भारत के राष्ट्रपति - भारत के राष्ट्रपतियों की सूची 1950 से 2022 तक | bharat ke rashtrapati

भारत के राष्ट्रपति

भारत में संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है जिसके अन्तर्गत दो प्रकार की कार्यपालिका होती हैं, एक औपचारिक और दूसरी वास्तविक। राष्ट्रपति भारतीय संघ की कार्यपालिका का औपचारिक प्रधान है व व्यवहार में वास्तविक कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद् द्वारा किया जाता है।
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संविधान के अनुच्छेद 53 के द्वारा संघ की कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित की गई हैं। वह अपनी शक्तियों का प्रयोग स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा करता है।

भारत के राष्ट्रपतियों की पूरी सूची

भारत के राष्ट्रपतियों की पूरी सूची

नामकार्यकाल
#डॉ. राजेन्द्र प्रसाद1950 - 1962
#डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन1962 - 1967
#डॉ जाकिर हुसैन1967 - 1969
#वराह गिरि वेंकट गिरि1969 (कार्यवाहक)
#न्यायमूर्ति मुहम्मद हिदायतुल्ला1969 (कार्यवाहक)
#वी. वी. गिरी1969 - 1974
#फखरूद्दीन अली अहमद1974 - 1977
#बी. डी. जत्ती1977 (कार्यवाहक)
#नीलम संजीव रेड्डी1977 - 1982
#ज्ञानी जैल सिंह1982 - 1987
#आर. वेंकटरमन1987 - 1992
#डॉ. शंकरदयाल शर्मा1992 - 1997
#के.आर. नारायणन1997 - 2002
#ए.पी.जे. अब्दुल कलाम2002 - 2007
#श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल2007 - 2012
#श्री प्रणब मुखर्जी2012 - 2017
#श्री राम नाथ कोविंद2017 - 2022
#द्रौपदी मुर्मू2022 से अभी तक

राष्ट्रपति का निर्वाचन


(क) योग्यताएँ (Qualification)
संविधान के अनुच्छेद 58 में राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित होने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ निश्चित की गई हैं-
  • भारत की नागरिकता
  • न्यूनतम 35वर्ष की आयु
  • अन्य ऐसी योग्यताएँ, जो लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए आवश्यक हैं।
उपर्युक्त योग्यताओं के अतिरिक्त संविधान में यह शर्त लगाई गई है कि भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन अथवा उसके नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य निकाय में लाभ का पद धारण करने वाला व्यक्ति राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए पात्र नहीं होगा। अनुच्छेद 59 में यह प्रावधान भी किया गया है कि राष्ट्रपति संसद के किसी सदन या राज्य के किसी विधान मण्डल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा।

(ख) निर्वाचन की विधि
राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचक मण्डल के सदस्यों द्वारा किया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 54 और 55 में राष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बन्धित व्यवस्थाएँ की गई हैं

(i) निर्वाचक मण्डल
राष्ट्रपति के चुनाव के लिए निर्वाचक मण्डल में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य और राज्यों की विधानसभाओं और संघीय क्षेत्र की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित होते हैं। राज्यसभा और लोकसभा के मनोनीत सदस्यों को, तथा जिन राज्यों में विधान परिषदें हैं, उनकी विधान परिषदों के सदस्यों को निर्वाचक मण्डल में सम्मिलित नहीं किया गया है। संघ शासित क्षेत्रों की विधानपरिषदों के सदस्यों को भी निर्वाचक मण्डल का सदस्य नहीं बनाया गया है। निर्वाचक मण्डल के द्वारा राष्ट्रपति के अप्रत्यक्ष चुनाव का निश्चय भारत की संविधान सभा ने लम्बे विचार विमर्श के बाद लिया था । संविधान सभा ने जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान की पद्वति से राष्ट्रपति के चुनाव को इस कारण स्वीकार नहीं किया था कि यह संसदीय प्रणाली के अनुकूल नहीं होगा, तथा यदि जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित राष्ट्रपति का नाममात्र के कार्यपालिका प्रधान के रूप में कार्य करना व्यावहारिक नहीं रहेगा।
संविधान में यह व्यवस्था की गयी है कि जहाँ तक संभव हो, राष्ट्रपति के निर्वाचन में भिन्न भिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के पैमाने में एकरूपता रखी जायेगी। इस उद्देश्य से निर्वाचक मण्डल के समस्त सदस्यों के मतों का मूल्य निर्धारित करने के लिए संविधान में विशेष सूत्र का प्रावधान किया गया है। इस सूत्र के अनुसार किसी राज्य की विधानसभा के एक निर्वाचित सदस्य के मत का मूल्य निर्धारित करने के लिए, राज्य की कुल जनसंख्या में उस राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या का भाग दिया जायेगा और जो भागफल होगा उसमें पुनः 1000 का भाग दिया जायेगा।

राज्य की विधानसभा के सदस्य के मत का मूल्य निम्नलिखित रीति से निर्धारित होगा-

राज्य की विधानसभा के
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राष्ट्रपति के चुनाव में संघ और राज्यों के प्रतिनिधित्व में समानता को सुनिश्चित करने के लिए संसद के निर्वाचित सदस्य के मतों के मूल्य को निर्धारित करने के लिए समस्त राज्यों की विधानसभाओं के लिए नियत किये गये कुल मतों की संख्या के योग में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या का भाग दिया जाता है।
संसद के निर्वाचित सदस्यों की संख्या का मूल्य निम्नलिखित प्रकार से निर्धारित होगा-

संसद के प्रत्येक सदन के
2002 में हुए राष्ट्रपति (डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम) के निर्वाचन के समय निर्वाचक मण्डल के सदस्यों की कुल संख्या 4896 थी इनमें 776 सांसद तथा 4120 विधायक थे। निर्वाचक मण्डल के मतों का कुल मूल्य 1098882 था। सांसदों के मतों का कुल मूल्य 549408 एवं विधायकों के मतों का कुल मूल्य 549474 था। सांसद के मत का मूल्य 708 व विधानसभा के सदस्यों के मतों की संख्या भिन्न भिन्न है, जैसे उत्तरप्रदेश के विधायकों के मतों का मूल्य 208 सर्वाधिक है और सिक्किम के विधायकों के मतों का मूल्य 7 न्यूनतम है।

