कारक - कारक की परिभाषा, भेद और उदाहरण | karak in hindi | karak kise kahate hain

कारक किसे कहते हैं?

संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जो वाक्य के अन्य शब्दों (खासकर क्रिया) से अपना सम्बन्ध प्रकट करता है कारक karak कहलाता है।
जैसे -
  • राम ने रावण को मारा। उसने उसको पढ़ाया।
प्रथम वाक्य में दो संज्ञा शब्द (राम और रावण) और एक क्रिया शब्द (मारा) है। दोनों संज्ञा शब्दों का आपस में तो सम्बन्ध है ही, मुख्य रूप से इनका सम्बन्ध क्रिया (मारा) से है।
जैसे -
  • रावण को किसने मारा ? - राम ने
  • राम ने किसको मारा? - रावण को
यहाँ मारने की क्रिया राम करता है, अत: 'राम ने' कर्त्ताकारक और मारने (क्रिया) का फल रावण पर पड़ता है, अतः 'रावण को' कर्मकारक कहेंगे।
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स्पष्ट है कि करने वाला कर्त्ताकारक हआ। इसका चिह्न 'ने' है। जिस पर फल पड़ा वह कर्मकारक हुआ। इसका चिह्न 'को' है।

कारक की परिभाषा

'कारक' शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है- क्रिया को करने वाला, क्रिया से सम्बन्ध कराने वाला अर्थात् क्रिया को सम्पन्न करने में किसी न किसी प्रकार की भूमिका को निभाने वाला।
व्याकरण में कारक वह व्याकरणिक कोटि है जो यह स्पष्ट करती है कि वाक्य में प्रयुक्त किसी संज्ञा या सर्वनाम पद का सम्बन्ध क्रिया के साथ तथा अन्य शब्दों के साथ क्या है।

कारकीय परसर्ग या विभक्ति

वाक्य में प्रयुक्त किसी संज्ञा या सर्वनाम के कारक को प्रकट करने के लिए जो कारकीय चिह्न संज्ञा या सर्वनाम के साथ प्रयुक्त होते हैं उन्हें कारकीय परसर्ग या विभक्ति चिह्न कहते हैं।
प्रत्येक कारक का परसर्ग (विभक्ति चिह्न) होता है किन्तु वाक्य में हर संज्ञा या सर्वनाम के साथ वह प्रयुक्त हो यह आवश्यक नहीं है।

कारक के भेद

कारकों के मुख्य आठ भेद हैं। कारक तथा उनके विभक्ति चिह्न निम्नलिखित हैं।

कारक विभक्तियाँ
1. कर्ता कारक (क्रिया को करने वाला) ने, को, से, के द्वारा
2. कर्म कारक (जिस पर क्रिया का प्रभाव पड़ता है) को, से
3. करण कारक (जिस साधन से क्रिया हो) से, के द्वारा, में, पर, का, के साथ, के माध्यम, के कारण
4. सम्प्रदान कारक (जिसके लिए क्रिया की गई हो) के लिए, को, पर, का
5. अपादान कारक (जिससे पृथकता हो) से (पृथक् होने के लिए) से पृथक्, से, का
6. सम्बन्ध कारक (क्रिया के संचालन का आधार) का, की, के, रा, री, रे, ना, नी, ने
7. अधिकरण कारक (क्रिया करने का स्थान) में, पे, पर, के, को, के ऊपर, के भीतर
8. सम्बोधन कारक (जिस संज्ञा को संबोधित किया जाए) ऐ ! हे ! अरे ! ओ!

कर्ता कारक (ने, को, से, के द्वारा)

वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जो क्रिया के करने वाले का बोध कराता है। अतः क्रिया के करने वाले को कर्ता। कारक कहते हैं, क्योंकि बिना कर्ता के क्रिया संभव नहीं होती। कर्ता प्रायः चेतन/सजीव होता है।
  • भूपेन्द्र पुस्तक पढ़ता है।
  • नीता ने खाना बना लिया।
  • मैं गाना गाता हूँ।
  • उसने कुछ फल खरीदें।

'ने' विभक्ति का प्रयोग
कर्ता कारक की मुख्य विभक्ति 'ने' है। जब क्रिया सकर्मक, पूर्ण कृदन्त एवं भूतकाल में हो तब कर्ता के साथ सदैव 'ने' विभक्ति प्रयुक्त होती है।
जैसे -
  • राम ने गाना गाया।
जब वाक्य में प्रयुक्त क्रिया (अकर्मक या सकर्मक) वर्तमान काल या भविष्यत् काल में हो तब कर्ता कारक के साथ 'ने' विभक्ति प्रयुक्त नहीं होती है।
  • कनिष्का विद्यालय जाती है।
  • गार्गी कल जोधपुर जायेगी।

