शीत युद्ध क्या है? कारण, परिणाम, अर्थ, परिभाषा, प्रभाव, महत्व, विकास एवं विस्तार के चरण | sheet yudh kya hai

प्रस्तावना

'तोपों से भी अधिक उच्च स्वर से विश्व में विचारों का गर्जन था'- पैक्टन
विचारधाराओं के संघर्ष के रूप में शीत युद्ध की प्रगति का इतिहास सन् 1917 की उस रूसी बोल्शेविक क्रांति' से माना जाता है, जिसने एक नई व्यवस्था को जन्म दिया और कार्लमार्क्स के विचारों को मूर्त रूप प्रदान किया। इस व्यवस्था को एक ऐसी समाजवादी व्यवस्था के रूप में जाना गया जो शोषणात्मक पूँजीवादी व्यवस्था का विरोध करती थी। सोवियत संघ में साम्यवादी व्यवस्था के अभ्युदय से सम्पूर्ण पूँजीवादी विश्व भयभीत हो उठा तथा सोवियत संघ के नये राज्य को नष्ट करने के लिए एकजुट हो गया। परिणामस्वरूप दो वैचारिक पक्ष अस्तित्व में आये। एक ओर साम्यवादी सोवियत संघ था तो दूसरी ओर अपने मित्र राष्ट्रों सहित पूँजीवादी अमरीका। इन दोनों पक्षों का एक दूसरे के प्रति जो दृष्टिकोण था, उससे स्पष्ट परिलक्षित होने लगा कि भविष्य में इन दोनों के मध्य आपसी मतभेद तथा तनाव बढ़ते ही रहेंगे।
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यद्यपि अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर इस काल में शीत युद्ध' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ था तथापि अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में पूँजीवाद बनाम साम्यवाद का वैचारिक संघर्षशील समीकरण विश्व के राजनीतिक क्षितिज पर स्थापित हो गया।

1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध, मित्र राष्ट्रों तथा धुरी राष्ट्रों के नाम से बने दो गुटों के बीच लड़ा गया। इसी दौरान जर्मनी तथा सोवियत संघ के बीच गैर आक्रामक सन्धि हुई। परन्तु शांति सन्धि का उल्लंघन करते हुए जर्मनी ने सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया। परिणामस्वरूप युद्ध में सोवियत संघ मित्र राष्ट्रों के साथ शामिल हो गया। इससे मित्र राष्ट्रों की शक्ति दुगनी हो गई और मित्र राष्ट्रों ने युद्ध में विजय प्राप्त की। इस युद्ध में पुरानी पूँजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था का अन्त हुआ जिसका विश्व पर व्यापक प्रभाव था।
युद्ध के अंत में, विश्व दो गुटों में विभाजित हो गया- पश्चिमी या पूँजीवादी गुट, जिसका नेतृत्व संयुक्त राज्य अमरीका करता था तथा दूसरा समाजवादी गुट जो सोवियत संघ के नेतृत्व में था। इस तरह से संयुक्त राज्य अमरीका तथा सोवयित संघ जैसी दो महाशक्तियों के रूप में अभ्युदय हुआ। ये दोनों गुट दो वैचारिक रूप से विरोधी राजनीतिक व्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते थे इसलिए उनके बीच टकराव का होना स्वाभाविक था। यह टकराव या संघर्षशील अवस्था शीतयुद्ध में परिवर्तित हो गयी क्योंकि दोनों महाशक्तियों में कटुता, तनाव, वैमनस्य और मनोमालिन्य में अनवरत वृद्धि हुई और समूचे विश्व में एक प्रकार का भय, अविश्वास और तनाव का वातावरण बना। एक नये संघर्ष के युग का आविर्भाव हआ जिसे 'सशस्त्र शान्ति का युग' कहा गया। यह युद्ध वैचारिक युद्ध के रूप में भी जाना गया।

शीत युद्ध का अर्थ एवं परिभाषा

"शीत युद्ध" शब्द की उत्पत्ति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई है। इस शब्द का प्रयोग संयुक्त राज्य अमरीका तथा भूतपूर्व सोवियत संघ की गैर-सैनिक शत्रुता को दर्शाने के लिए किया गया जो द्वितीय विश्व युद्ध से ही चली आ रही थी। समय व्यतीत होने के साथ इसका प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में एक अवधारणा के रूप में होने लगा। "शीत युद्ध" शब्द का अर्थ यह है कि राष्ट्रों के बीच वास्तविक युद्ध (अर्थात् सैनिक शत्रुता) के बगैर ही शत्रुता की स्थिति का बने रहना है। इस शीत युद्ध में वैचारिक घृणा, राजनीतिक अविश्वास, कटनीतिक जोड-तोड, सैनिक प्रतिस्पर्धा, जाससी, मनोवैज्ञानिक युद्ध और कटुतापूर्ण सम्बन्ध प्रमख रहे।

शीत युद्ध वस्तुतः युद्ध के नर-संहारक दुष्परिणामों से बचते हुए युद्ध द्वारा प्राप्त होने वाले समस्त उद्देश्यों को प्राप्त करने की एक नूतन अवधारणा थी। शीत युद्ध एक प्रकार का वाक्-युद्ध था, जिसे कागज के गोलों, पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो तथा प्रचार साधनों से लडा गया। इसमें प्रचार द्वारा विरोधी गुट के देशों की जनता के विचारों को प्रभावित करके उसके मनोबल को क्षीण करने का प्रयत्न किया गया और अपनी श्रेष्ठता, शक्ति एवं न्यायप्रियता का तार्किक दावा किया गया। वस्तुत: 'शीत युद्ध' एक प्रचारात्मक युद्ध था जिसमें एक महाशक्ति दूसरे के खिलाफ घृणित प्रचार का सहारा लेती थी। यह एक प्रकार का कूटनीतिक युद्ध भी था, जिसमें शत्रु को अकेला करने और मित्रों की खोज करने की चतुराई का प्रयोग किया जाता रहा है, यही युद्ध अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में 'शीत युद्ध' के नाम से विख्यात है। इसे मनोवैज्ञानिक युद्ध की भी संज्ञा दी गई।

डॉ. एम. एस. राजन के शब्दों में, "शीत-युद्ध शक्ति-संघर्ष की राजनीति का मिला-जुला परिणाम है, दो विरोधी विचाराधाराओं के संघर्ष का परिणाम है, दो प्रकार की परस्पर पद्धतियों का परिणाम है, विरोधी चिन्तन पद्धतियों और संघर्ष पूर्ण राष्ट्रीय हितों की अभिव्यक्ति है जिनका अनुपात समय और परिस्थितियों के अनुसार एक-दूसरे के पूरक के रूप में बदलता रहा है।"

जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, "शीत युद्ध पुरातन शक्ति सन्तुलन की अवधारणा का नया रूप है। यह दो विचारधाराओं का संघर्ष न होकर दो भीमाकार शक्तियों का आपसी संघर्ष है।"

के. पी. एस. मेनन के अनुसार, "शीत युद्ध जैसा कि विश्व ने अनुभव किया, दो विचारधाराओं, दो पद्धतियों, दो गुटों, दो राज्यों और जब वह अपनी पराकाष्ठा पर था तो दो व्यक्तियों के मध्य उग्र संघर्ष था, दो विचारधाराएं थीं पूँजीवाद और साम्यवाद। दो पद्धतियां थीं-संसदीय लोकतन्त्र और जनवादी जनतन्त्र-बुर्जुआ जनतन्त्र और सर्वहारा वर्ग की तानाशाही। दो गुट थे- नाटो और वारसा पैक्ट। दो राज्य थे- संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ। दो व्यक्ति थे- जोसेफ स्टालिन और जॉन फास्टर डलेस।"

जॉन फॉस्टर डलेस के शब्दों में, “शीत युद्ध नैतिक दृष्टि से धर्म-युद्ध था, 'अच्छाइयों के लिए बुराइयों के विरूद्ध, सत्य के लिए गलतियों के विरूद्ध और धर्म-प्राण लोगों के लिए नास्तिकों के विरूद्ध ....... संघर्ष था।"

लुई हाले ने अपनी पुस्तक दी कोल्ड वार एज हिस्ट्री 1967 (The Cold war as History 1967) में लिखा है, "शीत युद्ध परमाणु युग में एक ऐसी तनावपूर्ण स्थिति है जो शस्त्र युद्ध से एकदम भिन्न किन्तु उससे अधिक भयानक युद्ध है। यह एक ऐसा युद्ध है जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करने के स्थान उन्हें उलझा दिया। विश्व के सभी देश और सभी समस्याएँ चाहे वह वियतनाम हो, चाहे कश्मीर या कोरिया हो अथवा अरब-इजरायल संघर्ष हो- सभी शीत युद्ध में मोहरों की तरह प्रयुक्त किये गये।"

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि शीत युद्ध वास्तविक युद्ध नहीं था अपितु युद्ध का वातावरण था, जिसमें प्रत्येक महाशक्ति स्वयं को शक्तिशाली और दूसरे को कमजोर बनाने के उग्र एवं नरम कूटनीतिक दाव-पेचों का सहारा लेता रहा। दोनों पक्ष आपस में शान्तिकालीन कूटनीतिक सम्बन्ध कायम रखते हुए भी एक दूसरे के प्रति शत्रुभाव रखते थे और सशस्त्र युद्ध के अतिरिक्त अन्य सभी उपायों से एक-दूसरे को कमजोर तथा शक्तिहोन बनाने का प्रयास करते थे। इसे उष्ण शान्ति का भी नाम दिया गया।

