दक्षिण-दक्षिण संवाद | dakshin dakshin samvad kya hai

प्रस्तावना

उत्तर-दक्षिण संवाद की असफलता के परिणामस्वरूप दक्षिण-दक्षिण संवाद का जन्म हुआ। अपने असंतुलित इतिहास में उत्तर-दक्षिण संवाद बहुत सारे उतराव चढ़ाव से गुजरा, जिसमें "उतराव" दृश्य पटल पर ज्यादा उभरे। लगातार असफलता ने दक्षिण को उत्तर के अमीर, औद्योगिकृत देशों से मिलने वाली किसी भी मदद के प्रति निराशावादी बना दिया। परन्तु इस असफलता से, दक्षिण ने एक महत्त्वपूर्ण सबक सीखा।
दक्षिण के गरीब, विकासशील देशे को जल्द ही इसका बोध हुआ कि उत्तर उनकी बातों को सुनने से तब तक इंकार करेगा जब तक कि दक्षिण की उत्तर से मोल-तोल करने की क्षमता कमजोर रहेगी। इन विकसित देशों पर जितना अधिक ये निर्भर रहेंगे, उन्हें छूटों या रियायतों के रूप में उतना ही कम लाभ होगा। इस बोध ने उस विचार को जन्म दिया जिसे दक्षिण के “सामूहिक आत्म-निर्भरता" के रूप में जाना जाता है।
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यह सामूहिक आत्म-निर्भरता दक्षिण-दक्षिण सहयोग के बढ़े हुए स्तर द्वारा ही प्राप्त की जा सकती थी। दूसरा, बहुत सारे ऐसे क्षेत्र पहले से अस्तित्व में थे, जहाँ दक्षिण के देशों के बीच सहयोग की अपूर्व संभावनाएं थीं। ब्रान्ट रिपोर्ट ने भी अनुशंसा की थी कि क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय संघटन, या सहयोग के दूसरे क्लासिक रूप, अभी भी विकासशील देशों विशेष तौर से छोटे देशों के बीच आर्थिक विकास और ढांचागत बदलाव को उत्प्रेरित करने के लिए व्यावहारिक विकल्प प्रदान कर सकते थे।
इस तरह उत्तर दक्षिण सहयोग की मृग मरीचिका के पीछे भागने के बजाय दक्षिण गोलार्द्ध के विकासशील राष्ट्रों ने अपने त्वरित आर्थिक विकास के लिए 'दक्षिण-दक्षिण आपसी सहयोग' पर जोर देना प्रारम्भ कर दिया।

दक्षिण-दक्षिण संवाद : अभिप्राय

'दक्षिण-दक्षिण संवाद' से तात्पर्य है दक्षिण-दक्षिण अर्थात् विकासशील देशों के मध्य आर्थिक सहयोग के लिए विचारविमर्श अथवा आपसी सहयोग के आधार की खोज। नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था' की स्थापना के लिए उत्तर-दक्षिण सहयोग' के प्रयत्न किए गए थे किन्तु धनी विकसित देशों की हठधर्मिता एवं अड़ियल रूख के कारण कोई उत्साहजनक परिणाम नहीं निकले। फलतः विकासशील देशों की निर्धनता बढ़ती गयी, ऋणभार बढ़ता गया, बजट घाटा बढ़ता गया और व्यापार में असन्तुलन बढ़ता गया। अत: यह आवश्यकता अनुभव की जाने लगी कि दक्षिण-दक्षिण के बीच प्रभावशाली तथा सार्थक संवाद की स्थिति उत्पन्न की जाये। इसके द्वारा दक्षिण के राष्ट्रों में आपसी विश्वास, सहयोग और सद्भावना की स्थिति का निर्माण किया जा सकता है।

दक्षिण-दक्षिण सहयोग : पृष्ठभूमि

दक्षिण-दक्षिण संवाद का वास्तविक सूत्रपात 1968 ई. में नई दिल्ली में आयोजित द्वितीय अंकटाड के सम्मेलन में विकासशील राष्ट्रों में आपसी सहयोग की आवश्यकता पर बल देने के साथ प्रारम्भ हुआ था। इसके बाद दक्षिण-दक्षिण सहयोग की अवधारणा पर सन् 1970 ई. के लुसाका सम्मेलन में विचार-विमर्श हुआ। सन् 1974 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने जब 'नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था' का आह्वान किया तो विकासशील राष्ट्रों के आपसी सहयोग का विशेष उल्लेख किया था। तत्पश्चात् 1975 ई. के लीमा में हुए विदेशमन्त्रियों के सम्मेलन एवं कोलम्बों में सन् 1976 ई. में हुए निर्गुट सम्मेलन तथा चौथे अंकटाड सम्मेलन (1976) में इस प्रकार के सहयोग की अवधारणा की अभिपुष्टि की गयी। ग्रुप -77' को सन् 1979 की बैठक में भी विकासशील राष्ट्रों के मध्य आपसी व्यापार की वृद्धि की आवश्यकता एवं सामूहिक आत्म-निर्भरता की आवश्यकता पर बल दिया गया। मई 1981 में काराकास में विकासशील राष्ट्रों के मध्य आर्थिक सहयोग पर हई उच्चस्तरीय बैठक में इस विषय को एक नया आयाम प्रदान किया गया एवं विकासशील राष्ट्रों के मध्य प्रशल्क अधिमानों की विश्व व्यापी प्रणाली की मांग की गयी ताकि व्यापार सम्वर्द्धन उत्पादन व रोजगार में वृद्धि हो सके।