'कर्ता' को ज्ञात करना
वाक्य में प्रयुक्त (कर्ता विभक्ति सहित हो तब) क्रिया से 'किसने' प्रश्न करने पर प्राप्त शब्द कर्ता कारक होगा।
क्रिया से 'किसने' प्रश्न करने पर उत्तर प्राप्त नहीं होने की स्थिति में, क्रिया पर 'कौन' प्रश्न का आरोप करने से जो उत्तर प्राप्त होता है, वह शब्द का कारक होगा -
  • अभिषेक ने प्रशान्त को पुस्तक दी।
अभिषेक ने, यहाँ अभिषेक कर्ता है।

अभिषेक प्रशान्त को पुस्तक देता है। कौन देता है?
उत्तर- अभिषेक कर्ता है।

यद्यपि कर्ता कारक की मूल विभक्ति 'ने' है तथापि कभी कभी 'को' तथा 'से' (के द्वारा) विभक्ति (परसर्ग) का प्रयोग कर्ता कारक के साथ होता है।

'को' विभक्ति का प्रयोग
होना, पड़ना, चाहिए क्रियाओं वाले वाक्यों में कर्ता के साथ 'को' विभक्ति आती है। निम्न वाक्यों में कर्ता के साथ 'को' विभक्ति प्रयुक्त हुई है-
  • छात्रों को परिश्रम करना चाहिए।
  • आशा को आज अजमेर जाना है।
  • उनको इन्तजार करना पड़ा।
  • राहुल को कोट बनाना है।
  • राधा को आज आना होगा।

'से/के द्वारा' विभक्ति का प्रयोग
जब वाक्य कर्मवाच्य या भाववाच्य का हो तब कर्ता कारक के साथ 'से' या 'के द्वारा' विभक्ति प्रयुक्त होती है,
जैसे -
  • मीनाक्षी द्वारा खाना बनाया गया। (कर्मवाच्य)
  • अंजना से चला नहीं जाता। (भाववाच्य)

कर्म कारक (को, से)

वाक्य में प्रयुक्त जिस संज्ञा या सर्वनाम शब्द पर क्रिया का फल या प्रभाव पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते हैं।

'कर्म' को ज्ञात करना
वाक्य में प्रयुक्त क्रिया पर 'किसको' प्रश्न का आरोप करने से जो उत्तर प्राप्त होता है, वह शब्द कर्मकारक होता है,
जैसे-
  • धर्मेन्द्र ने भूपेन्द्र को सामान भेजा।
'भेजा' क्रिया पर 'किसको' प्रश्न का आरोप करने पर उत्तर प्राप्त होता है, 'भूपेन्द्र' को। अतः 'भूपेन्द्र' शब्द कर्मकारक होगा।

किन्तु 'किसको' प्रश्न का आरोप करने पर उत्तर प्राप्त न हो तो क्रिया पर 'क्या' प्रश्न का आरोप करने पर 'कर्म' कारक ज्ञात होगा।
जैसे-
  • महेन्द्र पुस्तक पढ़ता है। [महेन्द्र दूध पीता है।]
'पढ़ता है' क्रिया पर 'क्या' प्रश्न का आरोप करने पर उत्तर प्राप्त होता है 'पुस्तक'। अतः 'पुस्तक' शब्द कर्मकारक होगा।

को' विभक्ति का प्रयोग
कर्मकारक की मुख्य विभक्ति 'को' है। 'को' विभक्ति का प्रयोग प्रायः सजीव कर्म के साथ होता है, निर्जीव के साथ नहीं।
जैसे -
  • शशांक कुत्ते को मारता है।
  • मनन भोजन करता है।

अपवाद
  • भारत ने पाकिस्तान को हराया।
  • सचिन उस पुस्तक को पढ़ो।
यद्यपि कर्मकारक की मूल विभक्ति 'को' है किन्तु कभी-कभी 'से' विभक्ति भी कर्मकारक के साथ प्रयुक्त होती है।

'से' विभक्ति का प्रयोग
पूछना, कहना आदि क्रियाओं के साथ कर्म कारक के साथ 'को' के स्थान पर 'से' का प्रयोग होता है,
जैसे -
राधा ने कृष्ण से पूछा।
राम ने लक्ष्मण से कहा।

करण कारक (से, के द्वारा, के साथ, के माध्यम, में, पर, का)

