राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है? | Rajyapal ki niyukti kaun karta hai

राज्यपाल की नियुक्ति

राज्य का राज्यपाल भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होता है। राज्यपाल बनने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिए। वहः
  • (अ) भारत का नागरिक हो,
  • (ब) उसकी न्यूनतम आयु 35 वर्ष हो, और
  • (स) वह अपने कार्यकाल के दौरान किसी लाभ के पद पर आसीन न हो।
यदि कोई व्यक्ति संसद के किसी भी सदन का अथवा राज्य विधायिका का अथवा राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर किसी मंत्रिपरिषद का सदस्य है और वह राज्यपाल के रूप में नियुक्त कर दिया जाता है, तो वह अपने उस पद से त्यागपत्र देता है। राज्यपाल पांच वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है, परंतु सामान्यतया वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त अपने पद पर बना रहता है। राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त का तात्पर्य है कि राज्यपाल अपनी पदावधि के पूर्ण होने के पहले भी राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है। वह अपनी पदावधि से पूर्व त्यागपत्र दे सकता है। यद्यपि, वास्तविक रूप में राज्यपाल नियुक्त करने तथा उसे पद से हटाये जाने का निर्णय राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार लेता है।
Rajyapal ki niyukti kaun karta hai
संविधान निर्माताओं के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि राज्यपाल का चयन किस प्रकार किया जाए? अमेरिका जैसे संघात्मक देशों में राज्यपाल का चयन प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा तथा कनाडा जैसे देशों में राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा की जाती है लेकिन भारतीय परिस्थितियों में कौन-सी व्यवस्था उपयुक्त होगी, इस पर विचार-विमर्श के उपरांत राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया को अपनाया गया।
इस निर्णय के निम्न आधार माने जाते हैं-
  • राज्यपाल का निर्वाचन राज्यों में स्थापित की जाने वाली संसदीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं हो सकता है क्योंकि राज्यपाल का निर्वाचन होने से मुख्यमंत्री से संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है क्योंकि वह भी जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि होता है।
  • निर्वाचित राज्यपाल का संबंध अपने दल से बना रहता है जिससे वह निष्पक्ष व निःस्वार्थ संवैधानिक मुखिया की भूमिका का निर्वहन नहीं कर पाता।
  • राज्यपाल राज्य में केंद्र का प्रतिनिधि होता है, इसलिये राज्यपाल का प्रत्यक्ष निर्वाचन केंद्र-राज्य संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता।
  • चूँकि राज्यपाल केवल संवैधानिक मुखिया है, अतः उसका प्रत्यक्ष चुनाव अनावश्यक धन व संसाधनों की बर्बादी का कारण होता।
अंततः यह निर्णय लिया गया कि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाएगी तथा वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण कर सकता है।

