औद्योगिक क्रांति क्या है? औद्योगिक क्रांति के कारण, परिणाम, प्रभाव, प्रसार | audyogik kranti kya hai

औद्योगिक क्रांति क्या है?

औद्योगिक क्रांति से आशय उन वैज्ञानिक आविष्कारों, तकनीकी अनुसंधानों एवं उनके अनुप्रयोगों से है जिसके फलस्वरूप 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैंड में परंपरागत उद्योगों के स्थान पर नए एवं विशाल उद्योगों की स्थापना की गई जिससे उत्पादन की तीव्र गति एवं बेहतर उत्पाद के फलस्वरूप तत्कालीन औद्योगिक परिवेश में क्रांतिकारी परिवर्तन आए। 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल तक इंग्लैंड में लघु एवं कुटीर उद्योग-धंधों की ही प्रमुखता थी, परंतु नए-नए यांत्रिक अनुसंधानों के फलस्वरूप संगठित एवं विशाल कारखाना पद्धति का विकास हुआ, जिसमें मशीनों द्वारा व्यापक पैमाने पर उत्पादन संभव हो सका। इस बदले परिवेश से पूंजीवादी विचारधारा सामने आई तथा देश के संपूर्ण औद्योगिक जगत पर पूंजीपतियों का निर्णायक नियंत्रण स्थापित हो गया।
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इस तरह कुटीर उद्योगों के स्थान पर कारखाना प्रणाली तथा दस्तकारी के स्थान पर मशीन युग की शुरुआत ही औद्योगिक क्रांति है। इस क्रांति ने वृहद् पैमाने पर पूंजीवाद के विकास को प्रोत्साहन, औद्योगिक श्रमिक-वर्ग के स्तर में बदलाव, जनसंख्या में वृद्धि तथा इसका स्थानांतरण एवं नव साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया, साथ ही नई सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समस्याओं को भी जन्म दिया।

सर्वप्रथम इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति होने के कारण

18वीं शताब्दी में फ्रांसीसी उद्योग-धंधे एवं व्यापार इंग्लैंड की अपेक्षा उन्नत अवस्था में थे। जनसंख्या के मामले में फ्राँस की जनसंख्या इंग्लैंड से लगभग तिगुनी थी।
खनिज संसाधन, मशीनी शक्ति एवं कच्चा माल भी फ्रांस में अपेक्षाकृत अधिक उपलब्ध था, फिर भी औद्योगिक क्रांति इंग्लैंड में ही क्यों हुई? इसके लिये अनेक कारण उत्तरदायी थे, जो इस प्रकार हैं-

सर्वप्रथम इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति होने के कारण
  • इंग्लैंड की भौगोलिक स्थिति
  • कोयला तथा लोहे के उत्पादन में वृद्धि
  • कृषि क्रांति का प्रभाव
  • जनसंख्या में वृद्धि
  • पूंजी की उपलब्धता
  • औपनिवेशिक विस्तार
  • मज़बूत सामुद्रिक शक्ति
  • अनुकूल राजनीतिक वातावरण
  • यांत्रिक आविष्कार
  • परिवहन व्यवस्था का विकास
  • संचार व्यवस्था

इंग्लैंड की भौगोलिक स्थिति
इंग्लैंड की अनुकूल भौगोलिक स्थिति ने औद्योगिक क्रांति के लिये एक मज़बूत आधार प्रदान किया। चारों ओर से समुद्र से घिरे होने के कारण इंग्लैंड के चारों ओर अनेक बंदरगाहों का विकास हुआ। व्यापारिक आवागमन में सुविधा तथा परिवहन की सस्ती एवं अच्छी सुविधाओं जैसे निर्णायक कारकों से आंतरिक एवं बाह्य व्यापार को प्रोत्साहन मिला।
कपड़ों के उत्पादन के लिये उपयुक्त जलवायु, शक्ति साधन के रूप में कोयला, धातु के रूप में लोहा तथा आवागमन हेतु नदियों की उपस्थिति ने औद्योगिक क्रांति हेतु प्रेरक तत्त्व का काम किया।

कोयला तथा लोहे के उत्पादन में वृद्धि
इंग्लैंड में कोयला एवं लोहे के प्रचुर भंडार के बावजूद उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं था जब तक उसके उत्पादन में वृद्धि न हो, जिससे ईंधन के रूप में तथा मशीन निर्माण में इसका यथेष्ट उपयोग हो सके।
इंग्लैंड में 1700 ई. तक कोयला उत्पादन के प्रारंभिक प्रयास आरंभ हो चुके थे किंतु एक बड़ी समस्या यह थी कि अधिक गहराई में कोयला खुदाई के क्रम में पानी निकल आता था, अत: किसी ऐसी युक्ति की आवश्यकता महसूस हो रही थी जिससे इस पानी को खदानों से निकाला जा सके और कोयले का उत्पादन बढ़ाया जा सके। इस संबंध में जेम्स वाट एवं मैथ्यू बोल्टन के प्रयास से वाष्प इंजन का विकास हुआ और इंग्लैंड में कोयला उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
इंग्लैंड में लोहे की कमी नहीं थी, परंतु उसके उपयोग हेतु उसे गलाने की ज़रूरत पड़ती थी। तत्कालीन पद्धति के अनुसार लकड़ी की सहायता से लोहे को गलाकर उपयोग किया जाता था। यह प्रणाली काफी धीमी एवं खर्चीली भी थी।
'डार्बी' द्वारा विकसित लोहे को गलाने की कोयला पद्धति ने काफी हद तक लोहे को गलाने की समस्या का समाधान कर दिया परंतु इस तरीके से गलाए गए लोहे में शुद्धता का अभाव था। अंतत: हेनरी कोर्ट द्वारा कोक कोयले का उपयोग कर कच्चे लोहे की अशुद्धियाँ दूर करने एवं शुद्ध लोहे के उत्पादन में सफलता प्राप्त की गई। इस पद्धति से इंग्लैंड में लौह उद्योग की पर्याप्त प्रगति संभव हो पाई।