'करण' शब्द का अर्थ होता है साधन या उपकरण। वाक्य में कर्ता कारक संज्ञा या सर्वनाम के जिस साधन से क्रिया सम्पन्न करता है अर्थात् जिस संज्ञा या सर्वनाम की सहायता से कोई कार्य सम्पन्न हो, उसे करण कारक कहते हैं।
जैसे -
  • ईक्षा पेन्सिल से चित्र बनाती है।
  • रुझान हवाई जहाज द्वारा कोटा गया।
  • घनश्याम ने समाचार पत्र के माध्यम से जाना।
  • कविता ने नौकर के साथ सामान भेजा।
उक्त उदाहरणों में करण कारक की विभक्तियाँ से, के द्वारा, के साथ एवं के माध्यम से आदि प्रयुक्त हुई हैं तथा इनके अतिरिक्त निम्न वाक्यों में 'में', 'पर', 'का' विभक्तियाँ भी करण कारक के साथ प्रयुक्त हुई हैं-
  • में- एक गोली में उसका काम तमाम हो गया।
  • एक रुपये में पुस्तक मिल गई।
  • पर- मेरे बोलने पर वह नाराज हो गया।
  • राम के आने पर सब प्रसन्न हुए।
  • का- प्रेमचन्द का गोदान कृषक समस्या को प्रस्तुत करता है।
  • प्रसाद की कामायनी छायावादी महाकाव्य है।
  • तुलसी का 'रामचरितमानस' मर्यादाओं की मंजूषा है।
[यहाँ 'का, की' विभक्तियाँ 'के द्वारा' शब्द का बोध कराती है।]

सम्प्रदान कारक (के लिए, को, पर, का)

'सम्प्रदान' शब्द का अर्थ होता है देना। अत: वाक्य में कर्ता के द्वारा जिस किसी संज्ञा या सर्वनाम को कुछ दिया जाता है या जिस किसी संज्ञा या सर्वनाम के लिए क्रिया की जाती है, वह संज्ञा या सर्वनाम शब्द सम्प्रदान कारक होता है।
  • ताऊजी मंडी से बच्चों के लिए अखरोट लाये।
  • पेट के वास्ते मनुष्य क्या-क्या नहीं करता।
  • सैनिकों ने देश के हेतु बलिदान दिया।
  • दान के निमित्त वस्त्र प्रदान करो।
  • मनुष्य को जीने के अर्थ परिश्रम करना पड़ता है।

'को' विभक्ति (विशेष रूप में जहाँ देने का भाव हो)
  • हेमराज भिखारी को रोटी देता है।
  • भूपेन्द्र ने नीता को पुस्तक दी।
  • प्रशान्त ने दादाजी को दवाई दी।
  • मैंने राम को फल खरीदकर दिये।

'पर' विभक्ति
  • उसने चार पैसों पर अपना ईमान खो दिया।
  • तुम इतनी सी बात पर नाराज हो।

अपादान कारक (से अलग/से पृथक्/से/का)

'अपादान' शब्द अलगाव के भाव को प्रकट करता है। अतः वाक्य में जब क्रिया के द्वारा कोई संज्ञा या सर्वनाम अन्य किसी संज्ञा या सर्वनाम से अलग हो अर्थात् जिस संज्ञा या सर्वनाम से अलग हो उसे अपादान कारक कहते हैं, अतः अपादान कारक ध्रुव यानी स्थायी रहने वाली संज्ञा या सर्वनाम में पाया जाता है।
यद्यपि अपादान कारक में पृथकता का भाव ही प्रमुख है, तथापि कुछ अन्य स्थानों पर तुलना करने, भिन्नता बतलाने, से आरम्भ होने, कारण होने, सीखने, डरने या भयभीत होने, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष होने, लजाने, मुक्त होने या दूर होने के भाव को भी प्रकट करता है, यथा -

(i) अलग होने का भाव
  • पेड़ से पत्ता गिरता है।
  • वह घर से बाहर गया।

(ii) तुलना का भाव
  • गार्गी कनिष्का से बड़ी है।
  • राजस्थान हिमाचल से बड़ा है।

(iii) भिन्नता का भाव
  • निखिल का व्यवहार चिराग से भिन्न है।

(iv) आरम्भ होने का भाव/उत्पत्ति या निकास का भाव
  • गंगा हिमालय से निकलती है।
  • मैं आज से पढूंगा।

(v) कारण होने का भाव
  • सुनयना गर्मी से परेशान है।

(vi) सीखने का भाव/पढ़ने के अर्थ
  • बच्चा माता-पिता से सीखता है।

(vii) डरने या भयभीत होने का भाव
  • पुजारी कुत्ते से डरता है।
  • धनी लुटेरों से भयभीत है।

(viii) घृणा का भाव
  • शशांक मक्खियों से घृणा करता है।

(ix) ईर्ष्या व द्वेष का भाव
  • गोपियाँ बाँसुरी से ईर्ष्या करती हैं।
  • पाकिस्तान भारत से ईर्ष्या-द्वेष रखता है।

(x) लजाने का भाव
  • बहू ससुर से लजाती है।

(xi) मुक्त होने का भाव
  • वह ऋण से मुक्त हो गया।

(xii) दूरी का भाव
  • सूर्य पृथ्वी से बहुत दूर है।

(xiii) कार्यारम्भ या समय प्रकट करने के लिए
  • वह रविवार से छुट्टी पर है।

(xiv) रक्षा, वैर, पराजय के अर्थ
  • मुझे गुण्डों से बचाओ।

सम्बन्ध कारक (का, की, के, रा, री, रे, ना, नी, ने)