नई दिल्ली में 22-24 फरवरी, 1981 की अवधि में 44 देशों का सम्मेलन हुआ जिसका उद्घाटन श्रीमती इन्दिरा गांधी ने किया। इस सम्मेलन ने दक्षिण-दक्षिण सहयोग के ठोस दिशा संकेत खोजने के प्रयास किये गये। 'उत्तर' (धनी पश्चिमी देश) पर निर्भरता कम करने की दृष्टि से ही और दक्षिण-दक्षिण में परस्पर सहयोग स्थापित करने के लिए यह सम्मेलन बुलाया गया था। सम्मेलन में सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात जैसे अमीर देश भी आगन्त्रित थे। उनसे यह आशा की गयी कि वे अपने गरीब देशों की सहायता के लिए आगे आंएगे। यदि तेल सम्पन्न देश अपने धन को विकासशील देशों में लगाना स्वीकार कर लें तो बेशक 'दक्षिण' (निर्धन विकासशील देशों) की अर्थ-व्यवस्था बदल सकती है।

अक्टूबर 1982 में ग्रुप-77' के मन्त्रियों ने न्यूयार्क में एक घोषणा स्वीकार कर विकासशील राष्ट्रों के मध्य प्रशुल्क अधिमानों की स्थापना पर बाताएं प्रारम्भ की। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विकासशील राष्ट्रों के मध्य आपसी व्यापार अधिमानों व दीर्घकालीन समझौतों जैसे प्रत्यक्ष उपाय अपनाकर उनके आपसी व्यापार में वृद्धि करना था। गुटनिरपेक्ष देशों के हरारे शिखर सम्मेलन (1986) ने 'उत्तर-दक्षिण संवाद' के स्थान पर 'दक्षिण-दक्षिण संवाद' की आवश्यकता स्पष्ट रूप से प्रतिपादित की।

इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि दक्षिण-दक्षिण के सहयोग को अधिक निश्चित रूप देने में दिल्ली विचार सम्मेलन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया और विभिन्न समस्याओं को रेखांकित किया जिनमें पारस्परिक सहयोग आवश्यक था।

दक्षिण-दक्षिण संवाद के विभिन्न मंच

दक्षिण-दक्षिण के देशों के पारस्परिक सहयोग को आगे बढ़ाने वाले अन्तर्राष्ट्रीय मंचों को यदि देखा जाये तो यह उभर कर सामने आयेगा कि अंकटाड सम्मेलन, ग्रुप-77 की बैठकें, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन और जी-15 सम्मेलन दक्षिण-दक्षिण सहयोग के प्रमुख मंचों में से एक हैं इनका विवरण निम्नलिखित रूप से विश्लेषित किया जा सकता हैं-

अंकटाड सम्मेलन
अंकटाड अथवा संयुक्त राष्ट्र संघ के व्यापार एवं आर्थिक विकास पर हुए अधिवेशन से पूर्व विदेशी व्यापार तथा सहायता सम्बन्धी समस्याओं पर प्रशुल्क दरों एवं व्यापार पर हुए सामान्य या गैट समझौते (GATT) के अन्तर्गत विचार किया जाता था। उक्त सामान्य समझौते' का अल्पविकसित देशों को आशानुकूल लाभ नहीं मिल सका। इसी कारण अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग हेतु एक नवीन कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया, जिसका प्रयोजन अल्पविकसित देशों के विद्यमान अन्तर में कमी करना था। इसी कार्यक्रम को 'अंकटाड' की संज्ञा दी गयी। अंकटाड की स्थापना संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के एक स्थायी अंग के रूप में, 30 दिसम्बर, 1964 को हुई। यह अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्धों में एक नया मोड़ बिन्दु है और इसने विश्व व्यापार के विकास को एक नई दिशा प्रदान करने का प्रयत्न किया क्योंकि विकासशील देशों के विशेष सन्दर्भ में यह अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्धों के अध्ययन का प्रथम बड़ा प्रयास है। अब तक हुए अंकटाड सम्मेलनों में विकासशील देशों के मध्य आपसी सहयोग पर बल दिया गया है।

