग रंग एवं नस्ली भेदभाव से ऊपर उठकर साथ-साथ लड़े थे। फलतः तीव्र जातीय कटुता में कमी आना स्वाभाविक था। इसके अलावा युद्ध के पश्चात् राजनीति में सर्वहारा का महत्त्व काफी बढ़ गया, क्योंकि युद्ध के क्रम में मजदूरों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इसी परिप्रेक्ष्य में समाजवादी विचारधारा का उदय तथा विकास हुआ। युद्धकाल में महत्त्वपूर्ण उद्योगों को सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया और इस रूप में राजकीय समाजवादी विचारधारा का प्रसार किया। श्रमिकों द्वारा श्रमिक हित की प्राप्ति हेतु कतिपय प्रयास किए गए। अनेक श्रमिक संगठन बने। यह एक ऐसी प्रवृत्ति थी जो राष्ट्रसंघ 'अतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन' के रूप में सामने आई। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रमिकों के कल्याण जैसे विषयों पर केन्द्रित था।
विश्वयुद्ध के पश्चात् शिक्षा के क्षेत्र में भी व्यापक विस्तार दर्ज किया गया। इसके अंतर्गत ब्रिटेन में प्राथमिक शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए। 14 वर्ष की आयु वर्ग तक के बच्चों को शिक्षा देना आवश्यक कर दिया गया। इसी तरह फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान आदि जैसे देशों में भी शिक्षा के चहुमुखी विकास पर विशेष ध्यान दिया गया।

प्रथम विश्व युद्ध के आर्थिक परिणाम

युद्धकाल में अनेक उद्योग नष्ट हो गए। भयंकर गोलीबारी से धन एवं जन की व्यापक क्षति हुई। युद्धकाल में स्थापित किए गए सैन्य-सामग्री आधारित उद्योग युद्धोपरांत बन्द कर दिए गए। फलतः बेकारी की समस्या उत्पन्न हुई। वाणिज्य एवं व्यापार को भी धक्का लगा, चूंकि युद्धकाल में विभिन्न यूरोपीय देशों में बाहर से आयातित माल पर रोक लगा दी गई थी।

पेरिस शांति सम्मेलन, 1919
प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी एवं उसके सहयोगी देशों (ऑस्ट्रिया, हंगरी, बुल्गारिया एवं तुर्की) की पराजय हुई तथा विजयी मित्रराष्ट्रों ने युद्धोत्तर काल की व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से 1919 में पेरिस में एक शांति-सम्मेलन का आयोजन किया। वैसे तो इस सम्मेलन में सभी विजयी देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। परनतु सम्मेलन के प्रमुख निणयों में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज, फांसीसी प्रधानमंत्री क्लिमेंशू एवं इटली के आयरलैंड का ही निर्णायक प्रभाव पड़ा था। फ्रांस के विदेश मंत्रालय में शांति सम्मेलन का अधिवेशन प्रारंभ हुआ। इस सम्मेलन की अध्यक्षता फ्रांसीसी प्रधानमंत्री विलमेंशू की थी। इस सम्मेलन में पराजित धुरी राष्ट्रों से समझौता करने हेतु 5 शांति संधियों का प्रारूप तैयार किया गया। इन शांति संधियों के फलस्वरूप यूरोप का राजनीतिक व भौगोलिक मानचित्र बिल्कुल परिवर्तित हो गया तथा अनेक भावी समस्याओं की उत्पत्ति हुई।
इस सम्मेलन में जिन 5 संधियों का मसविदा तैयार किया गया, वे इस प्रकार है-
  • वर्साय की संधि (28 जून, 1919) - जर्मनी के साथ
  • सेंट जर्मेन की संधि (10 दिसंबर, 1919) - ऑस्ट्रिया के साथ
  • निउली की संधि (27 नवंबर, 1919) - बुल्गारिया के साथ
  • त्रियानो की संधि (4 जून, 1920) - हंगरी के साथ
  • सेब्रे की संधि (10 अगस्त, 1920) - तुर्की के साथ