राज्यपाल

राज्य की संवैधानिक व्यवस्था में राज्यपाल का पद अत्यंत महत्त्व रखता है। संविधान सभा के सदस्य के.एम. मुंशी ने राज्यपाल के पद के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राज्यपाल संवैधानिक औचित्य का प्रहरी और वह कड़ी है जो राज्य को केंद्र के साथ जोड़ते हुए भारत की एकता के लक्ष्य को प्राप्त करता है। संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिये एक राज्यपाल होगा, परंतु 7वें संविधान संशोधन द्वारा यह जोड़ा गया कि एक ही व्यक्ति को दो या उससे अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। राज्यपाल राज्य की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख होने के साथ ही केंद्र का प्रतिनिधि भी होता है तथा राज्यपाल राज्य विधानमंडल का अभिन्न अंग होता है।
"राज्यपाल संवैधानिक औचित्य का प्रहरी और वह कड़ी है जो राज्य को केन्द्र के साथ जोड़ते हुए भारत की एकता के लक्ष्य को प्राप्त करता है।"
भारत में संघीय व्यवस्था अपनाई गई है, जिसके अनुरूप दो स्तर पर शासन संचालन किया जाता है, केन्द्रीय स्तर पर तथा राज्य स्तर पर। केन्द्र में राष्ट्रपति तथा मंत्रिपरिषद सहित प्रधानमंत्री कार्यपालिका के प्रमुख भाग हैं। राज्य स्तर पर राज्यपाल तथा मंत्रिपरिषद सहित मुख्यमन्त्री मिलकर कार्यपालिका का गठन करते हैं, यानि केन्द्र में जो स्थिति राष्ट्रपति की है, राज्य में लगभग वही स्थिति राज्यपाल की है।
संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 153 के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई है कि प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होगा। एक ही व्यक्ति दो से अधिक राज्यों का भी राज्यपाल हो सकता है, यह व्यवस्था संविधान के सातवें संशोधन (1956) द्वारा की गई है।
यहाँ एक तथ्य स्पष्ट कर देना आवश्यक है। राज्यपाल का पद स्वतन्त्र भारत में नया नहीं है। ब्रिटिश भारत में भी प्रान्तों के राज्यपाल ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधित्व करते थे। लेकिन ब्रिटिश कालीन भारत के राज्यपाल व स्वतन्त्र भारत के राज्यपाल में मूलभूत अन्तर यह है कि जहाँ प्रथम वर्ग केन्द्रीय सत्ता तथा निरंकुशता का प्रतीक था, वहीं दूसरी ओर स्वततंत्र भारत में राज्यपाल, केन्द्र और राज्य के मध्य ऐसी कड़ी है, जिसकी एक ओर राज्य के स्थानीय विकास व आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील भूमिका अपेक्षित है, दूसरी ओर यह भी आशा की जाती है कि वह राष्ट्रीय एकता व राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखेगा।

राज्यपाल के लिये अर्हताएँ

संविधान में राज्यपाल के पद पर नियुक्ति के लिये दो अर्हताएँ निर्धारित की गई हैं
  1. उसे भारत का नागरिक होना चाहिये।
  2. वह 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
इसके अतिरिक्त राज्यपाल की नियुक्ति से संबंधित दो परंपराएँ और जुड़ गई हैं

प्रथम, वह उस राज्य से संबंधित नहीं होना चाहिये, जहाँ उसे नियुक्त किया जा रहा है, जिससे वह स्थानीय राजनीति से मुक्त रहे।

दूसरा, राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति से पहले उस राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श किया जाए, जहाँ उनकी नियुक्ति की जा रही है। किंतु इन परंपराओं का कुछ मामलों में उल्लंघन किया जाता है।

संविधान में राज्यपाल पद के लिये कुछ शर्तों का भी उल्लेख किया गया है, जो निम्नलिखित हैं-
  • राज्यपाल संसद के किसी सदन का सदस्य या राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा, यदि ऐसा सदस्य राज्यपाल पद पर नियुक्त किया जाता है, तो यह समझा जाएगा कि राज्यपाल का पद ग्रहण करने की तारीख से उन्होंने अपना स्थान रिक्त कर दिया।
  • उसे किसी लाभ के पद पर नहीं होना चाहिये।
  • राज्यपाल अपना पद ग्रहण करने से पहले उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उसकी अनुपस्थिति में उस न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान करेंगे और उस पर अपना हस्ताक्षर करेंगे।

