गर्भावस्था क्या है? अवस्थाएँ लक्षण एवं संकेत | pregnancy in hindi

गर्भावस्था क्या है?

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में मानव विकास का प्रथम सूत्रपात्र माता के गर्भाशय में शिशु भ्रूण के रूप में होता है। अर्थात् स्त्री के गर्भ में पल रहे शिशु के प्रारम्भिक निर्माण का मूल रूप को शिशु-भ्रूण कहा जाता है। भ्रूण में ही शिशु का निर्माण होता है। भ्रूण के सूत्रपात काल से ही स्त्री के गर्भाशय में शिशु के जन्म लेने की अवस्था गर्भावस्था कहलाती है। जिस स्त्री को यह गर्भावस्था रहती है उसे गर्भवती स्त्री कहते हैं। जब तक शिशु इस गर्भावस्था से मुक्त होकर संसार में प्रवेश नहीं करता, तब तक गर्भवती स्त्री के शरीर से ही भ्रूण का पोषण होता है।
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वर्तमान वैज्ञानिक युग में परखनली द्वारा गर्भाधान कराकर भ्रूण को शिशु स्वरूप प्रदान करते हैं। आज विश्व में अनेक परखनली बच्चे जीवित हैं। परखनली गर्भाधान का यह तरीका बहुत भयशील है। मातृत्व स्त्री का सहज एवं स्वाभाविक गुण है। स्त्री जन्मदायिनी एवं जीवनदायिनी होती है। प्रकृति की ओर से ही स्त्री को सृष्टि का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य मिला हुआ है।

गर्भावस्था के लक्षण एवं संकेत

गर्भावस्था का समय 9 माह 7 दिन का होता है। गर्भावधि की गणना रजोधर्म के अन्तिम दिन से प्रसव के दिन तक की होती है। जब स्त्री के अण्डाणु का निषेचन पुरुष के शुक्राण से हो जाता है तो इसे निषेचित अण्डाणु कहते हैं। इस निषेचित अण्डाणु में बड़ी तीव्र गति से गुणन क्रिया होती है, जिससे इनका वृद्धि एवं विकास होता है। जब ये निषेचित अण्डाणु गर्भाशय में अपना स्थान बना लेते हैं तथा माता के अपरा से पोषण प्राप्त करने लगते हैं तब गर्भावस्था के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

प्रथम 5 माह के लक्षण व संकेत
  1. मासिक चक्र कारुकना।
  2. प्रातःकाल जी मिचलाना- चक्कर आना व उलटी आना।
  3. अधिक नींद का आना- हार्मोन में परिवर्तन के कारण व शरीर में नवीन प्रक्रियाओं के समायोजन के लिए अतिरिक्त विश्राम की आवश्यकता होती है।
  4. लार का अधिक स्रवण- खट्टे या मीठे भोज्य पदार्थों को देखकर लार स्रवण बढ़ जाता है।
  5. आलस्य व सुस्ती का अनुभव।
  6. बार-बार मूत्र विसर्जन हेतु जाना- बढ़े हुए गर्भाशय का भार मूत्राशय पर पड़ता है, जिससे बार-बार स्त्री को मूत्र त्यागने की इच्छा होती है।
  7. गर्भ की हलचल का अनुभव- यह अनुभव 16-18सप्ताह की अवधि में होता है। गर्भस्थ शिशु के हाथ व पैरों की हलचल माँ को अनुभव होती है।
  8. पेट का बढ़ना- गर्भाशय के आकार में वृद्धि होने से उदर में भी वृद्धि होने लगती है।

प्रथम 5 माह की अवधि में चिकित्सक द्वारा जाने गये संकेत
  1. स्तनों में परिवर्तन- स्तनों का आकार बढ़ने लगता है। चौथे माह में स्तनों के चारों ओर कालिमा छा जाती है व पाँचवें माह तक स्तनों की शिराएं फूलने लगती हैं।
  2. गर्भाशय के आकार, आकृति एवं स्थिति में परिवर्तन- गर्भाशय सामान्य स्त्री की अपेक्षा गोलाकार हो जाता है। गर्भकाल के चौथे व पाँचवें माह तक गर्भाशय के मध्य भाग तथा अग्रभाग नाभि तक पहुँच जाते हैं। इस प्रकार गर्भाशय में वृद्धि होती है।
  3. भ्रूण की उपस्थिति से उत्पन्न संकेत- चौथे माह तक भ्रूण का विकास हो जाता है तथा अब यह गर्भ में हलचल करने लगता है जिसे माता स्पष्ट अनुभव करने लगती है। भ्रूण के विकास के साथ-साथ गर्भाशय में उल्व तरल पदार्थ भी बढ़ने लगता है।
  4. स्टेथोस्कोप से भ्रूण के हृदय की धड़कन को सुना जा सकता है।
  5. योनि का नीला पड़ना- गर्भावस्था के दूसरे माह से योनि के रंग में परिवर्तन होने लगता है। चौथे माह तक योनि का नीलापन अपनी चरम सीमा पर होता है जो प्रसव के समय तक बना रहता है।
  6. त्वचा में परिवर्तन- गर्भवती स्त्री के चेहरे का रंग पीला व आँखों के नीचे व ऊपर के होंठ के आस-पास कारंग कुछ काला हो जाता है।