(ii) मत पद्धति
राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के (Proportional Representation) अनुसार 'एकल संक्रमणीय मत' (Single Transferable Vote) प्रणाली के आधार पर होता है। यह पद्धति इसलिये अपनाई जाती है कि वास्तव में निर्वाचक मण्डल के बहुमत का समर्थन प्राप्त व्यक्ति ही राष्ट्रपति निर्वाचित हो सके। एकल संक्रमणीय मत पद्धति में मतदाता, जितने भी प्रत्याशी हो, उनके संबंध में मतपत्र पर अपनी वरीयता अंकित कर सकता है। यह माना जाता है कि मतदाता ने जिस प्रत्याशी के नाम के आगे प्रथम वरीयता अंकित की है, उसे मत दिया गया है।
निर्वाचित होने के लिए राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को निर्धारित न्यूनतम मत संख्या (Quota) प्राप्त करना आवश्यक होता है।
राष्ट्रपति के चुनावों में प्रत्याशी को निर्वाचित होने के लिए न्यूनतम मतों का कोटा निम्नलिखित सूत्र से निर्धारित होता है-
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यदि मतगणना के प्रथम चरण में किसी उम्मीदवार को न्यूनतम कोटा के बराबर या अधिक प्रथम वरीयता के मत प्राप्त हो जाये तो उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। यदि किसी भी प्रत्याशी को निर्धारित न्यूनतम कोटा के बराबर या अधिक प्रथम वरीयता के मत प्राप्त नहीं होते, तो ऐसे प्रत्याशी को, जिसे प्रथम वरीयता के सबसे कम मत प्राप्त होते हैं, प्रतिस्पर्धा से हटा दिया जाता है। इस प्रकार हटाये गये प्रत्याशी के मतों को मतपत्रों पर अंकित द्वितीय वरीयता के अनुसार प्रतिस्पर्धा में शेष रह गये प्रत्याशियों को हस्तांतरित कर दिया जाता है। इस प्रकार हस्तान्तरित मतों को उन प्रत्याशियों द्वारा प्राप्त प्रथम वरीयता के मतों में जोड़ दिया जाता है। मतगणना के प्रत्येक चरण के पश्चात्, सबसे कम मत प्राप्त प्रत्याशी को प्रतिस्पर्धा से हटाकर, द्वितीय वरीयता के आधार पर मतों के हस्तान्तरण की प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक कि किसी एक प्रत्याशी को न्यूनतम कोटा के निर्धारित मत प्राप्त न हो जायें। यदि मतगणना के समस्त चरण पूरे हो जाने के पश्चात् भी किसी प्रत्याशी को निर्धारित कोटा जितने मत प्राप्त नहीं होते, तो अंतिम चरण में शेष रहे दो प्रत्याशियों मे से अधिक मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है।
कतिपय आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति के चुनाव में अपनायी गयी मत-पद्धति को आनुपातिक प्रतिनिधित्व का नाम दिया जाना उचित नहीं है। वास्तव में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति तब उपयोगी होती है जब एक ही निर्वाचन होना हो। उस स्थिति में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के द्वारा अल्पसंख्यकों को भी उनके मतों के अनुपात में अपने प्रत्याशी निर्वाचित करने का अवसर प्राप्त हो जाता है।

(iii) नामांकन
1952 के राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव अधिनियम के अनुसार राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन पत्र पर निर्वाचक मण्डल के दो सदस्यों के प्रस्तावक व अनुमोदक के रूप में हस्ताक्षर कराना पड़ता था। कोई प्रतिभूति राशि जमा नहीं कराई जाती थी। इस कारण लोग प्रचार मात्र लिए नामांकन भर देते थे। 1967 में 17 उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र भरे। कुछ प्रत्याशियों को एक भी मत नहीं मिला। तब 1974 में उपर्युक्त अधिनियम में संशोधन करके राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के नामांकन पत्र को कम से कम 10 निर्वाचकों द्वारा प्रस्तावित तथा कम से कम 10 निर्वाचकों द्वारा अनुमोदित किया जाना तथा नामांकन पत्र के साथ 2500 रूपये की राशि भी जमानत के रूप में जमा कराना आवश्यक किया गया। किन्तु अगस्त 1997 में पारित राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव (द्वितीय संशोधन) के अनुसार राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए कम से कम 50 प्रस्तावक एवं 50 अनुमोदक का होना अनिवार्य कर दिया गया है। जमानत की राशि 2500 से बढ़ाकर 15,000 रू. कर दी गई है। इस प्रावधान का उद्देश्य राष्ट्रपति चुनाव में गैर जिम्मेदार उम्मीदवार को भाग लेने से हतोत्साहित करना है।
यदि किसी प्रत्याशी को वैध मतों के छठे भाग के बराबर मत नहीं मिलते हैं तो जमानत की यह राशि जब्त कर ली जाती है।
भारत में अब तक 13 बार राष्ट्रपति का निर्वाचन हो चुका है। 1952 और 1957 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारी बहुमत से राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। वे प्रथम वरीयता के मतों के आधार पर ही निर्वाचित घोषित हो गये थे। 1962 में सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन भी प्रथम वरीयता के आधार पर ही राष्ट्रपति चुन लिये गये थे। 1967 में यद्यपि डॉ. जाकिर हुसैन प्रथम वरीयता के मतों के आधार पर ही चुन लिये गये थे किन्तु उन्हें विपक्षी दलों के संयुक्त प्रत्याशी न्यायाधीश के. सुब्बाराव की कड़ी चुनौती का सामना कर पड़ा था। 1969 में डा. जाकिर हुसैन के देहावसान के बाद हुए राष्ट्रपति चुनाव में श्री.वी.वी. गिरि निर्वाचित हुए। इस चुनाव में कोई भी प्रत्याशी निर्धारित न्यूनतम कोटा के बराबर प्रथम वरीयता के मत प्राप्त नहीं कर सका। द्वितीय वरीयता के मतों की गणना के पश्चात् श्री गिरि निर्वाचित हो सके। 1974 में श्री फखरूद्दीन अली अहमद राष्ट्रपति पद के लिए प्रथम वरीयता के मतों के आधार पर ही निर्वाचित हो गये। 1977 में श्री नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति के चुनाव के लिए आम सहमति से निर्वाचित हुए। 1982 में ज्ञानी जैल सिंह प्रथम वरीयता के मतों के आधार पर ही चुन लिये गये। 1987 में श्री. आर. वेंकटरमन भी वरीयता के मतों के आधार पर ही निर्वाचित हुए। 1992 में डा. शंकरदयाल शर्मा भी प्रथम वरीयता के मतों के आधार पर ही चुन लिये गये। 1997 में श्री. के.आर. नारायणन भारत के 11 वें राष्ट्रपति के रूप में मुख्य राजनैतिक दलों के मध्य आम सहमति से निर्वाचित किये गये। जुलाई 2002 में डॉ. ए. पी..जे. अब्दुल कलाम भारत के 12 वें राष्ट्रपति प्रथम वरीयता के आधार पर ही निर्वाचित किये गये। डॉ. कलाम को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अतिरिक्त बसपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस तथा अन्नाद्रमुक का समर्थन प्राप्त था। व्यक्ति के रूप में डॉ. कलाम 11वें राष्ट्रपति थे तथा कार्यकाल के अनुसार वे 12 वें राष्ट्रपति थे क्योंकि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद दो बार राष्ट्रपति बनाये गये थे।

राष्ट्रपति की शपथ

राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित व्यक्ति को पद-ग्रहण करने से पूर्व शपथ लेनी होती है। संविधान के अनुच्छेद 60 में राष्ट्रपति की शपथ का प्रारूप दिया गया है। राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष शपथ लेता है। शपथ में राष्ट्रपति ईश्वर के नाम पर अथवा सत्यनिष्ठा से यह प्रतिज्ञा लेता है कि वह श्रद्धापूर्वक राष्ट्रपति के कार्यो का निर्वाह करेगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का प्रतिरक्षण और संरक्षण करेगा तथा भारत की जनता की सेवा और कल्याण में संलग्न रहेगा।
राष्ट्रपति को संविधान द्वारा प्रदान की गयी शक्तियों को देखते हुए उसकी शपथ का बड़ा महत्त्व है। शपथ के द्वारा राष्ट्रपति को संविधान की रक्षा करने का गम्भीर दायित्व प्रदान किया गया है।

