संगठन - संगठन का अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य, महत्व, आधार एवं रूप | sangathan

संगठन

किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिये सामूहिक रुप से किया गया योजनाबद्ध प्रयास प्रशासन' कहलाता है। यह आवश्यक है कि सामूहिक उद्देश्यों के लिए लोग ठीक प्रकार से संगठित हों, तभी वे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। यह तब ही संभव हो सकता है, जब एक ठोस संगठन की संरचना की जाए, जिसके माध्यम से लोगों की सामुहिक शक्ति को ठीक प्रकार से सामान्य लक्ष्य प्राप्ति के लिये व्यवस्थित किया जा सके। अतः संगठन को प्रत्येक प्रशासकीय कार्य की पहली कड़ी कहा जा सकता है।
वर्तमान समय में संगठन मानव की प्रत्येक गतिविधि के साथ जुड़ा हुआ है। अमिताई इटजिओनी के शब्दों में, "कुशल संगठन के अभाव में हमारा जीवन स्तर, हमारी संस्कृति और हमारा प्रजातान्त्रिक जीवन कायम नहीं रह सकता।' मानव कल्याण और संगठनात्मक विवेक एक सीमा तक साथ-साथ चलते हैं। मनुष्य संगठन के लक्ष्यों को अपने जीवन के मूल्यों के रूप में स्वीकार करते हैं। मनुष्यों का अधिकांश समय किसी-न-किसी संगठन में व्यतीत होता है। मनुष्यों की पहचान भी इसी आधार पर होती है कि वे कैसे संगठन के सदस्य हैं। डब्ल्यू. एच. व्हाइट का यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है कि हम " संगठनात्मक मानव युग" में रह रहे हैं।

संगठन का अर्थ

सामान्य अर्थ में संगठन का तात्पर्य किसी कार्य को योजनाबद्ध रूप से सम्पन्न करना है। संक्षिप्त ऑक्सफोर्ड शब्दकोष के अनुसार , संगठन शब्द का निर्माण " टू ऑर्गनाइज' से हुआ है, जिसका तात्पर्य, तैयार करना एवं चालू अवस्था में रखना है। संगठन शब्द का प्रयोग तीन अर्थों में किया जा सकता है। प्रथम, संरचना का ढांचा तैयार करना एवं द्वितीय, उसका निर्माण करना तथा तृतीय, स्वयं संरचना है। इसी शब्दकोष के अनुसार ही संगठन का अर्थ "किसी वस्तु के परस्पर आश्रित भागों को जोड़ने के कार्य को कहते हैं, जिससे प्रत्येक भाग को विशिष्ट कार्य मिल जाए और वह सम्पूर्ण भागों से सम्बन्ध रखता हुआ कार्य को सम्पन्न कर सके।"

एल. डी. व्हाइट के अनुसार, "संगठन का अर्थ कर्मचारियों की उस अवस्था से है, जो निश्चित किए हुए विषयों की प्राप्ति के लिये कार्यों एवं उत्तरदायित्वों को विभाजित करके स्थापित की जाती है।

गॉस ने संगठन की परिभाषा देते हुए लिखा है कि "किसी एक कार्य में लगे हुए व्यक्तियों तथा समूहों के प्रयत्नों एवं क्षमताओं का सम्बन्ध ही संगठन है, जिससे कम से कम संघर्ष से वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके, जिनके लिये वह कार्य किया जा रहा है तथा जो उस उद्यम से सम्बन्धित है, उन्हें उससे अधिकतम सन्तोष प्राप्त हो सके ।"

ग्लैडन के अनुसार , “संगठन का सम्बन्ध किसी उद्यम में लगे हुए व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों के आकार से है, जिनका निर्माण इस प्रकार किया जाना चाहिए कि जिससे वे उस उद्यम कार्यों की पूर्ति कर सकें।"

जे. डी. मुने के अनुसार, “संगठन सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मानवीय सहयोग है।" मिल्वर्ड ने संगठन की परिभाषा देते हुए लिखा है, "प्रत्यायोजित सत्ता रेखा से जुड़े हुए अन्तर्सम्बन्धित अंगों की व्यवस्था संगठन संरचना कहलाती है।" एल. उरविक के अनुसार, "संगठन में उन क्रियाओं का निर्धारण आता है, जो किसी भी कार्य या योजना के लिये आवश्यक है और उनकों ऐसे वर्गों में क्रमबद्ध करना है कि वे विभिन्न व्यक्तियों को सौंपे जा सके” साइमन ने संगठन की परिभाषा देते हुए बतलाया है कि, “मनुष्यों के एक वर्ग में परस्पर व्यवहारों तथा सम्बन्धों की जटिल संचार व्यवस्था को ही संगठन कहा जाता है।" सुल्जे के अनुसार ,“एक संगठन एक मानव सामग्री साधन, स्थान तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं को क्रमबद्ध तथा प्रभावशाली ढंग से जुटाने को कहते हैं, जिससे वांछित लक्ष्य प्राप्त हो सके।
संगठन की उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर संगठन शब्द व्यापक अर्थ रखता है। संगठन के संरचनात्मक दृष्टिकोण से सम्बन्धित विद्धान संगठन का तात्पर्य आकार एवं निर्माण से लेते हैं जिसमें एक आकार तैयार किया जाता है और उस आकार के अनुरूप संगठन का ढांचा खड़ा किया जाता है, इकाइयों का उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाता है तथा उचित व्यक्तियों की भर्ती की जाती है। इसमें मानवीय सम्बन्धों के पक्ष को कोई महत्त्व नहीं दिया गया है। डिमोक एवं डिमोक के शब्दों में- "संगठन में संरचना तथा मनुष्य दोनों ही होते है।" संगठन को केवल एक संरचना के रूप में ही देखना तथा मनुष्यों को, जो उसका निर्माण करते हैं और जिनकी सेवा में संगठन संलग्न होता है, उपेक्षा करना तथा उनका ध्यान न रखना सर्वथा अव्यावहारिक है। अतः आधुनिक विद्वानों ने संगठन में मानवीय पहलुओं को भी विशिष्ट स्थान दिया है। वे इसे एक जीव प्रक्रिया मानते हैं उनके अनुसार , संगठन एक जीवित प्राणी के समान है। इसमें सभी प्रक्रियाएँ दिखाई देती है, जिन्हें हम नाड़ी, हृदय धड़कन, रक्त संचार इत्यादि नामों से पुकारते हैं।