वाक्य में प्रयुक्त एक संज्ञा या सर्वनाम का दूसरी संज्ञा या सर्वनाम से सम्बन्ध बताने वाले शब्द रूप को सम्बन्ध कारक कहते हैं।

(i) अधिकार सम्बन्ध
  • लीला की साड़ी कीमती है।

(ii) रिश्ता सम्बन्ध
  • अशोक का भाई सुशील परिश्रमी है।

(iii) मूल्य सम्बन्ध
  • पाँच सौ रुपये का नोट असली है।
  • बीस रुपये का खिलौना टूट गया।

(iv) कार्य कारक सम्बन्ध
  • चाँदी की पाजेब नई डिजाइन में है।

(v) परिमाण सम्बन्ध
  • दस मीटर का थान खरीदा।

(vi) प्रयोजन सम्बन्ध
  • खाने के बर्तन साफ रखो।

रा,री,रो विभक्ति
उत्तम पुरुष एवं मध्यम पुरुष के सर्वनामों के साथ (मैं, हम, तुम) सम्बन्ध कारक में रा, री, रे विभक्तियाँ प्रयुक्त होती हैं-
  • मेरा घर यहाँ से दूर है।
  • हमारी दुकान यहीं है।
  • हमारे कपड़े नये हैं।

ना, नी, ने विभक्ति
'आप' शब्द (सर्वनाम) का सम्बन्ध कारक में प्रयोग होने पर ना, नी, ने विभक्तियाँ प्रयुक्त होती हैं, यथा-अपना काम आप करो।
अपनी पुस्तक मुझे दो।
अपने कपड़े साफ रखो।

विशेष

1. सम्बन्ध कारक की विभक्तियाँ (परसर्ग) सम्बन्धी (संज्ञा, सर्वनाम)के लिंग, वचन के अनुसार बदलती हैं,
जैसे-
  • नन्दू का घर,
  • नन्दू की दुकान,
  • नन्दू के बच्चे आदि।
  • मेरा बस्ता, मेरी पुस्तक।

2. सम्बन्ध कारक का सम्बन्ध वाक्य में प्रयुक्त क्रिया के साथ नहीं होता है। इसलिए कतिपय विद्वान सम्बन्धवाचक शब्द को कारक नहीं मानते।

अधिकरण कारक (में, पे, पर, को, के अन्दर, के ऊपर)

वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जो क्रिया के आधार (स्थान, समय आदि) का बोध कराता है, अधिकरण कारक कहते हैं।

क्रिया के आधारों के अनुसार इन्हें दो भागों में बाँट सकते हैं-
  1. स्थानबोधक आधार
  2. समय बोधक आधार

(i) स्थानबोधक आधार
  • चिड़िया पेड़ पर बैठी है।
  • चूहे बिल में रहते हैं।
  • बन्दर छत पर बैठा है।
  • वह कुएं में कूद पड़ी।

(ii) समय बोधक आधार
  • परीक्षा मार्च में होगी।
  • गाड़ी दस बजकर दस मिनट पर आती है।
  • सोमवार को बाजार बन्द रहता है।
पहचान- वाक्य में प्रयुक्त क्रिया पर 'कहाँ' प्रश्न का आरोप करने पर प्राप्त उत्तर अधिकरण कारक होता है।

सम्बोधन कारक (हे! ओ! अरे!)

सम्बोधन का अर्थ होता है पुकारना। अतः कारक के रूप में वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा के जिस रूप से किसी को पुकारा, बुलाया, सुनाया या सावधान किया जाता है, उसे सम्बोधन कारक कहते हैं।
  • हे भगवान! गरीबों पर दया करो।
  • अरे बेटा! इधर आना।
  • अरे मोहन! तुम कब आए?
विशेष
  • सर्वनाम शब्द का प्रयोग सम्बोधन कारक में कभी नहीं होता।
  • सम्बोधन कारक की विभक्तियाँ संज्ञा शब्द से पहले प्रयुक्त होती।
  • कई बार संज्ञा शब्द पर जोर देकर सम्बोधन कारक का काम चला लिया जाता है, यथा-बेटा, पढ़ाई में ध्यान लगाओ। राजू, जल्दी करे।
  • कभी-कभी संज्ञा शब्द के बिना केवल विभक्ति ही प्रयुक्त होती है-अरे, उधर बैठो।
  • सम्बोधन कारक के बाद सम्बोधन विराम चिह्न या अल्प विराम का प्रयोग किया जाता है।
  • सम्बोधन कारक के बहुवचन संज्ञा शब्दों पर अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता है, जैसे-देवियो ! सज्जनो! भाइयो!