राष्ट्रपति की पदावधि

राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष तक की अवधि तक पद धारण करता है। किन्तु संविधान में यह व्यवस्था है कि पद की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी वह अपने उत्तराधिकारी के पद-ग्रहण करने तक पद पर बना रहेगा। पदावधि समाप्त होने से पूर्व राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति को सम्बन्धित अपने हस्ताक्षरित लेख द्वारा प्रमाण पत्र दे सकेगा व संविधान के अनुसार वह अपने पद पर पुनः निर्वाचित हो सकता है। पदारूढ़ राष्ट्रपति के त्याग-पत्र, मृत्यु या पद से हटाये जाने या अन्य किसी कारण से पद रिक्त हो जाने की स्थिति मे संविधान के अनुच्छेद 65 के अनुसार उप-राष्ट्रपति, नया राष्ट्रपति निर्वाचित होने तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। यदि राष्ट्रपति अनुपस्थिति या बीमारी या अन्य किसी कारण से अस्थायी रूप से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो, तो ऐसी अस्थाई अवधि में भी उप-राष्ट्रपति उसके कृत्यों का निर्वहन करता है।

राष्ट्रपति को पद से हटाये जाने की प्रक्रिया

राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा उसके कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व भी पद से हटाया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 61 के अनुसार राष्ट्रपति पर केवल संविधान के अतिक्रमण के लिए महाभियोग चलाया जा सकता है। राष्ट्रपति के विरूद्ध महाभियोग के लिए किसी एक सदन में आरोप लगाया जा सकता हैं। ऐसा आरोप सदन के कम से कम एक चौथाई सदस्यों द्वारा प्रस्तावित किया जा सकता है। ऐसे प्रस्ताव के लिए कम से कम 14 दिन पूर्व लिखित सूचना दिया जाना आवश्यक है। यदि संसद का वह सदन जिसमें राष्ट्रपति के विरूद्ध महाभियोग का आरोप लगाया गया है। महाभियोग के प्रस्ताव को सदन के कम से कम दो तिहाई बहुमत के समर्थन से एक संकल्प के रूप में पारित कर देता है तो दूसरा सदन राष्ट्रपति के विरूद्ध लगाये गये आक्षेप की जांच करता है अथवा जांच करवाता है। महाभियोग के लिए राष्ट्रपति के विरूद्ध लगाये गये आक्षेप की दूसरे सदन द्वारा जाँच किये जाते समय राष्ट्रपति को सदन के समक्ष अपना पक्ष एवं स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का अधिकार होता है। राष्ट्रपति स्वयं अथवा अपने प्रतिनिधि के माध्यम से उपस्थित होकर अपना स्पष्टीकरण दे सकता है। दूसरे सदन द्वारा की गई जाँच में राष्ट्रपति के विरुद्ध लगाये गये आक्षेपों के सिद्ध हो जाने, और सदन द्वारा अपने कुल सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से महाभियोग के प्रस्ताव को पारित कर लेने की तिथि से राष्ट्रपति अपने पद से हटा हुआ समझ लिया जाता है। भारत में अभी तक किसी भी राष्ट्रपति के विरूद्ध महाभियोग का प्रस्ताव नहीं किया गया है।

राष्ट्रपति के वेतन, भत्ते और अन्य सुविधायें

संविधान में प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति को बिना किराया दिए अपने शासकीय निवास के उपयोग का अधिकार होगा और उसे ऐसी परिलब्धियाँ, भत्ते और विशेषाधिकार भी प्राप्त होंगे जो संसद विधि द्वारा निर्धारित करे । संविधान में यह भी प्रावधान है कि राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किये जायेंगे। इस समय भारत के राष्ट्रपति का प्रतिमाह 5 लाख रुपये सैलरी के रूप में मिलती है। जिस पर उन्हें किसी तरह का कोई टैक्स नहीं चुकाना होता है। इसके अलावा राष्ट्रपति को कई भत्ते भी मिलते हैं। सेवामुक्त राष्ट्रपति को निःशुल्क आवास, चिकित्सा, वाहन इत्यादि की सुविधा भी प्रदान की जाती है।

राष्ट्रपति की शक्तियाँ

संविधान में राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। वह राष्ट्राध्यक्ष के रूप में, तथा संघ की कार्यपालिका के प्रधान के रूप में शक्तियों का प्रयोग और दायित्वों का निर्वहन करता है। संविधान के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित की गयी है।
संविधान के द्वारा राष्ट्रपति को प्रदान की गयी शक्तियों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
  1. सामान्य शक्तियाँ
  2. आपातकालीन शक्तियाँ

(1) सामान्य शक्तियाँ (General Powers)
राष्ट्रपति की सामान्य शक्तियों में कार्यपालिका शक्तियों, विधायी शक्तियों, वित्तीय शक्तियों, संविधान संशोधन के संबंध में शक्तियों तथा न्यायपालिका सम्बन्धी शक्तियों को सम्मिलित किया जाता है।

(i) कार्यपालिका शक्तियाँ (Executive Powers)
संघ की कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित हैं। संविधान के अनुच्छेद 73 में प्रावधान है कि संघ की कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग उन विषयों के सम्बन्ध में किया जा सकेगा जिनके संबंध में संसद को कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। इसके अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा किसी संधि या करार के आधार पर किये जाने वाले कृत्यों को भी संघ की कार्यपालिका शक्तियों के अधीन माना गया है। राष्ट्रपति की कार्यपालिका शक्तियों के अन्तर्गत निम्न शक्तियों को गिनवाया जा सकता है

(क) महत्त्वपूर्ण नियुक्तियाँ (Important Appointments):
संघ के कार्यपालिका प्रधान के रूप में राष्ट्रपति को महत्त्वपूर्ण नियुक्तियाँ करने की शक्ति प्राप्त है। वह प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता हैं, तथा उसकी सलाह से मंत्रिपरिषद् के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है। मन्त्री राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त अपना पद धारण करते हैं। संविधान के प्रावधानों के अनुसार मंत्रि-परिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। इस प्रकार प्रधानमंत्री की नियुक्ति, और प्रधानमन्त्री व मंत्रियों के पद पर बने रहने के संबंध में राष्ट्रपति की शक्ति व्यवहार में सीमित हो जाती है। वह लोकसभा के बहुमत का समर्थन प्राप्त व्यक्ति को ही प्रधानमन्त्री के पद पर नियुक्त कर सकता है। इसी प्रकार मंत्रि-परिषद भी तब तक पद पर बनी रहती है, जब तक कि उसे लोकसभा के बहुमत का विश्वास प्राप्त हो। किन्तु ऐसी परिस्थितियों में, जबकि लोकसभा में किसी एक दल या चुनाव से पहले बने हुए गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हो, अथवा बहुमत के संबंध में स्थिति अस्पष्ट हो, राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की नियुक्ति के संबंध में अपने विवेक के अनुसार निर्णय लेने का अवसर प्राप्त होता है।
राज्यों के राज्यपाल, उच्चतम तथा राज्यों के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों, भारत के महान्यायवादी (Attorney General), भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General), संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों, विदेशों में भारत के राजदूतों और अन्य राजनयिक पदाधिकारियों, भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की शक्ति राष्ट्रपति को प्राप्त है। नियुक्ति की शक्तियों का प्रयोग राष्ट्रपति अपने व्यक्तिगत विवेक के अधीन नहीं करता, अपितु मंत्रि-परिषद की सलाह के अनुसार करता है। राष्ट्रपति संघ के प्रशासन का अध्यक्ष होता है। संविधान में प्रावधान है कि संघ की सेवा के अधीन समस्त व्यक्ति राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त पद धारण करते है।
राष्ट्रपति को संघ के अधिकारियों को पद से हटाने का भी अधिकार प्राप्त है। इस संबंध में राष्ट्रपति अपनी शक्ति का प्रयोग संविधान के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, तथा कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार करता है।

