समन्वय - अर्थ व परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ, आवश्यकता, महत्त्व | samanvay

समन्वय

आधुनिक युग बड़े संगठनों का युग है। बड़े संगठनों के उद्देश्य भी व्यापक होते जा रहे हैं। संगठनों के इस विस्तार तथा उनके द्वारा सम्पादित कार्यों की जटिल होती प्रकृति ने अनेक समस्याओं को खड़ा कर दिया है।
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जैसा कि पूर्व अध्याय में स्पष्ट किया जा चुका है कि कोई भी संगठन अनेक प्रत्ययों, अवयवों और इकाइयों का मेल अथवा संयोजन है। संगठन के इन अवयवों के बीच परस्पर सकारात्मक सहयोग की अपेक्षा की जाती है। अतः संगठन में विभिन्न इकाइयों के मध्य तालमेल स्थापित करना पड़ता है, जिसे समन्वय कहते हैं।

अर्थ व परिभाषा

साधारण शब्दों में समन्वय से तात्पर्य है, किसी भी संगठन की विभिन्न गतिविधियों में तालमेल बिठाना ।
किन्तु विद्वानों ने समन्वय की व्याख्या दो दृष्टियों से की है, जो समन्वय की निषेधात्मक दृष्टि से व्याख्या करते हैं उनके अनुसार, समन्वय संगठन में कार्यो के दोहराव को रोकने की क्रिया है, किन्तु जो विद्वान विधेयात्मक दृष्टि से समन्वय की व्याख्या करते हैं, वे समन्वय को संगठन के विभिन्न कर्मचारियों में मिलजुलकर सहयोगपूर्वक कार्य करने की प्रवृत्ति के विकास के रूप में देखते हैं। वर्तमान सन्दर्भ में दोनों ही दृष्टियाँ अतिवादी हैं, बल्कि वास्तविकता तो यह है कि समन्वय दोनों ही दृष्टियों का मेल है।
समन्वय की विभिन्न विद्वानों ने जो परिभाषाएँ दी हैं, वे इस प्रकार हैं-
  • हेनरी फेयोल – “समन्वय किसी संगठन की सभी क्रियाओं में समरसता स्थापित करता है, ताकि उसका कार्य सुविधाजनक ढंग से सफलतापूर्वक चलता रहे।
  • सेकलर हडसन – “समन्वय कार्य के विभिन्न हिस्सों के बीच तालमेल स्थापित करने की महत्त्वपूर्ण गतिविधि है।"
  • मूने और रैले – “किसी सामान्य उद्देश्य की प्राप्ति हेतु की जाने वाली विभिन्न क्रियाओं के मध्य एकता बनाए रखने के उद्देश्य से सामूहिक प्रयत्नों में सुव्यवस्था स्थापित करने को समन्वय कहते हैं।'
  • नीग्रो – “समन्वय से तात्पर्य है कि संगठन के विभिन्न अंग एक साथ मिलकर प्रभावकारी रूप से कार्य करते हैं और संघर्ष, अतिराव तथा पुनरावृत्ति के बिना काम चलता रहता है।"
  • मेकफारलैण्ड – "समन्वय एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक कार्यकारी अधिकारी अपने अधीनस्थों में सामूहिक प्रयास का एक सुव्यवस्थित स्वरूप विकसित करता है तथा सामूहिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु क्रियाओं से सम्बन्धित एकता स्थापित करता है।
  • न्यूमैन – “समन्वय प्रयत्नों की ऐसी व्यवस्थित समकालिकता है, जिसमें किसी कार्य के उचित निष्पादन का उचित परिणाम, समय तथा निर्देशन प्राप्त होता है, जिसके फलस्वरूप निर्धारित उद्देश्य के लिए सामंजस्यपूर्ण तथा एकीकृत क्रियाएँ सम्भव होती हैं।
  • चार्ल्सबर्थ – “उद्यम के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये संगठन के कुछ भागों का सामंजस्यपूर्ण एकीकरण ही समन्वय कहलाता है।"
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समन्वय संगठन में कार्यों की पुनरावृत्ति को रोकते हुए विभिन्न इकाइयों में परस्पर सहयोग पूर्वक कार्य करने की प्रवृत्ति का विकास करता है।