संगठन का कार्य लोगों के लिए साधनों एवं अवसरों की संख्या बढ़ाना है, जिनके लिये इसकी स्थापना की गई है। इसमें परिवर्तन की सम्भावना जुड़ी रहती है। ग्लेडन के अनुसार ,"कोई भी परिवर्तनरहित संगठन मरणासन्न है। साइमन के अनुसार , संगठन अपने सदस्यों को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित करता है-
  1. कार्य विभाजन द्वारा,
  2. प्रामाणिक प्रयोगों को निर्धारित करके,
  3. नीचे, ऊपर तथा पाश्वों में अपने निर्णयों को प्रसारित करके,
  4. संचार व्यवस्था स्थापित करके जिसमें सभी प्रकार की सूचनाएँ उपलब्ध हों,
  5. सदस्यों को प्रशिक्षण द्वारा।

संगठन सम्बन्धी दृष्टिकोण औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठन
संगठन के सम्बन्ध में अलग-अलग व्यक्तियों का अलग-अलग दृष्टिकोण रहता है। संगठन से सम्बन्धित विद्वान संगठनों को दो प्रकार का मानते हैं- औपचारिक संगठन एवं अनौपचारिक संगठन। औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठनों को विभिन्न नामों से भी पुकारा जाता है, जैसे - औपचारिक संगठन को नौकरशाही, पदसोपानीय, यान्त्रिक एवं शास्त्रीय तथा अनौपचारिक संगठन को सामूहिक, प्रतिस्पर्धी, खुला बाजार, मानवीय, प्राकृतिक, एवं आंगिक कह कर पुकारा जाता है। दोनों प्रकार के संगठनों के मिश्रित स्वरूप से सम्बन्धित नये दृष्टिकोण को जेम्स थोम्पसन ने "नयी परम्परा" के नाम से पुकारा है।

औपचारिक संगठन

औपचारिक संगठन का तात्पर्य ऐसे संगठन से है, जिसमें संगठन का ढांचा स्पष्टतया परिभाषित रहता है। संगठन पदसोपान एवं कार्य विभाजन के सिद्धान्तों पर आधारित रहते हुए अपने वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। वह संगठन का परम्परागत स्वरूप है जिसका लोक प्रशासन के विचारों पर पूरा प्रभाव पड़ा है। संगठन के औपचारिक स्वरूप को कई नामों से पुकारा जाता है। जैसे यान्त्रिक संगठन, नौकरशाही संगठन, पद-सोपानीय संगठन, परम्परागत संगठन, शास्त्रीय संगठन इत्यादि । औपचारिक संगठन के ढ़ाचें में वे रूप एवं पहलू आते हैं जो कि अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं तथा उनमें परिवर्तन धीरे-धीरे होता है। एल. डी. व्हाइट औपचारिक संगठन के बारे में लिखते हैं, "यह सम्बन्धों की एक औपचारिक घोषित स्थिति है जो शासन में कानून तथा उच्चतम प्रबन्ध द्वारा निर्धारित की जाती है" इसे चित्र या रेखाचित्र पर अंकित किया जा सकता है, भले ही यह परिपूर्ण न हो।” एल. उरविक के अनुसार, “संगठन से तात्पर्य वह औपचारिक ढांचा है जिसकी संरचना स्पष्ट सिद्धान्तों, नियमों तथा उपनियमों के आधार पर विशेषज्ञों द्वारा की जाती है।"

औपचारिक संगठन की विशेषताएं
औपचारिक संगठन की इन परिभाषाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि औपचारिक संगठन का स्वरूप स्थाई एवं सुनिश्चित रहता है। ऐसा संगठन कार्य दक्षता पर अधिक जोर देता है। इसमें निर्वैयक्तिक्ता पायी जाती है। औपचारिक संगठन की निम्न विशेषताएँ बतलायी जा सकती है-
  • स्थायी दशाओं में नियमित कार्य सम्पन्न किया जाना है। 
  • कार्य विशेषीकरण (कार्य विभाजन)
  • साधनों (कार्य करने के सही तरीकों) पर जोर दिया जाता है।
  • संगठन के आन्तरिक विभागों का निर्णय संगठन के उपरी अधिकारियों द्वारा किया जाता है।
  • उत्तरदायित्व (किसको क्या कार्य करना या औपचारिक कार्यों का वर्णन ) पर जोर दिया जाता है।
  • प्रत्येक का प्राथमिक उत्तरदायित्व तथा निष्ठा उसकी संगठनीय उप-इकाई के प्रति रहती है।
  • संगठन का स्वरूप पदसोपानीय रहता है (संगठन पिरामिड की तरह दिखाई देता है।)
  • संगठन के बारे में ज्ञान केवल पद सोपान के शिखर पर रहता है। (केवल मुख्य कार्यपालिका ही प्रत्येक बात को जानता है।)
  • संगठन में मनुष्यों का आपसी व्यवहार लम्बवतीय होता है, एक ऊपर से आदेश प्राप्त करता है तथा अपने अधीनस्थ को प्रेषित करता है।
  • व्यवहार की प्रणाली आज्ञापालन, आदेश तथा सर्वोच्च अधीनस्थ सम्बन्धों द्वारा निर्देशित होती है।
  • संगठन में प्रतिष्ठा का अंकन व्यक्ति द्वारा धारित पद या कार्यालय से होता है।

औपचारिक संगठन सम्बन्धी दृष्टिकोण
औपचारिक संगठन से सम्बन्धित दृष्टिकोणों को तीन विचारधाराओं के अन्तर्गत विभाजित किया जा सकता है।