अन्तिम 5 माह में उत्पन्न लक्षण एवं संकेत
  1. भ्रूण की क्रियाशीलता बनी रहती है व भ्रूण की गतिशीलता निरन्तर बढ़ती जाती है।
  2. स्तनों के भार में वृद्धि भी निरन्तर होती रहती है।
  3. पैरों की पेशियों में अन्त:उदरीय रक्तचाप के बढ़ने से संकुचन होने लगता है व सूजन आ जाती है।
  4. गर्भावस्था के अंतिम दो-तीन माह में गर्भवती स्त्री की महाप्राचीरा पेशियां मध्य पट पर अधिक दबाव पड़ने लगता है जिससे साँस लेने में कठिनाई का अनुभव होता है।
  5. गर्भाशयी संकुचन भी होता रहता है।

गर्भावस्था में आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन

  1. उपापचयात्मक परिवर्तन- गर्भवती स्त्री के शरीर में अधिक पोषण की माँग, भ्रूण द्वारा अधिक पोषण की माँग, स्तनपान हेतु अतिरिक्त पोषण की माँग, गर्भाशय की वृद्धि व विकास के लिए उपापचयात्मक परिवर्तन होता है। अमाशयिक स्राव भी कम होने लगता है जिससे भोजन अधिक समय तक अमाशय में पड़ा रहता है। प्रोजेस्टीरोन हार्मोन की उपस्थिति के कारण आँतों की पेशियों में शिथिलता आ जाती है। कब्ज, उल्टी, जी मिचलाने व छाती में जलन की समस्या भी होती हैं।
  2. मूत्र नलिकाओं में परिवर्तन- रक्त-परिसंचरण वृक्क की ओर अधिक होने लगता है जिससे वृक्क को अतिरिक्त कार्य करना पड़ता है। ग्लो मेरुलर फिल्टरेशन की गति 50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, जिससे अधिक यूरिया का निष्कासन होने लगता है, इस अवस्था में ग्लूकोज के पुन:शोषण की गति कम हो जाती है, जिससे मूत्र में ग्लूकोज आने लगता है। प्रोजेस्टीरोन हार्मोन के अत्यधिक स्राव से मूत्र नलिकाएं फूलकर वक्र हो जाती हैं।
  3. रक्त परिसंचरण में परिवर्तन- शरीर में रक्त की मात्रा बढ़ने के कारण हृदय को अधिक कार्य करना पड़ता है। रक्तवारी के आयतन (Volume) में वृद्धि हो जाती है। रक्त में हीमोग्लोबिन का प्रतिशत कम हो जाता है। रक्तचाप भी चौथे व पाँचवें माह तक बढ़ जाता है। रक्तचाप के बढ़ने से टाँगों की शिराएँ फूलकर मोटी हो जाती हैं।
  4. श्वसन सम्बन्धी परिवर्तन- गर्भाशय का बढ़ता भार महाप्राचीरा पेशी पर पड़ता है जिससे यह दब जाती है, फलतः श्वसन क्रिया में बाधा उत्पन्न होती है।
  5. हार्मोन्स में परिवर्तन- गर्भावस्था के दौरान एड्रीनोकोर्टीको तथा थाइरोट्रोपिन की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। एड्रीनल ग्रन्थियों से भी अधिक मात्रा में कार्टिकोस्टीरोन हार्मोन स्रावित होने लगता है, जिससे उदर पर निशान बन जाते हैं। रक्त में प्रोजेस्टीरोन हार्मोन की उपस्थिति के कारण उथला श्वास होता है। थायराइड ग्रन्थि का आकार बढ़ जाता है।
  6. नाड़ी संस्थान में परिवर्तन- नाड़ी संस्थान में परिवर्तन के कारण गर्भवती में तनाव, भय, चिन्ता, सिरदर्द आदि का अनुभव होता है।
  7. योनि मार्ग, ग्रीवा व गर्भाशय में परिवर्तन- हार्मोन्स का प्रभाव प्रजनन अंगों पर पड़ता है। स्ट्रोजन के कारण योनि मार्ग की श्लेष्मिक झिल्ली अधिक मोटी हो जाती है,रंग नीला पड़ जाता है। ग्रीवा में रक्त नलिकाओं का जाल बढ़ जाता है व ग्रीवा की संयोजक तन्तुएँ अधिक आर्द्रताग्राही हो जाती हैं।
  8. उदर व श्रोणि जोड़ों में परिवर्तन- उदर में वृद्धि के कारण वहाँ की त्वचा में तनाव पैदा होता है जिससे वहाँ की त्वचा लचीली होकर खिंचकर फट जाती है, फलस्वरूप पेट पर धारियाँ बन जाती हैं।
  9. पेशियों व कंकाल तन्त्र में परिवर्तन- ऐच्छिक पेशियों की गति कम हो जाती है। पीठ व कमर की पेशियों में भी खिंचाव होता है। मलाशय की पेशियों पर दबाव पड़ता है, जिससे गुदा-द्वार की शिराएँ फूल जाती हैं और बवासीर भी हो सकता है।