'ने' चिह्न का प्रयोग कहाँ-कहाँ होता है

(1) जब क्रिया सकर्मक हो तो, सामान्य भूत, आसन्न भूत, पूर्ण भूत, संदिग्ध भूत और हेतु हेतु मद्भूत कालों में इस चिह्न का प्रयोग होता है।
जैसे -
  • सामान्य भूत - उसने रोटी खायी।
  • आसन्न भूत - उसने रोटी खायी है।
  • पूर्ण भूत - उसने रोटी खायी होगी।
  • संदिग्ध - उसने रोटी खायी थी।
  • हेतुहेतु मद्भूत - अगर उसने रोटी खायी होगी, तो पेट भरा होगा।

(2) अकर्मक क्रिया में कर्ता के 'ने' चिह्न का प्रयोग प्रायः नहीं होता है, लेकिन नहाना, खाँसना, छींकना, थूकना, भौंकना, आदि अकर्मक क्रियाओं में इस चिह्न का प्रयोग उपर्युक्त भूतकालों में होता है।
जैसे-
  • राम ने नहाया।
  • उसने खाँसा है।
  • उसने छींका था।
  • मैने थूका होगा।

(3) जब अकर्मक क्रिया सकर्मक बन जाती है, तो, इस चिह्न का प्रयोग उपर्युक्त भूतकालों में होता है।
जैसे -
  • उसने बच्चे को रुलाया।
  • माँ ने बच्चे को रुलाया।
  • कुत्ते को मैंने जगाया था।
  • उसने बच्चे को सुलाया था।

(4) यदि अकर्मक क्रिया के साथ कोई सजातीय कर्म आ जाए तो उपर्युक्त भूतकालिक प्रयोगों में यह चिह्न प्रयुक्त होगा।
जैसे -
  • उसने तीखी बोलियाँ बोली। (बोली बोलना)
  • उसने टेढ़ी चाल चली है। (चाल चलना)

(5) यदि संयुक्त क्रिया का अंतिम खंड सकर्मक हो, तो उपर्युक्त भूतकालों में इस चिह्न का प्रयोग होगा। जैसे उसने जी भरकर टहल लिया।
  • उसने जी भर कर टहल लिया है।
  • उसने दिल खोलकर रो लिया होगा।

(6) 'देना' या' डालना' क्रिया के पहले यदि कोई अकर्मक क्रिया भी हो तो अपूर्ण भूत और हेतुहेतु मद् भूतकालों को छोड़कर सभी भूतकालों में इस चिह्न का प्रयोग होगा।
जैसे -
  • सामान्य भूत - उसने घंटों सो डाला।
  • आसन्न भूत - उसने घंटों सो डाला है।
  • पूर्ण भूत - उसने घंटो सो डाला था।
  • संदिग्ध भूत - उसने घंटो सो डाला होगा।

'ने' चिह्न का प्रयोग कहाँ-कहाँ नहीं होता है

(1) वर्तमान काल और भविष्यत् काल के सभी भेदों तथा मात्र अपूर्णभूत काल में इस चिह्न का प्रयोग नहीं होता है।
जैसे -
  • वह खाता है।
  • वह खा रहा है।
  • वह खा रहा था।
  • वे खेलेगें।
  • वे खेलते रहेंगे।
  • मैं पढ़ चुका होऊँगा।

(2) वैसे तो सिर्फ अपूर्ण भूतकाल को छोड़कर सभी भूतकालों में सकर्मक क्रिया रहने पर इस चिह्न का प्रयोग होता है, लेकिन पूर्वकालिक क्रिया रहने पर इन चिह्न का प्रयोग नहीं होता है।
जैसे -
  • वह आकर पढ़ा।
  • वह बैठकर गया है।
  • मैं नहाकर खाया था।
  • वह सो कर लिखा होगा।

(3) वैसे तो एक सकर्मक क्रिया रहने पर भूतकालिक प्रयोग में 'ने' चिह्न लगता है लेकिन कुछ सकर्मक क्रियाओं - बकना, बोलना, भूलना, समझना, आदि के रहने पर इस चिह्न का प्रयोग न करें।
जैसे -
  • वह मुझसे बोली।
  • श्याम गाली बका है।
  • तुम नहीं समझे थे।
  • वह मुझे भूल गया होगा।

(4) अकर्मक क्रियाओं के भूतकालिक प्रयोग में इस चिह्न का प्रयोग करें।
जैसे -
  • वह आया।
  • तुम नहीं गये।
  • राम दौड़ा।
  • वह सो गया था।

(5) चुकना, जाना और सकना के भूतकालिक प्रयोग में इस चिह्न का प्रयोग न करें।
जैसे -
  • वह लिख चुका।
  • तुम खा गये।
  • राम बोल न सका।
  • तू गा न सका।

