अमेरिका की कार्यपालिका | america ki karyapalika

अमेरिका की कार्यपालिका

चूँकि अमेरिका में अध्यक्षात्मक शासन अर्थात राष्ट्रपतीय शासन का प्रतिमान पाया जाता है। इसका आधार शक्तियों का पृथक्करण का सिद्धान्त है। फलतः मुख्य या प्रधान कार्यपालक (राष्ट्रपति) राज्य का वास्तविक अध्यक्ष है। वस्तुतः अमेरिकी शासन प्रणाली में राष्ट्रपति राजनीतिक और आलंकारिक (ornamental) दोनों ही प्रकार की कार्यपालिका है। इसका चुनाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रीति से लोगों द्वारा निश्चित अवधि (4 वर्ष) के लिए किया जाता है और जो विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं है। यद्यपि उसे महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकता है। वह विधायिका से लगभग स्वतंत्र होता है। राष्ट्रपति अपने मंत्रिमण्डल के सदस्यों को स्वयं मनोनीत करता है। मंत्रिगण राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं, संसद के प्रति नहीं। साथ ही वे संसद के सदस्य भी नहीं होते।
विधायिका के साथ बहुत कम सम्पर्क रहने के कारण अमेरिका के राष्ट्रपति की शक्ति कुछ न कुछ कम हो जाती है, किन्तु फिर भी वह संसार के सबसे अधिक राजनीतिक प्रमुखों में से एक है।
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विल्सन राष्ट्रपति के प्रभाव को लगभग असीमित मानते थे। सरकार के कार्यपालक या प्रशासकीय प्रधान के रूप में, राजनीतिक पार्टी के नेता के रूप में और कानून बनाने तथा नीति निर्धारण में राष्ट्र के पथ प्रदर्शक के रूप में राष्ट्रपति का अधिकार और उसका प्रभाव बहुत व्यापक है। वही एक ऐसा व्यक्ति है जिसे राष्ट्र का प्रवक्ता माना जा सकता है और जिस सभा-मंच से वह अपने देश को संदेश देता है वही राष्ट्रीय मंच है। संकटकाल की स्थिति में उसे और भी व्यापक अधिकार दिये जाते हैं।
इस प्रकार, मंत्रिमण्डलीय या संसदीय शासन पद्धति से भिन्न राष्ट्रपतीय सरकार "वह शासन पद्धति है जिसमें कार्यपालिका (राज्याध्यक्ष और उसके मंत्रीगण शामिल करके) सांविधानिक रूप में अपने कार्यकाल के बारे में विधायिका के नियंत्रण से स्वतंत्र होती है और अपनी राजनीतिक नीतियों के लिए उसके प्रति उत्तरदायी नहीं होती।" 

अमेरिकी राष्ट्रपतीय शासन की विशेषताएँ

उपर्युक्त तथ्यों के अवलोकन के पश्चात अमेरिकी शासन प्रणाली की निम्नवत विशेषताएँ प्रकट होती हैं-

राष्ट्रपति का वास्तविक प्राधिकार
कार्यपालिका का नेतृत्व राष्ट्रपति के हाथों में होता है। वह केवल नाममात्र का ही प्रधान नहीं है अपितु वह असली कार्यपालिका है। वह संविधान द्वारा दी गई समस्त शक्तियों का उपयोग करता है। वह अपने मंत्रियो को अपने सलाहकारों के रूप में नियुक्त कर सकता है जो उसके सहयोगी नहीं हैं, बल्कि जैसा अमेरिका में कहा जाता है, उसके 'महल के रक्षक' है। उसके मंत्रियों की संस्था को कैबिनेट का नाम दिया जाता है जो राष्ट्रपति के 'परिवार' या 'विशेषज्ञ मण्डल' (brains trust) की तरह होती है। राष्ट्रपति अपनी इच्छा से अपने मंत्रियों के विभागों में परिवर्तन कर सकता है और अगर कोई मंत्री अपने स्वामी का विश्वास खो बैठे तो राष्ट्रपति उसे हटा सकता है।
राष्ट्रपति राज्य के बहुत से उच्चाधिकारियों की नियुक्ति करता है जिनका किसी अन्य संस्था (जैसे-सिनेट) द्वारा समर्थन प्राप्त करना आवश्यक होता है। वह राष्ट्रीय नीतियों का निर्धारण करता है, सेनाओं की लामबन्दी का आदेश दे सकता है, संकटकालीन स्थिति की घोषणा कर सकता है और देश में कानूनों के प्रवर्तन और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए कोई भी आवश्यक कदम उठा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति के बारे में यह कहा जाता है कि- "वह सभी कार्यपालक निर्णयों का अंतिम स्रोत है; वह राष्ट्र की विदेश नीति का प्राधिकृत प्रवर्तक है।"

निर्वाचित प्रतिनिधि
वह जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। वह लोगों द्वारा निश्चित अवधि (4 वर्ष) के लिए चुना जाता है। कोई भी राष्ट्रपति अपने दो बार के कार्यकाल के लिए चुना जा सकता है।

महाभियोग की प्रक्रिया
संसदीय प्रणाली के प्रधानमंत्री की भाँति अमेरिकी राष्ट्रपति अपने पद से आसानी से नहीं हटाया जा सकता। इस बात की आशंका बनी रहती है कि राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का उस सीमा तक दुरुपयोग न करे, कि उसे हटाना आवश्यक हो जाए। इसके लिए संविधान में, महाभियोग की प्रक्रिया का प्रावधान है। राष्ट्रपति अपने पद की शपथ लेते हुए इस बात की प्रतिज्ञा करता है कि वह देश के संविधान की रक्षा करेगा। अगर वह इस पवित्र शपथ का उल्लंघन करता है तो उस पर 'कदाचार (Misbehaviour), कर्तव्य परायणता की गम्भीर अवहेलना या संविधान को भंग करने का आरोप लगाया जा सकता है जिसके लिए उसके खिलाफ महाभियोग चलाया जा सकता है। लेकिन यह महाभियोग प्रक्रिया बहुत कठिन होती है। राष्ट्रपति एन्ड्रयू जॉनसन के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया सिनेट में चला था किन्तु वह एक मत से बच गया। वस्तुतः महाभियोग की प्रक्रिया एक शक्तिशाली निवारक के रूप में व्यवस्था की जाती है जिसका उपयोग असाधारण परिस्थितियों में किया जा सकता है, ताकि उस स्थिति में राज्याध्यक्ष को उसके स्थान से हटाया जा सके अगर वह संविधान का उल्लंघन किया हो।

