औद्योगिक क्रांति - कारण, परिणाम, प्रभाव | audyogik kranti

औद्योगिक क्रांति क्या है?

18 वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन में उत्पादन, यातायात, आधारभूत उद्योगों में अभूतपूर्व परिवर्तन को औद्योगिक क्रांति कहते हैं।
औद्योगिक क्रांति उत्पादन के साधन में द्रुत परिवर्तन को रेखांकित करती है जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन में मानव का स्थान मशीन ने ले लिया कुटीर उद्योगों के स्थान पर कारखाना प्रणाली तथा दस्तकारी के स्थान पर मशीन-युग का आरंभ हुआ।
क्रांति का प्रचलित अर्थ अकस्मात् परिवर्तन होता हैं। 18वीं सदी में तकनीकी क्रियाओं में आश्चर्यजनक रूप से अकस्मात् परिवर्तन हुआ जिसका प्रभाव राजनीति, समाज और अर्थतंत्र पर पड़ा इससे राज्य की नीति भी प्रभावित हुई और आम आदमी भी।
audyogik-kranti
औद्योगिक क्रांति का आर्थिक आधार तैयार किया चार क्रांतियों- कृषि क्रांति, जनांकिकीय क्रांति, व्यवसायिक क्रांति और परिवहन क्रांति ने। इसका तकनीकी आधार तैयार किया वैज्ञानिक कति ने तथा इसका वैचारिक आधार तैयार किया प्रबोधन काल के चिंतन ने।
औद्योगिक क्रांति तीन क्षेत्रों आर्थिक संगठन, तकनीकी तथा व्यापारिक ढांचे में होने वाली सामूहिक प्रक्रिया का परिणाम थी। आर्थिक संगठन से अभिप्राय हैं अधिक पूंजी की उपलब्धता, कच्चे मालों की प्राप्ति तथा उत्पादन की खपत के लिए आन्तरिक और विदेशी बाजारों का विकास। तकनीकी का अर्थ है - मानव श्रम को कम करने के लिए नई-नई मशीनों का आविष्कार एवं प्रयोगा व्यापारिक ढांचे से अर्थ है - भूमि, श्रम और पूंजी का कुशलतापूर्वक प्रयोग। इन परिवर्तनों की संयुक्त रूप से औद्योगिक क्रांति कहा जाता है।
औद्योगिक क्रांति के काल के सम्बन्ध में इतिहासकारों का एक मत नहीं है बल्कि भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने अलग-अलग मत व्यक्त किए हैं तथापि इस क्रांति के आरंभ की कोई निश्चित तिथि निर्धारित करना संभव नहीं है। पिछली सदियों की तकनीकी प्रक्रियाओं तथा प्रचलनों के गर्भ से इसका जन्म हुआ। वास्तव में औद्योगिक क्रांति कोई आकस्मिक घटना न होकर विकास की एक अनवरत प्रक्रिया है जो यूरोप के विभिन्न देशों में विभिन्न समय में घटित हुई जिसका क्रम अब भी जारी हैं।
  • इतिहासकार डेविस का कथन है कि, "औद्योगिक क्रांति का अभिप्राय उन परिवर्तनों से हैं, जिन्होने यह संभव कर दिया कि मनुष्य उत्पादन के पुराने उपायों को छोड़कर बड़ी मात्रा में विशाल कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन कर सकें।"
इस काल में सामाजिक संबंधों एवं उद्योग के ढांचे में परिवर्तन की गति तथा उत्पादन एवं व्यापार की मात्रा इतनी अधिक ऊंची थी कि उनका वर्णन करने के लिए 'क्रांतिकारी शब्द के अतिरिक्त अन्य शब्द उपयुक्त नहीं होगा। इस प्रकार औद्योगिक क्रांति शब्द का प्रयोग 'औद्योगिक पद्धति' में हुए आमूलचूल परिवर्तनों के लिए किया गया। इसमें दस्तकारी के स्थान पर शक्ति-संचालित यन्त्रों से काम होने लगा। इन नवीन परिस्थितियों में उद्योग-धंधों का उद्देश्य बड़ी मात्रा में उत्पादन करना तथा नियता को बढ़ाना हो गया।
औद्योगिक क्रांति का तात्पर्य उद्योगों में मशीनी प्रणाली का आगमन तथा कारखाना प्रणाली के उद्भव से हैं। उत्पादन प्रणाली में आधारभूत या आमूल-चूल परिवर्तन को ही औद्योगिक क्रांति कहा गया। अर्थात् औद्योगिक क्रांति परिवर्तन की उस स्थिति को बताती है जिसके कारण सीमित गृह उद्योग का युग समाप्त हुआ तथा यंत्रों व मशीनों की सहायता से बड़े-बड़े कारखानों से अत्यधिक मात्रा में औद्योगिक वस्तुओं का निर्माण किया जाने लगा।
वस्तुतः 'औद्योगिक क्रांति' शब्द का प्रयोग इसलिए नहीं किया जाता कि परिवर्तन की प्रक्रिया अत्यंत तीव्रगामी थी वरन् इसलिए किया जाता हैं कि परिवर्तन सम्पन्न होने के बाद इसके प्रभाव अति तीक्ष्ण थे। डेढ़ शताब्दी में विश्व ने जितनी प्रगति की उतनी तो पिछली 10 शताब्दियों में भी नहीं हुई थी।
औद्योगीकरण से पहले शक्ति का स्रोत मनुष्य होता था जिसका स्थान अब मशीनों ने ले लिया। अतः प्रौद्योगिकी व तकनीकी को औद्योगिक क्रांति की जननी भी कहा जा सकता है।
औद्योगिक प्रणाली में ऊर्जा संसाधनों का उपयोग पूंजी-निवेश क्षमता, व्यापार वाणिज्य हेतु अनुकूल दशाएं और श्रमिकों की गतिशीलता अनिवार्य तत्व माने जाते हैं और औद्योगिक क्रांति की संपन्नता ने सभी पुरातन प्रणालियों व मान्यताओं आदि को परिवर्तित कर दिया और एक नए युग का आरंभ हुआ। औद्योगिक क्रांति का प्रारंभ ब्रिटेन में 18वीं शताब्दी में हुआ और बाद में यह क्रांति यूरोप के अन्य देशों तथा उससे बाहर भी प्रसारित हुई। यहां तक कि आज भी यह इसी अवस्था में लगभग प्रत्येक देश में विद्यमान है।
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन पद्धति, संगठन तथा प्रबन्ध में जो मौलिक परिवर्तन हुए उन्हें सामूहिक रूप से औद्योगिक क्रांति कहा जाता हैं।

औद्योगिक क्रांति के कारण

  • पुनर्जागरण एवं भौगोलिक खोजें
  • व्यापारिक पूंजी का योग
  • कृषि का विकास
  • नये उद्योगों का जन्म
  • सूती वस्त्रोद्योग का विकास
  • लोहे का उत्पादन
  • फ्रांस की राज्य क्रांति
  • अन्य नये आविष्कार
  • पर्याप्त बाजार का होना
  • साम्राज्यवादी भावना
  • शिक्षा का प्रसार
  • जनसंख्या में वृद्धि
  • यातायात के साधनों का विकास
  • भौतिकता में वृद्धि
  • राष्ट्रीयता की भावना
औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंजीनियरिंग उद्योग से प्रारंभ हुई और फिर लोहा, इस्पात, कोयला, सूती वस्त्र उद्योग, रंग, रसायन और यातायात में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
इन परिवर्तनों के पीछे निम्नलिखित कारण प्रमुख रूप से उत्तरदायी थे-

1. पुनर्जागरण एवं भौगोलिक खोजें
पुनर्जागरण के कारण यूरोपवासियों में तार्किक दृष्टिकोण एवं स्वतंत्र चिन्तन का उदय हुआ। इससे भौगोलिक खोजों को प्रोत्साहन मिला। भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप नये-नये। देशों की खोज हुई और यूरोपवासी दूसरे देशों के सम्पर्क में आए। उन्होंने दूसरे महाद्वीपों में उपनिवेश स्थापित किये। उन उपनिवेशों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्हें बड़ी मात्रा में वस्तुओं के उत्पादन की प्रेरणा मिली। इससे औद्योगिक क्रांति को प्रोत्साहन मिला।

2. व्यापारिक पूंजी का योग
मध्यकाल में यूरोप कृषि प्रधान महाद्वीप था। उद्योगों की सीमा कुटीर उद्योगों तक सीमित थी। इंग्लैण्ड में ऊन कातने एवं बुनने का व्यवसाय था। फ्रांस में शराब के उद्योग थे। इटली में सिल्क एवं सूती कपड़ा उद्योग था। इन सबसे घरेलू मांग की पूर्ति होती थी। विदेशी व्यापार के नाम पर केवल यूरोप के देश आपस में थोड़ा-बहुत आयात-निर्यात करते थे। मुख्य रूप से विदेशी व्यापार अरबों के हाथ में था। अरब लोग एशिया के सुदूरवर्ती देशों से माल लाकर भूमध्यसागरीय देशों को देते थे, बदले में इटली से ये ऊनी एवं सूती वस्त्र खरीदते थे। 15वीं सदी में तुर्कों ने इस व्यापारिक मार्ग पर अधिकार कर लिया। अत:। समुद्री मार्ग की खोज की गयी। वास्कोडिगामा के भारत पहुंचने के पश्चात ही हॉलैण्ड,इंग्लैण्ड ,फ्रांस भी समुद्र व्यापार में प्रविष्ट हुए। इस प्रकार 16वीं, 17वीं तथा 18वीं सदी में यूरोप में एक प्रकार की व्यावसायिक क्रांति हुई। जिसमें विदेशी व्यापार से अपार धनराशि प्राप्त की गई। इसी धन का प्रयोग औद्योगिक क्रांति में पूंजी के रूप में हुआ।

3. कृषि का विकास
कृषि के विकास से औद्योगिक क्रांति के समय नये उद्योगों के विकास में सहायता मिली। इस समय बेकार भूमि को कृषि योग्य बनाया गया तथा फसलों के क्रमवार उत्पादन से भूमि को खाली छोड़ना बन्द कर दिया गया। इससे उपज में वृद्धि हुई। कृषि के विकास के कारण बढ़ती हुई जनसंख्या में असंतोष उत्पन्न नहीं हुआ। सामाजिक संतोष ने औद्योगिक विकास में अपूर्व योगदान दिया।

4. नये उद्योगों का जन्म
18वीं सदी तक इंग्लैण्ड का निर्यात व्यापार काफी वृद्धि कर गया था। अब तक इंग्लैण्ड के व्यापारी भारत का माल चीन में तथा चीन का माल अन्य देशों में बेचते थे, पर अब यह धारणा बलवती हो गयी कि पर्याप्त श्रम उपलब्ध है तो उसके उपयोग से कुटीर उद्योगों का उत्पादन बढ़ सकता हैं। यह महत्त्वपूर्ण प्रगति थी, इंग्लैण्ड ने फ्रांसीसी उपनिवेश प्राप्त कर लिए, हॉलैण्ड के पूंजीपतियों के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। यूरोप और अमेरिका में डच पूंजी का स्थान भी अंग्रेजी पूंजी ने ले लिया। फलस्वरूप जहाजरानी का विकास, बैंकिंग व्यवस्था तथा व्यापारिक एजेन्टों के कारण यूरोप की आर्थिक राजधानी एन्टवर्प से हटकर लन्दन हो गयी। इस प्रकार 18वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक व्यापार विकास के साथ-साथ बैंकिंग व्यवस्था का विकास भी हुआ जिसने औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया।

5. सूती वस्त्रोद्योग का विकास
18वीं शताब्दी के तकनीकी आविष्कार सूती वस्त्रोद्योग के क्षेत्र में हुए। यह विकसित होने वाला प्रथम उद्योग था उपनिवेशों की मांग की पूर्ती हेतु ऐसी आवश्यक हुई कि कम श्रम से अधिक उत्पादन हो। जॉन के 'फ्लाइंग शटल' का 1750 ई. में भरपूर उपयोग होने लगा। इसी प्रकार हरंग्रीव्स की 'स्पिनिंग जैनी' नामक मशीन ने इस उद्योग को प्रभावित किया। इन दोनों आविष्कारों से यह उद्योग प्रथम श्रेणी का उद्योग बन गया। प्रथम महायुद्ध तक इंग्लैण्ड विश्व का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादन का केन्द्र माना जाने लगा। इस प्रकार यह कहना गलत नहीं होगा कि औद्योगिक क्रान्ति सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में हुई और वह भी सूती वस्त्रोद्योग में।

6. लोहे का उत्पादन
इंग्लैण्ड में लोहे को गलाने हेतु लकड़ी का कोयला प्रयोग में लिया जाता था। 18वीं सदी में खनिज कोयले का प्रयोग किया जाने लगा। 1760 ई. तक इंग्लैण्ड में लोहा पिघलाने की केवल 17 भट्ठियाँ थी जबकि इस सदी के अंत तक यह संख्या सौ से भी ऊपर पहुंच गयी। 1780 ई. तक लोहे का उत्पादन चौगुना हो गया। परिणामस्वरूप इंग्लैण्ड लोहे के आयात के स्थान पर निर्यात करने लगा।

7. फ्रांस की राज्य क्रांति
फ्रांस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट की साम्राज्यवादी नीति के कारण इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि देशों के बीच दीर्घकाल तक युद्ध चलता रहा। इस युद्ध के फलस्वरूप इंग्लैण्ड को अपने सैनिकों तथा मित्र राष्ट्रों के सैनिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक उत्पादन की प्रेरणा मिली। इसके लिए उसे उत्पादन के साधनों में सुधार करना आवश्यक हो गया। युद्ध की समाप्ति के बाद इंग्लैण्ड में बेरोजगारी फैल गई। अतः बेरोजगारी को दूर करने के लिए वहा उद्योग-धंधों का विकास किया गया। इससे उत्पादन में वृद्धि हुई। इसके अतिरिक्त कच्चा माल प्राप्त करने एवं तैयार माल को खपाने के लिए इंग्लैण्ड को नये-नये उपनिवेश स्थापित करने पड़े।