कृषि क्रांति का प्रभाव
औद्योगिक क्रांति को बढ़ावा देने में इंग्लैंड में होने वाली तीव्र कृषि क्रांति का भी योगदान कम नहीं था। बढ़ती हुई जनसंख्या हेतु कृषि उत्पादन में वृद्धि समय की मांग थी। अत: इंग्लैंड में नई कृषि विधि जैसे चकबंदी व्यवस्था (बाड़ा आंदोलन) का विकास हुआ। इसके तहत ज़मींदारों के अधीन बड़े-बड़े कृषि फार्म स्थापित हुए। इसका एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि इन ज़मींदारों की कृषिगत आय में होने वाली वृद्धि औद्योगिक क्षेत्र में निवेशित की जाने लगी।
इंग्लैंड में कृषि कार्यों में आधुनिक कृषि यंत्रों के व्यापक प्रयोग से कृषिगत मज़दूरों में बेरोज़गारी की समस्या उत्पन्न हो गई। अतः बेरोज़गार हुए कृषक मज़दूर बड़े-बड़े कारखाना प्रणाली हेतु सस्ते श्रमिक का बेहतर विकल्प साबित हुए और इस रूप में वहाँ औद्योगिक क्रांति को बढ़ावा मिला।

जनसंख्या में वृद्धि
18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैंड की जनसंख्या में होने वाली तीव्र वृद्धि ने भी औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया। जनसंख्या में वृद्धि के फलस्वरूप वस्तुओं की मांग में वृद्धि हुई जिससे उत्पादन में भी वृद्धि हुई। जनसंख्या में वृद्धि ने उद्योगों के लिये श्रम शक्ति का भी कार्य किया, रोजगार के अवसर बढ़े और बाजार का विस्तार हुआ जिसने औद्योगिक क्रांति को प्रोत्साहन दिया।

पूंजी की उपलब्धता
औद्योगिक विकास हेतु पूंजी की पर्याप्त उपलब्धता एक अनिवार्य कारक है। इस समय इंग्लैंड में विदेशों से अधिकाधिक मात्रा में धन का स्थानांतरण हुआ। वस्तुतः दास व्यापार, सामुद्रिक लूटमार, अमेरिका तथा भारतीय लूट से उपार्जित धन का निवेश बड़े-बड़े कारखानों को स्थापित करने में किया गया।
व्यापारिक बैंकों के द्वारा भी औद्योगीकरण को बढ़ावा देने हेतु व्यापक ऋण की मात्रा उपलब्ध कराई गई। गौरतलब है कि विभिन्न देशों के व्यवसायियों द्वारा अर्जित धन का निवेश भूमि खरीदने तथा उसे विकसित करने में किया गया परंतु इंग्लैंड में यह उद्योगों की स्थापना व उसके विस्तार पर ज्यादा केंद्रित था।

औपनिवेशिक विस्तार
विभिन्न यूरोपीय देशों द्वारा व्यापार वृद्धि के क्रम में उपनिवेश स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इंग्लैंड इस मामले में अग्रणी रहा कि विश्व के प्रत्येक कोने में इसके उपनिवेश थे। इन उपनिवेशों में उपलब्ध कच्चे माल का प्रवाह इंग्लैंड की ओर तथा इंग्लैंड स्थित उद्योगों में निर्मित माल का प्रवाह एक बाज़ार के रूप में इन उपनिवेशों में होता था। फलतः औद्योगीकरण को प्रोत्साहन मिला।

मज़बूत सामुद्रिक शक्ति
सामुद्रिक शक्ति की दृष्टि से इंग्लैंड एक अग्रणी यूरोपीय देश का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा था। युद्ध की स्थिति में भी इंग्लैंड अपनी सुदृढ़ एवं विशाल जलसेना के आधार पर अपने व्यापार को प्रभावी रूप से संचालित करने में सक्षम रहा। अन्य देशों के पास तुलनात्मक रूप से मजबूत सामुद्रिक शक्ति नहीं थी। यही वह निर्णायक कारक था जिसके बल पर इंग्लैंड एक विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित करने में सफल रहा।

अनुकूल राजनीतिक वातावरण
1688 ई. की गौरवपूर्ण क्रांति के पश्चात् ब्रिटेन में संसदीय प्रजातंत्र मज़बूती के साथ स्थापित हुआ था तथा जनता को उन्मुक्त वातावरण एवं अधिकार प्राप्त थे। राजनीतिक उथल-पुथल के स्थान पर यहाँ राजनीतिक स्थायित्व था, जिसने व्यापारिक गतिविधियों को गति प्रदान की, जबकि इस समय यूरोप के अन्य देशों में निरंकुश सामंती व्यवस्था कायम थी और राजनीतिक हलचल व्याप्त थी।