विधायिका को कार्यपालिका से अलग करना
अमेरिकन शासन प्रणाली (सरकार) शक्तियों के समेकन की बजाए शक्तियों के पृथक्करण व्यवस्था को अपनाया गया है। सरकार के तीनों अंगों के बीच शक्तियों का पूर्णतः पृथक्करण कर दिया गया है। राष्ट्रपति और उसके मंत्री विधायिका के सदस्य नहीं बन सकते। मंत्रीपद पाते ही उसे विधायिका की सदस्यता त्यागनी होगी। इसी कारण, मंत्रीगण विधायिका में उपस्थित नहीं होते और यद्यपि वे वहां जा सकते हैं और वहाँ अपने विचार भी प्रकट कर सकते हैं, किन्तु मतदान में भाग नहीं ले सकते। राष्ट्रपति विधायिका को अपने संदेश भेज सकता है और यह विधायिका के इच्छा पर निर्भर है कि वह राज्याध्यक्ष की इच्छाओं के अनुसार कार्य करे या न करे। विधायिका मंत्रियों के व्यवहार की निन्दा नहीं कर सकती, वह केवल राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई आरम्भ कर सकती है। विधायिका द्वारा पास किए गए विधेयक राष्ट्रपति के निषेधाकिार के अधीन होते हैं जो उन विधेयकों के बारे में अपने इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है, यदि वे बिल उनकी नीतियों के अनुकूल नहीं हैं। राष्ट्रपति द्वारा तैयार किया गया बजट विधायिका के सामने पेश किया जाता है जो उसे पास कर सकती है या उसमें कटौती का प्रस्ताव पास कर सकती है। इसी के कारण जब विधायिका में टकराव होता है तो गतिरोध की स्थिति पैदा हो जाती है।

विधायिका के प्रति जवाबदेह (उत्तरदायी) नहीं
चूँकि अमेरिका में अध्यक्षीय शासन प्रणाली है। अध्यक्षीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका से पूर्णतः स्वतंत्र होती है। वह न तो विधायिका पर आश्रित रहता है न ही अपने कार्यों के लिए उसके प्रति जिम्मेवार ही होता है। मंत्रीगण भी (जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है) राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी हैं, संसद के प्रति नहीं।

कार्यपालिका तथा विधायिका में सहयोग का अभाव
संसदीय प्रणाली के विपरीत अमेरिकी शासन में सरकार के अंगों के बीच सहयोग नहीं होता। चूँकि कार्यपालिका के सदस्य विधायिका के सदस्य नहीं होते हैं साथ ही एक दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। फलतः दोनों में, बहुधा संघर्ष हो जाता है।

नियंत्रण और संतुलन
यह देखने के लिए नियंत्रण और संतुलन की पद्धति की व्यवस्था की जाती है कि सरकार के तीनों अंगों ने केवल अपने-अपने क्षेत्र में रहें, बल्कि वे एक दूसरे के खिलाफ नियंत्रण का भी कार्य करें जिससे संतुलन अविच्छिन्न रहे। विधायी और कमर्चारी विभागों के बीच संबंध व्यवस्था बनी रहे जिससे कोई भी 'जार्ज तृतीय' की तरह स्वेच व्यवहार न करने लगे। इसी तथ्य की मान्यता के कारण मान्टेस्क्यू द्वारा विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया गया शक्तियों के 'पृथक्करण का सिद्धान्त', नियंत्रण और संतुलन की पद्धति द्वारा अनुपूरित किया गया है जिसकी इतनी बुद्धिमत्ता से अमेरिकी संविधान के निर्माताओं ने सूत्रपात किया है। इसके अनुसार, जबकि राष्ट्रपति नियुक्तियाँ और अन्य देशों के साथ संधियां कर सकता है, उनके लिए सिनेट द्वारा अनुसमर्थन प्राप्त होना आवश्यक है। इसी प्रकार, कांग्रेस द्वारा पास किए गए सभी विधेयक राष्ट्रपतीय निषेधाधिकार के अधीन हैं और कांग्रेस राष्ट्रपति के निषेधाधिकार पर उस सूरत में हावी हो सकती है, अगर वह उसी विधेयक को उसी रूप में दो तिहाई बहुमत से पुनः पास कर दे।

अमेरिका का राष्ट्रपति

“अमेरिका का राष्ट्रपति दुनिया का सबसे बड़ा (महान) शासक है-" ऑग। संयुक्त राज्य अमेरिका में, अध्यक्षात्मक सरकार की स्थापना की गई है, इसलिए वहां का राष्ट्राध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। वहां पर राष्ट्रपति के पास वास्तविक शक्तियाँ हैं। वह सरकार तथा राज्य दोनों का प्रधान है। क्योंकि अमेरिका में कोई प्रधानमंत्री का पद नहीं है। चूंकि अमेरिका में, शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धान्त लागू है, अत: वहां कार्यपालिका, जो वास्तविक प्रशासकीय संस्था है, स्वतंत्र है, वह किसी भी अन्य संस्था के ऊपर उत्तरदायी नहीं है।, फिलाडेल्फिया सम्मेलन (1787) में निश्चित कार्यावधि के लिए निर्वाचित एकल कार्यपालिका के पक्ष में समझौता हुआ। अतः संविधान में यह व्यवस्था की गई कि, कार्यपालिका शक्ति एक राष्ट्रपति में निहित होगी। (अनु० 2 भाग-I)

राष्ट्रपति पद के लिए योग्यता
अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद 2 (4) में राष्ट्रपति पद के लिए निम्नलिखित योग्यताओं का उल्लेख किया गया है और जो व्यक्ति इन योग्यताओं को अपने में समाहित करेगा, वही अमेरिका का राष्ट्रपति होगा-
  • वह संयुक्त राज्य अमेरिका का जन्मजात नागरिक हो,
  • वह 35 वर्ष की आयु का हो चुका हो,
  • वह कम से कम 14 वर्ष तक अमेरिका में रह चुका हो।

पद की अवधि
राष्ट्रपति की अवधि संविधान के अनुच्छेद 2 भाग-I में चार वर्ष के लिए निर्धारित की गई है। संविधान के 22वें संशोधन द्वारा कोई एक व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति पद धारण नहीं करेगा।

राष्ट्रपति का चुनाव
अमेरिकी राष्ट्रपति का निर्वाचन अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था की अत्यन्त महत्वपूर्ण बात है। संविधान के अनुच्छेद 2 में, राष्ट्रपति के निर्वाचन की विधि का उल्लेख किया गया है। संविधान निर्माताओं ने अप्रत्यक्ष प्रणाली द्वारा राष्ट्रपति के निर्वाचन की व्यवस्था रखी है। यही कारण है कि एक निर्वाचक मण्डल द्वारा राष्ट्रपति का निर्वाचन होता है।

निर्वाचक मण्डल
संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से उस अल्पसंख्यक समूह के द्वारा हो, जिसके चयन की विधि राज्यों की व्यवस्थापिकाएँ तय करें। इसके अतिरिक्त यह भी निश्चय किया गया कि प्रत्येक राज्य के लिए राष्ट्रपति के निर्वाचकों की संख्या उस राज्य के लिए निश्चित सीनेट के सदस्यों तथा प्रतिनिधि सभा के सदस्यों की संख्या के बराबर हो और इस प्रकार, विविध राज्यों के प्रतिनिधियों से मिलकर उस निर्वाचकमण्डल का निर्माण होगा जो राष्ट्रपति का निर्वाचन करेगा। इस निर्वाचक मण्डल का अर्थ राष्ट्रपति को चुनने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रखा गया।