ग्रुप-77
1960 के दशक में संयुक्त राष्ट्र संघ के नए सदस्यों में अफ्रीकी राज्यों की संख्या काफी थी और संघ के लगभग दो-तिहाई सदस्य विकासशील तृतीय विश्व के देशों में से थे जो अपने को 'ग्रुप-77' कहने लगे। इस समुदाय की स्थापना 1964 ई. में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में की गयी थी। वर्तमान में इनकी संख्या 133 हो गयी है फिर भी उन्हें 'ग्रुप-77' के नाम से ही सम्बोधित किया जाता है। 'ग्रुप-77' के अधिकांश देश तृतीय विश्व के हैं। ये ऐसे देश है जिनके आर्थिक हित समान है और जो संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से विश्व अर्थव्यवस्था की संरचना में बुनियादी परिवर्तन करना चाहते हैं।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन
गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के देशों में अधिकांशत: देश विकासशील राष्ट्र है जिनकी अर्थव्यवस्था हर प्रकार के पिछड़ेपन से ग्रस्त है। इस आन्दोलन की स्थापना के दूसरे चरण में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का सारा ध्यान अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर केन्द्रित रहा जिसमें एक ओर विकासशील (दक्षिण) और विकसित (उत्तर) के बीच संवाद की बात की गई। वही विकासशील राष्ट्रों के बीच आर्थिक सहयोग और सामूहिक आत्म-निर्भरता की बाद को बार-बार दोहराया गया।

1970 ई. के दशक में जबकि विकासशील राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाएं एक ओर विकास की धीमी गति से प्रभावित थी, दूसरी ओर विकसित राष्ट्रों द्वारा भेदभाव पूर्ण आचरण और व्यापार मुद्रा सुविधाएं और प्रविधि के हस्तान्तरण की समस्याएं लगातार बनी थी, ऐसी स्थिति में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन द्वारा अल्जीयर्स सम्मेलन और बाद में हवाना सम्मेलन में उत्तर-दक्षिण के आर्थिक सम्बन्धों के विवाद में तेजी आयी और दक्षिण के राष्ट्रों द्वारा अधिक सुविधाओं की मांग की गई। इसी बीच हरारे सम्मेलन में उत्तर-दक्षिण संवाद' के स्थान पर 'दक्षिण-दक्षिण संवाद' अर्थात् परस्पर आर्थिक सहयोग पर बल दिया। हरारे सम्मेलनों में आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए विकासशील देशों का एक आयोग गठित करने का निर्णय किया गया जिसकी अध्यक्षता तंजानिया के पूर्व राष्ट्रपति जूलियस न्यूरेरे को सौंपी गयी। आयोग से कहा गया कि वह विकासशील देशों में गरीबी, भूखमरी, निरक्षरता के उन्मलन और आर्थिक समस्याओं के निवारण के उपाय सुझाएं। 1989 ई. के बेलग्रेड शिखर सम्मेलन में भाषण देते हुए भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दक्षिणदक्षिण सहयोग का आह्वान किया। उन्होंने कहा, "हमें दक्षिण-दक्षिण सहयोग को अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्धों में वर्तमान सम्बन्धों की अपेक्षा और अधिक ठोस रूप देना चाहिए। दक्षिण को अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाने के लिए चुनौतियों का सामना करना होगा। दक्षिण के हम लोगों में बहुत-सी ऐसी बातें है जो विकास की प्रक्रिया तेज करने में, गरीबी का उन्मूलन करने में और हमारे लोगों को समृद्ध बनाने में मदद कर सकती है। दक्षिण में विकास के समान उद्देश्यों के लिए एक-दूसरे के बारे में अधिक जानकारी और संसाधनों को बनाने में मदद कर सकती है। दक्षिण में विकास के समान उद्देश्यों के लिए एक-दूसरे के बारे में अधिक जानकारी और संसाधनों को जुटाने हेतु राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है।" उन्होंने आगे कहा, "दक्षिण-दक्षिण सहयोग को आवश्यक प्रोत्साहन देने तथा हमारे आपसी दीर्घकालिक हितों के लिए अस्थायी बलिदानों को स्वीकार करने हेतु एक उच्चकोटि की राजनीतिक इच्छा शक्ति की आवश्यकता है। हमें दक्षिण-दक्षिण सहयोग के प्रोत्साहन के लिए संस्थागत ढांचे को सुव्यवस्थित करना चाहिए। 77 के ग्रुप तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन दोनों ही आर्थिक और तकनीकी सहयोग के कार्यक्रम है। इन कार्यक्रमों को त इनमें परस्पर समन्वय स्थापित करना चाहिए। विकास और विविधता से दक्षिण की अर्थव्यवस्थाओं में काफी विस्तार हो रहा है। व्यापार के क्षेत्र में व्यापारिक प्राथमिकताओं की विश्व व्यवस्था के अन्तर्गत, विकासशील देश दक्षिण-दक्षिण व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए एक-दूसरे को प्राथमिकता शुल्क देते हैं। हमें संयुक्त उद्यम, आपसी पूंजी निवेश प्रवाह करने तथा आपस में प्राथमिकता के आधार पर प्रौद्योगिकी का हस्तान्तरण करने हेतु इसी प्रकार की कार्यवाही करने की आवश्यकता है।" इस तरह से श्री राजीव गाँधी ने दक्षिण के देशों के बीच सभी क्षेत्रों में सहयोग करने पर जोर दिया।

वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन दक्षिण-दक्षिण के सहयोग और गतिविधियों का प्रभावशाली केन्द्र हो सकता है क्योंकि वर्तमान स्थिति में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन तृतीय विश्व के देशों का सबसे बड़ा मंच है। इस मंच से विकासशील राष्ट्र अपनी आर्थिक गतिविधियों को तथा आपसी सहयोग को आगे बढ़ा सकते हैं।

जी-15 के सम्मेलन
जी-15 की स्थापना 1989 में बेलग्रेड में नवें गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन की बैठक के दौरान की गयी थी। जी-15 के सदस्य देश हैं- अल्जीरिया, अर्जेन्टाइना, ब्राजील, चिली, मिस्र, भारत, इण्डोनेशिया, जमाइका, मलेशिया, मैक्सिको, नाइजीरिया, पेरू, सेनेगल, वेनेजुएला, तथा जिम्बाब्बे। इसका पहला शिखर सम्मेलन कुआलालम्पुर में हुआ। इस सम्मेलन में जी-15 की भूमिका और प्रासंगिकता को स्पष्ट किया गया था। इसे विकासशील देशों (दक्षिण) के ठोस प्रतिनिधित्व के रूप में देखा गया, जिसका लक्ष्य विकास के काम को प्रोत्साहित एवं तेज करने का है और विकसित एवं विकासशील देशों के बीच सार्थक बातचीत तथा विकासशील देशों के बीच आपसी सहयोग सुदृढ़ करने की दिशा में ठोस उपाय सुझा सकें।

दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन और दक्षिण-दक्षिण राष्ट्रों का सहयोग
दक्षिण और दक्षिण के राष्ट्रों के बीच आर्थिक सहयोग की दिशा में प्रगति की बात बार-बार कही गई किन्तु आर्थिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में सामूहिक प्रयासों का अभाव लम्बे समय तक रहा। दक्षिण एशियाई क्षेत्र के देशों में एक ओर द्विपक्षीय सम्बन्धों के तनाव उपस्थित है तो दूसरी ओर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और दबावों से यह क्षेत्र मुक्त नहीं है।

1980 के दशक में भारत, पाकिस्तान नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीप देशों ने सारे द्विपक्षीय विवादों तथा तनावों के होते हुए भी आर्थिक, तकनीकी, सांस्कृतिक और औद्योगिक सहयोग को विकसित करने के लिये 1985 में ढांका में क्षेत्रीय संगठन की नींव रखी। सार्क का मूल आधार क्षेत्रीय सहयोग पर बल देना है। दक्षिण एशियाई वरीयता व्यापार समझौते (SAPTA) को मंजूरी दिए जाने से दक्षिण एशिया में आर्थिक सहयोग के नये युग का सूत्रपात हुआ है। अब साम्यवादी चीन को भी इस संगठन में शामिल करने की वकालात की जा रही है।

सारांश

दक्षिण-दक्षिण के राज्यों के बीच सहयोग के आरम्भिक प्रयासों को यदि देखा जाय तो यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि वे अपने विकास की प्राथमिकताओं को भलीभांति रेखांकित कर रहे हैं, साथ ही साथ अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के दबावों और उनकी आवश्यकताओं का सही आभास इन देशों को हैं और सभी अभ्यास प्रश्नावली पर सामूहिक दृष्टिकोण और कार्य योजनाओं को बनाने तथा लागू करने के ये देश तत्पर हैं । वर्तमान दक्षिण-दक्षिण के राष्ट्रों के बीच सहयोग और सामूहिक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में बार-बार रेखांकित की जा रही है, किन्तु अपने राजनैतिक दबावों और आर्थिक अभावों के परिणामस्वरूप दक्षिण-दक्षिण सहयोग अधिक प्रभावी नहीं हो पाया है। यह सब होते हुए भी दक्षिण-दक्षिण के राष्ट्रों की आर्थिक आवश्यकताएं उत्तरदक्षिण के सहयोग और नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएं की अनिवार्यताएं तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध भी दक्षिण के राष्ट्रों के सामूहिक प्रयासों से अछूते नहीं रह पाये है और एक उनका अनुभव कई अन्तर्राष्ट्रीय मंचो से किया जा सकता है।

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