वर्साय की संधि

मित्र राष्ट्रों द्वारा की गई सभी संधियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संधि ही थी जो जर्मनी के साथ की गई थी। चार महीने के अथक परिश्रम के पश्चात् तैयार हुई उक्त संधि का मसविदा मित्रराष्ट्रों ने जर्मन प्रतिनिधिमंडल के सम्मुख प्रस्तुत किया। इस संधि पर विचार करने हेतु जर्मनी को दो सप्ताह का समय दिया गया। निश्चित ही यह संधि पूर्ण रूप से मित्रराष्ट्रों के हितों की संवर्धन एवं जर्मन हित के बलिदान पर आधारित थी। अतः जर्मनी द्वारा इस संधि की शर्तों का विरोध हुआ, तो ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज द्वारा जर्मनी के साथ पुनः युद्ध की धमकी दी गई। फलतः जर्मनी को बाध्य होकर वर्साय की संधि को स्वीकार करना पड़ा।

वर्साय की संधि की शर्ते

प्रादेशिक व्यवस्था
अल्सास लॉरेन का प्रसिद्ध समृद्ध क्षेत्र, जो 1871 ई. में जर्मनी द्वारा फ्रांस से छीन लिया गया।, वर्साय की संधि के तहत पुनः जर्मनी से लेकर फ्रांस को दे दिया गया। जर्मनी की सैन्य शक्ति से भयभीत फ्रांस के प्रधानमंत्री विलमेश ने अपने देशको सुरक्षित रखने के लिए राइन नदी के बाए किनारे अर्थात् राइनलैंड पर लगभग 31 मील क्षेत्र का स्थायी रूप से असैन्यकरण कर दिया। इसका अभिप्राय यह था कि इस 31 मील वाले भू-भाग पर जर्मनी कभी भी सैन्य गतिविधियां संचालित नहीं करेगा। इसके अलावा राइनलैंड को उत्तरी, मध्य एवं दक्षिणी तीन भागों में विभक्त कर यह व्यवस्था की गई कि मित्रराष्ट्रों की सेनाएं उत्तरी भाग पर 5 वर्ष तक, मध्य पर 10 वर्ष तक एवं दक्षिणी भाग पर अगले 15 वर्ष तक क्षेत्र में सुरक्षा बनाए रखने मौजूद रहेंगी।

यद्यपि फ्रांस राइनलैंड को प्राप्त करने की इच्छा रखता था। परन्तु जब उसकी यह मंशा पूर्ण नहीं हो पायी तो उसने जर्मनी के समृद्ध कोयला क्षेत्र "सार" पर अधिकार करने का दावा प्रस्तुत किया और अंततः यह तय हुआ "सार" क्षेत्र की शासन व्यवस्था के अधीन संचालित होगी एवं सार के कोयला खानों पर फ्रांस का स्वामित्व स्थापित हुआ। इस संबंध में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इन क्षेत्रों में 15 वर्षों के पश्चात् जनमत संग्रह द्वारा यह तय किया जाएगा कि यहां के लोग जर्मनी या फ्रांस में कसके साथ रहना चाहते हैं और यदि इस जनमत संग्रह का परिणाम जर्मनी के पक्ष में जाता है तो उस स्थिति में इन कोयले की खानो को जर्मनी फ्रांस को निश्चित मूल्य देकर खरीद सकता है।

जर्मनी को सर्वाधिक नुकसान उसकी पूर्वी सीमा पर हुआ। मित्रराष्ट्रों द्वारा एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में पोलैण्ड के निर्माण का निर्णय लिया गया और जर्मनी के पूर्वी सीमा के अधिकांश भू-भाग को छीनकर नवनिर्मित पोलैण्ड राज्य को दे दिया गया। पोलैण्ड के लिए एक निश्चित समुद्री क्षेत्र प्राप्त करने हेतु जर्मनी | के बीचोंबीच एक विस्तृत भू-भाग जिसके अंतर्गत पोसेन एवं पश्चिमी प्रशा का संपूर्ण क्षेत्र शामिल था, पोलैण्ड को दे दिया गया। यह प्रदत्त क्षेत्र 'पोलिश गलियारा' के नाम से प्रसिद्ध था। इसके कारण पूर्वी प्रश शेष जर्मनी से एकदम अलग-थलग हो गया। पोलिश गलियारो के उत्तरी छोर पर डान्जिंग नामक प्रसिद्ध बंदरगाह था जहां की संपूर्ण आबादी जर्मन थी। परन्तु विबंडना ये थी कि डान्जिंग का एक 'स्वतंत्र नगर' घोषित कर उसे राष्ट्रसंघ के संरक्षण में रखा गया। प्रसिद्ध बाल्टिक बंदरगाह 'मेमेल' का प्रारंभ में राष्ट्रसंघ के संरक्षण में रखा गया। परन्तु बाद में इसे लिथुआनिया के अधीन कर दिया गया। श्लेसविग का प्रसिद्ध डच क्षेत्र जो 1864 में बिस्मार्क ने डेनमार्क से छीन लिया था, एक जनमत संग्रह के परिणाम के आधार पर पुनः डेनमार्क को लौटा दिया गया। इसके अतिरिक्त जर्मनी को साइलेशिया नामक क्षेत्र का एक छोटा भाग चेकोस्लोवाकिया को देने पड़े तथा यूपेन, मार्सनेट एंव मल्मेडी के क्षेत्र बेल्जियम को मिले।