शीत युद्ध की प्रकृति

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शीतयुद्ध की प्रकृति के सम्बन्ध में हम यही कहना चाहेंगे कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही विकसित हुई। वैसे भी 5 वें दशक में सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक रूप से इसकी प्रकृति दो परस्पर विरोधी विचारधारा के रूप में ही उभर कर आयी थी। इस शीत युद्ध के दौरान ही दोनों विचारधाराओं वाली महाशक्तियों पूर्व सोवियत संघ ने नव स्वतंत्र राष्ट्रों को अपने-अपने प्रभाव में या खेमें में शामिल करने के लिए हथियार, आर्थिक सहायता, सैनिक सहायता और शस्त्र-सप्लाई खुले रूप से उपलब्ध कराई थी। यही नहीं, सामूहिक सुरक्षा प्रणाली को अपनाते हुए सैनिक संधियां तथा क्षेत्रीय संगठनों का निर्माण भी तीव्र गति से किया गया था।

इसमें अप्रत्यक्ष रूप से शस्त्रीकरण, हस्तक्षेप, जासूसी, वैज्ञानिक तथा तकनीकी सर्वोच्चता का निरन्तर प्रयोग होता रहा। यदा-कदा कुछ स्थानों पर सैनिक हस्तक्षेप तथा प्रत्यक्ष कार्यवाही, नाकाबंदी एवं चुनौती इसके अनिवार्य अंग बन गये थे। यह वास्तव में युद्ध न होकर ऐसी स्थिति का निर्माण करता है जिसमें अशान्ति, तनाव और संघर्ष राजनीतिक रूप से चलते रहे है। शीत युद्ध एक ऐसी स्थिति थी जिसे मूलत: 'उष्ण शान्ति' कहा जाना चाहिए। इस में न तो पूर्ण रूप से शान्ति' रहती है और न ही वास्तविक युद्ध' होता है, बल्कि शान्ति एवं युद्ध के बीच की अस्थिर, स्थिति बनी रहती है। हालांकि वास्तविक युद्ध नहीं होता, किन्तु यह स्थिति युद्ध की प्रथम सीढ़ी होती है जिसमें युद्ध के वातावरण का निर्माण होता रहता था। प्रसिद्ध विद्धान इसाक डोयशर ने लिखा है, 'शीत युद्ध को प्रकृति ट्रॉटस्की की ब्रेस्त लिटोस्क में की गयी प्रसिद्ध घोषणा की याद दिलाने वाली थी जहाँ उन्होंने कहा था- न युद्ध और न शान्ति।'

शीत युद्ध के कारण

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तथा पूर्व सोवियत संघ के विघटन तक अर्थात् चार दशक से भी अधिक समय तक सम्पूर्ण विश्व की राजनीति पर शीत युद्ध छाया रहा। यह विश्व युद्ध दो विरोधी सिद्धान्तों के आधार पर लड़ा गया और सम्पूर्ण युद्ध दो विरोधी गुटों में बंटकर रह गया था। एक गुट का नेतृत्व पूँजीवादी देश अमरीका कर रहा था और दूसरे गुट का संचालन समाजवादी देश पूर्व सोवियत संघ कर रहा था।
महायुद्ध की समाप्ति के बाद दोनों महाशक्तियाँ युद्ध से प्राप्त लाभ की स्थिति को बनाये रखना चाहती थीं और अपने प्रभाव के विस्तार के लिए उत्सुक थीं। उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति के मार्ग में एक शक्ति दूसरे के लिए बाधक थीं। दोनों ही पक्षों को एक दूसरे से कुछ शिकायतें थी। वे शिकायतें ही मूल रूप में शीत-युद्ध की उत्पत्ति का कारण थीं।

यहां शीत युद्ध की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारण इस प्रकार हैं-
  • ऐतिहासिक कारण
  • पारस्परिक सन्देह एवं अविश्वास
  • युद्धोत्तर उद्देश्यों में अन्तर
  • सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते की अवहेलना
  • सोवियत संघ द्वारा बाल्कन समझौते का अतिक्रमण
  • ईरान से सोवियत सेना का न हटाया जाना
  • यूनान में सोवियत संघ का हस्तक्षेप
  • टर्की पर सोवियत संघ का दबाव
  • अणु बम का आविष्कार
  • सोवियत संघ द्वारा अमरीका विरोधी प्रचार अभियान
  • पश्चिमी राष्ट्रों द्वारा रूस विरोधी अभियान शुरू करना
  • सोवियत संघ द्वारा वीटो का बार-बार प्रयोग
  • सोभियत संघ की लैण्ड-लीज सहायता बन्द करना
  • शक्ति-संघर्ष

ऐतिहासिक कारण
सोवियत संघ में 1917 को बोल्शेविक क्रान्ति होना पश्चिमी विचारधारा के राष्ट्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गयी थी। पश्चिमी राष्ट्रों ने इसका विरोध भी किया था, ब्रिटेन, अमरीका, फ्रांस जैसे राष्ट्र साम्यवाद का प्रसार रोकने का अथक प्रयास भी कर रहे थे। इसी दृष्टि का विरोध करने स्वरूप ब्रिटेन ने 1923 तक, अमेरिका ने 1933 तक मान्यता नहीं दिये जाने से रूस पश्चिमी राष्ट्रों के प्रति नाराजगी रखता था। जर्मनी जैसे राष्ट्रों को आशंका को दृष्टि से देखने के बजाए रूस पर अधिक नजर रखने की जरूरत समझ रहे थे। ब्रिटेन ने तुष्टिकरण की नीति इसी दृष्टिकोण से अपनायी कि जर्मनी को मदद देकर रूस के साम्यवाद को रोका जा सकता है। इसे हम शीत-युद्ध की उत्पत्ति का ऐतिहासिक कारण भी मान सकते हैं।

पारस्परिक सन्देह एवं अविश्वास
द्वितीय महायुद्ध के दौरान पारस्परिक सहयोग करते हुए भी दोनों महाशक्तियाँ एक-दूसरे को सन्देह, आशंका एवं अविश्वास की दृष्टि से देखती थीं। वस्तुतः पश्चिम के देशों के लिए जर्मनी और पूर्व सोवियत संघ दोनों ही सिर दर्द थे। अत: वे दोनों से छुटकारा पाना चाहते थे या कम-से-कम उनकी शक्ति का ह्रास चाहते थे। यही कारण है कि युद्ध के दौरान जब पूर्ववर्ती सोवियत संघ ने पश्चिम में जर्मनी के विरूद्ध दूसरा मोर्चा खोलने के लिए अनुरोध किया तो ब्रिटेन व अमरीका ने उसे टालने की कोशिश की। पश्चिम पूर्ववर्ती सोवियत संघ को पूर्णतः 'आहत एवं शक्तिहीन' होते देखना चाहता था। पश्चिम को इसमें कुछ सफलता भी मिली क्योंकि युद्ध में पूर्व सोवियत संघ को सबसे अधिक हानि उठानी पड़ी थी। परन्तु इसने पारस्परिक अविश्वास की जड़ों को गहरा कर दिया।

युद्धोत्तर उद्देश्यों में अन्तर
अमरीका और सोवियत संघ के युद्धोत्तर उद्देश्यों में भी स्पष्ट भिन्नता थी। भविष्य में जर्मनी के विरूद्ध सुरक्षित रहने के लिए सोवियत संघ, यूरोप के देशों को सोवियत प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहता था, तो पश्चिमी देशों के मत में जर्मनी की पराजय से सोवियत संघ के अत्यन्त शक्तिशाली हो जाने का भय था। यह देश सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव क्षेत्र को सीमित रखने के लिए कटिबद्ध थे। इसके लिए आवश्यक था कि पूर्वी यूरोप के देशों में लोकतान्त्रिक शासनों की स्थापना हो जिसके लिए स्वतन्त्र निर्वाचन कराने आवश्यक थे। स्टालिन के मत में इन देशों में स्थापित साम्यवादी सरकारें ही वास्तविक जनतान्त्रिक सरकारें थीं।

सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते की अवहेलना
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान याल्टा सम्मेलन (1945) को रूस के याल्टा नामक स्थान पर आयोजित हुआ। जिसमें रूस, ब्रिटेन, अमेरिका के शासनाध्यक्ष-स्टालिन, चर्चिल, रूजवेल्ट आदि इकट्ठे हुए और कुछ समझौते किये थे। पोलैण्ड में सोवियत संघ द्वारा संरक्षित 'लुबनिन शासन' और पश्चिमी देशों द्वारा संरक्षित 'लन्दन शासन' के स्थान पर स्वतन्त्र और निष्पक्ष निर्वाचन पर आधारित एक प्रतिनिध्यात्मक शासन स्थापित करने का निर्णय लिया। लेकिन जैसे ही युद्ध का अन्त निकट दिखायी देने लगा स्टालिन ने अपने वचनों से मुकरना प्रारम्भ कर दिया। उसने अमरीकी और ब्रिटिश प्रेक्षकों को पोलैण्ड में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी तथा पोलैण्ड की जनतन्त्रवादी पार्टियों को मिलाने की कार्यवाही प्रारम्भ कर दी। उसने पोलैण्ड में अपनी संरक्षित लुबनिन सरकार को लादने का प्रयत्न किया। हंगरी, बल्गारिया, रूमानिया और चेकोस्लोवाकिया में भी सोवियत संघ द्वारा युद्ध विराम समझौतों तथा याल्टा व पोट्सडाम सन्धियों का उल्लंघन किया गया। सोवियत संघ ने इन सभी देशों में लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना में मित्र-राष्ट्रों के साथ सहयोग करने से इन्कार कर दिया और सोवियत संघ समर्थक सरकारें स्थापित कर दी। सोवियत संघ की जापान के विरूद्ध युद्ध में सम्मिलित होने की अनिच्छा और उसके द्वारा मित्र-राष्ट्रों को साइबेरिया में अड्डों की सुविधा प्रदान करने में हिचकिचाहट ने भी पश्चिमी राष्ट्रों के रूस के प्रति सन्देह को बढ़ाया। मंचूरिया स्थित सोवियत फौजों ने 1946 के प्रारम्भ में राष्ट्रवादी सेनाओं को तो वहां प्रवेश तक नहीं करने दिया जबकि साम्यवादी सेनाओं को प्रवेश सम्बन्धी सुविधाएं प्रदान की और उनको सम्पूर्ण युद्ध सामग्री सौंप दी, जो जापानी सेना भागते समय छोड़ गयी थी। याल्टा समझौतों के विरूद्ध की गयी सोवियत कार्यवाहियों से पश्चिमी राष्ट्रों के हृदय में सोवियत संघ के प्रति सन्देह उत्पन्न होने लगा।