8. अन्य नये आविष्कार
18वीं सदी में जितने आविष्कार हुए उतने पहले कभी नहीं हुए। 1760 ई. से 1770 ई. के मध्य उद्योगों के लिए चार आविष्कार बहुत ही महत्त्वपूर्ण सिद्ध हए। ऑर्कराइट का 'वाटर फ्रेम', हरग्रीव्ज की 'स्पिनिंग जैनी', क्राम्पटन का 'म्यूल' तथा वाट का 'स्टीम इंजन'। आगामी दस वर्षों में कॉर्टराइट का 'पावर लूम' तथा कोर्ट की लोहे को गलाकर ढालने की विधि ने चमत्कारिक परिवर्तन किया। 1785 ई. में सूत कातने में वाट के भाप के इंजन का प्रयोग हुआ। इससे पूर्व अधिकांश कुटीर पवन चक्की से चलते थे जो नदियों के किनारे स्थित थे। अब ये उद्योग बड़े-बड़े नगरों के विशाल कारखानों में केन्द्रित हो गये। 1770-1800 ई. के मध्य सूती वस्त्र में 10 गुना वृद्धि हुई।

9. पर्याप्त बाजार का होना
1700 ई. के पश्चात् आन्तरिक और विदेशी बाजार की मांग की निरन्तर वृद्धि ने इन आविष्कारों को जन्म दिया। उद्योगपति भी तत्कालीन अर्थव्यवस्था को सुरक्षित मान कर नये या पुराने उद्योगों के विकास में विशाल पूंजी लगाने को तत्पर थे। इसलिए औद्योगिक क्रांति हुई और उत्पादन में वृद्धि होती चली गई।

10. साम्राज्यवादी भावना
औद्योगिक क्रांति के लिए साम्राज्यवादी भावना भी उत्तरदायी थी। इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी आदि देश विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में अपने उपनिवेश स्थापित कर रहे थे। अतः इन देशों को अपने उपनिवेशवासियों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए, और अधिक लाभ कमाने के लिए बड़े पैमाने पर वस्तुओं के उत्पादन की प्रेरणा मिली। उपनिवेशों से उन्हें कच्चा माल प्राप्त हुआ तथा तैयार माल की खपत के लिए मण्डियाँ भी उपलब्ध हुई। अतः साम्राज्यवाद की भावना के कारण औद्योगिक उत्पादन को प्रोत्साहन मिला।

11. शिक्षा का प्रसार
पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप यूरोप में शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ। अब लोगों में तर्क और स्वतंत्र चिन्तन की भावनाओं का उदय हुआ। इससे वैज्ञानिक आविष्कार को बहुत प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप उद्योग-धंधों के लिए नये-नये आविष्कार हुए, यातायात के साधनों में उन्नति हुई और कृषि के क्षेत्र में नवीन विधियों का प्रचलन हुआ।

12. जनसंख्या में वृद्धि
औद्योगिक क्रांति का एक अन्य कारण जनसंख्या में वृद्धि होना भी था। यूरोप में 18वीं शताब्दी में जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई। इंग्लैण्ड की जनसंख्या 1700 ई. में 60 लाख थी जो 1800 ई. में बढ़कर 90 लाख हो गई। इसी प्रकार फ्रांस में 1700 ई. में 1 करोड़ 10 लाख जनसंख्या थी जो 1800 ई. में बढ़कर 2 करोड़ 60 लाख हो गयी थी। बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हुई, क्योंकि कृषि के द्वारा बढ़ती हुई जनसंख्या को रोजगार देना संभव न था। अत: अनेक लोग उद्योग धंधों की ओर आकृष्ट हुए। इसके अतिरिक्त जनसंख्या की वृद्धि से दैनिक उपयोग की वस्तुओं की मांग भी बढ़ती चली गई। अतः लोगों ढ़ती मांगों की पूर्ति के लिए अधिक मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करना आवश्यक था। इससे भी औद्योगिक क्रांति को प्रोत्साहन मिला।

13. यातायात के साधनों का विकास
यातायात के विकास के कारण भी वाणिज्य व्यापार की उन्नति हुई। पक्की सड़कों के विकास से आन्तरिक व्यापार का विकास हुआ। समुद्री मार्ग के विकसित हो जाने से यूरोपीय देश उपनिवेशों के साथ व्यापार करने लगे। इस प्रकार जल यातायात एवं थल यातायात के साधनों के विकसित हो जाने से वाणिज्य व्यापार का पर्याप्त विकास हुआ और अधिक उत्पादन को प्रोत्साहन मिला। अतः वस्तुओं के बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के लिए कल-कारखानों की स्थापना पर बल दिया जाने लगा।

14. राष्ट्रीयता की भावना
राष्ट्रीयता की भावना ने भी औद्योगिक क्रांति के विकास में योगदान दिया। इस समय यूरोपीय देशों में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार हो चुका था। राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर प्रत्येक राष्ट्र शक्तिशाली और वैभवशाली बनना चाहता थी। ये देश आर्थिक क्षेत्र में उन्नति कर समद्धिशाली बनने के लिए प्रयत्न करने लगे अतः अनेक देशों में वस्तुओं के अधिक से अधिक उत्पादन के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हुई।

15. भौतिकता में वृद्धि
पुनर्जागरण के फलस्वरूप धर्म का महत्त्व कम हुआ और भौतिकता का महत्त्व बढ़ गया। अब लोग अपने जीवन को अधिक से अधिक भोगविलास पर्ण बनाने के लिए प्रयत्न करने लगे। इसके लिए यह आवश्यक था कि वस्तुओं का उत्पादन अधिक मात्रा में किया जाये। इस प्रकार भोग-विलास की वस्तुओं के उत्पादन के लिए कल-कारखाने स्थापित करने की आवश्यकता हुई। इस प्रकार उपर्युक्त कारण औद्योगिक क्रांति में सहायक हुए।

सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के होने के कारण

औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में हुई। राजनीतिक दृष्टि से इंग्लैण्ड कोई विशेष शक्तिशाली देश नहीं था। फ्रांस इंग्लैण्ड की तुलना में अधिक समृद्ध था, फिर भी इस क्रांति का सूत्रपात इंग्लैण्ड में ही हुआ। निश्चय ही इसके कुछ विशेष कारण थे, जो निम्न हैं-

प्राकृतिक कारण
  • प्राकृतिक साधनों की प्रचुरता
  • अनुकूल भौगोलिक स्थिति
  • जलवायु
  • कटा-फटा समुद्री तट
  • सामुद्रिक शक्ति की श्रेष्ठता

आर्थिक कारण
  • आर्थिक विकास के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि का पाया जाना
  • श्रमिकों का अभाव तथा श्रम संचयक साधनों की आवश्यकता
  • पूंजी का असीमित संचय
  • विस्तृत बाजार क्षेत्र
  • वैज्ञानिक आविष्कार
  • यातायात का विकास
  • दक्ष श्रमिकों की उपलब्धता
  • इंग्लैण्ड की व्यापारिक तथा आर्थिक नीति
  • संगठन की योग्यता
  • बैंकिंग व्यवस्था का विकास होना
  • व्यक्तिगत आर्थिक स्वतंत्रता
  • विकासशील दृष्टिकोण

राजनीतिक कारण
  • राजनीतिक स्थायित्व एवं शांति का वातावरण
  • बाह्य आक्रमणों से मुक्ति
  • फ्रांस की राज्य क्रांति
  • राज्य की अभिरूचि
  • दास-प्रथा से मुक्ति तथा पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता

सामाजिक-धार्मिक कारण
  • सामाजिक तथा धार्मिक वातावरण की अनुकूलता

प्राकृतिक कारण

1. प्राकृतिक साधनों की प्रचुरता
इंग्लैण्ड में विभिन्न प्रकार के आवश्यक प्राकृतिक साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे, जैसे कि लोहा और कोयला, जो औद्योगिक क्रांति के जनक कहे जाते हैं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होने के साथ कोयले व लोहे की खाने एक-दूसरे के निकट हैं। यदि किसी कच्चे माल की कमी अनुभव होती थी, तो उसकी पूर्ति साम्राज्य के उपनिवेशों से पूरी कर ली जाती थी।

2. अनुकूल भौगोलिक स्थिति
इंग्लैण्ड की भौगोलिक स्थिति भी उसके लिए अत्यन्त लाभप्रद थी, क्योंकि इंग्लैण्ड की भौगोलिक स्थिति के दो गुणों- प्रथम संसार से पृथकता और दूसरा, संसार से निकट सम्पर्क, से विदेशी व्यापार में बहुत सफलता मिली। इंग्लैण्ड यूरोप से पृथक होने के कारण आक्रमणों से सुरक्षित रहा तथा एशिया और अमेरिका के केन्द्र-बिंदु के रूप में व्यापारिक संबंध स्थापित करने में सुगमता रही।

3. जलवायु
इंग्लैण्ड की जलवायु समशीतोष्ण तथा स्वास्थ्यप्रद हैं, इससे यहां के निवासियों को कठिन परिश्रम तथा बौद्धिक विकास के लिए पर्याप्त प्रेरणा मिली। समशीतोष्ण जलवायु सूती वस्त्र उद्योग के विकास में भी अनुकूल सिद्ध हुई।

4. कटा-फटा समुद्री तट
इंग्लैण्ड के समुद्री तट की लंबाई 7000 मील हैं तथा वह काफी कटा-फटा है, जिससे सुरक्षित तथा उत्तम बन्दरगाहों का निर्माण सम्भव हो सका। समुद्र तट से देश का कोई भी भाग 80 मील से अधिक दूर नहीं हैं। गल्फ-स्ट्रीम की गर्म सामुद्रिक धारा के कारण पूर्वी किनारा हमेशा व्यापार के लिए खुला रहता है। समुद्री तट की अनकलता के कारण इंग्लैण्ड में एक ओर तो जहाज तथा मत्स्य उद्योगों का विकास सम्भव हो सका और दूसरी ओर नये साम्राज्यों की स्थापना और विस्तृत बाजारों का शोषण भी संभव हुआ।

5. सामुद्रिक शक्ति की श्रेष्ठता
इंग्लैण्ड उस समय विश्व की सर्वश्रेष्ठ सामुद्रिक शक्ति थी। इंग्लैण्ड के नाविक अत्यन्त कुशल तथा साहसी थे जिससे उनकी सामुद्रिक शक्ति सर्वोपरि हो गई। इस सामुद्रिक सर्वोच्चता के कारण इंग्लैण्ड एक विशाल साम्राज्य स्थापित करने में सफल हुआ। जल-शक्ति होने के कारण इंग्लैण्ड बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रहा तथा शांतिपूर्वक अपना औद्योगिक विकास करता रहा।

आर्थिक कारण

1. आर्थिक विकास के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि का पाया जाना
इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति से पूर्व अर्थव्यवस्था में औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक भूमिका तैयार हो चुकी थी। लोहा, वस्त्र तथा जहाजी उद्योग प्रगति के मार्ग पर थे. इंग्लैण्ड के निवासियों में बड़े पैमाने पर उत्पादन तथा विदेशी व्यापार से लाभ अर्जित करने की इच्छा विद्यमान होने से नये आविष्कारों, बैंकिंग विकास तथा संयुक्त पूंजी वाली कम्पनियों के विकास का मार्ग खुल गया था।

2. श्रमिकों का अभाव तथा श्रम संचयक साधनों की आवश्यकता
इंग्लैण्ड में उद्योग तथा व्यापार के निरन्तर बढ़ते हुए श्रम की मांग के मुकाबले श्रमिकों का अभाव था। परन्तु कुशल एवं योग्य श्रमिकों ने इस कमी को पूरा कर दिया। यूरोप के अधिकांश देशों में आन्तरिक शान्ति का अभाव था। इसलिए वहां के बहुत से कुशल एवं अनुभवी श्रमिक भागकर इंग्लैण्ड में आ गए। इससे इंग्लैण्ड को लाभ भी हुआ। उपनिवेशों के कारण इंग्लैण्ड के व्यापारिक क्षेत्र का बहुत अधिक विस्तार हो चुका था। मांगों की पूर्ति उत्पादन की घरेलू प्रणाली के आधार पर पूरी नहीं की जा सकती थी। इसकी पूर्ति के लिए ऐसी कारखाना प्रणाली की आवश्यकता थी, जिसमें अधिक उत्पादन के लिए स्वचालित मशीनों से सहायता ली जाए। श्रम-पर्ति सीमित होने से वहां के कशल शिल्पियों को श्रम संचयक साधनों के रूप में यंत्रों, मशीनों तथा नयी-नयी तकनीकियों के आविष्कार को प्रोत्साहन मिला। 

3. पूँजी का असीमित संचय
इंग्लैण्ड का ऊन व्यवसाय तथा विदेशी व्यापार एवं वाणिज्य उन्नत होने से व्यापारियों के पास यथेष्ट पूंजी एकत्रित हो रही थी, जिसका ये विनियोग करना चाहते थे। इंग्लैण्ड की तात्कालिक परिस्थितियां पूंजी संग्रह के पक्ष में थी तथा औद्योगिक विस्तार के लिए अनुकूल थी। इतिहास में इस बात का प्रमाण हैं कि इस काल में इंग्लैण्ड की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने व्यापार के आधार पर तथा अनुचित राजनीतिक प्रभाव के द्वारा भारत का धन इंग्लैण्ड लाने में सफलता प्राप्त की। 1757 ई. में प्लासी की विजय के पश्चात् अंग्रेजों ने बंगाल को खूब लूटा और वहां से अतुल्य धन-सम्पदा प्राप्त की। इंग्लैण्डवासी अपनी पूंजी का सदुपयोग करना जानते थे। उन्होंने अपनी पूंजी में वृद्धि करने के लिए अधिक पूंजी वाणिज्य-व्यापार में लगाई। इससे भी इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति सम्भव हो सकी।