गर्भाधान- गर्भाधान के क्षण से ही विकास प्रक्रिया शुरू हो जाती है एवं गर्भित कोशिका जो डिम्ब (Ovum) एवं शुक्राणु (Sperm) के सम्मिलन से निर्मित होती है, उसमें समस्त आनुवंशिक सूचनाएँ कूट संकेतित (Coded) रहती हैं जिससे कुछ समयान्तराल के पश्चात् एक पूर्ण मानव का निर्माण होता है।

गर्भकालीन विकास की अवस्थाएँ

गर्भकालीन विकास की कुल अवधि 9 माह की होती है, इसे तीन अवस्थाओं में विभाजित किया है।

(1) बीजावस्था ( Zygote) : शुक्राणु से गर्भित डिम्ब से बीजावस्था प्रारम्भ होती है। यह दो सप्ताह तक चलती है। आन्तरिक भाग में निरन्तर कोशिका विभाजन की क्रिया चलती रहती है, जिसके कारण कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि होती है। गर्भाधान के 78दिन तक निषेचित डिम्ब माता के गर्भाशय में उपस्थित तरल पदार्थ में तैरता है। 10 दिन बाद यह माता के गर्भाशय की दीवार से चिपक जाता है, जिसे आरोपन कहते हैं। पहले समूह से शिशु शरीर का विकास होता है, दूसरे से नाभि नाल एवं अपरा का विकास तथा तीसरा कोशिकाओं का समूह पारदर्शी झिल्ली का रूप ग्रहण कर लेता है। इस झिल्ली में 'गर्भस्थ जीव' लिपटा रहता है तथा इसकी सुरक्षा होती है।

(2) भ्रूणावस्था (Embryo Period) : भ्रूणावस्था में विकास की अवस्था प्रारम्भ होती है। यह तीसरे सप्ताह से प्रारम्भ होकर माह के अंत तक होती है, बढ़ते हुए कोषों के समूह को 'भ्रूण' (Embryo) कहते हैं। इस अवधि में भ्रूण का संरचनात्मक विकास पूर्ण हो जाता है।
  • बाह्य परत - यह भ्रूण की सबसे ऊपरी एवं पहली परत होती है, इस परत से शिशु के बाल, नाखून, त्वचा, दाँत एवं नाड़ी मंडल का निर्माण होता है।
  • मध्य परत - इससे त्वचा के भीतरी भाग व मांसपेशियों का निर्माण होता है।
  • अन्तः परत - इससे सभी जीवनोपयोगी अंगों (फेफड़े, मस्तिष्क, यकृत, पाचन प्रणाली) का निर्माण होता है। भ्रूणावस्था के अन्त तक भ्रूण 1-1/4 इंच से 2 इंच की लम्बाई प्राप्त कर लेता है व वजन 15- 20 ग्राम का हो जाता है। माह अन्त तक भ्रूण के हृदय में धड़कन प्रारम्भ हो जाती है व नाभि नाल का विकास होता है।