यांत्रिक आविष्कार
इस समय इंग्लैंड के विभिन्न क्षेत्रों में हुई वैज्ञानिक प्रगति एवं यांत्रिक आविष्कार ने औद्योगिक क्रांति को नई दिशा प्रदान की तथा उसे विश्वव्यापी स्वरूप प्रदान किया।
जॉन के (John Kay) नामक प्रसिद्ध अंग्रेज़ ने 1733 ई. में कपड़ा बुनने के लिये 'फ्लाइंग शटल' नामक मशीन का आविष्कार किया, जिसकी सहायता से कम समय में अधिकाधिक कपड़ों की बुनाई संभव हो पाई। इस आविष्कार के फलस्वरूप काते गए सूत की मांग में तीव्रगामी वृद्धि हुई जिससे इस क्षेत्र में नए आविष्कार की आवश्यकता महसूस की गई।
जेम्स हारग्रीव्स द्वारा 'स्पिनिंग जेनी' नामक मशीन के आविष्कार की सहायता से आठ गुना अधिक सूत उतने ही परिश्रम से काटा जा सकता था, जितना कि अभी तक प्रचलित पद्धति से काटा जाता था।
रिचर्ड आर्कराइट द्वारा 'वाटरफ्रेम' नामक मशीन की सहायता से सूत कातने की और भी उन्नत तकनीक विकसित की गई।
इस मशीन को चलाने हेतु जल ऊर्जा का उपयोग किया जाता था। इस दिशा में सेमुएल क्रॉम्पटन द्वारा आविष्कृत 'स्पिनिंग म्यूल' एवं एडवर्ड कार्टराइट द्वारा आविष्कृत 'पावरलूम' नामक मशीन की सहायता से वस्त्र उद्योग में सूत की कताई एवं बुनाई के कार्यों में क्रांतिकारी परिवर्तन आया और इस परिवर्तन ने इंग्लैंड में औद्योगीकरण को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया।
सूती वस्त्र उद्योग की व्यापक उन्नति के परिणामस्वरूप उसकी रंगाई की आवश्यकता को ध्यान में रखकर विभिन्न रसायन उद्योग विकसित हुए। इस संबंध में शीले द्वारा एक महत्त्वपूर्ण रसायन 'क्लोरीन' की खोज हुई जिसके माध्यम से कम समय में ही सूत की रंगाई का काम संभव हो पाया।
जेम्स वाट द्वारा 'भाप इंजन' का आविष्कार किया गया जो कि एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इसके माध्यम से उद्योगों हेतु कम खर्चे पर ही सुरक्षित ईंधन की पूर्ति संभव हो सकी। इस आविष्कार ने औद्योगिक क्षेत्र में क्रांति उत्पन्न कर दी।

परिवहन व्यवस्था का विकास
कच्चे माल को औद्योगिक स्थलों पर पहुँचाना एवं उत्पादित माल को बाजार तक पहुँचाना परंपरागत परिवहन व्यवस्था से संभव नहीं हो पा रहा था। अतः परिवहन के वैसे नवीन साधन, जो तीव्रगामी एवं सुदृढ़ हों, की आवश्यकता महसूस की गई। इन्हीं आवश्यकताओं के तहत कंकड़-पत्थर एवं तारकोल के मिश्रण से सड़क निर्माण की नवीन विधियों का आविष्कार हुआ।
सड़क मार्ग के साथ-साथ आंतरिक व्यापार को बढ़ावा देने हेतु नहरों की विशाल श्रृंखला का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ तथा इंग्लैंड के लंदन, मैनचेस्टर आदि औद्योगिक नगर इन नहरों द्वारा एक-दूसरे से जुड़ गए।
परिवहन साधनों के रूप में वाष्प-चालित इंजन का विशिष्ट महत्त्व रहा। इसके उपयोग से स्टीमर्स एवं जहाजों की गति में तीव्रता आई। भाप-इंजनों द्वारा लोहे की पटरियों पर रेलगाड़ियों का सफल संचालन भी सराहनीय रहा। इन सभी यांत्रिक आविष्कारों से परिवहन क्षेत्र में क्रांति आई, जिसने औद्योगीकरण को प्रोत्साहन दिया।

संचार व्यवस्था
औद्योगीकरण को पर्याप्त प्रोत्साहन देने में अत्याधुनिक संचार माध्यम संबंधी आविष्कार भी विशेष महत्त्व रखते हैं। टेलीफोन एवं टेलीग्राफ के आविष्कार ने संचार क्षेत्र में क्रांति ला दी। इस दिशा में इंग्लैंड एवं फ्रांस के समुद्र तटों के मध्य टेलीग्राफ के तार सफलतापूर्वक बिछाए गए तथा अटलांटिक महासागर में टेलीग्राफ लाइन बिछाकर संसार के लगभग सभी देशों के बीच संपर्क सूत्र कायम किया गया।
तत्कालीन संदर्भ में अगर हम देखें तो उस समय किसी अन्य यूरोपीय देश में ये सभी सुविधाएँ प्राप्त नहीं थीं, जैसे कुछ देशों में पूंजी पर्याप्त न थी, कहीं प्राकृतिक संसाधन नहीं थे तो कहीं राजनीतिक/प्रशासनिक पद्धति अनुकूल नहीं थी। चूँकि इंग्लैंड में 1688 की 'गौरवपूर्ण क्रांति' के पश्चात् सुव्यवस्थित राजनीतिक/प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी, अत: इसका लाभ इंग्लैंड को मिला। अन्य यूरोपीय देशों में इस समय भूमि पर आधारित अर्थव्यवस्था थी, जहाँ राजनीतिक शासन पद्धति पिछड़ी हुई थी तथा जर्मनी एवं इटली जैसे देश तो संगठित भी नहीं थे।
अतः हम कह सकते हैं कि इन विभिन्न कारणों ने विभिन्न यूरोपीय देशों के बीच इंग्लैंड को विशिष्ट स्थिति में ला खड़ा किया और इस रूप में इंग्लैंड औद्योगिक क्रांति का अगुवा बना। औद्योगिक क्रांति के संबंध में इंग्लैंड अन्य देशों का पथ-प्रदर्शक भी बना क्योंकि इंग्लैंड में यह परिवर्तन किसी दूसरे देश की सहायता के बिना हुआ। इसी आधार पर इंग्लैंड को 'विश्व की उद्योगशाला' कहा गया है।