समन्वय की विशेषताएँ

उपर्युक्त वर्णित परिभाषाओं के आधार पर समन्वय की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-
  • समन्वय संगठन की एक सतत् एवं अनवरत् रूप से चलने वाली क्रिया है। यह किसी समय विशेष पर की जाने वाली क्रिया नहीं बल्कि हर क्षण, हर पल की जाती है।
  • समन्वय एक गत्यात्मक प्रक्रिया है। जो समय, स्थान व परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ अपना समायोजन करती रहती है।
  • समन्वय का प्रत्यक्ष सम्बन्ध संगठन के उद्देश्यों से होता है, न कि सांगठनिक परिप्रेक्ष्य में व्यक्तिगत उद्देश्यों की पूर्ति हेतु।
  • समन्वय में निषेधात्मक और विधेयात्मक दोनों ही क्रियाओं का मेल होता है।
  • समन्वय संगठन की कोई पृथक क्रिया नहीं बल्कि संगठन के विभिन्न स्तरों के साथ स्वतः जुड़ी हुई क्रिया है। 
  • समन्वय संगठन के विभिन्न भागों के सामंजस्यपूर्ण एकीकरण की क्रिया है, जिसमें प्रयत्नों की एकरूपता निहित होती है और यही तत्व समन्वय को सहयोग से पृथक करता है। जैसा कि टैरी ने कहा है कि “सहयोग किसी सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए व्यक्ति का दूसरे या दूसरों के साथ सामूहिक कार्य है। समन्वय, सामूहिक कार्य से कहीं अधिक है ओर इसका (समन्वय) अर्थ है - प्रयत्नों की समकालिकता अर्थात् प्रयत्न एक ही समय में होने चाहिए।'

समन्वय के प्रकार

1. लम्बरूप समन्वय (Vertical Coordination)
इस प्रकार के समन्वय में सत्ता एवं पदसोपान का विशेष महत्त्व है। उच्चाधिकारी अपनी सत्ता को तत्कालीन अधीनस्थ अधिकारी या कर्मचारी से समन्वय स्थापित करता है।
एक पदसोपान व्यवस्था में इस प्रकार का समन्वय उत्पन्न करने के लिये शक्तियों का प्रत्यायोजन करना पड़ता हैं। इसके लिये निरीक्षण, नियंत्रण तथा निर्देशन आदि तकनीकी बातों को ध्यान में रखा जाता है। उच्च पदाधिकारी को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों में विश्वास एवं आदान-प्रदान की भावना का विकास उत्पन्न करना पड़ता है। समन्वय की प्रायोजित व्यवस्था में सत्ता लम्बरूप में ऊपर से नीचे की ओर क्रमिक रूप से चलती है,  मध्य में बाधा उत्पन्न करने वाले व्यक्तियों को कार्य से पृथक् कर दिया जाता है।

2. क्षैतिजिक समन्वय (Horizontal Coordination)
समतल प्रकार का समन्वय, प्रबन्ध के समान स्तरों पर किया जाता है। यदि समान स्तर के पदाधिकारियों के मध्य समन्वय स्थापित किया जा सके तो प्रशासन की गति ही रूक जायेगी। इस प्रकार की समन्वय की व्यवस्था में पदाधिकारी एक-दूसरे पर अपनी सत्ता लादने की कोशिश नहीं करते। वे समान स्तर पर स्वयं ही समन्वय स्थापित कर लेते हैं।

3. आन्तरिक समन्वय (Internal Coordination)
आन्तरिक समन्वय संगठन की विविध इकाइयों के मध्य किया जाता है। यह कर्मचारियों के मध्य होता है और बाह्य तत्वों से प्रभावित नहीं होता।

4. बाह्य समन्वय (External Coordination)
जब कभी समन्वय जनमत, राजनीतिक दल, शासकीय नीतियों तथा अन्य व्यक्तिगत समस्याओं द्वारा प्रभावित होता है, उसे हम बाह्य प्रकार का समन्वय कहते हैं। यदि संगठन में बाह्य संस्थाओं के साथ तालमेल उत्पन्न न किया जावे, तो वह अपने उद्देश्यों की पूर्ति में असफल हो जायेगा और प्रशासन में विविध प्रकार की बाधाएँ उत्पन्न होंगी।