निर्वाचक
मण्डल के उतने ही सदस्य रखे गए, जितने कि कांग्रेस के। 23वें सांविधानिक संशोधन द्वारा कोलंबिया जिले को भी तीन प्रतिनिधि निर्वाचक मण्डल में चुनने का अधिकार दे दिया गया है। इस प्रकार, आजकल निर्वाचक मण्डल के कुल 538 सदस्य हैं, जिसमें 435 प्रतिनिधि सभा के सदस्य, 100 सीनेट के सदस्य तथा 3 कोलंबिया जिले में सदस्य हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के यथार्थ स्वरूप को समझने के लिए निम्नलिखित तथ्यों का विश्लेषण करेंगे-

प्रत्याशियों का मनोनयन
राष्ट्रपति के निर्वाचन का पहला चरण देश के विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशियों का मनोनयन है। वह मनोनयन विभिन्न राजनीतिक दलों के अखिल राष्ट्रीय सम्मेलनों में किया जाता है। इन अखिल राष्ट्रीय सम्मेलनों के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव दल की प्रारंभिक इकाइयों द्वारा किया जाता है। इनका चुनाव कहीं राज्यों के सम्मेलनों में होता है तो कहीं राज्य की प्रारंभिक इकाइयों में। कहीं राज्य की केन्द्रीय समितियों में भी इसका प्रावधान है। इस तरह से, निर्वाचित प्रत्येक दल का राष्ट्रीय सम्मेलन राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति पद के लिए एक-एक प्रत्याशी मनोनीत करता है। प्रत्याशियों के चयन में सम्मेलन का ध्यान इस बात की ओर रहता है कि कौन से ऐसे राज्य हैं जो मत संख्या की दृष्टि से बड़े हैं तथा जिनमें दूसरे राजनीतिक दल का भी पर्याप्त अभाव है।

चुनाव अभियान
सर्वदलीय राष्ट्रीय सम्मेलन का कार्य दल के चुनाव घोषणापत्र की रचना, नई राष्ट्रीय समिति की स्थापना तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों के लिए दल के प्रत्याशियों के नाम निर्देशन के साथ समाप्त हो जाता है। इसके बाद राष्ट्रव्यापी चुनाव आन्दोलन होता है। यह प्रचार युद्ध काफी जटिल तथा खर्चीला होता है। उम्मीदवार चुनाव लड़ने में राजनीतिक व्यवसायिकों, सार्वजनिक संपर्क विशेषज्ञों तथा स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों से सहायता लेते हैं। उम्मीदवार रेडियो, टेलीविजन का सहारा लेते हैं और उनके द्वारा अपनी नीति तथा कार्यक्रम का प्रचार करते हैं।

निर्वाचक मण्डल
इसके बाद निर्वाचक मण्डल के लिए दोनों दलों द्वारा उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं। इन उम्मीदवारों के अपने-अपने दलों के राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशियों को वोट देने की प्रतिज्ञा लेनी पड़ती है। निर्वाचक मण्डल की सदस्य संख्या 538 है। निर्वाचकों का चुनाव मतदाताओं द्वारा होता है। प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार होता है।
निर्वाचक मण्डल के सदस्यों का चुनाव सूची प्रणाली के द्वारा होता है अर्थात मत किसी उम्मीदवार के लिए नहीं, अपितु पार्टी की सूची के पक्ष में डाले जाते हैं। अमेरिका में, यह प्रथा स्थापित हो गई है कि जिस उम्मीदवार को भी मतदाताओं के अधिकार वोट प्राप्त हो जाते हैं, उस राज्य के निर्वाचक मण्डल के सारे स्थान उस उम्मीदवार को प्राप्त हो जाते हैं। जो प्रत्याशी निर्वाचकों में से 270 स्थान प्राप्त कर लेता है, उसको यह विश्वास हो जाता है कि वह राष्ट्रपति बन जाएगा।

निर्वाचक मण्डल द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव
निर्वाचक मण्डल के सदस्य दिसम्बर के दूसरे बुधवार को अपने राज्यों की राजधानियों में इकट्ठे होते हैं और राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के लिए मत देते हैं। मतपत्रों को सीनेट तथा प्रतिनिधि सभा के सदस्यों की उपस्थिति में खोला जाता है। सीनेट का अध्यक्ष मतों को गिनता है और परिणाम की आपैचारिक घोषणा करता है। 20वें संशोधन के अनसार. अब राष्टपति 20 जनवरी को अपना पद ग्रहण करता है।

किसी भी उम्मीदवार को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में
यदि मतगणना का परिणाम ऐसा निकलता है जिससे किसी भी प्रत्याशी को आवश्यक बहुमत प्राप्त नहीं होता, तो राष्ट्रपति के निर्वाचन का कार्य प्रतिनिधि सभा करती है। वह उन तीन सबसे अधिक मत पानेवाले प्रत्याशियों में से राष्ट्रपति का निर्वाचन करती है, जिनके नाम सीनेट का अध्यक्ष उसके पास भेजता है। प्रतिनिधि सभा जब इस प्रकार राष्ट्रपति का चुनाव करती है, तब सभा के सदस्य राज्यवार मतदान करते हैं और उनके मत एक राज्य एक मत के आधार पर गिने जाते हैं। एक राज्य एक मत का निर्धारण उस राज्य विशेष के बहुसंख्यक दल के प्रतिनिधियों के मत से किया जाता है। यदि शपथ के अवसर पर राष्ट्रपति किसी कारण अयोग्य ठहरा दिया जाता है, तो राष्ट्रपति जबतक योग्य नहीं ठहरा दिया जाता, उसके दायित्व का निवर्हन उपराष्ट्रपति करता है।

राष्ट्रपति की शक्तियां एवं कार्य
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के प्रधान होने के कारण अमेरिका का राष्ट्रपति मात्र संवैधानिक प्रधान न होकर वास्तविक प्रधान है। अमेरिका के संविधान के अनुच्छेद-2 के अनुसार, कार्यपालिका शक्तियाँ संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति में निहित हैं .......... राष्ट्रपति संयुक्त राज्य की सेवा तथा समुद्री बेड़े इत्यादि का मुख्य सेनापति होता है ........ वह सीनेट के परामर्श तथा 2/3 बहुमत की स्वीकृति द्वारा अन्य देशों से समझौते कर सकता है, परन्तु अमेरिका के राष्ट्रपति की शक्तियों का इससे ठीक अनुमान नहीं लगता है क्योंकि धीरे-धीरे अनेक कारणों से व्यवहार में उसकी शक्तियाँ बढ़ गई हैं साथ ही न्यायालय ने भी, उसकी शक्तियों को विस्तत करने में सहायता की है। अर्नेस्ट एस. ग्रिफिथ ने राष्टपति के पद को अमेरिकी शासन की समस्त संस्थाओं में सबसे अधिक नाटकीय बताया है। मुनरो के शब्दों में- “अब तक लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति ने इतनी अधिक सत्ता का प्रयोग नहीं किया, जितनी कि अमेरिकी राष्ट्रपति प्रयोग करता है।" राष्ट्रपति के अधिकारों का वर्णन हम इस प्रकार, प्रस्तुत कर सकते हैं।