औद्योगिक क्रांति के परिणाम/प्रभाव

औद्योगिक क्रांति विश्व इतिहास की अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। इस क्रांति ने परंपरागत उत्पादन पद्धति को गंभीर रूप से प्रभावित किया। जहाँ पहले उत्पादन पद्धति मानव श्रम पर निर्भर थी वहीं इस क्रांति के फलस्वरूप मानवीय श्रम के स्थान पर मुख्यतः मशीन प्रणाली का विकास हुआ। इस युक्ति के कारण उत्पादन के स्तर में मात्रात्मक एवं गुणात्मक वृद्धि संभव हो सकी। कच्चे माल की प्राप्ति एवं बाजार की आवश्यकता ने विभिन्न यूरोपीय देशों को औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के लिये प्रेरित किया। परंपरागत रूप से यूरोप का तत्कालीन सामाजिक ढाँचा जिसमें सामंत वर्ग मुख्यतः सामाजिक प्रतिष्ठा एवं आर्थिक समृद्धि के उच्च सोपान पर था, की जगह नवीन पूंजीपति वर्ग ने ले ली। इस पूंजीपति वर्ग में पूंजी का अधिकाधिक संकेंद्रण होने तथा उस पूंजी का औद्योगिक इकाइयों में निवेश होने से एक नवीन व्यवस्था ने जन्म लिया जिससे श्रमिकों का शोषण होने लगा। श्रमिकों ने शोषण से मुक्ति के लिये अनेक कदम उठाए जो श्रमिक आंदोलनों के रूप में प्रकट हुए।
औद्योगिक क्रांति ने मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं- सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि क्षेत्रों को गंभीर रूप से प्रभावित किया, जिसे हम निम्नलिखित बिंदुओं में प्रस्तुत कर सकते हैं-

औद्योगिक क्रांति के परिणाम/प्रभाव
  • कारखाना पद्धति का उद्भव और विकास
  • शहरीकरण
  • सामाजिक संरचना में परिवर्तन 
  • साम्राज्यवाद का उदय
  • पूंजीवाद का विकास
  • श्रमिक समस्या का उदय
  • समाजवादी विचारधारा
  • नवीन राजनीतिक विचारधाराओं का उदय

कारखाना पद्धति का उद्भव और विकास
औद्योगिक क्रांति से पूर्व वस्तुओं का उत्पादन कुटीर उद्योगों के अंतर्गत होता था जिसमें कारीगरों द्वारा अपने घरों में ही अल्प पूंजी से विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन किया जाता था अर्थात् हस्तकारी विद्या का प्रचलन था। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप परंपरागत हस्तकारी प्रणाली को तीव्र आघात पहुँचा।
औद्योगिक क्रांति के पश्चात् हस्तकारी के स्थान पर मशीनों एवं विभिन्न उन्नत यंत्रों की बाढ़ सी आ गई। अब इन मशीनों एवं यंत्रों को चलाने हेतु अधिक स्थान की आवश्यकता महसूस होने लगी, क्योंकि घरों में इसका उपयोग संभव नहीं था, अतः विस्तृत उत्पादन स्थल के रूप में कारखाना पद्धति का विकास हुआ।
भौगोलिक खोजों, व्यापारिक लाभों, वैज्ञानिक अनुसंधानों तथा यांत्रिक उपलब्धियों आदि के फलस्वरूप एक नवीन औद्योगिक परिदृश्य सामने आया। परिणामतः वस्तुओं के उत्पादन की युक्ति सस्ती, मात्रात्मक एवं गुणात्मक वृद्धि के साथ सामने आई।
बदली हुई स्थिति में परंपरागत, स्वतंत्र एवं छोटे स्तर के कारीगर इस नई उत्पादन प्रणाली का सामना करने में असमर्थ हो गए और इनका परंपरागत धंधा ठप हो गया। इस स्थिति में उनमें बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो गई तथा अब वे इन कारखानों में वेतनभोगी श्रमिक के रूप में कार्य करने हेतु मजबूर हो गए और इस रूप में इनका स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया।

शहरीकरण
औद्योगीकरण की प्रक्रिया में उत्पादन केंद्र के रूप में लोहा एवं कोयला क्षेत्रों, व्यापारिक केंद्रों तथा बंदरगाहों के समीप शहरों की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हुई। ग्रामीण स्तर पर कुटीर उद्योगों के पतन के फलस्वरूप जनसंख्या का स्थानांतरण इन केंद्रों में होने लगा क्योंकि यहाँ रोज़गार के अवसर मौजूद थे। जनसंख्या का आव्रजन इन शहरी स्थानों की तरफ होने से यहाँ जनसंख्या में वृद्धि होने लगी। इस प्रक्रिया से देश के विभिन्न भागों में जनसंख्या घनत्व में भी व्यापक परिवर्तन आने लगा। जो क्षेत्र अभी तक उपयोग में नहीं आ सके थे उनका महत्त्व बढ़ गया।
औद्योगिक क्रांति से पूर्व इंग्लैंड के दक्षिण-पूर्वी भाग में कृषि की प्रधानता थी और वहाँ जनसंख्या का जमाव भी अधिक था जबकि इसके उत्तर-पश्चिमी भाग की जनसंख्या अपेक्षाकृत कम थी, परंतु इन क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना ने सभी समीकरण को बदल दिया। इस भाग में बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना से जनसंख्या में भारी बढ़ोतरी हुई।
इन शहरों का विकास किसी निश्चित योजना के आधार पर नहीं हुआ, फलतः अनेक शहरी एवं स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी उत्पन्न हुई। तत्कालीन शहरी व्यवस्था ने मानव जीवन शैली, रहन-सहन, खान-पान आदि पहलुओं को प्रभावित किया। औद्योगिक केंद्रों के आस-पास कच्ची बस्तियों के विस्तार से वहाँ अत्यधिक गंदगी के कारण महामारी का प्रकोप बढ़ने लगा और इस तरह मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