राज्यपाल का वेतन, सुविधाएँ एवं विशेषाधिकार

संविधान के कुछ उपबंधों में राज्यपाल के वेतन एवं सुविधाओं के बारे में प्रावधान है, जो निम्नलिखित हैं-
  • राज्यपाल को संसद विधि द्वारा निर्धारित वेतन, भत्ते एवं विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। वर्तमान में राज्यपाल को 3 लाख 50 हज़ार ₹ वेतन के रूप में प्राप्त होते हैं।
  • यदि राज्यपाल दो या अधिक राज्यों का कार्यभाल सँभाल रहा है, तो राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार उसी अनुपात में उन्हें वेतन प्राप्त होगा।
  • राज्यपाल को बिना किराया दिये शासकीय आवास (राजभवन) के उपभोग का अधिकार होगा।
  • राज्यपाल के वेतन एवं भत्तों में उनके कार्यकाल के दौरान किसी प्रकार की कटौती नहीं की जाएगी।
  • राज्यपाल द्वारा अपने कर्तव्यों के पालन के लिये किये गए कार्य एवं शक्तियों के प्रयोग पर वह किसी भी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा।
  • अपने कार्यकाल के दौरान राज्यपाल को आपराधिक मामलों में सुनवाई से छूट प्राप्त होगी तथा किसी भी न्यायालय को इस दौरान राज्यपाल की गिरफ्तारी या कारावास के लिये आदेश देने की अधिकारिता नहीं होगी। 
  • अनुच्छेद 361(4) के अनुसार राज्यपाल के व्यक्तिगत कार्यों के संबंध में यह उन्मुक्ति सीमित है। यदि राज्यपाल द्वारा किये गए व्यक्तिगत कार्यों के संबंध में अनुतोष (Relief) का दावा करने वाली सिविल कार्यवाही प्रारंभ की जाती है, तो निम्नलिखित तीन शर्तों का पूरा होना आवश्यक है-
1. इसकी लिखित सूचना राज्यपाल को देनी होगी।
2. ऐसी सूचना के बाद कम-से-कम दो माह का समय देना होगा।
3. सूचना में पक्षकार को अपना नाम, पता, कार्यवाही की प्रकृति तथा मांगे गए अनुतोष (relief) का विवरण
देना होगा।

राज्यपाल की पदावधि

राज्यपाल की पदावधि के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 156 में तीन बातें बताई गई हैं
  1. राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा।
  2. राज्यपाल राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा।
  3. इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन रहते हुए राज्यपाल अपने पद ग्रहण की तारीख से पाँच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा। परंतु राज्यपाल अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी तब तक पद पर बना रहेगा, जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता है।
संविधान में ऐसी कोई विधि प्रक्रिया स्पष्ट नहीं की गई है जिसके तहत राष्ट्रपति राज्यपाल को पद से हटा सके। राज्यपाल राष्ट्रपति के 'प्रसादपर्यंत' पद धारण करता है अर्थात् राज्यपाल के लिये 5 वर्षों का कार्यकाल पूरी तरह राष्ट्रपति के प्रसाद पर निर्भर करता है, इसलिये यह मुद्दा काफी विवादास्पद रहा है, केंद्र सरकार द्वारा कई बार इसका दुरुपयोग किया गया है। 'बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ, (2010) मामले में 5 न्यायधीशों की संविधान पीठ ने निर्णय दिया कि राज्यपाल को मनमाने आधार पर नहीं हटाया जा सकता। उदाहरणस्वरूप, उसे इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि केंद्र में सरकार बदल गई है और राज्यपाल नई सरकार की विचारधारा या सिद्धांतों में विश्वास नहीं रखता।
राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल को उसके बचे हुए कार्यकाल के लिये दूसरे राज्य में स्थानांतरित किया जा सकता है तथा ऐसा राज्यपाल जिसका कार्यकाल समाप्त हो गया हो, उसकी पुनर्नियुक्ति की जा सकती है।

राज्यपाल की शक्तियाँ

प्रत्येक पद के साथ कुछ शक्तियां जुड़ी होती हैं। राज्य के प्रमुख के रूप में प्रभावी तरीके से अपना कार्य करने के लिए संविधान द्वारा राज्यपाल को शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं।
राज्यपाल की शक्तियों को निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:-
  • (अ) कार्यकारी शक्तियाँ
  • (ब) विधायी शक्तियाँ
  • (स) वित्तीय शक्तियाँ
  • (द) न्यायायिक शक्तियाँ
  • (इ) विवेकाधीन शक्तियाँ