(ख) संघ की इकाइयों पर नियंत्रण
राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह राज्य सरकारों को निर्देशित, नियंत्रित तथा समन्वित करे। राज्यों के पारस्परिक विवादों के निपटारे के सम्बन्ध में परामर्श देने के लिये अनुच्छेद 263 के तहत अन्तर्राज्यीय परिषद का गठन करता है। वह किन्हीं संघीय विषयों का प्रशासन राज्य सरकार को सौंप सकता है। संघीय क्षेत्रों के प्रशासन का उत्तरदायित्व तो राष्ट्रपति पर होता ही है।

(ग) विभिन्न प्रकार के नियमों का निर्माण
भारत सरकार के कार्य संचालन के संबंध में नियम बनाने का अधिकार भी राष्ट्रपति को प्राप्त है। राष्ट्रपति भारत सरकार के कार्यों को विभिन्न मंत्रियों को आवंटित किये जाने के संबंध में भी नियम बना सकता है।

(घ) सर्वोच्च सेनाओं का सेनापति
राष्ट्रपति भारत की समस्त सेनाओं का प्रधान सेनापति होता है किन्तु इस शक्ति का प्रयोग वह कानून के अनुसार ही कर सकता है।

(ii) विधायी शक्तियाँ
संविधान ने राष्ट्रपति को संघ की संसद का अभिन्न अंग बनाया है। संसद के प्रत्येक सदन के अधिवेशन को बुलाने, तथा दोनों सदनों का या किसी एक सदन का सत्रावसान करने की शक्ति राष्ट्रपति को प्रदान की गयी है। राष्ट्रपति को लोकसभा का विघटन करने की भी शक्ति प्रदान की गयी है।
राष्ट्रपति संसद के किसी सदन अथवा संसद के दोनों सदनों की सामूहिक बैठक में अभिभाषण दे सकता है। संविधान के अनुच्छेद 87 में प्रावधान है कि राष्ट्रपति लोकसभा के प्रत्येक आम चुनाव के पश्चात् होने वाले पहले सत्र के आरम्भ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरम्भ में संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में अभिभाषण देगा।
राष्ट्रपति की विधायी शक्तियों के अन्तर्गत निम्न शक्तियों को गिनवाया जा सकता है-

(क) विधेयकों पर विलम्बकारी निषेधाधिकार का प्रयोग
राष्ट्रपति को संसद के समक्ष विचाराधीन किसी विधेयक के संबंध में या अन्य किसी संदर्भ में संसद को संदेश भेजने का अधिकार प्राप्त है। संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति के अनुमोदन के पश्चात् ही कानून बन सकता है। राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह किसी विधेयक को पुनर्विचार के पश्चात् उस विधेयक को मूल रूप में अथवा संशोधित रूप में पारित कर दे तो राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति को नहीं रोक सकता। धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के पश्चात् ही लोकसभा में विचारार्थ प्रस्तुत किये जा सकते हैं। इसलिए संसद द्वारा पारित धन विधेयकों के संबंध में राष्ट्रपति को अपनी अनुमति रोकने का अथवा उन्हें पुनर्विचार के लिए संसद के पास भेजने का अधिकार प्राप्त नहीं होता संविधान के अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत, संविधान संशोधन विधेयक संसद द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति के अनुमोदन के पश्चात् ही प्रभावी होता है किन्तु राष्ट्रपति संवैधानिक संशोधनों पर निषेधाधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता।

(ख) अध्यादेश जारी करने की शक्ति
राष्ट्रपति को संसद के सदनों के सत्र में नहीं होने पर अध्यादेश जारी करने की भी शक्ति प्राप्त है। राष्ट्रपति द्वारा जारी किये गये अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है। संसद के पुनः आहूत होने से 6 सप्ताह से पूर्व इसे संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना आवश्यक होता है, अन्यथा ऐसा अध्यादेश प्रभाव में नहीं रहता। राज्यों के विधान मण्डलों द्वारा पारित कतिपय विधेयकों पर, अथवा किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा संबंधित राज्य के विधान मण्डल द्वारा पारित ऐसे विधेयकों पर, जिनको कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख लिया गया हो, अनुमति देने की शक्ति राष्ट्रपति के पास है।

(ग) राज्यों के सम्बन्ध में
नये राज्यों के निर्माण और राज्यों की सीमा अथवा नामों में परिवर्तन से संबंधित विधेयक भी राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है।

(घ) सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार
राष्ट्रपति को साहित्य, कला-विज्ञान और समाज सेवा में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले 12 व्यक्तियों को राज्य सभा के सदस्य के रूप में मनोनीत करने की शक्ति प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 331 के अन्तर्गत यदि राष्ट्रपति की यह राय हो कि लोकसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह उस समुदाय के अधिकतम दो सदस्यों को लोकसभा के सदस्य के रूप में मनोनीत कर सकता है।

(iii) वित्तीय शक्तियाँ
संघ के वित्त के संबंध में राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियाँ प्रदान की गयी है। धन विधेयक लोकसभा में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के पश्चात् ही प्रस्तुत किये जा सकते हैं। राष्ट्रपति को वित्त आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की शक्ति प्रदान की गयी है। भारत की आकस्मिक निधि पर राष्ट्रपति का नियंत्रण होता है। यह आकस्मिक परिस्थिति में संसद की पूर्व अनुमति के बिना इस निधि में से व्यय करने की अनुमति दे सकता है। राष्ट्रपति द्वारा दी गयी ऐसी स्वीकृति पर बाद में संसद की स्वीकृति लिया जाना आवश्यक है।