सोवियत संघ द्वारा बाल्कन समझौते का अतिक्रमण
सोवियत संघ ने अक्टूबर 1944 में चर्चिल के पूर्वी यूरोप के विभाजन के सुझाव को स्वीकार कर लिया था। इसके अन्तर्गत यह निश्चित हुआ था कि सोवियत संघ का बल्गारिया तथा रूमानिया में प्रभाव स्वीकार किया जाय और यही स्थिति यूनान में ब्रिटेन की स्वीकार की जाये। हंगरी तथा यूगोस्लाविया में दोनों का बराबर प्रभाव माना जाय, किन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद इन देशों में बाल्कन समझौते की उपेक्षा करते हुए सोवियत संघ ने साम्यवादी दलों को खुलकर सहायता दी और वहां सर्वहारा की तानाशाही' स्थापित करा दी गयी। इससे पश्चिमी देशों का नाराज हो जाना स्वाभाविक था।

ईरान से सोवियत सेना का न हटाया जाना
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत सेना ने ब्रिटेन की सहमति से उत्तरी ईरान पर अधिकार जमा लिया था। यद्यपि युद्ध की समाप्ति के बाद आँग्ल-अमरीकी सेना तो दक्षिण ईरान से हटा ली गयी, पर सोवियत संघ ने अपनी सेना हटाने से इन्कार कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव के फलस्वरूप ही सोवियत संघ ने बाद में वहां से अपनी सेनाएं हटायी। इससे भी पश्चिमी देश सोवियत संघ से नाराज हो गये और उसके प्रति अविश्वास की भावना का विकास हुआ।

यूनान में सोवियत संघ का हस्तक्षेप
द्वितीय विश्व युद्ध के समय यूनान पर जर्मनी का आधिपत्य था। 1944 में उसके आधिपत्य की समाप्ति पर ब्रिटेन ने जर्मनी का स्थान ले लिया। लेकिन वहां गृह युद्ध प्रारम्भ हो गया जिसमें साम्यवादी छापामारों को यूगोस्लाविया, बुल्गारिया तथा रूमानिया द्वारा सहायता दी जा रही थी अत: यूनान के साम्यवादी बन जाने की पूरी सम्भावना उत्पन्न हो गयी थी यद्यपि अमेरिका के हस्तक्षेप के कारण ऐसा सम्भव नहीं हो पाया, किन्तु फिर भी इस प्रश्न को लेकर सोवियत संघ तथा अमेरिका के मध्य तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई।

टर्की पर सोवियत संघ का दबाव
युद्ध के तुरन्त बाद सोवियत संघ ने टर्की पर कुछ भू-प्रदेश प्राप्त करने और वास्फोरस में नाविक अड्डा बनाने का अधिकार देने के लिए दबाव डालना शुरू किया। परन्तु पश्चिमी राष्ट्र इसके विरूद्ध थे। जब टर्की पर सोवियत संघ का हस्तक्षेप बढ़ने लगा तो अमरीका ने उसे चेतावनी दी कि टर्की पर किसी भी आक्रमण को सहन नहीं किया जायेगा और मामला सुरक्षा परिषद् में रखा जायेगा।

अणु बम का आविष्कार
शीत युद्ध के सूत्रपात का एक अन्य कारण अणु बम का आविष्कार था। यह कहा जाता है कि अणु बम ने हिरोशिमा का ही विध्वंस नहीं किया, अपितु युद्धकालीन मित्र-राष्ट्रों की मित्रता का भी अन्त कर दिया। संयुक्त राज्य अमरीका में अणुबम पर अनुसन्धान कार्य और उसका परीक्षण बहुत पहले से चल रहा था। अमरीका ने इस अनुसन्धान की प्रगति से ब्रिटेन को तो पूरा परिचित रखा, लेकिन सोवियत संघ से इसका रहस्य जान-बूझकर गुप्त रखा गया। सोवियत संघ को इससे जबर्दस्त आघात पहुंचा और उसने इसे एक घोर विश्वासघात माना। उधर अमरीका और ब्रिटेन को अणुबम के कारण यह अभिमान हो गया कि अब उन्हें सोवियत सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है। इस कारण भी दोनों पक्षों में मन-मुटाव बढ़ा। इस तरह से सोवियत संघ द्वारा अपनी उपेक्षा करने के कारण भी संयुक्तराज्य अमेरिका के प्रति अविश्वास व्यक्त किया गया।

सोवियत संघ द्वारा अमरीका विरोधी प्रचार अभियान
द्वितीय महायुद्ध समाप्त होने के कुछ समय पूर्व से ही प्रमुख सोवियत पत्रों में अमरीका की नीतियों के विरूद्ध घोर आलोचनात्मक लेख प्रकाशित होने लगे। इस ‘प्रचार अभियान' से अमरीका के सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्रों में बड़ा विक्षोभ तथा अन्सतोष फैला और अमरीका ने अपने यहाँ बढ़ती हुई साम्यवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाना प्रारम्भ कर दिया ताकि अमरीका में साम्यवाद के प्रभाव को बढ़ने से रोका जा सके। सोवियत संघ ने अमरीका में भी साम्यवादी गतिविधियों को प्रोत्साहित करना प्रारम्भ किया। 1945 के आरम्भ में 'स्टेटजिक सर्विस' के अधिकारियों को यह ज्ञात हआ कि उनकी संस्था के गुप्त दस्तावेज साम्यवादी संरक्षण में चलने वाले पत्र अमेरेशिया के हाथों में पहुंच गये हैं। 1946 में कैनेडियन रॉयल कमीशन' की रिपोर्ट में कहा गया कि कनाडा का साम्यवादी दल 'सोवियत संघ की एक भुजा' है। ऐसी स्थिति में अमरीकी प्रशासन साम्यवादी सोवियत संघ के प्रति जागरूक हो गया और उन्होंने साम्यवाद का हौवा खड़ा कर दिया। सोवियत संघ ने अमरीका की इस कार्यवाही को अपने विरूद्ध समझा और उसने भी अमरीका की कटु आलोचना करने का अभियान प्रारम्भ कर दिया, परिणामस्वरूप शीतयुद्ध में वृद्धि हुई।

पश्चिमी राष्ट्रों द्वारा रूस विरोधी अभियान शुरू करना
पश्चिमी राष्ट्रों की सोवियत विरोधी नीति और प्रचार अभियान ने जलती आहुति में घी का काम किया 18 अगस्त, 1945 को बर्नेज (अमरीकी राज्य सचिव) तथा बेविन (ब्रिटिश विदेश मन्त्री) ने अपनी संयुक्त विज्ञप्ति में सोवियत नीति के सन्दर्भ में कहा कि "हमें तानाशाही के एक स्वरूप के स्थान पर उसके दूसरे स्वरूप के संस्थापन को रोकना चाहिए।" 5 मार्च, 1946 को अपने फुल्टन भाषण में चर्चिल ने कहा कि “बाल्टिक में स्टेटिन से लेकर एड्रियाटिक में ट्रीस्टे तक, महाद्वीप (यूरोप) में एक 'लौह आवरण' छा गया है। ये सभी प्रसिद्ध नगर और सोवियत क्षेत्र में बसने वाली जनता न केवल सोवियत प्रभाव में है वरन् सोवियत नियन्त्रण में है।" उसने आगे कहा कि "स्वतन्त्रता की दीप-शिखा प्रज्वलित रखने एवं ईसाई सभ्यता की सुरक्षा के लिए" एक आँग्ल-अमरीकी गठबन्धन की आवश्यकता है। चर्चिल के फुल्टन भाषण के दूरगामी परिणाम हुए। अप्रेल 1946 के उपरान्त दोनों पक्षों ने अपने मतभेदों को खुले आम प्रकट करना शुरू कर दिया जिसमें दोनों पक्षों का एक-दूसरे के प्रति शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण एक यथार्थ सत्य बन गया।

सोवियत संघ द्वारा वीटो का बार-बार प्रयोग
सोवियत संघ ने अपने वीटो' के अनियन्त्रित प्रयोगों द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यों में अवरोध डालना प्रारम्भ कर दिया, क्योंकि वह संयुक्त राष्ट्र संघ को विश्व-शान्ति और सुरक्षा स्थापित करने वाली एक विश्व-संस्था न मानकर अमरीका के विदेश विभाग का एक अंग समझता था। इसलिए वीटो' के बल पर उसने अमरीका और पश्चिमी देशों के लगभग प्रत्येक प्रस्ताव को निरस्त करने की नीति अपना ली। सोवियत संघ द्वारा वीटो के इस प्रकार दुरूपयोग करने से पश्चिमी राष्ट्रों की यह मान्यता बन गयी कि वह इस संगठन को समाप्त करने के लिए प्रयतशील है। इस कारण पश्चिमी राष्ट्र सोवियत संघ की कटु आलोचना करने लगे, जिसके परिणामस्वरूप उनमें परस्पर विरोध और तनाव का वातावरण और अधिक बढ़ गया।