'के' चिह्न का प्रयोग कहाँ-कहाँ होता है

'को' कर्म कारक का चिह्न है। इसका प्रयोग कर्म कारक के अतिरिक्त कुछ दूसरे कारकों में भी होता है। जैसे

(1) कर्म कारक के रूप में
  • राम ने रावण को मारा। ('रावण को' कर्म कारक)

(2) कर्म कारक के रूप में प्रेरणार्थक क्रिया के गौणकर्म में
  • शिक्षक छात्र को हिन्दी पढ़ाते हैं। (छात्र को' गौणकर्म)
  • माँ बच्चे को खाना खिलाती है। ('बच्चे को' गौणकर्म)

(3) यदि अस्तित्व के अर्थ में 'होना' क्रिया का प्रयोग हो, तो कर्म कारक के 'को' का रूपांतर 'के' में हो जाता है।
जैसे -
  • सोहन के पुत्र हुआ है। (को, के बदले 'के')
  • उसके दो पत्नियाँ हैं। (को, के बदले 'के')

(4) कर्ता कारक के रूप में क्रिया की अनिवार्यता प्रकट करने के लिए
  • राम को पटना जाना होगा। ('राम को' कर्त्ता कारक)
  • मोहन को पत्र लिखना है। ('मोहन को' कर्ता कारक)

(5) कर्ता कारक के रूप में कै, दस्त आदि शरीरिक आवेग की अभिव्यक्ति के लिए
  • रोगी को बिछावन पर कै हो गयी। ('रोगी को' - कर्ताकारक)

(6) कर्त्ता कारक के रूप में मानसिक आवेगों की अभिव्यक्ति के लिए
  • सीता को चिंता सता रही है।
  • गीता को दुःख हुआ।

(7) कर्ता कारक में यदि 'दे' सहायक क्रिया के रूप में प्रयुक्त हो
  • सोहन को आम खाने दो। ('सोहन को' - कर्ता कारक)
  • मोहन को किताब पढ़ने दो। ('मोहन को' - कर्ता कारक)

(8) संप्रदान कारक के रूप में
  • राम ने श्याम को पुस्तक दी। ('श्याम को' - संप्रदान कारक)
  • बच्चे ने शिक्षक को घड़ी दी। ('शिक्षक को' - संप्रदान कारक)

(9) इच्छासूचक के रूप में यदि मन, जी, आदि का प्रयोग हो
  • गीता पढ़ने को मन करता है। (पढ़ने को' - संप्रदान कारक)
  • रामायण सुनने को जी करता है। ('सुनने को' - संप्रदान कारक)

(10) अधिकरण के रूप में, समय सूचक शब्दों के साथ
  • वह प्रतिदिन रात को आता है। (रात को' - अधिकरण कारक)
  • वह चार बचे सुबह को आता है। ('सुबह को'-अधिकरण कारक)

'से' चिह्न का प्रयोग कहाँ-कहाँ होता है

(1) अपादान और करण दोनों कारको का चिह्न 'से' है लेकिन दोनों में अर्थ की दृष्टि से बहुत अंतर है। जहाँ करण का 'से' साधन का अर्थ सूचित करता है, वहाँ अपादान का 'से' अलगाव का।
जैसे -
  • वह कलम से लिखता है। (कलम से - करण कारक)
  • पेड़ से पत्ते गिरते हैं। (पेड से - अपादान कारक)

(2) करण का प्रयोग 'हेतु' के अर्थ में
  • वह किसी काम से आया है। (काम से - काम हेतु)

(3) करण का प्रयोग कारण बतलाने के अर्थ में
  • वह प्लेग से मर गया। (मरने के कारण - प्लेग)

(4) करण का प्रयोग प्रेरणार्थक क्रिया में
  • जेलर कैदी से काम करवाता है। (कर्ता जेलर है. कैदी नहीं)
  • संपादक लेखक से किताब लिखवाता है। (कर्ता संपादक है, लेखक नहीं)

(5) अपादान का प्रयोग दिशा बोध कराने में
  • बिहार झारखण्ड से उत्तर है।
  • मोहन सोहन से लंबा है।

(6) अपादान का प्रयोग समय-बोध कराने में
  • मैं सुबह से पढ़ रहा हूँ।
  • वह दो वर्षों से तबला सीख रहा है।

(7) कर्ता कारक के रूप में जब अशक्ति प्रकट करनी हो
  • राम से रोटी खायी नहीं जाती। (कर्मवाच्य)
  • सीता से चला नहीं जाता। (भाववाच्य)

(8) कर्म कारक के रूप में जब क्रिया द्विकर्मक रहती है
  • छात्र गुरु से हिन्दी सीख रहा है।
  • सीता गीता से वीणा सीख रही है।

(9) जाति, स्वभाव, प्रकृति, लक्षण आदि प्रकट करने में
  • राम जाति से क्षत्रिय है।
  • वे स्वभाव से दयालु हैं।