4. विस्तृत बाजार क्षेत्र
इंग्लैण्ड का साम्राज्य विश्व में चारों ओर फैला होने के कारण उसके उपनिवेश उसके लिए अच्छे बाजार थे, जहां पर इंग्लैण्ड का माल सरलता से बेचा जा सकता था और बिक रहा था। इस कारण इंग्लैण्ड को माल की बिक्री के लिए बाजारों की चिंता न थी। यह उल्लेखनीय होगा कि इन उपनिवेशों में भारत का बाजार सबसे वृहत् एवं महत्त्वपूर्ण था।

5. वैज्ञानिक आविष्कार
पूँजी की पर्याप्तता, विस्तृत बाजार तथा श्रम के अभाव से इंग्लैण्ड में वैज्ञानिक आविष्कारों की श्रृंखला से औद्योगिक क्रांति सफल हुई।

6. यातायात का विकास
इंग्लैण्ड के द्वारा एक विशाल साम्राज्य की स्थापना तथा व्यापार क्षेत्र में विस्तार, सुव्यवस्थित तथा सुदृढ़ सामुद्रिक शक्ति के द्वारा ही सम्भव हो सका। इंग्लैण्ड में उस समय सड़कें, नहरें तथा नदियों द्वारा जल यातायात के साधन भी विकसित थे जिससे न केवल आन्तरिक व्यापार में वद्धि हई. बल्कि श्रमिकों की गतिशीलता में भी वृद्धि हई। कारखानों से निर्मित माल समुद्र तट तथा विदेशों से आये कच्चे माल को कारखानों तक पहुंचाना भी सम्भव हो सका।

7. दक्ष श्रमिकों की उपलब्धि
यद्यपि इंग्लैण्ड में श्रमिकों का अभाव था, परन्तु कुशल एवं योग्य श्रमिकों की पूर्ति को बढ़ाना सम्भव था, क्योंकि यूरोप के अन्य देशों में आन्तरिक अशान्ति के कारण वहां के कुशल श्रमिक भागकर इंग्लैण्ड आ रहे थे।

8. इंग्लैण्ड की व्यापारिक तथा आर्थिक नीति
इग्लेण्ड की व्यापारिक एवं आर्थिक नीति उद्योगों को संरक्षण देकर देशी व्यापार एवं वाणिज्य की उन्नति के पक्ष में थी। इस नीति के फलस्वरूप इंग्लैण्ड ने संरक्षण करों द्वारा अपने माल की मांग बढ़ाकर वर्षों तक अपना व्यापार-संतुलन अपने पक्ष में रखा, जिससे वहां पर पूंजी का असीमित संचय होता गया और विदेशी व्यापार क्षेत्र का विकास एवं विस्तार हआ

9. संगठन की योग्यता
संगठन उत्पादन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है तथा व्यापार एवं उद्योग की प्रगति का सूत्रधार है। इंग्लैण्ड के निवासियों में विस्तृत व्यापार के संगठन की दक्षता तथा बड़े पैमाने की उत्पत्ति की कुशलता पाई जाती थी। इससे इंग्लैण्ड को एक ओर समस्त संसार से व्यापारिक संबंध स्थापित करने का मौका मिला, दूसरी ओर राष्ट्र में अधिक और कुशल उत्पादन करने का।

10. बैंकिंग व्यवस्था का विकास होना
इंग्लैण्ड में 17वीं शताब्दी में ही बैंकिंग व्यवस्था का विकास हो चुका था। 1664 ई. में बैंक ऑफ इंग्लैण्ड की स्थापना हो जाने से बैंकिंग व्यवस्था, मुद्रा बाजार आदि को विकसित होने का अवसर मिला। बैंकिंग एवं मुद्रा बाजार व्यवस्थित एवं विकसित होने से औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त वित्तीय साधन और साख सुविधाएं प्राप्त हो सकी।

11. व्यक्तिगत आर्थिक स्वतंत्रता
आर्थिक विकास में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी साहस और आर्थिक साधनों के शोषण को प्रोत्साहित करती है। ग्लैण्ड में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पाये जाने से व्यापार तथा व्यवसाय के इच्छुक अन्य यूरोपीय  देशों के अधिकांश निवासी आकर बस गये और इंग्लैण्ड तथा विदेशी निवासियों ने व्यक्तिगत इच्छानसार व्यवसाय तथा व्यापार प्रारभ कर आद्योगिक तथा व्यापारिक प्रति करने में योगदान दिया।

12. विकासशील दष्टिकोण
बाजार क्षेत्रों के विकास के साथ इंग्लैण्ड के पंजीपतियों की ओर विचारशील जनता की यह विचारधारा हो गयी थी कि इतने विस्तृत व्यापार क्षेत्रों से लाभ उठाने के लिए पूंजी की सहायता तथा बड़े-बड़े यन्त्रों के आविष्कार से उत्पादन-तंत्र में सुधार किया जाना चाहिए। इस विचारधारा ने भी इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति का मार्ग खोल दिया।

राजनीतिक कारण

1. राजनीतिक स्थायित्व एवं शांति का वातावरण
उस समय यूरोप के अन्य देश संघर्षों में अथवा परस्पर युद्धों में फंसे हुए थे, किंतु इंग्लैण्ड में पूर्णरूपेण राजनीतिक शांति थी। यही कारण था कि युद्धग्रस्त राष्ट्रों से अनेक शिल्पी एवं व्यवसायी इंग्लैण्ड में आकर बसे। इसी प्रकार इटली से भी अनेक दक्ष श्रमिक, शिल्पी एवं व्यापारी इंग्लैण्ड में आये। इस प्रकार औद्योगिक उन्नति कार्यकुशल एवं बुद्धिमान प्रणेता इंग्लैण्ड को अनायास ही मिल गये।

2. बाह्य आक्रमणों से मुक्ति
इंग्लैण्ड में सर्वप्रथम औद्योगिक क्रांति होने व इसकी सफलता का अन्य कारण इंग्लैण्ड का बाहरी आक्रमणों से मुक्त रहना था। जिन युद्धों में ब्रिटेन ने हिस्सा लिया, वे भी इंग्लैण्ड की भूमि पर नहीं बल्कि यूरोपीय देशों, अमेरिका और एशिया की भूमि पर लड़े गये। बाहरी आक्रमणों से मुक्त होने के कारण उद्योगपतियों और व्यापारियों को पूंजी के विनियोग करने को प्रोत्साहन मिला।

3. फ्रांस की राज्य क्रांति
नेपोलियन की साम्राज्यवादी नीति के कारण इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच लगभग 22 वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। इन दीर्घकालीन युद्धों के कारण यूरोप के प्रायः सभी देशों की आर्थिक व्यवस्था, अस्त-व्यस्त हो गई, परन्तु इंग्लैण्ड की आर्थिक व्यवस्था पर अधिक बुरा प्रभाव नहीं पड़ा। इन युद्धों के फलस्वरूप इंग्लैण्ड को अपने सैनिकों तथा मित्र राष्ट्रों के सैनिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक उत्पादन की प्रेरणा मिली। नेपोलियन की महाद्वीपीय नीति भी असफल रही तथा अनेक देश इंग्लैण्ड से चोरी-छिपे माल मंगवाते रहे। इस प्रकार इंग्लैण्ड सम्पूर्ण यूरोप का कारखाना बन गया। इससे इंग्लैण्ड का औद्योगिक विकास तीव्र गति से हुआ।

4. राज्य की अभिरूचि
इंग्लैण्ड के औद्योगिक विकास में राज्य की भी पर्याप्त रूचि थी। इंग्लैण्ड की सरकार ने विदशी माल के इंग्लैण्ड में आयात तथा वहां से कच्चे माल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा था। उसने भारतीय सूती वस्त्र के आयात पर भी रोक लगा दी थी। सरकार की इस नीति से औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन मिला।

5. दास-प्रथा से मुक्ति तथा पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता
जबकि यूरोप के अनेक देशों में दास-प्रथा प्रचलित थी, इंग्लैण्ड के समाज में दास-प्रथ से मुक्ति और पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता थी। उन्हें इच्छानुसार कार्य करने, व्यापार-व्यवस्था प्रारंभ करने, वितरण करने तथा पंजी के संचय और विनियोग करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। इससे निजी साहस को भी बढ़ावा मिला।

सामाजिक-धार्मिक कारण

सामाजिक तथा धार्मिक वातावरण की अनुकूलता
इंग्लैण्ड में सामाजिक एवं धार्मिक वातावरण विकास के अनुकूल था। इंग्लैण्ड में मध्ययुगीन कट्टरता एवं जड़ता धीरे-धीरे समाप्त हो चुकी थी और शिक्षा के स्तर में वृद्धि हो रही थी। इन सबने मिलकर नये आविकारों तथा रीतियों को प्रोत्साहित किया।
उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि 18वीं शताब्दी के आरंभ में इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के अनुकूल सभी परिस्थितियां उपस्थित थी। इसीलिए वह यूरोप में औद्योगिक क्रांति का प्रणेता बन गया।

औद्योगिक क्रांति के प्रभाव/परिणाम

औद्योगिक क्रांति ने समाज के सभी पहलुओं, जैसे- आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था आदि को प्रभावित किया। यही नहीं, इस क्रांति ने समस्त मानव जाति की गतिविधियों में हलचल मचा दी। 'क्रांति का परिणाम था नयी जनता, नये वर्ग, नयी नीतियां, नयी समस्यायें और नये साम्राज्य।' औद्योगिक क्रांति जो लम्बी अवधि तक चली. का आधार ही नवीन आविष्कार, नवीन प्रणालियां तथा नवीन विचारधारा थी। औद्योगिक क्रांति ने ही इंग्लैण्ड को विश्व में आर्थिक प्रभुसत्ता दिलवायी। औद्योगिक क्रांति के मुख्य रूप से निम्नलिखित परिणाम निकले, जिन्हें हम आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्रों में विभक्त कर सकते है-

आर्थिक परिणाम

उत्पादन में वृद्धि
औद्योगिक क्रांति का प्रथम प्रभाव उत्पादन पर पड़ा। यन्त्रों के द्वारा कम समय में अधिक मात्रा में वस्तुओं का निर्माण होने लगा। पहले मशीनों का उपयोग कुछ सीमित उद्योगों में हुआ, लेकिन धीरे-धीरे सभी उद्योगों का मशीनीकरण हो गया। उत्पादन बढ़ने से ही इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि देश समृद्ध हो गये।

घरेलू उद्योगों का विनाश
क्रांति से पूर्व कारीगर लोग अपने परिवार के साथ सीमित पूंजी से तथा थोड़े-से औजारों से उत्पादन करते थे। अपनी रूचि की वस्तु का निर्माण करते थे तथा उसी से जीवनयापन करते थे। मशीनों से उत्पादन अधिक मात्रा में तथा काफी सस्ता एवं सुन्दर होने लग गया। अत: घरेलू उत्पादन की वस्तुओं के ग्राहक कम हो गये और कटीर उद्योगों में काम करने वाले कारीगर बेकार हो गये इस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने कुटीर उद्योगों को नष्ट कर दिया।

बड़े कारखानों की स्थापना
औद्योगिक क्रांति के प्रांरभिक काल में छोटे-छोटे कारखाने स्थापित किये गये। इनकी सफलता से प्रोत्साहित होकर बडे-बडे कारखाने लगाये गये। इनमें हजारों व्यक्ति एक साथ कार्य कर सकते थे ये बड़े कारखाने सफल हुए। इनमें मजदूरों के अलावा ऐसे लोगों को भी सेवा में रख लिया। जाता था जो हर समय खर्च घटाने, प्रति व्यक्ति काम लेने और कारखाने में तैयार माल के लिए और बाजार खोजने के तौर-तरीकों का अध्ययन कर सकें।

फैक्ट्ररी पद्धति की स्थापना
बड़े कारखानों में फैक्ट्ररी पद्धति अपनाई गई। इसकी निम्न विशेषतायें थी-
  1. हजारों लोगों का एक साथ कारखाने में काम करना,
  2. कार्य विभाजन,
  3. श्रमिकों पर निरीक्षकों की नियुक्ति.
  4. मशीनों का यांत्रिक शक्ति से चलना.
  5. पूंजी का विशेष उद्योग में फंसा होना,
  6. श्रम के मूल्य को लेकर मजदूर मालिक संघर्ष। इस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने वर्ग-संघर्ष को अधिक महत्त्वपूर्ण बना दिया।

विशेषज्ञता का विकास
कारखाना पद्धति में प्रत्येक व्यक्ति को एक ही वस्तु का छोटा-छोटा काम करने को दिया जाता था। प्रायः एक व्यक्ति को दूसरे लोगों के कार्यों के बारे में अधिक जानकारी नहीं होती थी। इस प्रकार की विशेषज्ञता का विकास हुआ।

नये नगरों का विकास
मशीनों से चलने वाले बड़े-बड़े कारखाने ऐसे स्थानों पर स्थापित हुए जहां उनको चलाने के लिए कोयला एवं अन्य साधन उपलब्ध थे। काम करने के लिए गांव से बेरोजगार लोग आकर कारखानों के पास ही बसने लगे। परिणामस्वरूप नये-नये नगरों का विकास सम्भव हुआ। इंग्लैण्ड में मेनचेस्टर, ग्लासगो, लिवरपूल आदि नगरों का विकास इस दौरान ही संभव हुआ।

बेरोजगारी की समस्या
इस क्रांति से पूर्व प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी काम में संलग्न था। लेकिन औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप बहुत से लोगों को काम मिलना कठिन हो गया। इन बड़े-बड़े यन्त्रीकृत कारखानों से कई व्यक्ति का कार्य कम समय में ही होना सम्भव हो गया। समय-समय पर व्यापारिक मंदी के दौरान भी कारखानों में मजदूरों की छंटनी की जाती थी जिससे बेरोजगारी की समस्या बढ़ जाती थी।

राष्ट्रीय बाजारों को संरक्षण
औद्योगिक क्रांति के बाद राष्ट्रीय उत्पादन को महत्व दिया जाने लगा। अन्य राष्ट्रों की निर्मित वस्तुओं पर भारी आयात कर लगाया जाने लगा, ताकि वे स्वदेशी वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा न कर सकें और यदि करें भी तो अधिक मुनाफा न कमा सके। इस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने राष्ट्रीय बाजार को संरक्षण प्रदान करना आवश्यक कर दिया।