प्रशांत महासागर क्षेत्र में स्थित विभिन्न द्वीपों सहित अफ्रीकी महादेश में स्थित चार जर्मन उपनिवेशों से जर्मनी को वंचित कर दिया गया एवं इसे मित्रराष्ट्रों के सरंक्षण में रखा गया। इस प्रादेशिक व्यवस्था से लगभग 13 प्रतिशत भू-भाग एवं 10 प्रतिशत आबादी जर्मनी के हाथ से निकल गयी। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के आधार पर कहा जा सकता है कि जर्मनी प्रतिशोध की भावना में अधिक समय तक इंतजार नहीं कर सकता था।

सैन्य व्यवस्था
वर्साय संधि की सैनिक व्यवस्था भी जर्मनी हेतु काफी अपनाजनक एवं सैन्य दृष्टि से इसे निर्बल करने के उद्देश्य से प्रेरित थी। इस संधि के तहत जर्मन की अधिकतम संख्या एक लाख तय की गई। जर्मनी का प्रधान सैनिक कार्यालय समाप्त कर दिया जाएगा। सैन्य सामग्री सहित युद्धोपयोगी वस्तुओं के उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इतना ही नहीं जर्मनी के सभी नौ सैनिक जब्त कर लिए गए और साथ ही यह तय किया गया कि जर्मनी की नौ सेना में केवल छह युद्धपोत एवं इतने ही संख्या में गश्ती जहाज होंगे। जर्मनी हेतु पनडुब्बी जहाजों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिए गए। आमतौर पर हम कह सकते हैं कि जर्मनी हेतु निः शस्त्रीकरण की व्यवस्था आरोपित कर उसे सैन्य दृष्टि से बिल्कुल ही पंगु बना दिया गया। निःशस्त्रीकरण पर आधारित इस घृणित व्यवस्था के अनुपालन एवं निगरानी हेतु जर्मन के खर्चे पर मित्रराष्ट्रों द्वारा एक सैन्य आयोग स्थापित किया गया। ज्ञातव्य है कि जर्मनी के अत्य ही संवेदनशील राइनलैड क्षेत्र का स्थायी रूप से असैन्यकरण कर दिया गया एवं इस क्षेत्र का अगले पंद्रह वर्षों के लिए मित्रराष्ट्रों के आधिपत्य में रखने की व्यवस्था की गई।

आर्थिक-व्यवस्था
वर्साय संधि के तहत की गई व्यवस्था ने आर्थिक दृष्टि की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी। चूंकि इस संधि में इस बात को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया था कि जर्मनी एवं उसके राज्य ही विश्वयुद्ध के विस्फोट हेतु जिम्मेदार हैं। इसी आधार पर युद्ध में मित्रराष्ट्रों को हुई क्षति की भरपाई के लिए जर्मनी को क्षतिपूर्ति का दायित्व सौंपा गया। यद्यपि क्षतिपूर्ति की वास्तविक रकम वर्साय संधि में निश्चित नहीं की गई थी परन्तु यह व्यवस्था अवश्य की गई थी कि 1921 ई. तक जर्मनी 5 अरब डॉलर जमा करे। क्षतिपूर्व से संबंधित एक बात और तय की गई कि क्षतिपूर्ति आयोग की संस्तुति पर ही अंतिम रकम तय की जाएगी। युद्धकाल में जर्मनी द्वारा फ्रांस के लोहे एवं कोयले का भरपूर उपयोग किया गया था और इसी आधार पर लोहे एवं कोयले से खानों से समृद्ध जर्मनी का सार क्षेत्र आगामी 15 वर्षों के लिए फ्रांस को दे दिया गया।