'में' और 'पर' का प्रयोग कहाँ-कहाँ होता है
‘में' और 'पर' अधिकरण कारक के चिह्न हैं। इनका प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है

(क) 'में' का प्रयोग

(1) अधिकरण कारक के रूप में वस्तु, स्थान आदि के भीतर की स्थिति बतलाने में
  • छात्र कमरे में है।
  • पानी में मछली है।

(2) अधिकरण कारक के रूप में प्रेम, घृणा, दोस्ती, दुश्मनी, आदि भावों को प्रकट करने में
  • मोहन और सोहन में मित्रता है। दोनों में बहुत प्रेम है।
  • आपमें शराफत कूट-कूटकर भरी है।

(3) अधिकरण कारक के रूप में. समय का बोध कराने हेतु
  • मैं सुबह में व्यायाम करता हूँ।

(4) अधिकरण कारक के रूप में वस्त्र या पोशाक के भाव प्रकट करना औरतें साड़ी में अच्छी लगती हैं।
  • आप धोती में अच्छे लगते हैं।

(5) अधिकरण कारक के रूप में जगह, स्थान आदि बतलाने में
  • वह मुम्बई रहता है। (में - लुप्त है)
  • मैं अब दिल्ली नहीं रहता। (में - लुप्त है)

(6) करण कारक के रूप में किसी वस्तु का मूल्य बतलाने हेतु
  • वह वस्त्र कितने रूपये में है?

(ख) 'पर' का प्रयोग
अधिकरण कारक में निम्नांकित स्थितियों में होता है

(1) ऊपर का बोध कराने के लिए
  • वह छत पर बैठा है। (छत के ऊपर)

(2) समय, दूरी तथा अवधि का बोध कराने के लिए
  • वह दस बज कर पाँच मिनट पर स्कूल गया। (समय)
  • राँची यहाँ से दस मील पर है। (दूरी)
  • वह पाँच दिनों पर लौटा। (अवधि)

(3) संप्रदान कारक के रूप में मूल्य बताने के लिए
  • वह एक हजार रुपये मासिक पर काम नहीं करेगा।
  • आपका ईमान पैसे पर बिक गया।

संज्ञा की कारक-रचना

बालक
कारक एकवचन बहुवचन
कर्ता कारक बालक, बालक ने लड़का, लड़का ने
कर्म कारक बालक, बालक को लड़का, लड़का को
करण कारक बालक (से, द्वारा) बालकों (से, द्वारा)
संप्रदान कारक बालक के लिए बालकों के लिए
अपादान कारक बालक से बालकों से
सम्बन्ध कारक बालक (का, के, की) बालकों (का, के की)
अधिकरण कारक बालक (में, पर) बालकों (में, पर)
संबोधन कारक हे बालक हे बालकों

लड़का
कारक एकवचन बहुवचन
कर्ता कारक लड़का, लड़का ने लड़के, लड़कों ने
कर्म कारक लड़का, लड़का को लड़के, लड़कों को
करण कारक लड़के लड़कों
संप्रदान कारक लड़का के लिए लड़कों के लिए
अपादान कारक लड़का से लड़कों से
सम्बन्ध कारक लड़का (का, के, की) लड़कों (का, के की)
अधिकरण कारक लड़का (में, पर) लड़कों (में, पर)
संबोधन कारक हे लड़का हे लड़कों

नदी
कारक एकवचन बहुवचन
कर्ता कारक नदी, नदी ने नदियाँ, नदियों ने
कर्म कारक नदी, नदी को नदियाँ, नदियों को
करण कारक नदी (से द्वारा) नदियाँ (से द्वारा)
संप्रदान कारक नदी के लिए नदियों के लिए
अपादान कारक नदी से नदियों से
सम्बन्ध कारक नदी (का, के, की) नदियों (का, के की)
अधिकरण कारक नदी (में, पर) नदियों (में, पर)
संबोधन कारक हे नदी हे नदियों

बन्धु
कारक एकवचन बहुवचन
कर्ता कारक बन्धु, बन्धु ने बन्धु, बन्धुओं ने
कर्म कारक बन्धु, बन्धु को बन्धु, बन्धुओं को
करण कारक बन्धु बन्धुओं
संप्रदान कारक बन्धु के लिए बन्धुओं के लिए
अपादान कारक बन्धु से बन्धुओं से
सम्बन्ध कारक बन्धु (का, के, की) बन्धुओं (का, के की)
अधिकरण कारक बन्धु (में, पर) बन्धुओं (में, पर)
संबोधन कारक हे बन्धु हे बन्धुओं

कारक संबंधित प्रश्नोत्तरी

'रमेश जयपुर से दिल्ली जा रहा है।' इस वाक्य में कारक है
  1. सम्बन्ध कारक
  2. अपादान कारक
  3. करण कारक
  4. सम्प्रदान कारक
अपादान कारक