(3) गर्भस्थ शिशु (Period of foetus) : यह अवस्था 3 माह से लेकर शिशु के जन्म के पहले तक की है। इसमें शरीर के विभिन्न अंगों एवं मांसपेशियों का विकास पूर्ण हो जाता है और सभी अंग क्रियाशील हो जाते हैं। लम्बाई, आकार, आकृति एवं वजन में तेजी से वृद्धि होती है।
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3 माह - इस माह में शिशु छोटा व मोटा अर्द्धवृत्त के समान दिखाई देने लगता है। रीढ़ की हड्डी बनने लगती है। शरीर लम्बा हो जाता है व माह के अन्त तक हाथ व पैर बनने प्रारम्भ हो जाते हैं। गुलाबी रंग की त्वचा बनती है। सिर का विकास शरीर के आकार का 1/3 भाग होता है व गुर्दै कार्य करना शुरू कर देते हैं। इसी माह में चेहरा भी बनने लगता है। बाह्य कान, आँख की पलकें बन जाती हैं और हाथ अधिक लम्बे होते हैं। लम्बाई 6-8सेमी व वजन 3/4 औंस हो जाता है। पोषण अब नाभिनाल से नाभिरज्जु (Umbilical cord) द्वारा होने लगता है। गर्भाशय के आकार में वृद्धि होती है।

4 माह - शिशु का सिर अधिक बड़ा होता है व छोटे-छोटे बाल भी उग जाते हैं। पीठ धनुषाकार होती है व हाथ-पैरों की उँगलियों में नाखून और मसूड़ों के भीतर दाँत का विकास होने लगता है। लिंग निर्धारण भी इसी माह में होता है। माह के अन्त तक आन्तरिक अंग अपना-अपना कार्य करने लगते हैं। लम्बाई 11-12 सेमी तथा वजन 100-110 ग्राम हो जाता है।

5 माह - हृदय की धड़कन में स्पष्टता आती है। मांसपेशियों के सक्रिय होने से क्रियाशीलता में वृद्धि होती है। लम्बाई 18-20 सेमी व वजन 280-300 ग्राम हो जाता है।

6 माह - इस माह में त्वचा पर कोमल रोएं उगने लगते हैं तथा शरीर पर सफेद क्रीम जैसा चिपचिपा तैलीय तरल पदार्थ भी एकत्रित होने लगता है जिसे वर्निक्स (Vermix) कहते हैं। माता को शरीर के अंगों के संचालन का अनुभव होने लगता है। शिशु की पलकें अलग-अलग हो जाती हैं। सिर का विकास तीव्र होता है। माह के अंत तक 30-32 सेमी लम्बाई व वजन 600-750 ग्राम तक होता है।

7 माह - इस माह तक सम्पूर्ण शिशु बन जाता है। हाथ-पैरों की उँगलियों में नाखून बन जाते हैं। सामान्यत: किसी एक स्थिति को ग्रहण कर लेता है। क्रियाशीलता कम हो जाती है। इस समय तक लम्बाई 15-16 इंच तथा वजन 1.5-2 किलो तक हो जाता है।

8 माह - आँखें पूर्ण रूप से विकसित हो जाती हैं, रेटिना का निर्माण हो जाता है, श्वसन क्रिया प्रारम्भ हो जाती है व त्वचा एवं शरीर में वसा एकत्रित होती है । शिशु परिपक्व हो जाता है।

9 माह - त्वचा का रंग स्वाभाविक हो जाता है। बाल उग आते है। होंठ पतले व गुलाबी रंग के होते हैं। वसीय तन्तुओं की मात्रा भी अधिक होती है। 9 माह के अन्त तक 3.0-3.5 किग्रा. वजन व लम्बाई 18-20 इंच तक हो जाती है। नौवें माह के अन्त तक गर्भवती स्त्री को गंभीर संकुचन होने लगता है। जन्म से पूर्व शिशु धीरे-धीरे गर्भाशय में नीचे की ओर खिसकने लगता है।

गर्भकालीन विकास को प्रभावित करने वाले कारक

  • गर्भवती माता का आहार
  • गर्भवती माता का स्वास्थ्य
  • मादक पदार्थों व शराब का सेवन
  • माता-पिता की अभिवृत्तियां
  • माता-पिता की उम्र
  • गर्भवती माता की संवेगात्मक अनुभूतियाँ

गर्भावस्था के कष्ट

  • जी मिचलाना या प्रात:वमन
  • कब्ज
  • छाती में जलन
  • अपच
  • अनिद्रा
  • बवासीर
  • पेशीय ऐंठन
  • बार-बार मूत्र उत्सर्जन
  • कमर का दर्द
  • शारीरिक सूजन
  • शिराओं का फूल जाना
  • योनि स्राव
  • अल्प श्वास
  • आहार के प्रति घृणा या प्रेम