सोभियत संघ की लैण्ड-लीज सहायता बन्द करना
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका सोवियत संघ को लैण्डलीज योजना के अन्तर्गत आर्थिक सहायता प्रदान कर रहा था उससे वह असन्तुष्ट तो था ही क्योंकि यह सहायता अत्यन्त अल्प थी, किन्तु इस राशि को भी राष्ट्रपति ट्रमैन ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एकाएक बन्द कर दिया जिससे सोवियत संघ का नाराज होना स्वाभाविक था।

शक्ति-संघर्ष
शीत युद्ध का मुख्य कारण महाशक्तियों का पारस्परिक शक्ति संघर्ष' था। जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि "शीत युद्ध शक्ति सन्तुलन के प्राचीन विचार की नवीन अभिव्यक्ति है।" द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् अमरीका और पूर्ववर्ती सोवियत संघ विश्व में दो महाशक्तियाँ रह गयी थीं। अन्य शक्तियाँ या तो लुप्त हो गई थीं या वे आर्थिक दृष्टि से इतनी निर्बल हो गई थीं कि अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में निर्णायक भूमिका अदा करने की स्थिति में नहीं थीं। अमरीका तथा सोवियत संघ दोनों आदेश देने की स्थिति में थे। अतः इनमें विश्व-प्रभुत्व स्थापित करने के लिए आपसी संघर्ष अनिवार्य अंग बन गया। निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि शीतयुद्ध को बढ़ाने में अनेक तत्वों की भूमिका रही है।

शीत युद्ध : विकास एवं विस्तार के चरण

"दो भीमकाय दैत्यों के मध्य संघर्ष समकालीन विश्व राजनीति की बड़ी विशेषता है।" -अज्ञात
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् दो महाशक्तियों संयुक्त राज्य अमेरिका एवं सोवियत संघ का आविर्भाव हुआ। इस महायुद्ध के पश्चात् अमरीका की यह धारणा बन गई कि सोवियत संघ पश्चिमी राष्ट्रों के लिए वास्तविक सैनिक खतरा है। सोवियत साम्यवादी व्यवस्था पश्चिमी व्यवस्था के लिए एक चुनौती है तथा अपने अस्तित्व के लिए साम्यवाद का अवरोध किया जाना चाहिए। लेकिन इसके लिए युद्ध का सहारा नहीं लिया जा सकता था। अत: उन्होंने अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए राजनीतिक प्रचार का मार्ग पकड़ा जिससे दोनों महाशक्तियों में शीत युद्ध' का आधुनिक रूप से श्रीगणेश हुआ।

शीतयुद्ध के विभिन्न चरणों को निम्नलिखित रूप से विश्लेषित किया जा सकता है-

शीत युद्ध के विस्तार का प्रथम चरण (1946-1953)
1945 से 1953 तक पश्चिमी देशों और सोवियत संघ में संयुक्त राष्ट्र संघ के भीतर और बाहर अणुशक्ति के नियन्त्रण एवं नियमन, निःशस्त्रीकरण, पराजित राष्ट्रों के साथ शान्ति सन्धियों, जर्मनी, बर्लिन, यूरोप की सुरक्षा समस्याओं, एशिया एवं अफ्रीका के अल्प-विकसित राष्ट्रों के भविष्य आदि अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के लगभग सभी प्रश्नों पर तीव्र वाद-विवाद तथा कूटनीतिक संघर्ष चलता रहा। सोवियत संघ द्वारा मार्शल योजना के प्रत्युत्तर में अक्टूबर 1947 में यूरोप के नौ साम्यवादी देशों के 'कोमिनफार्म' की स्थापना के बाद शीत युद्ध की उग्रता बढ़ती गई। सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप पर अपने नियन्त्रण को और भी अधिक कठोर बना दिया। इस तरह से शक्ति के दो गुट या शिविर बन गए और उनमें अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों के विस्तार के लिए जी-तोड़ स्पर्धा होने लगी। अत: इस काल में शीत युद्ध का वास्तविक रूप सामने आ जाता है। इस काल में अमरीका के सोवियत संघ को घेरकर उसके विस्तार का प्रत्येक स्तर पर प्रतिरोध करने की नीति अपनायी।

इस काल में शीतयुद्ध में वृद्धि के लिए कई घटनाएं प्रमुख थीं, जिन्हें निम्नलिखित रूप से गिनाया जा सकता है-

(1) चर्चिल का फुल्टन भाषण
5 मार्च, 1946 को अमरीका के फुल्टन स्थान पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल द्वारा दिये गये भाषण ने शीत युद्ध का शंखनाद कर दिया। फुल्टन नगर में भाषण करते हुए चर्चिल ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में एक नयी विचारधारा का सूत्रपात किया। उसने कहा, "हमें तानाशाही के एक स्वरूप के स्थान पर उसके दूसरे स्वरूप की संस्थापना को रोकना चाहिए।" उसने "स्वतन्त्रता की दीप-शिखा प्रज्वलित रखने एवं ईसाई सभ्यता की सुरक्षा के लिए" एक आंग्ल-अमरीकी गठबन्धन की मांग की। उसका सुझाव था कि साम्यवाद के प्रसार को सीमित रखने के हर सम्भव एंव नैतिक-अनैतिक उपायों का अवलम्बन किया जाये। इसके बाद समूचे अमरीका में सोवियत विरोधी भावना का तूफान फूट पड़ा।

(2 ) ट्रूमैन सिद्धान्त
12 मार्च, 1947 को राष्ट्रपति ट्रूमैन ने अमरीका की यह नीति घोषित की कि वह साम्यवाद के प्रसार को रोकेगा। इसका उद्देश्य था साम्यवाद के विस्तार को उसके तत्कालीन स्तर पर ही रोक देना। इसी बीच यूनान एवं टर्की में साम्यवादियों के नेतृत्व में लड़े जा रहे गृहयुद्ध का दमन करने के लिए इन देशों को वित्तीय सहायता देने की नीति को उचित ठहराते हुए तर्क दिया कि साम्यवाद के प्रसार को रोकने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका को कहीं भी हस्तक्षेप करने का अधिकार है। ट्रूमैन सिद्धान्त शीतयुद्ध को फैलाने के लिए एक नया दस्तावेज था जिसमें यह स्पष्ट अभिव्यक्ति की गई थी। वस्तुत: आर्थिक सहायता के माध्यम से साम्यवाद के प्रसार को सीमित करने की अमेरीका ने जो नीति अपनायी उसे 'ट्रूमैन सिद्धान्त' के नाम से पुकारा जाता है।

(3) मार्शल योजना
1950 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में शीत युद्ध और गहरा हो गया। अमरीका ने दिसम्बर, 1951 में यूरोप के पुनर्विकास का कार्यक्रम बनाया, जिसको मार्शल योजना के नाम से जाना जाता है। और यह ट्रूमैन के सिद्धान्त का आर्थिक प्रतिपक्ष था क्योंकि ट्रूमैन का सिद्धान्त मौलिक तौर पर एक राजनीतिक योजना थी। यद्यपि संयुक्त राज्य अमरीका ने घोषणा की थी कि इस योजना का लक्ष्य केवल युद्ध द्वारा बर्बाद किये गए यूरोप का पुनर्निर्माण करना है, लेकिन सामान्यतः यह साम्यवादियों के बढ़ते प्रभाव से यूरोप को सुरक्षित करने का एक मात्र प्रबल प्रयास था। इस प्रकार इस योजना ने अमरीका की 'साम्यवाद के अवरोध की नीति' को सफल बनाने में सहायता दी।

(4) बर्लिन की नाकेबन्दी
1948 में सोवियत संघ ने बर्लिन की नाकेबन्दी करके शीत युद्ध को चरम सीमा पर पहुंचा दिया। बर्लिन की नाकेबन्दी के अवसर पर दोनों ही पक्षों को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का मौका मिला। इससे पश्चिमी जर्मनी के बीच सभी रेल, सड़क और जलीय यातायात बन्द कर दिया गया। बर्लिन शेष विश्व से अलग-थलग पड़ गया। सोवियत संघ इस कार्यवाही से पश्चिम बर्लिन के लोगों को अपनी ओर आने के लिए विवश कर देना चाहता था किन्तु पश्चिम के दशों ने लगभग एक वर्ष तक अनिवार्य आवश्यकता की सभी वस्तुएँ हवाई मार्ग द्वारा पश्चिम बर्लिन में पहुँचायी। अन्ततः विवश होकर सोवियत संघ को बर्लिन की नाकेबन्दी समाप्त करनी पड़ी।

(5) जर्मनी का विभाजन
1948 में क्षत-विक्षत जर्मनी 'शीत युद्ध' का एक प्रधान केन्द्र बन गया। ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका ने अपने अधीनस्थ जर्मनी के तीनों पश्चिमी क्षेत्रों का एकीकरण कर दिया। इस तरह 21 सितम्बर, 1949 को संघीय जर्मन गणराज्य जिसे 'पश्चिमी जर्मनी' भी कहते थे, का उदय हुआ। मित्र-राष्ट्रों के इस कार्य के प्रत्युत्तर में 7 अक्टूबर, 1949 को जर्मनी के सोवियत संघ प्रभुत्व वाले क्षेत्र में जर्मन प्रजातन्त्रात्मक गणराज्य जिसे 'पूर्वी जर्मनी' भी कहते थे, की स्थापना कर दी गयी। इस प्रकार जर्मनी-पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी- में विभाजित हो गया। इसने शीतयुद्ध को तीव्र कर दिया।