(iv) न्याय सम्बधी शक्तियाँ
राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय और राज्यों के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। संविधान के अनुच्छेद 72 में राष्ट्रपति को, न्यायालय द्वारा सिद्ध-दोष किसी व्यक्ति के दण्ड को क्षमा करने अथवा दण्ड की मात्रा कम करने का अधिकार प्रदान किया गया है। क्षमादान के इस अधिकार का प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा सैनिक न्यायालय द्वारा दण्डित किये गये व्यक्तियों, मृत्यु दण्ड से संबंधित प्रकरणों, तथा ऐसे संबंधित अपराधों के प्रकरणों में किया जा सकता है जो संघ सरकार की कार्यपालिका शक्ति के अधीन आते हों।
उच्चतम न्यायालय के कार्य-प्रक्रिया संबंधी नियमों का अनुमोदन करने की शक्ति भी राष्ट्रपति को प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 143 के अन्तर्गत राष्ट्रपति किसी भी वैधानिक प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त कर सकता है।

(v) कूटनीतिक या राजनयिक शक्तियाँ
राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष के रूप में विदेशों में देश का प्रतिनिधित्व करता है। समस्त राजनयिक संव्यवहार राष्ट्रपति के नाम से ही सम्पन्न किये जाते हैं। विदेशों में भेजे जाने वाले राजनयिक प्रतिनिधियों, राजदूतों व वाणिज्य दूतों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। विदेशों के राजनयिक प्रतिनिधियों के प्रमाण-पत्र भी राष्ट्रपति स्वीकार करता है। अन्तर्राज्यीय संधियों और समझौते भी राष्ट्रपति स्वीकार करता है। अन्तर्राज्यीय संधियां और समझौते भी राष्ट्रपति के नाम से ही किये जाते हैं।

आपातकालीन शक्तियाँ
भारत के संविधान में तीन प्रकार की आपातकालीन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है।
  1. राष्ट्रीय आपात
  2. किसी राज्य में सांविधानिक तंत्र का विफल हो जाना (राज्य आपात्)
  3. वित्तीय आपात

(1) राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352)
संविधान के अनुच्छेद 352 में यह व्यवस्था की गयी है कि जब राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाये कि युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र आन्तरिक विद्रोह के कारण, भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा को संकट उत्पन्न हो गया है तो वह सम्पूर्ण देश या उसके किसी भाग में आपात्काल की उद्घोषणा कर सकता है। अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत भारत में अब तक तीन बार आपात्काल की घोषणा की गई है, 1962 में भारत पर चीन के आक्रमण के समय की गई आपात घोषणा 1968 तक जारी रही। अतः 1965 में भारत पाकिस्तान के आक्रमण के समय नये सिरे से आपात्काल लागू नहीं किया गया। 1971 में भारत पर पाकिस्तान के पुनः आक्रमण के समय एवं 1975 में आन्तरिक अशान्ति के आधार पर आपात्काल की घोषणा की गई। 1975 में घोषित आपात्काल के दौरान शक्तियों का दुरूपयोग किया गया। आपात् शक्तियों के दुरूपयोग को रोकने के लिए 44वें संविधान संशोधन द्वारा आपातकालीन प्रावधानों पर प्रतिबन्ध लगाये गये, वे अग्रवत् हैं

44वें संविधान संशोधन के पश्चात् आपात् प्रावधान
  1. राष्ट्रीय आपात घोषित करने की परिस्थिति के लिए 'आन्तरिक अशान्ति' के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह' शब्द का प्रयोग किया गया।
  2. राष्ट्रपति द्वारा ऐसी उद्घोषणा केवल प्रधानमंत्री की सलाह से नहीं, ऐसी उद्घोषणा संघ के मंत्रिमण्डल के निर्णय की लिखित सूचना के पश्चात् ही की जा सकेगी।
  3. अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत की गयी आपात्काल की उद्घोषणा को, एक माह की अवधि में संसद के दोनों सदनों द्वारा, पृथक-पृथक संकल्प पारित कर अनुमोदित किया जाना आवश्यक है।
  4. यदि एक माह की अवधि में संसद के दोनों सदनों द्वारा आपात्काल की उद्घोषणा का अनुमोदन नहीं किया जाता है तो ऐसी उद्घोषणा प्रभाव में नहीं रहती।
  5. राष्ट्रपति द्वारा की गयी आपाकाल की उद्घोषणा अधिकतम 6 माह की अवधि तक प्रभावी रह सकती है। यदि संसद के दोनों सदन पृथक-पृथक संकल्प पारित कर ऐसी उद्घोषणा को आगे बढ़ाने का निश्चय करें तो उसे अधिकतम 6 माह की अवधि के लिए और बढ़ाया जा सकता है। आपातकाल की उद्घोषणा का अनुमोदन करने अथवा आपातकाल के लागू रहने की अवधि को 6 माह की समाप्ति के पश्चात् और आगे बढ़ाने के संबंध में संसद द्वारा पारित संकल्प को , संसद के प्रत्येक सदन में उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थन प्राप्त होना चाहिए।
  6. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए कार्यवाही करने का अधिकार निलम्बित नहीं किया जा सकता।
  7. यदि राष्ट्रपति द्वारा आपात्काल की उद्घोषणा किये जाने के पश्चात् संसद उसका अनुमोदन न करने का संकल्प पारित कर देती है तो राष्ट्रपति को आपात्काल की उद्घोषणा वापस लेनी होती है।
  8. लोकसभा में उपस्थित एवं मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों में साधारण बहुमत से आपात्काल की घोषणा समाप्त की जा सकती है।

राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल होने पर आपात की घोषणा (अनुच्छेद 356)
संविधान के अनुच्छेद 356 में यह प्रावधान किया गया है कि यदि राष्ट्रपति को, किसी राज्य के राज्यपाल को मिले प्रतिवेदन के आधार पर, या अन्यथा, यह विश्वास हो जाये कि राज्य में कि ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो गयी है ; जिनमें राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता तो वह उस राज्य में संवैधानिक संकट की घोषणा कर सकता है। अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा की गयी ऐसी घोषणा को प्रचलित भाषा में “राष्ट्रपति शासन” लागू किया जाना कहा जाता है। अनच्छेद 356 के अन्तर्गत, किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता के संदर्भ में कार्यवाही करके राष्ट्रपति राज्य की विधानसभा को भंग या निलम्बित कर सकता है, तथा उस राज्य की सरकार के सभी कार्यों को सम्पन्न करने का अधिकार अपने हाथ में ले सकता है। ऐसी घोषणा के लागू रहने की अवधि में राष्ट्रपति, राज्य के विधान मण्डल में निहित शक्तियों का, संघ की संसद द्वारा उपयोग किया जायेगा।

संविधान में यह स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत की गयी घोषणा के लागू रहने के दौरान भी राज्य के उच्च न्यायालय की शक्तियों में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा की गयी उद्घोषणा को अनुमोदन के लिए संसद के दोनों सदनों के समक्ष पृथक-पृथक रखा जाता है। यदि घोषणा के लागू किये जाने के दो माह की अवधि में, संसद के दोनों सदन पृथक-पृथक, ऐसी उद्घोषणा का अनुमोदन करने का संकल्प पारित नहीं करें तो उद्घोषणा स्वतः निरस्त मान ली जाती है। वर्ष 1998 में बिहार राज्य में आपातकाल की उद्घोषणा कर दी गई थी किन्तु संसद में पारित न होने के कारण उद्घोषणा स्वतः निरस्त हो गई थी। अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत जारी उद्घोषणा का प्रभाव 6 माह की अवधि तक रहता है। संसद के दोनों सदन पृथक-पृथक संकल्प पारित कर ऐसी उद्घोषणा की अवधि को अगले 6 माह की अवधि के लिए और बढ़ा सकते हैं। किन्तु किसी भी स्थिति में उद्घोषणा के जारी रहने की अवधि 3 वर्ष से अधिक नहीं हो सकती। संविधान में प्रावधान किया गया है कि अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत की गयी उद्घोषणा एक वर्ष से अधिक अवधि के लिए केवल तभी जारी रखी जा सकती है जबकि निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित कर दे कि ऐसी उद्घोषणा का जारी रहना संबंधित राज्य की विधानसभा के आम निर्वाचन कराने में होने वाली कठिनाईयों के कारण आवश्यक हो।

अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की उद्घोषणा की राष्ट्रपति की शक्ति भारत के संविधान के सर्वाधिक विवादास्पद प्रावधानों में से एक है। संविधान सभा में भी इस प्रावधान के औचित्य पर शंकाएँ की गयी थी। संविधान सभा में प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने यह आशा व्यक्त की थी कि इस अनुच्छेद का दुरूपयोग नहीं होगा तथा इसे अत्यन्त असामान्य परिस्थितियों में केवल यदा-कदा ही प्रयोग में लाया जायेगा।

संविधान के लागू होने के पश्चात् से अब तक की अवधि में अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राष्ट्रपति की शक्तियों के उपयोग के उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि इस संबंध में संविधान सभा के सदस्यों द्वारा व्यक्त की गयी शंकाएं सही थी। अब तक 100 से अधिक बार इस शक्ति का उपयोग कर विभिन्न राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने की घोषणाएँ की जा चुकी हैं।

पूर्व में यह माना जाता था कि अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत आपातकाल लागू करने तथा आपात परिस्थितियों के आकलन के विषय में राष्ट्रपति के विवेक में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ वाले मामले में यह स्पष्ट कर दिया है कि ऐसा प्रतीत होने पर कि इस शक्ति का उपयोग दुर्भावना या राजनीतिक विद्वेष के आधार पर किया गया है उसे न्यायिक समीक्षा से मुक्त नहीं रखा जा सकता व आपात् परिस्थितियों के आकलन में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रि-परिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं है।

यह व्यवहार में भी प्रमाणित हो गया है कि वर्ष 1998 व 1999 में उत्तरप्रदेश व बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने की वाजपेयी सरकार की सलाह को राष्ट्रपति ने पुनर्विचार के लिए अपनी टिप्पणियों के साथ वापस भेजकर अपने विवेकाधिकार का प्रयोग किया है।

वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360)
संविधान के अनुच्छेद 360 में प्रावधान किया गया है कि यदि राष्ट्रपति को विश्वास हो जाये कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत या उसके किसी भाग का वित्तीय स्थायित्व या साख संकट में है तो वह देश या उसके किसी भाग में आपातकाल की घोषणा कर सकेगा। भारत में अभी तक वित्तीय आपात की स्थिति नहीं आई हैं।

राष्ट्रपति की स्थिति

भारत में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है। इस कारण सामान्यतया यह स्वीकार किया जाता है कि संघ की कार्यपालिका शक्तियां व्यवहार में प्रधानमंत्री और मंत्रि-परिषद में निहित होती है तथा राष्ट्रपति कार्यपालिका का केवल औपचारिक प्रधान है। इस संबंध में भारत के राष्ट्रपति की तुलना ब्रिटेन के सम्राट से भी की जाती है। किन्तु कतिपय संविधान विशेषज्ञों का मत है कि भारत के राष्ट्रपति को केवल औपचारिक या नाममात्र का कार्यपालिका प्रधान मानना उचित नहीं है तथा संविधान द्वारा राष्ट्रपति को वास्तविक शक्तियाँ भी प्रदान की गयी है। राष्ट्रपति की स्थिति के वास्तविक आकलन के लिए उपर्युक्त दोनों धारणाओं का परीक्षण किया जाना आवश्यक है।

(i) संवैधानिक प्रधान की धारणा
राष्ट्रपति को संवैधानिक प्रधान मानने की धारणा मुख्यतः इस तथ्य पर आधारित है कि भारत में संसदीय प्रणाली को अपनाने के कारण, कार्यपालिका की वास्तविक शक्तियाँ प्रधानमंत्री और मंत्रि-परिषद में निहित मानी जाती हैं। इसी कारण भारत में राष्ट्रपति की स्थिति ब्रिटेन के सम्राट की भाँति मानी जाती है, जिसके विषय में ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था में यह उक्ति प्रसिद्ध है कि “वह राज्य करता है, शासन नहीं।' भारत में संविधान के लागू होने के पश्चात् से ही ब्रिटिश प्रणाली की भांति यह परम्परा प्रचलित रही कि राष्ट्रपति को सदैव मंत्रि-परिषद् की सलाह के अनुसार ही कार्य करना होता है।

संविधान के लागू होने के पश्चात् भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रपति की स्वविवेकीय शक्तियों का तर्क प्रस्तुत करते हुए यह मत व्यक्त किया था कि उसकी तुलना ब्रिटिश सम्राट से किया जाना उचित नहीं है। किन्तु स्वयं उन्होंने भी, और उनके पश्चात् निर्वाचित हुए राष्ट्रपतियों ने सामान्यतः मंत्रि-परिषद् की सलाह के अनुसार ही कार्य करने की परम्परा का पालन किया।

संविधान के 42वें संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 74(1) में संशोधन कर यह व्यवस्था कर दी गयी कि राष्ट्रपति मंत्रि-परिषद की सलाह के अनुसार ही कार्य करेगा। 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 74 में पुनः संशोधन कर यह प्रावधान कर दिया गया कि राष्ट्रपति मंत्रि-परिषद द्वारा दी गयी सलाह को एक बार मंत्रि-परिषद् के पुनर्विचार के लिए भेज सकता है, किन्तु पुनर्विचार के पश्चात् मंत्रि-परिषद् द्वारा दी गयी सलाह के अनुसार ही राष्ट्रपति को कार्य करना होता हैं।