कार्यपालिका संबंधी शक्तियाँ
अमेरिका का राष्ट्रपति मुख्य कार्यपालक के रूप में काम करता है। मुख्य कार्यपालक के रूप में उसे निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त हैं

कानून को लागू करना
संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रशासनाधिकारी के रूप में सभी कानूनों- न केवल कांग्रेस द्वारा पारित कानूनों बल्कि संधियों व संघीय न्यायालय के निर्णयों को लागू करना और संविधान द्वारा दिये गये, अन्य कर्तव्यों का पालन करना राष्ट्रपति का कर्तव्य है। राष्ट्रपति पद की शपथ में ही उससे यह अपेक्षा की गई है, कि वह सभी कानूनों से महान अर्थात संविधान का पोषण एवं संरक्षण करेगा। युद्ध काल में, या आन्तरिक संकटकाल में, राष्ट्रपति का कार्य अत्यन्त गम्भीर एवं महत्वपूर्ण हो जाता है। राष्ट्रपति अपने इस अधिकार का प्रयोग एटर्नी जनरल के माध्यम से करता है। इसके लिए वह संघीय सेवकों को किसी भी प्रकार का आदेश दे सकता है। राष्ट्रपति कानूनों का उचित पालन नहीं करने पर किसी व्यक्ति या राज्य के विरुद्ध न्यायिक कार्यवाही करने का भी आदेश दे सकता है।

प्रशासन के प्रधान के रूप में अथवा शासन संचालन
राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रधान प्रशासक है। उसपर संयुक्त राज्य अमेरिका के शासन संचालन का पर्ण उत्तरदायित्व है। संघीय सरकार के समस्त प्रशासन संबंधी कार्य राष्टपति द्वारा ही संचालित होते हैं। कार्यपालिका क्षेत्र में सर्वोच्च होने के नाते राष्ट्रपति का यह कर्तव्य है कि वह यह देखे कि देश के संविधान, संविधियों एवं न्यापालिका के निर्णयों का समस्त देश में कार्यान्वयन हो रहा है या नहीं। शासन संचालन के लिए राष्ट्रपति को अध्यादेश अथवा अनुदेश, नियम, उपनियम या आदेश जारी करने का अधिकार है। राज्य के समस्त विभागों में, अध्यक्षों तथा अधीनस्थों को उसकी आज्ञा का पालन अनिवार्यतः करना पड़ता है।

नियुक्ति एवं पदच्युत का अधिकार 
राष्ट्रपति की कार्यपालिका शक्ति के अन्तर्गत नियुक्ति एवं पदच्युति का भी अधिकार शामिल है। संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रपति की नियुक्ति संबंधी शक्तियां दो प्रकार की होती हैं- उच्चस्तरीय नियुक्तियां एवं नियुक्तियां। उच्चस्तरीय पदों पर राष्ट्रपति सिनेट के परामर्श और सहमति से नियुक्ति करता है। निम्नस्तरीय पदों पर सिनेट की सहमति और परामर्श की आवश्यकता नहीं होती। उच्चस्तरीय पदों में राजदूत, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रपति के कैबिनेट के सदस्य (मंत्री), वाणिज्यदूत, प्रशासनिक आयोगों के अध्यक्ष, महान्यायवादी, संघीय सरकार की, अन्य अनेक उच्चाधिकारियों आदि आते हैं। इन सब नियुक्तियों के लिए सिनेट का अनुसमर्थन आवश्यक है।
राष्ट्रपति को कुछ पदाधिकारियों को पदच्युत करने का भी अधिकार है। जिस वर्ग के पदाधिकारियों को वह सिनेट के सहमति के बिना नियुक्त करता है, उन्हें वह अपने अधिकार के अन्तर्गत पदच्युत कर सकता है। उच्चतर पदों के पदाधिकारियों को कांग्रेस द्वारा पारित महाभियोग के प्रस्ताव पर वह हटा सकता है।

क्षमादान तथा मृत्युदण्ड स्थगित करना
प्रधान प्रशासनाधिकारी होने के कारण अपराधियों को क्षमादान करना, उनके दण्ड को कम करना या स्थगित
करना और सामूहिक क्षमादान करना राष्ट्रपति के विशेषाधिकार हैं (अनुच्छेद 2 भाग-2 के तहत)। क्षमादान के अधिकार का प्रयोग राष्ट्रपति कांग्रेस तथा न्यायालयों से पूर्ण स्वतंत्र होकर करता है, परन्तु इसकी दो सीमाएँ हैं- (1) जिस व्यक्ति को महाभियोग द्वारा दण्डित किया गया है राष्ट्रपति उसे क्षमा नहीं कर सकता है, और (2) वह केवल, उन्हीं मामलों में, अपने क्षमादान के अधिकारों का प्रयोग कर सकता है जिनमें अपराध संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुद्ध किया गया है न कि किसी राज्य कानून के विरुद्ध।