गर्भवती स्त्री की देख-भाल

आहार - गर्भावस्था में आहार का बहुत महत्त्व है। संतुलित आहार के सेवन से स्वास्थ्य उत्तम रहता है। इस अवस्था में अतिरिक्त भोज्य तत्त्वों (कार्बोज, प्रोटीन, विटामिन व खनिज लवण) की आवश्यकता होती है।
गर्भवती स्त्री को अनाज (चावल, गेहूँ, बाजरा, जौ, मक्का, रागी आदि), दूध व दूध से बने भोज्य पदार्थ, पनीर, दाल, दही, अण्डा, मछली, सोयाबीन, मूंगफली, सूखे मेवे, तेल, घी, नारियल, तेल युक्त बीज, पपीता, आम, गाजर, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, गुड़, शलजम, हल्दी, केला आदि जो कि कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण (कैल्सियम, फास्फोरस, आयरन, आयोडीन) जल व रेशे आदि से भरपूर पोषण हो वही सन्तुलित आहार में शामिल करने चाहिए।
  1. गर्भवती माँ को एक या दो बार भरपेट भोजन न करके थोड़ी-थोड़ी मात्रा में 5-6बार भोजन करना चाहिए।
  2. मिर्च, मसाले युक्त, तला गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए।
  3. हरी पत्तेदार सब्जियाँ, छिलके सहित फल, पीली सब्जियाँ, सलाद, दूध, छाछ आदि को अधिक मात्रा में आहार में सम्मिलित करना चाहिए।
  4. जल की भी मात्रा अधिक लेनी चाहिए।
  5. छिलकेदार दाल, चोकर सहित आटा, अंकुरित अनाज आदि के सेवन से कब्ज की शिकायत नहीं होगी।
  6. रात्रि में सोने से दो घण्टे पूर्व भोजन कर लेना चाहिए।
  7. बासी व गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए।
  8. आराम व नींद पर्याप्त मात्रा में लेनी चाहिए व आरामदायक वस्त्र पहनने चाहिए ताकि शारीरिक क्रियाओं में बाधा न आए व रक्तसंचार सुचारु हों।
  9. हलका-फुलका हानि रहित व्यायाम करना चाहिए।
  10. स्वच्छ वायु व सूर्य का प्रकाश भी नियमित रूप से लेना चाहिए ताकि मानसिक शान्ति के साथ शरीर सुचारु रूप से चलता रहे।
  11. शारीरिक स्वच्छता, वातावरण स्वच्छता, आहार स्वच्छता व वस्त्र स्वच्छता का अच्छे से खयाल रखना चाहिए।
  12. मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए। गर्भवती माँ को खुश व चिन्तामुक्त, सकारात्मक होना चाहिए व सुबह-शाम खुले स्थान व स्वच्छ वायु में टहलना चाहिए।

गर्भावस्था से संबंधित महत्त्वपूर्ण बिन्दु

  • गर्भावस्था का समय 9 माह 7 दिन का होता है, गर्भावधि की गणना रजोधर्म के अन्तिम दिन से प्रसव के दिन तक की होती है।
  • मासिक चक्र का रुकना, प्रात:काल जी मिचलाना, अधिक नींद का आना, बार-बार मूत्र उत्सर्जन हेतु जाना, पेट का बढ़ना आदि गर्भावस्था के प्रथम पाँच माह के लक्षण हैं।
  • भ्रूण की क्रियाशीलता में वृद्धि, स्तनों के भार में वृद्धि, पैरों की पेशियों में संकुचन, गर्भाशयी संकुचन आदि गर्भावस्था के अन्तिम पाँच माह के लक्षण हैं।
  • उपापचयात्मक परिवर्तन, मूत्र नलिकाओं में परिवर्तन, रक्त परिसंचरण में परिवर्तन, श्वसन संबंधी परिवर्तन, उदर प्रदेश श्रोणि जोड़ों में परिवर्तन आदि गर्भावस्था में आन्तरिक रूप से होते हैं।
  • बीजावस्था, भ्रूणावस्था, गर्भस्थ शिशु-ये गर्भावस्था की तीन अवस्थाएँ हैं।
  • गर्भवती माता का आहार, मादक पदार्थों का सेवन, संवेगात्मक अनुभूतियाँ, स्वास्थ्य, माता-पिता की उम्र सभी गर्भकालीन विकास को प्रभावित करते हैं।
  • अनिद्रा, बवासीर, कमर दर्द, सूजन, अल्प श्वास, कब्ज, उल्टी, छाती में जलन आदि कष्ट गर्भावस्था में होते हैं।
  • माता और बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य के लिए माता को संतुलित भोजन करना चाहिए।
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