वर्साय- संधि एवं द्वितीय विश्वयुद्ध

यह कहना काफी हद तक सत्य है कि वर्साय की संधि प्रत्यक्ष रूप से द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए जिम्मेदार थी। वर्साय संधि का उद्देश्य यूरोप में स्थायी शांति स्थापित करना था, परन्तु इसके मूल में विद्यमान विषावत बीज मात्र 20 वर्षों के भीतर ही फूट पड़ा और द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में विश्व के महाविनाश का कारण बना।

यह तो निश्चित ही था कि वर्साय की संधि जैसे कठोर एव अपमानजनक संधि की शर्तो को कोइ भी स्वाभिमानी देश लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता था। अतः यह तो स्वाभाविक ही था कि भविष्य में जर्मनी पुनः युद्ध द्वारा अपने अपमान को धोने का प्रयत्न करता। द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज वर्साय की आरोपित संधि के शर्ते में मौजूद थे। चूंकि 1919 में जर्मनी असहाय था। अतः वह वर्साय की कठोर संधि को घूंट पीकर रह गया। परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे वह शक्ति का संचय कर संधि की एक-एक शर्त का उल्लंघन करने लगा। इस कठोर एवं प्रतिशोधात्मक संधि के अनेक भाग मित्रराष्ट्रों की सहमति,एवं विक्षोभ से संशोधित तथा भंग होते चले गए एवं जर्मनी ने संधि की शर्तो को ठुकराने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि विश्व के किसी भी संधि में | इतनी तीव्र गति से संशोधन नहीं हुई जितने कि वर्साय संधि में। 1926 में इस संधि के प्रथम भाग में संशोधन किए गए जब जर्मनी को राष्ट्रसंघ की सदस्यता मिली। क्षतिपूर्ति के प्रश्न को अंततः सन् 1932 में लोजान सम्मेलन द्वारा समाप्त ही कर दिया गया। 1933-34 में जर्मन राजनीति में हिटलर के उत्कर्ष के पश्चात् वर्साय संधि की शर्तो को तोड़ना तो बहुत छोटी सी बात रह गई। 1935-36 में नि:शस्त्रीकरण संबंधी वर्साय संधि की शर्तो की सभी मर्यादाओं को हिटलर ने भंग कर दिया. खासकर जर्मन सेना का सीमित करने वाली शर्त को। हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने शीध्र ही अपने खोए हुए भू-भाग को पुनः प्राप्त करने का सिलसिला प्रारंभ किया। 1935 में उसने राइनलैंड में फौज भेजकर उस पर अधिकार कर लिया और इस रूप में असैनिकीकरण संबंधी वर्साय संधि के उपबंधों को अस्वीकृत कर दिया। सितंबर, 1938 में जर्मन अल्पसंख्यकों को चेकोस्लोवाकिया से मुक्त कराने हेतु प्रेरित हुआ एवं लगभग समस्त चेकोस्लोवाकिया को ही जर्मनी में विलयित कर लिया। चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार कर लेने के पश्चात् हिटलर ने अब पोलिश गलियारा एवं डान्जिंग के बंदरगाह की ओर ध्यान केन्द्रित किया। अंततः जब वर्साय संधि द्वारा पोलैंड संबंधी व्यवस्थाओं को तोड़ने का प्रयत्न किया गया तो इसकी परिणति द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में सामने आई। अतः कहा जा सकता है कि वर्साय संधि की अन्यायपूर्वक एवं आरोपित व्यवस्थाओं को तोड़ने के लिए ही हिटलर ने घटनाओं की वह अनवरत् श्रृंखला शुरू की, जिसके कारण द्वितीय विश्वयुद्ध का विस्फोट हो गया। अतः एक अर्थ में वर्साय संधि शांति का अंत करने वाले संधि थी।