समन्वय की आवश्यकता एवं महत्त्व

  • परस्पर विरोध की भावनाओं को दूर करने हेतु समन्वय आवश्यक है। एक संगठन में विभिन्न योग्यताओं, भिन्न रूचियाँ, भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों और मूल्यों तथा विभिन्न प्राथमिकताओं वाले लोग कार्य करते है। संगठन में कार्य करते समय प्रतिस्पर्धा, विरोधीभाव, अहंकार की भावना आदि से शक्ति एवं सत्ता के लिए झगड़े उत्पन्न होते हैं।
  • समन्वय द्वारा संगठन की विभिन्न इकाइयों के बीच परस्पर सामंजस्यपूर्ण भावना का विकास किया जाता हैं। 
  • समन्वय संगठन की विभिन्न इकाइयों के बीच प्रयत्नों की एकरूपता को स्पष्ट करता है जिससे कार्यों की पुनरावृति नहीं होती, जिससे संगठन मितव्ययी एवं कार्यकुशल बनता हैं।
  • समन्वय संगठन की विभिन्न इकाइयों में सहयोग की अपेक्षा करता है, जिससे संगठन की सभी इकाइयाँ क्रमबद्ध रूप से जुड़ी रहती है और संगठन एकीकृत इकाई के रूप में अपनी पहचान बनाता हैं।
  • समन्वय संगठन की विभिन्न इकाइयों तथा उनके विभिन्न कर्मचारियों के बीच सकारात्मक एवं व्यवस्थित सहयोग विकसित करता है, परिणामस्वरूप उद्देश्य की राह आसान हो जाती है।
  • आज के तकनीकी युग में प्रत्येक संगठन विशेषीकृत इकाइयों का समुच्च्य बन चुका है एवं उनके प्रयत्नों के बीच तालमेल बिठाना आज के समय की महती आवश्यकता है।
  • मितव्ययता एवं कार्यकुशलता की दृष्टि से भी समन्वय का अपना महत्व है।

समन्वय के साधन

प्रशासनिक संगठन में समन्वय स्थापित करने के बहुत से साधन हैं। इन साधनों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।
  1. औपचारिक साधन
  2. अनौपचारिक साधन

औपचारिक साधन (Formal Means)
संगठन अपनी विभिन्न इकाइयों एवं गतिविधियों में समन्वय स्थापित करने में निम्न एक से अधिक औपचारिक साधनों को, एक समय में उपयोग में लाता है। वे हैं-
  1. नियोजन
  2. पर्यवेक्षण
  3. सत्ता के माध्यम से
  4. सांगठनिक प्रयासों द्वारा यथा-सम्मेलन, संगोष्ठियाँ, अन्तर्विभागीय सम्मेलन आदि।
  5. सम्पर्क व्यक्ति की नियुक्ति के द्वारा
  6. केन्द्रीकृत गृहपालन क्रियाओं की स्थापना के माध्यम से
  7. लिखित सम्प्रेषण की व्यवस्थित पद्धति स्थापित कर
  8. सामूहिक निर्णय प्रक्रिया अर्थात् सहभागिता द्वारा
  9. क्रियाविधियों के मानकीकरण द्वारा
  10. मुख्य कार्यपालिका द्वारा विभिन्न इकाइयों के बजट निर्धारण के माध्यम से।

अनौपचारिक साधन (Informal Means)
संगठनों की विभिन्न गतिविधियों में उचित तालमेल स्थापित करने हेतु औपचारिक साधनों के साथ-साथ कई अनौपचारिक साधनों का भी सहयोग लिया जाता है, वे हैं-
  • व्यक्तिगत नेतृत्व क्षमताओं का सहयोग लेकर
  • अन्तर्वैयक्तिक सम्बन्धों के माध्यम से
  • सामूहिक भोज, सामूहिक खेल आयोजन, भ्रमण, समारोहों और चाय पार्टियों के माध्यम से भी समन्वय किया जाता है।
  • समन्वय में उच्चाधिकारी की भावुक अपीलें भी सम्मिलित होती हैं।
  • सहभागी निर्णय निर्माण प्रक्रिया भी समन्वय में सहयोग करती है।

अच्छे समन्वय की पूर्व शर्ते

  1. पद सोपान की रचना पूर्ण स्पष्ट हो तथा यह पिरामिड की तरह लगता भी हो। इसमें सत्ता एवं उत्तरदायित्व की स्पष्ट व्यवस्था हो।
  2. संगठन का प्रत्येक कार्मिक अपनी इकाई के मुखिया के प्रति उत्तरदायी हो।
  3. बड़े मुख्य विभागों के अधीन तुरंत उप विभागों का गठन, उद्देश्य, कार्य तथा आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए।
  4. जहाँ तक सम्भव हो सके, प्रत्येक विभाग स्वावलम्बी हो तथा उनकी एकीकरण प्रक्रिया समन्वय की आवश्यकताओं के अनुकूल हो।
  5. विभागों की संख्या कम होनी चाहिए, ताकि मुख्य कार्यपालिका प्रभावी ढंग से उन पर नियंत्रण रख सके।
  6. प्रबन्ध तथा समन्वय के लिए सामान्य और सहायक स्टाफ सेवाएँ गठित की जानी चाहिये।
  7. बड़े संगठनों की सहायक क्रियाएँ, जैसे कार्मिक प्रबन्ध तथा वित्तीय प्रबन्ध मुख्य कार्यकारी के अधीन होने चाहिये।
  8. सूत्र और स्टाफ अभिकरणों के भेद को किसी व्यावहारिक नियम के अन्तर्गत पुनर्गठित किया जाना चाहिए।

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