(6) नाटो की स्थापना
सम्पूर्ण यूरोप में साम्यवादी आन्दोलन के उभार के कारण जहाँ सोवियत संघ तथा अमरीका के मध्य तनाव में वृद्धि हुई वहीं अमेरिका ने पश्चिमी शक्तियों के साथ सुरक्षात्मक गठबंधन करने का प्रस्ताव किया। इस प्रकार अप्रेल, 1949 में नार्थ अटलांटिक सन्धि पर हस्ताक्षर कर नॉर्ट अटलांटिक ट्रिटी आर्गेनाइजेशन (नाटो) की स्थापना की। प्रारम्भ में इसमें 12 देश सम्मिलित हुए, बाद में यूनान, तुर्की तथा पश्चिमी जर्मनी भी इसमें सम्मिलित हो गए।

(7) साम्यवादी चीन की क्रान्ति
यद्यपि शीतयुद्ध का अविर्भाव यूरोप में हुआ था किन्तु यह वहीं तक सीमित न रहकर उसके बाहर भी फैल गया था। यूरोप के तुरन्त बाद इसका प्रचार-प्रसार सुदूर पूर्व में भी हुआ। चीन में साम्यवादी क्रान्ति 1949 में सफल हुई। हालांकि वहां के च्यांग काई शेक ने संयुक्त राज्य अमरीका का पूरा समर्थन प्राप्त किया था लेकिन वह साम्यवादी क्रान्ति को रोकने में बिल्कुल असफल रहा। माओ के नेतृत्व में साम्यवादी क्रान्ति की सफलता के बाद जब च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी सरकार भागकर फारमोसा चली गयी तो चीन की साम्यवादी सरकार ने महासभा एवं सुरक्षा परिषद् में अपनी सदस्यता प्राप्त करने की मांग की। संयुक्त राज्य अमरीका ने उसका विरोध किया। लेकिन संयुक्त राज्य अमरीका यह नहीं चाहता था कि सुरक्षा परिषद् में सोवियत संघ का एक और समर्थक हो जाय । साम्यवादी चीन की सदस्यता की मांग को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अस्वीकार किये जाने की सोवियत संघ में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। अत: चीन की सदस्यता के प्रश्न को लेकर सोवियत संघ और अमरीका के मध्य शीत-युद्ध में भयंकर कटुता और वैमनस्य पैदा हो गया।

(8) कोरिया युद्ध
कोरिया का युद्ध वास्तव में पश्चिमी गुट और साम्यवादी गुट के बीच युद्ध था। 1950 ई. में साम्यवादी उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया। जिससे 'शीत युद्ध' ने कुछ समय के लिए 'उष्ण अथवा सशस्त्र युद्ध' का रूप धारण कर लिया। प्रत्यक्ष में यह युद्ध सोवियत संघ एवं अमेरिका का युद्ध बन गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने उत्तरी कोरिया को आक्रमणकारी घोषित कर दिया और उसके झण्डे के नीचे अनेक देशों की, विशेषतः अमेरिका की सेनाओं ने दक्षिणी कोरिया की सहायता की, परन्तु किसी भी पक्ष को निर्णयात्मक विजय प्राप्त न हो सकी और 8 जून, 1953 को अन्ततः कोरिया में युद्ध-विराम हो गया, किन्तु दोनों गुटों के बीच शीत युद्ध जारी रहा।

(9) जापान के साथ मित्र देशों की शान्ति-सन्धि
1951 में अमेरिका द्वारा जापान के साथ शान्ति-सन्धि पर हस्ताक्षर किए। सोवियत संघ के लिए यह बात असहनीय थी। उसने इस एकपक्षीय कार्यवाही की खुलकर आलोचना की। इससे शीतयुद्ध के वातावरण में वृद्धि हुई।

वस्तुत: इस चरण में शीत-युद्ध में काफी तीव्रता देखी गयी। इससे विश्व में अशान्ति का वातावरण बना।

शीत युद्ध के विस्तार का द्वितीय चरण (1953-1958)
ट्रूमैन-स्टालिन युग के पश्चात् 1952 में अमरीका और सोवियत संघ के नेतृत्व में परिवर्तन आया और यह आशा की जाने लगी कि शीत-युद्ध की उष्णता में ठण्डापन आयेगा। 1952 में हैरी एस ट्रूमैन के स्थान पर आइजहॉवर सत्ता में आये। उधर सोवियत संघ में स्टालिन के स्थान पर उदारवादी एवं युवा नेता खुश्चेव सत्ता में आये। इस युग में शीत युद्ध केवल यूरोप और सुदूर पूर्व तक सीमित नहीं रहा बल्कि पश्चिमी एशिया (मध्य पूर्व) और दक्षिण-पूर्व एशिया भी इसकी परिधि में आ गए। शस्त्रों की होड़ को बढ़ावा दिया गया और सैनिक अड्डों के जाल का विस्तार किया गया।

इस चरण में शीत युद्ध को बनाये रखने वाली प्रमुख घटनायें ये थी-

(1) सोवियत संघ द्वारा आणविक परीक्षण
अगस्त, 1953 ई. में सोवियत संघ द्वारा प्रथम आणविक परीक्षण किया गया। यह बम हिरोशिमा पर डाले गये अणुबम से लगभग 800 गुणा ताकतवर था। इस तरह से हाइड्रोजन बम बनाने की क्षमता को प्राप्त करने से सोवियत संघ ने संयुक्त राज्य अमरीका की बराबरी प्राप्त कर ली, इससे अमरीका सशंकित हुआ ओर निःशस्त्रीकरण को दोनों पक्ष आवश्यक समझने लगे।

(2) हिन्द-चीन का प्रश्न
एक बार जब शीत युद्ध शुरू हो गया तो उसमें कोई कमी आयेगी इसकी परवाह किसी को भी न रही और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति संघर्ष का अखाड़ा बन गई। इसी शीत युद्ध के चलते रहने से हिन्द-चीन का प्रश्न अन्तर्राष्ट्रीय विवाद का विषय बना। जिसमें फ्रांसीसी साम्राज्यवाद के विरूद्ध हिन्द-चीन के संघर्ष में दोनों महाशक्तियों ने अलग-अलग पक्षों का समर्थन किया। अमरीका ने इस संघर्ष में फ्रांस का सहयोग किया तो सोवियत संघ ने हिन्द-चीन के लोगों का समर्थन किया। इस प्रकार हिन्दचीन की समस्या शीत युद्ध का कारण बन गयी।

(3) सीटो का निर्माण
कोरिया का संकट समाप्त होते ही हिन्द-चीन शीत युद्ध का एक नया क्षेत्र बन गया। 1953 में चर्चिल ने संयुक्त राज्य अमेरिका के आगे यह प्रस्ताव रखा था कि दक्षिण-पूर्वी एशिया के लिए नाटो जैसे एक संगठन का निर्माण किया जाय। विरोध करना था इस संधि पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, न्यूजीलैण्ड, पाकिस्तान, थाईलैण्ड और फिलिपीन्स ने हस्ताक्षर किए।

(4) वारसा पैक्ट का निर्माण
14 मई, 1955 को सोवियत संघ और उसके पूर्वी यूरोप के साथी आठ देशों ने वारसा पैक्ट का निर्माण किया। इसके अनुसार यदि किसी सदस्य पर सशस्त्र सैनिक आक्रमण होता है तो अन्य देश उसकी सैनिक सहायता करेंगे। अत: वारसा पैक्ट की स्थापना के साथ ही शीत युद्ध ने संस्थागत रूप ले लिया। यह संगठन 'नाटो' के विरोध में अस्तित्व में आया।

(5) हंगरी की समस्या
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से हंगरी में कट्टरपंथी साम्यवादी नेता रकोसी का शासन था। वह स्टालिन द्वारा नामांकित नेता था। रकोसी का शासन स्टालिन के शासन से भी अधिक कठोर और अत्याचारी था। 23 अक्टूबर, 1956 को हंगरी के लोगों ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह में जनता ने मांग की कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता. लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना, सोवियत सैनिकों को हंगरी से हटाने और हंगरी में बहुदलीय व्यवस्था लागू की जाए। इन माँगों से सोवियत संघ का क्षब्ध होना स्वाभाविक ही था अतः उसने 4 नवम्बर, 1956 को हंगरी के इस जन-विद्रोह को क्रूरतापूर्वक कुचल दिया। सोवियत सेनाओं को हंगरी से वापस बुलाने के एक प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद् में सोवियत संघ ने 'निषेधाधिकार' का प्रयोग करके रद्द कर दिया। इस प्रकार हंगरी संकट में सोवियत संघ ने अपनी मनमानी की, अमरीका की विफलता उजागर हुई और गुटनिरपेक्ष देशों की साहसहीनता प्रकट हुई और महाशक्तियों के बीच शीत युद्ध में अभिवृद्धि हुई।

(6) आइजनहॉवर सिद्धान्त
5 जनवरी, 1957 को अमरीकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर को अमरीकी कांग्रेस ने यह अधिकार दिया कि वह स्वविवेक से अमरीकी सेना को मध्य-पूर्व के किसी भी देश में साम्यवादी आक्रमण को रोकने के लिए भेज सकता है। इससे शीत-बुद्ध में भारी उग्रता आ गयी। 1955 से 1958 तक पश्चिमी एशिया शीतयुद्ध का भयंकर अखाड़ा बन गया। इसने इस प्रदेश में अमरीकी वर्चस्व को बढ़ावा दिया।