परस्पर निर्भरता बढ़ाना
आर्थिक दृष्टि से औद्योगिक विकास ने संसार के सभी देशों को परस्पर निर्भर बना दिया। पहले प्रत्येक देश अपनी आवश्यकताओं को अपने आप पूरा करता था। अब यातायात के साधन भी विकसित हो गये थे जिससे संसार के सभी बाजार आपस में जड गये। औद्योगिक देशों को पिछडे देशों से कच्चा माल चाहिये और पिछडे देशों को मशीनें तथा तैयार माल चाहिये। इस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने सभी को एक-दूसरे पर निर्भर बना दिया।।

संयुक्त पूंजी वाली कंपनियों का विकास
औद्योगिक क्रांति से पूर्व उद्योग की स्थापना के लिए बहुत ही कम पंजी की आवश्यकता होती थी। औद्योगिक कांति से उत्पादन की विधि  में परिवर्तन हुआ और विशाल पूंजी की आवश्यकता पड़ने लगी जो कि एक व्यक्ति के द्वारा जुटाया जाना सामर्थ्य के बाहर था। फलतः संयुक्त पूंजी वाली कम्पनियों या प्रमण्डलों का विकास हुआ। प्रारंभ में ऐसी कम्पनियां असीमित दायित्व वाली थी, किन्तु बाद में सन् 1862 से सीमित दायित्व वाली कम्पनियों की स्थापना हुई।

पूंजीपतियों एवं श्रमिकों के संबंधों में परिवर्तन
औद्योगिक क्रांति ने नियोजक और नियोजित; पूंजीपति और श्रमिकों के संबंधों में परिवर्तन किया। घरेलू उत्पादन प्रणाली में नियोजक-नियोजित या तो एक ही परिवार के सदस्य होते थे अथवा उनकी संख्या बहुत कम होने के कारण उनमें पारिवारिक सम्बंध स्थापित हो जाते थे। परन्तु संयुक्त पूंजी वाली कम्पनियों की कारखाना प्रणाली में श्रमिक एक मशीन का पुर्जा मात्र रह गया और उसका स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया। फलस्वरूप पूंजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग पर हावी होने लगा और उसका शोषण किया जाने लगा, जिससे बाद में श्रमिक-संघों के विकास को प्रोत्साहन मिला।

पूंजीपतियों का औद्योगिक एकाधिकार
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप बड़े-बड़े कारखाने तथा संयुक्त प्रमण्डल अस्तित्व में आये, जिन पर धीरे-धीरे पूंजीपतियों का एकाधिकार सा हो गया और मजदूरों की स्थिति बहुत ही दयनीय और शोचनीय होती गयी। उद्योगों पर पूंजीपतियों का एकाधिकार होने से पूंजीपतियों का राजनीतिक सत्ता पर भी प्रभुत्व बढ़ा।

बैंकिंग एवं बीमा व्यवसाय का संगठन
उत्पादन वृद्धि व व्यापार क्षेत्र की वृद्धि से जोखिम का क्षेत्र बढ़ा और इसका अन्य साख सबधा आवश्यकत बढ़ी। इन समस्याओं का समाधान बेकिंग संस्थाओं और बीमा कम्पनियों के संगठन द्वारा तथा मुद्रा और पूंजी बाजार के विकास द्वारा किया गया।

आर्थिक संकटों की उत्पत्ति
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं के बीच प्रत्यक्ष संबंध समाप्त हो गया। फलतः कभी उत्पादन मांग से कम और कभी अधिक होने लगा। इससे वस्तुओं के मूल्यों में उतार-चढ़ाव आने लगे। 

उद्योगों का स्थानीयकरण
औद्योगिक क्रांति से पूर्व उद्योग छोटी-छोटी उत्पादन इकाइयों के रूप में विकेन्द्रित थे। परन्तु औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप बड़े पैमाने की उत्पत्ति, कारखाना प्रणाली तथा कोयले की शक्ति के उपयोग के कारण उद्योग-धंधे, कोयला क्षेत्रों कच्चे माल उत्पादक क्षेत्रों तथा व्यापारिक केन्द्रों में स्थापित होने लगा। यातायात और सन्देशवाहन के साधनों के विकास ने उद्योगों के विकेन्द्रीकरण को और भी बढ़ावा दिया।

उद्योगपतियों का संगठन
औद्योगिक क्रांति ने उद्योगपति वर्ग को ही जन्म नहीं दिया, वरन् उनमें अपने हितों और प्रतियोगिता को समाप्त करने के लिए संगठन की भावना भी उत्पन्न की फलतः 1785 ई. में उद्योगपतियों का चैम्बर स्थापित हुआ। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य सरकार की आर्थिक नीति को प्रभावित करना था।

विकास दर में वृद्धि
इंग्लैण्ड की वकास दर, जो कि 1700-1780 ई. के बीच लगभग 1 प्रतिशत वार्षिक थी, औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप बढ़कर 1781-1913 ई. की अवधि में 3 प्रतिशत वार्षिक हो गई। विकास दर में वद्धि के फलस्वरूप राष्ट्रीय आय औ प्रति व्यक्ति आय दोनों में वद्धि हुई।

यातायात के साधनों का विकास
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में यातायात के साधनों का भी तीव्र गति से विकास हुआ। सड़क, नहर, रेल तथा जहाजरानी आदि सभी यातायात साधनों का विकास हुआ।

बड़े पैमाने पर कृषि एवं यन्त्रीकण
श्रमिकों की कमी के कारण कृषि में यन्त्रीकरण बढ़ा और कृषि में व्यावसायिक दष्टिकोण अपनाये जाने से बड़े पैमाने पर कृषि की जाने लगी। इस प्रकार औद्योगिक क्रांति से कृषि क्रांति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

सामाजिक परिणाम
औद्योगिक क्रांति के सामाजिक परिणाम भी महत्त्वपूर्ण थे। जहां एक ओर औद्योगिक क्रांति से भौतिक समृद्धि के नये-युग का मार्ग प्रशस्त हुआ, वहीं दूसरी ओर सामाजिक उत्पीड़न, वर्ग संघर्ष और शोषण की शुरूआत हुई।
सामाजिक क्षेत्र में निम्नलिखित प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं-

मध्यम वर्ग का उदय
औद्योगिक विकास के लिए पूंजी तथा व्यावसायिक वद्धि की आवश्यकता थी। सामन्तों के पास पूँजी तो थी, पर समाज का यह वर्ग उद्योगों की स्थापना को निम्न कर्म समझता था। मध्यम वर्ग के लोगों के पास पूंजी भी थी और व्यावसायिक बुद्धि भी। इस वर्ग ने औद्योगिक विकास में पर्याप्त रूचि ली, फलत: औद्योगिक विकास के साथ-साथ उसका भी विकास होता गया। वे श्रमिक, जो आर्थिक दृष्टि से थोडे बहुत सम्पन्न थे, उन्होंने भी स्वतंत्र व्यवसायों की शुरूआत कर दी। ऐसे लोग जो न तो मजदूरी कर सकते थे और न बड़े उद्योग ही स्थापित कर सकते थे, उन्होंने व्यावसायिक कार्यों, दलाली ठेकेदारी इत्यादि करना प्रारंभ कर दिया। धीरे-धीरें सम्पूर्ण आर्थिक व्यवस्था पर इस मध्यम वर्ग का प्रभाव स्थापित हो गया।

समाज में नया वर्ग भेद
मध्यकालीन समाज तीन भागों में बंटा हुआ था- (i) पादरी, (ii) सामन्त और (iii) निम्न वर्ग। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप सामन्तों का स्थान पूंजीपतियों ने ले लिया। उद्योगों को सही रूप में चलाने के लिए वैज्ञानिकों कुशल शिल्पियों प्रबंधकों एवं अन्य कई प्रकार के सहायकों की आवश्यकता के कारण एक नये शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय हुआ। इसके अतिरिक्त औद्योगिक श्रमजीवी वर्ग सामाजिक जीवन का अंग बन गया। इस प्रकार समाज में तीन नये वर्गों का आविर्भाव हुआ- पूजीपति वर्ग, (ii) शिक्षित मध्यम वर्ग (iii) श्रमिक वर्ग।

श्रमिकों की दुर्दशा
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप बड़े-बड़े कारखानों की संख्या बढ़ती जा रही थी और उनमें हजारों श्रमिक एक साथ कार्य करते थे। इन मजदूरों को अमानुषिक एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में रहना और काम करना पड़ता था। इनके लिए शुद्ध हवा एवं पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी तथा कार्य करने की कोई कालावधि भी निर्धारित नहीं थी। उन्हें 16-16 घण्टे कार्य करना पड़ता था। मशीनों पर कार्य करते समय किसी मजदूर का अंग-भंग हो जाए या वह मर जाए, तो मिल-मालिक का कोई दायित्व नहीं था। स्त्रियों और बच्चों की दशा तो और भी खराब थी।

ग्रामीण जनसंख्या में कमीं
औद्योगिक क्रांति के दौरान कृषि क्षेत्र में उपयोग में आने वाली मशीनें भी तैयार हुई। अब कृषि का यन्त्रीकरण हो गया और जितने व्यक्ति पहले कृषि कर्म में लगे रहते थे, अब बेरोजगार हो गये, परिणामस्वरूप ग्रामीण जनता का बड़ा भाग औद्योगिक केन्द्रों की ओर पलायन को विवश हुआ। जहां 1700 ई. में ग्रामीण और शहरी जनता का अनुपात 80:20 था वहां 1900 ई. में यह अनुपात उल्टा हो गया अर्थात् 20:80 ।

जनसंख्या का स्थानान्तरण
औद्योगिक क्रांति के भौगोलिक और व्यावसायिक वितरण में भी बहुत परिवर्तन हआ। इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी में कई ऐसे क्षेत्र थे जो पहले उपेक्षित थे, जो अब कारखाने खुल जाने से या कोयला एवं खनिज का भण्डार मिल जाने से आबाद हो गये। दूसरी तरफ ऐसे क्षेत्र भी थे जो पहले कृषि प्रधान, कुटीर उद्योग व्यवस्था में महत्वपूर्ण थे, किन्तु अब उनका महत्त्व कम हो गया था, फलतः यहां से लोग अन्यत्र जा रहे थे। इस प्रकार इस युग में जनसंख्या का स्थानान्तरण हुआ।

संयुक्त पारिवारिक प्रथा का टूटना
औद्योगिक क्रांति ने प्राचीन काल से चली आ रही संयुक्त पारिवारिक प्रथा को छिन्न-भिन्न कर दिया। कारखाना पद्धति में श्रमिकों को निश्चित समय तक काम करना पड़ता था और इसलिए उन्हें अपने परिवार के सदस्यों से अलग-अलग रहना पड़ता था। काम पाने की इच्छा व यातायात के साधनों में विकास से श्रमिक गतिशीलता बढ़ी और संयुक्त परिवार प्रणाली का पतन आरम्भ हुआ। अब उसके स्थान पर स्वतंत्र छोटे-छोटे परिवार विकसित होने लगे।

अनैतिकता का विकास
औद्योगिक क्रांति ने भौतिक समृद्धि प्रदान की जिससे शराब और जुए का प्रचार बढ़ा।

जन-स्वास्थ्य की समस्या
औद्योगिक विकास के साथ-साथ शहरों में रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी खतरनाक रूप में प्रकट हुई। अधिक समय तक बिना विश्राम किये, अस्वास्थ्यप्रद दूषित वातावरण में काम करने, गन्दी बस्तियों में रहने तथा शुद्ध पेय जल की व्यवस्था न होने से अनेकानेक रोगों का प्रकोप बढ़ा। कारखानों से निकलने वाले जहरीले धएं से शहरों का वायुमण्डल दुषित हो गया। यातायात के साधनों ने भी इस प्रदुषण में सहयोग दिया। इन सभी के परिणामस्वरूप जनस्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा।

गन्दी बस्तियों की समस्या
औद्योगिक क्रांति ने गंदी बस्तियों के विकास में पर्याप्त योगदान दिया। श्रमिकों तथा निम्न आय के परिवार कारखानों के इर्द-गिर्द बहुत सटे हुए क्वार्टरों और झोपड़ों में बस गये। इस स्थिति ने गन्दी बस्तियों को जन्म दिया। इन बस्तियों में रहने वाले बच्चों पर वहां के वातावरण का घातक प्रभाव पड़ा और बड़े होने पर उनमें से बहुत से अपराधी बन जाते थे। धीरे-धीरें ये बस्तियां देश,समाज सभी के लिए एक समस्या बन गयी।

जीवन-स्तर में उन्नति
औद्योगिक क्रांति ने मानव समाज की सुख-सुविधा की वृद्धि में अद्भुत भूमिका निभाई है। तड़क-भड़क, चमक-दमक और भोग-विलास की वस्तुओं की मांग बहुत बढ़ गयी।

मनोरंजन के साधनों में वृद्धि
19वीं सदी के अंत से अच्छा मनोरंजन अधिक लोगों के लिए सुलभ हो गया। सिनेमा, रेडियो और टेलीविजन ने नये किस्म का मनोरंजन प्रदान किया जो दुनिया में सर्वसाधारण को सुलभ हुआ।

शिक्षा के प्रति चेतना का उदय
अब अधिकांश लोग न केवल बच्चों को शिक्षित बनाने की लालसा रखने लगे, अपितु वे स्वयं भी थोड़ा-बहुत पढ़ लिखकर अपने समय की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भाग लेने को अधिक उत्सुक हुए।

राजनीतिक परिणाम
औद्योगिक क्रांति ने राजनीतिक क्षेत्र को भी जबरदस्त रूप से प्रभावित किया। सामाजिक शोषण के विरूद्ध अधिनियम स्वतंत्र व्यापार नीति, उपनिवेशवाद की सफलता, मध्यम वर्ग का राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष तथा संसदीय सुधार, राजनीतिक सुदृढ़ता आदि इस क्राति के ही परिणाम है। संक्षेप में इनका वितरण इस प्रकार है