(अ) कार्यकारी शक्तियाँ
भारतीय संविधान द्वारा राज्य की संपूर्ण कार्यकारी शक्तियाँ राज्यपाल में निहित की गयी हैं जिनका प्रयोग वह मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार करता है। वह मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद के अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। वह अन्य महत्वपूर्ण पदों जैसे राज्य लोकसेवा आयोग, राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य वित्त आयोग के अध्यक्षों तथा सदस्यों, एडवोकेट जनरल तथा उच्च न्यायालय के अतिरिक्त अन्य न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। जब राष्ट्रपति द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है तो राज्यपाल की सलाह ली जाती है। पंरतु वास्तव में राज्यपाल की शक्तियाँ मात्र औपाचारिक हैं। वह मुख्यमंत्री के रूप में केवल उसी व्यक्ति को नियक्त कर सकता है जो विधानसभा में बहमत का नेता है। वह मंत्रिपरिषद के सदस्यों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह से ही कर सकता है। उसके द्वारा अन्य सभी नियुक्तियाँ तथा कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही की जाती हैं।

(ब) विधायी शक्तियाँ
राज्यपाल राज्य विधायिका का अभिन्न अंग होता है और उसे कुछ निश्चित विधायी शक्तियाँ दी गयी हैं। उसे राज्य विधानसभा के सत्र को बुलाने तथा उसका अवसान करने का अधिकार है। वह राज्य विधान सभा को भंग भी कर सकता है। वह राज्य विधानसभा अथवा विधायिका के दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों में अभिभाषण देता है। यदि एंग्लो-इंडियन समुदाय का विधान सभा में उचित प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह उस समुदाय के एक सदस्य को नामांकित करता है। यदि राज्य में द्विसदनीय विधायिका है तो विधान परिषद के 1/6 सदस्यों का नामांकन राज्यपाल द्वारा किया जाता है। आपको पुनः स्मरण करा दें कि वास्तविकता में राज्यपाल ये सभी कार्य मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद की संस्तुति पर ही करता है। राज्य विधायिका द्वारा पास किया गया कोई विधेयक तभी कानून या अधिनियम का रूप लेता है जब राज्यपाल उस पर अपनी स्वीकृति दे देता है।

(स) वित्तीय शक्तियाँ : आप समाचार पत्रों में पढ़ते होंगे कि प्रत्येक वर्ष सरकार द्वारा बजट विधायिका के पटल पर उसके अनमोदन के लिए प्रस्तुत किया जाता है। वास्तव में, राज्य का बजट या 'वार्षिक वित्तीय विवरण' राज्यपाल की तरफ से राज्य के वित्त मंत्री द्वारा तैयार किया जाता है और राज्य विधायिका के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। इसके अतिरिक्त कोई भी वित्त विधेयक राज्यपाल की संस्तुति के बिना राज्य विधायिका में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। राज्यपाल का राज्य आकस्मिक निधि पर पूर्ण नियंत्रण होता है।

(द) न्यायिक शक्तियाँ
राज्यपाल राज्य के प्रधान के रूप में राज्य के अधिकार क्षेत्र के तहत किसी भी दंडित व्यक्ति को क्षमा कर सकता है। वह किसी भी दंड को स्थगित कर सकता है या कम कर सकता है। परन्तु सैनिक न्यायालय द्वारा दंडित व्यक्ति के सम्बंध में राज्यपाल को क्षमादान का अधिकार नहीं है।

(इ) विवेकाधीन शक्तियाँ
जैसाकि हम पूर्व में पढ़ चुके हैं, राज्यपाल राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है। इसका अर्थ यह है कि वास्तविकता में राज्यपाल की कोई शक्तियां नहीं होती हैं। परंतु संविधान के अनुसार, विशेष परिस्थितियों में वह मंत्रिपरिषद् की सलाह के बिना भी कार्य कर सकता है। ऐसी शक्तियाँ जिनका प्रयोग राज्यपाल अपने विवेक के आधार पर करता है, विवेकाधीन शक्तियाँ कहलाती हैं। प्रथमतः यदि विधानसभा में किसी एक राजनीतिक दल या किसी राजनीतिक दलों के गठबंधन को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो राज्यपाल स्वविवेक का प्रयोग करते हुए किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनने हेतु निमंत्रण दे सकता है। दूसरे, राज्यपाल केन्द्र तथा राज्य के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। राज्य विधायिका द्वारा पारित किसी भी विधेयक को वह भारत के राष्ट्रपति के विचार हेतु आरक्षित कर सकता है। तृतीय, यदि राज्यपाल यह मानता है कि राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चल रही है तो वह राष्ट्रपति को इसकी सूचना दे सकता है। वैसी स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत, राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाता है, राज्य मंत्रिपरिषद् हटा दी जाती है और राज्य विधानसभा या तो भंग कर दी जाती है या निलंबित कर दी जाती है। ऐसी आपातकाल स्थिति के दौरान, राज्यपाल राष्ट्रपति की ओर से राज्य में शासन करता है।