शीत युद्ध के विस्तार का तृतीय चरण (1959-1962)
इस चरण में शीतयुद्ध 'पिघलाव' और 'गरम युद्ध' के दो परस्पर विरोधी तत्त्वों में उलझता रहा। इसमें जहाँ शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धान्त को कुछ प्रारम्भिक सफलतायें मिली वहाँ अक्टूबर, 1962 में क्यूबा संकट ने अत्यन्त विस्फोटक स्थिति पैदा कर दी।
इस काल की कतिपय महत्वपूर्ण घटनाएं निम्नलिखित रूप से हैं-

(1) खुश्चेव की अमरीका यात्रा
15 सितम्बर, 1959 को सोवियत प्रधानमंत्री खुश्चेव ने अमरीका की यात्रा की। इस यात्रा से सोवियत संघ और अमरीका के मध्य सौहार्द्र और प्रेम का वातावरण बना। खुश्चेव ने आइजनहॉवर को सोवियत संघ आने का निमन्त्रण दिया। इस सौहार्द को कैम्प डेविड भावना' का नाम दिया गया और कहा गया था कि इस भावना से प्रेरित होकर दोनों देश अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को दूर करने का सम्मिलित प्रयास करेंगे जिससे शीत-युद्ध की बर्फ पिघलेगी और विश्व शान्ति की नींव दृढ़ होगी। दोनों देशों के सम्बन्ध सुधर रहे थे। पर इसी बीच यू-2 घटना से शीत-युद्ध पुनः तीव्र हो गया, तथा इस भावना को भारी ठेस लगी।

(2) यू-2 विमान काण्ड
1 मई, 1960 को अमरीका का जासूसी विमान यू-2 सोवियत संघ सीमा में जासूसी करते हुए पकड़ा गया। इस विमान में जासूसी के अनेक उपकरण और यन्त्र पकड़ गये। यह विमान सोवियत सैनिक प्रदेश पर उड़ते-उड़ते विभिन्न स्थानों के फोटो ले रहा था। रूस ने यू-2 विमान को मार गिराया चालक पॉवर्स को पकड़ लिया तथा इसके चालक ने जासूसी की सब बाते स्वीकार कर लीं। इस घटना को लेकर सुरक्षा परिषद् में अमेरीकन प्रतिनिधि और सोवियत प्रतिनिधि में वाद-विवाद छिड़ गया। बात तब बहुत बढ़ गयी जब राष्ट्रपति आइजनहॉवर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सोवियत संघ में सामरिक गतिविधियाँ बडी गुप्त रहती है। अतः अमरीका ऐसी जासूसी कार्यवाहियाँ करता रहेगा। खुश्चेव ने इस जासूसी उड़ान को अत्यन्त उत्तेजनात्मक कार्य और सोवियत संघ की प्रभुता का घोर अपमान माना। इस प्रकरण ने शीत-युद्ध में तूफान ला दिया।

(3) कैनेडी का राष्ट्रपति निर्वाचित होना
8 नवम्बर, 1960 को अमरीकी राष्ट्रपति पद के निर्वाचन में जॉन कैनेडी विजयी हुए। खुश्चेव ने कैनेडी को बधाई भेजते समय यह आशा व्यक्त की कि उनके निर्वाचन से सोवियत संघ और अमरीका के सम्बन्ध सुधरेंगे और शीत-युद्ध की उग्रता में कमी आयेगी। कैनेडी ने बधाई का उत्तर भेजते हुए लिखा कि उनका मुख्य कार्य 'न्यायपूर्ण और स्थायी शान्ति' की स्थापना के लिए प्रयास करना होगा। कैनेडी की नीतियों एवं दृष्टिकोण से ऐसा आभास होने लगा कि शीत-युद्ध में कमी आयेगी, अमरीका-सोवियत संघ निकट आ सकेंगे। कैनेडी ने अपने पूर्वाधिकारी के विपरीत सोवियत संघ के प्रति सहयोग की नीति अपनाने का नारा बुलन्द किया।

(4) क्यूबा की घटना
क्यूबा अमरीका के निकट एक टापू है, जहाँ 1958 में डॉ. फिडेल कास्त्रों के नेतृत्व में साम्यवादी शासन सत्ता में था। अमरीका के लिए यह चिन्ता का विषय था कि उसकी सीमा पर सोवियत संघ का क्यूबा के माध्यम से प्रभाव बढ़ रहा है। कास्त्रों की सरकार को सोवियत संघ से बड़ी मात्रा में आर्थिक और सैनिक सहायता मिलने लगी। 1962 के आस-पास तो सोवियत संघ ने क्यूबा में नये-नये मिसाइल अड्डे कायम कर दिये । इन अड्डों में रॉकेट प्रक्षेपण-अस्त्र रखे जाने लगे। इससे संयुक्त राज्य अमरीका की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो गया और बहु कहा जाने लगा कि "स्वस्थ अमेरिकी शरीर में क्यूबा एक कोढ़ है।" इसलिए अमरीका इस शिशु साम्यवादी राज्य का दमन करना चाहता था। अत: 22 अक्टूबर 1962 को अमरीका ने क्यूबा की नाकेबंदी की घोषणा की। किन्तु सोवियत संघ के नरम रूख ने विश्वयुद्ध की आशंका को टाल दिया और अपने सैनिक अड्डों को हटा लिया। परिणामस्वरूप क्यूबा के प्रति संयुक्त राज्य अमरीका के दृष्टिकोण में नम्रता आयी। इस प्रकार क्यूबा शीतयुद्ध का चरमोत्कर्ष था।

शीत युद्ध के विस्तार का चतुर्थ चरण (1963-1979)
इस चरण को हम 'तनाव में शिथिलता' या तनाव शैथिल्य या देतान्त का युग कह सकते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि सोवियत संघ के खुश्चेव की शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की धारणा के अनुकूल ही अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन कैनेडी भी तनाव को कम कर एक नई दिशा में बढ़ना चाहते थे। वास्तविकता यह थी कि इस काल में जहां एक ओर शीत युद्ध में शिथिलता आयी वहीं दूसरी ओर महाशक्तियों में प्रतिद्वन्द्विता भी बनी रही।

इस चरण की प्रमुख घटनाएं इस प्रकार हैं-

(1) परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि
25 जुलाई, 1963 ई. को ब्रिटेन सहित दोनों देशों ने मास्को में वायुमण्डल, बाह्य अन्तरिक्ष और समुद्र में अणु परीक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाने वाली एक सन्धि पर हस्ताक्षर किये। 26 जुलाई, 1963 को अमरीकी जनता के नाम अपने एक भाषण में कैनेडी ने इस सन्धि को शीत-युद्ध की समाप्ति की दिशा और युगों से विश्व शान्ति की दिशा में किये जाने वाले प्रयासों के मार्ग में एक ऐतिहासिक सीमा चिह्न बताया। यद्यपि यह सन्धि महाशक्तियों के विवादों का हल नहीं करती थी, फिर भी इसने शीत युद्ध में शिथिलता ला दी। यह दोनों महाशक्तियों के सहयोग और शान्ति की इच्छा का प्रतीक थी। इससे दोनों देश एक दूसरे के समीप आये।

(2) हॉट लाइन समझौता
इस सन्धि के साथ ही वाशिंगटन और क्रेमलिन में टेलीफोन और रेडियो का सीधा सम्पर्क स्थापित करने का समझौता हुआ। इस सम्पर्क का उद्देश्य महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय संकट के समय दोनों महाशक्तियों में सीधा सम्पर्क स्थापित करके भूल अथवा आकस्मिक दुर्घटना से छिड़ने वाले युद्ध के संकट का निवारण करना था। इससे गुटनिरपेक्षता के महत्त्व में कमी आई।

(3) परमाणु अप्रसार सन्धि 1968
12 जून, 1968 को अमरीका सोवियत संघ और ब्रिटेन ने मिलकर अन्य देशों के साथ 'परमाणु अप्रसार सन्धि' पर हस्ताक्षर किये। इस सन्धि का मुख्य उद्देश्य अणु अस्त्रों के प्रसार को रोकना था। इसके अन्तर्गत अणु अस्त्र सम्पन्न देशों ने उन देशों को अणु अस्त्र तथा उनकी तकनीक न देने पर सहमति व्यक्त की जिनके पास यह तकनीक नहीं थी।

(4) मास्को-बोन समझौता 1970
यह समझौता जर्मन संघीय गणराज्य और पूर्व सोवियत संघ के बीच 10 अगस्त, 1970 को हुआ था। इसकी पुष्टि 17 मई, 1970 को की गई। यह समझौता यूरोपीय इतिहास में युग प्रवर्तक रहा है। इसने शीत युद्ध की एक मूल जड़ को समाप्त कर दिया। इस समझौते द्वारा मास्को और बोन ने शक्ति के प्रयोग का त्याग करने और वस्तुस्थिति अर्थात् यूरोप में युद्धोत्तर वास्तविक सीमाओं को स्वीकार करने का आश्वासन दिया। इसने पश्चिमी जर्मनी को जर्मन एकीकरण के प्रयासों को जारी रखने का अधिकार दिया।

(5) बर्लिन समझौता 1971
यह समझौता अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और पूर्व सोवियत संघ के बीच 3 सितम्बर, 1971 को सम्पन्न हुआ। इसने बर्लिन समस्या का समाधान कर दिया और यूरोपीय सुरक्षा सम्मेलन के मार्ग को प्रशस्त कर दिया। इसने पश्चिम बर्लिन को पश्चिम जर्मनी का एक अंग नहीं माना परन्तु इसने पश्चिम जर्मनी एवं पश्चिम बर्लिन के बीच पूर्वी जर्मनी के क्षेत्र से होकर माल व यात्रियों के आने जाने की सुविधा देने का मार्ग प्रशस्त किया। बर्लिन समझौता शान्ति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।