1. नौकरशाही विचारधारा
संगठन के सम्बन्ध में नौकरशाही की विचारधारा को केन्द्रीय मानते हुए जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर द्वारा प्रतिपादित विचारधारा इस बात पर जोर देती है कि संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति करने के लिये नौकरशाही अनिवार्य है। यह आदर्श प्रारूप है। वेबर की इस विचारधारा की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-
  • पदसोपान
  • पदोन्नति व्यावसायिक कार्य कुशलता एवं योग्यता पर आधारित ।
  • नौकरशाही में जीवनवृत्ति की प्रवृत्ति पाई जाती है।
  • नियम के पालन पर जोर ।
  • संगठन के कर्मचारियों एवं सम्बन्धित व्यक्तियों के बीच निर्वैयक्तिक सम्बन्ध रहता है।
मैक्स बेबर की नौकरशाही विचारधारा को मानवीय सम्बन्धों पर जोर देने वाले विद्वान स्वीकार नहीं करते हैं क्योंकि यह विचारधारा यान्त्रिक दृष्टिकोण के सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसे कठोर साधनों पर अधिक जोर देने तथा अमानवीय होने के कारण अव्यावहारिक माना जाता है।

2. वैज्ञानिक प्रबन्ध विचारधारा
संगठन के औपचारिक स्वरूप के सम्बन्ध में दूसरा दृष्टिकोण वैज्ञानिक प्रबन्ध का है। बीसवीं सदी में विकसित यह विचारधारा मुख्यतया फ्रेडरिक टेलर की देन है जिसके अनुसार, प्रबन्ध सच्चा विज्ञान है जो सुनिश्चित विधियों, नियमों, सिद्धान्तों पर आधारित है। प्रबन्ध से तात्पर्य उन विभिन्न सिद्धान्तों से है जो सभी प्रकार के संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य उत्पादन वृद्धि में संगठनात्मक कार्य-कुशलता तथा मितव्ययता को प्राप्त करना है। वैज्ञानिक प्रबन्ध विचारधारा मनुष्य को मशीन के समकक्ष मानती हुई इस बात पर जोर देती है कि उसके द्वारा किये जाने वाले कार्यों में मशीन की भांति कार्य कुशलता आये।
वैज्ञानिक प्रबन्ध से सम्बन्धित विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से कुछ सिद्धान्तों का सामान्यीकरण किया गया है-
  1. कार्यों के तरीकों का मानकीकरण।
  2. मजदूरों का वैज्ञानिक चयन एवं प्रशिक्षण।
  3. प्रबन्धकों एवं मजदूरों के बीच समान कार्य विभाजन ।
  4. प्रबन्धकों एवं मजदूरों में परस्पर विश्वास एवं सहयोग।
वैज्ञानिक प्रबन्ध विचारधारा ने संगठनीय सिद्धान्तों को एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया । अपने अनुभव एवं प्रयोगों द्वारा इसके प्रणेता फ्रेडरिक विन्सलो टेलर ने संगठन की कार्य कुशलता एवं मितव्ययता के लिये इस बात पर बल दिया कि प्रबन्ध को निर्धारित विधियों एवं सिद्धान्तों, जो सभी संगठनों में सार्वभौमिक रूप से लागू किये जा सकते हैं,पर आधारित होना चाहिए ।
यद्यपि वैज्ञानिक प्रबन्धक विचारधारा का काफी लम्बे समय तक लोक-प्रशासन में प्रचलन रहा, पर आलोचकों ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया कि मनुष्य मशीन के समान हैं।

3. प्रशासकीय प्रबन्ध विचारधारा
संगठन के औपचारिक दृष्टिकोण से जुड़ी तीसरी विचारधारा “प्रशासकीय प्रबन्ध है। लूथर गुलिक, एल. उरविक, जे. डी. मूने एवं ऐलेन सी. रिले इसके प्रमुख प्रणेता हैं। यह विचारधारा यह मानती है कि प्रशासन, जहां भी है, वह अपनी शक्ति, प्रबन्ध के सिद्धान्तों के अनुसंधान में लगाता है, ये सिद्धान्त कहीं भी प्रयोग में लाये जा सकते हैं। गुलिक एवं उरविक ने इस सम्बन्ध में “पोस्डकोर्ब' का प्रचलन किया । मूने एवं रिले ने समन्वय, पदसोपान, कार्य- विभाजन एवं लाइन एवं सूत्र के सिद्धान्तों का प्रचलन किया। मेरी पार्कर फोलेट एवं हेनरी फियोल ने भी प्रशासकीय सिद्धान्त बतलाये । ये प्रशासकीय सिद्धान्त संगठन में कार्य कुशलता के लिये आवश्यक माने गये। इस विचारधारा ने औपचारिक संगठनों को जन्म दिया। यद्यपि मानवीय सम्बन्धों के पक्षधर तथा इस सिद्धान्त के आलोचक इन्हें कठोर, अमानवीय, अव्यावहारिक इत्यादि कह कर आलोचना करते हैं। हरबर्ट साइमन इन्हें "कहावतें" कहते हैं।