1. राजनीतिक स्थिरता
औद्योगिक क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण देन हैं-राजनीतिक स्थिरता। इस क्रांति से राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई। यातायात के साधनों एवं संचार व्यवस्था का विकास हुआ। इन सबने राजनीतिक सुदृढता को स्थायित्व प्रदान किया।

2. औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा
औद्योगिक क्रांति के कारण उत्पादन की मात्रा बढ़ने लगी तथा कच्चे माल की आवश्यकता हई। अतः कच्चे माल को प्राप्त करने के लिए उपनिवेशों की स्थापना तथा स्थापित उपनिवेशों की सुरक्षा के लिए सैनिक व्यवस्था आवश्यक थी। उत्पादित माल को खपाने  के लिए बाजारों की आवश्यकता थी और इस आवश्यकता की पूर्ति भी उपनिवेशों से ही सम्भव थी। अतः उपनिवेशों को स्थापित करने अथवा अविकसित देशों पर राजनीतिक नियंत्रण प्राप्त करने की प्रवृत्ति को बल मिला।

3. विदेश नीतियों में परिवर्तन
औद्योगिक क्रांति से पूर्व धर्म तथा जाति के आधार पर संघर्ष चलते थे, लेकिन इस क्रांति के बाद व्यापार-वाणिज्य मुख्य मुद्दा हो गया। औद्योगिक क्रांति से विदेश नीति महाद्वीपीय स्तर से हटकर अंतर्राष्ट्रीय हो गयी।

4. मध्यम वर्ग का राजनीतिक उत्कर्ष
इस क्रांति को सफल बनाने में तथा इसका लाभ उठाने में मध्यम वर्ग प्रमख रहा। इसके फलस्वरूप यह वर्ग धन तथा शिक्षा के क्षेत्र में मध्यकालीन सामन्तों से आगे निकल गया। लेकिन मध्यम वर्ग के पास कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे। प्रशासन में इसका कोई योग नहीं था जबकि राज्य की आय का बहुत बडा भाग यही वर्ग देता था। अत: यह वर्ग कुलीनों के बराबर का दर्जा प्राप्त करने का इच्छक हआ। परंतु आश्चर्य यह हैं कि क्रांति का प्रारंभ इंग्लैण्ड में हुआ, पर अमेरिका के मध्यम वर्ग को राजनीतिक अधिकार सर्वप्रथम मिलें।

5. श्रमिक संघर्ष
औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप श्रमिक वर्ग में चेतना जागृत हुई और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने में वे पीछे न रहे। परिणामस्वरूप 1802 ई. में कानून बना कि निर्धन एवं अनाथ बच्चों से सप्ताह में केवल 62 घण्टे काम लिया जाए। 1819 ई. में कानन बना जिसके अंतर्गत 9 वर्ष के बालकों से 12 घण्टे से अधिक काम लेना निषिद्ध किया गया। 1822 ई. में ये घण्टे और कम किये गये, इसके बावजूद श्रमिक संघर्ष बढ़ते रहे।

6. सामाजवादी विचारधारा का विकास
मजदूरों की स्थिति को सुधारने के लिए जो आन्दोलन किया गया वह आगे चलकर 'समाजवाद' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसका अर्थ है समाज में समानता स्थापित करना। समानता का अर्थ हैं आर्थिक एवं राजनीतिक समानता, अवसरों की समानता, समान कार्य के लिए समान वेतन आदि समानता के अंतर्गत आते हैं।

वैचारिक परिणाम
सम्पूर्ण संसार में मुक्त-व्यापार की विचारधारा लोकप्रिय हुई और इससे पूंजीवाद को बढ़ावा मिला।
मजदूरों की संख्या में वृद्धि हुई और उनमें जागरूकता से समाजवादी विचारधारा लोकप्रिय होने लगी।
महिलाओं में जागरूकता आने से नारीवाद का उत्थान हुआ।
मशीनीकरण के कारण पर्यावरणीय समस्याओं का जन्म हुआ और मानवजाति अपने पर्यावरण को लेकर सजग हुई।

अन्य देशो का औद्योगीकरण में पिछड़ जाने के कारण।

1. औद्योगिक क्रांति को संपादित करने वाला पहला देश इंग्लैंड था। अन्य देशों में भी इसके लाभों को देखते हुए प्रयत्न किये गये, लेकिन प्रयत्नों के परिणाम आशानुरूप नहीं हो पाये। इस संदर्भ में फ्रांस तथा हालैण्ड जैसे देशों के संदर्भ में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं कि यह देश औद्योगिक विकास के क्षेत्र में अग्रणी क्यों नहीं बन पाये या क्या कारण था कि यूरोप के अन्य देश प्रयल करने के बावजूद सफल नहीं हो पाये जबकि 18वीं सदी में फ्रांस और नीदरलैंड ब्रिटेन की तरह ही संपन्न थे।

2. कुछ हद तक तो अन्य देशों के पिछडने का कारण प्राकृतिक हैं। इंग्लैंड की तरह इनकी प्राकतिक स्थिति नहीं थी, इन देशों के जनसंख्या का घनत्व अधिक नहीं था, इससे व्यापार पर यातायात संबंधी असुविधाओं का अधिक प्रभाव पड़ता था, क्योंकि उत्पादित माल को खपत के लिए काफी दूर भेजना पड़ता था, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती थी। 18वीं सदी में सड़कें अधिक विकसित नहीं थी तथा जल यातायात विकसित करने के लिए भी आवश्यक परिस्थितियाँ नहीं थी। हॉलैण्ड को छोड़कर अन्य देशों के समुद्री तट अपेक्षाकृत छोटे थे तथा अधिकतर नदियों में पानी वर्ष भर नहीं रहता था। औद्योगिक विकास के लिए अन्य साधन भी ब्रिटेन की तरह उपलब्ध नहीं थे। फ्रांस तथा बेल्जियम को कपड़ा कारखानों के लिए बढ़िया ऊन विदेशों से मंगानी पड़ती थी। कोयले के अधिक उत्पादन की ओर भी ध्यान नहीं दिया गया था क्योंकि लकड़ी के प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने के कारण ये देश उत्पादक शक्ति के परम्परागत तरीकों पर ही निर्भर करते थे।

3. राजनीतिक परिस्थितियों का भी उद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ा क्योंकि जर्मनी, इटली, बेल्जियम, छोटे-छोटे राज्यों, डचियों, धर्म प्रांतों इत्यादि में बंटे हुए थे जहाँ तरह-तरह के कानून, नियम तथा कर थे। फ्रांस भले ही राजनीतिक दष्टि से संगठित था लेकिन आर्थिक क्षेत्र में खण्डित था. स्थान-स्थान पर चुंगी चौकियाँ थी, जिसके परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं तक पहुँचने तक इन वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती थी।

4. यूरोपीय देशों में सामाजिक स्थिति ने भी उद्योगों के मार्ग में बाधा डाली। सभी प्रदेशों में सम्पत्ति तथा आय के बँटवारे में बहुत सारी असमानताएं थी जिसका लोगों की क्रय शक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता था। संपन्न वर्ग विलासिता और ऐश्वर्य की वस्तुओं की मांग करते थे। यह मांग इतनी सीमित रहती थी कि औद्योगीकरण को बढ़ावा नहीं दे सकती थी। साधारण जनता की आर्थिक स्थिति ब्रिटेन से कहीं अधिक दयनीय थी। किसानों को राज्य, सामंत तथा चर्च तीनों को कर देने पड़ते थे जिससे उसकी क्रय शक्ति कम हो जाती थी। इस कारण वे आवश्यकता की वस्तुओं का उत्पादन स्वयं करने का प्रयास करते थे तथा मंडी पर अधिक निर्भर नहीं थे। इससे उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बहुत सीमित रह जाती थी तथा इन्हें बनाने के लिए उद्यमियों को प्रोत्साहन नहीं मिल पाता था।
दुसरे ब्रिटेन की तरह सामाजिक परिवर्तन भी नहीं हो पाया था। फ्रांस में व्यवसाय को सामंत एक अप्रतिष्ठित कार्य समझते थे। लुई 13वां के समय अभिजात वर्ग को व्यापारिक क्षेत्र में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयत्न किये गये थे लेकिन सामाजिक मान्यताओं के कारण ये प्रयत्न सीमित तथा अस्वीकार्य रहा। जर्मन राज्यों में सामंतो, बुर्जुआ तथा कृषकों के मध्य सीमा रेखा थी तथा इन्ह एक दूसरे का व्यवसाय अपनाने को हतोत्साहित किया जाता था। जो लोग उद्योग स्थापित करना भी चाहते था उन्हें आवश्यक पूंजी नहीं मिल पाती थी। पूंजी का निवेश मुख्यतः भूमि खरीदने में किया जाता था। अतः इन देशों के लोग अपनी आय का प्रयोग व्यवसाय की वृद्धि में न करके भूमि, ओहदा तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करने में करते रहे।

5. फ्रांस, नीदरलैण्ड तथा जर्मनी में व्यवसायिक फर्म कछ विशेष घरानों से संबंध रखती थी इस कारण वे परम्परा को परिवर्तन से कहीं अधिक महत्व देती थी, उन्हें अधिक मात्रा में उत्पादन की अपेक्षा उत्कृष्टता बनाये रखने की अधिक चिंता रहती थी। नयी तकनीक अपनाकर जोखिम उठाने की परंपरा भी बहुत कम रहीं। ये घराने बाहर से पंजी लेने में भी झिझकते थे, इन सबका औद्योगिक विस्तार पर विपरीत प्रभाव पड़ा इसके अतिरिक्त ब्रिटेन की तुलना में इन क्षेत्रों की साधारण जनता भी कंजूसी से खर्च करती थी, अपेक्षाकृत संपन्न लोग भी आय का कुछ ही भाग खर्च करते थे, इसका कारण व्यवहारिक था। ब्रिटेन में काफी समय से गृह युद्ध नहीं हुआ था तथा सरकार द्वारा जबरन पूंजी व सम्पति जब्त करने का डर भी कम था। जबकि अन्य जगह पर ऐसा डर बना हुआ था जिसके कारण लोगों को अधिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ता था। अतः यह स्वाभाविक हो जाता था कि वो मुसीबत के दिनों के लिए बचत करें।

6. इन सबके अतिरिक्त कुछ तत्कालीन घटक भी औद्योगीकरण के मार्ग में बाधा बने। ब्रिटेन के औद्योगिक विकास का यूरोपीय देशों पर सीधा प्रभाव पडा, जहाँ भी उद्योगों को संरक्षण प्राप्त नहीं था, वहाँ ब्रिटेन में बने माल पहुँचने के कारण स्थानीय उद्योग धंधे नष्ट होने लगे। फ्रांस के क्रांतिकारी युद्धों से लेकर नेपोलियन के पतन तक युद्धों का काल छाया रहा, जिसके फलस्वरूप मानवशक्ति व पूंजी का नाश, व्यापक सामाजिक चिंताओं, राजनीतिक अनिश्चितता, व्यापार में बाधा आदि स्थितियाँ उत्पन्न हो गयी। जिनके चलते औद्योगिक विकास हो पाना संभव नहीं था।

इंग्लैंड का सर्वहारा क्रांति से बचने का कारण

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या कारण थे जिससे प्रथम औद्योगिक देश सर्वहारा क्रांति की संभावना से बच गया जबकि कार्ल मार्क्स ने यह भविष्यवाणी की थी कि सर्वहारा क्रांति उस देश में होगी जो सबसे पहले औद्योगिकृत होगा और जहाँ पूँजी एवं श्रम का सर्वाधिक विरोधाभास होगा। इस प्रक्रिया से सर्वप्रथम इंग्लैंड गुजरा था इसके बावजूद वहाँ सर्वहारा क्रांति नहीं हुई 19वीं सदी के प्रारंभ में भले ही ब्रिटेन अन्य देशों की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक था, तथापि संसद में भूस्वामियों का ही नियंत्रण और वर्चस्व था, जिसमें सुधार की आवश्यकता थी, 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में ब्रिटिश राजनीतिक जीवन को प्रभावित करने वाले दो महत्वपूर्ण कारक थे, फ्रांस की क्रांति और औद्योगिक क्रांति। फ्रांस की क्रांति ने यह साबित कर दिया कि शक्ति मध्यवर्ग और निम्न वर्ग के पास है, साथ ही औद्योगिक क्रांति ने मध्यवर्ग को और भी अधिक शक्तिशाली बना दिया तथा एक नये वर्ग के रूप में निम्न वर्ग को जन्म दिया। फ्रांसीसी क्रांति के नारे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व न निम्न वर्ग की अपेक्षाओं को जगा दिया, जिसका प्रभाव इंग्लैण्ड में भी महसूस किया गया। नगरीकरण की बढ़ती प्रक्रिया से समाज में अब ऊँच-नीच तथा जन्म के आधार पर भिन्नताओं को स्वीकार करने अथवा सम्मान देने की स्थिति अब समाप्त हो चुकी थी, राजनीतिक क्षेत्र में भी परिवर्तन दिख रहे थे, जैसे-जानकार जनमत का विकास, समाचार पत्रों की संख्याओं में वृद्धि, दबाव गुट का उदय, दासता उन्मूलन के प्रति चेतना स्वतंत्र व्यापार के प्रति समर्पण आदि।

इसके अतिरिक्त इस काल में कई विचारधाराएं एवं संगठन विकसित होने लगे थे और उन्होने ब्रिटिश जीवन को अपने ढंग से प्रभावित किया। इस काल में उपयोगितावादी विचारधारा, समाजवादी विचारधारा, ऑक्सफोर्ड विचारधारा, ईसाई समाजवादी विचारधारा सभी ब्रिटिश जनमानस को प्रभावित कर रहे थे। जेम्स मिल ने उपयोगितावादी विचारधारा पर बल दिया। मिल का यह मानना था कि किसी भी संस्था अथवा विचारधारा का महत्त्व उसकी उपयोगिता के आधार पर देखा जाना चाहिए। इसका उद्देश्य होना चाहिए- अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख। इसी प्रकार राबर्ट ओवेन, ओकानेर आदि ने समाजवादी विचारधारा पर बल दिया और पूंजी तथा श्रम की समस्याओं को उजागर किया। न्यूमैन जहाँ आक्सफोर्ड विचारधारा से संबंद्ध थे, वहीं चार्ल्स किसले तथा विलियम विवरफोर्स इसाई समाजवादी विचारधारा से संबद्ध रहे। इन विचारधाराओं का ब्रिटिश राजनैतिक एवं सामाजिक जीवन पर प्रभाव देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए 1809 ई० में ब्रिटेन में दास व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।