(ii) राष्ट्रपति की वास्तविक शक्तियों की धारणा
संविधान के 42वें और 44वें संशोधन के पश्चात्, इस परम्परा को सांविधानिक आधार प्राप्त हो गया है कि राष्ट्रपति कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान नहीं है, तथा कार्यपालिका की वास्तविक शक्तियाँ प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् में निहित है। कतिपय विशेषज्ञों का यह मत है कि संविधान के 42वें व 44वें संशोधन के पश्चात् भी यह मानना उचित नहीं है कि राष्ट्रपति मंत्रि-परिषद् की कठपुतली मात्र, अथवा उराके पारा वारतव में कोई शक्तियाँ ही नहीं हैं। व्यवहार में ऐसे अनेक सन्दर्भ हैं जिनमें राष्ट्रपति को स्वविवेक से निर्णय करना होता है। संविधान के अनेक प्रावधान भी राष्ट्रपति की कतिपय वास्तविक शक्तियों का संकेत देते हैं। संविधान के ऐसे प्रावधानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही संसदीय शासन प्रणाली के अनुरूप यह माना जाये कि राष्ट्रपति शासनाध्यक्ष नही है, केवल राष्ट्राध्यक्ष है, तथा शासन का अध्यक्ष प्रधानमंत्री को माना जाना चाहिए, तथापि भारत के राष्ट्रपति की तुलना ब्रिटेन के सम्राट से किया जाना उचित नहीं है।
संविधान के ऐसे प्रावधानों में मुख्यतः अग्रांकित की गणना की जा सकती है-
  1. भारत का राष्ट्रपति निर्वाचित है, वह वंशानुगत प्रधान नहीं है।
  2. ब्रिटेन के सम्राट की गरिमा इस उक्ति में निहित मानी जाती है कि "सम्राट कोई गलती नहीं करता।' इस उक्ति का व्यवहार में अर्थ यह है कि वस्तुतः सम्राट किन्ही शक्तियों का प्रयोग ही नहीं करता, अतः उसके द्वारा गलती भी नहीं होती। जबकि भारत के राष्ट्रपति के लिए संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन पर महाभियोग चलाने का प्रावधान है। महाभियोग के प्रावधान से स्पष्ट है कि राष्ट्रपति अपने विवेक से भी शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।
  3. राष्ट्रपति संविधान का संरक्षण, प्रतिरक्षण व परिरक्षण करने के लिए शपथबद्ध है। इस प्रकार राष्ट्रपति पर संविधान के संरक्षण का महत्त्वपूर्ण दायित्व है। यह स्पष्ट है कि यदि मंत्रि-परिषद् प्रधानमंत्री को संविधान के विपरीत कोई परामर्श दे तो राष्ट्रपति ऐसे परामर्श को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं माना जा सकता।
  4. राष्ट्रपति की भूमिका दोहरी है। वह संघ की कार्यपालिका का प्रधान है किन्तु वह राष्ट्राध्यक्ष भी है। यह सुनिश्चित करना उसका दायित्व है कि राज्यों का शासन संवैधानिक रीति से चले। इस रूप में राज्यों से संबंधित विषयों में उसे मंत्रि-परिषद् की सलाह से बँधा हुआ मानना उचित नहीं कहा जा सकता । राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया भी ऐसी है जिसमें राज्यों की विधानसभाओं और संघ की संसद के मतों की समान प्रभावशीलता को सुनिश्चित किया गया है। राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया से यह स्पष्ट है कि उसे राज्यों का भी प्रतिनिधि बनाया गया है। अतः यह उनका दायित्व है कि वह राज्यों से संबंधित विषयों में केवल केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के निर्देश से बंधा हुआ नहीं रहे। राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने की शक्ति के प्रयोग के सन्दर्भ में उससे मंत्रि-परिषद् की राय की अपेक्षा निष्पक्ष रूप से परिस्थितियों के आकलन की अपेक्षा की गयी है। एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ वाले वाद में उच्चतम न्यायलय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत अपनी शक्ति का प्रयोग करने में राष्ट्रपति मंत्रि-परिषद् की सलाह से बंधा हुआ नहीं है। अक्टूबर, 1997 में उत्तरप्रदेश में एवं 1998 में बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मंत्रि-परिषद् की सलाह को पुनर्विचार के लिए लौटाकर भारत के राष्ट्रपति श्री के. आर. नारायणन् ने, इस संबंध में स्वतंत्र निर्णय लेने की राष्ट्रपति की शक्ति को रेखांकित किया है।
राष्ट्रपति की स्थिति के सन्दर्भ में उपर्युक्त दोनों प्रकार के दृष्टिकोणों के विश्लेषण के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सामान्यतः संसदीय प्रणाली की अपेक्षा के अनुरूप राष्ट्रपति मंत्रि-परिषद् की सलाह के अनुसार कार्य करता है। इस प्रकार वह वास्तविक शासक नहीं है। संविधान में "अवरोध और संतुलन” प्रणाली भी है जिसके कारण राष्ट्रपति निरंकुश नहीं बन सकता। किन्तु इसे ब्रिटिश सम्राट की भांति "स्वर्णिम शून्य' भी नहीं कहा जा सकता। वह एक गणतंत्र का निर्वाचित राष्ट्राध्यक्ष है। जटिल परिस्थितियों में संविधान के संरक्षण का महत्त्वपूर्ण दायित्व राष्ट्रपति पर ही है अतः विशिष्ट परिस्थितियों में उसके द्वारा स्वविवेक से निर्णय किया जाना वांछनीय भी है और उचित भी।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के मध्य संबंध


(क) संबंधों का संवैधानिक स्वरूप
संघ की कार्यपालिका के औपचारिक प्रधान के रूप में राष्ट्रपति से सामान्यतः शासन के कार्यों में व्यापक हस्तक्षेप की अपेक्षा नहीं की जाती। सामान्य परिस्थितियों में शासन की शक्तियों का उपयोग प्रधानमंत्री द्वारा मंत्रिपरिषद् के साथ मिलकर किया जाता है। ब्रिटेन के सम्राट की भांति ही भारत का राष्ट्रपति भी शासन के सामान्य कार्यों से स्वयं को पृथक रखता है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रपति व्यवहार में सरकार की गतिविधियों व कार्य-करण के संबंध में अपनी आँखे मींच ले, तथा उनसे बिल्कुल उदासीन हो जाये। व्यवहार में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् के "मित्र, हित-चिन्तक व पथ प्रदर्शक" की भांति कार्य कर सकता है। स्वयं संविधान में भी शासकीय कार्यों पर सजग दृष्टि रखने के संबंध में राष्ट्रपति की भूमिका को स्वीकार किया है। संविधान ने प्रधानमंत्री पर यह दायित्व डाला है कि वह राष्ट्रपति द्वारा अपेक्षा किये जाने पर शासन से संबंधित गतिविधियों व विधायन के प्रस्तावों के विषय में राष्ट्रपति को सूचनाएँ दे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व संसद, तथा प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद् के मध्य कड़ी के रूप में भी कार्य कर सकता है। राष्ट्रपति किसी मंत्री द्वारा लिए गए निर्णय को मंत्रिपरिषद् के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत करने के लिए प्रधानमंत्री को निर्देश दे सकता है। जब राष्ट्रपति इस विषय में आश्वस्त होना चाहे कि प्रधानमंत्री को लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त है, या नहीं है, तो वह प्रधानमंत्री को लोकसभा का विश्वासमत प्राप्त करने का निर्देश दे सकता है।

(ख) व्यवहार में राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री संबंध
भारत में संविधान के लागू होने के पश्चात् राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के मध्य सौहार्द्रपूर्ण संबंधों के निर्वाह के लिए स्वस्थ परम्पराएँ विकसित हुई हैं। इन परम्पराओं के माध्यम से राष्ट्रपति द्वारा शासन के नित्य-प्रति के कार्यों में हस्तक्षेप न किये जाने के बावजूद, शासन के कार्यों में उसकी मैत्रीपूर्ण सहभागिता को सुनिश्चित किया गया है। यह परम्परा रही है कि भारत का प्रधानमंत्री, शासकीय विदेश यात्राओं से लौटने पर यात्रा के उद्देश्य और प्रभावों के विषय में राष्ट्रपति से भेंट कर उन्हें अवगत कराता है।