(6) यूरोपीय सुरक्षा सम्मेलन
3 से 6 जुलाई, 1973 तक फिनलैण्ड की राजधानी हेलसिंकी में यूरोपीय सुरक्षा सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में यूरोप के 35 राज्यों के विदेश मन्त्रियों ने भाग लिया। यूरोपीय राज्यों के इस सुरक्षा सम्मेलन का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को समाप्त करके शीत-युद्ध का अन्त करना तथा सुरक्षा की नयी भावना को प्रोत्साहित करना था।

(7) द्वितीय यूरोपीय सुरक्षा सम्मेलन
नवम्बर 1974 का ब्लाडीवास्तोक शिखर सम्मेलन अमरीका और सोवियत संघ द्वारा तनाव कम करने के ही प्रयत्नों का परिणाम था। ब्लाडीवास्तोक में राष्ट्रपति फोर्ड और सोवियत नेता ब्रेझनेव की यह मुलाकाल तथा उसमें सामरिक अस्त्र परिसीमन समझौते की रूपरेखा तैयार करना शीत-युद्ध को समाप्त करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।

(8) तृतीय यूरोपीय सुरक्षा सम्मेलन
तृतीय यूरोपीय सहयोग और सुरक्षा सम्मेलन बेलग्रेड में जून 1977 में हुआ। सम्मेलन में लगभग 50 यूरोपीय देशों ने भाग लिया। सम्मेलन में पूर्व और पश्चिम के बीच सुरक्षा तथा सद्भाव स्थापित करने के लिए यूरोपीय सहयोग को और अधिक दृढ़ बनाने के प्रश्न पर विचार हुआ। यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए भी अनेक सुझाव दिये गये। इस यूरोपीय सुरक्षा सम्मेलन से तनाव शैथिल्य में उल्लेखनीय सहायता मिली।

शीत युद्ध के विस्तार का पंचम चरण (1980-1989)
यह शीत युद्ध का अन्तिम चरण माना जाता है। इस चरण में महाशक्तियों में सहयोग के साथ-साथ प्रतिद्वन्द्विता भी चलती रही। इसे दूसरे शीतयुद्ध के नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो इस नये शीत युद्ध' का प्रारम्भ राष्ट्रपति रीगन के सत्ता में आते ही अमरीकाा को पुनः कार्य पर लगाने, अस्त्र शस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने, मित्र राष्ट्रों का पुन: शस्त्रीकरण करने, शस्त्रों की होड़ को तेज करने और सोवियत संघ के प्रति कठोर नीति अपनाने की घोषणा' से माना जाता है। तथापि इससे पूर्व अनेक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों और समस्याओं पर अमरीका और सोवियत संघ ने पृथक्-पृथक् पक्षों का साथ दिया। उदाहरणार्थ, 1971 में बंगलादेश के स्वाधीनता संघर्ष में अमरीकाा ने पाकिस्तान का साथ दिया तो सोवियत संघ ने भारत का पक्ष लिया। पश्चिमी एशिया के संघर्ष में अमरीकाा ने इजरायल की पीठ थपथपायी तो सोवियत संघ ने अरबों का पक्ष लिया तो पश्चिम और पूर्व में पुनः गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया। 1977 में इथोपियासोमालिया विवाद में सोवियत संघ ने सोमालिया के विरूद्ध इथोपिया को हथियार दिये और अमरीकाा ने सोमालिया की सहायता की। 1979 के अन्त में अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप पर अमरीकाा ने बहुत हल्ला मचाया। राष्ट्रपति कार्टर ने अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप को विश्व शान्ति के लिए एक गम्भीर खतरे की संज्ञा दी। राष्ट्रपति कार्टर के शासनकाल के उत्तरार्द्ध के दिनों में "सोवियत संघ के साथ सम्बन्धों में निरन्तर बिगाड़ के कारण जिस तरह की राजनीतिक स्थिति पैदा हो गयी उससे अमरीकाा और सोवियत संघ में एक प्रकार के शीत-युद्ध का नवीनीकरण हो गया।"

1 सितम्बर, 1983 को दक्षिण कोरिया के यात्री विमान को सोवियत संघ द्वारा मार गिराये जाने की अमरीकाा में सबसे तीखी प्रतिक्रिया हुई, परिणामस्वरूप महाशक्तियों के बीच शीत-युद्ध में तेजी आई। अमेरिका ने इस घटना को अत्यन्त गंभीरता से लिया। इस विमान-काण्ड से शीत युद्ध का एक नाजुक दौर शुरू हो गया। सन् 1986 में अमरीकाी ‘स्टारवार कार्यक्रम' के विरूद्ध सोवियत संघ ने भी जवाबी कार्यवाही आरम्भ कर दी। फरवरी 1987 में सोवियत संघ ने अपने ऊपर लगाये गये प्रतिबन्ध को समाप्त करते हुए परमाणु परीक्षण किया और अमरीकाा को चेतावनी दी कि यदि 1987 में अमरीकाा ने परमाणु परीक्षण किया तो वह भी इसे पुन: शुरू कर देगा। सन् 1988 के प्रारम्भ में राष्ट्रपति रीगन द्वारा कांग्रेस को प्रस्तुत दस्तावेज यह संकेत करते थे कि सोवियत संघ के प्रति अविश्वास अब भी अमरीका की राष्ट्रीय नीति का आधार बना हुआ था।

यद्यपि द्वितीय विश्व युद्ध के समापन से लेकर सोवियत संघ के विखंडन तक के समय को शीतयुद्ध का युग कहा गया है, लेकिन यह एक सतत विशेषता नहीं थी और न ही समस्याएँ समान थी। शीत युद्ध ने विश्व शांति को अनेक चरणों में भंग किया, जो सामयिक रूप से चलती रही है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि पूरे शीत युद्ध के दौरान न समस्याएँ ही समान थी और न ही समय और काल समान था। प्रथम जर्मन संकट एक समस्या थी, फिर कोरिया का युद्ध अफगान संकट सामने आया, स्टार युद्ध एक भयानक कार्यक्रम था जो इस दिशा में संयुक्त राज्य अमरीकाा का निर्णय आदि ने शीत युद्ध की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने एवं उसको गति देने में विशेषरूप से सहायता की थी। इस प्रकार शीत युद्ध का ढाँचा एवं आयाम विभिन्न प्रकार के थे जिनके प्रभाव बहुमुखी थे। सन् 1991 ई. में सोवियत संघ के विघटन के बाद संयुक्तराज्य अमेरिका ही विश्व की एकमात्र महाशक्ति रह गई है। फलतः एकध्रुवीय विश्व में शीतयुद्ध की भीषणता समाप्त हो गई। अब विश्व के राष्ट्रों में आर्थिक स्पर्धा का दौर चल रहा है।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध के प्रभाव

शीत युद्ध के दौरान विश्व मूल रूप से वैचारिक आधारों पर दो गुटों में विभाजित हो गया था। 1917 में रूसी क्रान्ति ने विश्व में एक नयी व्यवस्था को जन्म दिया था। पूँजीवादी एवं साम्राज्यवादी शक्तियों ने सोवियत संघ के नए राज्य और शासन के विरूद्ध अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध घोषित कर दिया। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के तुरन्त बाद शीत युद्ध का जन्म यूरोप तथा विश्व के अन्य भागों में हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य साम्यवाद के प्रसार को रोकना था। साम्यवादी आंदोलन तथा राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष, दोनों ने एक दूसरे को सहयोग करके एशिया, अफ्रीका, लेटिन अमेरिका के देशों में चल रहे पुराने साम्राज्यवादी शासन के विरूद्ध कई क्षेत्रों में मिलकर संघर्ष किया। संयुक्त राज्य अमरीकाा तथा दूसरे साम्राज्यवादी देश सोवियत संघ के विस्तार को रोकने के लिए असमर्थ नजर आ रहे थे। क्योंकि साम्यवादी आन्दोलन को अन्तर्राष्ट्रीय साम्यवादी आन्दोलन समर्थन प्राप्त था इसलिए पाश्चात्य राष्ट्रों के लिए इस उभरते मुक्ति संघर्ष के उफान का दमन करना मुश्किल हो गया था। इसलिए उन्होंने विश्वभर में साम्यवादी राष्ट्रों की घेरेबंदी एवं गठबंधनों को विकसित करना आरम्भ कर दिया था। लेकिन शीत युद्ध के लिए साम्यवाद एकमात्र मुद्दा न था। संघर्षरत राष्ट्रों के राष्ट्रीय हितों ने भी शीत युद्ध को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। चीन तथा सोवियत संघ के टकराव में राष्ट्रीय हितों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। शीतयुद्ध में धर्म भी एक मुद्दा बना था। शिया और सुन्नी के झगड़ों, हिन्दू, मुस्लिम धार्मिक मुद्दों ने क्रमशः ईरान-इराक तथा भारतपाकिस्तान के बीच तनाव पैदा करके शीत युद्ध में वृद्धि की।

इस प्रकार शीत युद्ध ही एक ऐसा बिन्दु था जिसने विश्व राजनीति एवं राष्ट्रों को प्रभावित किया था, एशिया, अफ्रीका, लैटिन अफ्रीका के नव स्वतन्त्र राष्ट्र भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। इसके साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय संगठन व संस्थाओं को भी शीत यूद्ध ने प्रभावित किया और विश्व को दो गुटों में विभक्त कर दिया।