इस काल में मध्यवर्ग की कुछ प्रमख मांगे थी और इनकी आकांक्षाएं बढ़ गयी थी, इस काल के ब्रिटिश राजनैतिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण था-कुलीन वर्ग एवं मध्यवर्ग के हितों में क्रमिक सामंजस्य। यही वजह है कि ब्रिटेन में फ्रांस की तरह एक रक्तपूर्ण क्रांति की संभावना टल गई। मध्यवर्ग की पहली महत्त्वपूर्ण मांग थी ब्रिटिश संसद में मताधिकार का विस्तार और मध्यवर्ग के दबाव में 1780ई० में एक बिल लाया गया, लेकिन यह पारित नहीं हो सका । अंत में 1832 ई० में एक संसदीय अधिनियम लाया गया, जिसके अनुसार 6 लाख लोगों को मताधिकार प्रदान किया गया। मध्यवर्ग की दूसरी महत्वपूर्ण मांग थी- सरकारी व्यय में कमी, कर की राशि में कटौती और मुक्त व्यापार का सिद्धांत। सर्वप्रथम एडम स्मिथ ने मुक्त व्यापार की बात उठाई थी, आगे काकटेन, जेम्स मिल आदि विचारकों ने भी मुक्त व्यापार पर बल दिया। इसी संदर्भ में मध्यवर्ग का बल अनाज कानून के विरोध पर था। यह अनाज कानून 1815 ई० में कुलीन वर्ग को प्रसन्न करने के लिए लाया गया था। व्यापक विरोध को देखते हुए 1846 ई में अनाज कानून को समाप्त कर मुक्त व्यापार को अपना लिया। सबसे बढ़कर इस अनाज कानून को रद्द करने में जमींदार समर्थक टोरी दल ने ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इसका प्रतीकात्मक अर्थ कुलीन वर्ग एवं मध्य वर्ग के हितों में क्रमिक सामंजस्य लाया गया परंतु मजदूरों की मांग के प्रति सरकार का रूख आरंभ से ही कठोर रहा, मध्यवर्ग जैसा झुकाव नहीं देखा गया। नेपोलियन की पराजय के उपरांत जहाँ सम्पूर्ण यूरोप के देश खुशियाँ मना रहे थे, वहीं बर्मिघम, लंकाशायर और मैनचेस्टर के श्रमिकों के लिए यह बेरोजगारी तथा आर्थिक परेशानियाँ लेकर ही आया था। 1816 ई० में मेनचेस्टर से बनकरों का एक समूह अपनी कछ मांगों को लेकर लंदन तक मार्च किया, जिसे ब्लैंकेटियर्स मार्च के नाम से जाना जाता हैं। लेकिन सरकार द्वारा इस भीड़ पर हिंसात्मक एवं बलपूर्वक कार्यवाही द्वारा नियंत्रण स्थापित कर लिया गया। भूमि की फिर से बँटवारे की मांगे करने वाले स्पेन्स के विद्रोह को भी राजद्रोह मानकर कुचल दिया गया। 1819 ई० में पीटर लू हत्या कांड हुआ, वस्तुतः लंदन के पीटर लू नामक स्थान पर श्रमिकों की एक भीड़ इकट्ठी हुई लेकिन निहत्थे लोगों पर गोली चलाई गयी, जिसमें 1100 लोग मारे गये तथा 400 से अधिक लोग घायल हो गये। जब 1830 और 1840 के दशक में पूरे यूरोप में क्रांतियाँ हो रही थी उस समय इंग्लैंड में श्रमिक असंतोष की अभिव्यक्ति चार्टिस्ट आंदोलन के रूप में हुई। इसमें प्रमुख कार्यक्रम था अधिक से अधिक हस्ताक्षरों से अनुमोदित श्रमिकों की मांग को ब्रिटिश संसद में पहुँचाना। इस संदर्भ में 1839 ई० में 10 लाख लोगों के हस्ताक्षर युक्त चार्टर और 1842 में 30 लाख लागों के हस्ताक्षर युक्त चार्टर पेश किया गया। लेकिन सर्वप्रमुख आंदोलन 1848 ई० में देखा गया जिसमें 50 लाख हस्ताक्षर संसद में प्रस्तुत किये गये। लेकिन यह आंदोलन अपनी मौत से स्वयं समाप्त हो गया। क्योंकि चार्टिस्ट लोग मजाक एवं मनोरंजन का विषय बन गये। इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण था जाली हस्ताक्षर करना।

श्रमिकों मांगों एवं समाजवादी आंदोलन का इंग्लैण्ड में असफल हो जाने के पीछे एक प्रमुख कारण था राज्य का अधिकाधिक लोककल्याण की ओर उन्मुख होना तथा कालांतर में चार्टिस्टों की छः मुख्य मांगों में से संसद का वार्षिक चुनाव होने की मांग को छोड़कर अन्य पांचों मांगे जैसे प्रत्येक व्यक्ति को मताधिकार प्राप्त हो, गुप्त मतदान की प्रथा हो, निर्वाचन क्षेत्र समान हो हाउस ऑफ कामन्स की सदस्यता के लिए सम्पत्ति संबंधी शर्तो की समाप्ति हो, संसद के सदस्यों को वेतन दिया जाये, सरकार द्वारा मान लिये गये।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जब सरकार द्वारा असंतोष को दूर करने के लिए अनेक सुधार किये गये तो श्रमिक वर्ग की आर्थिक स्थिति भी सुधरी तथा असंतोष भी कम हआ। चार्टिस्टों का नरमपंथी वर्ग क्रमिक सुधारों की प्रगति से संतुष्ट होने लगा और राजनीतिक आंदोलन में उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं रहीं। एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि तत्कालीन सरकार निरंकुश और स्वेच्छाचारी नहीं थी वहाँ लोकप्रिय शासन कायम था जिससे चार्टिस्टों को व्यापक पैमाने पर राष्ट्रीय सहानुभूति प्राप्त नहीं हो सकी, क्योंकि उन्हें लोकमत नहीं मिल सका। चार्टिस्ट आंदोलन के पश्चात श्रमिकों की प्राथमिकताएं बदल गई तथा वे राजनीतिक मांगों से आर्थिक मांगों की ओर उन्मुख हो गये। फिर 19वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन एक बार फिर साम्राज्यवादी प्रसार की ओर उन्मुख हुआ। इस साम्राज्यवादी प्रसार से प्राप्त लाभ का एक अंश श्रमिकों को मिलने लगा, अतः श्रमिक अपेक्षाकृत संतुष्ट हुए तथा कुलीन श्रमिकों का एक समूह उत्पन्न हो गया जो क्रांति के उद्देश्य से दूर हटता चला गया। दूसरे अब इंग्लैंड को शोषण करने के लिए उपनिवेशों में एक नया सर्वहारा मिल चका था अतः कार्ल मार्क्स की यह भविष्यवाणी गलत सिद्ध हो गयी कि सर्वप्रथम सर्वहारा क्रांति वहां होगी जो सबसे अधिक औद्योगीकृत देश होगा और जिसके कारण वहाँ पूंजी व श्रम के बीच सर्वाधिक विरोधाभास होगा।

अमेरिका का औद्योगीकरण

1. प्रारंभ मे अमेरिका को अपने औद्योगीकरण में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पूँजी का अभाव, दक्ष व कुशल श्रमिकों की कमी, यातायात के अविकसित साधन और मशीनों संबंधी ज्ञान का अभाव आदि औद्योगीकरण के मार्ग में प्रमुख बाधाएँ थी। किंतु कालांतर में हुई जनसंख्या की वृद्धि ने श्रमिकों के अभाव को समाप्त कर दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका में औद्योगिक संवृद्धि का आधार व्यापक प्राकृतिक स्रोत, एक बड़े क्षेत्र में स्थापित राजनीतिक एकता में स्थायित्व तथा सरकारी संरक्षण एवं प्रोत्साहन ने तैयार किया। अमेरिका के औद्योगीकरण की पता यह है कि उसने विभिन्न क्षेत्रों में विकास की ऊपर से नहीं ओढा अपित विकास अधिकांशतः स्वतःस्फूर्त था। गहयुद्ध से पर्व अमेरिका एक औद्योगिक राष्ट्र बन चुका था और गहयुद्ध के बाद विकास तीव्र हुआ तथा बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में अन्य देशों की तुलना में इसका राष्ट्रीय उत्पादन सबसे अधिक हो गया।

2. जनसंख्या की वृद्धि के कारण अमेरिका के आंतरिक बाजार का विकास हुआ जहाँ अनाज, धान, सब्जियाँ, व माँस की खपत बढ़ गई। दूसरी ओर यूरोप के बाजार में अमेरिकी खाद्यान्न एवं मांस की मांग बढ़ गई। बढ़ती हुई कृषि उपज की माँग के कारण कृषि के विज्ञानीकरण व यंत्रीकरण की आवश्यकता हुई। तकनीकी में सुधार ने कृषि का उत्पादन बढ़ाया। खाद का प्रयोग किया जाने लगा फसलों को बढ़ाने हेतु फसल चक्र तकनीक का प्रयोग शुरू हुआ, फसल कटाई मशीन का अविष्कार हुआ, खाद्य पदार्थो के परिरक्षण एवं पैकेजिंग प्रणाली का विकास हुआ, पशुपालन में नस्ल का ध्यान रखा जाने लगा। इसके फलस्वरूप अमेरिका के कृषि एवं पशुपालन का काया पलट हो गया। समृद्ध कृषि ने जहाँ औद्योगिकीकरण को आधार प्रदान किया वहीं कृषि क्षेत्र से जुड़े कई उद्योग पनपने लगे।

3. औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक होता हैं परिवहन और संचार व्यवस्था का विकास जिससे एकीकृत बाजार व्यवस्था का विकास हो तथा देश के विभिन्न उत्पादन केंद्रों और प्राकृतिक स्रोत वाले स्थानों को जोड़ा जा सके। इंग्लैंड का अनुकरण कर पक्की सड़कों तथा नहरों का जाल बिछाया गया परंतु भाप इंजन से चलने वाली यात्री नावों का विकास देशी विकास था यातायात विकास में प्रथम चरण में पक्की सड़कों और उन पर राष्ट्रीय चुंगी चौकियों का निर्माण किया गया। फिर नदियों तथा नहरों के विकास को प्राथमिकता दी गई तत्पश्चात भाप का ईजन तथा जल यातायात का विकास हुआ। रेलों का विकास यद्यपि सड़क व जल मार्गो के पश्चात हुआ परंतु रेलमार्गों के विकास ने क्रांतिकारी परिवर्तन लाया। अमेरिका के विभिन्न क्षेत्र रेलवें के विकास से आर्थिक संगठन में बँधे। रेल मार्ग के निर्माण में पूँजी निवेश से हुए लाभ से प्रेरित होकर पूँजीपतियों ने कई अन्य क्षेत्रों में भी धन लगाना शुरू किया और इस प्रकार आर्थिक क्रियाकलापों में तेजी आई। 1840 के दशक में जहाजरानी के क्षेत्र में भी अमेरिका ने काफी प्रगति की और ऐसे जहाज बनाये जो अन्य जहाजों की अपेक्षा तीव्र गति से चलते थे। 1860 के दशक में अमेरिकी व्यापारी बेड़े इंग्लैंड को टक्कर देने की स्थिति में आ गये जहाजरानी के विकास ने अमेरिका के वैदेशिक व्यापार को प्रोत्साहित और प्रसारित किया। इस काल में संचार व्यवस्था का विकास टेलीग्राफ लाईन के विकास में देखा जा सकता है। 1837 में सेम्यूल एफ.बी. मौर्स के द्वारा प्रथम सफल टेलीग्राफ लाईन का विकास किया गया। प्रथम लाईन का निर्माण वाशिंगटन और बाल्टीमोर के बीच किया गया।
यातायात व्यवस्था के विकास से सयुंक्त राज्य अमेरिका में विनिर्माण उद्योग का विकास संभव हो पाया। रेलवे एवं नहर मार्गों के विकास के फलस्वरूप माल भाडे़ की दर में कमी आयी और इसके पश्चात दूरस्थ क्षेत्रों से कच्चे माल को प्राप्त करना तथा तैयार माल को दूरस्थ क्षेत्रों तक भेजना संभव हो सका। यातायात व्यवस्था के विकास के साथ एक एकीकृत बाजार का विकास हुआ तथा विभिन्न क्षेत्रों ने कुछ विशिष्ट प्रकार के उत्पादों में विशेषज्ञता हासिल कर ली।

4. अमेरिका ने सूती वस्त्र उद्योग में काफी विकास किया। इस क्षेत्र में मशीनीकरण के नये तरीके विकसित करने के लिए कई कदम उठाये गये। कार्टराइट ने जिस करघे का आविष्कार किया उसमें कई प्रकार के सुधार हुये। 1813 में वाल्मथ नामक स्थान पर बोस्टन मैनुफैक्चरिंग कंपनी स्थापित की गई। इसकी कार्य प्रणाली और संगठन बाद में वाल्मथ पद्धति के नाम से जाना जाने लगा। यह एक ऐसी समन्वित प्रक्रिया थी, जिसके अनुसार कपड़ा तैयार होने के सारे काम जैसे कढ़ाई, बुनाई, रंगाई और छपाई एक ही सयंत्र में पूरे किये जा सकते थे। इन आविष्कारों व सुधारों के फलस्वरूप कपड़ा उद्योग विकसित हुआ और 1860 के दशक तक यह संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण उद्योग बन गया। दक्षिणी न्यू इंग्लैंड, पेन्सिलवेनिया आदि राज्यों में वस्त्र उद्योग का काफी विकास हुआ। इस उद्योग के विकास में जनसंख्या वृद्धि, प्रशुल्क सुरक्षा और उन्नत तथा सस्ते परिवहन व्यवस्था महत्त्वपूर्ण कारक रहे।