अनौपचारिक संगठन

कोरसन एवं हैरिस लिखते हैं कि, "किसी भी संगठन का वास्तविक चित्र हमें औपचारिकता में नहीं मिलता क्योंकि प्रत्येक संगठन में भिन्न-भिन्न एवं जटिल सम्बन्ध होते हैं, जिसका  अध्ययन करना आवश्यक होता है। संगठन की औपचारिक योजना कार्यरूप में सदैव उससे भिन्न हो जाती है। संगठन की औपचारिक तस्वीर के आधार पर गहराई में नहीं पहुंच सकते। संगठन में अनेक प्रकार के अलिखित दबाव एवं प्रभाव होते हैं। हर्बर्ट साइमन के अनुसार, "अनौपचारिक संगठन से तात्पर्य, उन अन्तरर्वैयक्तिक सम्बन्धों से है, जो संगठन के निर्णयों को प्रभावित करते हैं, जिनका उल्लेख औपचारिक योजना में होने से रह गया है या उसके भाग के रूप में नहीं है।" यह संगठन के सदस्यों के वास्तविक व्यवहार का रूप है। अनौपचारिक संगठन को कई नामों से पुकारा जाता है, जैसे "कोलेजियल", "प्रतियोगी”, “प्राकृतिक", "आंगिक", "खुला मॉडल" इत्यादि।
एल. डी. व्हाइट ने अनौपचारिक संगठन की परिभाषा देते हुए यह लिखा है कि, " यह अधिक उग्र होता है। सामाजिक एवं आर्थिक अन्तर, जाति या भाषा का अन्तर, शिक्षा का स्तर एवं वैयक्तिक रूचियां या अरूचियां इत्यादि संगठन पर प्रभाव डालती हैं। यह न तो लिखा हुआ होता है और न ही निर्मित बल्कि भावना प्रधान होता है। अनौपचारिक संगठन की निम्नलिखित विशेषताएं है-
  1. अस्थायी दशाओं के परिणामस्वरुप उत्पन्न कार्य ।
  2. विशेषीकृत ज्ञान, सामान्य कार्यों की पूर्ति के लिए।
  3. लक्ष्यों पर जोर।
  4. संगठन के आन्तरिक विवादों का संगठन के मुखिया द्वारा परस्पर विचार विमर्श द्वारा निराकरण।
  5. उत्तरदायित्वों का बिखराव।
  6. प्रत्येक की निष्ठा एवं उत्तरदायित्व सम्पूर्ण संगठन के प्रति।
  7. संगठन की लचीली संरचना।
  8. संगठनीय ज्ञान प्रत्येक स्तर पर।
  9. संगठनीय मानवों में क्षितिजीय एवं लम्बवतीय क्रिया एवं प्रतिक्रिया ।
  10. संगठनीय क्रियाएं एवं प्रतिक्रियाएं परामर्श के रूप में।
  11. संगठन में प्रतिष्ठा का निर्धारण व्यक्तिगत, व्यावहारिक कार्यकुशलता एवं प्रतिष्ठा द्वारा।
अनौपचारिक संगठन, औपचारिक संगठन की कार्यशीलता को प्रभावित करते है। अनौपचारिक संगठन के सदस्य अपने मानकीकरण स्थापित कर लेते हैं जो सामान्य हितों एवं विचारों के आदान-प्रदान पर आधारित रहते हैं। ऐसे संगठनों का मूल उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है। बर्नार्ड के शब्दों में, "औपचारिक संगठन सामाजिक संगठन में विद्यमान भावनाओं एवं मूल्यों का ध्यान नहीं रख सकता जिसके साथ व्यक्ति एवं व्यक्तियों के समूह अनौपचारिक रूप से जुड़े हुए होते हैं। यह बात समझ लेनी चाहिये कि अनौपचारिक संगठन, सामाजिक जीवन एवं उसके अस्तित्व का मूल रूप है। गोलेफ लिटरर के शब्दों में, “ऐसे संगठन मानव जीवन के आवश्यक चलायमान भाग एवं अविच्छेदनीय अंग हैं। यह पूर्ण संगठन होता है।

अनौपचारिक संगठन सम्बन्धी दृष्टिकोण या विभिन्न विचारधाराएँ

अ. मानव सम्बन्ध विचारधारा
अनौपचारिक संगठन से जुड़ी मानव सम्बन्ध विचारधारा अनौपचारिक सम्बन्ध, मानवीय भावनाएं तथा समूह व्यवहार को संगठन के क्रिया-कलापों का केन्द्र मानता है। एल्टन मेयो, फ्रिटज जे. रोथलिसबर्गर एवं डब्ल्यू. जे. डिक्सन द्वारा किये गए प्रयोगों के आधार पर यान्त्रिक या औपचारिक विचारधारा के सिद्धान्तों को अव्यावहारिक बताते हुए, संगठन के बारे में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। ये प्रयोग "हाथोर्न प्रयोग" के नाम से विख्यात हैं।
मानव सम्बन्ध विचारधारा के अन्तर्गत निम्नलिखित निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए-
  • मानव श्रमिक मशीन के समकक्ष नहीं है।
  • श्रमिक द्वारा उत्पादन, सुविधापूर्ण भौतिक दशाओं पर निर्भर नहीं करता है।
  • उत्पादन का स्तर संगठन में समूह द्वारा निर्धारित किया जाता है।
  • व्यक्तिगत सन्तुष्टि और मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति का कार्य की दशाओं पर प्रभाव पड़ता है।
इस विचारधारा का बाद के संगठनीय विचारकों पर भी प्रभाव पड़ा। अभिप्रेरण एवं कार्य सन्तोषीकरण से सम्बन्धित अनुसन्धान इस विचारधारा से प्रभावित रहे। ए. एच. मैसलो, फ्रेडरिक हजबर्ग इत्यादि ने इसी विचारधारा से प्रेरणा ली।

ब. संगठनीय विकास
संगठनीय विकास विचारधारा महत्त्वपूर्ण विचारधारा है, जो व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर संगठन की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए ऊपर से किया गया योजनाबद्ध संगठनीय प्रयास है। इस प्रयास में बाहरी परामर्श की सहायता ली जा सकती है। इस विचारधारा की निम्नलिखित विशेषताएं है-
  • प्रत्येक सदस्य की दूसरों के साथ दक्षता में वृद्धि,
  • संगठन में मानवीय भावनाओं की वैधानिकता,
  • सदस्यों में परस्पर विश्वास का विस्तार,
  • तनाव में कमी,
  • "टीम प्रबन्ध" एवं अन्तर्समूह सहयोग को बढ़ावा,
  • गैर सत्तात्मक एवं परस्पर क्रियाओं द्वारा संघर्षों के समाधान की तकनीक का विकास और
  • कम संरचित एवं आर्थिक आंगिक संगठन ।
कुर्त लेविन, लिपिट, मैक ग्रेगर, बैले इत्यादि विद्वानों ने इस विचारधारा को विकसित किया।

स. संगठन अपने परिवेश में एक इकाई के रूप
चेस्टर बर्नार्ड, डेविड़ सेल्जनिक तथा बर्टन क्लार्क ने संगठन को विश्लेषण की एक पूर्ण इकाई मानते हुए यह बतलाया है कि संगठनीय दबाव एवं तनाव पर्यावरण से आते हैं तथा संगठन को एक व्यूह रचना तैयार करनी चाहिए, जिससे वह पर्यावरण द्वारा उत्पन्न समस्याओं का मुकाबला कर सके। संगठन के सदस्य सामाजिक एवं मानसिक दृष्टि से पर्यावरण से प्रभावित होते हैं।

औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठनों में अन्तर
अन्तर का आधार औपचारिक संगठन अनौपचारिक संगठन
1. संगठनीय पर्यावरण स्थायी, नियमित अस्थायी
2. मानव की प्रकृति सिद्धान्त पर बल व्यवहार पर बल
3. कार्यों का आधार आदेश एवं आशा, नियम मानववाद, संचार खुलापन, नवोन्मेषण
4. संगठन की सामाजिक नागरिक एवं नौकरशाही नागरिक के रूप में ही नौकरशाही की भूमिका

औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठन में पूर्व वर्णित अन्तर होते हुए भी एक दूसरे के विरोधी या विकल्प के रूप में नहीं है। कोई भी औपचारिक योजना, चाहे वह कितनी कुशलता के साथ बनायी गई हो, पूर्ण नहीं हो सकती है, उसमें शून्यता आ जाती है । जिसकी पूर्ति अनौपचारिक संगठन के द्वारा ही की जा सकती है। यह असमानता बढ़ती जाती है क्योंकि रेखाचित्रों की निर्धारित बातें, सामाजिक तथा आर्थिक भाषाओं के अन्तर, शिक्षा सम्बन्धी स्तर, जाति, विचार इत्यादि को ध्यान में रखकर संशोधित एवं परिवर्तित हो जाती है। चेस्टर बर्नार्ड के शब्दों में "अनौपचारिक संगठन कोई बुराई नहीं है, अगर वह पहले से अस्तित्व में नहीं है तो इसकी रचना करनी होगी।
ये दोनों विचारधाराएँ आपस में एक दूसरे का विकल्प भी नहीं हैं। ये संगठन के कार्यों के दो भिन्न पहलुओं से सम्बन्ध रखती है। अतः इन पहलुओं के आन्तरिक सम्बन्धों को ध्यान में रखकर ही संगठनीय समस्याओं का समाधान ढूंढना पड़ता है। औपचारिक संगठन सिद्धान्ततः अनुपयुक्त व अपूर्ण हो सकता है, जब तक इसमें अनौपचारिक संगठन के सिद्धान्तों से सुधार नहीं कर लिया जाता। साथ ही अनौपचारिक संगठन पर ज्यादा जोर दिया जाता है तो इससे श्रम विभाजन, कार्य, पृथक्करण एवं उत्तरदायित्व निर्धारण की समस्याएँ पैदा हो जाएगी । संगठन के विद्यार्थियों के लिए यह स्पष्टः चुनौती है कि केवल एक ही सिद्धान्त को कैसे प्रयोग में लाया जाए।

निष्कर्ष
औपचारिक एवं अनौपचारिक विचारधाराओं का मूल्यांकन करते हुए एक यह पक्ष प्रस्तुत किया जाता है कि औपचारिक स्वरूप को प्राथमिकता दी जाये। अगर ऐसा नहीं होता है तो संगठन में निर्दयता, निरर्थकता एवं अकार्यकुशलता की प्रवृत्तियाँ विकसित हो जायेंगी, जो संगठन के उद्देश्य प्राप्ति में रूकावटें पैदा करेंगी। दूसरा दृष्टिकोण, प्रबन्धकीय संस्थाओं के औपचारिक एवं अनौपचारिक सम्मिश्रण को उपयुक्त मानता है। फिफनर एवं प्रेस्थस लिखते हैं कि " एक प्रबन्धकीय संस्था जिसमें औपचारिक और अनौपचारिक संगठन मुख्य रूपरेखा से मेल खाते हैं, स्वस्थ एवं प्रसन्न है। संश्लेषित विचारधारा के समर्थक बर्नार्ड, साइमन, थॉमसन, इत्यादि विद्वानों ने यह बताया है कि संगठन का प्रारम्भ औपचारिक रूप से हो, परन्तु आगे कार्य संचालन में संगठनीय व्यवहार एवं उसके पर्यावरण को भी स्वीकार किया जाए। अतः निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठन में अन्तर होते हुए भी एक दूसरे के विरोधी या विकल्प के रूप में नहीं है। संगठन के लिये किसी एक ही सिद्धान्त को प्रयोग में लाना कठिन है। अतः दोनों का सम्मिश्रण उपयुक्त होगा।

संगठन के आधार

संगठनीय उद्देश्य की प्राप्ति और कार्यकुशलता के लिए यह आवश्यक है कि संगठन का निर्माण किसी आधार पर किया जाए। विद्वानों ने संगठन के गठन के आधारों को खोजने का प्रयास किया है।

यूनानी विद्वान अरस्तू ने संगठन के दो आधार बताए थे-
  1. मनुष्यों की संख्या के आधार पर, और
  2. सेवा या उद्देश्य के अनुसार कार्य का विभाजन।

सरकारी तन्त्र सम्बन्धी हॉलडेन समिति (1918) की सिफारिशों के अनुसार, विभागों का गठन दो आधारों पर किया जाना चाहिए-
  1. सेवित व्यक्ति तथा
  2. की जाने वाली सेवाएँ

विभिन्न संगठनों के अध्ययन से संगठन के चार विभिन्न आधार प्रकट होते हैं। जो है :-
  1. कार्य या प्रयोजन
  2. प्रक्रिया
  3. व्यक्ति
  4. क्षेत्र

लूथर गुलिक ने भी संगठन के यही चार आधार बताए हैं और इन्हें “चार P" (Four Ps) कहा है। संगठन के इन चार आधारों को निम्नांकित चार्ट से स्पष्ट किया गया है-

संगठन के आधार
  1. क्षेत्र
  2. प्रयोजन
  3. प्रक्रिया
  4. व्यक्ति

संगठन के उपर्युक्त प्रत्येक आधार का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है-