अतः शीत युद्ध के प्रभाव निम्नलिखित प्रकार हैं-

विश्व का दो गुटों में विभाजित होना
शीत युद्ध के कारण विश्व राजनीति का स्वरूप द्विध्रुवीय बन गया। संयुक्त राज्य अमरीकाा और सोवियत संघ दो पृथक्-पृथक गुटों का नेतृत्व करने लग गये। अब विश्व की समस्याओं को इसी गुटबन्दी के आधार पर आंका जाने लगा जिससे अन्तर्राष्ट्रीय समस्याएं उलझनपूर्ण बन गयीं। चाहे कश्मीर समस्या हो अथवा कोरिया समस्या, अफगानिस्तान समस्या हो या अरब-इजरायल संघर्ष, उस पर गुटीय स्वार्थों के परिप्रेक्ष्य में सोचने की प्रवृत्ति बढ़ी। इस द्वि-ध्रुवीय अवधारणा ने विश्व राजनीति में शक्ति-स्पर्धा को जन्म दिया।

भय और सन्देह का वातावरण
शीत युद्ध ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भय' और 'सन्देह' के वातावरण को अनवरत रूप से बनाये रखा। राष्ट्र एक-दूसरे को शंका की दृष्टि से देखते रहे। इसने महाशक्तियों में वास्तविक युद्ध को जन्म नहीं दिया परन्तु 'प्रति युद्ध' तो होते ही रहे। इसने 'युद्ध के वातावरण' को बनाये रखा। नेहरू ने ठीक ही कहा था कि हम लोग 'निलम्बित मृत्यु दण्ड' के वातावरण में रह रहे हैं । शीत युद्ध, गरम युद्ध से भी भयानक युद्ध है क्योंकि यह 'चिन्तन', 'भावनाओं' एवं 'मनोवेगों' पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है जो अन्ततः अपमानजनक, अशिष्ट एवं असभ्य व्यवहार को जन्म देता है। शीत युद्ध ने युद्धकालीन मित्रता को शत्रुता में, सहयोग को असहयोग में, विश्वास को अविश्वास में और मेल-मिलाप को विरोध में परिवर्तित किया।

आणविक युद्ध का भय
शीत युद्ध ने आणविक हथियारों के विकास को चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया था। जिन राष्ट्रों के पास ये हथियार नहीं थे वे राष्ट्र भी इन्हें प्राप्त करने के लिए प्रयासरत होने लगे। वैज्ञानिक अनुसंधान में तीव्रता लाई जाने लगी। एक से बढ़कर एक आणविक हथियारों का निर्माण होने से यह आशंका व्यक्त की जाने लगी कि द्वितीय विश्व युद्ध के बजाए तीसरे विश्व युद्ध में आणविक हथियारों का प्रयोग भरपूर मात्रा में किया जायेगा। आणविक शस्त्रों के निर्माण की होड़ में वृद्धि हुई। आणविक शस्त्रों के परिप्रेक्ष्य में परम्परागत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था की संरचना ही बदल गयी। वर्तमान में अनेक राष्ट्रों के पास आणविक हथियारों का जखीरा है।

सैनिक गठबन्धन
शीत युद्ध ने विश्व में सैनिक सन्धियों एवं सैनिक गठबन्धनों को जन्म दिया। नाटो, सीटो, सेण्टो तथा वारसा पैक्ट जैसे सैनिक गठबन्धनों का प्रादुर्भाव शीत युद्ध का ही परिणाम था। इसके कारण शीत युद्ध में उग्रता आयी, इन्होंने निःशस्त्रीकरण की समस्या को और अधिक जटिल बना दिया एवं शस्त्रीकरण को बढ़ावा दिया।

संयुक्त राष्ट्र संघ को पंगु बनाना
द्वितीय विश्व युद्ध की समाधि के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ को विश्व शक्ति, युद्ध, सहयोग, सुरक्षा की स्थापना के लिए स्थापित किया गया था। शीत युद्ध के कारण इसकी स्थिति, कार्य, शक्तियाँ कम होती गई। सुरक्षा परिषद् में वीटों का प्रयोग निरन्तर होने से यह नाममात्र की संस्था बन कर रह गयी। यहाँ तक कि कई बार तो संघ की स्थिति केवल एक मूकदर्शक से बढ़कर नहीं रही। संयुक्त राष्ट्र का मंच महाशक्तियों की राजनीति का अखाड़ा बन गया और इसे शीत-युद्ध के वातावरण में राजनीतिक प्रचार का साधन बना दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि इसके अस्तित्व को ही संकट उत्पन्न हो गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के लक्ष्यों तथा उद्देश्यों को भारी धक्का लगा।

निःशस्त्रीकरण के मार्ग में बाधा
शीत युद्ध ने शस्त्रीकरण की होड़ को बढ़ावा दिया जिसके कारण विश्व शान्ति और नि:शस्त्रीकरण की योजनाएं धूमिल हो गयीं। संसार के प्रत्येक राष्ट्र ने हथियारों की दौड़ में शामिल होकर समूची अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को ही हथियारों, प्रक्षेपास्त्रों, बमों से लैस कर दिया। सेनाओं को आधुनिकतम हथियार उपलब्ध कराये गये। सभी राष्ट्रों ने सैनिक व्यय में भारी वृद्धि कर दी थी। इसके साथ-साथ दीर्घकाल तक होने वाली अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति शिखर वार्ता, नि: शस्त्रीकरण वार्ता भी राजनीति का शिकार होती रही। इससे शीत युद्ध ने इसके मार्ग में अनेक कठिनाईयाँ खड़ी कर दी थी। आणविक परीक्षणों में निरन्तर वृद्धि होते रहने से विश्व शान्ति खतरे में पड़ गई।

सुरक्षा परिषद् को लकवा लग जाना
शीत युद्ध के कारण सुरक्षा परिषद् को लकवा लग गया। सुरक्षा परिषद् जैसी संस्था, जिसके कन्धों पर अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा स्थापित करने का त्वरित निर्णय लेने का भार था सोवियत संघ और अमरीका के संघर्ष का अखाड़ा बन गयी। इसमें महाशक्तियाँ अपने परस्पर विरोधी स्वार्थों के कारण विभिन्न शान्ति प्रस्तावों को वीटो द्वारा बेहिचक रद्द करती रहती थी, वस्तुतः यहाँ इतना अधिक विरोध और वीटो का प्रयोग दिखायी देता था कि इसे संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थान पर विभक्त और विरोधी दलों में बंटा हुआ राष्ट्र संघ कहना अधिक उपयुक्त है।

तृतीय विश्व युद्ध का खतरा बढ़ना
मानव जाति दूसरे विश्व युद्ध के भयानक परिणामों से उबर भी नहीं पाई थी कि शीत युद्ध के कारण तृतीय विश्व युद्ध के बादल मंडराने प्रारम्भ हुए चारों तरफ आतंक, संघर्ष, क्षेत्रीय युद्ध, प्रतिस्पर्धा, अविश्वास के बादल छाने लगे। एक छोटी से छोटी घटना से तृतीय विश्व युद्ध लड़ने की धमकी दी जाने लगी थी। कोरिया, क्यूबा, वियतनाम, बर्लिन भारत-पाक युद्ध आदि में तृतीय विश्व युद्ध की आशंका व्यक्त की जाने लगी थी।

मानवीय कल्याण के कार्यक्रमों की अपेक्षा
शीतयुद्ध के कारण विश्व राजनीति का केन्द्र बिन्दु सुरक्षा की समस्या तक ही सीमित रह गया और मानव कल्याण से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण कार्यों का स्वरूप गौण हो गया।शीत युद्ध के कारण ही तृतीय विश्व के विकासशील देशों की भुखमरी, बीमारी, बेरोजगारी, अशिक्षा, आर्थिक, पिछड़ापन, राजनीतिक अस्थिरता आदि अनेक महत्त्वपूर्ण समस्याओं का उचित निदान यथासमय सम्भव नहीं हो सका। क्योंकि महाशक्तियों का दृष्टिकोण मुख्यतः 'शक्ति की राजनीति' तक ही सीमित रहा।

सारांश

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि शीत युद्ध ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में जिस भय, अविश्वास, सन्देह. तनाव और शक्ति-स्पर्धा के वातावरण को जन्म दिया उसके कारण विश्व में सीमित मुद्दों की एक लम्बी श्रृंखला का अभ्युदय हुआ। कोरिया, कांगो, हिन्द-चीन, अरब-इजरायल, भारत-पाक, ईरान-इराक युद्ध को इसी श्रृंखला में गिनाया जा सकता है। सन् 1989 में विश्व इतिहास में चमत्कारी मोड़ आया। शीत युद्ध के मूल कारणों की समाप्ति हो गयी। बर्लिन की दीवार का पतन हो गया, जर्मनी का एकीकरण हो गया, वारसा पैक्ट भंग कर दिया गया और दोनों महाशक्तियों के बीच सहयोग के मधुर सम्बन्धों का सूत्रपात हुआ। यह शीत-युद्ध की समाप्ति का ही परिणाम था कि खाड़ी संकट (1989-90) के समय सोवियत संघ और अमरीकाा ने मिलकर सुरक्षा परिषद् प्रस्तावों का समर्थन किया। इस प्रकार उस पुरानी व्यवस्था एवं शासन का, जो द्विध्रुवीय संरचना पर आधारित थी, अंत हो गया। आज 'शीत युद्ध' की भीषणता अतीत की वस्तु बन चुका है।

FAQ :

शीत युद्ध कब शुरू हुआ?
शीत युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुआ।

शीत युद्ध का अन्त कब हुआ?
शीत युद्ध का अंत 1991 में हुआ.

शीत युद्ध का अर्थ क्या है?
शीत युद्ध शब्द का अर्थ यह है कि राष्ट्रों के बीच वास्तविक युद्ध (अर्थात् सैनिक शत्रुता) के बगैर ही शत्रुता की स्थिति का बने रहना है।

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