सामाजिक संरचना में परिवर्तन
औद्योगिक क्रांति से पूर्व यूरोपीय समाज मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित था- कुलीन, पादरी एवं सर्वसाधारण। राजा एवं राजपरिवार के अन्य सदस्यों के बाद क्रमश: कुलीन एवं पादरी वर्ग का समाज में सर्वोच्च स्थान था। भूमि एवं प्रशासन के क्षेत्र में इनका लगभग एकाधिकार था जबकि सर्वसाधारण की स्थिति अत्यंत ही दयनीय थी और दोनों वर्गों द्वारा इनका विभिन्न तरीके से शोषण किया जाता था।
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप समाज की इस वर्ग संरचना में व्यापक परिवर्तन आया। गौरतलब है कि औद्योगिक क्रांति से पूर्व अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था परंतु अब अर्थव्यवस्था के रूप में कृषि का महत्त्व गौण होता गया एवं उसकी जगह उद्योगों का अस्तित्व कायम हुआ।
औद्योगीकरण से पूंजीपति, उद्योगपति एवं मिल-मालिक के रूप में नए वर्ग उभरकर सामने आए। इन वर्गों को पूंजीवादी वर्ग (व्यापारी और पूंजीपति), मध्यम वर्ग (कारखानों के निरीक्षक, दलाल, ठेकेदार, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील आदि) तथा श्रमिक वर्ग में विभक्त किया जा सकता है। इन विभिन्न वर्गों के उदय से सामाजिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गई।
नए पूंजीपति वर्ग ने न सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में महत्ता स्थापित की वरन् राजनीतिक क्षेत्र में भी उच्च स्तर को प्राप्त किया। मध्यम वर्ग अत्यंत ही महत्त्वाकांक्षी था जिसकी गतिविधियाँ बहुआयामी थीं तथा अपने हितों की रक्षा हेतु वह श्रमिकों के साथ उच्च वर्ग को भी युक्तियुक्त नियंत्रण में रखने का प्रयास करता था। श्रमिक वर्ग के पास धन का नितांत अभाव था तथा पूंजीपतियों द्वारा इस वर्ग का शोषण विभिन्न ढंग से किया जाता था।
औद्योगिक क्रांति ने तत्कालीन समाज के ताने-बाने पर आधारित सामाजिक संबंधों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया। उदाहरण के लिये संयुक्त परिवार की प्रथा टूटने लगी, मानव-मानव के बीच संबंध का स्थान अब मानव-मशीन ने ले लिया, लोगों के नैतिक स्तर में व्यापक गिरावट आई आदि।

साम्राज्यवाद का उदय
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप विभिन्न देशों में साम्राज्यवादी प्रवृत्ति विकसित हुई, ताकि उद्योगों के लिये कच्चे माल की आपूर्ति का स्रोत, उत्पादित वस्तुओं की बिक्री हेतु बाज़ार तथा औद्योगीकरण के फलस्वरूप तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या को अन्यत्र बसाने की आवश्यकता पूरी हो सके। चूँकि इन आवश्यकताओं की पूर्ति साम्राज्यवाद के माध्यम से ही संभव थी, अतः विभिन्न यूरोपीय देशों द्वारा इस यक्ति का अवलंबन किया गया।
विभिन्न यूरोपीय देशों द्वारा अमेरिका, अफ्रीका तथा एशिया महादेशों में अनेक ऐसे क्षेत्रों की खोज की गई जहाँ इन उद्योगों हेतु कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में था, साथ ही ये क्षेत्र इन उद्योगों से उत्पादित माल हेतु एक उपयुक्त बाजार भी हो सकते थे। इस दिशा में यातायात एवं संचार के नवीन साधनों ने साम्राज्यवाद को तीव्र गति प्रदान की और इन क्षेत्रों पर विभिन्न यूरोपीय देशों का अधिकार होने लगा।
साम्राज्यवाद की आड़ में विभिन्न यूरोपीय देशों के मध्य परस्पर प्रतियोगिता बढ़ने लगी जिसकी चरम परिणति साम्राज्यवादी देशों के मध्य अनेक युद्धों के रूप में देखने को मिली। प्रारंभ में इंग्लैंड, फ्राँस, बेल्जियम और हॉलैंड जैसे यूरोपीय देशों ने विश्व के विभिन्न भागों में अपने उपनिवेश स्थापित कर लिये थे।
इटली व जर्मनी के एकीकरण एवं जापान के एक महान शक्ति के रूप में उदय के पश्चात् इन देशों के द्वारा भी इस दिशा में प्रयास किये गए। इस प्रकार औपनिवेशिक क्षेत्र में इन विभिन्न देशों की महत्त्वाकांक्षाओं एवं प्रतियोगी भावनाओं ने परस्पर घृणा एवं वैमनस्य को बढ़ावा दिया।

पूंजीवाद का विकास
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप पूंजीवाद के विकास से एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। इस क्रांति से पूर्व यूरोप में पूंजी का निवेश सामान्यतः भूमि में ही किया जाता था, परंतु पुनर्जागरण काल में हुई भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आई विभिन्न व्यापारिक कंपनियों द्वारा बैंकों की स्थापना की गई। ये बैंक व्यक्तिगत पूंजी की सुरक्षा हेतु एक मानक स्थान थे जहाँ पूंजी जमा करने के एवज में अतिरिक्त धन की प्राप्ति होती थी। ये व्यापारिक बैंक इस पूंजी का निवेश अपने व्यापार को और अधिक विस्तार देने में भी करते थे।
यह व्यापारिक पूंजीवाद का आरंभिक चरण था। 17वीं एवं 18वीं शताब्दी के बीच व्यापारिक पूंजीवाद का तीव्र विकास हुआ परंतु 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध एवं 19वीं शताब्दी में पूंजीवाद का स्वरूप औद्योगिक पूंजीवाद' का हो गया।
औद्योगीकरण हेतु अधिक पूंजी की आवश्यकता स्वाभाविक थी क्योंकि नई मशीनों के मूल्य बहुत ही अधिक थे। इसके अतिरिक्त मजदूरों को दी जाने वाली मजदूरी के भुगतान के लिये भी धनराशि की ज़रूरत थी। अभी तक कृषि, व्यापार एवं
वाणिज्य के क्षेत्र में जो पूंजी निवेश होता था वह किसी व्यापक स्तर पर नहीं होकर लगभग सीमित स्तर पर ही होता था।
औद्योगिक क्रांति ने उद्योगों की स्थापना, संचालन एवं उसकी प्रगति हेतु वृहद् पूंजी की आवश्यकता को जन्म दिया। इस आवश्यकता की पूर्ति पूंजीपति एवं उद्योगपति द्वारा अकेले कर पाना मुश्किल था। फलतः विभिन्न आकर्षक ब्याज, बॉण्ड एवं प्रमाण-पत्र जारी कर समाज के विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों से उनकी बचत को पूंजी के रूप में इस्तेमाल कर औद्योगिक विकास को निश्चित गति दी गई।
विभिन्न यूरोपीय देशों द्वारा पूंजी की आवश्यकता की पूर्ति हेतु उपनिवेशवादी/साम्राज्यवादी नीति को अपनाना पड़ा ताकि विभिन्न उपनिवेशों से पूंजी का एक निश्चित प्रवाह हो सके। इसलिये तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में पूंजीवाद एवं साम्राज्यवाद को जुड़वाँ भाई भी कहा गया है।