सेंट जर्मेन की संधि
ऑस्ट्रिया के साथ मित्र राष्ट्रों की संधि पेरिस के समीप सेंट जर्मेन में हुई। इस संधि के अनुसार ऑस्ट्रियन साम्राज्य का विखंडन हो गया। ऑस्ट्रिया ने हंगरी, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया तथा यूगोस्लाविया की स्वतंत्रता को मान्यता दी। इन सभी राष्ट्रों को ऑस्ट्रिया-हंगरी के बहुत से भू-भाग प्राप्त हुए। इस लूट में इटली भी कुछ पाने की इच्छा रखता था, एवं उसे भी इरीट्रिया के क्षेत्र प्राप्त हुए।

सेंट जर्मेन की संधि के परिणामस्वरूप ऑस्ट्रिया को अपनी जनसंख्या एवं क्षेत्रफल के हिसाब से तीन-चौथाई हिस्से की हानि उठानी पड़ी। निः शस्त्रीकरण की प्रक्रिया ऑस्ट्रिया में भी हुई। ऑस्ट्रियाई सैनिकों की संख्या घटाकर 30 हजार कर दी गई, नौसैनिक जहाज जब्त कर लिये गए, डैन्यूब नदी का अंतर्राष्ट्रीयकरण
कर दिया गया। इतना ही नहीं, युद्ध की जिम्मेदारी का भार ऑस्ट्रिया पर भी डाला गया तथा क्षतिपूर्ति हेतु बड़ी रकम हर्जाने के रूप में देने की बात तय हुई।

त्रियानों की संधि
यह संधि मित्र राष्ट्रों एवं हंगरी के बीच संपन्न हुई थी। इस संधि द्वारा हंगरी का अंग-भग कर दिया गया-
जैसे-ट्रांसिलवेनिया एवं उसके साथ के कुछ प्रदेश रोमानिया को दिए गए। क्रोशिया, स्लोवानिया, बोस्निया-हर्जेगोविया युगोस्लाविया को तथा स्लोवाकिया के क्षेत्र चेकोस्लोवाकिया को प्राप्त हुए, समुद्री मार्ग हेतु फ्यूम के भाग्य का निर्णय इटली एवं यूगोस्लोवाकिया की सहमति पर छोड़ दिया गया। इन विभिन्न कठोर संधियों के प्रति हंगरीवासियों में व्यापक आक्रोश फैला।

निउली की संधि
मित्र राष्ट्रों ने बुल्गारिया के साथ निउली की संधि की। इस संधि के तहत बुल्गारिया को जाते हुए प्रदेशों को वापस करना पड़ा। मैसिडोनिया का अधिकांश हिस्सा यूगोस्लाविया को एवं ब्रेस का प्रदेश यूनान को दिया गया। साथ ही बुल्गारिया को भी सैन्य एवं आर्थिक दृष्टिकोण से एकदम पंगु बनाने की हरसंभव कोशिश की गई। फलतः बुल्गारिया में भी इस संधि के प्रति तीव्र विरोध सामने आया।

सेब्रे की संधि
इस संधि के अनुसार तुर्की साम्राज्य का विखंडन कर दिया गया। एक व्यवस्था के तहत तुर्की की सीमा एशिया माइनर प्रायद्धीप एवं कुस्तुनतुनिया नगर तक सीमित कर दी गई। साथ ही एक ही विशेष प्रावधान द्वारा संरक्षण-प्रणाली की व्यवस्था की गई थी। इस प्रणाली के तहत फिलिस्तीन, ट्रांसजॉर्डन एवं मेसोपोटामिया इंग्लैंड को, जबकि सीरिया एवं लेबनान फ्रांस को प्रदान किए गए।