राष्ट्रपति और परराष्ट्र संबंध
राष्ट्र के प्रधान प्रशासनाधिकारी के रूप में राष्ट्रपति संयुक्त राज्य अमेरिका की परराष्ट्र नीति निर्धारित करता है और विदेशों से अमेरिका के संबंधों का संचालन करता है। 1936 ई० में 'करटिस राइट' (Curtis Wright) के मुकदमे में यह कहा गया कि, "राष्ट्रपति पूर्ण रूप से संघीय शासन का वैदेशिक संबंधों के निर्वहन में अधि कृत प्रवक्ता तथा साधन है।" वह विदेशों में भेजनेवाले राजदूतों एवं राजनयिकों की नियुक्ति करता है। केवल राष्ट्रपति ही संयुक्त राज्य अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता है। राष्ट्रपति ही विदेशी राजदूतों तथा विदेशी प्रतिनिधियों का स्वागत करता है तथा उनसे प्रमाण पत्र ग्रहण करता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नियमित करने और उनमें स्थायित्व लाने का प्रमुख साधन, जो संधि है और अमेरिका में संधि करने का अधिकार राष्ट्रपति के हाथों में एक ऐसा अस्त्र है जिससे वह अमेरिका की परराष्ट्र नीति को प्रभावित कर सकता है। वह युद्ध एवं शांति की घोषणा करता है, विदेशों के साथ आर्थिक, राजनीतिक, व्यापारिक एवं सामरिक समझौते पर हस्ताक्षर करता है। लेकिन यहां ध्यान देने की बात यह है कि विदेशों से की जानेवाली संधियों को प्रभावी होने के लिए सिनेट का समर्थन आवश्यक है। सिनेट द्वारा पुष्टि कराने की कठिनाई से बचने के लिए राष्ट्रपति ने एक नया ढंग निकाला है। प्रायः संधियां न कर, उनके स्थान पर प्रशासकीय समझौते किये जा सकते हैं। इन समझौतों में भी, वही शक्ति और प्रभावी होता है जो संधि में।
संयुक्त राज्य अमेरिका की परराष्ट्र नीति निर्धारित करने में राष्ट्रपति का महत्वपूर्ण हाथ होता है। किसी नीति की घोषणा करके और उसे लागू करने के लिए आवश्यक कार्यवाही करके वह उस नीति की सभी बातों और उद्देश्यों से देश को प्रतिबद्ध कर सकता है। राष्ट्रपति विदेशी सरकारों से संबंध स्थापित करता है तथा दूतावास खोल सकता है। राष्ट्रपति को किसी नये राज्य की मान्यता प्रदान करने का अधिकार है। राष्ट्रपति इस अधिकार का प्रयोग कर बहुत कुछ अमेरिका की परराष्ट्र नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध निर्धारित कर सकता है। आधुनिक युग में, वैदेशिक मामलों में कई प्रकार के संबंधों को विशेषकर सैनिक और सामरिक संबंधों को, गोपनीय रखा जाता है। इस दृष्टि से राष्टपति को गप्त समझौते करने का भी अधिकार प्रदान किया गया है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति का यह भी कर्तव्य है कि विदेश यात्रा करनेवाले और प्रवासी अमेरिकी नागरिकों को भी संरक्षण प्रदान करें। यदि प्रवास काल में, किसी भी नागरिक के साथ वहां दुर्व्यवहार किया जाता है तो राष्ट्रपति ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर हर्जाना देने की मांग कर सकता है। राष्ट्रपति रीगन ने अमरीकी नागरिकों की सुरक्षा के नाम पर ग्रेनेडा में 25 अक्टूबर, 1983 को सैनिक कार्रवाई की थी।

प्रतिरक्षा अधिकार
अमेरिकी सेना के विभिन्न अंगों-वायु, स्थल और नौसेना तथा नागरिक सेना का राष्ट्रपति ही प्रधान सेनापति है और इस रूप में अमेरिका की राष्ट्रीय प्रतिरक्षा का उत्तरदायित्व उसी पर होता है। प्रतिरक्षा व्यवस्था का केन्द्र-बिन्दु विशेषकर युद्ध संचालन में राष्ट्रपति ही होता है। स्थूल रूप में, राष्ट्रपति के प्रतिरक्षा अधिकारों के तीन मुख्य स्रोत हैं :
  • संविधान के अनुसार मुख्य प्रशासनाधिकारी होने के रूप में,
  • अमेरिकी सेना का प्रधान सेनापति होने के रूप में, और
  • कांग्रेस से प्राप्त अनुदान व अधिकार।
मुख्य प्रशासनाधिकारी के रूप में राष्ट्रपति को सिनेट की स्वीकृति से सेना के उच्च अफसरों को नियुक्त तथा पदच्युत करने का अधिकार है। उसे स्थल, जल तथा वायु विभागों को निरीक्षण करने और उनको नियमित करने का अधिकार है। उसे सैन्य नियमों को लागू करवाने का भी अधिकार है। वही स्थल सेना, वायुसेना, जल सेना के व्यय का बजट प्रस्तुत करता है।
राष्ट्रपति प्रधान सेनापति के रूप में जो भी आदेश जारी करता है उसको कानून की मान्यता प्राप्त होती है।
राष्ट्रपति का एक कर्तव्य यह भी है कि वह प्रत्येक राज्य में गणतंत्रीय शासन प्रणाली को बनाये रखने का विश्वास दिलाये और उनकी बाहरी आक्रमणों तथा आन्तरिक उपद्रवों से रक्षा करे। इस कर्तव्य का पालन करने के लिए भी राष्ट्रपति अपार अधिकारों को प्राप्त कर सकता है।
राष्ट्रपति कांग्रेस से भी साधन और अधिकार प्राप्त करता है। बहुधा कांग्रेस द्वारा स्वीकृत अनुदानों से राष्ट्रपति को युद्ध के लिए भर्ती करवाने, युद्ध सामग्री का उत्पादन, यातायात, संचार इत्यादि से संबंधित अनेक अधिकार प्राप्त हुए जिनका वह अपनी इच्छानुसार उपयोग कर सकता है।

विधि निर्माण संबंधी अधिकार
संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान के अनुच्छेद-2, भाग-3 के अनुसार राष्ट्रपति कांग्रेस को संघ की स्थिति के बारे में समय-समय पर सूचना देगा और उसके विचार के लिए उन कानूनों के बारे में योजनाएँ रखेगा जिनको वह आवश्यक तथा उपयुक्त समझेगा। वह कुछ असाधारण अवसरों पर सदनों के या दोनों में से एक का अधिवेशन बुलायेगा और दोनों के स्थगन के समय के बारे में मतभेद होने पर वह उतने समय के लिए स्थगित कर देगा जितना कि वह उचित समझे।
यद्यपि अमेरिकी संविधान शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित है परन्तु साथ में, संतुलन और नियंत्रण की भी व्यवस्था अपनाई गई है इसलिए जहां कांग्रेस को कानूनी शक्तियाँ दी गई हैं वहां राष्ट्रपति को भी उनमें भागदारी बनाया गया है। यह निम्नलिखित तरीके से स्पष्ट होता है अर्थात् संविधान में राष्ट्रपति को निम्नलिखित विधायी अधिकार प्रदान किये हैं-
वह कांग्रेस का विशेष अधिवेशन बुला सकता है, यहां राष्ट्रपति कांग्रेस के अधिवेशनों को नियंत्रित करता है।
यदि कांग्रेस के दोनों सदन बैठक स्थगित करने के समय पर सहमत नहीं हों, तो उसे उनको स्थगित करने का अधिकार है।
वह समय-समय पर ऐसे संदेश भेज सकता है जिसमें संयुक्त राज्य की स्थिति की सूचना का वर्णन हो।
कांग्रेस द्वारा विचार किए जाने के लिए विषयों की प्रस्तावना कर सकता है।
विधायी क्षेत्र में, वह राष्ट्र का नेतृत्व करता है। इस संबंध में संविधान में केवल इतना कहा गया है कि राष्ट्रपति कानून बनाने के लिए कांग्रेस के सामने प्रस्ताव रखेगा।
कांग्रेस द्वारा स्वीकृत विधेयकों, आदेशों और प्रस्तावों पर हस्ताक्षर करना अथवा उन्हें हस्ताक्षर किये बिना अपनी आपत्तियों सहित पुनर्विचार के लिए कांग्रेस को लौटा देना। इसे राष्ट्रपति का निषेधाधिकार या वीटो कहा जाता है। 