'पीयूष राम को पीट रहा है। इसमें रेखांकित शब्द में कारक है
  1. कर्म कारक
  2. कर्ता कारक
  3. अपादान कारक
  4. संबंध कारक
कर्ता कारक

'पूजा को नौकरी नहीं करनी है।' इस वाक्य में रेखांकित अंश है
  1. कर्म कारक
  2. कर्ता कारक
  3. कर्म और कर्ता
  4. सम्प्रदान कारक
कर्ताकारक

'वह सिंह से भीत है।' में कौनसा कारक है?
  1. करण कारक
  2. अपादान कारक
  3. सम्प्रदान कारक
  4. अधिकरण कारक
अपादान कारक

द्विकर्मक वाक्य में 'को' परसर्ग आता है
  1. मुख्य कर्म के बाद
  2. कर्ता के बाद
  3. गौण कर्म के बाद
  4. कहीं नहीं
गौण कर्म के बाद

निम्नलिखित में से किसमें सही प्रयोग हुआ है
  1. उस के लिए
  2. उस-के-लिए
  3. उसके लिए
  4. उस केलिए
उसके लिए

निम्नलिखित में से कारक प्रयोग की दृष्टि से कौनसा वाक्य शुद्ध है
  1. हमने आमेर को अच्छी तरह देखा है।
  2. आज तो बजट के ऊपर बहस होगी।
  3. अमित घर में ही था पर मिलने नहीं आया।
  4. खाना कपड़ा का पैसा कौन देगा?
अमित घर में ही था पर मिलने नहीं आया।

निम्नलिखित में अपादान कारक प्रयोग का क्रमांक है
  1. गुरुजी से पूछो
  2. वह हवाई जहाज से लंदन पहुँचा।
  3. मैं चाकू से फल काटता हूँ।
  4. पुजारी कुत्ते से डरता है।
पुजारी कुत्ते से डरता है।

'प्रशान्त भिखारी को रोटी देता है।' रेखांकित शब्द का कारक है
  1. कर्म कारक
  2. सम्प्रदान कारक
  3. सम्बन्ध कारक
  4. अधिकरण कारक
सम्प्रदान कारक

निम्न में से किस वाक्य में करण कारक प्रयुक्त हुआ है
  1. प्रेम जयपुर से जोधपुर आया।
  2. बच्चा छत से गिर पड़ा।
  3. वह साइकिल से आफिस जाता है।
  4. पुजारी कुत्ते से डरता है।
वह साइकिल से आफिस जाता है।

'किसान ने भूमि पर हल चलाया।' इस वाक्य में कर्ता एवं अधिकरण क्रमशः है
  1. किसान, हल
  2. भूमि, हल
  3. किसान, भूमि
  4. हल, भूमि
किसान, भूमि

'राम कलम से लिखता है।' इस वाक्य में कर्ता के अतिरिक्त और कौनसा कारक है?
  1. कर्म कारक
  2. अपादान कारक
  3. करण कारक
  4. सम्बन्ध कारक
करण कारक

कर्ता कारक का विभक्ति चिह्न है
  1. को
  2. से
  3. ने
  4. के लिए
ने

'को' और 'के लिए' किस कारक के चिह्न हैं?
  1. सम्प्रदान कारक
  2. करण कारक
  3. अपादान कारक
  4. संबोधन कारक
सम्प्रदान कारक

'कारक' का अर्थ है?
  1. कार्यकर्ता
  2. क्रिया को करने वाला
  3. कारवाला
  4. कारखाने वाला
क्रिया को करने वाला

FAQ :

कारक किसे कहते हैं?
संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जो वाक्य के अन्य शब्दों (खासकर क्रिया) से अपना सम्बन्ध प्रकट करता है कारक karak कहलाता है।

कारक के कितने भेद होते हैं?
कारकों के मुख्य आठ भेद हैं। 1. कर्ता कारक 2. कर्म कारक 3. करण कारक 4. सम्प्रदान कारक 5. अपादान कारक 6. सम्बन्ध कारक 7. अधिकरण कारक 8. सम्बोधन कारक

कर्ता कारक किसे कहते हैं?
संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जो क्रिया के करने वाले का बोध कराता है। अतः क्रिया के करने वाले को कर्ता। कारक कहते हैं।

कर्म कारक किसे कहते हैं?
जिस संज्ञा या सर्वनाम शब्द पर क्रिया का फल या प्रभाव पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते हैं।

करण कारक किसे कहते हैं?
वाक्य में कर्ता कारक संज्ञा या सर्वनाम के जिस साधन से क्रिया सम्पन्न करता है अर्थात् जिस संज्ञा या सर्वनाम की सहायता से कोई कार्य सम्पन्न हो, उसे करण कारक कहते हैं।
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