5. औद्योगीकरण हेतु लौह एवं इस्पात उद्योग का विकास किया जाना आवश्यक था। फेडरिक नामक व्यक्ति ने लौह अयस्क से लोहे को पिघला कर अलग करने की एक नई विधि निकाली। विलियम केली नामक व्यक्ति ने इस्पात निर्माण की नई विधि खोज निकाली लौह उद्योग के विकास ने औद्योगीकरण को प्रोत्साहन दिया व विभिन्न प्रकार की फैक्ट्रियाँ स्थापित की गई। अमेरिका के इस्पात उद्योग के विकास में एण्ड्र कारनेगी नामक व्यक्ति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने पेंसिलवेनिया में इस्पात का जो कारखाना लगाया, वह देश का सबसे बड़ा कारखाना था।

6. कोयले एवं लोहे के पश्चात एक महत्त्वपूर्ण खनन उत्पाद पेट्रोलियम था। यद्यपि बीसवीं सदी में अंतर्दहन इंजन के विकास से पूर्व इसका यह महत्त्व स्थापित नहीं हुआ था। पैट्रोलियम उत्पादन एवं व्यवसाय का संगठनकर्ता जाँ डी. रॉकफेलर था। सर्वप्रथम व्यवसायिक स्तर पर तेल उत्पादन पश्चिमी पेन्सिलवेनिया में 1859 में इ.एल.ड्रेक के द्वारा किया गया। 1870 में रॉकफेलर एवं उसके सहयोगियों ने मिलकर ओहियो में स्टैण्र्ड ऑयल कंपनी का गठन किया।

7. बड़े-बड़ें कारखानों का निर्माण साझेदारी में किया गया। ये साझेदारियाँ आगे चलकर निगमों में परिवर्तित हो गई। उद्योगों के शेयर्स अधिक से अधिक लोगों को बेचे जाने लगे। अधिकांश पूँजी व्यापारियों व महाजनों द्वारा लगाई जो अपने लाभ को पुनः उद्योग में लगाते थे। अमेरिकी उद्योग की सफलता के कारण इंग्लैंड व यूरोप के व्यापारियों ने अपनी पूँजी अमेरिकी उद्योगों में निवेश करना प्रारंभ किया, फिर अमेरिका में स्टॉक बाजार अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग बन गया और अर्थिक उन्नति को बढ़ावा दिया।

रूस में औद्योगीकरण
1. इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका की तुलना में रूस में औद्योगीकरण काफी बाद में प्रारंभ हुआ। इसके पिछड़ने के कारण थे-कृषि दासता की उपस्थिति, मुद्रा प्रणाली तथा पूँजी का अभाव, किसानों के गरीब होने के कारण आंतरिक मांग का बहुत सीमित होना आदि। रूस के पास लोहे और कोयले के प्रचुर भंडार थे परंतु पूंजीगत कमी एवं तकनीकी कमी के कारण औद्योगिक विकास नहीं हो पा रहा था। 1890 के दशक तक भूमिधर अभिजात वर्ग औद्योगीकरण के बिल्कुल खिलाफ था। परंतु 1890 तक आकार स्थिति परिवर्तित होने लगी थी। रूस के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में समाजिक संबंधों, शिक्षा, तथा उद्योगों के विकास मे गुणात्मक परिवर्तन आये। क्रीमीयाई युद्ध में पराजय एवं सैन्य शक्ति की असफलता ने रूसी जनता और शासक वर्ग दोनों को प्रभावित किया और उन्हें आर्थिक दुर्बलता का एहसास हुआ इस समय तक कृषि दासता का अंत कर दिया गया था जो इसी एहसास का परिणाम था। अब उद्योगों के लिए श्रमिक उपलब्ध थे।

2. रूसी राज्य ने इस क्षेत्र में वो भूमिका निभायी, जो भूमिका पश्चिम में मुख्यतः पूँजीपतियों ने निभाई थी जैसे निवेश उपभोग और उत्पादन का जिम्मा। रूस के पास एक तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या और समृद्ध प्राकृतिक संसाधन थे लेकिन यहाँ के किसानो के गरीब होने के कारण आंतरिक मांग बहुत सीमित था। व्यक्तिगत मांग के कमजोर होने के कारण राज्य को ही प्रमुख खरीददार की भूमिका निभानी पड़ती थी। राज्य ने इसके लिए कई कदम उठाये मसलन भारी उद्योगों से राज्य ने एक मुश्त खरीददारी की उन्हें मुनाफा और ऋण की गारंटी दी। विदेशी पूँजीपतियों को पूँजी लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। 1880 के पश्चात् फ्रांसीसी और ब्रिटिश कम्पनियों की सहायता से कोयला, लोहा और पेट्रोलियम का उत्पादन बढ़ गया। बैंकिंग और रेलवे के विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया गया।

3. रूसी औद्योगीकरण में राज्य की प्रभावी भूमिका के बारे में गेरशेनक्रोन के विचारों का काफी प्रभाव रहा। गेरशेनक्रोन ने रूसी परिस्थितियों के अनुसार औद्योगिक विकास का मॉडल सुझाया था। गेरशेनक्रोन मॉडल ने इस अवधारणा को अस्वीकार कर दिया कि प्रथम या अग्रणी औद्योगिक देश के अनुरूप ही औद्योगिक विकास के मार्ग का अनुसरण किया जाय। इसका मानना था कि कुछ मूलभूत कारकों की अनुपस्थिति में भी औद्योगीकरण संभव हैं बशर्ते राज्य की सक्रिय भागीदारी हो। गेरशेनक्रोन मॉडल के अनुसार अगर एक बार औद्योगिक विकास की प्रकिया अपने उछाल पर पहुँच जाता हैं तो राज्य की सक्रिय भूमिका समाप्त हो जाती है और गैर-राज्य उद्यमों और पूँजी का विकास होता हैं तथा औद्योगीकरण अपने बल पर चलता रहता हैं।

4. निवेश की समस्या के निदान हेतु राज्य ने स्वयं निवेशकर्ता, उत्पादक तथा खरीदार की भूमिका निभाई। निवेश के लिए धन की कमी को विदेशी कर्ज के माध्यम से पूरा किया गया साथ ही किसानों पर अत्यधिक कर लगाया गया। जार निकोलस के वित्त एवं उद्योगमंत्री सर्जेई विट्टे के काल में औद्योगिक क्षेत्र में काफी उन्नति हुई। 1893 ई. में विट्टे को वित्तमंत्री के पद पर नियक्त किया गया। विटटे का कार्यक्रम भारी कराधान. विदेशी कर्ज तथा बडे एवं भारी उद्योगों की स्थापना पर आधारित था इसका सकारात्मक परिणाम यह रहा कि रूस विश्व का चौथा बड़ा औद्योगीकृत राष्ट्र बन गया। विट्टे का उद्धेश्य निजी उद्यमों को प्रोत्साहित करना और राज्य पूंजी के व्यापक कार्यक्रम के जरिए रूस के समद्ध प्राकतिक संसाधनों का दोहन करना था। घरेलू स्रोत्रों की अपर्याप्तता के कारण विदेशी पूँजी की जरूरत महसूस की गई. अतः रूस में विदशी पूंजी का तीव्र गति से प्रवेश हुआ और प्रथम विश्वयद्ध प्रारंभ होने के समय रूस यूरोप का सबसे बड़ा कर्जदार देश बना गया। राज्य ने आधे से ज्यादा विदेशी निवेश का उपयोग रेलवे के विकास के लिए किया बाकी निवेश उद्योगों खासकर खनन, धात् कर्म उद्योगों, तेल उद्योग, बैंकिंग और व्यापार के क्षेत्र में हुआ। रेलवे के विकास ने भारी उद्योगों के विकास और कृषि के वाणिज्यीकरण में प्रमख भूमिका निभाई।

5. रूस के औद्योगीकरण की कई कमजोरियाँ या सीमाएँ भी देखी जा सकती हैं। रूस के औद्योगिक विकास में आर्थिक संवृद्धि की दर में काफी उतार-चढाव रहा स्थिरता नहीं दिखाई दी। क्षेत्रीय विषमताएँ भी काफी अधिक रहीं। कुछ ही क्षेत्रों में उद्योगों का संकेद्रण देखने को मिला। उद्योगों में आधुनिक तकनीक का विकास नाम मात्र के बराबर था। विट्टे के कार्यक्रम से कृषक एवं कुलीन असंतुष्ट रहे क्योंकि औद्योगीकरण के लिए कृषि क्षेत्र का व्यापक शोषण हुआ। औद्योगीकरण की प्रक्रिया में राज्य के अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण मध्यवर्ग के लोग नाराज हो गये। राज्य के अंतर्गत लाये जाने वाली औद्योगीकरण ने रूस में एक सशक्त मध्यमवर्ग को जन्म नहीं दिया। सर्गेई विट्टे की व्यवस्था में राज्य नीतियों ने कृषि पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया और अपना पूरा निवेश उद्योगों के क्षेत्र में केंद्रित किया औद्योगिक क्षेत्र में भी उपभोक्ता उद्योगों की अपेक्षा भारी उद्योगों में ही अधिक निवेश किया गया और ज्यादा संरक्षण दिया गया। व्यापक प्रसार के बावजूद अन्य विकसित देशों के मुकाबले रूसी रेलें अपर्याप्त व अविकसित ही थी। भू-क्षेत्र व जनसंख्या के आनुपातिक आधार पर रूस रेल विकास के मामले में यूरोप में सबसे पिछडा हुआ ही था। सडकों का भी बुरा हाल था। कम ही सडको पक्की थीं। सुधारों का लाभ भी समाज के छोटे से वर्ग को ही हुआ था व अधिकांश नागरिक अत्यंत ही दयनीय निर्वाह परिस्थितियों के कारण बहुत ही असंतुष्ट थे। यह असंतोष शहरी मजदरों व ग्रामीण किसानों में और भी ज्यादा गहरा था।

जर्मनी का औद्योगीकरण

1. जर्मनी में औद्योगिक क्रांति का प्रसार बाद में हुआ। वस्तुत: प्रारंभ में औद्योगीकरण के मार्ग मे कई बाधाएँ थीं
जैसे-
  • जर्मनी 18वीं सदी में लगभग 300 छोटी-छोटी राजनीतिक इकाईयों में विभक्त था। 
  • उद्योगों में उत्पादन की गिल्ड पद्धति तथा घरेल पद्धति प्रचलित थी।
  • जर्मन राज्यों में उत्पादकों को सुगठित बाजार भी प्राप्त नहीं था क्योंकि हर राज्य अपने कर और शुल्क लगाता था और एक राज्य को दूसरे राज्य में माल ले जाने के लिए शुल्क अदायगी करनी पड़ती थी।
  • इसके अतिरिक्त पूर्वी हिस्से में सर्फडम या कृषि दासता विद्यमान थी जिसके कारण अपेक्षित तथा आवश्यक श्रमिकों का अभाव था।
  • निरंतर युद्धों के कारण एक बड़ी जर्मन जनसंख्या नष्ट हो चुकी थी। इसके साथ-साथ जर्मनी में पितृसत्तावादी कानून प्रचलित थे, जिसके अनुसार एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जनसंख्या प्रवास पर पाबंदी लगाई गई थी। इस कारण भी अपेक्षित श्रमिकों की कमी पड़ गई। साथ ही पितृसत्तावादी कानून श्रेणी व्यवस्था का ही समर्थन करते थे।
  • जर्मनी के पास जहाज और बाजार का अभाव था और देश में यातायात की दशा भी अच्छी नहीं थी। संचार व्यवस्था बिल्कुल कम विकसित थी।
  • जर्मनी में ऐसा कोई पूंजीपति वर्ग नहीं था, जो उद्योगों में अपना धन लगा सकता जैसा कि ब्रिटेन में मौजूद था। ब्रिटेन से भिन्न यहाँ भी फ्रांस की ही तरह पूँजी की आपूर्ति केवल शक्तिशाली व्यापारियों और उत्पादकों के धनों तक सीमित थी और पूजीं की उपलब्धता के लिए कोई व्यापक व्यवस्था मौजूद नहीं थी।

2. परंतु उपर्युक्त बाधाओं के बावजूद 19वीं सदी में जर्मनी के औद्योगीकरणा का मार्ग प्रशस्त हो गया। वस्तुतः प्रशा जर्मनी में एक महत्वपूर्ण राज्य था प्रशा ने आर्थिक मामलों के निर्धारण के लिए व्यापारियों को ही सरकारी सेवा में नियुक्त करना प्रारंभ किया। 1815 ई. में वियना कांग्रेस ने प्रशा को कुछ महत्त्वपूर्ण कोयला एवं लोहा उत्पादक क्षेत्र प्रदान किया था जिसके परिणाम स्वरूप प्रशा में औद्योगीकरण को बढ़ावा मिला। एक प्रकार से देखा जाये तो इसके पूर्व ही नेपोलियन बोनापार्ट ने जर्मनी की आर्थिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर दिया। नेपोलिन ने जर्मन राज्यों को अपेक्षाकृत 39 बड़े राज्यों में संगठित कर दिया, करारोपण व्यवस्था में समानता लाई। वैसे तो नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था ने जर्मनी की अर्थव्यवस्था को क्षतिग्रस्त किया। परंतु एक प्रकार से लाभ भी मिला, क्योंकि जर्मन क्षेत्र में ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार के कारण देशी उत्पादों को प्रोत्साहन मिला।