वित्तीय शक्तियाँ
वित्तीय क्षेत्र में भी राष्ट्रपति को महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त है। 1921 ई० के बजट एवं लेखांकन अधिनियम पारित होने के बाद बजट के संबंध में, राष्ट्रपति के अधिकार बढ़ गए हैं। 1921 ई० के बाद बजट निर्माण करने तथा इस संबंध में कांग्रेस को आवश्यक सूचना देने की जिम्मेदारी भी राष्ट्रपति को सौंपी गई है।

न्यायिक शक्तियाँ
अन्य देशों के राज्याध्यक्षों की तरह अमेरिका के राष्ट्रपति को भी कतिपय न्यायिक शक्तियाँ प्राप्त हैं। राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, सिनेट के परामर्श एवं सहमति से करता है। संघ के विरुद्ध किए गए अपराधों के संबंध में दिए गए, दण्ड को राष्ट्रपति क्षमा कर सकता है, कम कर सकता है या स्थगित कर सकता है। उसे एक साथ अनेक व्यक्तियों को भी क्षमा करने का अधिकार है। इसे सर्वक्षमा कहा जाता है। महाभियोग के आधार पर दण्डित व्यक्तियों को क्षमा करने का अधिकार, उसे नहीं है।

राष्ट्रपति एक दलीय नेता के रूप में
राष्ट्रपति अपने दल का नेता होता है। वह अपने दल की राष्ट्रीय समिति के चेयरमैन को नियुक्त करता है और उसके परामर्श से अपने दल के अन्य महत्वपूर्ण पदों को भरता है। उसके दल के पदाधिकारी दल की सभी महत्वपूर्ण नीतियों और निर्णयों के बारे में, उससे परामर्श करते हैं और प्रायः उसके विचार सब महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णायक होते हैं। वह सारे देश में, अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है। कांग्रेस के दोनों सदनों के लिए अपनी पार्टी का उम्मीदवार मनोनीत करने में राष्ट्रपति भाग लेता है। अनेक उपायों से वह पार्टी के हितों को पुष्ट करता है तथा आगे बढ़ाता है। राष्ट्रपति अपने नेतृत्व का उपयोग पार्टी के मतभेद तथा निर्बलताओं आदि को दूर करने के लिए भी कर सकता है। अमेरिकन राष्ट्रपति राष्ट्र की ओर उन नीतियों, कार्यक्रमों तथा प्रतिज्ञाओं की पूर्ति के लिए देखता है जिनका राष्ट्रपति अपने चुनाव के समय अपने दल की ओर से वचन दिया था।

राष्ट्रपति एक राष्ट्रीय नेता के रूप में
संयुक्त राज्य अमेरिका में, राष्ट्रपति एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेता बन गया है। अमेरिका का राष्ट्रपति घरेलू तथा विदेशी मामलों में अपने राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में तथा विदेशों में यात्रा करते समय वह अपने देश का प्रमुख प्रतिनिधि होता है। वह अपने राष्ट्र की ओर से वैदेशिक नीतियों के बारे में अनेक बयान देता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति केवल राजनीतिक व्यवस्था का ही प्रधान नहीं होता, बल्कि वह वहां के राष्ट्रीय जीवन का भी प्रधान होता है, वह केवल शासन अध्यक्ष ही नहीं बल्कि राज्याध्यक्ष भी होता है। 'ह्वाइट हाउस' अमेरिका में सबसे बड़ा मंच है जिसकी ओर महत्वपूर्ण सार्वजनिक समस्याओं को हल करने के निमित्त तथा पथ-प्रदर्शन के लिए लाखों लोगों की दृष्टि लगी रहती है। राष्ट्रपति के संबंध में विल्सन ने एक बार लिखा था कि- "सारे राष्ट्र ने उसे चुना है और राष्ट्र, इस बात को जानता है कि उसका कोई दूसरा राजनीतिक प्रवक्ता नहीं है। सार्वजनिक महत्व के मामलों में वही राष्ट्र की वाणी या प्रवक्ता है। वह किसी एक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधि नहीं वरन् सारी जनता का प्रतिनिधि है। यदि वह राष्ट्रीय विचारधारा की सही व्याख्या करता है और दृढ़तापूर्वक उसकी स्वीकृति के लिए अटल रहता है तो उसका कोई विरोध नहीं कर सकता और यदि राष्ट्रपति अन्तर दृष्टि वाला और योग्य है तो उसके कार्य से जनता को जो आनन्द व हर्ष मिलता है वह अन्यत्र असम्भव है। जनता राष्ट्र को एक वद्ध होकर कार्यशील देखना चाहती है। वह एक के नेतृत्व के लिए लालायित रहती है।"
इससे स्पष्ट है कि राष्ट्रपति ही राजनीतिक रंग-मंच का केन्द्र बिन्दु होता है। उसका व्यक्तित्व और सार्वजनिक जीवन उसके देशवासियों की गहरी अभिरुचि का विषय है। उसके संदेशों और भाषणों को लाखों लोग सुनते और पढ़ते हैं।

राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियाँ
युद्ध, आन्तरिक उपद्रव, आर्थिक संकट से उत्पन्न राष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति को अपार अधिकार प्राप्त हैं। जब तक संकट रहता है तब तक जितने भी अधिकारों की वह मांग करता है वे उसे प्राप्त हो सकते हैं। संकटकाल में, राष्ट्रपति राष्ट्र का नेतृत्व करता है। राष्ट्रपति रुजवेल्ट ने 1939 में युद्ध प्रारम्भ होने पर ऐसे ही संकट की घोषणा की थी और दिसम्बर 1941 के शुरू में प्रवेश होते समय बहुत से ऐसे कानून बनाये गये थे जिनके द्वारा राष्ट्रपति का नियंत्रण औद्योगिक और अन्य क्षेत्रों में व्यापक कर दिया था। संकटकाल के समय कांग्रेस के अतिरिक्त उच्चतम न्यायालय का अंकश भी राष्ट्रपति के ऊपर रहता है। जब राष्ट्रपति ट्रमैन ने कोरिया के युद्ध के समय प्रतिरक्षा के प्रयासों में हड़ताल से उत्पन्न बाधाओं को रोकने के। लिए इस्पात की मिलों पर कब्जा कर लिया, तो सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के इस कार्य को अवैध घोषित कर दिया।