राज्यपाल की स्थिति

राज्यपाल के सम्बन्ध में स्वयं राज्यपालों ने तथा अन्य विशेषज्ञों ने भिन्न मत व्यक्त किये हैं। सरोजिनी नायडू के अनुसार, वह “सोने के पिंजरे में बन्द चिड़िया के समान है।" श्री प्रकाश के अनुसार, उसे छूटी हुई जगह पर हस्ताक्षर करने के अतिरिक्त कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित के अनुसार, “पद नहीं वेतन के आकर्षण के कारण ही कोई व्यक्ति राज्यपाल बनना स्वीकार करता है।" डा. पट्टाभिसीतारमैय्या के अनुसार, राज्यपाल का पद "अतिथि सत्कार तथा राष्ट्रपति को एक पखवाड़े का प्रतिवेदन देने के लिए है।"
यह दृष्टिकोण का एक पहलू है। यदि विभिन्न राज्यों के राज्यपालों की कार्यवाहियों पर दृष्टि डालें तो कई सकारात्मक निर्णय सामने आते हैं यथा ;
  • 1974 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री ए.एल.डायस ने सड़कों की खराब स्थिति पर चिन्ता व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री श्री सिद्धार्थ शंकर राय व सार्वजनिक निर्माण मंत्री को बुलाकर सलाह दी जिसे स्वीकार कर लिया गया।
  • उत्तर प्रदेश में श्रीमती सरोजिनी नायडू ने मुसलमानों व शरणार्थियों के कल्याण के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाये।
  • उड़ीसा के राज्यपाल, ए.एन. खोसला ने जल विद्युत संसाधनों के विकास के लिए योजना बनाई।
  • राजस्थान के राज्यपाल, श्री मदनलाल खुराना ने गरीबी रेखा के नीचे के लोगों की समस्याओं को सुनने व निराकरण करने में पहल की।
उपरोक्त उदाहरण राज्यपालों की राज्य प्रशासन के सन्दर्भ में सकारात्मक भूमिका पर रोशनी डालते है। पर कई बार राज्यपालों की पहल, शासन-प्रशासन में हस्तक्षेप की सीमा में आने लगी। ऐसे में राज्यपाल व मुख्यमंत्री के मध्य टकराव की स्थिति उत्पन्न होना स्वभाविक है। पश्चिम बंगाल में राज्यपाल धर्मवीर व तत्कालीन मुख्यमंत्री अजय मुखर्जी के सम्बन्ध तनावपूर्ण रहे। राज्यपाल के रूप में डा. चेन्नारेड्डी की भूमिका भी विवादास्पद रही।
वस्तुतः 1967 से पहले कई कारणों से राज्यपाल का पद अधिक विवादास्पद नहीं बना। एक दल का वर्चस्व, स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद की आदर्श की खुमारी तथा ब्रिटिशकालीन राज्यपालों की भूमिका न दोहराने की प्रतिबद्धता के कारण राज्यपाल का पद शक्ति संघर्ष के घेरे में नहीं आया।
लेकिन चतुर्थ आम चुनाव के बाद जब राज्यों में गठबन्धन सरकारों का दौर प्रारम्भ हुआ तो केन्द्र व राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें बनीं। वहीं पर राज्यपाल की भूमिका में परिवर्तन आने लगा तथा उस पर केन्द्र के अभिकर्ता होने का आरोप लगने लगा। अनुच्छेद 356 के अत्यधिक प्रयोग के कारण भी राज्यपाल को केन्द्रोन्मुखी माना जाने लगा।
वस्तुतः संविधान निर्माता राज्यपाल को शक्ति नहीं सम्मान देना चाहते थे, जो राज्य के मुखिया को मिलना चाहिए। ऐसा व्यक्ति, जो सजग हो, जागरूक हो, राज्य तथा देश के व्यापक हितों को ध्यान में रखता हो तथा दलगत राजनीति से उठकर जन कल्याण की बात सोचता हो, वही राज्यपाल की पद की गरिमा को बनाये रख सकता है। इस सम्बन्ध में समय-समय पर विभिन्न आयोगों जैसे सरकारिया आयोग तथा अन्य सम्मेलनों में सुझाव दिये जाते रहे हैं। उन पर अमल करने की आवश्यकता है। सरकारिया आयोग तथा संविधान समीक्षा आयोग ने राज्यपाल के पद की आवश्यकता को स्वीकार किया  है।