3. 1800 के दशक में सर्फो या कृषि दासों की मुक्ति, 1830 के दशक में जॉलवरीन या चुंगी संघ की स्थापना, 1850 के दशक में फ्रांसीसी तरीके के संयुक्त स्टॉक बैंकों के निर्माण के बाद उपर्युक्त वर्णित समस्याएँ अपने आप कम हो गई और औद्योगिक विकास की अनुकूल दशा तैयार हो गई। 19वीं सदी के मध्य तक बर्लिन, हैमबर्ग, प्राग, वियना और लाइबेख को रेल लाईनों से जोड़ दिया गया। प्रशा में निजी क्षेत्र ने रेलवे लाइन बिछाने में मुख्य भमिका निभाई। रेलवे के विकास से जर्मनी में आन्तरिक बाजार का केंद्रीकरण हआ। 1850 ई से 1870 तक जर्मनी में कोयले और लौह उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। एक तरीके से कहा जाय तो जर्मनी ने अपना कोयला उत्पादन दस गुणा बढ़ा लिया था।

4. इस प्रकार जर्मन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास जर्मनी के एकीकरण के पूर्व ही आरंभ हो गया था। ऐसा माना जाता हैं कि एकीकरण के पूर्व ही पूंजीपतियों के पास इतनी पूंजी इकट्ठी हो गई थी और उत्पादन इस स्तर पर पहुँच गया था कि जर्मनी को भी उपनिवेशों की प्राप्ति की आवश्यकता महसूस होने लगी थी ताकि पूंजी का निवेश हो सके, तैयार माल बिक सके और कच्चे मालों के स्रोतों की प्राप्ति हो सके। इसी कारण एक सशक्त केंद्र और मजबूत सरकार की आवश्यकता महसूस की जा रही थी और यह एकीकरण से ही संभव हो सकता था अतः इस वर्ग ने एकीकरण की वकालत की।

5. 1870 के युद्ध के बाद जर्मनी का एकीकरण हो गया। एकीकरण के बाद व्यापारिक मार्ग में बाधाएँ हटने और सम्मिलित बैंकिंग व्यवस्था और मुद्रा प्रणाली की स्थापना होने से औद्योगीकरण की प्रक्रिया में तीव्रता आयी। 1870 के सेडॉन युद्ध के पश्चात् जर्मनी में पूँजी निवेश में बहुत तेजी आई जिसका आंशिक कारक फ्रांस से क्षतिपूर्ति के रूप में भारी रकम की प्राप्ति के फलस्वरूप पूँजी की उपलब्धता थी। औद्योगिक क्रांति के लिए आवश्यक जनशक्ति कुछ तो जर्मनी की जनसंख्या में बदलाव से तथा कुछ जनसंख्या में हुई तीव्र बढ़ोत्तरी से प्राप्त हुई। इस अतिरिक्त जनशक्ति का जर्मनी ने औद्योगिक अर्थव्यवस्था के विकास में भरपूर उपयोग किया। 1870 के बाद जर्मनी यूरोप का सबसे शक्तिशाली औद्योगिक देश बन गया। जर्मनी के लोगों ने कृषि को उन्नत करने में और रासायनिक तथा इस्पात उद्योग में विज्ञान का उपयोग करने में सभी को पीछे छोड़ दिया। 1900ई. तक जर्मनी ने रंगो के उत्पादन में विश्व के अधिकतम बाजार पर कब्जा कर लिया। कृत्रिम रंग उद्योगों के प्रभाव से औषधियों, फोटोग्राफी की सामग्री, कृत्रिम रेशे आदि उद्योगों की स्थापना हुई। 1870 के बाद बिजली उद्योग का सर्वाधिक तीव्रता से विकास हुआ। उच्च और निम्न वॉल्टेज तकनीक का भी विकास किया गया। बिजली के उत्पादों के उत्पादन तथा प्रयोग का आधा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार जर्मनी के हाथ में था। 20वीं सदी के आरंभ में जर्मनी में बिछायी गई बिजली की रेल लाईनों की लंबाई यरोप में ऐसी रेलों की समस्त लंबाई की आधी थी।

6. जर्मनी की इस औद्योगिक सफलता का एक प्रमुख कारण था उद्योगों के लिए आवश्यक प्राकृतिक संपदा की बड़ी मात्रा में उपलब्धता। कृषि की अच्छी स्थिति तथा कृषि के प्रयोग में आने वाली मशीनों और उर्वरकों का अधिकतम उत्पादन जिसके फलस्वरुप अनाज का प्रति व्यक्ति उत्पादन अन्य देशों की अपेक्षा अधिक होना. ग्रामीण सहकारी आंदोलन का विकास। पूंजी का निवेश केवल मशीनों के लिए ही विकास एवं तकनीकी शिक्षा में भी किया जाने लगा साथ ही बैंकिंग का व्यापक विकास किया जिसने उत्पादन करने वाली विशाल फर्मों के लिए पंजी उपलब्ध करवाना तथा नए उपयोगी प्रयोगों के लिए विशेष विभागों की स्थापना के लिए बैंकों द्वारा सहायता दिया जाना सनिश्चित किया।

जापान का औद्योगीकरण

1. जापान जो 1868 ई. से पूर्व औद्योगिक विकास में पिछड़ा हुआ था परंतु 1868 के पश्चात् इसने चमत्कारिक आर्थिक उन्नति की। इसके पीछे जापान की अनुशासित तथा परिश्रमी जनशक्ति और सरकार की उद्योगों के प्रति जागरूकता थी, जिसमें राष्ट्रहित निहित था। जापान के आधुनिकीकरण के लिए जापान का आधुनिक दृष्टि से आर्थिक विकास अति आवश्यक था। अतः जापान का औद्योगीकरण उसके आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा था। इसका उद्देश्य था जापान को आधुनिक राष्ट्र बनाना, ताकि जापान पाश्चात्य शक्तियों का मुकाबला कर सके।

2. सरकार द्वारा विस्तृत पैमाने पर आधुनिकीकरण के लिए प्रयास किये जाने का मुख्य कारण था पश्चिमी देशों के निरंतर दबाव का खतरा। जापान पर पाश्चात्य देशों द्वारा कई संधियाँ आरोपित कर दी गई थी और जापान न तो एक तरफ उपनिवेश के स्वरूप में रहने के लिए तैयार था दूसरी तरफ चीन की तरह अर्द्ध-उपनिवेश की स्थिति भी इसे नामंजूर थी। इसलिए जापान पश्चिमी दबाव का सामना करने के लिए स्वयं को आर्थिक एवं सैनिक दृष्टि से एक सक्षम राष्ट्र बनाना चाहता था। परंतु विरोधाभास यह था कि पश्चिम का सामना करने के लिए पश्चिमी तकनीक को तेजी से अपनाना आवश्यक था। तीव्र औद्योगिक विकास के पीछे एक महत्त्वपूर्ण कारक यह भी था कि वर्तमान संधि व्यवस्था के कारण जापान को यह स्वतंत्रता नहीं थी कि वह पश्चिमी वस्तुओं पर अपेक्षित चुंगी लगाकर देशी उद्योगों को सुरक्षा प्रदान कर सके। इसके फलस्वरूप एक ओर जहाँ विदेशी मुद्रा तेजी से जापान के हाथों से निकल रहीं थी। अतः जापान के सम्मुख एकमात्र विकल्प यह था कि वह तेजी से अपने देशी उद्योगों का विकास करें।

3. जापान में औद्योगिक विकास के लिए सरकार ने विदेशी पूंजी स्वयं उधार लेकर निजी उद्योगों को सहायता के रूप में दी। बहुत से उद्योग जो सरकारी क्षेत्र में प्रारंभ हुए थे, उन्हें बाद में निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया। इसलिए जापान के कई परिवारों ने उद्योग, व्यापार, वाणिज्य, बैंकिंग और यातायात के क्षेत्र में अभूतपूर्ण कार्य किए। मेइजी सरकार ने 1870 ई. में उद्योग मंत्रालय का गठन किया। 1871 में मशीनों के कल-पुर्जे बनाने के कारखाने तथा 1875 में सीमेंट कारखाना स्थापित किया गया। विदेश व्यापार पर यूरोपीय नियत्रण को समाप्त करने के लिए विनिमय केंद्र स्थापित किये। इसके बावजद अन्य देशों में जापान के माल की माँग पैदा करने में समय लगा।

4. अमेरिका के नमूने पर बैंक और कागजी मुद्रा चालू करने की योजना बनाई गई क्योंकि विकास हेतु एकरूप राष्टीय मद्रा और राष्ट्रीय बैंक की आवश्यकता थी। अतः 1881 में बैंक मॉफ जापान की स्थापना हई। 1896 में राष्ट्रीय बैंकों को निजी बैंकों में परिवर्तित कर राष्ट्रीय बैकिंग प्रणाली समाप्त की गई। कुछ ऐसे बैंक स्थापित किये गये जिनका उद्देश्य विदेशी मुद्रा के व्यापार को नियन्त्रित करना था व विदेशी व्यापार के लिए पूंजी उपलब्ध कराना था। इस प्रकार के परिवर्तन से जापान पश्चिमी देशों को आर्थिक क्षेत्र में मुकाबला करने की स्थिति में आ गया।

5. सरकार के द्वारा उद्योगों के विकास के लिए कई कदम उठाये गये। जापानी सरकार ने कुछ ऐसे उद्योगों को जो शोगुन की सरकार के द्वारा विकसित किया गया था, अपने हाथों में ले लिया था उनका आधुनिकीकरण किया। इसके अलावा सरकार पश्चिमी मॉडल पर सूती वस्त्र उद्योगों का विकास किया। चूँकि इन मशीनों का आयात महंगे दामों पर किया जाता था तथा सरकार इन्हें सस्ते दामों पर निजी उद्यमियों को उपलब्ध करवाती थी। सरकार के द्वारा मॉडल फैक्ट्री की भी स्थापना की गई ताकि जनता को पश्चिमी प्रौद्योगिकी के महत्त्व से परिचित कराया जा सके।

6. यातायात एवं संचार के साधनों के विकास पर भी पर्याप्त ध्यान दिया गया। 1872 ई. में टोकियो और योकोहामा के बीच रेल लाइन बिछा कर रेल चलाई गई। यह कार्य निजी कंपनियों को भी सौंपा गया था। इन प्रयासों से 1903 ई. तक रेलवे लाईन की लंबाई 4500 मील थी और इस रेल लाइन का 70% निर्माण निजी कंपनियों के द्वारा किया गया। रेल लाईनों के निर्माण में जापान, इंग्लैंड का विशेष रूप से ऋणी रहा। 1906 ई. में इसका राष्ट्रीयकरण किया। जहाज उद्योग के विकास पर ध्यान किया गया। जहाजों का आयात किया गया ताकि जल परिवहन का विकास हो। जहाज उद्योग का विकास इस कारण से हो पाया कि राज्य ने स्वयं विशेष छट एवं संरक्षण के माध्यम से इनके उत्तरदायित्व को वहन करने की इच्छा रखी। 1896 एवं 1899 में जहाज निर्माण अधिनियमों के द्वारा काफी छट और सहायता की व्यवस्था की गई अगर जहाज का निर्माण पर्णरूपेण अपने ही कारखानों में किया जाय। इस प्रकार घरेलू व्यवसाय में तेजी से वृद्धि हुई और जापान जल परिवहन के विकास में अग्रणी हो गया। 1871 में डाक व्यवस्था को नया स्वरूप दिया गया। 1877 में जापान अंतर्राष्ट्रीय डाक संघ क सदस्य बन गया। इसी प्रकार तार लाईन का विकास भी किया गया।

7. मेइजी पुनर्स्थापना के बाद कृषि की उन्नति के भी प्रयास किये गये। कृषकों को स्वामित्व का अधिकार मिला। बेगार प्रथा को समाप्त किया गया। पश्चिमी देशों से कृषि विशेषज्ञों की सेवाएँ प्राप्त कर कृषि क्रांति की दिशा में पहल की गई थी। अनेक कृषि विद्यालयों की स्थापना की गई। कृषि समितियों का गठन किया गया। उन्नत बीजों का विकास किया गया। 1907 ई. तक धान, गेहूँ, जौ, रेशम के कीड़ों की पैदावार दो गुणा से ढाई गुणा बढ़ गया।

8. जापान के औद्योगीकरण की अपनी विशेषताएँ थीं। अधिकांश पूंजीवाद के आरंभिक काल में बैंकिंग पूंजी सामान्यतया औद्योगिक पूंजी से पृथक होती हैं जबकि जापान में स्थिति भिन्न थी। जापान में औद्योगिक पूंजी का स्वतंत्र रूप से विकास नहीं हआ। राज्य ने स्वयं औद्योगीकरण की दिशा में पहल की और अपेक्षाकृत निम्न दरों में निजी उद्यमियों के हाथों बेच दिया। इन प्रक्रिया में कोई भी नया औद्योगिक वर्ग अस्तित्व में नहीं आया। बल्कि बैंकिंग एवं महाजनी पूंजी को ही प्रोत्साहन मिला तथा उन्हीं में से एक अंश का औद्योगिक पूंजी में रूपांतरण हो गया। अतः आधुनिक पूंजीवादी राष्ट्र की तुलना में जापानी पूजीवाद का चरित्र अपरिपक्व बना रहा। दूसरें जापान में भूमि लगान की मात्रा अधिक थी। अत: भूमि क्षेत्र एक बड़ी पूंजी को आकर्षित करता रहा तथा बहुत से निवेशकों ने उद्योगों के बजाय भूमि में ही अधिक पूंजी लगाना उचित समझा। जापान के औद्योगीकरण में एकाधिकारवादी प्रवृति का विकास हुआ तथा औद्योगिक एकाधिकार का अर्थ था सीमित प्रतिस्पर्धा एवं मूल्य वृद्धि। जैबात्सु समूह के व्यवसायियों ने बैंकिंग एवं उद्योगों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया। इस जैबात्सु में मित्सुई, मित्सुबिसी, सुमीरोमों और यसुदा समूह के व्यवसायिक शामिल थे। जैबात्सु समूह के व्यापारियों के उच्च राजनीतिक तालुकात होने के कारण इन्होनें नीति-निर्माण को प्रभावित करना प्रारंभ किया।

एक टिप्पणी भेजें

Post a Comment (0)

और नया पुराने