संगठन के सिद्धान्त

जैसा कि एल. डी. व्हाइट ने कहा है कि मान्य सिद्धान्त आचरण के वे कार्य नियम हैं जो विस्तृत अनुभव के कारण सर्व स्वीकृत होते हैं। फेयोल भी सिद्धान्तों की विश्वसनीयता उनके प्रमाणित होने के आधार पर निश्चित करते हैं। किसी भी औपचारिक संगठन के व्यवस्थित कार्यकरण हेतु कुछ निश्चित प्रक्रियाओं, नियमों एवं सर्वस्वीकृत आधारशिलाओं की आवश्यकता होती है, जिसके अभाव में संगठन दिशाहीन एवं अवरुद्ध हो जाते हैं। संगठन के इतिहास पर दृष्टि डालें तो जब से संगठन की अवधारणा का विकास हुआ, तभी से संगठन के सर्वमान्य सिद्धान्तों की तलाश भी प्रारम्भ हुई और इस दिशा में विशेषतः शास्त्रीय युग और उसके पश्चात् अनेक सिद्वान्तों को खोज निकाला गया। शास्त्रीय युग के अनेक चिन्तकों यथा-लूथर गुलिक, उर्विक, मूने, रैले, फेयोल, टेलर, फॉलेट आदि के इस सम्बन्ध में किये गये प्रयासों को नहीं भुलाया जा सकता।
औपचारिक संगठन के सिद्धान्तों में पदसोपान, आदेश की एकता, नियंत्रण का क्षेत्र, समन्वय, पर्यवेक्षण, विकेन्द्रीकरण, प्रत्यायोजन एवं सूत्र एवं स्टॉफ का सिद्वान्त प्रमुख है।

प्रयोजन

प्रयोजन के आधार पर संगठन का निर्माण किया जाता है। प्रयोजन से तात्पर्य, उस अन्तिम लक्ष्य या उद्देश्य से है जिसे प्राप्त करने के लिए संगठन का निर्माण किया जाता है। वर्तमान में विभिन्न देशों की सरकारें शिक्षा, यातायात, प्रतिरक्षा आदि विभिन्न उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न संगठनों का निर्माण इसी आधार पर करती हैं।

गुण (Merits)
वालेस ने प्रयोजन के आधार पर गठित संगठन के निम्न गुण बताए हैं-
  1. कार्यकुशलता में वृद्धि - एक प्रयोजन की प्राप्ति में सहायक सभी व्यक्तियों, के एक ही संगठन में, एक ही अध्यक्ष के नेतृत्व में मिलजुल कर कार्य करने से संगठन की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।
  2. दोहरेपन का निवारण - एक प्रयोजन से सम्बंधित सभी कार्य, एक ही संगठन द्वारा किये जाने के कारण कार्य का दोहराव नहीं होता है।
  3. निश्चित उत्तरदायित्व - प्रयोजन की प्राप्ति के लिए गठित संगठन का उत्तरदायित्व निश्चित होता है।
  4. नागरिकों को सुविधा - प्रयोजन के आधार पर गठित विभागों के कारण नागरिकों को अपने कार्यों को करवाने में आसानी रहती है। वे सरलता से अपने कार्य के प्रकार के आधार पर समझ लेते हैं, कि उन्हें किस विभाग में जाना है।

दोष (Demerits)
वालेस ने गुणों के साथ इस प्रकार के संगठनों के दोषों का भी वर्णन किया है। जो निम्न हैं-
विभागीकरण की प्रवृत्ति संगठन के सदस्य एक ही विभाग में कार्य करने के कारण विभागीकरण की प्रवृत्ति के शिकार हो जाते हैं। वे केवल संगठन से सम्बन्धित बातों पर ध्यान देते हैं, संगठन के बाहर की बातें नहीं सोच पाते ।
कार्यों की उपेक्षा व्यापक प्रयोजनों की प्राप्ति के लिए गठित विभाग में छोटे-छोटे कार्यों की उपेक्षा कर दी जाती है।
पुनरावृत्ति इससे विभिन्न संगठनों के कार्यों में दोहरापन आ जाता है जैसे सार्वजनिक निर्माण विभाग भी भवनों का निर्माण करवाता है और रेल्वे विभाग भी अपने लिए स्वयं भवनों का निर्माण करवाता है।
विभागीकरण के इस आधार की संस्तुति ब्रिटेन की हॉल्डेन कमेटी (1918-1919), अमेरिका के प्रथम हूवर कमीशन (1949-1950) और प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्ययन दल (1966-70) द्वारा की गयी है।

प्रक्रिया

प्रक्रिया से अभिप्राय तकनीकी व्यवसाय या किसी विशेष कार्य की निपुणता से होता है। जब संगठन का गठन प्रक्रिया के आधार पर किया जाता है, तो उन सभी लोगों को जो एक ही प्रक्रिया काम में लेते हैं। एक ही संगठन के अन्तर्गत लाया जाता है, जैसे चिकित्सा, लेखा विभाग, कानूनी परामर्श आदि । इस प्रकार के विभागों में विशेषज्ञ कर्मचारी रखे जाते हैं। इस आधार पर संगठित विभागों के उदाहरण हैं - कानन विभाग, परमाणु ऊर्जा विभाग आदि।

गुण (Merits)
प्रक्रिया के आधार पर गठित विभागों में निम्न गुण दृष्टिगोचर होते हैं-
  • विशेषीकरण तथा दक्षता में वृद्धि - विशेषज्ञ और तकनीकी व्यक्तियों के एक साथ, एक ही संगठन में कार्य करने से विशेषीकरण तथा दक्षता में वृद्धि होती है। इससे विशेषीकरण तथा तकनीकी दक्षता का सम्पूर्ण उपयोग सम्भव है।
  • मितव्ययी होना - विशेषज्ञ और तकनीकी व्यक्तियों के एक ही स्थान पर कार्य करने से उनके कार्य निष्पादन में आवश्यक महँगे उपकरणों को एक ही स्थान पर समायोजित करने से भारी बचत होती है। अगर विशेषज्ञों को अलग-अलग विभागों से सम्बद्ध कर दिया जाए तो कार्य निष्पादन का स्तर भी गिरेगा और महँगे उपकरणों का प्रत्येक स्थान पर उपयोग भी सम्भव न हो पायेगा।
  • एकरूपता और समन्वय - एक प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने वाले विशेषज्ञ, एक ही संगठन में कार्य करते हैं। अतः इससे संगठन के कार्यों में एकरूपता आती है और समन्वय बढता है।
  • उन्नति के अधिक अवसर - इस प्रकार के संगठनों में विशेषज्ञ व्यक्तियों को अपने व्यावसायिक जीवन में उन्नति के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं।