क्या राज्यपाल संघ का अभिकर्ता है?
यद्यपि संविधान का उद्देश्य राज्यपाल को केन्द्र तथा राज्य के मध्य संतुलनकारी कड़ी के रूप में कार्य करने की रही है तथापि कतिपय राज्यपालों के आचरण से यह लगने लगा कि राज्यपालों द्वारा राज्य के हित का ध्यान कम रखा जा रहा है, केन्द्रीय निर्देश पर काम करने की प्रवृत्ति अधिक हो रही है। विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 356 के प्रयोग के माध्यम से राज्यों में राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुशंसा के अधिकार को लेकर विवाद की स्थिति आई। इस संवैधानिक प्रावधान के सम्बन्ध में डा. बी. आर. अम्बेडकर ने कहा था कि इस अनुच्छेद के प्रयोग का अवसर बहुत कम आयेगा किन्तु, उसका इतना अधिक प्रयोग हुआ कि इस व्यवस्था को समाप्त करने के सुझाव दिये जाने लगे। 1977 में जब केन्द्र में जनता पार्टी का शासन सत्ता में आया तो नौ कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारें भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। तत्पश्चात् 1980 में इस प्रवृत्ति की पुनरावृत्ति हुई। कांग्रेस ने केन्द्र में फिर सत्ता सम्हाली तो नौ गैर कांग्रेस शासित राज्यों में सरकारें भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। अन्य अवसरों पर ऐसी घटनाएँ हुई जिससे लगने लगा कि राज्यपाल केन्द्र के हितों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं।
ऐसा नहीं कि राज्यपालों ने राज्य के हितों का कभी ध्यान रखा ही नहीं। कई बार राज्यपालों ने केन्द्र के साथ अपने सम्बन्धों का राज्य के हित में सकारात्मक रूप में प्रयोग किया। श्री वी.वी.गिरि जब केरल के राज्यपाल थे तो उन्होंने योजना आयोग से राज्य के लिए अधिक धन राशि की मांग की तथा उसमें वे सफल भी हुए। विभिन्न राज्यों में राज्यपालों ने राज्य की जनता के हित में हस्तक्षेप किया जिसके सकारात्मक परिणाम निकले। लेकिन पिछले कई दशकों में राज्यपाल ने केन्द्र के अभिकर्ता की भूमिका अधिक निभाई है ऐसा विशेषज्ञों का मानना है।
प्रो. के.वी. राव के अनुसार, राज्यपाल न तो राज्य के द्वारा चुना जाता है, न उसके द्वारा हटाया जाता है। वह राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होता है तथा केन्द्रीय निर्देश पर ही पद मुक्त होता है, अतः केन्द्र के लिए अधिक प्रतिबद्धता अस्वाभाविक नहीं है।

राज्यपाल का सम्बोधन
राज्यपाल के सभी भाषण मुख्यमंत्री व उसके मन्त्रिमण्डल द्वारा तैयार किये जाते हैं। सामान्यतया राज्यपाल द्वारा उसे उसी रूप में प्रस्तुत करना चाहिए लेकिन यदि भाषण में राज्यपाल के किसी पूर्ववर्ती कार्य की आलोचना हो, या कोई वाक्यांश केन्द्र-राज्य सम्बन्ध में बाधा उत्पन्न कर रहा हो या संवैधानिक भावना के अनुकूल न हो तो उन वाक्यांशों को न पढ़ना राज्यपाल का स्वविवेकाधिकार है।
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