निष्कर्षतः, यह कहा जा सकता है कि अमेरिका में राष्ट्रपति का पद अत्यधिक महत्व का है। राष्ट्र में उसे सर्वोपरि स्थान है। वह केवल कार्यपालिका का ही प्रधान नहीं अपितु समस्त देश का प्रधान भी होता है। राज्य के अध्यक्ष के नाते अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रथम नागरिक है और राष्ट्र की एकता का प्रतीक है, वही शासन के अध्यक्ष के नाते समस्त कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग करता है, वह कार्यपालिका के अतिरिक्त व्यवस्थापिका का भी नेतृत्व करता है। वह राष्ट्र के गौरवपूर्ण और प्रवीण दोनों है।
इस तरह, संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रपति अत्यन्त सम्मानित और शक्तिशाली व्यक्ति है। संकटकाल में उसकी शक्तियों में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा सकती है। फिर भी उसे निरकुंश शक्तियां प्राप्त नहीं हैं और वह नागरिकों के स्वतंत्रता का दमन या लोकमत की अवहेलना नहीं कर सकता है। अन्त में, हम कह सकते हैं कि ब्रिटिश शासन प्रणाली के अन्तर्गत महारानी और प्रधानमंत्री जो भूमिकाएँ निभाते हैं, अमेरिकी शासन प्रणाली के अन्तर्गत उन्हें अकेला राष्ट्रपति निभाता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति
अमेरिका का राष्ट्रपति दुनिया का सबसे बड़ा शासक है- औद्योगिक क्षमता और पूँजी की शक्ति के हिसाब से सारी दुनिया में संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे बड़ा देश माना जाता है। ऐसे महान देश में संविधान कार्यपालिका की सम्पूर्ण शक्ति राष्ट्रपति में निहित कर दी गई है। वह राष्ट्राध्यक्ष है तथा उसके पास वास्तविक शक्तियां हैं अर्थात वह सरकार तथा राज्य दोनों का प्रधान है, क्योंकि वहां कोई प्रधानमंत्री पद की व्यवस्था नहीं है। यहाँ पर ऑग का मत है कि "अमेरिका का राष्ट्रपति दुनिया का सबसे बड़ा शासक है।"
संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति पर जितना उत्तरदायित्व है और उसकी जितनी शक्तियां हैं, उतनी उस देश में या विश्व के किसी दूसरे देश में किसी अन्य अधिकारी की नहीं है। उसका पद विश्व के शासकों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। अमेरिका का राष्ट्रपति वास्तव में सबसे शक्तिशाली शासनाध्यक्ष है।

अमेरिका का राष्ट्रपति राजा तथा प्रधानमंत्री दोनों
लास्की के मतानुसार "अमेरिका का राष्ट्रपति एक अंश तक राजा और दूसरे अंश तक प्रधानमंत्री दोनों है। वास्तव में, वह ब्रिटिश सम्राट की भाँति राज्य एवं ब्रिटिश प्रधानमंत्री की भाँति शासन करता है। इसी प्रकार ब्रोगन ने अपनी पुस्तक "अमेरिका की शासन पद्धति" में लिखा है कि "अमेरिका के राष्ट्रपति के व्यक्तित्व में राजा और प्रधानमंत्री दोनों के पदों का समावेश है।" बेजहाट के मतानुसार "इंगलैंड में यह उत्तरदायित्व दो भागों में विभक्त है- प्रथम 'सम्मानित (Dignified) और द्वितीय "कुशल" (Efficient)। वहां पर राजा राज्य का सम्मानित अंग है तथा सार्वजनिक समारोहों में मुख्य कार्य राजा द्वारा किया जाता है। परन्तु राज्य की वास्तविक कार्यपालिका शक्ति अर्थात "कुशलता" का प्रयोग प्रधानमंत्री ही करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्यपालिका के दोनों अंग "सम्मानित" तथा "कुशलता' राष्ट्रपति के एक ही पद में अन्तनिर्हित कर दिये गये हैं। यदि एक ओर अमेरिका का राष्ट्रपति राजा के सदृश्य सार्वजनिक समारोहों का उद्घाटन करता है तब दूसरी ओर वह प्रधानमंत्री के सदृश्य राज्य की कार्यपालिका शक्ति का वास्तविक रूप में प्रयोग भी करता है।

अमेरिका का राष्ट्रपति सत्ताधारी नहीं
संविधान निर्माता अमेरिका के राष्ट्रपति को शक्तिशाली अधिकारी बनाना चाहते थे, परन्तु साथ ही वे उसे निरंकुश सत्ताधारी नहीं बनने देना चाहते थे। इंगलैंड की रानी से कहीं अधिक अमेरिका का राष्ट्रपति वास्तव में कार्यपालिका का सर्वोच्च है। इंगलैंड की रानी तो नाममात्र की शासिका है। वैसे इंगलैंड की रानी जिस तरह सत्ता का प्रतीक होने के नाते विदेशी राजदूतों के परिपत्रों को स्वीकार करती है, राज्य के उत्सवों की अध्यक्षता करती है, संसद का उद्घाटन करती है और अन्य औपचारिक राजकीय रस्में अदा करती है, उसी तरह अमेरिका का राष्ट्रपति भी राष्ट्र के अध्यक्ष के रूप में ऐसी ही तमाम बातें करता है, परन्तु यहां का राष्ट्रपति रानी की तरह केवल उत्सवों का उद्घाटनकर्ता और नाममात्र का शासक नहीं है। इस अर्थ में, उत्सवों की प्रधानता और रस्मों की अदायगी, इस पद की बाहरी शोभामात्र है।

अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम से राज्य नहीं चलता, वरन् वह सर्वोच्च सत्ता का उपयोग करता है
संविधान ने जो कुछ शक्ति और अधिकार राष्ट्रपति को दिये हैं उनका वह निर्वाध प्रयोग कर सकता है और करता है। उसके नाम से राज्य नहीं चलता, वह आनुवंशिक आधार पर सिहांसन पर नहीं बैठता, परन्तु अपने कार्य काल में वह जिस सत्ता का उपयोग करता है बड़े-बड़े राजाओं के लिए ईर्ष्या की वस्तु बनती है। कार्यपालिका के क्षेत्र में वह सर्वोच्च शासक है ही, विधि संबंधी बातों में भी प्रभावशाली ढंग से हस्तक्षेप कर सकता है। यद्यपि विधि निर्माण के क्षेत्र में उसका सीमित अधिकार है तथापि राजनीतिक विकास ने विधायिनी क्षेत्र में भी उसे व्यापक अधिकार दिए हैं। शक्ति पृथक्करण एवं अवरोध तथा संतुलन सिद्धान्त के कारण राष्ट्रपति को विधायिनी क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की गई है। वह कांग्रेस द्वारा पारित विधेयकों को निषेध (Veto) कर सकता है। वह संदेश भेजकर कांग्रेस पर मनोनुकूल विधेयक लाने के लिए सफलता पूर्वक दबाव डाल सकता है और इस मामले में उसकी नियुक्तियों की विशाल शक्ति सीनेटरों और हाउस के सदस्यों को प्रभावित करने में सहायक सिद्ध होती है। कांग्रेस द्वारा विचार किए जाने के लिए विषयों की प्रस्तावना कर सकता है। विधायी क्षेत्र में वह राष्ट्र का नेतृत्व करता है क्योंकि इस संबंध में संविधान में केवल इतना कहा गया है कि राष्ट्रपति कानून बनाने के लिए कांग्रेस के सामने प्रस्ताव रखेगा।
अमेरिका का राष्ट्रपति वास्तविक रूप में मुख्य कार्यपालक है तथा देश का सर्वोच्च नेता है। वह सम्पूर्ण शासन का केन्द्र बिन्दु है। सीधे जनता द्वारा चुने जाने की व्यवस्था का विकास ने मुख्य प्रशासक (राष्ट्रपति) में यह विश्वास पैदा कर दिया है कि वह राष्ट्र के प्रवक्ता के रूप में, कांग्रेस से किसी दृष्टि से कम नहीं है। विगत 60 वर्षों में कांग्रेस की साधन सम्पन्नता और कुशलता का ह्रास हुआ है। उससे राष्ट्रपति के नेतृत्व और नियंत्रण में वृद्धि हुई है। उसके लिए अपनी इच्छा को कार्यान्वित करने का मार्ग खुल गया है। कानून निर्माण में, नीति निर्धारण में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। विदेशों से अमेरिका के संबंधों का संचालन भी वही करता है जैसा कि 1936 में 'Curtis Wright' के मुकदमें में भी यह कहा गया कि- "राष्ट्रपति पूर्ण रूप से संघीय शासन का वैदेशिक संबंधों के निर्वहन में अधिकृत प्रवक्ता तथा साधन है। सिनेट द्वारा पुष्टि कराने की कठिनाई से बचने के लिए राष्ट्रपति ने एक नया ढंग संधि न कर, प्रशासकीय समझौते करता है। इन समझौतों में भी वही शक्ति और प्रभाव है जो संधि में। देश की प्रतिरक्षा का उत्तरदायित्व भी उसी पर है। वस्तुतः सर्वोच्च सेनापति और देश की विदेश नीति का प्रमुख निर्माता होने के रूप में वह राज्य की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी है और सेना संचालन तथा सेना की व्यवस्था करते समय ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर सकता है कि कांग्रेस को युद्ध या शांति की व्यवस्था करने के लिए बाध्य होना पड़े। उसे इन कार्यों में कैबिनेट की सहायता मिलती है। संकटकाल में राष्ट्रपति अपार शक्तियों का स्वामी बन जाता है।
इधर द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त एक महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि अमेरिकी राष्ट्रपति संसार के प्रजातांत्रिक राष्ट्रों का भी नेता बन गया है। "वास्तव में, अमेरिकी राष्ट्रपति समस्त पश्चिम गुट का प्रधान तथा सम्पूर्ण संसार में शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने का मुख्य साधन बन गया है।"
इस प्रकार, हम देखते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियां प्राप्त हैं। उसकी इन शक्तियों को देखते हुए ऑग ने कहा है कि "यूरोप के कुछ अधिनायकों को छोड़कर अमेरिका का राष्ट्रपति विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक है।" राष्ट्रपति की शक्तियों एवं प्रभाव के संबंध में विलसन का यह कथन उपयुक्त लगता है। "व्यक्ति तथा उसकी परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर राष्ट्रपति पद की स्थिति में परिवर्तन होता रहता है।"
राष्ट्रपति के उपर्युक्त शक्तियों को देखने पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वह एक तानाशाह भी है ? इस संबंध में यह कहा जा सकता है कि अमेरिकी संविधान ने कार्यपालिका की समस्त शक्तियां राष्ट्रपति को सौंपी है और उसके चुनाव के लिए ऐसी प्रणाली निर्मित की है जिससे उसके तानाशाह बनने का दुर्बल प्रशासक मात्र रहने की सम्भावना टाली जा सके। जैसा कि एक विदेश मंत्री ने कहा था, “(हम) अमेरिकी चार वर्ष के लिए एक राजा चुनते हैं और उसे कुछ सीमाओं के भीतर पूर्ण शक्तियां प्रदान करते हैं जिनको वह स्वयं ही निर्धारित करता है।" वस्तुतः अमेरिका में राष्ट्रपति की शक्तियों का संविधान में वर्णन है और उसपर कांग्रेस तथा उच्चतम न्यायालय का अंकुश है, इसलिए न तो वह शांति काल में और न ही संकटकाल में तानाशाह बन सकता है।
कार्यपालिका का अध्यक्ष होते हुए भी संवैधानिक रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति के अधिकार सीमित हैं फिर भी, उनके स्रोतों से अब उनकी शक्ति और सम्मान में वृद्धि हुई है, वह सम्भवतः संविधान निर्माताओं के कल्पना में भी नहीं थी।

समीक्षा
जब हम अमेरिकन राष्ट्रपति की स्थितियों का समीक्षा करते हैं तो पाते हैं कि अमेरिका में राष्ट्रपति का पद अत्यधिक महत्व का है। उसका स्थान सर्वोपरि है। कार्यपालिका के प्रधान के रूप में वह राष्ट्र से संबंधित सम्पूर्ण कार्यों का सम्पादन करता है। वह कार्यपालिका के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रधान है। इस हैसियत से वह राज्य और शासन दोनों करता है। वह राष्ट्र की एकता का प्रतीक है। नागरिकों का शुभचिंतक है। कार्यपालिका के अतिरिक्त वह व्यवस्थापिका का भी नेतृत्व करता है वह राष्ट्र का गौरवपूर्ण और प्रवीण दोनों है।
इस तरह, हम देखते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति अत्यन्त सम्मानित एवं शक्तिशाली व्यक्ति है। संकटकाल में उसकी शक्तियों में अपार वृद्धि देखने को मिलते हैं। व्यापक शक्तियों के बावजूद वह तानाशाह नहीं बन सकता क्योंकि उसपर कांग्रेस एवं उच्चतम न्यायालय का शिकंजा कसा हुआ है। फिर उसे जनता का भी डर बना रहता है। वस्तुतः वह जनहित एवं राष्ट्रहित में ही अपने अधिकारों का प्रयोग करता है। अन्ततः, निष्कर्ष के रूप में, लास्की के इन शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं- “अमेरिका का राष्ट्रपति राष्ट्रीय जीवन का प्रमुख है। वह राष्ट्र का मनोनीत नेता है और इसलिए उसे नाजुक तथा थकान वाले कार्य करने पड़ते हैं। कोई आश्चर्य नहीं यदि यह कहा जाये कि अपनी शक्ति के क्षेत्र में अपने प्रभाव के महत्व से और स्वयं अपने प्रधानमंत्री होने तथा एक महान राज्य के सर्वोच्च अध्यक्ष होने के कारण उसकी स्थिति अद्वितीय है।"

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