दोष (Demerits)
वालेस ने प्रक्रिया के आधार पर गठित संगठनों के दोषों को बताया है। जो निम्न हैं।
  • संकुचित दृष्टिकोण (Narrow View) - केवल तकनीकी और विशेषज्ञ कार्यों के निष्पादन से सम्बन्धित रहने के कारण सामान्य और गैर विशेषज्ञतापूर्ण कार्यों की उपेक्षा हो जाती है। इस प्रकार के संगठन में कार्यरत विशेषज्ञ केवल अपने विषय क्षेत्र में ही ध्यान देते हैं, अतः उनका दृष्टिकोण संकीर्ण हो जाता है। इसलिए इस प्रकार की व्यवस्था सम्पूर्ण प्रशासन के लिए हानिकारक होती है।
  • साधनों पर अनुचित बल - इस प्रकार के संगठनों में उद्देश्यों की अपेक्षा साधनों पर अधिक बल दिया जाता है। अतः इस प्रशासन का मुख्य लक्ष्य जनता की सेवा करना, भुला दिया जाता है।
  • संघर्षों की वृद्धि - विशेषज्ञों के एक साथ कार्य करने से, प्रक्रिया आधारित संगठनों में, विशेषज्ञों के मध्य व्यावसायिक अह्म की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह व्यवसायिक अहम आपसी ईर्ष्या-द्वेष और संघर्षों को बढ़ावा देता है।
  • व्यक्ति (Person) - कभी-कभी व्यक्तियों को भी संगठन का आधार बनाया जाता है। किसी विशेष व्यक्ति समूह के कल्याण अथवा उन्हें विशिष्ट सेवाएँ प्रदान करने के उद्देश्य से विभागों का गठन किया जाता है। इस आधार पर गठित विभागों को व्यक्ति आधारित विभाग कहा जाता है। इस प्रकार के संगठन जिस विशेष वर्ग समूह के लिए गठित किये जाते है उसे अनेक प्रकार की सेवाएं प्रदान करने का प्रयास करते हैं। उस वर्ग के उत्थान एवं उन्नति के लिए प्रयासरत रहते हैं।

गुण (Merits)
इस आधार पर संगठन गठित करने के निम्न लाभ हैं-
  • समन्वय - इस प्रकार के संगठन में एक निश्चित वर्ग को सेवाएँ प्रदान की जाती है। अतः प्रदान की जानी वाली सेवाओं के मध्य समन्वय स्थापित करने में सुविधा रहती है।
  • निश्चितता - इस आधार पर गठित संगठन से यह निश्चित हो जाता है कि किस संगठन द्वारा किस वर्ग को सेवाएँ प्रदान करनी है। सेवित व्यक्ति समूह भी सम्बन्धित संगठन से सीधा सम्पर्क स्थापित करने में समर्थ होता है।
  • समस्याओं का समाधान - इस प्रकार से गठित संगठन द्वारा व्यक्ति की समस्त समस्याओं के निराकरण का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार के संगठन का सेवित व्यक्तियों के समूह से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।
  • विभागीय उन्नति में दिलचस्पी - इस प्रकार के संगठन से लाभ प्राप्त करने वाले समूह संगठन की विभागीय उन्नति में गहन आस्था रखते हैं और अपना सम्पूर्ण समर्थन इसे प्रदान करते हैं क्योंकि वे जानते है कि विभागीय उन्नति से संगठन उनके हित में अधिक बेहतर कार्य कर पायेगा।

दोष (Demerits)
व्यक्ति समूह के आधार पर विभागों का गठन करने के कुछ दोष भी हैं। जो निम्नलिखित हैं-
अत्यधिक विभागों के होने का भय - व्यक्ति समूह के आधार पर विभागों का गठन करने से छोटे-छोटे अनेक विभागों का निर्माण हो जायेगा क्योंकि एक समाज में अनेक समूहों का अस्तित्व होता है। हॉल्डेन कमेटी ने इस प्रकार के छोटे-छोटे विभागों को 'लिलिपूटियन प्रशासन' (Lillipution Administration) कहा है।
कार्यक्षेत्र निर्धारण में कठिनाई - विभिन्न व्यक्ति समूहों के हित कई क्षेत्रों में समानताएँ रखते हैं। अतः ऐसी स्थिति में विभागों के कार्यक्षेत्र का निर्धारण करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
विशेषीकरण का विरोध - व्यक्ति समूह के हित में बहुआयामी कार्यक्रमों का आयोजन करने के कारण इस प्रकार के संगठन विशेषीकरण के सिद्धान्त के विरोधी होते है।
राजनीतिक दबाव - इस प्रकार के संगठन व्यक्ति समूहों के आधार पर निर्मित होने के कारण राजनीतिक दबाव से प्रभावित होते हैं। राजनैतिक उतार चढ़ावों का इस प्रकार के संगठनों पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

क्षेत्र

क्षेत्र अर्थात वह स्थान जहाँ पर कार्य किया जाता है, संगठन का आधार होता है। इस सिद्धान्त का आधार यह विश्वास है कि प्रत्येक क्षेत्र विशेष की अपनी अलग समस्याएँ होती हैं। इन अलग-अलग समस्याओं का सामाधान करने के लिए प्रत्येक क्षेत्र विशेष को एक अलग विभाग की आवश्यकता होती है। इस प्रकार जब कोई संगठन एक क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं के आधार पर निर्मित किया जाता है तो इसे क्षेत्रीय या भौगोलिक संगठन कहा जाता है। भारत में क्षेत्र के आधार पर जिलों का निर्माण किया गया है।

गुण (Merits)
क्षेत्र के आधार पर गठित विभाग में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं।
  • समन्वय - ऐसे संगठनों में समन्वय स्थापित करने में सुविधा होती है। एक निर्धारित क्षेत्र में विभिन्न सेवायें प्रदान करने में समन्वय स्थापित करने में सुविधा रहती है।
  • अनुकूलन - ऐसे संगठनों के माध्यम से राष्ट्रीय योजनाओं और कार्यक्रमों को क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित करने में आसानी रहती है।
  • कार्य में सुविधा - क्षेत्रीय संगठनों में कर्मचारी स्थानीय आवश्यकताओं और परिस्थितियों से सुपरिचित होते हैं, इसलिए कार्य करने में सुविधा होती है। संगठन का जनता से सीधा सम्पर्क स्थापित हो पाता है।
  • दूरस्थ क्षेत्रों में प्रशासन सम्भव - इस प्रकार के आधार पर प्रशासनिक संगठनों का निर्माण कर दूरस्थ क्षेत्रों में प्रशासन संचालित करने में सुविधा रहती है। लम्बी दूरी, यातायात और संचार के साधनों के अभाव के बावजूद भी प्रशासन चलाया जा सकता है।