श्रमिक समस्या का उदय
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप श्रमिकों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ा। जहाँ एक ओर औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप वस्तुओं के उत्पादन में मात्रात्मक एवं गुणात्मक वृद्धि हुई, यातायात एवं संचार साधनों के नए आविष्कार से विश्व के विभिन्न देशों की दूरियाँ कम हुईं तथा इस रूप में भूमंडलीकरण को बढ़ावा मिला, सभी देशों की राष्ट्रीय संपत्ति में होने वाली वृद्धि के फलस्वरूप आर्थिक रूप से संपन्नता के युग का पदार्पण हुआ, वहीं श्रमिक वर्ग औद्योगिक क्रांति के इन लाभों से काफी हद तक वंचित रहा।
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप उद्योगपतियों द्वारा संसाधन के उपलब्ध साधनों को हस्तगत कर लिया गया तथा श्रमिक अब इन उद्योगपतियों की दया पर आश्रित हो गए क्योंकि इस वर्ग के समक्ष परंपरागत व्यवसाय के समाप्त हो जाने के बाद यही एकमात्र विकल्प शेष रह गया था कि वह कारखानों में वेतनभोगी श्रमिक के रूप में कार्य करे।
श्रमिकों की कम मज़दूरी तथा कार्य के अधिक घंटों से संबंधित शर्ते अत्यंत ही अमानवीय थीं तथा श्रमिकों को यंत्र समझकर उनसे अधिकाधिक कार्य लिया जाता था। 1800 ई. में ब्रिटिश संसद द्वारा श्रमिक संघ विरोधी कानून के नवीनीकरण ने श्रमिक हितों की पूर्ण अनदेखी की।
श्रमिकों की एक अन्य समस्या जो और भी गंभीर थी, वह थी- बेरोज़गारी की समस्या। श्रमिकों को पूरे वर्ष कारखानों में रोज़गार के पूर्ण अवसर नहीं मिल पाते थे। फलतः इन श्रमिकों के सामाजिक पतन की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। बच्चों एवं महिलाओं को कारखानों में नियोजित करने से शारीरिक एवं मानसिक विकार के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी उत्पन्न हो गईं।
श्रमिकों की तीसरी गंभीर समस्या आवास संबंधी थी चूँकि बाहर के क्षेत्रों से कारखानों में काम करने हेतु श्रमिकों का व्यापक आव्रजन हुआ था। ये श्रमिक इन कारखानों के समीपवर्ती क्षेत्रों में ही बस गए थे। यहाँ स्थापित विभिन्न बस्तियों की स्थिति अत्यंत ही दयनीय थी। ये बस्तियाँ किसी योजना के आधार पर नहीं बसी थीं वरन् अव्यवस्थित रूप से अबाध गति से बसती गईं। इनमें सूर्य की रोशनी, स्वच्छ हवा व शुद्ध पेयजल का अभाव था। सँकरी सड़कें एवं गलियाँ तथा सघन मकानों की स्थिति के कारण यहाँ गंदगी एवं संक्रामक रोगों का बोलबाला था। इस नारकीय स्थिति में श्रमिकों की अकाल मृत्यु आम बात हो गई थी।
श्रमिकों के साथ एक बड़ी समस्या यह थी कि ये सभी श्रमिक भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से काम की तलाश में इन औद्योगिक शहरों में आकर बसे थे, जिनमें आपस में कोई परिचय नहीं था। अशिक्षित तथा ग्रामीण पृष्ठभूमि से संबंधित होने के कारण वे इन पूंजीपतियों के विरुद्ध साहसपूर्ण कदम उठाने की स्थिति में नहीं थे। वे अपने हितों के संरक्षण हेतु संगठन नहीं बना सकते थे क्योंकि इस पर प्रतिबंध था। अपनी समस्याओं के समाधान हेतु उनके पास कोई रास्ता नहीं था। आमतौर पर हम कह सकते हैं कि औद्योगिक क्रांति का लाभ मुख्यतः पूंजीपति वर्ग को ही मिला तथा श्रमिक वर्गों की स्थिति और भी दयनीय हो गई।