भारत में सामान्यतः विभिन्न राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के मध्य मधुर संबंध रहे हैं। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू के मध्य अनेक बार नीति संबंधी प्रश्नों पर मतभेद हुए, किन्तु ये मतभेद व्यक्तिगत कटुता अथवा टकराव के रूप में कभी व्यक्त नहीं हुए। हिन्दू कोड बिल को पारित किये जाने के प्रश्न पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपने संकोच से प्रधानमंत्री को अवगत कराया, लेकिन बाद में उस पर हस्ताक्षर कर दिए। गुजरात में सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के क्रम में हुए समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के सम्मिलित होने पर प्रधानमंत्री नेहरू सहमत नहीं थे, फिर भी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मध्य अनेक बिन्दुओं पर कई बार मतभेद दृष्टिगत हुए। श्री वी. के. कृष्णमेनन् को मंत्रिपरिषद् से हटाने, प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का निधन हो जाने पर उसकी अंत्येष्टि में डॉ. राधाकृष्णन के भाग लेने आदि बिन्दुओं पर उनमें मतभेद प्रकट हुए, किन्तु जवाहर लाल नेहरू और उपर्युक्त दोनों राष्ट्रपतियों के मध्य उत्पन्न हुए मतभेदों के पश्चात् भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के समक्षा संघर्ष की स्थिति नहीं आयी, और ऐरो छुटपुट मतभेदों को इन संवैधानिक पदों की गरिमा के अनुरूप सुलझा लिया गया।

राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के कार्यकाल में भी, उनके समय में रहे दो प्रधानमंत्रियों श्रीमती इंदिरा गांधी और श्री राजीव गांधी से मतभेद के अवसर उपस्थित हुए। आतंककारी गतिविधियों की रोकथाम के लिए स्वर्ण मंदिर में "ऑपरेशन ब्लू स्टार" नामक सैन्य कार्यवाही के संबंध में ज्ञानी जैल सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से इस बात पर असंतोष प्रकट किया कि इस कार्यवाही से पूर्व उन्हें विश्वास में नहीं लिया गया। प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के साथ राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के मतभेद काफी चर्चित रहे। श्री राजीव गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्रियों द्वारा स्थापित इस परम्परा का भी उल्लंघन किया कि विदेश यात्रा से लौटकर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से भेंट करें। वर्ष 1984 में दिल्ली में हुए दंगों के संबंध में गठित ठक्कर आयोग की रिपोर्ट, राष्ट्रपति श्री जैलसिंह द्वारा अपेक्षा किये जाने पर भी उन्हें प्रस्तुत नहीं की गयी। इस बिन्दु पर भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के मध्य मतभेद हुए। श्री राजीव गांधी के मंत्रिमण्डल के एक सदस्य श्री के. के. तिवारी ने राष्ट्रपति के विरुद्ध कतिपय प्रतिकूल सार्वजनिक टिप्पणियां की। इन टिप्पणियों से क्षुब्ध होकर राष्ट्रपति श्री जैलसिंह ने प्रधानमंत्री से अपेक्षा की कि वे श्री के. के. तिवारी को मंत्रिपरिषद् से हटा दें। प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा श्री तिवारी से त्यागपत्र ले लिए जाने के कारण इस संबंध में राष्ट्रपति के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। ज्ञानी जैलसिंह और श्री राजीव गांधी के मध्य टकराव इस सीमा तक बढ़ गये थे कि राजनैतिक क्षेत्रों में यह आशंका भी व्यक्त की जाने लगी कि कहीं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को बर्खास्त नहीं कर दें। किन्तु राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह ने इस संबंध में संसदीय प्रणाली की परम्पराओं का आदर करते हुए, राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में ही अपनी भूमिका का निर्वाह किया। यह भारतीय संसदीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण था कि उस समय विपक्ष के प्रमुख नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी राष्ट्रपति से यह अपेक्षा की कि वे लोकसभा में बहुमत द्वारा समर्थित प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने जैसा कोई कदम नहीं उठायें, क्योंकि ऐसा करना संसदीय लोकतंत्र के सिद्धान्तों के प्रतिकूल होगा।

आठवें राष्ट्रपति श्री वेंकटरमन भी तत्कालीन सत्तारूढ दल कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी थे। राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में उनके चयन में भी तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की निर्णायक भूमिका थी। प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी से उनके टकराव के संदर्भ उपस्थित नहीं हुए। बाद में राष्ट्रीय मोर्चा के प्रधानमंत्री श्री वी.पी. सिंह और उनके बाद बने प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर से भी उनके संबंध मधुर रहे।

भारत के नौवें राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा भी तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस (इ) के प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित हुए थे। राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में उनके चयन में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री पी. वी. नरसिंहराव की सहमति और निर्णायक भूमिका रही थी। डॉ. शर्मा के कार्यकाल में प्रधानमंत्री रहे श्री राव, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री एच.डी.देवेगौड़ा तथा श्री इन्द्र कुमार गुजराल से उनके संबंध सामान्यतः मधुर रहे। इनमें से बाद में तीन प्रधानमंत्री कांग्रेस से भिन्न दलों के थे, फिर भी राष्ट्रपति के किसी प्रधानमंत्री से टकराव के अवसर उपस्थित नहीं हुए।

भारत के 10वें राष्ट्रपति श्री के.आर. नारायणन् और सत्तारूढ़ गठबंधन राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के समर्थक दल कांग्रेस (इ) तथा मुख्य विपक्षी दल भाजपा व उसके अधिकांश सहयोगी दलों का समर्थन प्राप्त था। इस प्रकार वे व्यवहारतः मुख्य राष्ट्रीय दलों के मध्य आम सहमति से चुने गये राष्ट्रपति थे। उनकी कार्यशैली में स्वतंत्र व निष्पक्ष दृष्टिकोण परिलक्षित हुआ है। श्री इन्द्रकुमार गुजराल की सरकार ने उत्तरप्रदेश में श्री कल्याण सिंह द्वारा विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने के पश्चात् भी, जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश की तो राष्ट्रपति श्री नारायणन ने इसे मंत्रिपरिषद को वापस लौटा दिया। बाद में मंत्रिपरिषद ने अपनी सिफारिश को वापस ले लिया।

भारत के 11 वें राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन समर्थित उम्मीदवार थे अतः डॉ. कलाम एवं प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सम्बन्ध सौहार्द्रपूर्ण थे।

भारत में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के मध्य संबंधों के उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि दो सांविधानिक पदों के मध्य टकराव के अवसर उपस्थित नहीं हुए हैं। मतभेद के बिन्दु उपस्थित होने पर, इन पदों पर आसीन व्यक्तियों ने मतभेद का समाधान किया है, तथा संवैधानिक परम्पराओं के अनुसार परस्पर आदर का भाव प्रकट किया है। ऐसी परिस्थितियों में भी, जबकि राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री भिन्न दलों के रहे हैं, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के मध्य व्यक्तिगत टकराव के अवसर उपस्थित नहीं हुए हैं।
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