विश्वयुद्ध और भारत

यद्यपि भारत युद्ध से प्रत्यक्ष रूप से नहीं जुड़ा हुआ था लेकिन इसके प्रभावों से यह नहीं बच सका। विश्व युद्ध ने भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था को व्यापक रूप से प्रभावित किया। यह देखना महत्वपूर्ण है कि भारतीय जनसंख्या के विभिन्न वर्गों पर विश्व युद्ध का विभिन्न प्रकार का प्रभाव पड़ा। भारत के सबसे निर्धन वर्गों के लिए युद्ध का अर्थ निर्धनता में और अधिक वृद्धि थी। युद्ध के कारण लोगों पर भारी कर भी लगाए गए। युद्ध की आवश्यकताओं ने कृषि उत्पादनों एवं अन्य रोजमर्रा की आवश्यकताओं को दुर्लभ बना दिया। परिणामस्वरूप वस्तुओं के मूल्यों में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुयी। ऐसी भयावह स्थिति में जनता सरकार के विरुद्ध होने वाले किसी भी आंदोलन में शामिल होने को तैयार हो गई। नतीजे के तौर पर युद्ध के वर्ष तीव्र राष्ट्रवादी राजनैतिक आंदोलन के भी वर्ष हो गए।
दूसरी ओर युद्ध के कारण उद्योगपतियों को बेहद लाभ पहुँचा। युद्ध के कारण ब्रिटेन में आर्थिक संकट पैदा हो गया था और यद्ध की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए उन्हें भारतीय उद्योगपतियों पर निर्भर होना पड़ा। उदाहरण के लिए इस अवधि में जूट उद्योग काफी तेजी से बढ़ा। इस दृष्टि से युद्ध के कारण भारत में औद्योगिक उन्नति हुई। भारतीय उद्योगपतियों ने इस अवसर का भरपूर लाभ उठाया। और वह उसे युद्ध के बाद भी सुरक्षित रखना चाहते थे। इसीलिए वे स्वयं को संगठित करने और संगठित राष्ट्रीय आंदोलन में सहयोग करने को तैयार थे। इस प्रकार युद्ध के साथ भारतीय जनसमुदाय के विभिन्न वर्गों के अंदर राष्ट्रीयता की भावना भी आयी, यद्यपि विभिन्न वर्गों के अंतर्गत इसकी प्रक्रिया भिन्न रही। भारत की स्वतंत्र आर्थिक प्रगति भी स्वरूप लेने लगी जिसे विकसित होने में अगले कई वर्ष लगने थे।

प्रथम विश्व युद्ध के प्रभाव

राष्ट्रीय विचारधारा का प्रसार
प्रथम विश्वयुद्ध के फलस्वरूप राष्ट्रवादी विचारधारा में एक बार फिर उभार आया। जहाँ वियना कांग्रेस का उद्देश्य राष्टवादी भावना को कुचलना था वहीं पेरिस शांति सम्मेलन में राष्ट्रीयता की भावना पर बल दिया गया। राष्ट्रीयता की भावना के विकासस्वरूप स्टोनिया लैटिविया, लिथुवानिया एवं फिनलैंड जैसे नए देशों ने जन्म लिया। दूसरी तरफ राष्ट्रवाद के उदय के परिणामस्वरूप चीन एवं तुर्की में आंदोलन शुरू हो गये। यह राष्ट्रवादी भावना का उछाह ही था कि मिस्र में राजनीतिक नेताओं को सफलता मिली।
अब 1922 में इंग्लैंड को संरक्षण वापस लेना पड़ा। आयरलैंड में भी इंलैंड के विरूद्ध आंदोलन शुरू हो गया और अन्तत: उत्तरी आयरलैंड स्वतंत्र हो गया।

प्रजातंत्र का विकास
प्रथम विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप यूरोप में प्रजातंत्र का भी विकास हुआ। युद्ध के पश्चात् यूरोप के तीन महान राजवंशों यथा रोमनाऊवंश (रूस) हैब्सवर्ग वर्ग (ऑस्ट्रीया) एवं होहेनजोलर्न वंश (प्रशा) का खात्मा हो गया। दूसरी तरफ तुर्की में गणराज्य की स्थापना हुई। उसी तरह जब यूनान तुर्की से पराजित हुआ तो वहाँ भी गणराज्य की स्थापना हुई।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विश्व परिदृश्य में यूरोप के साथ-साथ एशिया एवं अमेरिका का भी महत्व बढ़ा। प्रथम विश्व युद्ध का स्वाभाविक परिणाम था यूरोप की प्रसिद्ध आर्थिक मंदी जिससे यूरोपीय अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगा।
प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् उपनिवेशवाद को भी गहरा धक्का लगा। उपनिवेशों का जनता की इच्छाएँ एवं अपेक्षाएँ जगी क्योंकि मित्र राष्ट्रों द्धारा प्रजातंत्र एवं आत्मनिर्णय के सिद्धांत पर बल दिया गया था।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद पुरूषों की संख्या कम हो गईं।
अतः प्रथम बार यूरोपीय राजनीतिक-सामाजिक जीवन में महिलाओं का महत्व बढा। इसके बाद ही Feminist movement की शुरूआत हुई। इसके साथ ही मजदूरों के मताधिकार में भी वृद्धि हुई। अत: यूरोप के राजनीतिक जीवन में श्रमिकों का महत्व बढ़ा।
सबसे बढ़कर यूरोपीय राजनीति में शक्ति संतुलन की अवधारणा गलत अर्थात आलोकप्रिय हो गई एवं उसके बदले अंतर्राष्ट्रीय संगठन पर बल दिया जाने लगा। इसी उद्योग का परिणाम था राष्ट्रसंघ की स्थापना।