समाजवादी विचारधारा
उत्पादन प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण अंग होने के बावजूद श्रमिक वर्ग औद्योगिक क्रांति के लाभों से वंचित था और उसकी स्थिति और भी गंभीर होती जा रही थी। वहीं पूंजीपति वर्ग अधिकतम लाभ की स्थिति में था। इस तरह एक वर्ग अपनी पूंजी के निवेश के बल पर लाभ का मुख्यतः अधिकतम भाग प्राप्त कर रहा था वहीं श्रमिक वर्ग अत्यंत ही कम मज़दूरी पर श्रम कर वस्तुओं का उत्पादन करता था और उसे लाभ की स्थिति से भी वंचित किया जाता था। फलतः विरोधाभासी स्थिति को बढ़ावा मिला।
कुछ विचारकों द्वारा श्रमिकों की दयनीय दशा में सुधार करने हेतु नई विचारधारा का प्रतिपादन किया गया, जिसे 'समाजवादी विचारधारा' का नाम दिया गया। यह विचारधारा इस बात का समर्थन करती थी कि उत्पादन के साधनों पर किसी एक वर्ग का अधिकार न होकर पूरे समाज का अधिकार होना चाहिये। इन विचारकों में रॉबर्ट ओवेन, सेंट साइमन एवं लुई ब्लाँ के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में एक नवीन विचारधारा का प्रतिपादन किया।
इन विचारकों द्वारा विभिन्न यूरोपीय देशों में प्रचलित आर्थिक व्यवस्था की तीव्र आलोचना की गई और उद्योगों के संगठन तथा पूंजीपति-श्रमिक संबंधों के विषय में नवीन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया।
कार्ल मार्क्स एवं एंजेल्स ने 1848 ई. में कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र जारी कर वैज्ञानिक समाजवाद की नींव डाली। इनके द्वारा औद्योगिक श्रमिकों को 'सर्वहारा' की संज्ञा दी गई, जिनका समस्त जीवन बेड़ियों से बँधा रहता है और जिनके पास खोने के लिये कुछ नहीं लेकिन पाने के लिये समस्त संसार होता है। इसी प्रसंग में कार्ल मार्क्स द्वारा दुनिया के सभी औद्योगिक श्रमिकों से एकजुट होने की अपील की गई थी।

नवीन राजनीतिक विचारधाराओं का उदय
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप कुछ नवीन राजनीतिक विचारधाराओं का जन्म एवं विकास हुआ। इसमें 'लैसेज़ फेयर' अथवा आर्थिक उन्मुक्तवाद एक प्रमुख विचारधारा थी। इस सिद्धांत के अनुसार आर्थिक क्रिया-कलापों में पूंजीपतियों की पूर्ण स्वतंत्रता एवं सरकार के किसी तरह से हस्तक्षेप पर निर्बधन था।
1776 ई. में एडम स्मिथ की युगांतरकारी पुस्तक 'वेल्थ ऑफ नेशंस' प्रकाशित हुई, जिसमें वाणिज्यवाद की नियामक एवं एकाधिकारपरक अवधारणाओं की तीव्र आलोचना की गई थी क्योंकि यह तत्कालीन आर्थिक माहौल के लिये अप्रासंगिक होती जा रही थी। इस तरह की स्थिति में आर्थिक क्षेत्र में सरकार की भूमिका यथासंभव कम-से-कम होने की बात तय की गई। सरकार की भूमिका को जान-माल की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, न्यायालय आदि क्षेत्रों तक ही सीमित रखने की वकालत की गई। सिर्फ व्यवसाय ही नहीं, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि मामलों में भी शासनतंत्र के हस्तक्षेप करने की ज़रूरत से इनकार करने की बात निश्चित की जाने लगी। नवोदित पूंजीपति वर्ग में यह आर्थिक दर्शन काफी लोकप्रिय हुआ।
अंततः हम कह सकते हैं कि औद्योगिक क्रांति न सिर्फ वस्तुओं के उत्पादन में मात्रात्मक एवं गुणात्मक वृद्धि से संबंधित थी वरन इसने मानव जीवन के समस्त पहलुओं को प्रभावित किया। इससे प्रभावित होकर साम्राज्यवाद, पूंजीवाद एवं समाजवाद जैसी विचारधारा ने भी ज़ोर पकड़ा।

औद्योगिक क्रांति का प्रसार

अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से उन्नीसवीं सदी के आरंभिक तीन दशकों तक औद्योगिक क्रांति मुख्यतः इंग्लैंड में ही संकेंद्रित रही, साथ ही कुछ उद्योग विशेष तक ही सीमित रही। इसके परवर्ती काल में क्रांति का प्रसार इंग्लैंड के अतिरिक्त अन्य राष्ट्रों में भी हुआ, साथ ही सभी प्रकार के उद्योगों, जैसे- दस्तकारी व अन्य कुटीर उद्योगों पर भी इसका प्रभाव समान रूप से पड़ा।

अमेरिका में औद्योगीकरण

19वीं सदी के आरंभ में अमेरिका का सकल राष्ट्रीय उत्पादन न केवल अन्य यूरोपीय राष्ट्रों की तुलना में गौण था बल्कि वह उत्पादन के तौर-तरीकों में भी इन राष्ट्रों की तुलना में अत्यंत पिछड़ा था। अगली एक सदी अमेरिका के उत्कर्ष की ही कहानी रही जिसमें 20वीं सदी के आगमन तक वह सकल राष्ट्रीय उत्पादन में अन्य सभी देशों से आगे निकल गया। इसी आर्थिक संपन्नता ने उसे प्रथम विश्वयुद्ध में प्रमुख शक्ति बनकर उभरने में योगदान दिया।
अमेरिका में औद्योगीकरण की शुरुआत को कृषि उन्नति का समर्थन प्राप्त था। अमेरिकी कपास की वैश्विक मांग ने कृषि आधुनिकीकरण और वाणिज्यीकरण को प्रेरित किया। कृषि में क्रांतिकारी परिवर्तनों- भूमि के दुरुपयोग को रोकना, पशु नस्ल सुधार, उर्वरकों का उपयोग और यंत्रीकरण ने अमेरिका को कृषि की दृष्टि से उन्नत राष्ट्र बना दिया। कृषि के साथ सहवर्ती गतिविधियों, जैसे- खाद्य परिरक्षण, माँस उत्पादन को अत्यधिक महत्त्व दिया गया जिससे घरेलू और वैश्विक बाज़ार में अमेरिका प्रतिष्ठित आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा।
विशाल भौगोलिक आकार के कारण अमेरिका को औद्योगिक प्रसार करने के लिये परिवहन के साधनों का विकास प्रथम आवश्यकता थी। उत्पादन केंद्रों को कच्चे माल के स्रोतों व बाजार से जोड़ने के लिये सर्वप्रथम सड़क परिवहन फिर रेल विकास और अंत में जल परिवहन विकास को प्राथमिकता दी गई। किंतु रेल विकास उद्योगों के प्रसार का प्रमुख कारक बना।
लौह व इस्पात उद्योग का संकेंद्रण दक्षिण पेंसिलवेनिया के क्षेत्र में हुआ क्योंकि वहाँ लोहा व कोक दोनों पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थे। लौह उद्योग ने शस्त्रों मशीनों व घड़ियों से जुड़े उद्योग को गति प्रदान की। किंतु इस समय तक अमेरिका लोहा गलाने की पुरानी तकनीक (लकड़ी के कोयले से) का ही उपयोग कर रहा था, जो कि अन्य यूरोपीय राष्ट्रों की तुलना में तकनीकी पिछड़ेपन का संकेत था।
अमेरिकी औद्योगीकरण को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समर्थन वहाँ के उन्नत वित्तीय बाज़ार से प्राप्त हुआ। साझेदारी युक्त कंपनियों, निगमों, शेयर बाजार, बैंकिंग के विकास से अमेरिका में पर्याप्त पूंजी निर्माण किया जा रहा था जिसने बड़े उद्योगों तथा परियोजनाओं का मार्ग प्रशस्त किया।