दोष (Demerits)
क्षेत्रीय आधार पर गठित संगठनों में निम्नलिखित दोष होते है।
  1. राष्ट्रीय नीति में एकरूपता का अभाव - इस आधार पर गठित विभागों द्वारा क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार कार्य किया जाता है। अतः राष्ट्रीय नीति के अनुरूप एकरूपता का अभाव मिलता है।
  2. क्षेत्रियता तथा फूट की भावनाओं को प्रोत्साहन - क्षेत्र विशेष के लिए अलग संगठन होने के कारण लोगों में संकीर्ण मनोवृत्ति विकसित होती है। इस कारण क्षेत्रीय आधार पर गठित विभाग स्थानीयता तथा फूट की भावनाओं को प्रोत्साहन देने में योगदान करते हैं।
  3. राजनैतिक दबाव - क्षेत्रीय आधार पर गठित विभाग आसानी से क्षेत्रीय राजनीति के शिकार हो जाते हैं। क्षेत्रीय नेता उन्हें अपने प्रभाव में ले लेते हैं। इस प्रकार ऐसे संगठनों में राजनैतिक दबाव, अन्य संगठनों की अपेक्षा अधिक मिलता हैं।
  4. श्रम विभाजन एवं विशेषीकरण का अभाव - क्षेत्रीय आधार पर गठित विभाग क्षेत्र विशेष के लिए अनेक कार्य करते हैं। अनेक प्रकार के कार्यों को करने के कारण क्षेत्रीय संगठनों में कार्यविभाजन एवं विशेषीकरण का अभाव मिलता है।
इस प्रकार उपर्युक्त चारों आधारों के अपने-अपने गुण एवं दोष हैं। इनमें से कोई भी आधार अपने आप में सम्पूर्ण नहीं है जिसे सार्वभौम रीति से लागू किया जा सके। इस प्रकार संगठन के निर्माण के लिए आधार का चयन परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए। आवश्यकतानुसार एक या दो आधारों का आपस में सम्मिश्रण कर संगठन का निर्माण किया जा सकता है। इस प्रकार संगठन के निर्माण में निहित उद्देश्य को ध्यान में रखकर संगठन के आधार को निश्चित करना चाहिए।

महत्त्वपूर्ण बिन्दु
  • संगठन मानव सामग्री, साधन, स्थान तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं को क्रमबद्ध तथा प्रभावशाली ढंग से जुटाने को कहते हैं, जिससे वांछित लक्ष्य प्राप्त हो सके, औपचारिक संगठन में संगठन का ढांचा स्पष्टतः परिभाषित रहता है।
  • औपचारिक संगठन से सम्बन्धित विचारधाराएँ हैं- नौकरशाही विचारधारा, वैज्ञानिक प्रबन्ध विचारधारा, प्रशासकीय प्रबन्ध विचारधारा।
  • अनौपचारिक संगठन से तात्पर्य उन अन्तरवैयक्तिक सम्बन्धों से है, जो संगठन के निर्णयों को प्रभावित करते हैं। यह संगठन के वास्तविक व्यवहार का रुप है।
  • अनौपचारिक संगठन के विभिन्न नाम हैं - "कोलेजियल", प्रतियोगी, प्राकृतिक, आंगिक, खुला मॉडल | 
  • अनौपचारिक संगठन से सम्बन्धित विचारधाराएं हैं- मानव सम्बन्ध विचारधारा, संगठनीय विकास विचारधारा, परिवेशीय विचारधारा ।
  • संगठनीय उद्देश्य की प्राप्ति और कार्यकुशलता के लिए यह आवश्यक है कि संगठन का निर्माण किसी आधार पर किया जावे।
  • अरस्तु ने संगठन के दो आधार बताये हैं - 1. मनुष्यों की संख्या के आधार पर 2. सेवा या उद्देश्य के आधार पर ।
  • हॉल्डेन कमेटी ने दो आधार बताए हैं। 1. सेवित व्यक्ति 2. की जाने वाली सेवाएँ
  • संगठन के चार आधार हैं- 1. कार्य या प्रयोजन 2. प्रक्रिया 3. व्यक्ति 4. क्षेत्र
  • गुलिक ने संगठन के चार आधारों को Four Ps कहा है।
  • प्रयोजन के आधार पर गठित विभागों के दोष हैं- 1. विभागीकरण की प्रवृत्ति 2. कार्यों की उपेक्षा 3. पुनरावृत्ति
  • प्रक्रिया के आधार पर गठित विभागों के गुण हैं। 1. विशेषीकरण तथा दक्षता में वृद्धि 2. मितव्ययिता 3. एकरुपता और समन्वय 4. उन्नति के अधिक अवसर। 
  • प्रक्रिया के आधार पर गठित विभागों के दोष हैं- 1. संकुचित दृष्टिकोण 2. साधनों पर अनुचित बल 3. संघर्षों की वृद्धि
  • व्यक्ति के आधार पर गठित विभागों के गुण हैं। 1. समन्वय 2. निश्चितता 3. समस्याओं का सम्पूर्ण समाधान 4. विभागीय उन्नति में दिलचस्पी
  • व्यक्ति के आधार पर गठित विभागों के दोष हैं। 1. अत्यधिक विभागों के होने का भय 2. कार्यक्षेत्र निर्धारण में कठिनाई 3. विशेषीकरण का विरोध 4. राजनीतिक दबाव
  • क्षेत्र के आधार पर गठित विभागों के गुण हैं। 1. समन्वय 2. अनुकूलन 3. कार्य में सुविधा 4. दूरस्थ क्षेत्रों में प्रशासन सम्भव
  • क्षेत्र के आधार पर गठित विभागों के दोष हैं 1. राष्ट्रीय नीति में एकरूपता का अभाव 2. क्षेत्रियता तथा फूट 3. राजनीतिक दबाव 4. श्रम विभाजन एवं विशेषीकरण का अभाव
  • संगठन के निर्माण के लिए आधार का चयन परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए।
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