क्या प्रथम विश्व युद्ध को टाला जा सकता था?
वस्तुतः प्रथम विश्व युद्ध के कारणों की जाँच करने पर हम पाते है कि कई भी कारण इतना सशक्त नहीं था जो युद्ध को अनिवार्य बना देता। इससे पहले भी इनमें से बहुत कारक मौजूद थे किंतु युद्ध 1914 में ही हुआ। इसकी वजह थी कि संपूर्ण यूरोप में युद्ध की मानसिकता निर्मित हो चुकी थी। युद्ध का मनोविज्ञान इतना सशक्त हो गया था कि सभी प्रश्नों का एक मात्र निराकरण युद्ध ही दिखता था। जैसा कि कार्डिनल महोदय का मानना है कि राजा या राजकुमार का हत्याकाण्ड युद्ध का अनिवार्य कारण नहीं हो है क्योंकि सराजेवो हत्याकाण्ड से पूर्व भी 1900 ई. में इटली के शासक तथा 1909 में पुर्तगाल के शासक की हत्या हो गई थी। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि युद्ध को टाला जा सकता था
कितु हम यह भी देखते है कि युद्ध का कारण शक्तियों के मौलिक, आर्थिक राजनीतिक हितों की टकराहट थीं। अत: जिस किसी मुद्दे पर निहित आर्थिक, राजनीतिक हित एवं राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न उपस्थित होता एवं इसी मुद्दे के साथ युद्ध एवं शांति के विकल्पों का चुनाव का प्रश्न खड़ा होता तो यूरोपीय शक्तियाँ युद्ध को ही चुनने में तत्पर होती। अतः युद्ध अनिवार्य एवं अवश्यंभावी था। ईमानदार कोशिशों के बाद समय बढ़ाया जा सकता था। थोड़े समय के लिए इसे स्थगित किया जा सकता था किंतु अंतिम रूप से इसे टाला नहीं जा सकता था।

सारांश

यहाँ हमारा उद्देश्य आपके समक्ष प्रथम विश्वयुद्ध के मुख्य कारण और परिणाम प्रस्तुत करना था। आपने महसूस किया होगा कि 1914 में सहयोगी राष्ट्रों का एकमात्र सामान्य उद्देश्य यूरोप से जर्मनी का प्रभुत्व समाप्त करना था। उन्होंने युद्ध रूस में समाजवादी क्रांति लाने, पुराने साम्राज्यों को नष्ट कर देने, नए अरब राष्ट्र स्थापित करने अथवा लीग ऑफ नेशन्स में नये प्रयोग करने के लिए नहीं आरंभ किया था। युद्ध का सबसे अधिक फायदा युद्ध में अंशतः शामिल देशों अथवा गैर शामिल देशों को पहुँचा। अमरीका एक बड़े आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा। जापान ने प्रशान्त महासागर में नौसेना शक्ति और महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति प्राप्त की, और भारत ने स्वराज्य प्राप्त करने की ओर काफी महत्वपूर्ण प्रगति की। विजयी सहयोगी राष्ट्रों ने कुछ विशेष लक्ष्य प्राप्त कर सकने के बावजूद विश्व के समक्ष बबांदी, ऋण, निर्धनता, शरणार्थी, अल्पसंख्यकों की समस्यायें और अपनी आंतरिक गुटबंदी के रूप में कष्टदायक विरासत पेश की।
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