जर्मनी में औद्योगीकरण

1815 की वियना व्यवस्था के अनुसार जर्मनी राजनीतिक रूप से 38 रियासतों का ढीला-ढाला संघ था, फिर भी आर्थिक विकास हेतु यहाँ पर जोलेवरीन संघ की स्थापना की गई। जोलेवरीन संघ ने जर्मनी में उद्योग, व्यापार और परिवहन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और वह आर्थिक लाभ बढ़ाने के लिये जर्मनी के एकीकरण का समर्थक बना।
जर्मन औद्योगीकरण का दूसरा चरण जर्मनी के एकीकरण से प्रारंभ हुआ और यहीं से औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व इंग्लैंड के हाथों से निकलकर जर्मनी के हाथ में आ गया। जर्मनी की तीव्र प्रगति के पीछे कारण थे- निवेश की मात्रा बढ़ जाना, जनसंख्या में वृद्धि, रूर घाटी व अन्य खनिज संसाधनों के धनी प्रदेश, तकनीकी शिक्षा व अनुसंधान पर अत्यधिक बल। इसके अतिरिक्त कृषि की सहकारी भूमिका, ऋण की उपलब्धता, बैंकिंग व बड़े औद्योगिक घरानों कार्टेल की उपस्थिति ने जर्मनी को अन्य राष्ट्रों से बहुत आगे लाकर खड़ा कर दिया।

फ्राँस में औद्योगीकरण

फ्रांस की स्थिति अन्य राष्ट्रों से भिन्न थी। वहाँ विकसित कृषि परंपरा थी और उद्योगों का आर्थिक जीवन में महत्त्व कृषि की तुलना में कम ही था। शासक लुई फिलिप (1830-48) के शासनकाल में उद्योगों के प्रसार को त्वरित करने का प्रयास किया गया। इस दौरान सर्वप्रथम खनन और धातुशोधन उद्योग के विकास को प्राथमिकता प्रदान की गई। फ्रांस के पूर्वोत्तर क्षेत्र में लौह-कोयला के प्रचुर भंडारों ने इसके औद्योगिक विकास हेतु आधारभूत साधन उपलब्ध करवाए। किंतु फिर भी कारीगरों व हस्तशिल्पियों का देश फ्राँस कभी भी जर्मनी या अमेरिका जैसा इस्पाती औद्योगिक विकास नहीं प्राप्त कर सका।

जापान का औद्योगिक विकास

अमेरिकी कमांडर पेरी के साथ संधि से पूर्व जो जापान वैश्विक व्यापार के लिये प्रतिबंधित था, वह अब तीव्र गति से अपना व्यापार बढ़ाकर मेईजी युग में औद्योगिक विस्फोट से विश्व को चौंकाने वाला था। उसने पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, उत्पादन प्रणाली का प्रबलता से अनुसरण करके चामत्कारिक आर्थिक उन्नति की। इसमें जापानियों के अनुशासन, परिश्रम, सादा रहन-सहन, सरकार की जागरूकता व राष्ट्रवाद की प्रेरणा का प्रमुख योगदान था।
1870 ई. में जापान में उद्योग मंत्रालय की स्थापना की गई। उद्योगों के हित में सरकार द्वारा ऋण लेकर उद्योगों में उदारतापूर्वक वितरण, अपने अधिकारियों का उचित प्रशिक्षण व नवीन खदानों की खोज और खनन कार्यों के कारण जापान औद्योगिक क्रांति की राह पर अग्रसर हुआ।
मुद्रा बैंकिंग प्रणाली के विकास हेतु मुद्रा का राष्ट्रीयकरण किया गया और 1882 ई. में केंद्रीय बैंक के रूप में बैंक ऑफ जापान की स्थापना की गई। 1887 ई. में 'योकोहामा सोना-चांदी बैंक' विदेशी मुद्रा के व्यापार नियंत्रण हेतु स्थापित किया गया। जहाज निर्माण हेतु उदार शर्तों पर ऋण और इस्पात की आपूर्ति सुनिश्चित की गई जिससे परिवहन व्यवस्था व जलसेना को मज़बूती मिली। 1871 ई. में डाक-तार व्यवस्था का विधिवत् विकास हुआ।
कृषि के क्षेत्र में सुधारों के शृंखलाबद्ध प्रयासों से कृषि क्रांति सुनिश्चित हुई। इसमें कृषकों को भूमि का स्वामी मान लेना, बेगार प्रथा की समाप्ति, पशु नस्ल सुधार, रेशम कीट का पालन, कर वसूली नकद करने जैसे प्रयास सम्मिलित थे।
अंततः कह सकते हैं कि व्यापार, बैंकिंग, परिवहन, उद्योग तथा कृषि के विकास ने अल्प समय में ही जापान का कायांतरण कर दिया।

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